Public Program

Birla Kreeda Kendra, मुंबई (भारत)

1979-01-14 Satya Ka Anveshan Mumbai NITL HD, 57'
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Public Program (Hindi). Birla Krida Kendra, Mumbai (India). 14 January 1979.

आशा है, आप लोग यहाँ सत्य की खोज में आए होंगे मैं आपसे हिंदी में बातचीत कर रही हूँ, कोई लोग ऐसे हों जो हिंदी बिलकुल ही नहीं समझते हैं तो फिर अंग्रेजी में बातचीत करुँगी| ठीक है| सत्य की खोज में मानव ही रह सकता है, जानवर, प्राणी नहीं रह सकते, उनको इसकी जरूरत नहीं होती मनुष्य ही को इसकी जरूरत होती है, कि वह सत्य को जाने| मनुष्य इस दशा में होता है, जहाँ वह जानता है कि कोई ना कोई चीज उससे छुपी हुई है और वह पूरी तरह से यह भी नहीं समझ पाता कि वह संसार में क्यों आया है? और वह इस उधेड़बुन में हर समय बना रहता है, की क्या मेरे जीवन का यही लक्ष्य है कि मैं खाऊ- पिऊ और जानवरों जैसे मर जाऊँ? की इसके अलावा भी कोई चीज सत्य है? सत्य का अन्वेषण मनुष्य के ही मस्तिष्क में जागरूक होता है| लेकिन सत्य के नाम पर जब हम खोजते हैं तो हम ना जाने किस चीज को सत्य समझ कर बैठते हैं, जैसे कि जब मानव सोचने- विचारने लग गया तो उसने संसार की जितनी जड़ चीजें थी उधर अपना ध्यान लगाया यानि यहाँ तक की वह चाँद पर पहुँच गया| कौन सा सत्य मिला उसे चाँद पर? साइंस की खोज की, तो उसमें उनको कौन सा सत्य मिला? जिन लोगों ने साइंस की खोज करके और अपने को बहुत प्रगल्भ समझा है एडवांस समझा है जिन्होंने सोचा है कि सारे संसार को हमने काबू में कर दिया है साइंस के बूते पर| आज उनके देशों में जाकर आप देखिए एक-एक घर टूट रहा है, एक-एक बच्चा रो रहा है, इतनी दारुण दशा है वहाँ क्योंकि अब तो मैं बहुत सालों से लंदन में रह रही हूँ| आप जानते हैं, लंडन शहर के अंदर कहा जाता है की, हर हफ्ते दो बच्चे मां-बाप मार डालते हैं और यह बच्चे कोई ऐसे अनैतिक बच्चे नहीं होते| बच्चों के मारने की तो वहाँ एक प्रघात सा बन गया है| कोई माँ- बाप को मार डालता है, कोई बुड्ढों को मार डालते हैं, कोई पति पत्नी को मार डालता है, पत्नी पति को मार डालती है, और जब किसी को मारने को नहीं मिलता है तो अपने को मारते बैठते हैं| फिर भी वहाँ न जाने लोग क्यों जहाँ पर सबसे ज्यादा सबसे अधिक सुबत्ता है, वहाँ सबसे ज्यादा आत्महत्या कर रहे हैं| इस तरफ हमारी दृष्टि नहीं जाती| हम लोग अपने आप को बहुत डेवलप कर रहे हैं| हम लोग नहीं सोचते की किस सत्य को इन लोगों ने पाया है जिसके कारण कि यह आत्महत्या पर तुले हुए हैं| सब तरह की सुबत्ता होते हुए भी इनके यहाँ हिप्पी जैसे लोग अपने को हर दिन मिटा रहे हैं, खत्म किए जा रहे हैं और यह वह जान गए हैं कि हमें अभी तक हमें सत्य तो मिला नहीं पर सत्य की जगह हमने बड़ा भारी कोई असत्य पाया है| इस आधुनिक काल में हिंदुस्तान में मेरी बात जरूर बड़ी अजीब सी लगती है, पर विदेश में नहीं| यहाँ मैंने सालों इस बंबई शहर में काम किया है लंदन में एक साल में जो काम किया वह बहुत ज्यादा है| आश्चर्य होता है, हिंदुस्तानी अभी सोच रहे हैं भारतीय की, अभी हम अगर इनके जैसे आधुनिक हो जाए, हमारे रोटी, कपड़े का अगर सवाल ठीक हो जाए तो हम बहुत ही ज्यादा विशेष हो जाए| रोटी  कपड़े का सवाल अपने देश में किन लोगों को है, हर तीसरे घर में भूत विद्या वहाँ होती है| हर दसवें घर बाद वहाँ पब होता है| जहाँ शराब पीते हैं जो इनके पास पैसा आया भी है, वह शराब और दुनिया भर के गंदे- गंदे व्यसनों में जा रहा है| इतनी भयंकर वहाँ की चीजें हैं कि मैं अगर आपको बताऊँ तो आप विश्वास भी नहीं करेंगे| वहाँ के कायदे- कानून पढ़ते ही साथ आप आश्चर्यचकित हो जाएँगे, क्योंकि हम यहाँ सोच भी नहीं सकते और जो हमारे यहाँ से वहाँ जाते हैं, साहब लोग जो वहाँ से सूट- बूट पहन कर आकर यह भी नहीं बताते हैं कि वहाँ पर किस तरह की गंदगी लोगों में फैल गई है और वहाँ किस तरह का एक दारुण चित्र बन रहा है| इस कदर अश्लील है सब कुछ की जो मैं आपको बता नहीं सकती| माँ के रिश्ते में मेरे जिव्हा पर यह शब्द आ नहीं सकते, इतनी घृणित है वहाँ की जिंदगी, जो टूट गई, बिखर गई है, उनको देखने के बाद हमें सोचना चाहिए कि हम किन चीजों की माँगे कर रहे हैं| जिन लोगों ने यह पाया है जो घर बैठे पैसा कमाते हैं| आज उनके बच्चे आपके देशों में आकर सत्य को खोज रहे हैं और यहाँ पर भी बड़े-से ठग एयरपोर्ट से ही उनको पकड़ ले रहे हैं| काफी ठग लोग भी तैयार हो गए अपने देश में| ठगों की तो अपने यहाँ जैसे अपने यहाँ मच्छर और खटमल आदि बहुत सारे पैरासाइट्स होते हैं उसी तरह धार्मिक ठग भी बहुत से निकल आए हैं| यह सब इसी वजह से होता है की मनुष्य सोचता है जब की, हमें अगर पैसा मिल जाए, हमारी अगर आर्थिक समृद्धि हो जाए तो हम बहुत बढ़िया हो जाए| इससे बढ़कर असत्य मनुष्य ने कोई नहीं खोजा| आप इस बात को शायद सोच रहे हों की माँ हमें इसलिए कह रही है क्योंकि आजकल हम हड़ताल बहुत यहाँ कर रहे हैं| इसलिए मैं नहीं कह रही हूँ, मैं इसलिए कह रही हूँ, की आप इस बात का अनुमान लगाएँ कि आप क्या खोज रहे हैं? आप शांति खोज रहे हैं या अशांति खोज रहे हैं? उसके तत्व पर आना चाहिए| आपके देश में जितनी शांति है मन में, आपके अंदर की घर में जाइए यह तो नहीं की, आपकी बीवी भाग गई, आपके बच्चे हैं वह ड्रग्स खाकर पडे हुए हैं| उसके अगर एक हजार हिस्सा भी अगर वहाँ शांति हो तो ठीक है आप उनके जैसे बनिए, लेकिन हमारे यहाँ हमारे नेता ही लोग नहीं जानते हैं की, हमारे अंदर कौन सी विशेषता है? क्या हमारे देश का विशेष स्वरूप है जिसकी वजह से यह देश आज भी