Public Program, Chitt apni aur rakhiye

मुंबई (भारत)

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Chitt Apni Aur Rakhiye 5th March 1975 Date : Place Mumbai Seminar & Meeting Type Speech Language Hindi

कल मैंने आपसे बताया था कि सहजयोग में जब आप पार हो जाते हैं, तो क्या चीज़ हो जाती है। किस तरह से आप गुणातीत में उतरते हैं और गुणातीत में उतर के आप किस तरह से अपनी चेतना में चैतन्य लहरियों को देखते हैं। और उनके द्वारा दूसरों का उद्धार करते हैं। ये गुणातीत का आशीर्वाद है । ये कलियुग का भी बड़ा भारी आशीर्वाद है । और इसकी भविष्यवाणी पहले बहुत बार हो चुकी है, कि कलियुग में जब बहुत से लोग परमात्मा को खोजते हये जंगलों में, कंदरों में और बड़ी बड़ी कठिन तपस्या में संन्यस्त भाव से वहाँ तपाचरण कर रहे थें। उनकी भक्ति का फल, उनके पाचारण का फल कलियुग में होने वाला है। जहाँ में सहज में ही कुण्डलिनी की जागृति हो कर के और सामूहिक उद्धार होगा, कल्याण होगा, मंगल होगा, लोग पार होंगे। सहजयोग की बात सही है और जिसके बारे में कहा है, वो भी सही बात है, क्योंकि सहज जो है वही एक तरीका प्रकृति का है। प्रकृति का अपना कोई भी तरीका असहज नहीं है। सब चीज़ सहज होती है। जैसे अपना श्वास लेना। हर तरह का काम जो प्रकृति करती है, जीवंत कार्य, वो सारा ही सहज होता है। लेकिन सहजयोग में एक …… (अस्पष्ट) होने के नाते …..(अस्पष्ट) खड़े हो जाते हैं। या जिसको कहना चाहिये कि मनुष्य इतना असहज है। मनुष्य ने अपने को इतना ज्यादा कॉम्प्लिकेट कर दिया है। मनुष्य ने अपने को इस कदर घेरे में डाल दिया है और इतना अपने को गलत चीज़ों से एकाकार कर लिया है, कि मनुष्य के लिये सहज होना ही कठिन बात है और ये सहजयोग की पहली कठिनाई है। पहली कठिनाई सहजयोगी की ये है। जैसे मनुष्य के मामले में मन में ये विचार है, अपने देश में विशेष, कि जब तक आप संन्यास नहीं लेंगे तब तक आप परमात्मा का नाम ले भी नहीं सकते। अब संन्यास लेना बिल्कुल बाह्य की बात है, बिल्कुल ही अधार्मिक बात है। उसका अन्दर के संन्यास से कोई मतलब ही नहीं बनता। अन्दर की साधुता जो है वो और चीज़ है और बाहर का दिखावा बिल्कुल और चीज़ है। बाहर के लोग अन्दर से साधू होते है, बाहर से गृहस्थी में होते है। राजा जनक जैसे एक ही हो गये थे, उस जमाने में। लेकिन आज वैसे अनेक हो सकते हैं। लेकिन जब ये बात कहते हैं तो गृहस्थ ही सामान्य लोग है और गृहस्थी लोग इसके अधिकारी हो गये । लेकिन गृहस्थ कितने कॉम्प्लिकेटेड है, क्योंकि गृहस्थी के लोग मेरे पास आते हैं अधिकतर, अभी जैसे यहाँ पे अधिकतर औरतें रो रही थी, वही बात है कि ‘हमारे बेटे का ठीक कर दो ।’ ‘हमारी बीबी ऐसी खराब हो गयी । हमारा लड़का ऐसा खराब हो गया। हमारे घर में पैसा नहीं। हमारे घर में लोग, बच्चे बीमार रहते हैं।’ कभी कछ है, कभी कुछ। गृहस्थों की जो प्रॉब्लेम्स हैं बहुत छोटी छोटी हैं। बहुत ही छोटी छोटी। इसलिये गृहस्थ की वृत्ति ही बहुत छोटी है। उसमें विशालता नहीं है । उसको अपना अगर बच्चा बीमार है तो बहुत बड़ी बात लगेगी । दूसरे का बच्चा बीमार है तो कुछ भी नहीं लगेगा । जैसे अपना बच्चा बीमार है, और अगर पड़ोसी ने रेडिओ चला दिया तो बहुत बुरा लगेगा। लेकिन दूसरे का बच्चा बीमार है और अपने यहाँ रेडिओ बज रहा होगा और पड़ोसी आ के कहे कि, ‘मेरा बच्चा नहीं सो सकता। रेडिओ बंद कर लो।’ तो कहेंगे कि, ‘अच्छा, दरवाजा बंद कर लो । हमारा रेडिओ ন

बंद नहीं हो सकता।’ यही बात है कि हमने सहजयोग में सामान्य लोगों को लिया हआ है और गृहस्थी के लोगों को लिया। गृहस्थी के प्रश्नों के वजह से ही सहजयोग धीरे धीरे, धीरे धीरे, चार कदम आगे चलता है तो तीन कदम पीछे आता है। पाँच कदम आगे चलता है तो फिर दो कदम पीछे आता है। एक आदमी सहजयोग में समझ लीजिये पूरी तरह से पार हो जाये ….(अस्पष्ट)। पुरूष क्या पार हो गया ? वो आधा-अधूरा ही है, लटकता हुआ चिपक रहा है। उसकी बीबी उसको खीचेगी । ‘अरे इसमें क्या रखा है?’ क्योंकि इसके दिमाग में ये बात आयी नहीं कि, ‘मैं क्यों नहीं पार हूँ? ये कौन होते हैं पार होने वाले?’ मन में ऐसी दुष्टता है एक तरह की। तो उसको लगेगा कि, ‘मेरा पति हो गया मैं क्यों नहीं हूँ?’ तो उसको फितायेगी। ‘तुम में क्या रखा है? मैंने बात की थी।’ कहोगे कि, ने कैसे जाना ? माँ तो सब कुछ जानती है। केवल कहेगी कि इनमें क्या पड़ने की जरूरत है । इसमें ये गड़बड़ है । इसमें ये घपला है। अब वो पति है। वो सोचता है कि ये तो मेरी बीबी है। माने ‘इससे मेरा विशेष संबंध है ही | पूर्वजन्म का तो संबंध होगा ही। जन्मजन्मांतर का कुछ संबंध है ही। तो जब तक मेरी पत्नी इस चीज़ को नहीं मानती तो मैं इसको कैसे मानूं?’ पैसे बचाये उसके और उसके साथ दौड़े। वो ही अच्छा है! वो चाहे अपना पैसा किसी और पे खर्च करें तो उसमें उसको हर्ज नहीं। और जो भी करना चाहे वो कर सकता है, लेकिन सहजयोग में माँ जब आता है तो वो अपनी पत्नी से बड़ा पक्का हो जाता है। क्योंकि सहजयोग आपको प्रेम सिखाता है। तो प्रेम सिखाने की वजह से वो अपने बीबी के प्रति भी करूणामय हो जाता है। और बीबी के लिये भी सोचने लगता है। और बीबी जो है वो उल्टा पढ़ाती है पट्टी। उसका डांवाडौल, डांवाडौल। जिनके सारे लोग जो हैं गृहस्थी वो सब डांवाडौल होते हैं। ये बड़ी भारी सहजयोग की विपदा है। बार बार चित्त जो है छोटी चीज़़ पे उलझता है। बहुत छोटी मैं चीज़ में। तुम क्यों नहीं आये? ‘वो मेरे पति का ऐसा था। उनकी बहन के फलाने के फलाने का शादी ब्याह हुआ, गयी थी ।’ फिर क्या? जाओ । ये नहीं कि संसार के कार्य छोड़ें, लेकिन जो अपने अन्दर की शक्तियाँ हैं ये , जिसके सहारे हमें उठने का है, जो परम का कर्तव्य है, उसको महत्त्वपूर्ण और सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण और वही सब कुछ नहीं मानियेगा। तब तक आप का गृहस्थ सिरीअसली नहीं होने वाला। कुछ भी नहीं ठीक होने वाला। उसमें चाहे पत्नी रुकावट डाले। आप उसकी बात मत सुनो। कोई भी रुकावट डाले आप उसको वो बात समझाईये | उसको कहिये, कि ये गलत बात है। अब देखिये सहजयोग में आपने जाना है, कि नाभि चक्र का बहुत स्थान है, जहाँ पे कि लक्ष्मी जी का बास है। आपकी पत्नी पर, अगर उनकी नाभि खराब होगी आप कितनी भी कोशिश करेंगे आपके घर में पैसा कभी रुक नहीं सकता। आपका पैसा सब …..(अस्पष्ट)। लेकिन अगर आपकी पत्नी की नाभि ठीक हो के अगर वो भी पार हो जाये, आप भी पार हो जाये, आप में संतोष आ जायेगा। घर में लक्ष्मी जी का राज्य आ जायेगा। लक्ष्मी जी का राज्य मतलब बहुत पैसा नहीं होता। उसका संतोष, उसका आनंद, उसकी शोभा, उसका यश, उसका भय । जैसे कोई बड़े घर की लड़की आयी आपके यहाँ ब्याह हो के। आपने देखा कि ये तो अजीब है। समझ में नहीं आता। ‘सबेरे चार बजे उठ कर के अपना घर नहीं साफ़ करती, कमरा नहीं साफ़ करती। सब ठीक तरह से नहीं रखती।’ वो बड़े घर की लड़की है। उसके यहाँ बहुत सारे नौकर थे। तो उसको तुमने कहा कि, ‘ये कैसे तुम्हारा तरीका है। समझ में नहीं आता। तुम सबेरे देर से उठी। आराम से अपना चाय पी रही है, ये कर रही है, वो कर रही है। हमको ऐसा लगा कि बिल्कुल बेकार की लड़की ले कर आ गये।’ भाई, लेकिन वो तो आपकी बह आयी है। आपने कोई

नौकरानी तो नहीं लानी थी। वो तो आपकी बह आयी। लेकिन आपने छोटे घर की लड़की लायी। वो सबेरे चार बजे उठेगी, बिस्तर वगैरा ठीक कर देगी, सब ठीक ठाक कर के रख देगी। लेकिन आपके घर में अगर कभी कोई नौकर आ जाये, तो आप देखियेगा कि, जो बड़े घर की लड़की होगी, उसको वो दिल खोल कर के एक अपनी चीज़ उठा के दे देगी। अपनी सास होगी, उसने अगर कह दिया लेकिन कहेगी, ‘लीजिये, लीजिये आप लीजिये।’ वही छोटे घर की लड़की आयेगी। वो नौकरानी जैसे रहेगी। वो आपसे कहेगी, ‘छोटा घर बड़ा घर पैसों से नहीं होता।’ इसमें कभी गड़बड़ नहीं करनी चाहिये। तबियत की बात है। तबियत जो पैसे से नहीं होती। राजापन जिसे कहते हैं। और जो छोटे घर की लड़की आयेगी जिनके घर में … (अस्पष्ट) का स्वभाव है, वो आयेगी तो वो क्या कहेगी? ‘अरे, इसको देने की क्या जरूरत है?’ अपनी सास की चीज़ें छुपायेगी । अपने बच्चों का खाना छुपा के रखेगी। कोई आयेगा तो उसको खाने को नहीं देगी। इतना गिनके देगी। ये अन्तर है। ये बड़ा भारी अन्तर पड़ जाता है। यही गृहस्थी की बात है। जब गृहस्थ आते हैं, घर में तो वो भी कभी कभी छोटे घर की लड़की जैसे बन जाते हैं । गृहस्थी में बड़प्पन आ गया तो अहाहा ! सोने पे सुहागा! बड़े तबियत का आदमी आ जाये, कि साहब कुछ भी हो जाये दुनिया में, मैं तो सहजयोग में बैठा हूँ और सहजयोग में बैठूंगा। तो उसके घर में लक्ष्मी तो आ ही जायेगी। उसके … (अस्पष्ट) क्योंकि साक्षात् परमात्मा ही उसके अन्दर विचरे हैं। साक्षात् आदिशक्ति की सारी शक्तियाँ ही उसके अन्दर विचरित है। उसका कोई अन्दाज है! लेकिन क्षुद्रता जो है वो गृहस्थी में बहुत पनपती है। बहुत पनपती है। ऑफिस में काफ़ी होता है। वो आदमी ऊपर चला गया। ये आदमी नीचे आ गया। ये हो गया, वो हो गया। इतना पैसा माँग लिया। उसके ये कर लिया । वो कर लिया। औरतों के मामलें और भी सत्यानाश। मेरी बह ने ऐसा कहा, मेरी सास ने ऐसा कहा। ये और वो। सब वही क्षुद्र क्षुद्र बातें करती रहेगी। उसी में अपनी सारी शक्ति नष्ट करेगा। ऐसा एकाध योगी आ जाये तो संन्यासी पक्का! और प्रेम से भर के कहता है कि, ‘माँ, मुझे पार कर लो। १ तो वो पार क्या होता है, चमकता है। ……उसके सारे ये नहीं कह रही हूँ कि तुम लोग संन्यास लो। कभी भी नहीं । लेकिन फर्क बता रही हूँ। गृहस्थी के लोग होते हैं वो छोटी तबियत होते हैं। बहुत छोटी तबियत होती है, बहुत ही छोटी । रात-दिन अपने बाल-बच्चे, घर-दार, ये , वो, कीड़े- चक्कर खतम हो चुके। इसका मतलब में तुमको मकौड़े। लेकिन काम तो इन्हीं में करना है। खिलने वाले हैं। इसी काम तो गृहस्थी में ही उठाना है। उसी में सहजयोग पनपने वाला है। उसी में फूल कीचड़ में कमल आने वाला है। लेकिन गृहस्थी में एक आदमी खड़ा हो जाये, फौरन कहेगा, ‘नहीं साहब, मैं तो पार हूँ।’ मैंने सहजयोग के बारे में सिर्फ अन्दर में पाया है। मैंने इसको पूरी तरह से जाना है। इसमें मुझे उठने का है तो कोई गृहस्थी वगैरा सब दब जाये। जैसे कि कमल है। खिल जायें एकदम से। एकदम से पनप जायें, ऊपर में आ जायें। सारा कुछ इतना खींचा खींचा है, पानी भी उसपे नहीं जायेगा । गृहस्थी को ये सोचना चाहिये कि हमें किस तरह से अपनी क्षुद्रता को कम करना चाहिये। गृहस्थी को ये विचार करना चाहिये कि हमारे अन्दर क्षुद्रता जो है उसको हमें कैसे ठीक करना चाहिये, जो पार हो जाये। जो पार नहीं हो उनसे तो अभी यही कहना है कि भैय्या, पार हो। क्योंकि हाथ में जब तक झाड़ नहीं आयेगा, आप सफ़ाई क्या करेंगे! जब तक आप अपने को मशिन से अलग नहीं करेंगे तब तक सफ़ाई कैसे करेंगे? जब आप अपने को नहीं जानेंगे तब दूसरों को कैसे जानेंगे? बहुतसी मांएं आती हैं कि ‘मेरे बच्चे को ठीक कर दो।’ जब मैं माँ को देखती हूँ वही भूत बनी बैठी है। वही भूत हैं तो बच्चों को

कैसे ठीक करें भाई। तुम तो ठीक हो पहले । पहले सहजयोग में आ के सब लोगों को चाहिये कि वो पूरी तरह से पायें। अपने कोई भी चक्र पकड़ने नहीं दीजिये। अपने चक्र साफ़ रखें। जब वो एक स्थिती आ जायेगी फिर वो दूसरों पे जायें। अपने बीबी, बच्चे, किसी को सुनने की जरूरत नहीं। कोई आपको सलाह दे तो आपको कभी नहीं सुनना चाहिये। ये आपकी विकनेस है और ये विकनेस बहुत मार खायेगी। मैंने ऐसे बहुत से सहजयोगी देखे हैं कि वो दूसरी औरतों पे निगाह रखते हैं, लेकिन सहजयोग के मामले में अपने बीबी के गुलाम! ऐसे लोग बहुत आगे नहीं जायेंगे । न उनको सहजयोग से कोई फ़ायदा है। न उनकी कोई बीमारी ठीक कर सकते हैं। लेकिन जिन लोगों ने अपना सहजयोग पूरी तरह से बना लिया है, पक्के तैयार हो गये हैं, जिनका घड़ा बिल्कुल तैयार हो गया है, उसी घड़े में से ये जो लक्ष्मी हैं, ये जो गृहस्थ की लक्ष्मी है ये बहने वाली है। ऐसा आदमी का गृहस्थ जरूर ठीक हो जायेगा। इस मामले में जबरदस्ती भी करना पड़े तो कोई हर्ज नहीं। इस मामले में आपको साफ़ साफ़ भी कहना पड़े कि, ‘नहीं, ये गलत बात है। में नहीं करने वाली। इस रस्ते पे मैं नहीं जाने वाला हूँ।’ उनको थोड़ा सा बुरा लग जाये तो भी हर्ज नहीं। धीरे धीरे धर्म की स्थापना होगी। जब घर के अन्दर धर्म की स्थापना हो जायेगी, जब आपके अन्दर में वो शूरत्व आ जायेगा, जब वो पुरुषार्थ आपके अन्दर आ जायेगा, उस चीज़ को आप पूरी तरह से पकड़ लेंगे तब दूसरा आदमी भी पिघलना शुरू हो जायेगा। फिर उसके पिघलने से आप उसका नुकसान कभी नहीं कर सकते हैं। आप उसका कितना भी बुरा सोचें आप उसका नुकसान नहीं कर सकते हैं। उसका उद्धार होगा, वो भी सन्मार्ग में आयेगा। वो भी पार हो जायेगा । उसका भी मंगलमय होगा। लेकिन अधिकतर आप देखियेगा, पार होने के बाद, ‘मेरी माँ ऐसी खराब है, मेरा बाप ऐसा खराब है। मेरी फलानी ऐसी है। वो ऐसी है। जैसे आदमी है, मियाँ-बीबी। ऐसे हमारे यहाँ बहुत से लोग हैं जिनके पति सहजयोग में काफ़ी उपर उठ गये और बीबी जो है सत्य साईबाबा की शिष्य। उसको सत्य नहीं, असत्य कहना चाहिये, पता नहीं क्या कहना चाहिये। बाधा इसके पीछे भाग रही है, उसके पीछे भाग रही है। ये कर रही, वो कर रही है। दूसरी कोई है। वो जा रही है। नाचती हैं, जहाँ पे वो, ‘घागरी फुंकणे’ बोलते हैं। ये होता है, वो होता है जहाँ पर वो जाती है। जाता ना तुम्ही तिथे? गेला होतात ना? गेला होतात की नाही? गेला असाल नक्की ! म्हणूनच हे. हे सगळं तिथून आलं आहे तुम्हाला. तुम्ही मगाशी म्हणालात ना मी कुठे नव्हते गेले? मग ठेवा हात तिथे. जनरलच बोलते मी. असा हात ठेवा. जिथे घागरी फुंकल्या जातात, तिथे जायचं नाही. ते भूतांचं आहे सगळं काम. भुतं आहेत भूतं ! त्या | बायकांच्या अंगात देवी आल्यात काय! देवीला अक्कल आहे की नाही, घाणेरड्या बायकांच्यामध्ये यायला ! (मराठी). हमारे महाराष्ट्र में ये सब बहुत है। इथून तिथून अशा लोकांना खेटराने ठीक करणार आहे मी. तुम्ही कोणी गेलात ना तर बघा! आणि मग घरात हे होतं आणि ते होतं. सगळ्यांना मिरच्यांच्या धुऱ्या द्या.(मराठी) सब मंदिर में जा कर के, पाँव छुआ के, तुम लोग जा के सब लोग। मंदिरों में मिरचों की धुरी लगा के आओ सब लोग। भागेंगे सब बड़वे और ये सब ‘घागरी फुंकणे’ वाले भूत। ये गृहस्थी में हो जाता है, कि मनुष्य जो है गृहस्थी के चक्कर में, अपना जो मूल कार्य है उसे भूल जाता है। इसलिये गृहस्थ को पार कराने में थोड़ी आसानी हो जाती है लेकिन उसको स्थिर कराने में बड़ी मुश्किल हो जाती है। क्योंकि वो आपस में सलाह मशवरा करता है। कोई संत 5

