Shri Mahashivaratri Puja

Mumbai (India)

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1976-02-29 Mahashivaratri Puja: Utpatti – Adi Shakti aur Shiva ka Swaroop, Mumbai

मैं श्री शिवजी की पूजा के विषय में बता रही थी कि उनकी पूजा से आपके अंदर क्या परिवर्तन आने चाहिये। परंतु आज मैं आपको बताने जा रही हूं कि आत्म साक्षात्कार के बाद आपके अंदर आंतरिक रूप से क्या घटना चाहिये। यहां पर (माथे पर) आपके 11 रूद्र स्थापित हैं। हम कह सकते हैं कि वे शिवजी की शक्तियों के कणों के रूप में हैं या अंशरूप में हैं और ये सभी आपके अंदर से जीवन के विषय में सभी प्रकार के गलत विचारों को दूर करते हैं। उदा0 के लिये जब कुंडलिनी जागृत होती है तो वे सब भी जागृत हो जाते हैं ग्यारह के ग्यारह। उदाहरण के लिये बुद्ध उनके एक अंश के रूप में हैं… महावीर भी एक अंश के रूप में हैं। ये सभी हमें विभिन्न चीजों के जाल में फंसने से बचाते हैं, जैसे अहं के चंगुल से। बुद्ध हमें अहं का शिकार होने से बचाते हैं… आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे कि आप किस प्रकार से इतने अहंवादी हो गये थे जो आपके लिये अत्यंत अपमान भरी बात है। लेकिन जिस समय ये रूद्र जागृत नहीं होते… जब इन रूद्रों में बिल्कुल भी प्रकाश नहीं होता तब क्या होता है? आप स्वयं को तर्कसंगत ठहराने लगते हैं … तब आप सोचते हैं कि जो कुछ भी आप कर रहे थे वह ठीक है….जो कुछ भी आप कह रहे थे वह ठीक था … जो कुछ भी आपने प्राप्त किया …. आप समझते हैं कि आप बिल्कुल ठीक हैं…. आपने कुछ भी गलत नहीं किया। इसके लिये बुद्ध रूपी रूद्र को जागृत किया जाना चाहिये। इसके विपरीत यदि आप अपने अहं को बढ़ावा देते रहे …. अहंवादी बनते रहे तो आप पूर्णतया दांई नाड़ी प्रधान व्यक्ति बन जायेंगे। एक बार जब आप दांई नाड़ी प्रधान व्यक्ति बन जाते हैं तो आपको पता है कि उनके लक्षण क्या होते हैं? इसके लिये अगर आप अंतरावलोकन करें और देखें कि अहं ने आपके साथ क्या किया है …. अपने बारे में आपके क्या विचार हैं? इसीलिये मुहम्मद साहब ने कहा था कि स्वयं की जूता पिटाई करिये। उन्हें मालूम ही नहीं था कि और क्या कहा जाना चाहिये। क्योंकि ये अहं आपको तोड़ डालेगा, आपके सिर को तोड़ डालेगा और आप कई प्रकार की परेशानियों में पड़ जायेंगे। अंततः मैंने देखा है कि लोग युप्पीज रोग के शिकार हो जाते हैं जिसमें चेतन मस्तिष्क एकदम बेकार हो जाता है …. वह व्यक्ति बिल्कुल भी गति नहीं कर सकता है। लोग चेतन मस्तिष्क से बिल्कुल भी गति नहीं कर सकते हैं (इस रोग के कारण) बिना सोचे समझे तो वे हिल डुल भी पाते हैं लेकिन सोचकर या चेतन मस्तिष्क से हिल डुल नहीं पाते हैं। ये रोग इतना भयानक है व्यक्ति रेगने वाले जीवों की तरह से हो जाता है। आपको उन्हें अपने शरीर पर ढोकर ले जाना पड़ता है। वे अपने आप चल फिर भी नहीं पाते हैं … बैठ नहीं पाते हैं। ऐसा बहुत छोटी उम्र में भी हो सकता है। ऐसा