Sahasrara Puja: The Ghost of Materialism

Thredbo (Australia)

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1987-0503 सहस्रार पूजा – “भौतिकवाद का भूत”, थ्रेडबो (औस्ट्रेलिया)

आज एक बहुत महान दिन है सभी सहज योगियों के लिए। बहुत समय पहले मैंने इच्छा की थी कि सहस्रार को खोला जाना चाहिए। परंतु सही समय के लिए प्रतीक्षा कर रही थी। सही समय पर इसको करना महत्वपूर्ण था। एक लड़के ने औरंगाबाद में, काफ़ी युवा था, मुझसे एक प्रश्न पूछा, “माँ, यह ब्रह्मचैतन्य की सर्वव्यापी शक्ति हमारी इंद्रियों से परे है, आप इसे इंद्रियों द्वारा अनुभव नहीं कर सकते। ऐसा कैसे है कि अब हम इसे अपनी इंद्रियों के द्वारा अनुभव कर पा रहे हैं। यह प्रश्न उसने पूछा और मैं आपसे यही प्रश्न पूछती हूँ। इससे पहले जिन लोगों को साक्षात्कार प्राप्त हुआ था वह इसके बारे में ऐसे बात नहीं कर पाए, जैसे आप लोगों को बताते हैं, कि आप इसे अपनी इंद्रियों पर महसूस कर सकते हैं। वे समझा नहीं पाए, वे इसको अनुभव के रूप में नहीं  प्रकट कर पाए। उन्होंने बस इतना किया कि शब्दों में उन्हें बताया, शब्द जो किसी चीज़ के बारे में बता रहे थे, जैसे आम का स्वाद। जब तक आप आम को खाएंगे नहीं तब तक आपको कैसे उसका स्वाद पता चलेगा। केवल यह जान कर कि यह बहुत अच्छा है, यह महान है, यह बढ़िया है, फिर भी आपने उस आम को चखा नहीं। तो अब क्या हो गया है, यह प्रश्न था।

दूसरी चीज़ यह थी कि लोग इतने परेशान हो गए थे, जैसे ज्ञानेश्वर, 21 साल की उम्र में उन्होंने समाधि ले ली। वे एक कमरे में गए और दरवाजे बंद किए, और वहां बैठे, और वहाँ उनकी मृत्यु हुई। वे सब, यहाँ तक कि क्राइस्ट ने अपने आप को सूली पर चढ़ा लिया क्योंकि वे दृष्टांत बता सके, वे उपमाओं के द्वारा बता सके, परंतु उनके साथ क्या हुआ, यह वे नहीं समझा सके। और उन्हें इतना दुख हुआ और इतने हताश हो गए, एक प्रकार से उन्होंने अपना जीवन बहुत शीघ्र ही समाप्त कर लिया। 

यह प्रश्न था। तो क्या रहस्य था, क्या आप में से कोई मुझे बता सकता है?

इसका उत्तर सरल है, पर स्वीकार करना कठिन है। इसका उत्तर यह है कि ये सभी अवतरण, जो इस पृथ्वी पर आए, सहस्रार के अंश थे, ब्रह्मचैतन्य के अंश थे, आदिशक्ति के अंश थे। वे इस पृथ्वी पर आए, कुछ लोगों को साक्षात्कार दिया, जो उत्कृष्ट थे, अच्छे लोग जिन्हें कोई समस्या नहीं थी। जैसे वे किसी प्रेम के सागर से बाहर आए हों और उन सभी को प्रेम के सागर में ले गए, उस सागर का आनंद लेने के लिए। जैसे कबीर ने कहा है, “जब एक बूंद सागर बन जाती है, तब मैं क्या कहूं?” “जब मस्त हुए फिर क्या बोलें?” उनमें से कितनों ने मौन धारण कर लिया, मौन। वे विलुप्त हो गए, वे पूर्णतः उस प्रेम के सागर में विलीन हो गए। परंतु आप पूरी तरह से विलीन नहीं हुए। 

आपके साथ कुछ विशेष हुआ है कि संपूर्ण ब्रह्मचैतन्य, संपूर्ण सागर ने एक बादल का रूप धारण कर लिया है, जो आदि शक्ति हैं और इस पृथ्वी पर आई हैं, आप सब पर चैतन्य की वर्षा करने के लिए, आप को प्लावित करने के लिए, आपका पालन पोषण करने के लिए, आपका विकास करने के लिए, इस प्रकार से प्रेम को प्रकट किया कि आप आदिशक्ति के शरीर में प्रवेश कर चुके हैं।

तो जिस प्रकार एक घड़ा जो गंगा नदी में है, आप आदिशक्ति के शरीर की एक कोशिका की तरह हैं। आपका अस्तित्व, आपका व्यक्तित्व संरक्षित है, इसके उपरान्त कि आपको ब्रह्मचैतन्य अनुभव होता है अपनी इंद्रियों के द्वारा और आप दूसरों को साक्षात्कार दे सकते हैं, पर आप आदिशक्ति के शरीर में है। जब तक आप आदिशक्ति के शरीर में है, आप यह सब कर सकते हैं। 

