The Culture of Universal Religion

Bordi (भारत)

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“विश्व निर्मल धर्म की संस्कृति”
बोर्डी (भारत), 7 फरवरी 1985।

युद्ध के मैदान में हमारी नई यात्रा का आज दूसरा दिन है। हमें लोगों को प्यार, करुणा, स्नेह और आत्मसम्मान से जीतना है।
जब हम कहते हैं कि यह एक विश्व धर्म है, यह एक सार्वभौमिक धर्म है जिससे हम संबंधित हैं, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात, इसका सार शांति है। शांति भीतर होनी चाहिए, शुरुआत करने के लिए। आपको अपने भीतर शांत रहना होगा। यदि आप शांत नहीं हैं, यदि आप अहंकारयुक्त छल कर रहे हैं, यदि आप केवल यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर रहे हैं कि आप शांतिपूर्ण हैं, तो कहना दुखद है किआप गलत हैं।
शांति स्वयं के अंदर आनंद प्राप्ति के लिये है। यह अपने भीतर महसूस करने के लिये है। इसलिए स्वयं को गलत सन्तुष्टि न दें, स्वयं को झूठी धारणाएं न दें। अपने आप को धोखा मत दो।
शांति को अपने ही भीतर महसूस करना होगा, और यदि आप ऐसा महसूस नहीं कर रहे हैं, तो आपको आकर मुझसे यह नहीं पूछना चाहिए, “माँ, मुझे यह महसुस क्यों नहीं हो रही है।” क्योंकि मैं आपको यह नहीं बताने वाली हूं कि आपके साथ कुछ गलत है। आपको इसे कार्यंवित करना होगा कि आप अपने भीतर शांति महसूस करें।
ऐसा नहीं है कि बाहर बहुत अधिक सन्नाटा हो तब आप शांति का अनुभव करते हैं। शांति अपने भीतर होनी चाहिए। यह तुम्हारे ही पास है। आपकी आत्मा पुर्णत: शांत है – अव्यग्र, बिना बेचैनी के। आपकी आत्मा में कोई बेचैनी नहीं है। बिल्कुल शांत और स्थिर।
इसे महसूस करना आपके ऊपर निर्भर है। यह किसी और का काम नहीं है कि वह आपको प्रमाणित करे। यह एक बात है। दूसरी बात, जब मैं आपको कुछ बता रही हूं, तो आपको लगता है कि यह मैं आपको नहीं बता रही हूं। यह बातेंआपके दिमाग में दर्ज ही नहीं होती है। आपको लगता है कि मैं इसे एक्स, वाई, जेड व्यक्ति को बता रही हूं लेकिन आपको नहीं। आप इसमें शामिल ही नहीं हैं। यह एक और संकेत है कि कोई शांति नहीं है। चुंकि शांति नहीं है इसलिये, दिमाग में दर्ज ही नहीं होता बहै। जो कुछ भी आपके दिमाग में जाएगा, वही काम करेगा।
लेकिन मैं जो पाती हूं वह ऐसा है कि वह लोग जिनके गहरे व्यक्तित्व हैं, तो वे इसे प्राप्त करते हैं। उथले व्यक्तित्व वाले लोग कुछ भी प्राप्ति नहीं करते हैं। पंजीकरण इतना खराब है कि मैं जो कुछ भी कहती हूं उसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अन्यथा जो कुछ भी मैं कहती हूं वह एक मंत्र है। इसका सीधा असर आप पर होना चाहिए, और आपको अपने भीतर उस प्रभाव, उस पैठ को महसूस करना चाहिए। लेकिन जैसे कि यह किसी अन्य ही के लिए है, जैसे कि यह आपके लिए नहीं है। इससे ही पता चलता है कि आपके भीतर कोई शांति नहीं है।
जो कुछ भी शुभ है, जो आपके विकास के लिए पौष्टिक है उसे, केवल आपके भीतर की शांति ही दर्ज कर सकती है। इसलिए अपने साथ शांति बनाने की कोशिश करें। अपने आप से लड़ो मत कि, “मुझे यह क्यों करना चाहिए?”, “मैं बहुत बुरा हूँ!”, “मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था!” – ऐसी सब बातें हमें नहीं करना चाहिए। कोशिश करें कि सबसे पहले खुद से न लड़ें।
