Gudi Padwa, Meditation in thoughtless awareness

New Delhi (भारत)

1976-03-30 Gudi Padwa, Meditation In Thoughtless Awareness New Delhi, India, 31' Download subtitles: EN,ES,FR,LT,PL,PT,RO,RU,SK,TR,UK,ZH-HANS,ZH-HANTView subtitles:
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[Hindi translation from English]

“गुड़ी पड़वा, “विचारहीन जागरूकता में ध्यान”

दिल्ली (भारत), 30 मार्च 1976।

हम ध्यान नहीं कर सकते; हम केवल ध्यान में हो सकते हैं। जब हम कहते हैं कि हम ध्यान करने जा रहे हैं तो इसका कोई अर्थ नहीं है। हमें ध्यान में रहना होगा। या तो आप घर के अंदर हों या घर के बाहर। ऐसा नहीं हो सकता की आप घर के अंदर हो  और फिर कहें कि: “अब मैं घर के बाहर हूं।” या जब आप घर के बाहर हों तो आप यह नहीं कह सकते: “मैं घर के अंदर हूँ।” “उसी तरह, जब आप अपने जीवन के तीन आयामों,  भावनात्मक और शारीरिक और मानसिक में आगे बढ़ रहे होते हैं| आप अपने अंदर नहीं हैं। “वास्तव में होना चाहिए” 

लेकिन जब आप अंदर होते हैं कि आप निर्विचार जागरूकता में होते हैं। फिर, न केवल आप वहां हैं, बल्कि आप हर जगह हैं, क्योंकि वह जगह है, यही वह स्थान है जहां आप वास्तव में सार्वभौमिक हैं … वहां से आप सम्पूर्ण विश्व के पदार्थ के हर कण में,हर सोच में जो की भावना है और हर योजना तथा विचार में व्याप्त होता शक्ति और मूल तत्व के संपर्क में हैं। आप इस सुंदर पृथ्वी का निर्माण करने वाले  सभी तत्वों में व्याप्त हो जाते हैं । आप पृथ्वी में, आकाश[इथर] में,तेज[प्रकाश] में,ध्वनि में व्याप्त हो जाते हैं| लेकिन आपकी गति बहुत धीमी है।

फिर आप कहते हैं: “मैं ध्यान कर रहा हूं,” इसका मतलब है कि आप वैश्विक सत्ता  के साथ व्याप्त हो कर गतिशील हो रहे हैं। लेकिन आप स्वयम गति नहीं कर रहे हैं अपितु स्वयम को उन चीज़ों से भार मुक्त कर रहें है जो आप की गति में बाधक हैं।

जब आप ध्यान में होते हैं तो आपको अपने आप को निर्विचार जागरूकता में रहने देना चाहिए। वहाँ, अचेतन खुद आप की जिम्मेदारी संभाल लेंगे। आप अचेतन के बल से आगे बढ़ना शुरू करेंगे। अचेतन इसे कार्यान्वित करने जा रहा है। यह आपको वहां ले जाने वाला है, जहां यह चाहता है कि आप जाएं। आप हर समय निर्विचार  जागरूकता में रहें। जितना हो सके निर्विचारिता को बनाए रखने की कोशिश करें। जब आप निर्विचार जागरूकता में होते हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि आप परमेश्वर और उनके लोगों के राज्य में हैं, उसकी व्यवस्था, उसकी चेतना, आपकी देखभाल करने जा रही है। यहां तक ​​कि जब आप अन्य लोगों को चैतन्य दे रहे होते हैं, मैंने देखा है कि आप निर्विचार जागरूकता में नहीं होते हैं। यदि आप निर्विचार जागरूकता में चैतन्य देते हैं, तो आप को कोई भी पकड़ नहीं आएगी क्योंकि ये सभी बाधाएं जो आप में प्रवेश करती हैं, ये सभी शारीरिक,भौतिक समस्याएं आप में तब आती हैं, जब आप उन तीन आयामों [शारीरिक,मानसिक, और भावनात्मक ]में होते हैं।