यह महानतम चीज़ है, जो हुई है। संपूर्ण सहस्रार खुल चुका है, देवी देवताओं के सातों पीठ  के साथ, जो उसके अंग- प्रत्यंग थे। वह पूरा का पूरा एक माँ के रूप में आया है, जो विनम्र है, जो भ्रांति जनक है, जो भ्रामिक  है, जो महामाया है। यह महानतम चीज़ है जो मनुष्य के साथ घटित हो सकती है, और संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ, कि अब आप अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर सकते हैं, आप दूसरों को साक्षात्कार दे सकते हैं, आप अपनी इंद्रियों द्वारा समझ सकते हैं, अपने तर्क द्वारा कि चैतन्य क्या है और वह क्या करता है। 

इसका प्रमाण यहीं है। सभी फूल  कल रात मुरझा चुके थे, समाप्त हो चुके थे उन लोगों की ऊष्मा से जो उन्हें पकड़े हुए थे। फिर मैंने बस उन पर थोड़ा सा चैतन्यित जल डाला और आप देखिए कि अब वे कैसे हैं। ब्रह्मचैतन्य ने उन्हें जीवित कर दिया, पर उनका व्यक्तित्व उनमें है, वे सभी चैतन्यित हैं और व कितने ताज़ा और सुंदर लग रहे हैं। आपके साथ भी यही चीज़ है, आप सभी ताज़ा और सुंदर लगते हैं। कोई भी एक सहजयोगी को पहचान सकता है।

इन परिस्थितियों में आप को समझना होगा की कुछ मर्यादाएँ हैं, जिनका आपको पालन करना होगा। सबसे पहले, मैंने आपको अपने शरीर में धारण किया है। एक बाह्य वस्तु को शरीर के अंदर जाना है और उसकी देखभाल होनी है, लालन-पालन होना है। पर यदि आप कष्टप्रद बन जाते हैं, तो आपको बाहर कर दिया जाएगा, मैं आपको सहन नहीं कर सकती। कुछ लोग अत्यधिक कष्टप्रद होते हैं। वे ध्यान नहीं करते, उनके अपने स्वयं के विचार होते हैं ध्यान के विषय में, वे स्वयं का विकास नहीं करते, वे परिपक्व नहीं होते, वे भूतकाल या भविष्य में रहते हैं, वे लोग कष्टप्रद होते हैं। एक सरल चीज़ का मैंने आपसे अनुरोध किया है कि अपनी नाक में थोड़ा घी डालें, जो बहुत ही सरल चीज़ है पर बहुत महत्वपूर्ण है। आप सभी बहुत ख़राब हंसा से ग्रसित हैं और एड्स के केस में एक लक्षण ,ख़राब हंसा होना है। आप एड्स की चपेट में आ सकते हैं और इस जैसी एक छोटी सी चीज़  का भी पालन नहीं किया जाता। यह एक धार्मिक कर्तव्य होना चाहिए कि आपको मुझे सुनना चाहिए, जो भी मैं कहती हूँ। वास्तव में आपको मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए। मेरा हाथ मेरी आज्ञा का पालन करता है, मेरी उंगलियां मेरी आज्ञा का पालन करती है, मेरे पैर मेरी आज्ञा का पालन करते हैं, आपका क्या, जो उस महान गौरव तक ऊपर उठाए गए हैं और उस महान पद पर, जो आदिशक्ति के शरीर में योगी होने का है और आप मेरे शरीर में कोशिकाओं के रूप में कार्य कर रहे हैं।

सबसे पहली चीज़ यह है,  इस तरह का कार्य करने के लिए, अपने शरीर में सभी प्रकार की चीज़ें धारण करना, एक अत्यंत साहसी कार्य है और यह प्रक्रिया भी अत्यंत भयावह है। इसे प्राप्त करने के लिए अत्यंत धैर्य, प्रेम, करुणा और सबसे अधिक कठोर परिश्रम आवश्यक है। इस को सबसे महान चीज़ माना जाना चाहिए कि सहस्रार मेरे द्वारा खोला गया। निःसन्देह मैं सहस्रार की स्वामिनी हूँ, मैं सभी चक्रों की स्वामिनी हूँ, पर मैं सहस्रार के परे भी हूं, उसके काफ़ी परे। अगर यह स्थिति है तो आपको अपने सहस्त्रार के विषय में सतर्क रहना चाहिए, वह मैं हूँ और आपके हृदय की देखभाल कर रही हूँ, जो यहां पर ब्रह्मरंध्र पीठ है, आख़िरकार जो खुलता है जब आपको आत्म साक्षात्कार प्राप्त होता है। 

सहज योग चारों ओर फैल रहा है पर उसे गहराई में भी विकसित होना है, और वहाँ, यदि आपको वास्तव में सही समझ है कि मैं कौन हूँ तो सहस्रार पूर्णतः स्वच्छ होना चाहिए।