अमेरिका में भी हो रहा है। मैंन यहां पर ऐसे दो तीन मामले देखे हैं, भारत में भी ऐसा ही हो रहा है। अतः यदि आपने अपने अहं को देखकर उसे नियंत्रित नहीं किया है और न ही आप इसके होने का पश्चाताप करते हैं …. कि हम तो पश्चाताप नहीं करते हैं। क्योंकि हम मानते हैं कि हमको आत्मसाक्षात्कार मिल चुका है तो हम गलतियां कर ही नहीं सकते हैं। लेकिन यह सत्य नहीं है। हमें अपनी गलतियों पर पश्चाताप करना पड़ेगा … अंग्रेजी भाषा में एक शब्द है सॉरी ….लोग हर बात के लिये सॉरी कहते हैं। यहां तक कि फोन उठाते ही वे सॉरी कहने लगते हैं। मैं पूछती हूं कि किस बात के लिये सॉरी? ये सॉरी शब्द भी एकदम खोखला है … इसका कोई अर्थ नहीं है … इसमें कोई गहराई नहीं है। जब आप सॉरी कहते हैं तो आपको देखना चाहिये कि आप क्यों सॉरी कहते हैं और क्या ठीक किया जाना चाहिये? आज की पीढ़ी की ये एक बहुत बड़ी समस्या है कि उन्होंने अपने अहं को बहुत बढ़ा लिया है। क्योंकि हमारी आर्थिक उन्नति, औद्यौगिक विकास, हमारे बड़े-बड़े संगठनों ने हमें ये सिखाया है कि हमें अपने अहं को विकसित करना चाहिये नहीं तो हम कहीं खो जायेंगे … कहीं के नहीं रह जायेंगे और इसी तरह से हम अपने अहं को बढ़ावा देने लगते हैं।
और दांई नाड़ी की समस्यायें प्रारंभ हो जाती हैं प्रतिक्रिया के रूप में फिर यह बांई ओर को चला जाता है। वास्तव में सिर में यह दांई ओर होता है….यहां पर दांई ओर का अहं ऊपर आता है और बांई ओर का रूद्र महावीर है। अतः लोग पाप करते हैं … गलत काम करते हैं … श्री गणेश के विरोध में कार्य करते हैं। इसके बाद श्री महावीर की नियंत्रणकारी शक्तियां आती हैं जो नियंत्रण करती हैं । वह कहते हैं कि आप नर्क में जायेंगे तो ये होगा … वो होगा। उन्होंने नरक की व्याख्या की है। प्रत्येक प्रकार के नरक की कि आप जब नरक में जायेंगे तो आपको जिंदा जला दिया जायेगा। मुझे तो ये सब बातें मालूम नहीं हैं। ऐसा वे आप लोगों को डराने के लिये कहते हैं। परंतु इससे कुछ फायदा नहीं हुआ है । अतः लोग बांई ओर को ज्यादा जाने लगते हैं और मुझे कहना चाहिये कि जब यह रूद्र प्रभावित हो जाता है तो व्यक्ति को भयंकर डिप्रेशन होने लगता है। वह अत्यधिक अवसाद में चला जाता है कि हे भगवान मुझे किस प्रकार का अवसाद हो गया है। मैं कितना बीमार हूं …ये हूं … वो हूं और फिर आप अपने डिप्रेशन से दूसरों को भयभीत करने लगते हैं … एक तरह का इमोशनल ब्लैकमेल करने लगते हैं। आप अनेक प्रकार के काम करने लगेंगे … अपना सिर फोड़ेंगे और ये या वो करेंगे। ऐसा अहं के कारण भी हो सकता है… या फिर बांई ओर के रूद्र की समस्या के कारण भी ये हो सकता हैं। ये दोनों रूद्र अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये हमारे दांये और बांये सिंपेथेटिक नर्वस सिस्टम से सीधे जुड़े होते हैं। अतः ये देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप इन दोनों रूद्रों को शिकार न बनें। इन रूद्रों को