सहज योग के माध्यम से, आपने अपने स्वयं के अस्तित्व के द्वार खोल दिए हैं। आपने स्वयम के राज्य में प्रवेश किया है, लेकिन आप वहां बने नहीं रह पाते हैं। आप इससे बाहर आ जाते हैं और फिर से आप वापस जाते हैं और ठहर जाते हैं – कोई बात नहीं। आपको इसके बारे में इतना हताश-निराश नहीं होना चाहिए। आप जानते हैं कि लोगों ने हजारों वर्षों तक काम किया है और वे स्वयम को खुद से अलग नहीं कर पाए। केवल आप लोग, सहज योगी, जो स्वयं श्री गणेश के प्रतिरुप जैसे बने हैं, इतने शक्तिशाली हैं, कि वे अन्य लोगों को जागृति और आत्मसाक्षात्कार दे सकते हैं। यहां तक ​​कि अगर आप पकड़े हुए हैं, तो भी आपने देखा है कि आपके पास शक्तियां हैं। यहां तक ​​कि अगर आपको लगता है कि चैतन्य नहीं आ रहे हैं, तो आप जानते हैं कि आपके पास शक्तियां हैं। आप दूसरों को आत्मसाक्षात्कार दिला सकते हैं। आपकी उपस्थिति में लोगों को आत्मसाक्षात्कार मिलता है। लेकिन आपको पूरी तरह से वह शक्ति होना चाहिए।

माना की आपकी  कार में कुछ गड़बड़ है : लेकिन जब तक यह चल रही है, यह ठीक है। आपको इसकी मरम्मत करनी होगी। आपको हर समय अपने सभी घावों की मरम्मत करनी है, जो हमने अपनी मूर्खता से, अपनी वासना से, अपने लालच से, अपनाई गयी कई झूठी पहचानों से स्वयम को दिए हैं। हमें अपनी कमजोरियों पर पूरा ध्यान देना चाहिए न कि अपनी उपलब्धियों की ओर। अगर हमें हमारी कमजोरियां पता है, तो हम वास्तव में बेहतर तैर कर पार कर सकते हैं। मान लीजिए, एक जहाज में एक छेद है और पानी उस छेद से अंदर आ रहा है, सभी सवार, सभी कर्मचारियों और स्वयं कप्तान का ध्यान और कहीं नहीं उस छेद पर होगा जहां से पानी अंदर आ रहा है। उसी तरह, आपको चौकीदारी पर होना चाहिए। एक सहज योगी के लिए बहुत सारे गड्ढे हैं – मैंने उन्हें देखा है।

बेशक, अतीत भी खत्म हो गया है- अतीत को भी काबू किया जा सकता है। वर्तमान में भी उनके पास पिछले काम की कई छायाएं हैं। उदाहरण के लिए, जब आप एक समूह में बैठे होते हैं, तो आप एक दूसरे में लिप्त होते हैं। जो भी, किसी भी रिश्ते से, एक दूसरे के साथ लिप्त हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि इस तरह की लिप्तता उनके व्यक्तिगत उत्थान को प्राप्त करने में किसी भी तरह सहायक नहीं है। यद्यपि आप सामूहिक रूप से एक दूसरे से सम्बन्धित तथा संचार में हैं, फिर भी हर कोई व्यक्तिगत रूप से उत्थानरत है; बल्कि उत्थान व्यक्तिगत है, बिल्कुल व्यक्तिगत है। इसलिए चाहे वह आपका बेटा, भाई, बहन, पत्नी, दोस्त ही क्यों न हो, आपको यह याद रखना चाहिए कि आप उनके उत्थान के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आप उनकी सहायता के लिए उनकी मदद नहीं कर सकते। केवल माँ की कृपा और उनकी खुद की इच्छा, जो तीन आयामी है, उन्हें छोड़ने का उनका अपना प्रयास,उनकी मदद करेगा।