टिका है| हमारा देश हमेशा ही से माँ का पुजारी रहा और शक्ति का पुजारी रहा, माँ की पूजा पवित्रता से ही होती है, यानी पवित्रता का पुजारी रहा है और संसार में सबसे पहले भगवान ने पवित्रता स्वरूप श्री गणेश को ही बनाया हम लोग पवित्रता के पुजारी हैं  न तो हम लोग पैसे-अडके के| यह हमारे देश की धुरी है जिस पर हम चल रहे थे और चलना चाहिए और यह धुरी मिटनी नहीं चाहिए है| यह अविनाशी धुरी हमारी बनी हुई है| कितने ही बेवकूफ आकर इस देश से चले जाएँ और कितने ही महामूर्ख हमें कितने भी भूले- भटकावे में डाल दे, तो भी इस देश की धुरी नहीं बदल सकती यह सारे संसार की धुरी| अब बड़े दुखी जीव यहाँ मैं देखती हूँ एक से एक, बड़ा आश्चर्य होता है मुझे इसका कारण हमारे पास जो सत्य का पता लगाया गया था और उसके बारे में जो बातें हमारे सामने थी वह हमने सब बंद करके रख दी| लॉर्ड मैकाले ने आकर हमें अंग्रेजी सिखा दी हो तो गए हम सब अंग्रेज साहब| मैं बड़ी खुश हूँ की लोग हिंदी भाषा समझने लगे नहीं तो, हिंदी भाषा समझना तो बिल्कुल गवारुपन होने लग गया क्योंकि हिंदी वाले भी गवारु है ही, वह भी नहीं जानते की हमारी कितनी बड़ी तपस्या से पाई हुई सत्य की पूँजी इसी देश में निहित जिसकी बदौलत हम सारे संसार की नेतागिरी कर सकते हैं| वह कौन सी पूँजी है वह कौन सा अन्वेषण है जो हमारे हाथ में है, इसी के बारे में मैं आपसे आज बताने वाली हूँ| जरा गौर से सुनना| हमारे देश में अनादि काल से लोगों ने ध्यान किया| ध्यान का मतलब है अंदर की खोज| बाहर की खोज नहीं, अंदर की खोज| इसके अनेक कारण है, जैसे मैं अपनी पुण्यभूमि, योग भूमि, भारत भूमि को वंदन करके कहती हूँ, इसका बड़ा भारी कारण यह है की इस योग भूमि का वातावरण इतना सहज है इतना सरल है उसमें कोई आफत नहीं| मैं उन्नीस सौ पैसठ में पहली मर्तबा जब इंग्लैंड गई तो मैं तो सोच रही थी की यह देश कोई प्रकोप में बड़ा हुआ है, या क्या इस तरह की ठंडी हवा इस तरह की बर्फ, इस तरह की नुकीली चुभने वाली हवाएँ बदन में जाकर के एक-एक रोम-रोम को इस तरह से दर्द से भर देती है, लबादे बदन पर लाद- लाद के लोग घूमते हैं, तब कहीं आप बाहर जा सकते हैं| कोई पेड़ के नीचे में लंदन में रह नहीं सकता| कोई झोपड़ियों में लंदन में रह नहीं सकता| वहाँ जब तक हीटिंग नहीं होगा तब तक आप घर में बैठ नहीं सकते| जहाँ का वातावरण ही मनुष्य के लिए इतना ज्यादा कठिन हो वहाँ मनुष्य जरूर ही वातावरण से लड़ेगा लेकिन यहाँ का वातावरण शांतमय और किसी भी तरह से उलझन में डालने वाला नहीं है| यहाँ का जीना इतना मुश्किल है ही नहीं, जितना वहाँ का जीना, इसीलिए जंगलों में भी थोड़े से चीजों से संतोष होकर के भी लोग रहते हैं| हमारे यहाँ जितने लोगों में संतोष हैं, आपको कहीं संसार में नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा जो वातावरण है वह संतोष से है वह हमें संतोष देता है और इसी संतोष के कारण ही मनुष्य की मनःस्थिति ऐसी है कि वह अंदर खोजता है इसी वजह से हमारे यहाँ अनादिकाल से बड़े-बड़े गुरुओं ने जो असली गुरु थे, उन्होंने गुरु घंटालों ने नहीं, असली लोगों ने जाकर के इस बात का पता लगाया कि हमारे अंदर कौन सी शक्ति विचरण करती है? किस शक्ति के द्वारा हम संचालित हैं? और क्यों हम इस संसार में आए हैं ? हमारा क्या अर्थ है? हम किस कारण बनाए गए? इसकी ओर उनका चित्त गया| इसकी ओर उन्होंने ध्यान दिया और उन्होंने बहुत कुछ अन्वेषण करके रखा| लेकिन हम तो अंग्रेज हैं, हमारे पास तो टाइम ही नहीं कि वह सब चीजें पढ़ें, या जाने, या समझे और जो समझते भी है उनको कहा जाता है की बड़े समझदार लोग हैं| वह भी इस कदर पाखंडी इतने झूठे और धर्मांध है की उनको देखते ही साथ ऐसा लगता है की यह ऐसे धर्म से तो भगवान बचाए| एक तरफ धर्मांधता की हद है, और दूसरी तरफ परमेश्वर के प्रति अविश्वास| इस दो किनारों के बीच परमात्मा की गंगा इसी देश में बही हुई है, और जिसे आपको जानना है और पाना है, और उसको आत्मसात करना है| यही हमारा सहज योग है| ‘सहज’ ‘सह’ माने आपके साथ, ‘ज’ मतलब पैदा हुआ| जो आपके साथ पैदा हुआ है| वही सहज योग है| सहज योग की यह चरम सीमा कहनी चाहिए| कृष्ण ने भी सहजयोग ही किया| नानक ने भी सहजयोग ही किया है| मोहम्मद साहब ने भी सहज योग ही किया है और ईसा मसीह ने भी सहजयोग ही किया है| लेकिन उसकी जो अंतिम चीज है जहाँ फूल का फल होना है वो आज इस समय होना है आधुनिक काल में होना है, और वह समय आ गया है की जब यह घटना घटित होगी| अब हमारा हाल ऐसा है कि क्या करें, अपने देश के लोग तो अंग्रेज हो गए| जो कि पवित्र है, जिनके घर में धार्मिकता है, जिनके ह्रदय में धार्मिकता है| वह तो अंग्रेज हो गए, और जो अंग्रेज है वह हिंदुस्तानी हो गए, पर उनमें वह धार्मिकता नहीं हैं| उनमें यह पवित्रता नहीं हैं| माँ- बहन का विचार नहीं है| चने हैं तो दाँत नहीं दाँत हैं तो चने नहीं हैं| लेकिन तो भी ऐसी कुछ असीम कृपा है की दोनों हालात में भी अनेक लोग इस बहती हुई अनुकंपा से आशिर्वादित हुए हैं| यह चीज क्या है? किस चीज का हमने पता लगाया? इस मामले में हमने अनेक बार इस होल में भी और अनेक हौंलो में बताया हुआ है, हमारे अंदर जो शक्ति निहित है, छिपी हुई है, जो नजरों में दिखाई नहीं देती है, उसको आप साइंस से नहीं जान सकते| साइंस से अंधेरे में आपको टटोल रहा है| एक चीज यह पकड़ ली, एक चीज वह पकड़ ली, एक चीज यह पकड़ ली| जब तक यहाँ पूर्ण प्रकाश नहीं होता तब तक आप पूरी चीज नहीं देख सकते और सम्यकता से आप उसे जान नहीं सकते| मनन वही प्रकाश देने वाली विधि है, जिससे मनुष्य अपना अंदर-बाहर पूरा जान लेता