Original Transcript : Hindi हो तो वो संत से सलाह मशवरा करेगा। कल कोई संत हो तो वो संत ही से सलाह मशवरा करे और कोई असंत हो तो उसे संत लोग क्यों मशवरा करें? उसे क्यों बात करें? उसे क्यों पूछे वो, ‘कौन हो तुम?’ बोलने वाले कौन ? अपनी संतता पूरी करने के बाद, फिर आप दूसरों से पूछ सकते हैं, दूसरों से कह सकते हैं । इसलिये आपको जानना चाहिये कि सहजयोग का कार्य सर्वसाधारण, सामान्य गृहस्थी में होने वाला है, गृहस्थ में होने वाला है। पर उसमें सिर्फ एक चीज़ का विचार रखें की गृहस्थ को ये जानना चाहिये, गृहस्थ एक बड़ी भारी रुकावट है, एक बड़ी भारी बाधा भी है और बड़ा भारी माया, मोह, जंजाल है। इसका मतलब संन्यास लेना नहीं। उससे भागना नहीं। इसका मतलब उससे मुँह मोड़ना नहीं है। लेकिन उसे उस गृहस्थी में ले कर के ही अपना चिराग जलाना है। उस अँधेरे को ही रोशन करना है। जब हमारा चिराग वहाँ पर उठेगा तो वही गृहस्थी ऐसी चमक उठेगी की लोग कहेंगे कि ‘अहाहा! ये एक खानदान हुआ। ये एक घर हुआ। ये ऐसे लोग हुये हैं कि सारा ही घर धर्म में पड़ा। उनके बाल-बच्चे, सब कुछ!’ सहजयोग के वैसे भी और भी बहत से इम्पेडिमेंट और बाधायें हैं। उसमें से ये है कि सहज में ही सब होता है। एकदम सब कुछ हो जाता है। जैसे एकदम से आपका हाथ ले जा के चंद्रमा पे बिठा दिया। आपको समझ में नहीं आया ये क्या है? आप अगर चंद्रमा पे पहुँच गये तो आप जानिये कि चंद्रमा है या क्या है? पूछिये, देखिये। सहजयोग में पहुँचने के बाद जब तक आप उसे देखेंगे नहीं, पहुँचेंगे नहीं , उसको जानेंगे नहीं, तब तक आप मान ही नहीं सकती कि आपने कुछ पाया हुआ है। इसलिये पार होने के बाद जरूरी है कि आपको मेडिटेशन में आना चाहिये। क्योंकि पार होने के बाद ही सब कुछ सीखने का है और जानने का है, क्या ? ये क्या हुआ? ये क्या है? हम कौन हैं? ये कहाँ आ गये? यहाँ से बहने वाली चीज़ क्या है? इससे क्या ये क्या हो सकता है? ये कैसे हमने पा लिया? इसका सारा ही ज्ञान पार होने के बाद ही बताया जा सकता है। क्योंकि उससे पहले बताया हुआ जो कुछ भी ज्ञान है, वो सारा हवा ही है। वो किताबों में लिखा हुआ है। ऐसा तो बहुतों लिख लिया। उससे कोई फायदा नहीं। बाद में इसका एक्स्पिरिमेंट आप करें। यहाँ पे कुछ लोग हैं, उन्होंने फूलों पे किया। फूलों को वाइब्रेशन्स दिये। तो गुलाब के फूल भी इतने इतने (छोटे) आते थे, अब बड़े बड़े आने लग गये। उसमें बहुत सुगंध आने लग गयी। उसका रंग बहुत सुंदर है। इन चैतन्य लहरियों का एक्स्पिरिमेंट आप मनुष्यों पे तो बहुत कर सकते हैं। कोई अगर पागल लोग हो तो वो ठीक हो जाते हैं। किसी की अगर कोई बीमारियाँ हों, कैन्सर की बीमारी , सिर्फ सहजयोग से ही ठीक हो सकती है और किसी से हो ही नहीं सकती। मैं बार बार कह रही हूँ। कोई माने या न माने। इसका इलाज सिर्फ सहजयोग करें। इसका उपयोग, घर के खाने में , पीने में, उठने में, बैठने में, बोलने में, व्यवहार में, सोचने में, पढ़ने में, लिखने में, पॉलिटिक्स में, हर एक चीज़ में आप कर सकते हैं । इतनी बड़ी भारी चीज़ है । प्रेम का जो सत्य स्वरूप है वो ये है, इसकी शक्ति का वर्णन ही नहीं किया जा सकता है। ये कितनी शक्तिशाली चीज़ है। अभी मैं दिल्ली गयी थी। मैंने किसी को बताया नहीं था । क्योंकि मैं अपने पति के साथ थीं, पटना गयी थी | पटना से जिस दिन लौट के आयीं, तो वहाँ जितने भी सहजयोगी हैं सबके हाथ एकदम ठण्डे होने लगे और जोर से वाइब्रेशन्स आने लगे। मैंने किसी से बताया नहीं। तो उन्होंने हमारे भाई साहब से पूछा कि, ‘माताजी आ गयीं ব

क्या ? हमारे लोग इतने ठण्डे क्यों हो गये?’ तो भाई ने कहा, ‘आयी तो हैं। लेकिन अभी वो मिलेंगी नहीं।’ तो कुछ लोग चले आयें। एकदम फौरन पता चलता है कि माताजी आ गयी हैं। हम रास्ते से जा रहे थे। सामने से एक आदमी जा रहा था। उसको ऐसा लगा कि पीछे से उसको कोई खींच रहा है। मूड़ के देखा तो मोटर में बैठी हुई। कहने लगा कि, ‘माताजी, मैंने देखा कि आप आरयीं हैं। मुझे लगा कि कोई इधर खींच रहा है।’ कितनी सुन्दर चीज़ आपको मिली। इसका प्रयोग हर जगह आप कर सकते हैं। इतनी अद्भूत शक्ति! लेकिन अभी भी आप उसी तीन डायमेंशन के दायरे में घूम रहे हो। उसी में आप घूमना चाहते हैं, बीबी, बच्चे, ये, वो, घर – द्वार, पॉलिटिक्स, पोजीशन। बहत से बड़े बड़े लोगों को पार कराया मैंने। बहुत से बड़े बड़े लोग हैं। जिनको की आप कहिये कि मिनिस्टर है और क्या क्या उनके बड़े बड़े नाम होते हैं । सेक्रेटरी है, ये है, वो है। उनकी प्रायॉरिटी जो है, उनका जो मूल्य है, मूल्यांकन है, बदलता है। उनके लिये एक ….. (अस्पष्ट) बहुत महत्त्वपूर्ण है, बजाय इसके कि सहजयोग से …..