संतुष्ट किया जाना चाहिये। अतः सामान्य बने रहने के लिये कम से कम इन दो रूद्रों की देखभाल की जानी चाहिये … एक तो जो हमारे अहं को नियंत्रित करते हैं और दूसरा स्वयं के प्रति दयाभाव… .. मैं तो ये कर ही नहीं सकता … मैं ये हूं … या मैं वो हूं और फिर सभी प्रकार की अवसाद की बातें। शारीरिक रूप से भी यह कार्यान्वित होता है और फिर कैंसर जैसी गंभीर समस्यायें होने लगती हैं। यदि ये रूद्र पकड़ जाते हैं तो आपको कैंसर रोग हो सकता है। लेकिन आपका यह भाग (माथा) सूज जाता है इसको मेधा कहते हैं। आपके माथे का यह भाग सूज जाता है और आप देख सकते हैं कि कैंसर के रोगी के पूरे माथे पर सूजन रहती है ….. कभी एक तरफ या कभी दोनों तरफ। जब व्यक्ति के स्वभाव में अचानक से कोई बदलाव आने लगता है तो आप नहीं बता सकते हैं कि किस रूद्र के पकड़ने से उन्हें मनोदैहिक रोग हुआ है। सभी मनोदैहिक रोग तभी होते हैं जब उनके ये रूद्र प्रभावहीन हो जाते हैं। ये रूद्र व्यक्ति के प्रभुत्ववादी या अवसादग्रस्त स्वभाव के कारण प्रभावहीन हो जाते हैं। कई अन्य कारणों से भी ये प्रभावित हो जाते हैं। ये सभी कारक श्री शिव की या उनकी शक्तियों का ही एक भाग हैं। वह अत्यंत करूणामय हैं … दया से परिपूर्ण हैं वह तो दया का सागर ही हैं। आप यदि उनसे क्षमा मांगे तों वह आपको क्षमा कर देते हैं। आपने जो कुछ भी किया है उसके लिये स्वयं को दोषी न समझते हुये यदि आप उनसे क्षमा मांगे तो वह आपको क्षमा भी कर देते हैं। परंतु यदि आप समझते हैं कि जो कुछ भी आपने किया है वह बहुत अच्छा किया है. … आपने कभी किसी को दुःख नहीं दिया है …. आपके कारण किसी को भी कष्ट नहीं पंहुचा है तो वह सब जानते हैं। और जब वह सब कुछ जानते हैं तो उसका दंड भी देते हैं। आपकी इच्छा शक्ति और श्रीशिवजी के आशीर्वादों का एक मिश्रण होना चाहिये। जब शिवजी आशीर्वाद देते हैं तो आपकी इच्छा शक्ति भी बढ़ जाती है। लेकिन आपके अंदर जानने की पूर्ण इच्छा शक्ति होनी चाहिये कि आपका व्यक्तित्व कुछ विशेष ऊंचे स्तर का होना चाहिये। वह ऐसे वैसे व्यक्ति नहीं हैं। माना आप शिव जी को किसी पार्टी में ले जाते हैं या ऐसा ही कुछ और तो वहां वे किस तरह लगेंगे …. लोग उन पर हंसेंगे । जब मैं कुछ हिप्पियों से मिली तो मैंने उनसे पूछा कि आप लोगों ने इस प्रकार के बाल क्यों रखे हुये हैं उन्होंने बताया कि वे प्रिमिटिव या आदिकाल के लोगों की तरह से दिखना चाहते हैं। मैंने कहा कि लेकिन आप लोगों का मस्तिष्क तो आधुनिक है फिर आदिकाल की तरह से बाल रखने का क्या अर्थ है भला? कितना बड़ा छल है… स्वयं से छल करने से कुछ नहीं होने वाला। सबसे अच्छा तो यह होगा कि आप स्वयं का सामना करना सीखिये और समझने का प्रयास करिये कि आप क्या क्या गलतियां करते रहे हैं। आप लोग इतने सहजयोगी यहां पर बैठे हुये हैं मैं आपको बताना चाहती हूं कि यदि आप ऐसा कर पाये तो मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी सभी प्रकार की