और सहस्त्रार को स्वच्छ रखने के लिए आप को सुनना चाहिए, जो भी मैं आप को बताती  हूँ, उसको मानें पूर्णतः एक विहित बात की तरह। सहस्रार को स्वच्छ रखने के लिए अपने हृदय को खोलिए। यदि आपके हृदय खुले हुए नहीं है तो मैं कैसे उन्हें अपने प्रेम से भर पाऊंगी? अपने हृदय को खोलिए अपने साथी योगी और योगिनियों के प्रति। इस बात की चिंता ना करें की भूतकाल में क्या हुआ है, इस बात से चिन्तित नहीं हों कि आपके जीवन में क्या हुआ है, जहां तक आपके सम्बन्धों का प्रश्न है। वैसी चीज़ें अब सहज योग में नहीं होंगी, वह हो ही नहीं सकतीं। यह इसी प्रकार से क्रियान्वित किया गया है, वह हो ही नहीं सकता। अगर इस हाथ में पीड़ा हो रही है तो दूसरे हाथ को उसकी सहायता करनी चाहिए। आप अकेले नहीं हैं, आप सामूहिक अस्तित्व के शरीर में है। अगर मूर्ख लोग हैं या बेवक़ूफ़ लोग हैं, सहज योग उन लोगों के लिए नहीं है। संस्कृत भाषा में उन्हें ‘मूढ़’ कहा जाता है। ना ही यह उन लोगों के लिए है जो कुछ अधिक ही बुद्धिमान हैं और स्वयं को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। बुद्धिमत्ता में यह क्षमता होती है और उन आदतों में लिप्त होना जो सहज नहीं हैं। धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आपकी चैतन्य लहरियाँ विलुप्त हो जाएँगी, आप बीमार हो जाएंगे, आपको परेशानियां होंगी और आप मुसीबत में पड़ जाएंगे। 

यह किसी प्रकार की चेतावनी नहीं है परंतु एक अनुरोध है क्योंकि आप मेरे शरीर में हैं। और जब भी कोई कष्टप्रद होने की चेष्टा करता है, मेरे शरीर में, मुझे वह सहना पड़ता है और बहुत झेलना पड़ता है। यह एक हास्यास्पद प्रकार का सूली पर चढ़ाना है, जहां हर क्षण आप सूली पर चढ़ाए जाते हैं, किसी के भी द्वारा जो वह करना चाहता है। सहज योगियों के हाथों में वह सारे कानून हैं जो मेरे जीवन को कष्ट पहुंचा सकते हैं, जो मुझे तकलीफ़ पहुंचा सकते हैं यदि वे चाहें तो। पर उनके पास यह क्षमता भी है, ऐसी योग्यता, ऐसी क्षमता कि वे मेरे हृदय में सदा के लिए रह सकते हैं। अपने हृदय को खोलिए, यही बात है जो मैं कहूंगी।

अब हमें यह देखना होगा कि हमारे हृदयों को क्या बंद रखता है। सबसे पहले, जो हमारे हृदय को बांधे हुए रखता है वह है, अतीत का भय।  अतीत में यदि हमें लोगों के बुरे अनुभव हुए हैं तो हम बहुत डरे हुए होते हैं। मैंने देखा है, मैं चकित हूँ। मैंने स्वयं यह देखा है कि इंग्लैंड में, जहां हम रह रहे थे, उस दिन, दुर्भाग्य से या भाग्यवश्, बर्फ़ पड़ रही थी, पहली बार, और हम घर बदल  रहे थे। तो मैं बाहर गई हुई थी और जब मैं वापस आई, मैंने एक महिला को और एक छोटे बच्चे को, जो बच्चे की गाड़ी में था,  एक घर के दरवाज़े पर खड़े हुए देखा, किसी महिला से बात करते हुए। दूसरी महिला दरवाज़े में एक छोटी सी खिड़की से बातें कर रही थी क्योंकि वहां पर एक  श्रृंखला लगी हुई थी। मैं बाहर गई और वापस आई, आधे घंटे बाद। और मैंने वही चीज़ देखी। वह महिला अभी तक बर्फ़ में खड़ी हुई थी और यह महिला उससे उसी खिड़की से बातें कर रही थी। मैं आश्चर्यचकित थी, यह क्या हो रहा है जैसे ‘मिडसमर नाइट्स ड्रीम’। ये लोग एक दूसरे से बातें कर रही हैं, भयावह। ऐसा क्या था जो घर के अंदर इस महिला को भयभीत कर रहा था? यह महिला उसका क्या कर लेती, एक बच्चे के साथ जो उसके घर पर आई। इतना भयभीत होने की क्या बात थी? 

आपके अंदर अहंकार होने के कारण आप दूसरों से डरते हैं। आपने दूसरों को कष्ट पहुंचाया है, दूसरों पर प्रभुत्व जमाया है, आपने यह सब किया है, तो आपके मस्तिष्क के अंदर यह है कि दूसरे भी वही चीज़ आपके साथ कर सकते हैं। इतना भी भयभीत होने की क्या बात है कि अपने घर के दरवाज़े आप सभी के लिए बंद कर दें? 