है| इतनी प्रचंड शक्ति हमारे अंदर सुप्तावस्था में है, इसके बारे में अनेक लोगों ने वर्णन किया हुआ है, कि तुम्हारे अंदर आत्मा बिराजता है| यह क्षेत्रज्ञ है वह सब कुछ जानता है जब तक वह जागरूक नहीं होता तब तक किसी भी चीज का अर्थ नहीं लगता| कल मैं गुरुवाणी पढ़ रही थी गुरुवाणी में कहीं भी उन्होंने यह नहीं बताया कि तुम अपने नाम लो| उन्होंने कहा कि जब तक तुम अपने आत्मा को नहीं पहचानोगे तब तक तुम परमात्मा को जान ही नहीं सकते और वह बड़े सादे शब्दों में एक अंग्रेज ने लिखा है उसका नाम है गेंट, जब तक तुम अपनी आत्मा को नहीं जान सकते तब तक तुम इसलिए परमात्मा को नहीं जान सकते क्योंकि परमात्मा को जानने के लिए आत्मा ही आँख है| (अस्पष्ट) को जानने के लिए जिस तरह यह पार्थिव आँखे हैं उसी तरह परमात्मा को जानने के लिए आत्मा ही आँखे हैं| यही चक्षु है जब तक यह नहीं खुलते तब तक आप परमात्मा को नहीं जान सकते और इसको पाए बगैर इसमें आत्म साक्षात्कार को अनुभूत किए बगैर जो लोग परमात्मा को कुछ भी करते हैं मंदिरों में जाना ब्राह्मणों को पैसा देना आदि आदि, या मस्जिदों में जाना और वहाँ जाकर लड़ाई झगड़े करना और गिरिजो में जाकर पोप लोगों को बड़े बड़े हीरे जवाहरात पहनाना| इन सब चीजों से परमात्मा का कभी भी ज्ञान नहीं हो सकता| उसके लिए अपनी आत्मा को ही खोलना पड़ेगा और उससे आगे यह भी कहा की जों इंसान इस तरह से परमात्मा को जानने का प्रयत्न करता है, हो सकता है कि वह शैतान ही को वरण रहा हो ना कि परमात्मा, क्योंकि उसके पास पहचानने के लिए आँखे नहीं है, जब अंधा आदमी किसी चीज का वरण करता है तो वह कैसे जानेगा कि वह सही चीज पर है या गलत चीज पर है, इसलिए आत्मसाक्षात्कार होना अत्यंत आवश्यक है| अब मैं यहाँ पर यहाँ तक कह सकते हैं क्योंकि अभी तो हमारी चढ़न है वहाँ लोग जो गड्ढे में गिर गया वह मेरी बातों को ज्यादा मानते हैं| यह भी कह सकते है कि माँ कहाँ आत्मा कहाँ परमात्मा, किसी पागलखाने में जाइए तो ऐसे ही अनुभव आते हैं| आत्मा कहाँ है? परमात्मा कहाँ है? हमें दिखा दो| आत्मा और परमात्मा आपके अंदर है बाहर नहीं| जो दिखता है उसके अंदर आप नहीं है| जब आप हॉल के बाहर थे तो आपको बाहर से हॉल दिखाई दे रहा था पर अब आप अंदर आ गए तब आपको हॉल नहीं दिखाई दे रहा जब अपनी आत्मा में आप स्थित होते हैं तब आप उसे देखते नहीं है उसे कार्यान्वित होते हैं| आत्मा का स्थान हमारे हृदय में है लेकिन इसको जानने के लिए हमारे अंदर कोई विशेष चीज बनाई गई या नहीं? परमात्मा ने ऐसी कोई विशेष मशीनरी हमारे अंदर रखी है या नहीं कोई ऐसी विशेष व्यवस्था की है? यह भी हमारे अनादि काल के गुरु लोग जानते थे की है, हम लोगों को किस तरह से बनाया गया हैं हम अंदर किस तरह से बने हुए हैं| यह भी उन्होंने अपने अंतर चक्षु से देखा था क्योंकि उनके अंदर आत्माएँ थी| आपके भी अंदर अभी आत्मा जागृत हुई नहीं है, इसलिए उनकी बात अजीब सी लगती है| जैसे कोई देहाती को बात बताएँ शहर की तो उसको अजीब लगती है| उसी प्रकार जो इस प्रांत में आए नहीं हैं, जो परमात्मा के प्रांत में आए नहीं हैं, उनके लिए यह सब चीजें अजीब लगती हैं| मनुष्य को परमात्मा ने अगर बनाया है, एक अमीबा से, आपको इतना सुंदर रूप दिया है तो कोई न कोई वजह होगी| इतनी मेहनत किस लिए की उसने जैसा की मैं कहती हूँ इसको मैंने बड़ी सुंदरता से बना लिया| आप कहेंगे माँ इतना अच्छा क्यों बनाया आपने? कभी आपने पूछा मुझे परमात्मा, आपने किस लिए बनाया? जब तक इसे मैं इसके मेंस से नहीं लगा देती हूँ, इसके स्तोत्र से नहीं लगा देती हूँ, इसका कोई अर्थ नहीं| सीधा हिसाब है| उसी प्रकार जब तक आप अपने उस स्तोत्र से नहीं लगते हैं आपका कोई भी अर्थ नहीं निकलता| आपके जीवन का कोई अर्थ नहीं निकलता, इसलिए आप बोर होते है अपने से| किसी आदमी से बोलो पाँच मिनट खाली बैठो तो वह तो या फिर सिगरेट पिएगा या शराब पिएगा या फिर भागेगा, इसीलिए मनुष्य व्यवस्था में जेल होती है| अगर मुझे कोई जेल में डालने कहे तो मैं तो आराम से बैठी हुई देखा करुँगी| मनुष्य जेल में भी इसलिए जाता है क्योंकि वह अपने को नहीं देख पाता वह घबराता है अकेले रहते हुए किसी से एकांतवास कह दीजिए तो उसके लिए वह सजा हो जाती है| एकांत से बढ़कर और क्या अच्छा होना चाहिए? जहाँ आप अपना आत्मा का विचरण करें, उसी के साथ रमण रह रहे हैं, उसी के साथ मजे मैं बैठे हुए हैं| और अपने अंदर इस तरह की व्यवस्था है यह भी सब ने कहा है| इसी देश में नहीं और भी देशों में कहा| जहाँ- जहाँ बड़े-बड़े अवतरण हुए हैं सबने कहा है कि तुम्हारे अंदर इसकी व्यवस्था हुई है, और तुम अपना जन्म फिर से लो| ईसा मसीह से उसके शिष्य ने (अस्पष्ट) पूछा, अरे भाई, इतने बड़े-बड़े लोग कैसे जन्म लेंगे? क्या वह अपनी माँ के उदर में जाएँगे, फिर से जन्म की बात क्या कर रहे हो? पुनर्जन्म की बात क्या कर रहे हो? ब्राह्मणत्व का मतलब द्विज, माने दो बार पैदा होने के बात क्या कर रहे हो? क्या फिर से हम अपनी माँ के उदर में जाकर जन्म ले, तब ईसा मसीह ने उसको जवाब दिया| कहा, हाँ, तुम्हारा पुनर्जन्म होगा| आत्मा और पानी के रूप में| अब पानी का अर्थ बहुत बड़ा होता है, वहाँ जिसे उन्होंने पानी कहा था, उसका अर्थ जैसे ईसाई लोग अब लगा कर बैठे हैं, वह दिखाई दे रहा है| गालिब ने कहा है, बेवकूफों की कमी नहीं ग़ालिब, बिन ढूँढे हजार मिलते हैं| किस चीज का अर्थ उल्टा कैसे लगाना चाहिए यह मनुष्यों से जाकर पूछिये| गीता का अर्थ एक लगा कर रखा हुआ है, बड़े-बड़े विद्वान बैठकर गीता के प्रवचन करते हैं और मैं देखती हूँ की बेवकूफी की बातें किए जा रहे