(अस्पष्ट)। दिल्ली में एक, ‘माताजी, वाइब्रेशन्स चले गये।’ ‘भाई, तुमने किया क्या ?’ ‘हम तो अपनी नौकरी कर रहे हैं भगवान के कृपा से। ….(अस्पष्ट) किया ? वो प्रायॉरिटी तुम्हारी बदलनी चाहिये। आप मेडिटेशन करिये, आपका काम ऐसा होता है, ऐसा। डायनॅमिक काम होगा। और कोई टेंशन आप पे नहीं आता है। आप हमेशा फूले-फले रहते हैं। खुश रहते हैं। लेकिन प्रायॉरिटी वही रहेगी। उधर मिनिस्टर को मिलना ज्यादा इंपॉर्टंट है। माताजी है, उनको मिलने की क्या जरूरत? हाँ, अगर घर में कोई बीमार हो जाये या कैन्सर हो जाये , तो मिनिस्टर को छोड़ के माताजी के पास आयेंगे। दुःख में ही माताजी याद आती है हर दिन। मिनिस्टर तो नहीं ठीक कर सकते। चलो, माताजी के पास चलो। इसलिये जब गृहस्थिओं पे दु:ख पड़ता है, तभी वो परमात्मा की ओर झुकते हैं और तभी उस तरफ बढ़ते हैं। और जैसे ही दुःख खत्म हो जाता है , फिर क्या! ऐसे ऐसे प्रगती कैसे होगी? आप उस चीज़ को कैसे जानेंगे? जिसका की सारा के सारा भंडार मैं आप के सामने खुला करना चाहती हूँ। उस संपूर्ण ज्ञान और उस संपूर्ण प्रेम और उस संपूर्ण शक्तिशाली आनंद को आप कैसे जानियेगा? जब तक आप ये फालतू की चीज़ छोड़ कर के उस की ओर अग्रेसर नहीं होगे। करना तो वो चाहेंगे लेकिन आप को लेना भी आना चाहिये। उसके बाद खर्च करना भी आना चाहिये और फिर उसका मज़ा भी उठाने आना चाहिये। जैसे किसी निठल्लू बेटे को बाप ने बहुत सारी प्रॉपर्टी दे दी, वो क्या? ….(अस्पष्ट)। कल का ध्यान का प्रयोग विशेष रूप से ….(अस्पष्ट) उसी तरह से आज भी फिर करेंगे। और जो लोग पार हो गये हैं, नये नये पार हैं जिनको पार के बारे में मालूम नहीं, उनके लिये फिर से क्लास होगा। इधर एक और इधर लेडिज के लिये एक। दो क्लास होने चाहिये। उनसे आप लोग बातचीत करिये। इसमें ये जान लेना चाहिये कि कुछ लोगों की इसमें प्रगति काफ़ी हो चुकी है। बिल्कुल शंका नहीं। और उनसे आपको सीखना पड़ेगा। उसमें बुरा मानने की कौन सी बात है। वो आप से बड़े भाई है। चाहे उमर में आप बड़े हो। उसमें जेलसी की कोई बात नहीं। आप भी उनके जैसा रहिये। आप भी उसको जान लीजिये। उसमें गहनता में आ जाईये। आप वो बात समझ लीजिये। किसी को भी इसमें मानने की कोई बात नहीं। जो सत्य है वो सत्य है। आप कुछ लोग इस लेवल पे आ में से भी बुरा सकते हैं। इससे भी उँचे लेवल को पार करना है, इससे भी ऊँचा चढ़ने का है। उसका तो कोई प्रश्न ही नहीं । आज मैं जरूर चाहूँगी कि आप लोगों को कोई प्रश्न है तो पूछिये। लेकिन रियलाइज्ड आदमी पूछे । अनरियलाइज्ड आदमी नहीं ।

प्रश्न – (अस्पष्ट) श्री माताजी -अपने अन्दर में मैंने कहा था न कि तीन नाड़ियाँ हैं। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। अपना काम तो सुषुम्ना नाड़ी से चलता है। अब इड़ा और पिंगला नाड़़ियाँ दो इस तरह से हैं और बीच में से सुषुम्ना की नाड़ी बनायी हुयी है। अब समझ लीजिये कि आप के इस साइड में कुछ खराबी हो, या किसी तरह की बाधा आ जाये, तो ये चीज़ बंद हो जाती है। तो इस तरह से आप से चलता नहीं। और अगर इधर की हो जाती है, तो इधर बंद हो जाता है। इसलिये इधर से भी नहीं चलता है । इडा और पिंगला नाड़ी दोनों अपने हाथ से जानी जाती हैं। इसलिये ये राइट साइड से बंद हो जाने का मतलब है, कि राइट साइड् की जो नाड़ी है, राइट साइड् पे जो आपका प्रवाह है, वो प्रवाह आपका रुक गया है। क्योंकि आप की राइट साइड़ जो नाड़ी है उसमें कुछ गड़बड़ है। अब समझ लीजिये, राइट साइड़ में जिसकी नाड़ी बंद हो जाती है, उसकी इड़ा नाड़ी पकड़ी है । अब इड़ा नाड़ी पकड़ी हुई है इसका मतलब क्या? उसने कोई योग किया होगा। योगसाधना जिसने करी हो। सूर्य का तप किया हो। गायत्री का मंत्र किया हो। आदि वगैरा जो प्रकार किये हो, उसका राइट हैंड कमजोर हो जायेगा। याने उसमें से बाधा आयेगी । जो अच्छा, भूत बाधा जिस पर हुई है। माने ये सब, मैंने आपसे कल ही कहा, कि ये जो गुरु हैं, अधिकतर, असली गुरु हैं वो तो मैंने देखे नहीं। बहुत समय वो तो जंगलों में ही हैं। अधिकतर गुरु लोग जो पैसा खाते हैं, वैसे भी अनाधिकार चेष्टा जो करते हैं, ऐसे सभी गुरु अधिकतर भूत ही हैं। उनके कारण आपके लेफ्ट हैंड साइड़ में हो सकता है। आप पे कोई करनी कर सकता है। आप के ऊपर में कोई भूतबाधा हो सकती है, वो भी आप स्मशान के पास गये हो। कभी कोई डर गया हो या फिर कोई पागल आदमी हो, जो कुछ भी साइकिक याने मेंटली, इमोशनल प्रॉब्लेम है। इमोशनल प्रॉब्लेम है, वो आपको जो है लेफ्ट हैंड पे पता चलेगा। और जो मेंटल प्रॉब्लेम हैं वो राइट हैंड पे पता चलेगा। अब मेंटल का इतना क्लिअर नहीं होता, लेकिन इमोशनल आप समझ लीजिये और एक समझ लीजिये कि जिसे आप कह सकते हैं इगो। एक से इगो होता है और एक से सुपर इगो होता है। इससे इगो होता है और इससे सुपर इगो होता है। इगो जो है वो अतिशय में होता है, बहुत मेहनत करने वाले लोग होते हैं, ‘मेरे सर पे ये काम है। मेरे पर ये जिम्मेदारी है। मुझे ये करने का है। मैं इस जगह का फलाना सेक्रेटरी हूँ।’ इस तरह जो | लोग सोचते हैं, उन लोगों की ये साइड़ पकड़ जाती है। जो लोग लिथॅर्जिक हैं, लेकिन भूतबाधा आदि में फँस गये हैं, कहीं उनको भय हो गया , कहीं कुछ हो गया, जिनको इमोशनल प्रॉब्लेम हैं, जिनका सुपर इगो गडबड़ में हैं, उनका ये साइड़ बंद हो गया। इस तरह से दोनों साइड़ चलते हैं। आप में जो दोष है, वो आपको समझ लेना चाहिये। आप अगर है किसी वजह से हो सकता है कि आपने गुरुजी की सेवा करी होगी और उन्होंने आपको सेवा का फलस्वरूप आपके ये कुण्डलिनी की एक शक्ति ही खत्म कर दी होगी। हो सकता है! अधिकतर यही होता है। उनका इलाज बहुत ही गंदा हैं लेकिन है। ये तो आप जानते हैं। क्या बताऊँ मैं आपको! ये आप जानते हैं कि पुराने शरीर पे इसका इलाज लिखा हुआ है, कि ऐसे आदमी का नाम ले कर के और उस पे बंधन डाल के पॅराबोलिक और उसको जूते मारना चाहिये और वो इलाज सब से अच्छा है। हमने देखा है। लिंबू, उससे भी बेस्ट है । और उसको कितने भी जूते मारेंगे, १०८ कम से कम मारना चाहिये । ऐसे, अपना बच्चा है, समझ लीजिये, लड़का है, बदमाश है, शराब पीता है, सताता है, उसको आपको अगर ठीक ০

कराना है, तो पार पहले हो जाओ। खुद पार होना पड़ेगा तब होगा। उसका नाम लिख कर के उसको जूते मारो, वो ठीक हो जायेगा। इस तरह की चीज़ों से अआप बहुतों को ठीक कर सकते है। उसका मन ठीक हो जायेगा, उसकी बुद्धि ठीक हो जायेगी, क्योंकि आप उसको जूते मारिये, चाहे उसको तलवार मारिये, चाहे उसको कुछ भी करिये, उसका उद्धार ही होने वाला है । पर आप सही हो जाईये। इसी कारण आपके वाइब्रेशन्स कभी कभी कम हो जाते हैं , घट जाते हैं। शंका नहीं। अब बहुत से लोग पार हो जाते हैं । उसकी शंका ये कि कैसे हो सकता है? ऐसे आसानी से कैसे हो सकता है? ऐसे क्यों हो गया ? आपके मन में कोई अधर्म की भावना आयेगी तो भी बंद हो जायेगा । आपने किसी गलत आदमी के घर खाना खाया, तो भी वाइब्रेशन्स बंद हो सकते हैं। इसकी वजह ये है कि उस आदमी ने, एक आदमी है समझ लीजिये , बहुत ही खराब है । उसने किसी का मर्डर किया। आपको खुश करने के लिये आपको खाना खिला रहा है। आपने उसका खाना खा लिया, आपके नाभि चक्र पे उसके खराब वाइब्रेशन्स हैं, वहाँ के जो देवता है, वो लुप्त हो जाते हैं । गुप्त हो जाते हैं । वो शांत है। अब वो नहीं होंगे तो वाइब्रेशन्स कहाँ से आयेंगे । उन्हीं के थ्रू वाइब्रेशन्स चलते हैं। इस वजह से जिसकी नाभि पकड़ जाये उसके लिये श्रू अच्छा ये है कि पानी हाथ में लें। उसको जरा वाइब्रेट कर के माथे पे लगा कर उसे पिये। खाना खाने बैठे। खाने के उपर भी एक आप उसको सक्क्युलर ऐसे तीन मर्तबा उसकी प्रदक्षिणा कर लें। उसको भी आप वाइब्रेशन्स खाने को दें । पानी को भी आप हाथ डाल कर के उसको वाइब्रेशन्स दें । वो पानी पियें । अधिकतर चीज़ों को वाइब्रेशन्स दे कर के आप करें। आपको किसी से बात करना है। वो आदमी ठीक नहीं है, आपको मालूम है। उसको घर ही से वाइब्रेशन्स दे के उसके पास जायें। वो अगर बात कर रहा है ऐसी वैसी तो उसको वाइब्रेशन्स दे दें । वो अगर परमात्मा के विरोध में भी बात कर रहा है तो भी उसको वाइब्रेशन्स देते रहें। ऐसे ऐसे करने से उस पे प्रेम का बंधन पड़ जायेगा। वो आदमी खुद, उसका जो है ठीक हो जायेगा। उसके सहस्रार पे वाइब्रेशन्स आयेंगे और उसके कारण आप उसको ठीक करेंगे । ऐसे हजारों में मैंने अपने बाल-बच्चों को ठीक किया आप जानते ही हैं। इतनों ने अपने घर वालों को ठीक किया, बीबीओं को ठीक किया, बच्चों को ठीक किया। धीरे -धीरे वो खुद ही सन्मार्ग पे आ जायेंगे और उनकी भी जिंदगी सुधर जायेंगी । और कोई प्रश्न हो तो पूछिये। प्रश्न : ….(अस्पष्ट) श्री माताजी : सर में, आपको एक तो सर में, यहाँ सहस्रार में आपको पहले थ्रॉबिंग पता चलेगी। माने, जो हृदय में प्राण है, जो प्राणशक्ति है, वो उठ कर के उपर में आती है और आपके लिंबिक एरिया में जा कर के यहाँ मारती है। यही योग की साधना होती है। जिस वक्त में वो प्राणशक्ति आपके चेतना शक्ति से एकाकार हो जाती है, तब वो शांत हो जाती है। उसी वक्त आपके अन्दर से वाइब्रेशन्स निकलना शुरू हो जाते हैं। माने जो तीसरी शक्ति है, जो स्थिति की है, जो शिवजी की है, वो बहना शुरू हो जाती है। यही वाइब्रेशन्स होते हैं। और जब आप कह रहे हैं कि सर से आपके वाइब्रेशन्स जा रहे हैं, तब आपको जान लेना चाहिये कि सर से वाइब्रेशन्स जा रहे हैं या आपके | अन्दर थ्रॉबिंग हो रहा है। वो चीज़ ठीक नहीं । अगर आपके अन्दर शथ्रॉबिंग हो रहा है, तभी आपका सहस्रार चल रहा है। उसको शांत कर लेना चाहिये। उसको कहे कि आप शांत करें। आप सीधा हाथ फोटो पे रखें और एक हाथ