दूसरी बात, ऐसा हो सकता है कि आप दूसरों द्वारा सताए गए हों या किसी ने आपको कष्ट पहुंचाया हो, तो आपका हृदय बंद हो गया है। आप दूसरों के लिए अपने हृदय को नहीं खोल पा रहे हैं। लोग बात ही नहीं करते, वह बस चुप रहते हैं। क्या हुआ है? जैसे एक मृत शरीर इधर- उधर घूम रहा हो। मान लीजिए, मैं ऐसी होती तो आपको सहज योग के और सहस्रार के रहस्यों के बारे में कौन बताता? तो इस प्रकार का स्वभाव उन लोगों में आता है जो अतीत में डरे हुए होते हैं या उन्होंने दूसरों को डराया हुआ होता है, अपनी ख़राब विशुद्धि के कारण।

आक्रामकता पश्चिम के गुणों में से एक गुण है और वह भी आप लोगों को विरासत में प्राप्त हुई है। जैसे ही आप उन्हें किसी चीज़ में लगाते हैं, वह आक्रामक हो जाते हैं। मैं इसे अपने अंदर नहीं सहन कर सकती। मान लीजिए मेरे पास कोई ऐसी दवा है जो कुछ कोशिकाओं को अत्यंत आक्रामक बनाती है, तब क्या होगा? आख़िरकार मैं कैंसर की मरीज़ बन जाऊंगी। एक आक्रामक कोशिका को घातक कोशिका कहते हैं और वह कोशिका आपको उचित ध्यान नहीं प्रदान कर सकती, उचित गहराई नहीं प्रदान कर सकती। पर आप कुछ नहीं बल्कि एक घातक कोशिका बन जाते हैं, एक ऐसी कोशिका जो कैंसर उत्पन्न कर रही है और वह इंसान सहयोगियों में कैंसर उत्पन्न करता है।

मैंने कई भयावह कहानियां सुनी हैं कि कैसे कुछ महिलाएं एवं कुछ पुरुष  आक्रामक हो गए हैं। कोई छोटा सा पद प्राप्त कर, वह अचानक आक्रामक हो जाते हैं। जैसे कोई आयोजक की पत्नी है या किसी नेता की, तो वह सोचती है कि वह कुछ नहीं बल्कि एक प्रधानमंत्री या कुछ ऐसी चीज़ हो गई है या किसी का पति कुछ बन जाता है। यह आक्रामकता दूसरे मनुष्य की आक्रामकता बढ़ाती है। तब प्रतिक्रिया आरम्भ होती है, कोई कुछ कहता है, दूसरा कुछ कहता है। हम प्रतिक्रियावादी बन जाते हैं। हमारे अंदर क्या अपना कुछ नहीं है कि हम प्रतिक्रियावादी हो जाएँ?

किसी भी चीज़ के लिए कोई प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हमारे अंदर अपना भी कुछ है, हम क्यों किसी भी चीज़ पर प्रतिक्रिया करें? जो भी लोग हमारे साथ कर रहे हैं या हमारे साथ किया है, वह समाप्त हो चुका है। अपने हृदयों को खोलिए। इसीलिए जब आप भारत आए, मैं सोचती हूँ कि आपने ग़ौर किया होगा कि एक भारतीय हृदय में क्रोध जैसी कोई चीज़ नहीं है, अंग्रेज़ों के लिए या पुर्तगाल के लोगों के लिए या किसी के लिए भी जिन्होंने उन पर शासन किया है। उनके अंदर अत्यधिक प्रेम, स्नेह और आदर है, और वह देखते हैं कि आपने उनके लिए क्या अच्छा किया है। जैसे कुछ वकील भारत आए और वे कुछ उच्च न्यायालय में गए और वहाँ पर एक दिन की छुट्टी कर दी गई, उन अंग्रेज़ वकीलों के दौरे को मनाने के लिए। परंतु अगर आप इंग्लैंड जाएं तो वह आपको मारेंगे, आपको बाहर कर देंगे।

आक्रामकता को आपके हृदय से जाना होगा, इसको इससे (हृदय से) बाहर निकलना होगा । मेरे शरीर में आक्रामक लोगों के लिए कोई जगह नहीं है, बिल्कुल भी कोई जगह नहीं है। मैंने आप पर कभी प्रभुत्व नहीं जमाया और आपको कभी मुझ पर हावी नहीं होना है। अगर आप किसी सहजयोगी पर हावी होते हैं, तो आप मुझ पर हावी हो रहे हैं। पर जब बात दूसरों की आती है तो वह किसी और पर हावी नहीं होते। जिस प्रकार एक बुरा पति अपनी पत्नी पर हावी होता है पर अन्य लोगों पर नहीं। तो जो सहजयोगी नहीं है वह उन पर हावी नहीं होते। 

यह सहस्रार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है क्योंकि अहंकार सहस्रार के एक बड़े हिस्से का आच्छादन करता है, और यदि आपका सहस्त्रार इस अहंकार से ढका हुआ है तो मैं आपकी सहायता कैसे कर सकती हूँ और मैं अपनी सहायता कैसे कर सकती हूँ? अब आप में से बहुत लोग मेरे शरीर में हैं, तनिक कल्पना कीजिए, तेजी से संचारित हो रहे हैं, और लड़ रहे हैं मेरे हृदय में जगह पाने के लिए, पर वह मेरे अहंकार में बैठ रहे हैं। वैसे मैं अहंकार रहित हूँ। क्योंकि मेरे अंदर प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं। अगर आपके अंदर प्रतिक्रिया नहीं है, तो आपके अंदर अहंकार का विकास नहीं हो सकता। मेरे अंदर प्रतिक्रियाएं नहीं हैं। मैं प्रतिक्रिया रहित हूँ। मैं अपनी शांति और शोभा में प्रस्थापित रहकर, सहजयोग को क्रियान्वित करने का प्रयास कर रही हूँ। मैं किसी चीज़ पर प्रतिक्रिया नहीं करती, परंतु आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे कष्ट देती हैं क्योंकि आप मेरे अंदर हैं।