हैं| बाइबल का तीसरा अर्थ निकला हुआ है| कन्फेस कहने लगे की कुरान में लिखा हुआ है कि हाथ में तलवार लेकर के तुम सब को मुसलमान बनवाओ| मैंने कहा, भैया मैंने तो पढ़ा नहीं| यहाँ रहमत रहीम की बात है| करीम और करामत की बात है| वहाँ कैसे हो सकता है कि वह ऐसी बात कहे? इस तरह का अंधापन जो कि साक्षात दत्तात्रेय ही संसार में आए हुए थे, उनके प्रति भी हम इस तरह के उच्चारण करने में जरा भी नहीं घबराते| जरा भी नहीं सोचते की, इतनी बड़ी हस्ती के पीछे में हमने बेवकूफ जिसको कुछ मालूम नहीं है इस तरह से क्यों कहे जा रहे हैं| कितने विशाल वह हैं जो ये लोग इस संसार में आए सारे संसार का मार्गदर्शन करने के लिए उनको क्या यह अरब समझेंगे? कभी-कभी सोचती हूँ यह दुर्भाग्य हिंदुस्थानी, जिन्होंने अपने बारे में कभी भी नहीं जाना| पूछिए इनसे, अपने देश के बारे में नहीं जाना, अपनी संस्कृति के बारे में नहीं जाना कल अगर इनसे पूछें की इनकी माँ का नाम क्या है? तो वह भी नहीं बता पाएँगे| इस कदर हम अभी भी उसी गुलामी के तरीकों से चल रहे हैं| इंग्लैंड में कोई भी हिंदुस्तानी आपको नहीं मिलेगा जो हिंदी में बातचीत करें या मराठी में करें, सब अंग्रेज सिर्फ (अस्पष्ट) नहीं है उनके पास अंग्रेज लोग हिंदुस्तानी संस्कृति सीखेंगे, पर यह लोग नहीं सीखने वाले| इस भारत में जहाँ की इतनी बड़ी शक्ति विचरित है वह कैसे जानिएगा? अगर आप इतने उथले है और इतनी सुपरफिशियल चीजों में आप अपने को इस तरह से लगाते हैं, हो ही नहीं सकता ना! जब तक गहरा ना डूबिएगा कुछ नहीं मिलने वाला, लेकिन आपके लिए डूबना मुश्किल नहीं है क्योंकि आपकी भूमि यही इतनी बड़ी उच्च चीज है की भारतवर्ष में जन्म लेने वाला कोई ना कोई बड़ी संपदा के साथ यहाँ आता है, या तो महादुष्ट भी इसमें जन्म लेता है की जो अच्छे लोगों का नाश करें, इस देश में जन्म लेने के लिए अनेक अनेक उपकार करने पड़ते हैं| अनेक पुण्य कर्म करने पड़ते हैं, तभी इस भारतवर्ष में आपका जन्म होता है, लेकिन कहते हैं ना टेकन फॉर ग्रांटेड| हमारे अंदर की जो शक्तियाँ हैं उसके बारे में सब बता गए, सब कुछ कह गए, लेकिन उसका उल्टा अर्थ बना कर के अपनी अपनी जेब भरने के सिवाय और कुछ नहीं किया हमने| हम अब आदि शंकराचार्य की बात कहें, इतने महान पुरुषों का ठिकाना करने में हम हिंदुओ कुछ बाकी नहीं रखा| उन्होंने कहा, कहा था ना योगे ना सॉके| किसी चीज से नहीं मिलने वाला| माँ की कृपा से ही मिलने वाला है, जिसने विवेक चूड़ामणि जैसी इतनी विद्वान विद्वत्ता भरी किताब लिखी है जिसमे अपनी विद्वत्ता का उसने परिचय दिया| उस के बाद वह अपनी माँ का ही वर्णन करने लगे| लोगों ने पूछा कि माँ का वर्णन क्यों कर रहे हो? तो कहने लगे, समझ लीजिए, इसके सिवा और कोई इलाज नहीं है| यही है सब कुछ, इसी में सारे मंत्र हैं| आप कोई ऐसी बात आपसे कहे तो लोग सोचे माताजी हिंदू धर्म का प्रचार कर रही है ईसा मसीह की कोई बात करें तो ईसा मसीह का प्रचार कर रही हैं| कोई ना कोई उसको राजनैतिक रूप देकर के बेवकुफियाँ करने के सिवाय कुछ और हम कर सकते हों तो उसको पा लीजिए इस चीज को पा लीजिए| क्योंकि यह आपके अंदर स्थित है और क्योंकि आप भारतीय हैं और विशेष रूप से अत्यंत महान आत्माएँ हैं| अपनी आत्मा को जागृत करिए| उसको देखिए, जानिए और अपने को पहचानिए| अपने आप का अभी तक आपने मूल्य आँका ही नहीं, और जाना ही नहीं है, जिस दिन यह ज्ञात होगा जब आप जानिएगा कि आप क्या है? उस दिन बात ही और होगी| अब हम क्या है? हम क्या हैं? कबीर कहते हैं, ‘जब मस्त हुए, फिर क्या बोले’ वह तो मस्त होकर बैठ गए| उन्होंने कहा, अब इनसे क्या बोलें जो कुछ थोड़े बहुत मस्ती में होते हैं वह जाकर की पहाड़ में छुप के बैठ गए| हमसे कहते हैं, माता जी आप ही करो मेहनत हम तो नहीं करनेवाले, हमको तो सूली पर चढ़ाएँगे सब| आप क्या है? यह जानने के लिए आपको कुछ भी नहीं करना| यह सब परमात्मा का काम है कि आपको इसका बोध कराएँ| आपके अवेयरनेस में यह चीज लाए, या परमात्मा का काम है, आप इंसान हुए आपने क्या किया? आप पैदा हुए मान लो आप इंसान हो गए दो पैर पर आप खड़े हैं आप जानवर नहीं है, उसी प्रकार यह भी होने के लिए भी आप  कुछ नहीं कर सकते| यह कहते ही साथ सबका अहंकार जागृत हो जाता है की क्या हम कुछ नहीं कर सकते| यही तो शंकराचार्य ने कहा है की, यह एक जागृत क्रिया है और जागृत क्रिया स्वयं ही हो जाती है| आप जानते हैं कि आप एक बीज को भी नहीं जगा पाते| आज तक मनुष्य ने कोई भी जीवित कार्य नहीं किया तो उस जागृत क्रिया को करने के लिए परमेश्वर को ही करना पड़ेगा| आप उसका नाम कैसे भी ले लीजिए क्योंकि आज मनुष्य अहंकार में परमात्मा को नहीं मानता| मैं चाहे कुछ भी कह लीजिए लेकिन यह कार्य आप से नहीं हो सकता, या सहज है स्पॉन्टेनियस है आपके अंदर यह सब चीजें बना कर रखी है आप सिर्फ इसका जो मेन है उसे लगा देने की बात है अब आप देख रहे हैं यहाँ पर आपको सब को नहीं दिखाई दे रहा होगा लेकिन बाद में देख लीजिएगा| यह पूरे बनाए हुए हैं कि आप अंदर में क्या है अब हमारी जो बात है, वह यह है कि इस के मामले में आपको बताना चाहें तो अभी तक लंडन में बता रहे थे कि चौरासी टेप्स हो गए हैं, माँ, अभी तक आपका नोलेज नहीं खत्म हुआ| तो मैं कहती हूँ, पहले आप इस अनुभव को ले लीजिए उसके बाद बात करेंगे| खाना हमने बनाया है, समझ लीजिए, आप को भूख है आप पहले खाना खा लीजिए, फिर सब बताएँगे हाल यह बेहतर है, की पूरा हम आपको बताते रहे कि यह चक्र क्या है? वह चक्र क्या है? कहाँ से कहाँ जाता है? कैसे खुलता है? क्या होता है? वह भी हर एक चीज हम आपको बताएँगे| उसी