तब तुम मुझसे लड़ते हो, “मैं ऐसा क्यों हूँ? मेरे साथ ऐसा क्यों होना चाहिए? मैं क्यों पकड़ रहा हूँ? क्यों। . . .??” मैं ऐसे प्रश्न का उत्तर कैसे दूं? यह बहुत आक्रामक होता है। मुझे लगता है कि कई सहज योगियों का यह बहुत आक्रामक रवैया है कि वे मुझसे ऐसा प्रश्न पूछते हैं कि, “क्यों …?” मैं “क्योंकि “आपको नहीं बता सकती कि आपके साथ क्या गलत है “क्यों” कि यह मेरी संस्कृति में नहीं है। आपको स्वयं को खोजना चाहिए कि आपके साथ क्या गलत है। लेकिन समस्या यह नही है कि, “आपके साथ क्या गलत है”। उचित रवैया यह होगा कि,”आपके साथ बढिया क्या है”। जो तुम्हारे साथ ठीक है, उस पर अपना पैर रखो, उस बिंदु पर खुद को स्थापित करो। और फिर अपने आप को ऊंचाई की तरफ विकसित करें।
जैसा कि मैंने कहा, इस धर्म के सार्वभौमिक विकास के लिए शांति मुख्य बात है।
यह कई चीजों से आकुल है। सबसे पहले, जैसा कि मैंने कहा, खुद स्वयं से। आपको अपने ही बारे में अज़ीब विचार नहीं रखने चाहिए। लोगों के पास बहुत अज़ीब विचार हैं। मैं सहजयोगियों को देखती हूं, जैसे ही उन्हें आत्मसाक्षात्कार होता है, या उनके साथ कुछ बेहतर होता है, वे दूसरों को यह बताना शुरू कर देते हैं कि कैसे ध्यान करना है, कैसे खड़े होना है, बंधन कैसे देना है, यह कैसे करना है और वह कैसे करना है। यह बहुत ही निम्न है, बहुत ही निम्न स्तर का है।
अपने भीतर आत्मसात करने का प्रयास करें। पहले अपने आप को विकसित करें वह उत्थान स्वयं दूसरों को बताएगा कि किसी व्यक्ति को कैसा होना चाहिए। आपका अपना चरित्र, आपका अपना बर्ताव, आपका अपना मिज़ाज़, आपका अपना व्यवहार। यह सब दूसरों को बताएगा कि यह एक महान व्यक्ति है और वे आपके उदाहरण का अनुसरण करने का प्रयास करेंगे। उदाहरण सर्वोत्तम शिक्षण है। जब वृक्ष छोटा होता है, भले ही वह कहे कि “मैं बड़ा हूँ,” कोई भी बौने वृक्ष के नीचे बैठने वाला नहीं है! लेकिन जब यह एक बड़ा पेड़ हो जाता है तो आप छाया देख सकते हैं और हर कोई जानता है कि यह एक बड़ा पेड़ है और वे उसके नीचे आकर बैठ सकते हैं। आपको बताने की जरूरत नहीं है। उसी तरह, जब आप बड़े हो जाते हैं, तो आपको यह प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती है कि “मैं बड़ा हूँ”, यह बस काम करता है।
अब भीतर की शांति, सबसे पहले, अन्य लोगों के साथ इस रूप में शांति को व्यक्त करती है। यह शांति की अभिव्यक्ति का पहला संकेत है। ऐसा व्यक्ति कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करता, क्रूर शब्दों का प्रयोग नहीं करता। लेकिन वह भी अप्रभावी व्यक्ति नहीं है। वह बहुत ही मधुर और अच्छे शब्दों का प्रयोग करते हुए बहुत प्रभावशाली हैं। हो सकता है कि वह कठोर शब्दों का प्रयोग करके शुरू करे, फिर वह शांत हो जाता है और उस स्थिति में आ जाता है जहां वह प्रभावी होता है और साथ ही वह बहुत नम्र और मीठा होता है।
ऐसे व्यक्तित्व को विकसित करना होगा – बाहर। तो, अपने दोस्तों के साथ शांति, सहज योगियों के साथ शांति। यदि आप सहजयोगियों के साथ शांतिपूर्ण नहीं हो सकते हैं तो आप अच्छे नहीं हैं। बिल्कुल अच्छा नहीं है। जब आप किसी अन्य सहज योगी से मिलते हैं तो आप कुत्तों की तरह एक-दूसरे पर भौंक नहीं सकते, है ना? आप तीन सहजयोगियों को एक साथ छोड़ देते हैं, आप एक बड़ी भौंकने वाली प्रणाली के साथ समाप्त होते हैं। वे अपने भीतर प्रबंधन नहीं कर सकते। यदि सौ हैं, तो ठीक है। लेकिन आप तीन और चार को इधर-उधर नहीं छोड़ सकते।