अपने सर पे रखें यूँ। या मेरी ओर भी आप कर सकते हैं । यहाँ पे, जिस जगह में हमारा तालु होता है। जिसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं। वहाँ पे आप लेफ्ट हैंड रखें और राइट हैंड हमारी ओर रखें। आप फोटो पे अगर थोड़ी देर हाथ रखें, तो आपको पता हो जायेगा, कोई न कोई आपकी उंगली जलना शुरू हो जायेगी, अगर आपके चक्र में बाधा है तो । नहीं तो आपके अन्दर पूरे वाइब्रेशन्स आयेंगे। आपको फौरन पता हो जायेगा कौनसी उंगली में, कहाँ पर हमें जलन | हो रही है। यहाँ जलन हो गयी तो समझ लीजिये कि आज्ञा चक्र में, यहाँ जलन हो गयी तो नाभि चक्र में है। इसके बारे में आप सब से यहाँ पर जानकारी कर लीजियेगा कि कौनसी कहाँ होती है। उसी के अनुसार फिर आप अपने हाथ रख लीजियेगा वहाँ पर जहाँ पर आपको बाधा है। सिर्फ हृदय चक्र के बारे में ऐसा है कि लेफ्ट हैंड जो है वो फोटो की ओर होना चाहिये, राइट हैंड हृदय पे होना चाहिये और बाकि जो कुछ भी बाधा, बाकी की है उस वक्त राइट हैंड फोटो पे होना चाहिये और लेफ्ट हैंड वहाँ होना चाहिये जहाँ आपको बाधा है और सब को आपको क्लॉक वाइज घुमाना चाहिये। इस तरह से करने से आपके चक्र ठीक हो। लेकिन कल भी मैंने आप से बताया था। आज भी बता रही हूँ आप से, कि सब से अच्छा तरीका, सब से बढ़िया तरीका, अपने सब चक्रों को हमेशा शुद्ध रखने का है। निर्विचारिता में रहना। जब भी आपको मौका मिले आप विचारों की ओर देख के, आप निर्विचारिता में चले जायेंगे। ये आपका …(अस्पष्ट)। इसमें जितनी आपकी स्थिति उँची उँची उठती जायेगी। वैसे वैसे अपने आपके चक्र जो है साफ़ होते जायेंगे। जितना भी हो सके आप निर्विचारिता में रहें। ये बहत बड़ी चीज़ है। हर संसार के जो कार्य और हर चीज़ की उलझन और हर चीज़ का प्रॉब्लेम जो आपका दिमाग उलझाता है, जो आपके अटेंशन को खींचता है, उसको कहना चाहिये की नहीं, ये तो माया है। ये तो माया है। एक बार कह दिया कि, ‘ये माया है, ये सब माया है और हम अन्दर खड़े हुये हैं। देख रहे हैं।’ तो धीरे धीरे वो चीज़ माया जो है वो छुपती जायेगी और सत्य आपके सामने रखना शुरू हो जायेगा। चित्त अपनी ओर रखें। दूसरों की ओर नहीं। मैं देखती हूँ कि जब भी मैं भाषण दे रही हूँ तब भी सब की आँखें घूम रही है। कोई आदमी आया । उसको जरूरी है कि देखना है? आँख का घूमना बंद करना पड़ेगा । जिस आदमी की आँख घूमती है, उस आदमी को पार कराना मुश्किल होता है। और मैंने ठाणे में ये कहा था लोगों से, अभी अंबरनाथ, आज कल जो लोगों की आदत पड़ गयी है कि हर औरत जायें उसको देखें । हर आदमी जायें उसको देखें। आँख उठा के देखिये । ये बहुत बुरी आदत है। इस से आज्ञा चक्र पे भूत बैठ जाते हैं। ये फ्लरटिंग है, फ्लर्टिंग | इसे कहते हैं, ये एक भूत का प्रकार है। ये बिल्कुल भूत का प्रकार है और जिस आदमी में ये आदत आ जाती है, उसके लिये पार होना बहुत मुश्किल है। फिर वो एक आदमी दूसरे को देखता है। उस तरह का आदमी तुमको भी, जैसे इनको हमने देखा कि इनमें वो आदत आ जायेगी। जब दुसरे आदमी को देखें, उनमें ये आदत आ जायेगी । और ये बढ़ते ही जाता है और ये भूत इस तरह के जो अतृप्त ही होते हैं, वो ऐसे लोगों के अन्दर आ जाते हैं। जिस | तरह से अतृप्त हैं। और हर एक आदमी में आ कर अपना कार्य करते हैं। और ऐसे आदमियों का आज्ञा चक्र इतना खराब कभी कभी हो जाता है, कि उसके बुद्धि में भ्रम हो जाता है और बुढ़ापे में उनकी बहुत मेमरी वगैरा क्षीण हो जाती है। इसलिये आँख का स्टेडी (स्थिर) होना बहत जरूरी है । आँख को आपको स्टेडी करना चाहिये। आँख

को अगर आपने स्टेडी कर लिया, स्टेडी ही रखें। हर एक चीज़ पे आँख घुमाने की कोई जरूरत नहीं है। जब तक आपको कोई लिखना ना हो, कुछ न करना हो, आप निर्विचारिता में ही देखते रहें । किसी की ओर घूर के भी देखने की जरूरत नहीं। आप अपनी ही ओर देखते रहें | स्थिर आँख करना बहुत जरूरी है । उसी तरह मैंने बताया था कि जिव्हा का भी स्थिर करना बहुत जरूरी है। जैसे ये कि लोगों की आदत है कि बहुत बोलेंगे या चुप रहेंगे। बीच में चलना चाहिये। जब बोलना है तब जरूरी बोलना है। जब नहीं बोलना है तब चुप रहिये। बड़बड़ करना, बकवास करना ये भी एक भूत का ही लक्षण है। मेरा तो सर पक जाता है, अगर कोई बड़बड़ा आदमी सामने आ जाये। और कोई अगर बिल्कुल ही नहीं बोलता है, तो वो भी एक भूत का लक्षण है। आप देखते हैं कि बहुत से पागल लोग दो तरह के हैं, एक तो बकते बहुत हैं या तो एकदम चूप हो जाते है। ये सब पागलपन की निशानियाँ हैं। सहजयोगी को चाहिये कि अपनी जिव्हा पर पूरा कंट्रोल करें। वो कर सकता है। उसी तरह से दूसरी चीज़ है खाने की। जिस आदमी को खाने की बहुत लालसा होती है, बहुत खाता है, वो भी है और जो नहीं खाता है, वो भी भूत है। मैंने पहले ही बताया था आपसे। तो इसलिये जिसको रसस्वाद भूत बहुत है, वो भी एक अच्छी चीज़ नहीं कि, ‘साहब उनको ये पसन्द है। उनको ये पसन्द नहीं। वो जिसने ज्यादा खिलायें । मिल गया शुरू कर दिया वो गया….