के लिए तो आए हैं सब बताने के लिए| नहीं तो कौन बताता आपको और इतना ही नहीं एक-एक बात जो भी हमारे शास्त्रों में लिखी हुई है, हिंदु शास्त्रों में ही नहीं सारे संसार के शास्त्रों में, यहाँ तक की लाओत्से की लिखी हुई सोक्रेटिस की लिखी हुई जो जो बातें हैं क्योंकि ये लोग सब सत्य पर खड़े थे और एक ही सत्य पर होता है, दो बातें नहीं होती| वह सारी की सारी बातें आप सिद्ध कर सकते हैं| और वह सिद्ध करने के लिए हम आज आपके सामने उपस्थित हुए हैं| यह शक्ति हमारे अंदर सुप्तावस्था में त्रिगुणात्मक त्रिकोणाकार अस्थि में पड़ी हुई है| अब हम कह रहे हैं जरूरी नहीं है आप इस पर विश्वास करें क्योंकि विश्वास करते ही लोग सोचते हैं हम ढह गए पर मूर्खों पर विश्वास करने में हम बड़े तेज हैं खासकर विलायती लोग| समझदारी रखनी चाहिए हम आपसे कह रहे हैं जब तक आत्म दर्शन नहीं होगा कोई बात नहीं होने वाली| इसको आप खरीद नहीं सकते है| आप हमें खरीद नहीं सकते| इसको आप पैसा नहीं दे सकते| परमात्मा को जो जो आदमी बेचता है वह नरक की गति पाएगा| यह नारकीय कार्य है और आपको भी ऐसे लोगों को ऐसे ऐसे धूर्तो को पालना- पोसना नहीं चाहिए| वह आपसे भी गए बीते हैं, जो आपके पैसे पर पल रहे हैं| इसमें आप कोई मेहनत नहीं कर सकते| कोई कहे सर के बल खड़े हो जाओ और उससे भी बढ़कर यहाँ हैं, मराठी में कहते हैं दोन नारळ तिकडे देऊन या तिकड़े सिद्धिविनायकाला| हो गया, फिर दूसरे दरवाजे से आकर फिर वही नारळ बेच रहे हैं| वह दिखते हैं इसमे, पंढरपुर के बड़वे दिखाई देते हैं| दिखाई नहीं देते ऐसी बात नहीं है| कोई मैं नई बात नहीं कह रही हूँ| कबीर ने भी इस पर कितना कहा नानक ने कहा, सब ने कहा, आए, गए, चले गए| किसी ने परवाह नहीं करी| अब भी वही, लेकिन आज तो मैं बात यह कह रही हूँ, कि अपना आत्म साक्षात्कार ले लो| यह बातें छोड़ो कि इसमें कुछ पैसा दे सकते हो या इसमें कोई कार्य कर सकते हों या इसको किसी वजह से आप पा सकते हों? नहीं| सागर ही को आप तक आना होगा| आप सागर तक नहीं उतर सकते| सागर ही अपने को अपनाएगा आपको और आपका जो गुण है वह सागर हो जाएगा| यह सागर का कार्य है| आपका नहीं और उसकी तरफ से हम हामी देते हैं| आपसे बहुत ने बताया होगा कि माताजी कुंडलिनी एक क्षण में उठा देती हैं और कुंडलिनी से लोग जागृत हो जाते हैं| उस पर बहुत लोग यह भी कहते हैं, चिकित्सा करते हैं, ऐसे कैसे हो सकता है? हमने तो सुना जब कुंडली उठती है तो लोग मेंढक जैसे कूदने लग जाते हैं| ऐसी बड़ी बड़ी किताबें लोगों ने लिख रखी है कि जब कुंडलिनी जागृत होती है तो आदमी के अंदर गर्मी का संचार हो जाता है उसके अंदर यह यह तकलीफ शुरू हो जाती है| वह वह तकलीफ शुरू हो जाती हैं| कम से कम न जाने इस मुंबई शहर में हजारों लोगों को हमने जागृति दी है पर आज तक ऐसा मौका नहीं आया, कभी देखा भी नहीं हमने क्यों ऐसा होता है? सोचना चाहिए यह बात सही है कि कुंडलिनी का जागरण इतना आसान नहीं है, बिल्कुल भी नहीं | हट योगी लोग सालों मेहनत करते हैं बड़े-बड़े साधु ने बताया की माँ हम लोगों ने हजारों साल लगा दिए और इन लोगों को आप हाथ खोल कर दे रही हो, क्या बात है जब कोई अशक्य, असंभव बात है और ज्यो की बहुत पैमाने में हो रही है अगर हो रही है तो क्या बात है हम माहिर हैं| हम जादूगर हैं कोई ना कोई बात तो है ही, अब हम क्या हैं क्या नहीं है इस मामले में हम बोलने वाले नहीं हैं| यह आप पता लगाइए क्योंकि अगर हम कहें हम यह हैं तो खोपड़ी पर बैठ जाइएगा और अगर नहीं कहीं तो पूछते रह जाएगा| यह आपको पता लगाने का है लेकिन आप अपना भला क्यों नहीं कर लेते? आप अपनी आत्मा को क्यों नहीं जान लेते? हम तो सिर्फ लालायित हैं कि आप अपनी आत्मा को जान लीजिए बस और हमें कुछ नहीं चाहिए| यह बात लोगों की खोपड़ी पे नहीं घुस सकती| उनको समझ में नहीं आता, की रात दिन माँ इतनी मेहनत क्यों करती है जबकि उसको इससे कोई लाभ नहीं है? माँ का लाभ ह्रदय का होता है| उसकी आँखों की शांति, आप लोग अपनी माँ को देखे हैं ना जब आपकी माँ में इतना प्रेम है, अगर हम विश्व की माँ है तो हमारे अंदर कितना प्रेम होगा और इसी प्रेम में आपसे विनती कर करके हर तरह से समझा समझा कर कहती हूँ की आत्मसाक्षात्कार ले लो बेटा! उसके बाद सब चीजें समझ में आ जाएँगी| तुम्हारा सारा राजकारण तुम्हें समझ में आ जाएगा| जब तक तुम ही इंपरफेक्ट हो जब तुम ही पूर्ण नहीं हो तुम राजकारण क्या करोगे? कोई सी भी डेमोक्रेसी ले लो मीडियोक्रेसी ले लो कोई सी भी क्रेसी ले लो, उससे कोई फायदा नहीं होने वाला| जब तक मनुष्य अपूर्ण है, मनुष्य परफेक्ट है क्या उसके बगैर किसी भी चीज का उत्तर ठीक से आने वाला नहीं है| जब तक आप पूर्णत्व को नहीं पाते, अपने पूर्णत्व को पा लो| उसके बाद बात होगी| क्या इससे भी कोई सादा सरल तरीका है कहने का? लेकिन जब मैं ऐसी बात कहती हूँ तो इसका मतलब यह नहीं की, अपने प्रति रोष पूर्ण हो जाओ| अपने प्रति दुष्ट करता हो जाओ| अपने प्रति नाराज हो जाओ, क्योंकि ऐसा कोई सा भी काम आप नहीं कर सकते जिसे एक माँ नहीं कर सकती| ऐसा कोई सा भी ही काम परमात्मा की दृष्टि में नहीं होता है जिसको परमात्मा पी ना ले| जिसने पूरा हलाहल को पी लिया वह ऐसे आपको छोटे-मोटे यह पाप कर्म को नहीं पी सकता और यह पाप कर्म भी तो आप का अहंकार ही कर रहा है| जब आपका अहंकार ही टूट जाएगा तो पाप करने वाला ही टूट जाएगा| उसके बाद में बात ही नहीं बनती| बात दूसरी हो जाती है| अभी आप अविद्या में बैठे हैं| कोई है ही नहीं विद्या में आ जाइए सीधा हिसाब| अभी आप अंधकार में बैठे हैं| प्रकाश में आ जाइए| अभी हम एक साहब से कह