इसलिए जब भी कोई ऐसा विचार आता है, तो आप, आपको पता होना चाहिए कि आपने पूर्णता में निर्विचार जागरूकता प्राप्त नहीं की है और इसीलिए आपको तीन आयामी समस्याएँ हैं। कभी-कभी, एक सहज योगी को पता चलेगा की एक भावना उसके दिमाग में आएगी। यह आपत्ति या हताशा का भाव होगा और वह स्वयं या दूसरों से अरुचि करेगा। दोनों चीजें एक जैसी हैं। मैंने देखा है कि कुछ सहज योगियों को दूसरों से बहुत अरुचि होती है। कोई ऐसी अरुचि  नहीं होनी चाहिए जो स्थायी हो। बेशक, थोड़े समय के लिए, आपको अरुचि महसूस हो सकती है। ठीक है। यह एक गुजरता हुआ चरण है। या आप अपने आप से निराशा  महसूस कर सकते हैं – एक गुजरता हुआ चरण हो सकता है। लेकिन अगर आप उस पर लगे रहते हैं, या यदि आप उससे चिपके रहते हैं, तो इसका मतलब है कि आप खुद को कंडीशनिंग कर रहे हैं, इसका मतलब है कि आप निर्विचार जागरूकता में नहीं हैं, इसका मतलब है कि आप अपने अतीत में हैं, आप अपना अतीत को अपने दिमाग में ठोस बना रहे हैं।

वर्तमान में सब कुछ क्षणभंगुर है। जो शाश्वत नहीं है सब कुछ क्षणभंगुर है। वर्तमान में शाश्वत रहता है, बाकी सभी बाहर फिंक जाता है। यह एक बहती नदी की तरह है जो कहीं भी नहीं रुकती है। लेकिन बहती नदी शाश्वत है। बाकी सारी चीजें बदल रही हैं। यदि आप शाश्वत के सिद्धांत पर हैं, तो जो कुछ भी शाश्वत नहीं है बाहर फिंक जाता है, विलीन हो जाता है और अस्तित्वहीन हो जाता  है।

हमें अपनी गरिमा, अपना सार समझना होगा। सबसे पहला और महत्वपूर्ण यह है कि सभी सहज योगी चुनिन्दा हैं। वे ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने चुना है। दिल्ली के इस शहर में हजारों और हजारों लोग हैं। पूरी दुनिया में बहुत सारे लोग हैं कि हम अति आबादी से पीड़ित हैं, लेकिन सहज योग में बहुत, बहुत कम लोग हैं। और जब आप शुरुआत में  चुने जाते हैं, तो आपको यह भी महसूस करना चाहिए कि आप नींव हैं। आप ऐसे पत्थर हैं जिन्हें नीचे रखा जाना है और मजबूत होना है, सहनशील होना है और इसीलिए यह आवश्यक है कि आप सभी जो अभी कम ही हैं, वे शुरूआती  दीपक हैं जो दुनिया में अन्य दीपकों को जगाने वाले हैं , आपको अनंत काल की शक्ति, ईश्वरीय प्रेम की शक्ति, इस वैश्विक अस्तित्व की शक्ति,  जो की आप हैं ही,  का आनंद लेना है।

यही ध्यान है। इसलिए जब सहज योगियों ने मुझसे पूछा: “हमें ध्यान के लिए क्या करना चाहिए?” आप निर्विचार जागरूकता में रहो बस इतना ही| इस समय कुछ मत करो | कि आप लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं, या यह कि अचेतन आप का जिम्मा ले रहा है, न केवल ऐसा, बल्कि यह भी कि, पहली बार प्रकृति में, आपके परिवेश में ,  सार्वभौमिक रूप से आपसे जुड़े हुए अन्य लोगों में, आप दिव्यता उत्सर्जित कर रहे हैं। केवल एक बात यह है कि हम एक चीज के आदी हैं की, हमें इसके बारे में कुछ करना चाहिए, और इसलिए हम कुछ करना शुरू करते हैं। ध्यान सबसे सहज विधि है। तब हमारे पास प्रार्थना होती है और हम पूजा भी करते हैं।जो शाश्वत है वह पाने की इच्छा से प्रार्थनाएं यदि हृदय में  पूर्ण समर्पण से की जाएँ, तो यह सफल होगी। बस उस के लिए प्रार्थना करें और बाकी [आपको कदम-दर-कदम ले जाया जाएगा।