फिर डर का दूसरा  भाग, जो बचपन से आता है। मैं अमेरिकियों के बारे में नहीं जानती, पर बहुत से अमेरिकी, जो मेरे पास आए, आधे पागल, सनकी लोग थे, पूरी तरह से दिमाग़ से सनकी। उनमें कुछ भी साधारण नहीं था। या तो वह बात नहीं करेंगे और अगर वह बात करते हैं तो वह फ़ालतू बात करते हैं। आप जान ही नहीं पाएंगे कि वह किस बारे में बात कर रहे हैं। फ्रेंच लोगों के साथ भी यही है। फ्रेंच उससे पहले से ही पागल थे जब इस दुनिया में कोई पागल नहीं था, मुझे लगता है। बहुत सनकी लोग, आप देखिए, बहुत कठिन, बिल्कुल समझ नहीं सकते, सब कुछ उल्टा। जब आप हमारे भारतीय टेलीफ़ोन को दोष देते हैं, आपको पता होना चाहिए कि वह फ्रेंच द्वारा बनाए गए। मैं हमेशा कहती हूं कि पूना में हमारे पास टेलीफ़ोन केवल देखने के लिए हैं, क्योंकि उसे पुण्य पटनम कहते हैं, मतलब पुण्यों का शहर और केवल परमात्मा ही इस टेलीफ़ोन को सुन सकते हैं। परंतु यहां तक कि भगवान भी नहीं!

तो इस तरह का सनकीपन या जिसे आप पागलपन कहते हैं, आक्रामक पागलपन अहंकार से आता है और प्रति अहंकार तक जाता है। और वह सबसे पहले कहते हैं  “ग़लत क्या है? ” जब वह बात करते हैं आपको लगेगा कि वह लड़ रहे हैं, पर ये प्रेममय बातें हैं, ‘श्रृंगारिक’ वह कहते हैं और हमें लगता है कि वह लड़ रहे हैं। और कुछ समय बाद वह आक्रामकता बहुत स्पष्ट हो जाती है और फिर ऐसा हो जाता है जैसे वह बुद्धिहीन हो गए हों, पूर्णतः बुद्धिहीन। और यह अमेरिकियों के साथ बहुत आम है, बहुत आम। आप अमेरिकियों में नहीं ढूंढ सकते, जब वह बात कर रहे हों, कोई अच्छा वक्ता जिसके चेहरे पर कोई ऐंठन ना हो, उसके शरीर पर, हर जगह, क्योंकि बहुत सी नसें पहले से ही तनाव में हैं इस प्रकार के  “ग़लत क्या है ?” स्वभाव की वजह से। दूसरी ओर अति में जाना  कि आप अपने लिए सारे निर्णय स्वयं ही ले लेते हैं।

और इसके पीछे जो है एक भूत मुझे कहना चाहिए एक बहुत बड़ा भूत और जो ना तो भूतकाल में है ना ही भविष्य में परंतु वर्तमान में है और वह भूत मैं उसे भौतिकवाद कहती हूं भौतिकवाद यह एक भूत है कि भयानक राक्षस जो अमेरिकी के सिर पर आ गया है और उनसे हम सब लोगों में आ गया।

और यह भौतिकवाद एक भयानक चीज़ है। यह इतनी घटिया, लज्जाजनक है जो किसी भी व्यक्ति को शोभा नहीं देता। यहां तक कि एक कुत्ता भी इतने भौतिकवाद से घृणा करेगा, जिस स्तर तक मनुष्य आज पहुंच गया है। यह भौतिकवाद एक आदमी को पूर्णतः लज्जास्पद बना देता है। एक महिला दूसरी महिला से यह पूछते हुए संकोच नहीं करती, “वैसे, आपके पास क्या मेरी चम्मचें हैं?” इसमें कोई लज्जा नहीं आती। हमें बचपन में बताया जाता था, भारत में, मेरा मतलब है, यह हमारी संस्कृति है कि यदि किसी की सुई आपके घर में है तो आपको उसे संभाल कर रखना है और वापस करना है परंतु यदि आपका हीरा भी किसी से खो गया है, तो उसके बारे में कभी नहीं पूछें। यह अच्छी आदत नहीं है। हीरा अधिक मूल्यवान नहीं है, बल्कि आपके सम्बन्ध, दोस्ती और इंसानों की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। आप कैसे पूछ सकते हैं? अगर वहां हीरा होता तो वह उसे ढूंढ लेते और उसे दे देते आपको, पर यदि उसके बारे में ऐसी कोई बात नहीं हुई या उल्लेख नहीं हुआ  तो यह पक्का है कि वहां हीरा नहीं है। और यदि वहां है अभी तो कोई बात नहीं। आख़िरकार हीरा है क्या? आप पहन रहे हैं या वह पहन रहे हैं इससे क्या अन्तर पड़ता है?