(अस्पष्ट)। इसका मतलब ये भी नहीं की जबरदस्ती जीभ को कुछ तो खा लिया नहीं मिला तो नहीं खाया । किसी की गुलामी थोड़े ही करनी है। चाहे वो जीभ हो, चाहे आँख हो । चाहे कोई भी अपना इंद्रिय हो। किसी के लिये हमें गुलामी नहीं करनी चाहिये। होंगे, अपने जगह बैठे रहो। जब जरूरत होगी तब इस्तेमाल करेंगे। नहीं तो बैठे रहो। जैसे कि हमें बाहर जाना होता है। तब हम कहते हैं कोचवान से कि, ‘भाई , चलो, ले आओ सामने मोटर।’ ये थोड़ी कहे कि, ‘बताओ, चलते हो कि नहीं चलते हो ।’ इसलिये ये सारे आपके वाहन हैं। इनपे भी आप पूरी तरह से अधिकार जमा सकते हैं अगर सहजयोग में आपकी बैठक हो जाये । तो सब पे अपनी बैठक जमा लें । लेकिन सब का फिर सूत्र आता है कि निर्विचारिता। फिर सूत्र मिल जाता है निर्विचारिता में। निर्विचारिता में अगर कर रहे हैं और आपके चक्र अगर पकड़ रहे हैं तो निर्विचार हो भी बिल्कुल सायमल्टेनिअस चीज़ है। निर्विचारिता में रहना यही इसका सूत्र है। और जहाँ तक हो सके निर्विचार रहें, निर्विचारिता में। क्योंकि विचारों से ही सब इंद्रिय भी नहीं सकते। जैसे चक्र छूटेंगे आप निर्विचार हो जायेंगे । आपके प्रति संवेदनशील हैं । सभी चीज़ आपको संवेदना विचारों से ही देते हैं। अगर विचार ही न आये तो आप अपने में समायेंगे पूरी तरह से। इसका मतलब बेहोशी से नहीं। निर्विचार रहें। पूर्णतया निर्विचार रहें। अन्दर देखते रहें। निर्विचार रहें। उसी में आपकी प्रगति सब से अधिक में अधिक हो सकती है। | सब से आखिर में मैंने आपसे पहले अनेक बार बताया है, कि सहजयोग कलयुग में जो आज पनपने वाला है, इस दशा में इवोल्यूशन की स्थिति आ गयी है। उसमें विराट का स्वरूप पूर्णतया खुलने वाला है। और इसलिये आप सब उस विराट के अंग-प्रत्यंग हैं। और आप अगर अपने घर में बैठ कर के कहे, तो आप नहीं ज्यादा आगे बढ़ सकते। आपको बार बार इसी सम्मेलन में आना होगा। इसी ऑर्गनाइझेशन में आना पड़ेगा। ये ऑर्गनाइझेशन | मैंने बनाया है। किसी और ने बनाया नहीं। इसके विरोध में जाने की कोई जरूरत नहीं। इसमें जो गलत लोग होंगे वो

अपने आप गिर जायेंगे। उनको अपने आप जाना पड़ेगा । वो यहाँ टिकेंगे नहीं। ऑर्गनाइझेशन के विरोध में अगर कोई बात करता है या ऑर्गनाइझेशन के खिलाफ़ में कोई बात करता है। तो गलत बात है। दूसरी बात ये है कि कोई लोग आप से अग्रेसर हैं, उनको जरूरी अग्रगण्य मानना पड़ेगा। जब तक आप उनको अग्रगण्य नहीं मानेंगे, आप भी अग्रगण्य नहीं बनेंगे। अगर आपका एक बड़ा अफ़सर है, जब तक आप उसको अफ़सर नहीं मानेंगे आपको भी कोई मानने वाला नहीं। उस तक पहुँचने के लिये आपको मानना पड़ेगा । नहीं तो आप उस विषय में नहीं जानेंगे। उनसे जेलसी करना नहीं चाहिये। उनको मानना चाहिये जो आपसे उँचे उठ गये हैं। उनकी बात को मानना चाहिये क्योंकि सहजयोग साधना और ऑर्गनाइझेशन भी दो चीजें हो सकती हैं। पर सहजयोग में जो लोग आगे पहुँच गये हैं, वो लोग पढ़े लिखे हों, चाहे नहीं हों। उनकी कोई पोजिशन हो या नहीं हो। वो किसी दशा में हों या नहीं हो। लेकिन सहजयोग में वो फूले हये उपर में हैं, तो उनको मानना ही पड़ेगा । इनकी सिनिऑरिटी अपनी बनाती है, गर्वन्मेंट ने बनायी हुई सिनिऑरिटी नहीं चलती। कोई रिकमंडेशन से नहीं चलती है। क्योंकि आप बहुत बड़े अपने को समझ के नहीं चल सकते । उसकी बात माननी पड़ेगी। उनकी जेलसी नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि ये गलत तरीके है। मैंने बहतों को देखा है कि ऐसे गलत रास्ते से या गलत बातें बहुत बोलते हैं। और इसलिये उनकी प्रगति होती ही नहीं । बिल्कुल नहीं होती। जहाँ के तहाँ बैठे हये हैं। आपस में चार गुट बना कर के आपस में ऐसी ही बकवास करते हैं। और ये सोचते नहीं कि आदमी क्यों इतना नज़दीक है और क्यों दूसरा आदमी पीछे हट गया। अपनी प्रगति करो, अपने को बढ़ाओ| और नज़दीक आते जाओ। पास आते जाओ| शक्ति के बिल्कुल नज़दीक आ कर के शक्ति में एकाकार हो जाओ। ये संभव है। ये हो सकता है। गृहस्थी में ही हो सकता है। इस गृहस्थी को ही मेरा अनेक बार नमस्कार है। और आपको आश्चर्य होगा कि हर समय जब भी आदिशक्ति का अवतरण इस संसार में हुआ था, तो वो कोई संन्यासिनी के रूप में नहीं आयी थीं| उसने अपनी गृहस्थी बचा कर के, बना कर के संसार में कार्य किया । आज ध्यान में वाइब्रेशन्स बहुत जोरों में हैं। मैं और नहीं बोलूंगी आप वाइब्रेशन्स से ही जानिये । उसमें भाषा नहीं होती। रूप होता है। अपने आप बहता है। छोटे बच्चे समझते हैं, कोई भी भाषा मैं बोलूँ, चाहे अंग्रेजी, मराठी, हिन्दी में। ये प्रेम जो बह रहा है उसको जानो। उसको जानना है। इसको जो जान लेता है वही सब कुछ पा लेता है।