रहे थे, उन्होंने उठ के मुझे लेक्चर देना शुरू कर दिया| ऐसा तो है माँ, मैंने कहा भाई है क्या ऐसा रटने के लिए? किसने कहा यह करो यह होना चाहिए? ये घटित करो| यह किताबें पढ़ पढ़ कर और बोल बोल कर किसको इंप्रेशन डाल रहे हो? क्यों बाह्य में रहने का? अपने को ही हम ठग रहे हैं| किसी और को हम नहीं ठग रहे हैं बेटे! अपने ही से हम दूर हैं| अपने ही को पा लो| इसमें कोई किसी तरह का दुख नहीं है| सारी शांति सारा आनंद आपके अंदर समाता है| सामूहिकता आ जाती है| आ जाती है, माने हो जाती है| आप अपने अंदर ही महसूस करते हैं| इनके क्या चक्र पर पकड़ हैं? इनको क्या प्रॉब्लम है? इनको कैसे ठीक करना है? इतनी बड़ी प्रचंड शक्ति है, की लंदन में हमारे एक साहब पार हुए जिस दिन पार हुए कहने लगे माँ, तुमने कहा था सामूहिकता आती है, कहने लगे, मैं जान सकता हूँ मेरे पिता का क्या हाल है? मैंने कहा, अच्छा देखो! तुम ऐसे हाथ करो, ऐसे आँख बंद करके उनका विचार करो| उनके हाथ से जो चैतन्य लहरियाँ बह रही थी, उनके इस हाथ में एकदम से आग सी लगने लगी, यह पिता का स्थान है, यहाँ पर जो भी है पिता का स्थान है| मैंने कहा, अच्छा तुम पता करो अपने पिता से, क्योंकि यह ऊँगली जो है वह सेंसेटिव है विशुद्धि चक्र की है| जहाँ श्री कृष्ण का वास है, विराट का वास है| मैंने कहा, तुम अपने पिता से पता करो क्या हाल है? उन्होंने फोन किया स्कॉटलैंड में अपने पिता को| जब उन्होंने स्कॉटलैंड फोन किया तब उनकी माँ ने बताया कि तुम्हारे बाप को बहुत बुरी तरह से ब्रोंकाइटिस हो गया है और उनका गला बहुत खराब है और वह बीमार पड़े हैं| अच्छा जानना ही नहीं उन को ठीक करना भी बन पड़ता है जब यह शक्ति जागृत हो जाती है तब आपकी मानसिक आपकी बौद्धिक और आपकी शारीरिक सारी व्यथाएँ दूर हो जाती हैं| सिर्फ शारीरिक नहीं, बहुत से लोग मेरे पास सिर्फ बीमारी ठीक करवाने आते हैं| चार-चार घंटे मुझसे मेहनत करवाते हैं| उनके घर जाकर के मेहनत करिए| मुझे ठीक कर दीजिए, लेकिन ठीक होने के बाद वह यह नहीं सोचते कि हम भी उस शक्ति को पा लें जिसे माँ सबको ठीक कर रही है| हम भी इस शक्ति को पा सकते हैं| हमारे बच्चे जो हैं आज सहजयोगी वही लोग बीमारियों को ठीक कर रहे हैं| मैं तो आजकल करती नहीं| आप अपने आप ठीक हो जाते हैं| दूसरों को आप ठीक कर सकते हैं, और हजार बार जो मैंने अनेक बार बात कही थी कैंसर की बीमारी भी हमारे साथ पैदा हुई है और हम ही उसको ठीक कर सकते हैं| सहज योग के बिना कैंसर ठीक नहीं हो सकता| हमने हजारों के कैंसर ठीक किए हैं| यहाँ भी दो-चार बैठे हुए हैं| जब कैंसर की बीमारी होगी तब आओगे| तब मैं यहाँ खड़ी नहीं हूँ तुम्हारे लिए, अगर आप सहज योगी हैं तो मैं ठीक करने वाली हूँ और अगर आप सहज योगी के रिश्तेदार हैं तो ठीक करुँगी| नहीं तो किसी की यहाँ मैं अस्पताल में डॉक्टर नहीं हूँ, सिर्फ जो सहजयोगी हैं उसी का महत्व परमात्मा की आँख में है नहीं, तो कल जब कल्कि का अवतरण होगा तो बाकी सब छठ करके वह खत्म कर देना एक मिनट भी नहीं रुकने वाला है न हीं आपको कोई समझाने वाला है| न हीं आपसे कहेगा कि आत्मसाक्षात्कार ले लो वह तो जो दौड़ेगा सब को खत्म कर देगा| आज जागृत हो करके अपने को पार करा लो और उस जगह पर बैठो जहाँ आप पूजे जाए| आपको मैं एक भी बात झूठ नहीं बता रही हूँ, लेकिन इसका आपको अंदाजा लेना पड़ेगा, इसको जानना पड़ेगा, देखना पड़ेगा| अत्यंत नम्रता पूर्वक चाहिए की आप इसे स्वीकार्य करें और लें| आज तो मैंने सब ने कहा था, माँ आज सिर्फ इंट्रोडक्शन दीजिए क्योंकि पहले इंट्रोडक्शन होना चाहिए इसलिए मैंने इस विषय में जो सर्वसाधारण बातें हैं वह बताई हैं उस पर भी अगर इस पर भी आपको कोई प्रश्न हो तब आप पूछिए, लेकिन जरा समझदारी से करें क्योंकि हम काफी होशियार आदमी हैं| दिमाग बहुत जबरदस्त है| इतना ही नहीं लेकिन आपको अंदर-बाहर सब जानते हैं इसलिए जरा समझदारी से सवाल पूछिएगा जिससे दूसरों का भी लाभ हो और आपका भी अगर उसमें सच्चाई है जेनुइननेस है तो हम हाजिर हैं आपके हर सवाल का जवाब देने को| अभी जो जो आपके अंदर में दुविधाएँ हैं जो जो परेशानियाँ हैं उससे ऊपर उठाने की शक्ति सहजयोग में है और इसीलिए आशा है आप लोग इसका अनुभव लें और कल आकर हमें बताएँ कि आप कितने आराम से घोड़े बेच कर सोए| कल भी यहाँ एक सेशन होगा जिसमें मैं चक्रों के बारे में बताऊँगी| उसके बाद दो सेशन्स आप जानते हैं भारतीय विद्या भवन में भी होंगे जहाँ ज्यादा तादाद में आइए| जितने आ सकते हैं| सबको हम पार करा सकते हैं लेकिन लोग कम आएँगे| यहाँ अभी अगर किसी ने कहा कि कपड़े उतार कर सबको नंगा नाचना है तो हॉल भरकर के रस्ते पर भी नाचना शुरू हो जाएगा, वह भी पैसा देकर| यह तो हम बहुत सूज्ञ और विचारक लोग हैं| बड़े- बड़े पैसेवालों का यह हाल है| बड़े-बड़े अकलवालों का है| लेखकों का है और जो जाता है वही कपड़े उतार कर नाचना शुरू कर देता है| सोचता भी नहीं है और समझता भी नहीं| यहाँ भी काफी हो चुका है| मुंबई में भी और जगह हो ही रहा है| लंदन में भी हुआ है इसलिए अपनी सुज्ञता पास में रखते हुए अपनी कीमत करते हुए अपने को समझते हुए और इस चीज को आप पा लीजिए| जो कि एक पाना है बोलना नहीं है, समझाना नहीं है| एक होना है, जिसे आक्टुँलायजेशिन actualisation कहते हैं| वह चीज है अगर आज घटित नहीं हुआ तो कल हो जाएगा कल नहीं होगा तो परसों हो जाएगा और जब तक नहीं होगा हम आपके साथ हैं इसलिए पूर्ण अपने पर विश्वास रखें ना अपने को नीचे गिराए ना दुखी समझे और इस चीज को प्राप्त करें| परमात्मा आपको सुबुद्धि दे| 

अब जिसको भी सवाल हों वह पूछे कौन सा सवाल है? 