मेरे पिता के घर में सारे दरवाज़े हर समय खुले रहते थे, सारे दरवाज़े, दिन रात । कभी कोई चोर नहीं आया। उन्होंने सोचा होगा कि दरवाज़े खुले हैं, कहीं ताला नहीं लगा है, तो कुछ क़ीमती नहीं होगा।  हमारे यहां,केवल एक चोरी हुई थी और चोर आया और वह हमारे यहां से ग्रामोफ़ोन ले गया और कुछ रिकॉर्डस। तो मेरे पिता जी ने कहा, ” वह पारखी है, उसने हमारे घर से सही वस्तु ली है, तो जाने दो। पुलिस को बताने से क्या लाभ? “

तो यह भौतिकवाद जो आ जाता है, एक पागल, पागल, पागल कुत्ते की तरह है, और आपको बीमारी दे जाता है, जो किसी भी और बीमारी से बदतर है। लोग किस प्रकार इससे खेलते हैं, इस बीमारी से। जैसा आप जानते हैं कि कभी आपको कोई छोटी-मोटी बीमारी हो जाती है, तो डॉक्टर आपके कुछ दांत  निकाल लेते हैं, आंखें निकाल लेते हैं, आपकी नाक निकाल लेते हैं, आपका बटुआ निकाल लेते हैं और आपका सब कुछ निकाल लेते हैं। एक छोटी सी चीज़ जैसे मलेरिया या ऐसी किसी बीमारी के लिए। परंतु ये बीमारी आपका वह सब कुछ ले जाती है जो भी आपके अंदर सुंदर है, अच्छा है।

जैसे कि उन्होंने फ़ैशन आरम्भ किया। इस भौतिकवाद के साथ वह फैशन आरम्भ करते हैं। महिलाएं इसकी चपेट में अधिक आती हैं। फ़ैशन प्रारम्भ होता है, किसी भी तरह का फ़ैशन प्रारम्भ होता है, जैसे आस्तीन लंबी होनी चाहिए। भारत में भी उन्होंने आरम्भ किया। फिर उसे छोटा कर देते हैं, फिर उसे आधा कर देते हैं, उसे बिना आस्तीन का कर देते हैं। मैंने कहा मैं इस दौड़ में नहीं भाग रही हूँ। मैं हमेशा आस्तीन वाला ही रखूंगी, एक जैसी आस्तीन, जिससे मुझे इसके बारे में परेशान होना ना पड़े। मैं अपने दर्ज़ी को बता सकती हूँ और वह जिस तरह से मैं चाहती हूँ वैसा बना सकता है, वह दर्ज़ी, क्योंकि वह जानता है कि मैं एक प्रकार का ही पहनती हूँ, बस। क्यों लोग फ़ैशन के पीछे भागते हैं, तनिक सोचिए। फ़ैशन के पीछे भागने की क्या आवश्यकता है? अब नई दौड़ आरम्भ हो गई है, उसमें भागें, फिर दूसरी दौर आरम्भ हो गई है, उसमें भागें, फिर तीसरी दौड़ आरम्भ हो गई है उसमें भागें।हर समय भागते रहें, इस फ़ैशन की पागल दौड़ों में।

अब फ़ैशन की एक नई दौड़ प्रारम्भ हो गई है कि सिर में तेल ना लगाएं, तो आप गंजे हो जाएंगे, फिर आप ‘विग’ ख़रीदेंगे, ये सब व्यवसायी हैं, जो यह क्रियान्वित कर रहे हैं, ये सब उद्योग हैं। तो आप बिल्कुल गंजे हो जाते हैं, फिर आप उनसे विग ख़रीदते हैं, फिर एक विशेष क़ीमत होती है उस विग को संवारने की, तो आप उन विग्स को संवारने के लिए जाते हैं। ऐसे ही पागलों की तरह यह चलता रहता है। 

उसके बाद एक और प्रकार है। अब लंदन में एक नया फ़ैशन आरम्भ हो गया है, क्योंकि आप देखिए ये लोग कुछ पैसे कमाना चाहते हैं। लोगों के पास इतना भी तर्क नहीं है और बुद्धि बची हुई नहीं है यह देखने के लिए कि आज वह जो सिखा रहे हैं, वे उसके बिल्कुल विपरीत हैं। पहले आपको ‘टेल कोट’ पहनना पड़ता था, आपको अपने बाल बिल्कुल अच्छे से बनाने होते थे उचित  तरीक़े से और वह सब, जैसा कि आप पुरानी तस्वीरों में देख सकते हैं। फिर शुरू हुए धारी वाले तीन पीस सूट। अब ऐसा है, मेरा मतलब है, कुछ दिन पहले तंग कपड़े पहनने का था, तो उन्होंने ‘वेरीकोज वेंस’ की बीमारी विकसित कर ली, आप देखिए। तो नहीं, नहीं- अब फ़ैशन है कि बिल्कुल ढीले कपड़े पहने जाएं। मैंने एक दिन देखा कि एक महिला एक बड़े कंबल से एक ड्रेस बना रही है, इस तरह से। मैंने सोचा वह कोई पुजारी है या कोई और। तो यह मूर्खता शुरू हो गई है।

