Arrival and Kundalini Puja

(भारत)

Kundalini Puja talk

Date: 1990/02/05

आप सब लोगों को मिल करके बड़ा आनन्द आया।  और मुझे इसकी कल्पना भी नहीं थी कि इतने सहजयोगी हैद्राबाद में हो गये हैं।  एक विशेषता हैद्राबाद की है  कि यहाँ सब तरह के लोग आपस में मिल गये हैं।  जैसे कि हमारे नागपूर में भी मैंने देखा है कि हिन्दुस्थान के  सब ओर के  लोग नागपूर में बसे हुए हैं।  और इसलिये वहाँ पर लोगों में जो संस्कार हैं,  उसमें बड़ा खुलापन है और एक दूसरे की ओर देखने की दृष्टि भी बहुत खुली हुई है ।

अब हम लोगों को जब सहजयोग की ओर नये तरीके से मुड़ना है तो बहुत सी बातें ऐसी जान लेनी चाहिये  कि सहजयोग ही सत्य स्वरूप है, और हम लोग सत्यनिष्ठ हैं।  जो कुछ असत्य है,  उसे हमें छोड़ना है।  कभी-कभी असत्य का छोड़ना बड़ा कठिन हो जाता है क्योंकि बहुत दिन तक हम किसी असत्य के साथ जुटे रहते हैं।   फिर कठिन हो जाता है कि उस असत्य को हम कैसे छोड़ें।  लेकिन जब असत्य हम से चिपका रहेगा  तो हमें शुद्धता नहीं आ सकती।  क्योंकि असत्यता एक भ्रामकता है और उस भ्रम से निकलने के लिए हमें एक निश्चय कर लेना चाहिए कि जो भी सत्य होगा उसे हम स्वीकार्य करेंगे और जो असत्य होगा उसे हम छोड़ देंगे।  इसके निश्चय से ही आपको आश्चर्य होगा कि कुण्डलिनी स्वयं आपके अन्दर जो कि जागृत हो गयी है,  इस कार्य को करेगी।  और आपके सामने वो स्तिथि ला खड़ी करेगी कि आप जान जाएंगे कि सत्य क्या है और असत्य क्या है।  यही नहीं और आपके अन्दर वो शक्ति आ जाएगी  कि  जिससे आप सिर्फ सत्य को ही प्राप्त करना चाहेंगे।  और जितना भी असत्य आपको दिखायी देता है, उसे छोड़ देंगे।

 अब बहुत सी बातें जो सहजयोग में बतायी जाती हैं,  वो बहुत सोच-समझ कर के और आप लोगों के संस्कारों का विचार करके, कि जिससे आप किसी तरह से दु:खी न हों, समझायी जा सकती हैं।  लेकिन उस समझाये जाने में भी हो सकता है, कि आप सोचें कि ये बात ठीक नहीं है, वो बात ठीक नहीं है।  बहुत से शास्त्रों में जो बातें लिखी गयी हैं,  वो अधिकतर सत्य हैं।  पर कहींकहीं ऐसा देखा जाता है कि बीचबीच में बहुत सी गलत धारणायें भी भर दी गयी हैं।  और इन गलत धारणाओं की वजह से हम उसी को सत्य मान के चल रहे हैं ।