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: हाँ, अच्छा अच्छा बैठिए बैठिए| समझ गए| समझ गए बता रहे हैं| आपने ठीक कहा की कैसे एक बात बताइए हाँ what she saying should I say in English or Hindi? वह कह रही हैं, के सहज योग में आप कहती हैं कुंडलिनी जागृत होती है तो कैसे होनी चाहिए? बैठ के होनी चाहिए या कैसे होना चाहिए? बिल्कुल साधारण सवाल है| बिल्कुल आना चाहिए| अब मैं आपसे पूछती हूँ बीज का जगाना कैसे होता है बेटे जानती हो? कोई जानता है? कैसे भी हो जाता है उसमें कोई बैठने से या बाह्य से नहीं होता है| आपके अंदर यह निहित शक्ति है और जिस तरह एक प्रकाशित दीप दूसरे सोए हुए दीपों को जगाता है उसी प्रकार यह हो जाता है क्योंकि हमारे अंदर जो प्रकाश है उस प्रकाश से आप जागृत हो जाते हैं| सीधा हिसाब है| आप भी प्रकाशित कल हो गए| आप दूसरे को प्रकाशित करें, तीसरे प्रकाशित हो गए, वह चौथे को करें| जो प्रकाशित होता है, वह किस तरह से दूसरे को प्रकाशित करता है इसका तो कोई उत्तर नहीं होगा ना बेटे| हाँ, तैयारी ना हो आपके अंदर, तेल ठीक से डाला हो, दीप न हो बत्ती ना हो ठीक से उसका कोई इंतजामात ठीक ना हो से तो वह भी करना पड़ता है| उसको भी कर लेते हैं| वह भी करने वाले ऐसे ही होते हैं जैसे कि कोई इंसान डूब रहा होता है तो उसको तैराक कैसे उठा लेता है क्योंकि वह तैरना जानता है इसलिए उठा लेता है क्योंकि वह जानता है इसलिए उठा लेता है और जो नहीं जानता वह डूबता है लेकिन जो डूबता है वह अगर सीख ले तैरना तो वह भी यह कार्य कर सकता है| जो डूबता है वह ही तैराक भी हो सकता और वही बचा सकता है पर एक बार तैराक होने पर डूबने वाले नहीं होते| अब समझ गए बात, कुछ भी नहीं करने का, सिर्फ इस तरह से आप हाथ करिए| यह आपके चक्र यहाँ पर सारे हाथों में खींच लेंगे और जागृति हो जाएगी वह तो सब मैं देखने ही वाली हूँ और करने ही वाली हूँ| 

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: वह सही बात है बैठ जाइए आप| मैं बताती हूँ, साधारणत: कुंडलिनी जागरण के बाद जब कि वह उसको छेद देती है, ब्रह्मरंध्र को छेद देती है उसके बाद ऐसा होता है| के खासकर सहज योग में शायद हो सकता है, कुंडलिनी हमें पहचान कर एकदम जोर से दौड़ती है| बहुत से लोग एक पल में पार हो जाते हैं| बहुत को यह अनुभव आ जाता है| पहला उसके बाद फिर वह जाती है वह आपकी माँ है ना समझ लीजिए किसी का लिवर है, लिवर में जाएगी उसको ठीक करेगी फिर ऊपर चढ़ेगी किसी के हृदय में तकलीफ है उसे ठीक करेगी वह विचरण करती रहती है और ठीक करती रहती हैं| अगर आदमी बहुत ज्यादा उसके साथ ज्यादती ना करे माने यह कि आत्मसाक्षात्कार के बाद मनुष्य इतना मजे में आ जाता है कि उसके व्यसन अपने आप से छूट जाते हैं| व्यसन इसलिए आते हैं क्योंकि आदमी बोर होता है अब हमारे यहाँ तो ऐसे ऐसे लोग थे कि जो ड्रग में पढ़े थे| कोमा में थे उनकी ड्रग्स छूट गई, शराब छूट गई, सिगरेट किसी से मैं कहती थोड़ी हूँ कि भाई तुम सिगरेट छोड़ो, यह छोड़ो| पहले सर के बल खड़े हो जाओ| वह अपने आप भी छूट जाता है| उस पर भी जबरदस्ती एक साहब है वह आए अपनी ऊँगली पकड़कर| यह है ना यह पकड़ता है चक्र जब आप सिगरेट पीते हैं| उनकी सिगरेट एकदम अपने आप छूट गई थी| एक दिन वह मोटर चला रहे थे, उनके साथ और भी दोस्त लोग मोटर चला रहे थे| सब ने कहा. अरे क्या तुम माताजी के पीछे में पागल हो गए हो एक सिगरेट हमारे साथ भी पियो नहीं तो हम तो बिल्कुल ही दुष्ट नजर आते हैं तुम्हारे सामने तो| सिगरेट पी रहे थे कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ, यह कोई सहज योग से नहीं हुआ लेकिन उनकी मोटर एकदम खड्डे में चली गई क्योंकि सिगरेट पीते हुए इधर उधर उनका चित्त गया होगा| तो उनकी मोटर एकदम खड्डे में चली गई| चारों के चारों और पूरी वह मोटर खत्म हो गई लेकिन उसमें से किसी को भी कोई चोट नहीं आई, लेकिन महाशय की जरा ऊँगली में चोट आई| जब मेरे पास आए तो मैंने कहा बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि तुम्हारी वजह से किसी को चोट नहीं आई क्योंकि आप सहयोगी थे, पर तुम्हारी ऊँगली में कैसे आ गई? कहने लगे माँ, जरा दोष हो गया, मैं सिगरेट पी रहा था उनके साथ में, लेकिन यह बहुत ज्यादती की बात मैंने कह दी क्या हो जाता है जब उसके बाद आप कोई ऐसा गलत काम करते हैं तो आपके अंदर से ही ऐसा महसूस होने लग जाता है क्योंकि हाथ में जलन सी आने लग जाती है| कुछ उलझन सी लगने लग जाती हैं| एक साहब डॉक्टर साहब हैं जर्मनी गए थे तो वहाँ एक बड़ी अच्छी शराब मिलती है, शराब वराब सब छूट गई थी उनकी मैंने कुछ मना नहीं किया था लेकिन वह शराब पीने चले गए और वहाँ जब गए तो उन्होंने थोड़ी सी उनको मन किया कि भाई इतनी अच्छी शराब मैं हमेशा से पीता रहा हूँ, थोड़ी पी लूँ| उन्होंने पी ली उसके बाद ऐसे उनके पेट में गुटूर गुटूर शुरू हो गया कि उनको उल्टियाँ ही करनी पड़ी| धर्म जो है अपने पेट में ही होता है| उसके लिए सोचना नहीं पड़ता कि मैं धार्मिक बनूँ| एकदम उल्टी आने लग जाती हैं| आपने भी देखा होगा किसी के घर जाइए तो उल्टी आने लग जाती हैं| हालाँकि लोग अच्छे हैं| पता होएगा आपको कि यह आदमी बहुत बड़ा कोई ना कोई मर्डरर रहा होगा| अपने बाप को सताया होगा| माँ को सताया होगा| कुछ ना कुछ अधर्मी काम किया होगा| आपको पता नहीं चलता, क्यों आपकी तबीयत खराब हो गई? यह पेट में धर्म होता है| इसको सोचा नहीं जाता या धर्म है या अधर्म है? करें या ना करें? पेट के अंदर बैठा रहता है, लेकिन जब आप पार हो जाते हैं तो यह अंतर आ जाता है, जैसे जानवर में और आप में अंतर हैं| आप किसी घोड़े को या किसी बैल को या किसी गधे को गंदगी के अंदर से गुजार के ले जाइए उसकी नाक में असर नहीं आएगा| जैसे गोरेगांव आप अगर जाइए आपको कितनी परेशानी हो जाएगी? आप चल नहीं सकते वहाँ उस गंदगी में क्योंकि आप इंसान हैं जानवर नहीं लेकिन जब आप पार हो जाते हैं तो आप वह इंसान हो जाते हैं जो किसी गंदगी को बर्दाश्त नहीं कर पाते| वह गंदगी जो है छूटती है| अपने आप ही गंदा सा लगता है इस तरह का अपने प्रति व्यवहार करना या दूसरों के प्रति व्यवहार करना एकदम गंदा सा लगता है इसलिए मनुष्य को अति मानव होना चाहिए यह कहना चाहिए महामानव होना चाहिए| कैसे हो जाता है? ऑटोमेटिक हो जाता है लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आप कुछ भी ना करें पार होने के बाद ही जो कुछ करना है वह किया जाता है उससे पहले नहीं, इसके लिए हम सब प्रक्रिया आपको बता देंगे किस तरह से अपनी सफाई करनी है, किस तरह से अपने को ठीक करना है हम बता देंगे आपको| 