इसलिए आपके भाइयों और बहनों के साथ शांति होनी चाहिए। वे सभी मेरे सहस्रार से पैदा हुए हैं और किसी को भी अपमान करने, व्यंग्य करने का अधिकार नहीं है। हानिकारक बातें कहना। वह दोस्ती नहीं है, वह दोस्ती नहीं है। यह एक प्रकार की अति सूक्ष्म शत्रुता है जिसे तुम अपने हृदयों में ढो रहे हो। यह क्षमाशीलता नहीं हो सकती। यदि आप दूसरों को व्यंग्यात्मक बातें कहते हैं, तो आप सार्वभौम धर्म की संस्कृति में नहीं हैं। आपको सम्मान से भरा होना चाहिए। आप एक-दूसरे के प्रति जितने सम्मानजनक होंगे, उतना ही अच्छा होगा।
मुझे नहीं पता कि आपको यह कैसे बताना है। लेकिन माना कि, कोई एक सहज योगी है, आपको उन्हे वैसे नहीं पुकारना चाहिए जैसे आप किसी टॉम डिक और हैरी को बुलाते हैं। जैसे कोई जा रहा हो। “ए मिस्टर एक्स, यहाँ आओ!” अब तो लोग मिस्टर भी नहीं कहते। कृपया उनके उपनामों का उपयोग करने का प्रयास करें तो बेहतर होगा। मिस्टर सो, मिस्टर सो मिस्टर सो। ।बेहतर होगा।
क्योंकि सरनेम का इस्तेमाल न करने की इस आधुनिक शैली ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान को कम कर दिया है। लेकिन मुझे लगता है, सहजयोगियों को एक नया तरीका आजमाना चाहिए और मुझे और भी बेहतर तरीके सुझाने चाहिए, एक-दूसरे को कैसे संबोधित करें, इस तरह से कि आप दूसरों का सम्मान करें। वह सम्मान एक दूसरे के भीतर वह शांति पैदा करेगा। अचानक आप किसी टिप्पणी के साथ सामने आते हैं। बहुत ही भद्दे कमेंट्स होते हैं। इसकी कोई कीमत नहीं है। यह हमारी संस्कृति नहीं है। हम सार्वभौम धर्म के हैं, ऐसी संस्कृति हमारी कैसे हो सकती है?
इसलिए, जब आप अपने भाइयों और बहनों के साथ शांत रहने की कोशिश करें, तो बेहद सम्मान से भरे बनने की कोशिश करें। जब आप एक दूसरे को पत्र लिखते हैं, तो आप कहें “मेरे प्यारे भाई सहज योग में ऐसे और ऐसे।” मैंने सभी कम्युनिस्टों को ऐसा करते देखा है। कोई भी निकाय जो किसी भी पार्टी का है, वह करता है। यह उनके लिए एक तरह का सम्मान है। आप गली के लोगों और आम लोगों की तरह बात नहीं कर सकते क्योंकि आप वास्तव में असाधारण हैं, और जो कुछ भी असाधारण है वह आपके माध्यम से व्यक्त होना चाहिये।
जैसा कि मैं आपसे इस नई संस्कृति के बारे में बात कर रही हूं, आइए समझते हैं कि कितने देशों में लोगों ने संस्कृतियों और संस्कृतियों को अपनाया है। मैं जानती हूँ कि जापान आधुनिकीकरण से बहुत प्रभावित हुआ है। लेकिन ज़ेन ने उन्हें एक खास तरह की संस्कृति सिखाई, जिसमें, मान लीजिए, आप देखते हैं कि दो जापानियों के पास एक कार है और वे एक-दूसरे की कार से टकरा जाते हैं, तो वे कुछ नहीं कहते। वे अपनी गाड़ी से उतरेंगे, एक दूसरे को प्रणाम करेगा, दुसरा पहले को प्रणाम करेगा, और गाड़ी में चढ़कर निकल जाएगा।
फिर अगर उन्हें कुछ दावा करना है, तो वे अदालतों में जाएंगे, लेकिन उस जगह पर वहीं वे लड़ते नहीं हैं, क्योंकि जरूरत क्या है? और मैंने जापानी से पूछा, “आप इसे कैसे प्रबंधित करते हैं?” तो उन्होंने उत्तर दिया, “लेकिन वहाँ सड़क पर लड़ने की क्या ज़रूरत है? क्योंकि आखिरकार, अगर इसका भुगतान करना ही है, तो यह बीमा है जो भुगतान करने वाला है। अगर कार टूट गई है, तो ठीक है, वे हमें भुगतान करने जा रहे हैं। मैं उस पर क्यों चिल्लाऊँ?” यह बहुत समझदार और व्यावहारिक बात है, मुझे लगता है। अकारण अपनी सांस क्यों बर्बाद करें? आपको कुछ भी नहीं मिलने वाला है।