कल्पना कीजिए, सहस्त्रार का सोचिए, परमात्मा का सोचिए, हम किस संसार में हैं और किस संसार में यह मूर्ख लोग जी रहे हैं। वह बिल्कुल अलग संसार है, बिल्कुल अलग मूर्ख दुनिया जहां लोग केवल निरर्थक चीज़ों के पीछे भाग रहे हैं। इस चीज़ से उस चीज़ की ओर जा रहे हैं, सभी चीज़ों को बदल रहे हैं, टाई बदल गई हैं, सब कुछ बदल गया है। आपको इतना सिर दर्द दे रहे हैं। हर समय आपको सोचना पड़ता है कि अब क्या फ़ैशन चल रहा है, चलो समाचार पत्र में देखा जाए। इस समय यह फ़ैशन है, ठीक है, यह कपड़े पहने जाएं। यह सब मूर्ख बनाना चल रहा है, क्योंकि यह भूत हमारे अंदर प्रवेश कर चुका है। 

सहजयोग में भी जब हम प्रवेश करते हैं, सावधान रहें, भौतिकवाद आपके मन के अंदर नहीं घुसना चाहिए, यह तनिक भी महत्वपूर्ण नहीं है। यहां तक कि, जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो आपको कुछ काला या सफ़ेद पहनना होता है, या मुझे पता नहीं क्या और, पर काला या सफ़ेद। एक व्यक्ति की मृत्यु हुई इंग्लैंड में, जो मेरे पति के बहुत अच्छे दोस्त थे और मेरे पास काली साड़ी नहीं थी, बिल्कुल काली। मेरा मतलब है, हमारे पास उस तरह की साड़ी नहीं होती, मुझे पता नहीं था कि मैं क्या करूं। मैंने अपने पति से कहा कि मेरे पास काली साड़ी नहीं है। उन्होंने कहा, “फिर, तुम मत आओ।” कल्पना कीजिए कि उनकी पत्नी को कैसा लगेगा अगर मैं वहां नहीं जाऊंगी। उन्हें कैसा लगेगा, यह सब कुछ नहीं। महत्वपूर्ण है तो बस काली साड़ी। 

जीवन के हर पड़ाव में आप भौतिकवाद द्वारा मूर्ख बनाए जा रहे हैं। इसमें कैसे फँस गए, सबसे पहले तो। और दूसरा पहलू यह है कि वही लोग आपको मूर्ख बना रहे हैं। “ठीक है, यह अच्छा नहीं है, यह बहुत अधिक है” – तो आप संस्कृति विरोधी हो जाते हैं। संस्कृति विरोधी होना क्या है, यह एक दूसरे प्रकार का भौतिकवाद है, दूसरे प्रकार की बेतुकी चीज़।

आजकल लंदन में एक संस्कृति विरोधी आंदोलन चल रहा है, जिसको ‘पंक्स’ (punks) कहते हैं। मुझे लगता है कि अब वह पुराना हो चुका है, पर फिर भी। उनके कभी-कभी चालीस पौण्ड्स लग जाते थे, उस तरह के बाल बनाने के लिए। मेरा मतलब है, क्या यह कुछ ऐसी चीज़ है जिसके लिए आप पैसा बचा रहे हैं। तो यह सारी चीज़ इसी प्रकार से कार्यान्वित होती है, केवल आपके चित्त को वास्तविकता से हटाने के लिए, ऊंचे नैतिक मूल्यों से हटाने के लिए, किसी निरर्थक चीज़ में लगाने के लिए। 

सहज योग में भी लोगों को सीखना चाहिए कि सामूहिकता में कैसे रहा जाए। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम सामूहिकता में रहें। हमें ऐसे बात नहीं करनी चाहिए, “यह मेरा है, यह मेरा है और यह मेरा है।” यहां तक कि बच्चों के लिए भी आपको ऐसे नहीं करना है, “यह मेरा बच्चा है, यह मेरा बच्चा है, यह मेरा भाई है, यह मेरी बहन है।” यह मेरा-मेरा, इसको दूर भगाना है। पर यह असंभव है, इसके बारे में भूल जाना आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए बायीं नाभि और दायीं नाभि ठीक होनी चाहिए। इसका एकमात्र तरीका यह है, “मां, यह सब आपका है।” यह कहना ख़तरनाक नहीं है क्योंकि मैं कभी भी आपसे कोई चीज़ नहीं लूंगी, जो आपकी है। केवल यह कहना है, “मां यह आपका है।” इसकी शुरुआत ऐसे कर सकते हैं, “यह सब आपका है, मैं आपका हूं, मेरा हृदय आपका है, मेरी सारी वस्तुएं आपकी है, मेरा जीवन आपका है।” केवल यह कहना ही सहस्त्रार के लिए एक बड़ा मंत्र है।