जैसे कि ज्ञानेश्वरी में ऐसा लिखा गया है  कि जब कुण्डलिनी का जागरण होता है तो आप हवा में उड़ने लग जाते हैं।   और आप पानी पे चलने लग जाते हैं और आप को बहुत सात समंदर के दूर की बातें दिखायी देती हैं।  अब ये अशक्य है, क्योंकि ज्ञानेश्वर जी एक संत थे,  महान संत थे।   हम लोगों को उस पर सोचना चाहिये कि संत लोग, जनहिताय जनसुखाय संसार में आ गये।   वो इस तरह की बातें मनुष्य को सिखा कर कौनसा सुख देने वाले हैं, उससे कौनसा आराम होने वाला है कि आप हवा में उड़ने लग जाएं तो क्या विशेष हो जायेगा।   या अगर आप पानी पे चलने लग जाएं तो क्या विशेष हो जायेगा।   लेकिन जिस चीज़ से हमको असल में लाभ होता है,  वो है हमारे अन्दर का परिवर्तन, और हमारा परमात्मा से संबंध होना।  पर उसी ज्ञानेश्वरी में लिखा गया है  कि पसायदान याने ये  कि वो कहते हैं कि अब विश्व के जो आत्मा हैं, विश्वात्मक जो हैं, उन्होंने खुश होना चाहिए।  क्योंकि मैंने वाणी का यज्ञ किया है और अब आप ऐसा पसायदान दें, ऐसा चैतन्य दें, जिससे सारे संसार में परिवर्तन आ जाये। और सारी बात परिवर्तन की लंबी–चौड़ी लिखी हुयी है।  तो ये समझ लेना चाहिए कि जो पहली बात थी, वो किसी ने उसमें भर दी है।  क्योंकि ऐसी बात ज्ञानेश्वर जी कभी लिख ही नहीं सकते, कि आप हवा में उड़ेंगे या आप पानी पे चलेंगे। इससे क्या लोगों का फायदा होने वाला है ।  वैसे ही हम लोग हवा में उड़ रहे हैं।  वैसे ही हम लोग जहाजों में चल रहे हैं। और वैसे ही दूरदर्शन से हम देखते हैं।  इसमें कुण्डलिनी की क्या जरूरत है । सो कुण्डलिनी से जो कार्य होना है, उसको समझना चाहिए और जिस तरह से भी हर एक ग्रंथ को हम पढ़ते हैं,  तो इसमें ये सोचना चाहिए कि इसका विचार जो है, वो सत्य को पकड़ के है या नहीं।  इसी प्रकार हमें गीता में भी  हर धर्मशास्त्रों में गलत चीज़ें लिख दी हैं।  जैसे कि  गीता में लिखा हुआ है कि आपका जन्म जिस जाति में होता है वही आपकी जाति हो जाती है, कभी हो ही नहीं सकता। क्योंकि जिसने गीता लिखी वो कौन थे, व्यास।  और व्यास किस के लड़के थे आप जानते हैं, कि एक घीवरनी के, एक मछिहारनी के लड़के थे,  जिनकी शादी भी नहीं हुई थी। ऐसे के जो बेटे थे, वो थे व्यास।  वो ऐसा कैसे लिखेंगे  कि आपकी जो जन्मसिद्ध जाति होगी, वही जाति हो जाएगी। लेकिन कहा गया है  कि या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता,  माने सब के अन्दर बसी हुई उसकी जाति है, जाति है।