लेकिन मैं ऐसे लोगों को जानती हूं जो गाड़ी चलाते हैं, और वे हर उस व्यक्ति को गाली दे रहे हैं जो उनके ड्राइविंग के रास्ते पर आता है। मेरा मतलब है, वास्तव में यह जीवन का अभिशाप है, जिस तरह से कुछ लोग गाड़ी चलाते हैं! और उसी तरह वे अपने जीवन में ड्राइव करते हैं। हर समय यह कोसते रहते हैं, “वह ऐसा है, यह बुरा है, वह ऐसा कर रहा है”। सहज योग में भी। उन्हें लगता है कि उन्हें अपने अलावा हर व्यक्ति की आलोचना करने का अधिकार है।
इसलिए दूसरों के साथ इस शांति को बनाए रखने के लिए क्षमाप्रार्थी मूड में रहें। “मुझे आशा है कि मैंने यह गलती नहीं की है।” “मुझे आशा है कि मैंने आपको चोट नहीं पहुंचाई है।” “मुझे आशा है कि मैंने आपकी चीजों को गलत तरीके से नहीं रखा है।” उस तरह। क्षमाप्रार्थी मूड में रहें।
यह आप भारतीयों में पा सकते हैं। भारतीयों को इस तरह की समस्या है कि, वे ज्यादा ही क्षमाप्रार्थी मूड में होते हैं। कभी-कभी, उन्हें समझाना असंभव होता है। मैं आपको एक उदाहरण देती हूँ। हम सांगली गए, और आप सब सुबह के ही इतने तृप्त थे और फिर खाना भी तैयार नहीं था। तो उन्होंने कहा कि “हम अपना भोजन नहीं कर सकते क्योंकि अभी देर भी हो चुकी है और यह और भी समय लेगा, इसलिए बेहतर है कि हम सो जाएँ।” मेज़बानों को बहुत दुख हुआ, आप जानते हैं। उन्हें लगा कि यह उनकी गलती है। अब, वहां यह दर्ज हो गया कि हमने उन्हें खाना नहीं दिया है, यह एक भयानक काम है जो हमने किया है। और फिर मुझे उन्हें विश्वास दिलाना पड़ा कि उन्हें (मेहमानों को )कोई बुरा नहीं लगा है, वे खुश हैं कि वे खाना नहीं खा रहे हैं, उन्होने पहले ही अधिक खा लिया था। “नहीं, लेकिन फिर भी यह हमारे नाम पर दर्ज होगा कि हमने उन्हें खाना नहीं दिया और वे बिना भोजन के सो गए।” उन्हें अंत तक समझाना नामुमकिन था, वे हर समय क्षमाप्रार्थी महसूस कर रहे थे।
भारतीय संस्कृति में आप देखिये, जापानीयों की तरह हमारे पास कुछ बहुत अच्छा है, जैसा कि मैंने आपको बताया, कि हमारी शैली क्षमा पर अधिक हैं। आक्रामक पर कभी नहीं। हम दूसरों में कमियां खोजने की कोशिश कभी नहीं करते, लेकिन हम किस तरह से असफल हुए हैं, कैसे असफल हुए हैं, इसमें हम अपनी खामियां ढूंढते हैं। यह भारतीयों से सीखने की बात है, अगर उन्होंने अपनी संस्कृति को बरकरार रखा है तो यह वास्तव में उनके खून में है।
तो हमारी संस्कृति ऐसी होगी कि हम अपने भीतर पूर्ण शांति का इजहार करेंगे। और तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम एक शरीर में हो,सक्रिय। आप एक शरीर में सक्रिय कोशिकाएं हैं। शरीर की सभी कोशिकाएं हमेशा कभी सक्रिय नहीं होती हैं। लेकिन जो सक्रिय हैं उन्हें एक-दूसरे के साथ शांति से रहना होगा, नहीं तो उस बेचारे शरीर का क्या होगा? इसलिए शांति बनाने की कोशिश करें।
दूसरी चीज जो आप शांति बनाने के लिए कर सकते हैं, वह है कम बात करना। जब भी कोई झगड़ा हो या कुछ भी हो, बस चुप रहो। देखिए, इसका बेहतर असर होगा। अगर दो व्यक्ति झगड़ रहे हैं तो कभी भी इसे सुलझाने की कोशिश न करें बल्कि चुप रहें। चुप रहना बहुत जरूरी है। अधिक मौन रहना। लेकिन यह अंग्रेजी संस्कृति की तरह एक अन्य अति नहीं होना चाहिए, कि वे बात ही ना करें, चाहे वह कुछ भी हो। वे बात ही नहीं करते हैं, लेकिन वे बहुत ज्यादा सोचते हैं। आपको इस भावना के साथ मौन रहना चाहिए कि ‘भगवान इन लोगों को कुछ समझ दे। बर्फ जमी समुद्र की तरह नहीं, शांति ऐसी हो जो कारगर हो। शांति जो प्रभावी है।