सभी सहज योगियों को एक समस्या है। और उन्हें अपने अतीत के कारण, अपनी भविष्य की आकांक्षाओं के कारण समस्याएँ हैं। अब जब आपको समस्याएं हैं, सहज योग में आपने उन्हें दूर करने का तरीका सीखा है। ध्यान के अलावा और भी कई तरीके हैं – आप उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं कि, आपको पता होना चाहिए कि चक्र क्या है, कुंडलिनी कहां है। अब, यदि कुंडलिनी को एक निश्चित चक्र द्वारा रोका गया है, जो काम नहीं कर रहा है, तो आपको इससे निराश नहीं होना चाहिए। अपने साधन या अपनी कार का रास्ते में रुक जाना , इससे निराश होने का क्या फायदा? आपको मशीन प्रणाली का ज्ञान सीखना होगा। आपको एक अच्छा तकनीशियन होना है और फिर आप इसे बहुत अच्छी तरह से प्रबंधित कर सकते हैं। तो सहज योग की सभी तकनीकों को सीखना और महारत हासिल करना चाहिए। यह आप केवल दूसरों को देने और उन्हें सुधारने और खुद को सही करने से सीख सकते हैं।

निराश होने की कोई बात नहीं है। यह सबसे बुरी बात है। अगर आप खुद से निराश और नाखुश हैं तो परेशानी होने वाली है। आपको खुद पर हंसना होगा और अपनी तंत्र प्रणाली [शरीर और आदतें] जो बिगड़ी पड़ी है, पर हंसना होगा। जब तुम स्वयम को चाहे अपने यंत्र के माध्यम से ही सही पहचानने लगते हो, तब तुम वहां नहीं होते। आप चक्र नहीं हैं, आप विभिन्न नाडी नहीं हैं। आप चेतना हैं, आप शक्ति हैं, आप कुंडलिनी हैं। इसलिए आपको इन सभी चीजों की जोकि ठीक दशा में नहीं हैं के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। यदि वे ठीक नहीं हैं, तो आप इसे हल कर सकते हैं।

अभी लाइट चली गई थी । अगर बिजली की आपूर्ति बंद होने के कारण लाइट चली गई है, तो यह एक गंभीर बात है। लेकिन यदि बल्ब ख़राब होने के कारण अगर रोशनी चली गई है: ओह, आप इसे बदल सकते हैं, आप यह सब कर सकते हैं। तो अगर आपके चक्र खराब हो गए हैं तो चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। चिंता करना, निराश रहना, करना, अपने आप में सहज योग के प्रति गलत रवैया है। ‘सहज’,का दुसरे शब्दों में अर्थ ही “सरल” है’। ‘सहज का मतलब है सरल होना है – मैं कह सकती हूं कि तुलसीदास (कबीर) ने कैसे कहा है:” जैसे राखऊ तैसे ही रहूँ “[आप मुझे जैसे रखेंगे, वैसे ही मैं रहूँगा] उस तरह का रवैया ही आपके चित्त को अंदर ले जाता है, क्योंकि बाहर यह अकेला छुटा हुआ है, ;अकेला कुत्तों के लिए छोड़ देना। हम बाहर के सम्बन्ध में परेशान नहीं होते हैं। “जैसे भी आप मुझे रखते हैं, मैं उस तरीके से रहूंगा”। और आपको आश्चर्य होगा कि सब कुछ बहुत अच्छी तरह से समझ में आता है।