जाति का मतलब होता है, जो हमारे अन्दर जन्मजात,  हमारे अन्दर जो एक तरह का रुझान है,  ऑप्टिट्यूड ( aptitude) है।  हमारे रुझान कहाँ हैं,  हम किस ओर उलझे हुए हैं। बहुत से लोग हैं जो कि पैसे को खोजते रहते हैं। बहुत से लोग हैं जो कि बड़ी सत्ता को खोजते रहते हैं। लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो कि परमात्मा को खोजते हैं।  जिसकी जो जाति, माने जिसका जो रुझान है, जिसकी जो ऑप्टिट्यूड है, वो उसके अन्दर एक बसी हुई ऑप्टिट्यूड है। इसका मतलब ये है कि सहजयोग में वही लोग आयेंगे जो परमात्मा को खोजते हैं, जो ब्रह्म को सोचते हैं और जो इस ओर ध्यान देते हैं कि हमें परम को प्राप्त करना है, और दुनियाई चीज़ों में क्या रखा है। पहले ऐसे ही लोग आयेंगे। प्रथम में ऐसे ही लोग आयेंगे जो कि वास्तविक में सोचते हैं कि किसी तरह से परमात्मा को प्राप्त कर लें, या इस परमात्मा चीज़ को जान लें, या इस आत्मा में हम लोग समा जाएं।  इस तरह से जो लोग सोचते हैं किसी भी वजह से, किसी भी पुस्तक को पढ़ने से, या किसी संत-साधुओं के साथ रहने से, किसी गुरुजनों के साथ रहने से, जो लोग इस तरह का सोचते हैं वो पहले सहजयोग में आते हैं।  इसलिये आप देखियेगा कि सहजयोग की प्रगति धीरे होती है और सब चीज़ों की प्लास्टिक प्रगति है।  हजारों आदमी आप पा लेंगे जो कि किसी गुरु के पीछे में दौड़ेंगे।  लेकिन फिर वो छोड़ देते हैं, उनको कोई लाभ नहीं होता। उनको पैसा – वैसा देते हैं, और किसी तरह से ठीक हो जाते हैं।  लेकिन हमको ये सोचना चाहिए कि जो सच्चाई होती है और जो जीवंत चीज़ होती है वो धीरे -धीरे पनपती है।  एकदम ज्यादा नहीं पनप सकती।  आपको अगर एक वृक्ष में फूल आने हैं, तो पहले एक-दो ही फूल आते हैंफिर चार-पाँच फूल आते हैं, फिर धीरे-धीरे उसमें अनेक फूल आ जाते हैं।  तो मनुष्य को ये जब सहजयोग की ओर रुझान हो जाता है, और वो सहजयोग में आ जाता है, तो उसको कभी-कभी बड़ा दु:ख होता है।  और उसे लगता है कि आखिर इतने धीरे-धीरे सहजयोग क्यों बढ़ता है।  सहजयोग की प्रगति इतने धीरे– धीरे क्यों है,  लेकिन उसकी वजह अब आप समझ गये कि हैं ये जीवंत चीज़ है।  और इसमें किसी पे जबरदस्ती हम नहीं कर सकते।  हम किसी को कहें कि आप पार हो गये, तो नहीं हो सकते, ये होना पड़ता है।  जब तक ये होना नहीं होगा, जब तक ये बात घटित नहीं होगी,  तब तक हम नहीं कह सकते कि ये हो गया।

जैसे कि एक हमारे साथ एक देवी जी थी,  वो गयी अमेरिका। उनका लड़का आया होनोलुलु सेतो मुझे कहने लगे कि माँ इनको आप पार कराओ। मैंने कहा, ये होते नहीं मैं क्या करूँ, तुम करा दो पार।  कहने लगी, कि जब आप से नहीं होते तो मैं कैसे करूँ। मैंने कहा, कि क्या उसको झूठा सर्टिफिकेट दे दें कि तू पार हो गया,  कहने लगी उससे क्‍या फायदा होने वाला है। मैंने कहा यही बात है, इसलिये ये घटित होना पड़ता है और ये सत्यस्वरूप प्राप्त होना चाहिए। अगर ये नहीं हुआ और कोई झूठमूठ में ही कहने लगे कि नहीं मुझे पार हो गया कहो, तो हो गया। और हर एक आदमी ही पार होगा, ऐसा भी नहीं कह सकते, बहुत से लोग नहीं होते हैं। अनेक कारणों की वजह से नहीं हो सकते।  किसी को कभी ये लगता है कि ऐसे कैसे हो सकता है। ज्यादातर लोगों में तो ये विचार आता है कि जब कभी हुआ नहीं, इसके लिये इतनी तपस्या करनी पड़ती थी,   हिमालय जाना पड़ता था, ये करना पड़ता था, तो अब हमें कैसे होगा। असल में अगर किसी से कहा जाये कि यहाँ एक हीरा रखा है और आपको मुफ़्त में मिल जायेगा, तो सब दौड़ आयेंगे, उसको नहीं छोड़ेंगे।  लेकिन जब ये कहा जाये कि सहज में ही, सस्ते में ही, बगैर कुछ पैसे दिये हुए आपकी कुण्डलिनी जागृत हो जाएगी, तो लोग विश्वास नहीं करते।  क्योंकि अपने पर विश्वास नहीं है, आत्मविश्वास नहीं है।   और वो समझ नहीं सकते हैं कि ये समा कौन सा है, ये कौन सा विशेष समा है जिसमें ये चीज घटित हो सकती है।  तो हमारे लिये क्या सोचना चाहिए कि हम लोग जो हैं, आज एक विशेष स्थिति में हैं। हम लोगों ने कुण्डलिनी का अभ्यास नहीं किया हो, उसके बारे में पढ़ा न हो, लिखा न हो, और हमारी जागृति हो गयी। और जब जागृति हो गयी है, और हमें आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो गया है।  तो ये सोच लेना चाहिए कि अब सब कार्य जो है, वो हम नहीं करने वाले हैं। ये चारों तरफ फैला हुआ जो परम चैतन्य है, जिस परम चैतन्य ने सारी सृष्टि की रचना की है।   आज उसी परम चैतन्य से हम एकाकारिता प्राप्त कर चुके हैं, और उस परम चैतन्य का ही ये कार्य है,  कि वो हमारे सारे कार्य करेंगे। सो हम कुछ भी नहीं कर रहे हैं, हम तो अकर्म में ही खड़े हैं।