तो इस नई संस्कृति में, हमें बेहद शांतिपूर्ण लोग हो जाना चाहिए। और वह शांति तुम्हारे चेहरों पर प्रकट होनी चाहिए। लोगों को समझ आना चाहिए कि आप शांत हैं। इसलिए मैं कहती हूं, अगर आप साफ-सुथरे कपड़े पहने हैं, आपके बाल साफ-सुथरे हैं, तो लोगों को अच्छा लगेगा। नहीं तो अगर आप बिखरे बालों वाले किसी व्यक्ति के पास पहुंचते हैं, तो आप जानिये कि वह वैसे ही परेशान हो जाता है! “भगवान जाने क्या हुआ है? यह आदमी किसी झगड़े से आ रहा है? किसी ने उसके बाल खींचे होंगे, या उसके साथ कुछ गलत हुआ होगा, जिस तरह से वह अस्त-व्यस्त हो रहा है। ” इसलिए यदि आप साफ-सुथरे कपड़े पहने हैं, तो लोगों को इतना दरकिनार नहीं किया जाता है, क्योंकि वे सोचते हैं कि “नहीं, नहीं, यह ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि, आप देखिये, आखिरकार, उसका कभी झगड़ा नहीं हुआ। वह अपने घर से शांति से आ रहा है।”
हमारी संस्कृति में स्वच्छता का बहुत महत्व है। विचार की शुद्धता, मन की शुद्धता, शरीर की शुद्धता, व्यवहार की शुद्धता। आप चीजों को बड़े करीने से कैसे करते हैं यह हमारी संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण है। यह बहुत, बहुत महत्वपूर्ण है! जो कुछ लोगों को बहुत ही मज़ेदार लग सकता है। क्योंकि, तुम कांटे को इस तरह से पकड़ते हो या उस तरह से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपने कांटे या चाकू को टेबल पर कैसे रखते हैं। यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है।
लेकिन यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है कि आप आरती कैसे करते हैं, आप पूजा की चीजें कैसे रखते हैं, आप मेरी तस्वीरें कैसे रखते हैं। आप अन्य सहजयोगियों की चीजों को कैसे धारण करते हैं, आप उन चीजों का सम्मान कैसे करते हैं जो शुभ हैं।
तो बात ऐसी है जो किसी को अपने भीतर धारण करना चाहिए। पवित्रता की, पवित्रता की, शुभता की, पवित्रता की। यानी बड़ी सावधानी और समझदारी से करना है और उस शुभता के भार के साथ चलना चाहिए। शुभता के उस वज़न के साथ। आप स्वयं इस धरती पर चलने वाले शुभ हैं। इस धरती पर शांति ‘आप’ हैं। लेकिन शांति जिस तरह से इस बर्तन में उंडेली जाती है, वह साफ-सुथरी होनी चाहिए, साफ-सुथरी होनी चाहिए और इस तरह से रखी जानी चाहिए कि कुछ भी बाहर ना छलके।
तो शांति पाने के लिए, अपने दिमाग को ठीक रखने का सबसे अच्छा तरीका है, अच्छी चीजों के बारे में सोचना। फूलों के बारे में सोचो, कांटों के बारे में नहीं। दूसरों ने आपके साथ क्या अच्छे काम किए हैं। कितनी अच्छी बातें हैं। आपके पास कौन से खूबसूरत पल हैं, और अपने को प्राप्त आशीर्वाद को गिनते रहे। आभारी हो। अन्यथा आप शांति की रचना नहीं कर सकते।
[माँ मराठी में किसी को विदा करती हैं]
आपको ऐसी वैसी हर चीज पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। अपना चित्त शांति में रखें। शांति को अंदर रखें, अपना चित्त अंदर रखें। वास्तव में, यदि आप वास्तव में मेरे सभी शब्दों को अपने मस्तिष्क के अंदर जाने देते हैं, तो मुझे यकीन है कि मैं परिणाम प्राप्त करूंगी लेकिन उथले दिमाग के साथ, यह बहुत कठिन है। आप केवल शोषित करो!