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: हाँ, अच्छा ठीक सवाल पूछा|

क्या होता है जब आपके अंदर में आलोक आ जाता है? जब आपके अंदर प्रकाश आ जाता है तो अंधकार अपने आप से चला ही जाता है| तब आप फिर मुझसे पूछेंगे कि माँ जब यह लाइट लगा दी तो क्या पूरा अंधकार चला जाता है? हाँ, हाँ पूरा ही जाता है लेकिन जब लाइट धीमी धीमी हो और उसके ऊपर की कंदील जो है वह बहुत गंदी रखी हुई हो तब फिर सफाई करनी पड़ती है लेकिन अगर वह पूरी तरह से साफ हो और उसके अंदर प्रकाश की ज्योति पूरी तरह से विराजमान हो तो हा जल ही जाती लेकिन बड़ा ही कठिन है अगर आप मुझसे कहे कि यह सब करो, तो मेरे यहाँ तो छेद है| वह सब निकल ही जाता है मेरे तो समझ ही नहीं आता किसी चीज के लिए इच्छा ही कैसे करू? मेरी कोई इच्छा ही नहीं बनती कोई इच्छा बनती है तो यहाँ से फट से निकल जाती है| एक छेद यहाँ कर देती हूँ ना उसी से सब निकल जाता है| कोई मुश्किल बात नहीं है और होना भी चाहिए अगर प्रकाश है तो प्रकाश में अंधेरा जाना ही चाहिए| अब यह जो चीज है आप करते हैं इसमें से तीन चीजें तो आप अपने अहंकार की वजह से करते हैं और तीन चीजें अपने प्रति अहंकार की वजह से करते हैं| यहाँ पर जो चित्र दिखाया गया है ऊपर में अहंकार और प्रति अहंकार यह दोनों की पूरी तरह से उतर आते हैं और जब यहीं खत्म हो गए| जब करने वाले कर्ता ही खत्म हो गए तब कौन करेगा बेटे? प्रचंड चीज है यह एक नया डायमेंशन आया है बस थोड़ा सा देखना पड़ता है| अपना साक्षीस्वरुपत्व दिखाना पड़ता है| जैसे कि एक बात हम समझाएँ कि अगर पानी में लहरें उठ रही है और लहरों पर नाव चल रही है लेकिन अगर आप पानी में हैं तो आप लहरों से डर भी रहे हैं और उस से लड़ भी रहे हैं लेकिन अगर आप नाव में बैठ गए तो आप दोनों चीज देख रहे हैं लेकिन जब तक नाव में नहीं बैठते तब तक जरा डगमग डगमग होता है| आप कहेंगे कब स्थिर होता है जब स्थिर हो गए तब स्थिर हो गए| जब आपको स्थिरता आ गई तब आप स्थिर हो गए| सहज योग में कुछ लोग बहुत से लोग पार हुए हैं हो गए| बहुत से लोग पार होते हैं| फिर गिर जाते हैं और बहुत से लोग काफी जड़ से स्थिर हो जाते हैं लेकिन तो भी उनकी जागृति जाती नहीं फिर से आ जाते हैं फिर मैं साल भर बाद आती हूँ फिर ठीक हो जाते हैं| कोई तो इसमें तूफान मेल है और कोई माल गाड़ी भी है| अब यह तो आप पर निर्भर है आप क्या बनना चाहते हैं?

हाँ कहो बेटा अच्छा एक मिनट एक आदमी अच्छा जो पहले खड़े हो बाकी सब बाद की बात है| हाँ बोलो…

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: हाँ, नहीं एक क्षण में होता है, एक क्षण में घटना एक क्षण में घटित होती है परंतु तैयारी मैं वक्त लग जाता है| कभी-कभी कोई बहुत ही गड़बड़ आदमी आते हैं| अभी किसी को भूत नहीं पकड़ लिया हो या कुछ गुरुओं के पास से आते हैं वह तो और भी मुश्किल होते हैं भैया मेरे लिए जो होते हैं सो होते हैं| मैं क्या बताऊँ जो गुरुओं के सामने जिन्होंने अपना माथा टिकाया है यह बड़े मुश्किल होते हैं लेकिन जब मैं देहातों में जाती हूँ तब फटाफट हज़ारों आदमी पार हो जाते हैं क्योंकि देहात के लोग सीधे साधे हैं| जमीन के साथ रहते हैं| अब आप लोग तो बड़े आदमी हो गए कॉम्प्लिकेटेड तो जरा उसमें कॉम्प्लिकेशंस निकालने पड़ते है मेरे को इसमें कोई समय का ठिकाना है तुम ही बताओ|

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: अब सुन लो पते की बात तुम्हें लगी है भूख तुम अभी बैठ जाओ बाकी सब तो दिमाग चला रहे हैं बैठ जाओ ज्यादा नहीं सोचो| राजा बेटे हो ना!

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी- हाँ, बोलो बेटा 

एक साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: हाँ, तुम पार हो क्या नहीं हो ना क्यों नहीं हो पाया ना अनुभव नहीं होता है माने क्या नहीं होता है तुमको यह बताओ| (अस्पष्ट) हाँ वह तो बहुत को ही होता है आप बैठ जाइए| मैं बताती हूँ जब आप पार होते हैं तो बहुतों को महसूस भी नहीं होता कि आप पार हो गए हैं| हाथ की लहरियाँ बह रही है या नहीं यह बताइए| आपकी चैतन्यलहरियाँ हाथ से बह रहे हैं या नहीं कुंडलिनी का अनुभव होना माने की कोई दोष है आपके अंदर| कुंडलिनी के चढ़ने का अनुभव अगर आपके अंदर हो तो इसका  मतलब सुषुम्ना में कोई दोष है कोई आफत आ गई समझे नहीं अगर आपके अंदर कोई नहीं है तो आप अति उत्तम है जैसे कि कहते हैं कि एरोप्लेन जितना बढ़िया हो और उसकी दौडान जितनी बढ़िया हो तो पता ही नहीं चलता है कब वह टेक ऑफ कर लेता है| ऐसी चीज है जब कुंडलिनी में कोई भी (अस्पष्ट) नहीं होता और सब चेतन लहरियाँ बहती है तो इससे अत्यंत और कौन सी अच्छी चीज हो सकती है बेटा? कोई दोष ही नहीं है तुम्हारे अंदर बेकार में बस तुम्हारे अंदर से चैतन्यलहरियाँ आती है या नहीं आती है? क्या अनुभूति होनी चाहिए क्या होती है? कुंडली की अनुभूति हाथ में से चैतन्य लहरियाँ आती है या नहीं तो बस और क्या चाहिए? अब क्या इनको यहाँ कोई बीमारी होनी चाहिए? अनुभव बेटा यही होता है इसे अनुभव का मतलब है तुम दूसरों को रिलाइजेशन दे सकते हो| दूसरों को जागृत कर सकते हो| निर्विचारता में जा सकते हैं| तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाती है| तुम्हारा मन ठीक हो जाता है| बुद्धि ठीक हो जाती है| अब अनुभव का मतलब किताब में लिखा हुआ है आप मेंढक के जैसे कूदिए इसमें मैं क्या करूँ? हमेशा होता है बेटे, बस तुम उसको मेंटेन करो| तुमने किया नहीं है उसपर मेहनत, तुमने किया नहीँ तो तुम में कोई दोष होगा| आकर के हम से पूछना चाहिए पर्सनली| अगर पार हो गए हो तो पूछना चाहिए| माँ यह बात है, हम बता देंगे कोई दोष होगा तो हाँ कहिए …..