यहां तक ​​कि कभी-कभी, आप महसूस कर सकते हैं कि: “मुझे एक निश्चित स्थान पर पहुंचना चाहिए”, “मुझे यह भजन जरुर करना होगा”, “मुझे अवश्य ही इन चीजों को पूरा करना होगा” और कभी-कभी ऐसा नहीं होता है। कभी-कभी गलती से कोई चीज जैसा आप चाहते हैं वैसे वह नहीं की जाती है। आपको इसे ईश्वर की इच्छा के रूप में स्वीकार करना चाहिए। यही वह कामना करता है। ठीक है। यही भगवान की इच्छा है और अब आप उनकी इच्छा के साथ एकाकर हैं। आप पूरी दुनिया के लिए  ईश्वर की इच्छा को  इस स्तर पर,अभिव्यक्त करने के लिए यहां हैं, यदि आप स्वयं के बारे में खुद ही अपनी इच्छाओं और विचारों को रखना शुरू करते हैं, तो कब आप ईश्वर की इच्छा बनेंगे?

इस ‘मैं-पन’ को दूर जाना होगा। यही ध्यान है। जहाँ आप ” मैं ” नहीं “तू” ही हैं। कबीरदासजी ने इसके बारे में एक सुंदर कविता लिखी है, जब बकरी जीवित रहती है रह रही है तो वह बोलती है  “मैं, मैं”। लेकिन जब उसकी मृत्यु हो जाती है और उसकी आंतें तारों के रूप में खींची जाती हैं और कुछ संत उन्हें “टुटारी”, उस वाद्ययंत्र जो कि उनके पास होता है, एकतारा में लगा देते हैं। और वह उसे अपनी उंगलियों से खींचता है, तब फिर यह कहती है: “तुही, तुही, तुही,” यह है: “तुम हो, तुम हो, तुम हो”। इसी तरह हमें मरना है और हमें पुनर्जीवित होना है। आप पहले भी रहे ही हैं, लेकिन जैसा कि मैंने आपको बताया है सहज योगी,एक खीर है, या कहें : “कच्चे घड़े की खीर है। तो कच्चे बर्तन की मिट्टी भी खीर में मिल जाती है। लेकिन आपका चित्त खीर में,  दूध में रह सकता है, और कच्चे बर्तन की मिट्टी को छोड़ सकता है। वह सुझबुझ  सहज है। यह वहाँ है। आपको आत्म-बोध मिल गया है। आप खुद महसूस कर सकते हैं। तुम्हें पता है कि वह तुम नहीं हो। आपने अपने चक्रों के बारे में उसी तरीके से बात करना शुरू कर दिया है। लेकिन सहज योगी के साथ केवल एक ही चीज, एकमात्र समस्या, या एकमात्र दोष,बावजूद की वह वहाँ है कि, उसका चित्त बाहर के साथ लिप्त है। यह एकमात्र दोष है | अगर चित्त हटा दिया जाए … कैसे हटाये? यही तो बात है। वह पहली बात है। एक बार, जब आप कहते हैं, “कैसे हटाये?” इसका मतलब है कि आपने त्रि-आयामी झंझट बना लिया है। आप को हटाना नहीं हैं। यह वहाँ पहले से ही है! अगर आपका ध्यान बाहर है, तो मैंने कहा होगा: “नहीं, तुम्हारे चित्त को अंदर जाना होगा। ऐसा अभी तक हासिल नहीं हुआ है। ” लेकिन यह वहाँ है। आप वहां बैठे हैं। मैं यहां बैठा हूं, लेकिन मेरा चित्त बाहर है। मुझे बस खुद महसूस करना है कि मैं कहाँ हूँ, काफी है

कुछ ने इसे महसूस किया है, कुछ ने इसे हासिल किया है। आप जानते हैं कि आप में से कुछ ऐसे भी हैं जो बहुत ऊपर गए हैं।