सहस्त्रार की देवी एक बहुत सीधी- साधी मनुष्य हैं, अत्यंत सरल और वे छोटे- छोटे कार्यों से भावुक हो जाती हैं, उनको बहुत छोटे- छोटे कार्यों से प्रसन्न किया जा सकता है। कुछ  नहीं चाहिए सहस्रार की देवी को प्रसन्न करने के लिए। वह बहुत ही सरल हैं।छोटी-छोटी बातें उन्हें प्रसन्न करती हैं। कल आप लोग फूल लाए थे और मैंने उन्हें नहीं लिया। आप सब ने सोचा होगा, “यह क्या है, माँ को फूल नहीं दे पाए, अपने हाथ ही में लिए रहे।” परंतु मैं आपको यह चमत्कार दिखाना चाहती थी इसीलिए मैंने नहीं लिए। और मैंने अन्त में वह लिए और देखिए अब वह सब में श्रेष्ठ हैं। वह ऐसे नहीं दिखते कि उन्हें अभी पेड़ से तोड़ा गया हो? मैं आपको यही दिखाना चाहती थी, तो मैंने कहा, “मैं थक गई हूं।” मैं बैठ गई और फिर मैंने आपको उन फूलों के साथ देखा, आप देखिए हाथों में लिए, आप सब बैठे थे। तो वह लीला विनोदिनी हैं, वे खेल खेलती हैं, छोटी-छोटी शरारत इधर-उधर करती हैं, जिससे आप सबक़ सीखें। क्योंकि अगर मैं आपसे कहूं, “यह कीजिए”, तो यह संभव नहीं है। पर थोड़े घुमावदार तरीक़े से मैं आपको दिखा सकती हूँ कि यह ग़लत है, यह आपको नहीं करना चाहिए। 

इसमें बुरा लगने की कोई बात नहीं है, मैं सारे फूल ले सकती थी पर किसी को यह लगा होगा, “क्यों माँ ने आज फूल नहीं लिए?” मुझे नहीं पता कि आपने यह सोचा या नहीं पर मुझे यह पता है कि मुझे यह चमत्कार दिखाने के लिए ऐसा करना था, कि ये फूल शेष फूलों से अधिक देर तक रहेंगे क्योंकि ये ब्रह्मचैतन्य द्वारा चैतन्यित किए गए हैं। और पानी बहुत बहुत ठंडा था इसलिए यहां तक कि मैंने भी गर्म पानी का नल खोला। यह ठीक है, कोई बात नहीं, वह मुरझाए नहीं, इसके उपरान्त भी वह बिल्कुल ठीक हैं।

तो आपने इस ब्रह्मचैतन्य के कई सारे चमत्कार देखे हैं, जो आपकी तस्वीरों में दिख रहा है, आपके जीवन में दिख रहा है, आपके अंदर जो इतने सारे बदलाव हुए हैं उनमें दिख रहा है, आपके परिवार में, आप सब में दिख रहा है। यह सब हुआ क्योंकि आप ब्रह्मचैतन्य में हैं। आप ये सब प्राप्त कर रहे हैं क्योंकि आप ब्रह्मचैतन्य के द्वारा आशीर्वादित किए गए हैं। पर दूसरे नहीं, तो आपका उनके प्रति व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि वह एक दूसरी ही दुनिया में हैं, क्या करें, कैसे उनकी मदद करें। हमें उनकी मदद करने का प्रयास करना चाहिए, अगर संभव है, पर एक सीमा तक। हमें अपने आप को नीचे नहीं गिराना है दूसरों के लिए। एक सीमा तक ही हम उनकी सहायता कर सकते हैं और हमें बहुत प्रसन्न होना चाहिए कि सहज योग इतने ज़ोर से चारों ओर फैल रहा है।

पर गहराई प्राप्त करने के लिए हमें पता होना चाहिए कि हमारी गुणवत्ता को बढ़ाना होगा। अगर कुछ लोग ऊपर उठ जाएं तो दूसरे भी उनके साथ ऊपर उठना शुरू कर देंगे। पूर्णतः इमानदारी होनी चाहिए, पूर्णतः समझदारी होनी चाहिए। एक दूसरे के प्रति अपने हृदयों को खोलिए, जिससे आप अपने हृदय मेरे लिए खोल सकें। प्रत्येक कोशिका को दूसरी कोशिका को जानना चाहिए, नहीं तो यह कार्यान्वित नहीं होगा। यह एक महान चीज़ है जो घटित हुई है, जब आप इस पृथ्वी पर हैं, जब आप वह हैं जिन्हें यह महान आशीर्वाद प्राप्त होना है। कितने ही संतों को यह प्राप्त नहीं हुआ। कितने महान लोग, जो इस पृथ्वी पर आए, उन्हें यह प्राप्त नहीं हुआ। यहां तक कि अवतरण, जो इस पृथ्वी पर आए, ऐसा नहीं कर सके जो आप कर रहे हैं। तो आपके अंदर अपने स्वयं के अस्तित्व, स्वयं के मापदंड और स्वयं की योग्यता का  संतोष और शोभा होनी चाहिए। दूसरों के पास आपके जितनी योग्यता नहीं है, ठीक है, उसके बारे में भूल जाएं। यह बात आपको अहंकार नहीं देनी चाहिए, पर आपको एक व्यक्तित्व मिलना चाहिए, जो प्रतिक्रिया नहीं करता। हमारे पास अपना भी कुछ है, हम चीज़ों पर प्रतिक्रिया नहीं करते। हम प्रतिक्रियावादी नहीं हैं और वह चीज़ें जो हानिकारक हैं, वह विलुप्त हो जाएँगी। सब कुछ बिल्कुल ठीक हो जाएगा क्योंकि हम अपनी पूर्णता में खड़े हुए हैं, अपनी शोभा में। हमें क्या चाहिए? कुछ नहीं, बस अपने आप का आनंद ले रहे हैं।

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें।