Talk: You have to be in Nirvikalpa, Eve of Sahasrara Puja

Laxenburg (Austria)

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              “आपको निर्विकल्प में रहना होगा”।

वियना, 4 मई 1985।

सहस्रार दिवस मनाने के लिए इतने सारे सहज योगी आते हुए देखना बहुत संतुष्टिदायक है।

सहस्रार को तोड़े बिना हम सामूहिक रूप से उत्थान नहीं कर सकते थे। लेकिन सहस्रार, जो कि मस्तिष्क है, पश्चिम में बहुत अधिक जटिलताओं में चला गया है और नसें बहुत अधिक मुड़ी हुई हैं, एक के ऊपर एक। सहस्रार को खुला रखना बहुत आसान होना चाहिए अगर पश्चिमी दिमाग आपकी माँ के बारे में समझ पाते और जागरूक हो सके।

जब आपकी माता सहस्रार की देवी हैं, तो सहस्रार को खुला रखने में सक्षम होने का एकमात्र तरीका पूर्ण समर्पण होना है।

इसके लिए बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं, “हम इसे कैसे करें?” यह एक बहुत ही मजेदार सवाल है – यह अप्रासंगिक है। यदि आपका सहस्रार किसी के द्वारा खोल दिया गया है, और सौभाग्य से वह देवता आपके सामने हैं, तो समर्पण करना सबसे आसान काम होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। यह कठिन है क्योंकि जो चित्त मस्तिष्क की कोशिकाओं के माध्यम से आया है, मस्तिष्क की कोशिकाओं के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करता है, वह प्रदूषित है, वह अशुद्ध है, वह विनाशकारी है; यह नसों को खराब कर देता है और जब नसें खराब हो जाती हैं, तो आत्मा का प्रकाश नसों पर नहीं पड़ता है और आप समर्पण करने में असमर्थता महसूस करते हैं। आम तौर पर, यह करना सबसे आसान काम होना चाहिए।

इसलिए, हमें मानसिक रूप से खुद से संपर्क करना होगा। हमें खुद से बात करनी होगी और खुद से कहना होगा, “आप कर क्या रहे हैं?” समर्पण क्या है? यह आनंद है। यह सिर्फ आनंद है। “तो फिर मैं समर्पण क्यों नहीं कर सकता? मुझ में क्या कमी है? क्या मैं बहुत निम्न स्तर का व्यक्ति हूँ? क्या मैं वही हूँ जो कह रहा था कि मैं एक साधक हूँ लेकिन मैं नहीं हूँ? क्या मैं बेईमान व्यक्ति हूं कि मैं आत्मसमर्पण नहीं कर सकता? यदि हां, तो मैं अपनी किस बात पर गौरवान्वित हूँ ? अगर स्थिति ऐसी है, तो मैं अपने अहंकार से इतना प्रभावित क्यों हूँ?”

त्यागने के लिए आपके पास है ही क्या ? सागर बनने के लिए एक बूंद को सागर में घुलना पड़ता है। और एक बूंद सागर से बड़ी नहीं हो सकती, है न? तो समर्पण है ही क्या ? अपने संस्कारों, अपने अहंकार और अपने चारों ओर निर्मित कृत्रिम बाधाओं को त्याग देना।

कोई इस दिशा में मानसिक रूप से कदम बढ़ा सकता है, कोई भावनात्मक रूप से आगे बढ़ सकता है और शारीरिक रूप से भी हम स्वयं से संपर्क कर सकते हैं। हम मन्त्रों के द्वारा, स्वयं का अवलोकन कर, स्वयं को जानकर, स्वयं तक पहुंच सकते हैं। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि यह आपके लिए सबसे बड़ा अवसर है, ईश्वर के लिए नहीं।

यदि आप उपलब्ध नहीं हैं तो परमात्मा अपनी अभिव्यक्ति की अंतिम परिणति को पूरा करने के अपने तरीके खोज सकते हैं। यह समझने के लिए भी कि कार्य कितना विशाल है, आपको समर्पण करने वाले हृदय की आवश्यकता है।

केवल मानसिक दृष्टिकोण से, जब आप पहुंचते हैं, तो आप एक घटिया अहंकार विकसित करते हैं कि आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

जैसे, मैंने यह कहते हुए अमेरिका फोन किया कि मैं आ रही हूँ, और लॉस एंजिल्स में एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक है जो एक भारतीय, महाराष्ट्रीयन व्यक्ति है। वह बस अपने नोबेल पुरस्कार से थोड़ा सा चूक गए – इतने महान वैज्ञानिक। उन्होंने तुरंत मुझे फोन किया और कहा, “माँ, मैं आपका स्वागत करने के लिए न्यूयॉर्क आ रहा हूँ। मैं पंद्रह दिन की छुट्टी ले रहा हूँ। जब आप यहाँ हो तो मैं आपके साथ रहना चाहता हूँ।” और करना क्या है? “वैसे भी, जब भी मुझे समय मिलता है, मैं अपनी सुविधानुसार सहज योग कर रहा हूँ। मैं यही कर रहा हूँ, है न?” “लेकिन मैं आपके साथ कुछ समय बिताने के लिए यूरोप के सभी अलग-अलग स्थानों की यात्रा करना चाहूंगा, अन्यथा, मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?”

लेकिन मैंने ऐसा सुना है कि, सहस्रार दिवस के लिए लोग अलग-अलग समय पर पहुंच रहे हैं। मैं हैरान थी! यह ठेठ पश्चिमी दिमाग है: “वैसे”। सहज योग अधिकतर “वैसे ही” करना है। “यह सुविधाजनक होना चाहिए, यह एक सप्ताहांत होना चाहिए, जब “वैसे ही” छुट्टी के लिए, हम वियना जा सकते हैं। वहाँ, निश्चित रूप से, “वैसे ही” हम एक पूजा करेंगे और “वैसे ही” माँ कुंडलिनी को ऊपर उठाएगी, वह हमारे देवताओं को जगाएगी और फिर हम “वैसे ही” आशीर्वाद का आनंद ले रहे होंगे ”। परमात्मा के लिए कोई बलिदान नहीं किया जा सकता है! उनके पास समय नहीं है, उनके पास समय नहीं है। सब कुछ “वैसे ही ” है। यह बल्कि आश्चर्यजनक है! युद्ध के लिए लोग अपनी जान दे देते हैं। विनाश के लिए दिन-रात इतनी मेहनत करते हैं। लेकिन मानवता के निर्माण के लिए, दिव्यता के अंतिम लक्ष्य के लिए, पश्चिम में, कितने ऐसे हैं जो वास्तव में समर्पण करते हैं?”

“अगर यह उपयुक्त हुआ, तो हम वहां होंगे, ‘सहज’। यह सहज शैली है! हमें सहज पहुंचना चाहिए।” मैंने इसके बारे में कई बार सुना है और अभी भी कई ऐसे हैं जो सहज योग के प्रति इस तरह का रवैया अपनाते हैं। यह कभी-कभी मेरे लिए आश्चर्यजनक होता है।

अगर मैं किसी गांव [भारत में] जाती हूं तो लोग पंद्रह दिन, एक महीने की छुट्टी लेते हैं। राहुरी में लोग मेरे आने की तैयारी के लिए एक महीने की छुट्टी लेते हैं। उनके लिए एक दिन की छुट्टी लेना भी बहुत बड़ी बात है। वही लोग हैं जो इसके लायक हैं। मानदंड यह नहीं है कि आप क्या पहनते हैं और क्या खाते हैं और आपके पास क्या है – मानदंड यह है कि, आप दे क्या सकते हैं और क्या त्याग कर सकते हैं। सांसारिक जीवन के पहचान पत्र (लेबल) छोड़ने पड़ते हैं, हमें समझना चाहिए। यह प्रगति जंजीरों से बंधे गुलामों की तरह के लोगों जैसी है: इच्छाओं की जंजीरें, आत्मतुष्टि की जंजीरें, सुस्ती की जंजीरें, अहंकार की जंजीरें – जो एक लकड़ी के लट्ठे की तरह है!

इसलिए हमें खुद को समझना होगा। हर किसी को अपने आप को समझना होगा: कि तुम्हारे माध्यम से दुनिया की मुक्ति आनी है।

आप पूरी मानवता की मुक्ति के लिए चुने गए हैं। परमात्मा चाहते हैं कि आप इस ब्रह्मांड के सौंदर्यीकरण के लिए, परमात्मा के प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति के लिए एक माध्यम के रूप में काम करें।

जब मैं यह कहती हूं, तो मैं देखती हूं कि अहंकार अपने आप ऊपर आ रहा है। जबकि इसके विपरीत एक समर्पण होना चाहिए, अपने पात्र को आनंद से भरने के लिए, दिव्यता का आनंद, ताकि जब आप दूसरों के पास जाएं तो आप उन पर ईश्वरीय सुंदरता और प्रेम डाल दें। यह आपको खुद को अच्छी तरह से समझना है न कि दूसरों को। किसी को दोष मत दो!

यह इतना कीमती है कि कोई भी शब्द इन पलों की महानता का वर्णन नहीं कर सकता है जो हम एक साथ बिता रहे हैं। आपको इसे अपने भीतर महसूस करना होगा – जो जिम्मेदारी आपको दी गयी है।

अपनी आत्मा के द्वारा, अपनी अवस्था के द्वारा, आप कार्य को पूरा कर सकते हैं। लेकिन स्वयं आप में श्रद्धा की कमी आपको समर्पण करने की शक्ति नहीं दे सकती। समर्पण ही सहस्रार का खुलना और, इसे पूरी तरह से खुला रखना है ताकि,  हमारे भीतर निर्विकल्प अवस्था स्थापित हो जाए।

उन्नति की नियमित प्रगति होनी चाहिए; मुहाने की नियमित प्रगति। क्या आपने कभी कोई कमल या कोई खिलता हुआ फूल देखा है जो, खिलता है, और बीच में फिर नहीं भी खिलता है फिर खिलता है फिर मर जाता है फिर खिल जाता है? क्या आपने प्रकृति में कभी ऐसी बेतुकी घटना देखी है? आपका उत्थान हो, फिर पतन हो, तुम ऊपर उठो, फिर तुम नीचे जाओ। क्या तुमने कभी किसी पेड़ को देखा है जो विकसित होता है, फिर से कीचड़ में चला जाता है, फिर से ऊपर आ जाता है, फिर से कीचड़ में चला जाता है और दूसरों को दोष देता है? क्या आपने कोई जानवर देखा है जो बढ़ने लगता है, फिर बौना बन जाता है, फिर से बढ़ता है, फिर से बौना बन जाता है? ये बड़े-बड़े महल भी जो हमारे लिए इतनी सुन्दरता से बनाए गए हैं, क्या आप देखते हैं कि वे अचानक छोटे हो जाते हैं और फिर ढह जाते हैं और फिर उड़ जाते हैं? केवल अहंकार और प्रति-अहंकार का गुब्बारा ही ऐसा करता है। और जब आप उनके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं, तो आप भी बहुत अजीबोगरीब व्यक्तित्व बन जाते हैं।

आपके सहस्रार का कमल अब खुला है। इसे अधिक से अधिक खुलना चाहिए और अचानक नहीं गिर जाना चाहिए, फिर से खुलना और गिरना नहीं करना चाहिए। यह एक बहुत ही जटिल घटना है जोकि आप पश्चिम में देख सकते हैं और आप कभी-कभी बहुत आश्चर्यचकित हो सकते हैं। मेरे लिए यह देखना कभी-कभी बहुत चौंकाने वाला होता है। अचानक कोई आएगा, “ओह, मैं इस बात को लेकर बहुत घबराया हुआ हूँ! मैं इसे लेकर बहुत नर्वस हूं!” कोई दूसरा व्यक्ति आकर मुझसे कहेगा, “मैं अब सहज योग छोड़ना चाहता हूं!” एक और आता है और मुझसे कहता है, “ओह, यह बहुत हो गया! मैं इसके साथ और आगे नहीं जा सकता।” तो हमें इस बात का एहसास होना चाहिए कि हमारे भीतर कुछ बहुत ही अजीब है, कुछ बेतुका है, इसलिए ऐसा होता है। हम आगे, पीछे, आगे, पीछे, हर समय चलते रहते हैं। यह पेंडुलम क्या है? वह सहस्रार नहीं हो सकता; सहस्रार पेंडुलम नहीं है, कमल है। तो पेंडुलम चित्त है, ध्यान है। जो चित्त बाएँ से दाएँ, दाएँ से बाएँ चलता है, वह हर समय ऐसे ही चलता रहता है।

लेकिन सहस्रार का क्षेत्र परमात्मा का राज्य है। जब ब्रह्मरंध्र पूरी तरह खुल जाता है तो आपके भीतर स्वर्गलोक खुल जाता है। कुंडलिनी जो उठी है और आपको बोध प्रदान किया है, वह सूक्ष्म मुहाना बनाती है जिसके द्वारा परमात्मा अपनी सभी विलक्षणता को आपके मस्तिष्क के भीतर डालना शुरू कर देते हैं। लेकिन अगर आप इन गुब्बारों से इसे दोनों तरफ से दबा रहे हैं, कभी खोल रहे हैं, कभी बंद कर रहे हैं, कभी खोल रहे हैं, तो परमात्मा अपना चित्त हटा लेता है; आपको यह पता होना चाहिए। उनका चित्त पीछे हट जाता है और यदि ऐसा कई बार किया जाता है, तो ईश्वर आगे परवाह नहीं करते।

तो यह आप ही हैं जिन्हें उस अवस्था को प्राप्त करना है और हम सभी उस निर्विकल्प अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। उसमें सिर्फ प्रगति है। निर्विकल्प के बाद तुम नीचे नहीं आ सकते। अगर कोई अभी भी ऊपर और नीचे, ऊपर और नीचे जा रहा है, तो उसे पता होना चाहिए कि वह अभी भी स्थिति तक नहीं है और उसे खुद का सामना करना चाहिए और खुद से कहना चाहिए कि, “नहीं, मुझे निर्विकल्प में होना है जहां से मैं नीचे नहीं आता हूँ !”

जो लोग निर्विकल्प अवस्था में नहीं हैं, वे बचने वाले नहीं हैं। मुझे यह कहते हुए बहुत अफ़सोस हो रहा है। उन्हें बचाया नहीं जा रहा है। उन्हें दंडित किया जाएगा। हालाँकि गैर आत्मसाक्षात्कारी लोगों के समान नहीं। लेकिन वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के क्षेत्र में आसन ग्रहण नहीं कर पायेंगे। कम से कम आपको निर्विकल्प की स्थिति में तो पहुंचना ही होगा। किसी भी परिस्थिति को दोष न दें। अपने पिता, माता, भाई, वातावरण, यह, वह दोष न दें। किसी को दोष देने की जरूरत नहीं है,” “क्योंकि कोई आया तो हम प्रभावित हुए?” तुम्हारे साथ मामला क्या है? मैं यहाँ हूँ – तुम मुझसे प्रभावित नहीं होते हो! आप किसी ऐसे व्यक्ति से कैसे प्रभावित होते हैं जो स्पष्ट रूप से इतना मूर्ख है, इतना दबंग है? यानी आपका स्तर क्या है?

तो कल मैंने आपको यह बताने का फैसला किया कि,  निर्विकल्प की स्थिति में कैसे रहना है। जैसा कि मैंने कहा, हमारी कार्यप्रणाली मानसिक हो सकती हैं। लेकिन अगर मानसिक रूप से मैं कहूं कि, “आप यह दवा लीजिये,” और आप दवा नहीं लेते हैं तो यह सिर्फ एक मानसिक बात है: दवा को अलमारी में रख दिया जाता है। तुम वैसे ही बने रहते हो और फिर तुम कहते हो, “माँ, हाँ, हमने आपका व्याख्यान सुना।”

तो कल की पूजा का मुख्य बिंदु, जैसा कि मैंने फैसला किया है कि, आपको निर्विकल्प अवस्था में होना है।

हम कह सकते हैं कि यह सहस्रार का दिन बहुत बड़ा दिन है क्योंकि मैंने ऐसा अल्टीमेटम पहले कभी नहीं दिया। क्योंकि अब हम विश्व धर्म के रूप में, विश्व धर्म के रूप में स्थापित हैं। हम अन्य धर्मों की तरह नहीं हैं, जहां अवतारों की मृत्यु के बाद, लोगों ने धर्म की शुरुआत की और उसके साथ जो करना चाहते थे, किया।

अपने जीवन काल में ही हम स्वयं को ऐसा यंत्र बनाने जा रहे हैं जो विश्व धर्म का प्रतिनिधित्व करेगा। हमें अपने भीतर मजबूत देवताओं को धारण करना होगा। हमने सभी गलतियों से उन्हें कमजोर कर दिया है – कोई बात नहीं। वे कमजोर हैं क्योंकि परंपरागत रूप से हमारे पास ताकत नहीं है – कोई बात नहीं  लेकिन अब यह धर्म स्थापित हो गया है, अब आगे से हम और अधिक काले धब्बे नहीं चला सकते।

हमने सभी चयन, प्रशिक्षण, सब कुछ कर लिया है और आप सभी को अब नाव में कूदना है। हमारे पास डगमगाने के लिए अब और समय नहीं बचा है। जो पीछे छूटेगा वो पीछे छूट जाएगा। यह अभी बहुत तीव्र अवधि है, आपको समझना चाहिए। समय की मांग अब ” वैसे ही” के ढंग से चलने वाली नहीं है। यह अब सहज योग नहीं है, यह अब महा योग है। और तुम्हें “महा” बनना है, तुम्हें महान बनना है अन्यथा तुम वहां नहीं हो सकते। आपको इन सब चीजों से बाहर निकलना होगा।

कल मैं अपनी तरफ से जो भी संभव होगा, कोशिश करूंगी। मैं इसे कार्यान्वित करुँगी। लेकिन यह एक गंभीर मामला है, मुझे आपको बताना होगा: कि एक बार जब मैंने धर्म की स्थापना कर ली तो मैं इसमें कोई छिद्र  नहीं रखना चाहती। मैं इसे टालती रही हूँ क्योंकि मुझे यकीन नहीं था। अब मैं निश्चित रूप से जानती हूं कि ऐसे कई लोग हैं जिन्हें ‘निर्मलाइट्स’ कहा जा सकता है। क्योंकि आपकी मां की खूबसूरत साड़ी पर अब काले धब्बे नहीं चाहिए। यह बिल्कुल उच्चतम गुणवत्ता वाला होना चाहिए।

धीरे-धीरे हम लोगों को छोड़ देते थे, धीरे-धीरे इस पर काम करते थे, लेकिन यहां अब समय नहीं बचा है। जैसा कि मैंने आपको बताया है, मैं भारत वापस जा रही हूं। कल मैं आपको बता पाऊंगी कि कैसे, धीरे-धीरे, आप अपने सहस्रार तक पहुँच गए हैं। और निर्विकल्प को पाने के लिए आपको वास्तव में खुद को पूरी तरह से समर्पित करना होगा।

सहज योग में आना सुविधा की बात नहीं है। यह सहस्रार दिवस है – आपको हिमालय पार करना है। यदि आप उन लोगों के जीवन को पढ़ेंगे जिन्होंने कैलाश तक यात्रा करने की कोशिश की, तो आपको पता चल जाएगा कि उन्होंने किन कठिनाइयों का सामना किया है। मैंने तुम्हें बहुत मधुरता से, कोमलता से उस बिंदु तक पहुँचाया है, लेकिन उस प्यार से बिगड़ना मत। जब तक आप निर्विकल्प अवस्था में नहीं होंगे, तब तक आप सभी हलकी सी भी हवा में बह जायेंगे।

मुझे खेद है कि मुझे यहां ऐसा कहना पड़ रहा है, ऑस्ट्रिया में। हमारे बाएं और दाएं की यात्रा के अंत का निर्णायक बिंदु इस स्थान को होना चाहिए। क्योंकि “मेरे पति ऐसे हैं,” “मेरी पत्नी ऐसी है,” “क्योंकि मेरा बच्चा ऐसा है,” आपको इन बातों के आधार पर कोई छूट नहीं मिलेगी। आप किसे बता रहे हैं? आपकी अपनी आत्मा को? अपनी आत्मा बताओ! क्या यह समझती है? यह तुम्हारे वायब्रेशनस् को छीन लेता है, यह तुम्हारा आनंद छीन लेता है, यह तुम्हारी स्थिति छीन लेता है।

निर्विचार स्थापित करना बहुत आसान है। लेकिन कुछ लोगों में वह भी नहीं है। फिर निर्विकल्प का क्या? आपको इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा।

यह आखिरी सहस्रार दिवस हो सकता है जिसे हम यूरोप में मना रहे हैं, शायद, मुझे नहीं पता। ऐसा नहीं है कि माँ तभी खुश होती हैं जब उच्च योग्यता या उच्च क्षमता वाले लोग हों – ऐसा नहीं है। मुझे उनके लिए बहुत चिंता है जो खो गए हैं, जो छूट गए हैं। लेकिन कभी-कभी अपने अनुभव से मुझे लगता है कि ऐसे लोग प्यार में बिगड़ जाते हैं। मेरा प्यार आपको बिगाड़ने के लिए नहीं है, आपको बर्बाद करने के लिए नहीं है, यह आपकी मुक्ति के लिए है। यह आप पर निर्भर है कि आप, खुद पर ईश्वर के आशीर्वाद की सुंदरता का आनंद लें।

अब भी अगर ऐसे लोग हैं जो धार्मिक नहीं हैं जो सच्चे नहीं हैं, जो धर्म स्तर पर सदाचारी नहीं हैं तो मैं उनसे क्या बात कर सकती हूँ? और यदि वे आत्मा भी नहीं हैं, तो मुझे उनके साथ क्या करना है?

विचारधाराएं, बातें, चर्चाएं और तर्क आपको वहां नहीं ले जाते हैं; नहीं वे नहीं ले जाते। यह ध्यान है। ध्यान क्या है? वास्तव में अपने आप का सामना करना और अपने आप को पूरी समझ के साथ सुधारना है कि आप क्या हैं। हमें आदर्श मनुष्य बनाना है। यही तो है विश्व धर्म, नहीं तो हमारे कई ‘धर्म’ चल रहे हैं। सभी महान अवतारों के नाम पर इतनी धार्मिक गतिविधियाँ, जो कही भी अवतार से सम्बद्ध नहीं हैं बल्कि, इसके ठीक विपरीत हैं।

इस निर्विकल्प अवस्था को एक बार और हमेशा के लिए स्थापित करना है ताकि,  फिर मुझे आपके साथ संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं रहे। कल सहस्रार [पूजा] में शामिल होने वाले लोगों का समूह उस अवस्था को स्थापित करने में सक्षम होना चाहिए, अन्यथा वे उन लोगों की तरह ही हैं जो नवागंतुक है। चाहे वे पहली बार आ रहे हैं या दसवीं बार या ग्यारहवीं बार या सौ बार: इससे क्या फर्क पड़ता है?

मेरे लिए यह सुस्पष्ट है। मेरे पास कम समय है चूँकि साधन ठीक होना चाहिए। यदि आपको इस साधन के विकास को उचित तरीके से तेज करना है ताकि ईश्वरीय प्रेम बहे और उस प्रेम के ईश्वर को, इससे प्रसन्नता हो तो, हमें ऐसे सुंदर फूल बनाने होंगे जिनकी वह सराहना करें, जिन्हें कि वे नष्ट नहीं करें। इस नाटक के दृष्टा को संतुष्ट किया जाना है ताकि वह अपने विनाश को स्थगित कर दे। इसीलिए मैंने कहा कि समय कम है। समय बहुत कम है।

अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे परमात्मा के क्षेत्र में विकसित हों – वे महान संत हैं जो पैदा हुए हैं – अगर हम उन्हें आनंद का पूरा मौका देना चाहते हैं तो सबसे पहले हम योग्य माता-पिता बनें, न कि ऐसे लोग जो सिर्फ भ्रम में रहते हैं .

सहज योग में सब कुछ समझाया नहीं जा सकता। मैं इसे समझा नहीं सकती, मैं नहीं कर सकती, क्योंकि आपके पास इसे समझने की शक्ति नहीं है। जैसे ग्रेगोइरे ने कहा, “माँ मुझे सूरज चाहिए।” क्योंकि लोगों ने उससे कहा था, “सप्ताहांत भयानक होगा। कोई सूरज नहीं होगा। ” पंद्रह मिनट के भीतर सूरज चमक रहा था! पंद्रह मिनट के भीतर! हवा चलने लगी। सभी बादल वियना के चारों ओर सहस्रार की तरह खूबसूरती से स्थापित हो गए, और आकाश इस तरह खुल गया जैसा की मैं चाहती हूं कि आपका सहस्रार खुला रहे। सारी प्रकृति इसे पूरा करने के लिए बहुत उत्सुक है लेकिन आपको अपनी आत्मा के साथ सहयोग करना सीखना चाहिए। यह एक ऐसा सहयोग नहीं है जो बस  “यूँ ही” हो। यह आत्मा होना है, आत्मा बन जाना है, पूरी तरह से – यह बहुत महत्वपूर्ण है। कोई भी चीज़ इसे रोक ना पाए।

मुझे उम्मीद है कि आज की घोषणा से हम सभी को अपने प्रति और अपने निर्माता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने में मदद मिलेगी। मेरे प्यार के लिए मेरी प्रशंसा करना अच्छा है। जो कुछ भी हुआ है उसके लिए मेरी प्रशंसा करना अच्छा है, लेकिन स्पष्ट करने के लिए, मुझे नहीं पता कि आप मेरी प्रशंसा कर रहे हैं। मैं प्रशंसा महसूस नहीं करती क्योंकि मैं स्वयं, मैं स्वयं नहीं हूं। मैं खुद को अलग देखती हूं और फिर खुद से कहती हूं कि, “देखो, तुम आदि शक्ति हो, ठीक है, लेकिन तुमने अपने बच्चों को बिगाड़ दिया है, तुमने उनके साथ पूरा न्याय नहीं किया है। वे सब बातों को इतना आसान और सांसारिक समझ लेते हैं। ”

तो कल आपको अपने दिल में एक प्रण लेना होगा। महत्वपूर्ण ये शब्द नहीं हैं। इन्हें आपके अस्तित्व की जीवंत क्रिया में होना चाहिए, जो यह साबित करे, जोकि आपको यह विश्वास दिला दे कि हम पूरी तरह से समर्पित हैं। और उसका प्रभाव तुम अपने व्यक्तित्व में, अपने अस्तित्व में, अपनी अभिव्यक्ति में अनुभव करोगे।

इतने सारे संतों के साथ, मुझे सहज योग के प्रसार की चिंता क्यों करनी चाहिए? चूँकि कुछ ऐसे हैं जो तुम्हें नीचे खींचते हैं, कुछ अड़ियल लोग हैं और कुछ अभी भी हैं जो ग्रसित हैं, कुछ हैं जो बडबडाने वाली रूह हैं। बस उन पर ध्यान मत दो। वे सब खो जाएंगे – कोई फर्क नहीं पड़ता।

हमें हमारे लिए उस महान दिन का निर्माण करना है जिस पर हमें गर्व हो कि हम सत्य के इस महान धर्म से संबंधित हैं। अभी तक कोई ऐसा धर्म नहीं हुआ जो सत्य का धर्म हो। इनकी कुछ प्रथाए है और कुछ उपदेश देते है और इसका अवतरण से कोई लेना-देना नहीं है। आपको कुछ ऐसा करना होगा कि लोग कहें कि हम इस व्यक्ति में अपनी मां को देख सकते हैं।

आज ऐसा दिन है जब मैं कुछ बच्चों को आशीर्वाद देना चाहती हूं। मैंने कई बच्चों को आशीर्वाद दिया है। मैं सभी माता-पिता को यह समझने का आशीर्वाद देना चाहूंगी कि बच्चों के पालन-पोषण के लिए उन्हें बहुत योगदान देना है। कुछ बहुत अच्छे टेप उन्होंने इंग्लैंड में इस विषय पर बनाए हैं की इस पागल पश्चिमी जीवन में बच्चों के ठीक से विकसित होने में कैसे मदद करें। और जो तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन रहा है (फ्रायड), उसने इस जगह पर काम किया। वह वही है जिसने आपको बर्बाद कर दिया है और आपको Holy Ghost पवित्र आत्मा के खिलाफ पाप करना पड़ा है। अपनी माता के समक्ष पाप, अब इस समय इस स्थान पर हमें यह आशा करने के लिए अपना चेहरा उस तरफ मोड़ना होगा कि यह कार्यान्वित हो सके ।

लेकिन जरा सोचिए कि हमने अब तक क्या कुर्बानी दी है? कोई बलिदान पर्याप्त नहीं है, लेकिन क्या हमने कुछ बलिदान किया भी है? इससे आपको समझ में आ जाएगा कि आपकी माँ ने आपको बिना किसी कठिनाई के दूसरा जन्म दिया है; प्रसव पीड़ा का सारा दर्द उसने अपने ऊपर ले लिया है। अब आप बड़े हो गए हैं और आपको यह समझना होगा कि अब आप बड़े हो गए हैं और आप बच्चों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते हैं। वह लड़कपन का दौर अब खत्म हो गया है। अब आप बड़े हो गए हैं, आपको इस महायोग के लिए और इस महान धर्म के लिए जिम्मेदार बनना होगा जिसे हमने स्थापित किया है: वह धर्म जो सभी धर्मों को एकीकृत करता है, वह धर्म जो अपने नजदीक आने वाले को शुद्ध करता है। यह सभी नदियों का सागर है। विश्व धर्म के इस महान महासागर में सभी नदियाँ बह कर समा जाती हैं।

इसलिए हमें नए स्वरूप, नई लय, दिव्य बांसुरी के नए संगीत में समाने के लिए खुद को ढालना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता, मुझे नहीं लगता कि पश्चिमी लोगों के पास ज्यादा संभावनाएं हैं। सहस्रार के लिए आए हैं तो तैयार हो जाइए! कल मैं जितना हो सके कार्यान्वित करना चाहूंगी।

मैं चौबीस घंटे काम कर रही हूं। एक मिनट भी मैं बर्बाद नहीं करती। और इसी तरह मुझे आशा है कि आप अपने चौबीस घंटे अपनी मुक्ति और पूरे ब्रह्मांड की मुक्ति के लिए समर्पित करेंगे।

परमात्मा आप सब को आशिर्वादित करें! तो ईश्वर आप सभी का भला करे।

ग्रेगोइरे: और हम आपसे, श्री माताजी से, जो हमारी सबसे पवित्र, सबसे प्यारी, सबसे पवित्र, दिव्य माता हैं, वादा करते हैं कि हम आपके साथ न्याय करने के लिए उत्थान करेंगे।

श्री माताजी: धन्यवाद। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। इस वादे के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आज मैं सूरज को धन्यवाद देती हूं और मैं वायु को धन्यवाद देती हूं और अब मैं इस वादे के लिए आपको धन्यवाद देती हूं।

मैं एक बहुत ही सरल, मासूम माँ हूँ, बहुत आसानी से प्रसन्न हो सकती हूँ, लेकिन मेरे साथ खिलवाड़ मत करो। मेरे साथ खेल मत खेलो। अबोधिता भी बहुत शक्तिशाली हो सकती है। मेरे साथ गेम मत खेलो।

मुझे लगता है कि हम लगभग दस मिनट तक ध्यान करें, यह एक अच्छा विचार होगा।

ग्रेगोइरे: तो श्री माताजी अब सुझाव देते हैं कि हम अब लगभग दस मिनट के लिए एक साथ ध्यान करें, तो आइए हम अपनी आँखे …

श्री माताजी : अपनी आँखें खुली रखो।

ग्रेगोइरे: मैं कहने जा रहा था, “आइए हम अपनी आँखें बंद करें!”

श्री माताजी : मैं यहाँ बैठी हूँ, आप ध्यान कहाँ करने जा रहे हैं?

ग्रेगोइरे: हाँ, श्री माताजी।

श्री माताजी : मुझ पर ध्यान करो! अपनी आँखें खुली रखो! बस अपनी आँखें खुली रखो।

अब सभी बच्चों को ऐसे ही हाथ रखना चाहिए, ठीक है? और मुझे देखो।

अपनी जीभ ऊपर उठाएं और जितना हो सके उसे पीछे की तरफ खींचे। इसे पीछे की ओर मोड़ें। इसे अपने सिरे पर परमानंद का अनुभव करने दें। अब अपनी ठुड्डी को नीचे रखें, अपनी गर्दन को स्पर्श करते हुए – अपनी आँखें बंद न करें – पूर्ण समर्पण में। ठोड़ी [नीचे] रखो, लेकिन अपनी आँखें बंद मत करो।

अपने सहस्रार पर ध्यान दें। अपने हाथों को पूरी तरह से दोनों बाजू पर ढीला करें, उन्हें ढीला करें। सीधे बैठो।

तालू को मत छुओ। अब सांस अंदर लें। जीभ को पीछे न धकेलें। जुबान जहां है वहीं रखें। सांस अंदर लें। अब अपने पेट को ऊपर उठाएं, बिना सांस बाहर निकाले, ऊपर की ओर हवा को फेफड़ों की ओर ऊपर की ओर धकेलें। अपने पेट को अंदर धकेलें।

सहस्रार पर ध्यान दें।

सहस्रार के माध्यम से आपको प्रकाश दिखाई देने लगेगा। सहस्रार एक प्रकार से आँखों जैसा हो जाता है। अब इसे छोड़ दो। इसे अब छोड़ दो।