हमारे द्वारा प्रयुक्त दूसरी विधि पूजा की है। मैंने पाया है कि यह – पूजा –  मनुष्य के साथ बहुत अच्छा काम करती है, क्योंकि यह आप की अतीत की इस बाबद कुछ ना कुछ करने की आदत को संतुष्ट करता है। तब आप वह सब देना शुरू कर देते हैं, जो कुछ भी ईश्वर प्रदत आशीर्वाद स्वरूप आप को प्राप्त है। और ऋषि और मुनि ने पाया -[ वे बहुत चतुर लोग हैं] – उन्होंने ज्ञान पाया है कि कैसे देवताओं को प्रसन्न किया जाए, कैसे माता को प्रसन्न किया जाए। तो उन्होंने आपको बताया है, जैसा कि उन्होंने मेरे इस जीवनकाल में भी आपको बताया है कि कैसे उन्हें खुश करना है। वे कहते हैं कि वह स्तुतिप्रिया है, इसका मतलब है कि ‘वह प्रशंसा पसंद करती है।’ ऐसा नहीं है। लेकिन जब आप किसी व्यक्ति की दिल से प्रशंसा करते हैं, जिसका अर्थ है कि आप उसे स्वीकार कर रहे हैं, और यही वह समय है जब चक्र एक ऐसी शक्ति का निर्माण करना शुरू करते हैं, जिससे आपको परमात्मा के राज्य में प्रक्षेपित और सक्रीय किया जाता है।

तो इन पूजा विधियों,  प्रार्थना विधियों और मंत्र विधियों को सहज योग के महान गुरु,  सहज योग के महान विचारकों द्वारा खोजा और रचा गया है। और यह प्रयास है, या आप सहज योगियों का सहज प्रयास कह सकते हैं, जो, मुझे कहना चाहिए,मेरे शरीर को स्पंदित करता है, मेरे शरीर से सार निकालता है। वे बनाते हैं, यह सीमित अस्तित्व से असीमित को प्रकाशित करता है, इस परिमित जा रहा है के माध्यम से अनंत रिलीज। और यह काम करता है, यह क्लिक करता है, मैंने इसे देखा है, यह बहुत अच्छी तरह से काम करता है।

लेकिन आप जानते हैं कि पूजा के बाद, मैं थोड़ी थक जाती हूं क्योंकि, यदि आप इस शक्ति को ग्रहण नहीं कर पाते  हैं, मैं सोना चाहती हूं और “सुषुप्ति” [गहरी नींद] के दौरान, अनंत अवस्था में प्रवेश करके अतिरिक्त चैतन्य से छुटकारा पाना चाहती हूं। यदि पूजा के दौरान जो कुछ भी मैं उत्सर्जित कर रही हूं, उसे आप संतुलन में, प्राप्त कर सकते हैं, तभी यह बेहतर मदद करता है। इसका मतलब है, जब आप पूजा भी कर रहे हैं, तो इसे प्राप्त करें। जब आप पूजा कर रहे हों तो पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करने के लिए निर्विचार जागरूकता में रहें। लेकिन पूजा करते हुए भी लोग बातचीत कर रहे हैं। मैंने देखा है कि वे घूम रहे हैं। मेरा मतलब है, मुझे नहीं पता कि इसे कैसे समझाया जाए! यह समय कुछ ऐसा जब की अमृत प्रकट होता है, और आप इसे पूरी श्रद्धा द्वारा प्राप्त करते हैं। यह प्रकट होता है। यदि आप उस समय मेरे चक्रों के चैतन्य को महसूस करते हैं, तो आप महसूस करेंगे कि मेरे शरीर में छोटे, बहुत छोटे छोटे, चक्र अलग-अलग स्थानों पर, अलग-अलग गति से, अलग-अलग आयामों में घूम रहे हैं। और मैं सच में नहीं जानती कि कैसे समझाया जाए! लेकिन, आप देखते हैं, यह एक राग बनाता है। आपको इसे प्राप्त करना होगा और यह एक माधुर्य है जो ,प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत रूप से उपयुक्त है।और जब आप इसे प्राप्त करते हैं, तो यह आप में उस अनंतता की स्थिति को सक्रीय  करता है। इसलिए आपको पता होना चाहिए कि पूजा के समय आपका सारा ध्यान ग्रहण करने में होना चाहिए।