मूर्खतापूर्ण समस्यायें … आर्थिक हों या राजनीतिक …. सभी समाप्त हो जायेंगी। अब विश्व को बचाने की जिम्मेदारी हमारी है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम एक महान और सम्माननीय जीवन का सृजन करें … जो बनावटी न हो…. जिसमें दिखावा न हो। परंतु इसको अंदर से विकसित होना चाहिये ताकि आपकी आत्मा का प्रकाश फैले और जो इस विश्व को भी प्रकाशित कर दे। इन समस्याओं को समझना काफी महत्वपूर्ण है … और …. मुझे कहना चाहिये कि यह रोग, मनोदैहिक रोग और अन्य समस्यायें मानव द्वारा सृजित हैं। इनको परमात्मा ने नहीं सृजित किया है। लेकिन परमात्मा की शक्तियां इन समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करती हैं। यदि विश्व में काफी सहजयोगी हों और जो सहजयोग को सच्चे मायनों में कर रहे हों। यदि ऐसा कुछ किया जा सकता तो हम बहुत कुछ कर सकते हैं ….. मानवता के उत्थान के लिये बहुत कुछ कर सकते हैं और इसी कारण हमें आत्मसाक्षात्कार मिला है। यह केवल हमारे लिये नहीं है … हमारे परिवार के लिये भी नहीं है ….. नही हमारे शहर और देश के लिये है बल्कि पूरे विश्व के लिये है। सहजयोग कार्यान्वित होने वाला है। अब यदि आपको प्रतिस्पर्धा करनी है तो अपने उत्थान के विषय में करनी चाहिये और किसी क्षेत्र में नहीं। लेकिन लोग इतने बनावटी हैं कि वे सोचते हैं कि दिखावा करने से या कुछ बनने से उन्हें कुछ बड़ा प्राप्त हो जायेगा। आपको अपने प्रति नम्र होना होगा ताकि आप समझ सकें कि जो कुछ भी आप कर रहे हैं वह उन वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिये कर रहे हैं जिनका समाधान हम कर सकते हैं। हम वास्तव में इन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं क्योंकि आप परमात्मा के चैनल हैं । अगर मैं अकेले ये कार्य कर सकती तो कबका यह कार्य कर चुकी होती। लेकिन मैं ये नहीं कर सकती इसीलिये मुझे आप सबको एकत्र करके बताना पड़ रहा है कि आप सब चैनल बने। आप सब आनंद प्राप्त करें… जीवन का आनंद उठायें… आपके जीवन का प्रत्येक क्षण आनंद ही बन जाता है जो श्रीशिव का उपहार है। श्रीशिव ही इस महान चीज और प्रत्येक क्षण को भोगने के लिये सृजन करते हैं। हमें इस अवस्था को प्राप्त करना है लेकिन स्वयं की भर्त्सना करके नहीं और न ही अपने अहं को बढ़ावा देकर बल्कि यह देखकर कि आप में क्या है। यही मुख्य चीज आपको देखनी है कि आपकी समस्या क्या है और आपको जो चीज परेशान कर रही है वो आप स्वयं हैं यदि आप स्वयं ये समझ लेंगे तो मुझे भरोसा है कि आप विश्व को परिवर्तित के लिये विश्व को स्वयं की ओर देख पाने में सक्षम करने के लिये अत्यंत लाभदायक साबित होंगे। क्योंकि बाह्य रूप से आप इन गहन समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढ सकते हैं। आप लोगों को कुंडलिनी का आशीर्वाद प्राप्त है कि आप एक मशाल बन सकते हैं ….सत्य के मार्ग की और प्रेम व आनंद की मशाल बन सकते हैं।
परमात्मा आपको धन्य करें।