अपना सिर उठाओ। अब अपने सिर वापस रखो।

उँगलियाँ [कान में] डालें। अपने सहस्रार पर ध्यान दो, बस। कुछ मत कहो, कोई मंत्र नहीं।

अपनी जीभ बाहर निकालें, इसे पीछे धकेलें। अपनी सांस लें। पेट को धक्का। अच्छी बात है।

अब बिना पलक झपकाए मुझे लगातार देखें, बिना आंखों पर कोई दबाव डाले। सहस्रार पर ध्यान दें।

आप इसे बिना पलक झपकाए कर सकते हैं।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करे।

यह है: शारीरिक रूप से, हमने अपना ध्यान अपनी विशुद्धि और अपनी आज्ञा पर लगाया है। लेफ्ट विशुद्धि अभी भी है।

अब अपने सिर को दाहिनी ओर और अधिक ढीला छोड़ दें, इस तरह। सहस्रार पर ध्यान दें, मुझे देखते हुए। ढीला कर दो। हाथ ढीला रखो। इसे ढीला करो।

अब बेहतर।

आप कुंडलिनी को ऊपर उठते हुए महसूस करते हैं?

आइए हम अपनी कुंडलिनी को ऊपर उठा कर खुद को बंधन में डाल लें। उठायें। अपने सहस्रार पर ध्यान दें। अपनी आँखें बंद न करें, अपना सिर पीछे धकेलें। एक। फिर से।

सीधे बैठो!

इसे अपने सिर पर ले लो।

दो।

तीन।

अब एक बंधन: एक, दो। इसे ठीक से, व्यवस्थित रूप से करें। हम सभी को ठीक से करना चाहिए। तीन … चार … पांच … प्रतीक्षा करने का प्रयास करें, जैसा कि मैं कर रही हूं … छह … सात।

फिर भी हमने इसे ठीक से नहीं किया है।

हम सभी को एक लय में करना चाहिए। चलो फिर से करे!

एक। धीरे से! दो। सहस्रार पर ध्यान के साथ। तीन।

मैं यह जिस तरह करती हूँ?

चार। पांच। अच्छा! छह।

सहस्रार पर ध्यान दें!

सात।

चढ़ रही है? चलो आखिरी बंधन है। हा! अब देखो।

स्पष्ट?

अद्भुत।

परमात्मा आप सबको आशीर्वाद दें।

ग्रेगोइरे: यदि आप अनुमति दें तो मैं कहना चाहूंगा कि यदि कुछ लोग हैं जो यह तय नहीं कर सकते कि सहज योग उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज है, तो उन्हें कल पूजा में नहीं आना चाहिए।

श्री माताजी: हा, बिल्कुल। कल की पूजा के लिए हमारे पास ऐसे लोग नहीं होने चाहिए जो कम से कम निर्विचार में न हों। इसका मतलब है कि अगर वे अभी भी सोचते हैं कि, “सहज योग मेरे लिए अनुकूल नहीं होगा,” और वह सब, हमें ऐसे औसत दर्जे के लोग नहीं चाहिए। कृपया मत आना। उनके साथ कुछ भी कार्यान्वित नहीं होगा, वे मेरे लिए बिल्कुल बेकार लोग हैं। अगर उन्हें पूजा में आना है तो उन्हें पता होना चाहिए कि, आपको एक क्षमता का होना चाहिए, अन्यथा कृपया मत आना। ऐसे बहुत से लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं कि सहज योग समाधान है और मैं उस समाधान के लिए चुना गया हूं। ऐसे लोगों को ही कल आना चाहिए।

वरना ऐसे तमाम लोग जो अब भी इस तरह से सोचते हैं। कृपया मुझे माफ़ करें। मैं चाहती हूं कि तुम मुझे माफ कर दो। सहस्रार पूजा के लिए मैं आपको नहीं रख सकती, ऐसा काम करना मेरे लिए ज्यादा ही है, यहाँ ऐसे अड़ियल बेतुके लोगों के साथ। मैं नहीं चाहता कि ऐसे अड़ियल बेतुके लोग आए। अगर उन्हें लगता है कि वे कुछ अहसान कर रहे हैं, तो उन्हें पता होना चाहिए कि मुझ पर किसी का अहसान नहीं है, लेकिन यह आप पर अहसान है। कृपया आप में से कोई भी, उस तरह का नहीं आना चाहिए। मैं इसे महसूस कर सकती थी| कुछ बैठे हैं तुम्हारे भीतर। इसलिए ऐसे सभी लोगों को आकर हमें परेशान करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्हें सहज योग से बाहर निकलना चाहिए, उस पर काम करना चाहिए और फिर वापस आना चाहिए। मुझे नहीं पता कि उनके पास कितने अवसर हैं, लेकिन जो भी हो।

आप जानते ही होंगे कि सहज योग में आना एक विशेष सौभाग्य की बात है और जो भी ऐसा सोचता है उसे यहां नहीं होना चाहिए। मैं बहुत आभारी रहूंगी। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।