नव वर्ष के साथ ही आज का दिन बहुत ही महान है। आज से दो साल के भीतर, सतयुग शुरू होने जा रहा है। यह कई चीजों के लिए एक महान दिन है जो आज के बाद नौ दिनों तक माँ के अवतरण के लिए मनाया जाता है। इस तारीख अथवा मुझे कहना चाहिए, कैलेंडर की शुरुआत मेरे पूर्वजों ने की थी और उनका मानना ​​था कि यह वह दिन है जब माता ने रचना शुरू की थी। और यही वह दिन है जब उसने शुरुआत करने के लिए गणेश को बनाया।

उत्पत्ती के चरण[प्रथम चरण, उत्पत्ति] में, उसने इस दिन अपना काम शुरू किया। और इसीलिए बहुत पहले उन्होंने इस तारीख को पहली तारीख के रूप में रखा क्योंकि समय इस तारीख से शुरू हुआ था। और इसीलिए यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण है, और यदि आप इस तिथि को पार कर लेते हैं तो आप समय से परे हैं। आपको इस तारीख पर कदम रख कर आगे जाना होगा। आपको अपने धर्म पर खड़े होना होगा , अपने धर्म के परे जाना होगा :धर्मातित  ’। आपको उन तीन गुणों से परे होना होगा और आगे बढ़ना होगा:गुणातीत ’। आप तीनों ही हैं। लेकिन आप के कदम ठीक होना चाहिए और जिसे आपने पार किया है या कर रहें है वे सभी सही भी हों। इसलिए जब आप परे हैं, तो आपको उन कदमों को जिन्हें आप किसी तरह पार कर चुके हैं, सुधारना होगा, यह ध्यान, पूजा, प्रार्थना के माध्यम से किया जा सकता है।

लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण, सबसे बड़ी प्रगति आपके सार्वभौमिक व्यक्तित्व द्वारा सार्वभौमिक देकर की जाती है। आप सभी को अपना जीवन सहज योग को समर्पित करना चाहिए और अधिक से अधिक देना चाहिए। हमारे बीच कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने बहुत कुछ दिया है और इसके द्वारा उन्होंने बहुत कुछ हासिल किया है। आपको देना होगा, इसके बारे में बात करनी होगी, इसे फैलाना होगा और इसे प्राप्त करने के लिए और लोगों को लाना होगा। अन्यथा वे विकासवादी प्रक्रियाओं से अछूते रह जायेंगे। आपके पास संदेह और सोचने के लिए समय नहीं है; इन सभी बेकार की गतिविधियों में अपना समय बर्बाद न करें। यदि आपको अभी भी संदेह है, तो छोड़ देना बेहतर है।  इस प्रक्रिया में शामिल होने का आप के लिए यह उचित समय है।

इसलिए आज मैं आपको इस दुनिया में आध्यात्मिक जीवन की यात्रा के लिए नव वर्ष की शुभकामनाएं देती हूं। आपको उन सभी सहज योगियों के बारे में सोचना होगा जो हमसे बहुत दूर हैं और हमारे मन को उनके प्रति अपने प्यार को ले जाना चाहिए की उन्हें वैसा ही आशीर्वाद मिले जैसा की आप सभी को यहां मिला हैं।

मुझे उम्मीद है कि इन महत्वपूर्ण दिनों में जब की मैं यहां हूं, आप अपनी मुक्ति के लिए मेरे बताये उन चार तरीको से खुद को पूरी तरह से समर्पित करेंगे। और जो भी कार्यक्रम आता है, उसे सहज में लेते हैं। आपको समय और समयबद्धता पर जोर नहीं देना चाहिए। जो भी सहजता में आए, उसे स्वीकार करो।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करें!