शांति का दूसरा पहलू कभी भी किसी ऐसी चीज का समर्थन करने की कोशिश नहीं करना है जो उतावला \झगडालू हो या जो विनाशकारी हो। जो कुछ भी विनाशकारी है उसका समर्थन कभी नहीं करना चाहिए। लेकिन जिस किसी को भी हमला या प्रताड़ना या हावी किया जा रहा है, उसकी रक्षा और उसका समर्थन किया जाना है। अगर आपके पास शांति की ताकत है तो आप वहां खड़े रहकर ही यह कर सकते हैं। आपको अपनी शांति के लिए लड़ने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर बात उस तक आ जाए… हिटलर जैसा इंसान जब आया तो लोगों को अपनी शांति के लिए लड़ना पड़ा।
अब, हमारी संस्कृति का दूसरा भाग परमानंद होना है। लोगों को हममें आनंद कार्यंवित होता दिखना चाहिए। लोगों को महसूस होना चाहिए कि आनंद है। यदि कोई व्यक्ति आनंदित है, तो वह आनंदित दिखता है। वह आनंद उत्सर्जित करता है। वह इसे विकीर्ण करता है। वह एक परेशान, दुखी प्राणी नहीं दिखता है, जो हर समय इधर-उधर की छोटी-छोटी बातों के बारे में कुढ़ता, कुड़कुड़ाता या चिंतित रहता हो। और किसी के आनंद में खलल डालने का अधिकार किसी को नहीं है। अगर कोई आनंदित अवस्था में है, तो उस व्यक्ति की नकल करने की कोशिश करें और वैसे आनंदित बन जाएं।लेकिन लोग ऐसे लोगों से जलते हैं जो आनंदित होते हैं और परेशान करने की कोशिश करते हैं! इसलिए इतने सारे संतों को प्रताड़ित किया गया, क्योंकि वे बहुत आनंदित और सुखी लोग थे।
हमें अपने भीतर स्थित परमानंद का मज़ा लेना है, यह महत्वपूर्ण है। शायद आप खुद ही के पास स्थित उस आनंद से अवगत नहीं हैं। कतई जागरूक नहीं। कभी नहीं, पहले कभी इतने लोग नहीं थे जिन्हें बोध हुआ हो। इतिहास में इससे पहले कभी भी आदि शक्ति आपकी समस्याओं का समाधान करने के लिए स्वयं इस धरती पर नहीं आई थी। इससे पहले कभी भी, बहुत साधारण प्रयास करने वाले, बहुत कम खोज करने वाले, बहुत कम समझ वाले लोगों को इस तरह की अनुभूति नहीं दी गई है। कभी-कभी, यह ऐसा है,यदि आप देखें, जैसे पत्थर अचानक हीरा बन जाता है। सधारणतया आप एक हीरे को हीरे के पत्थर से ही काट कर निकाल सकते हैं।
आप ऐसी आनंदमय स्थिति में हैं। यह जबरदस्त आनंद आ गया है। यह बहुत प्रभावी है। मैं खुद नहीं जान पाती जब भी मैं उन्हें देखती हूं। मैं वास्तव में हैरान हूं कि यह कैसे काम कर रहा है।
कृतज्ञता से ही परमानंद प्राप्त हो सकता है। केवल कृतज्ञता से अपने हृदय को बड़ा करके। आनंद कृतज्ञता का प्रतिफल है। ऐसी कृतज्ञता जो केवल सांसारिक या सिर्फ बोली जाने वाली लिप-सेवा नहीं है, बल्कि हृदय से है, वह हृदय से है, हृदय की कृतज्ञता है। और आनंदित लोग कभी भी दूसरों से ईर्ष्या नहीं करते हैं क्योंकि आनंद से बड़ा क्या है? आनंद के इतने आयाम हैं कि आप कारण और प्रभाव के दायरे से परे चले जाते हैं। सभी देवदूत, सभी गण आपकी सहायता के लिए वहां हैं। आप जानते हैं कि यह काम करता है। इस तरह यह काम करता है, कि…। लेकिन आप इसे हल्के में लेते हैं। जब आप को मालूम होता हैं कि यह हो गया है, वह हो गया है, तो आप उस आनंद से उतने प्रभावित ही नहीं होते कि, क्या आनंद है!
जब आप आनंदित महसूस करें तब आप अपने दिलों को पार कर जायें। अपने दिलों को पार करो और महसूस करो, बस देखो। आनंद को इस तरह महसूस करें – अपने दिलों को पार करें। आनंद महसूस करो! हमारे भीतर अपार आनंद है। भगवान इतने दयालु रहे हैं कि,हमें इतना प्राप्त हो गया है ।
क्या आप कृपया उन के आसपास हाथ रखेंगे जो नीचे बैठे हैं, कृपया! दूसरी महिला भी। वह कहाँ देख रही है? आप एक कुर्सी पर बैठे हैं, क्या आपको आने वाले हर व्यक्ति को देखना जरूरी है? कोई जरूरत नहीं है!। इसे महसूस करें!
परमात्मा आपका भला करे।
तो यह आनंद जब तुम हर जगह पाते हो, छोटी सी चीज में भी तुम पाते हो कि आनंद है। ज़ेन ने लोगों को यही सिखाया। उन्होंने केवल एक काई, थोड़ी सी काई को देखकर आनंद देखा, और आप काई देखते हैं और आप कहते हैं, “हे ईश्वर, यह कितनी सुंदर वस्तु है! “भगवान ने थोड़ी सी काई बनायी है, और उस काई में वह सभी छोटे-छोटे तंतु हैं, और वह आनंद है। लेकिन जो लोग व्यर्थ हैं वे कभी आनंद का अनुभव नहीं कर सकते। घमंड आनंद को मारता है। अहंकार आनंद को मारता है।
एक बार शिवाजी एक विशाल किले का निर्माण कर रहे थे। और, वहाँ ऐसा हुआ कि वह अहंकार में आ गये। उन्होंने महसूस किया, “देखिए इस काम के कारण कितने लोग रोज़गार पाये हैं।” तब उनके गुरु रामदास घटनास्थल पर प्रकट हुए। वे स्वयं अहंकार के नियंत्रक हैं, क्योंकि वे हनुमान के अवतार थे। तो वह आये और उन्होने कहा, “ठीक है, मैं चाहता हूं कि तुम मेरे लिए एक काम करो”। उन्होंने कहा, “हां गुरुजी, आप मुझसे क्या चाहते हैं?” उन्होंने कहा, “आप यहां पड़े इस शिलाखंड को, इतना बड़ा शिलाखंड, थोड़ा-थोड़ा करके तोड़े।” इसलिए जब लोगों ने इसे मारा तो यह टूटना शुरू हो गया। और अंदर एक छोटा सा पत्थर आया, जिसे उन्होने नारियल की तरह अपने हाथ में लिया और उसे तोड़ दिया। और उसमे पानी था और अंदर एक मेंढक था। और शिवाजी, उन्होंने महसूस किया, कि, “अगर भगवान ने इस मेंढक को बनाया है, तो उसने उसे पानी भी दिया है। मैं कौन होता हूं यह अहंकार करने वाला?
तो उसमे आनंद आया, कि भगवान ने मुझे सब कुछ प्रदान किया है। यह मेरे लिए सिर्फ लाल कालीन बिछा कर किया व्यवहार है। मैने क्या किया? कुछ भी तो नहीं। कितना सुंदर है!
ऐसा आनंद कितनों को मिला है? जिनको नही प्राप्त हुआ उनके प्रति सहानुभूति रखें। उन पर दया करें।
लेकिन आनंद आपके आत्मविश्वास से आता है, अगर आपको खुद पर भरोसा नहीं है, तो आनंद नहीं हो सकता। और आत्मविश्वास के खिलाफ सबसे बुरी चीज है – “तो मुझे क्या करना चाहिए? फिर मैं इसे कैसे प्राप्त कर सकता हूं? फिर मेरे पास क्यों नहीं है?” – यह सबसे खराब है। आप हर समय अपने आप से लड़ते रहते हैं!
आप वह हैं, आप उस पर बैठे हैं, और फिर भी अगर कह रहे हैं, “क्यों नहीं होना चाहिए,” तो क्या जवाब दें? मेरा मतलब है कि आप सिर्फ पूछना चाहते हैं क्योंकि आपको पूछना है? यह वहाँ उपलब्ध ही है। तुम पुछ क्यों रहे हो? बस इसे महसूस करो!
अगर यह काम कर जाता है, कि आपको महसूस होने लगता है कि आप कहां बैठे हैं, तो आपको आश्चर्य होगा कि आप अपने साथ शांति में हैं, और आनंद है।
अंत में, इस संस्कृति में, आपको उन लोगों की तरह व्यवहार करना होगा जिनके पास अधिकार है। आपके पास अपनी आत्मा का अधिकार है। आप अधिकृत हैं। आपके पास आत्मा है। जो सत्ता में हैं वे कभी दिखावा करने की कोशिश नहीं करते हैं। क्योंकि वे अधिकृत हैं, दिखावे के लिए क्या है? पागल लोग ही दिखावा करते हैं, देखिए।
अगर कोई सिर पर “मैं पुलिस महानिरीक्षक हूँ” का लेबल लगा देता है, तो लोग कहेंगे – पागलखाने में ले जाओ। उसी तरह कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं सहज योगी हूं। क्या कहते हो? मैं जो चाहे कर सकता हूँ !” फिर हम उसे कहाँ रखें? आपका अधिकार आपका स्व है, आपका अपना अस्तित्व है। आप जो हैं वह लोगों को आप में दिखना चाहिए। आपको अपने साथ अपना लेबल ले जाने की आवश्यकता नहीं है कि, “मैं सहज योगी हूँ, ऐसा और ऐसा!” – एक्स वाई जेड नंबर। क्रिमिनल नंबर 5, क्रिमिनल नंबर 10! आप अधिकृत हैं। आपके चेहरे पर अधिकार सम्पन्नत्ता झलकती है। लेकिन अब आप वास्तविकअधिकारी हैं।
आप देखिए, सभी अधिकारी कृत्रिम हैं। उदाहरण के लिए, कोई आज प्रधानमंत्री है, सड़क पर भिखारी बन सकता है। हो सकता है। लोकतंत्र में सब कुछ संभव है। उसी तरह किसी भी सत्तावादी सरकारों में। तो आज, आप ऊंचाई पर कुछ हो सकते हैं, आप बस नीचे गिर सकते हैं। लेकिन एक सहज योगी सहजयोगी ही रहेगा। आप अधिकृत और वास्तविक हैं। इसका मतलब है कि जो कुछ भी आपका अधिकार है वह आपके अस्तित्व का हिस्सा है, आप वही हैं। जैसे आप एक इंसान हैं, वैसे ही आप एक इंसान हैं। अब तुम चाहो तो भी पूँछ नहीं उगा सकते।
तो अब आप वास्तविकता मेंअधिकृत हैं, पूरी तरह से ढले हुए सहजयोगी हैं। चंदन की तरह – चंदन को “ओह, चंदन की लकड़ी” को कसम ले कर नहीं बताना पड़ता कि, यह चंदन है क्योंकि इसका हर हिस्से मे (माइक्रोफोन कुछ समय के लिए काम करना बंद कर देता है, माँ भारतीय बिजली की समस्याओं के बारे में कुछ मज़ाक करती है) … चंदन की खुशबू है। आप के हर अंग में, आप के हर अंग में सहज योग की खुशबू होनी चाहिए। तो आप केवल वास्तविक ही नहीं हैं, आप सिद्ध हैं। आप निष्कलंक हैं।
तो आप में उस अधिकार की गरिमा होनी चाहिए। और गरिमा बहुत विनम्र गरिमा है। गरिमा कभी अहंकारी नहीं होता। गरिमा की निशानी है नम्रता। मैंने तुम्हें एक व्यक्ति के बारे में एक कहानी सुनाई जो बाहर गया था और उसने जाकर एक अंधे आदमी, एक संत से पूछा, क्या उसने किसी को इस तरह से जाते देखा है। तो संत ने कहा “हाँ, तुम राजा हो, मैं जानता हूँ सर। पहले तुम्हारा सेवक यहाँ आया था, फिर तुम्हारा मंत्री आया, और अब तुम आये हो।” वह चकित हुआ था, क्योंकि वह अंधा था। एक अंधा व्यक्ति इन चीजों को कैसे देख सका था? उन्होंने कहा, “मैं नम्रता से पता लगा सकता हूं।”
जब तुम्हारा नौकरआया, तो उसने कहा, हे अन्धे! क्या तुने किसी को इस तरफ जाते देखा है?” जब तुम्हारा मंत्री आया तो उसने कहा, “क्या तुमने किसी को इस ओर जाते देखा है?” लेकिन जब आप आए, तो आपने कहा, “सर, आपसे ऐसा सवाल पूछने के लिए मुझे खेद है, लेकिन क्या आपने सुना कि कोई इस तरह से गुजर रहा है?”
यही है। नम्रता का प्रतीक है। आप दूसरों से कैसे बात करते हैं, लोगों को तुरंत पता चल जाएगा कि आपके पास दैवीयअधिकार है। परमात्मा की नम्रता देखिए। यह किस प्रकार आपको प्रसन्न करने की कोशिश कर रहा है, और आपको खुश कर रहा है, और प्रकृति में, व्याख्यान में भी आपको खुश कर रहा है! (जिस तरह से माइक्रोफ़ोन ने काम करना बंद कर दिया है उसका उल्लेख करते हुए)। ठीक है?
तो अब हमारी पूजा होगी। मुझे आशा है कि आप अपने विश्व् निर्मल धर्म की संस्कृति को समझ गए होंगे। कृपया इसे अपनाने का प्रयास करें।
परमात्मा आपको आशिर्वादित करे।