जैसे कि आज इसका (मायक्रोफोन) कनेक्शन है, आपका मेन से लग गया, तो मैं इसमें बोल रही हूँ तो सुनाई दे रहा है, इसका उपयोग हो रहा है। उसी प्रकार जब हमारा संबंध उस चारों तरफ फैली हुई परमात्मा के प्रेम की सृष्टि परम चैतन्य से हो जाता है।  उस वक्त हमें कोई भी फिक्र करने की, या कोई भी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है, सारी चिंता वही करते हैं।  उस पर भी ये मनुष्य जब शुरू–शुरू में सहजयोग में आता है, तो वो सोचता है कि चलो ये भी कर के देख लें, चलो वो भी कर के देख लें।  बहुत तर्क-वितर्क करता है।  और सोचता है कि चलो इससे काम बन जायेगा,  ऐसे करना चाहिये और उसी चिंता में रहता है।  लेकिन धीरे-धीरे वो समझ लेता है कि मेरा करने से कुछ नहीं होता है।  क्योंकि अगर आप ऐसा सोचें कि मैं कर के देख लेता हूँ,  तो परमात्मा कहते हैं कि अच्छा कर लो, तुमको जो कुछ करना है करो।  उसको कहते हैं अल्प धारिष्ट। अल्प धारिष्ट जो उसको वो देखता है कि आप एक अल्प धारिष्ट हैं, चलो इसको कर लें।  पर उसके बाद जब धीरे-धीरे आप में एक पूर्ण विश्वास आ जाता है, कि परम चैतन्य सब कार्य कर रहे हैं,  तब अपने आप परम चैतन्य स्वयं सारे कार्य को करके दिखा देते हैं, और सब कार्य बनते जाते हैं।  उसको स्वीकार्य करना चाहिये। किसी भी चीज़ को ऐसा नहीं कहना चाहिये कि ऐसा क्यों हो गया।

अब जैसे बताएं कि कभी अगर हमारा रास्ता भूल गया और हम रास्ते से किसी और रास्ते से जा रहे हैं।   तो यही सोचतें हैं कि इस रास्ते से जाना जरूरी था इसलिये रास्ता भूल गया, और इसलिये हम इस रास्ते पर आ गये।  फिर कोई सोचता है कि इस तरह से क्यों हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिये।  कभी-कभी बहुत सारी बातें हमारे समझ में नहीं आती हैं। बहुत दिनों बाद समझ में आ जाती है, कि ये होना जरूरी था और इसलिये ये चीज घटित हो गयी।  तब हम लोग एक तरह से उसमें शांति कर लेते हैं, इत्मीनान कर लेते हैं और यही जान लेते हैं कि जो कुछ भी होना था, वो कितने बढ़िया तरीके से हुआ।

तो कोई चीज़ हमारे मन के विरोध में हो जाये, तो ये नहीं सोचना चाहिये कि परमात्मा ने हमारी मदद नहीं की।  परमात्मा ने तो मदद की है, कि आपके जो मन की जो इच्छा थी वो ठीक नहीं थी।  इसलिये जो सही बात होनी चाहिये, वो परमात्मा ने आपके लिये कर दी। क्योंकि परमात्मा से ज़्यादा तो हम सोच नहीं सकते। इस परम चैतन्य के कार्य से हम ज़्यादा कार्य तो कर नहीं सकते। इसलिये उसने जो कार्य किये हैं और उसने जो व्यवस्था की हुई है, और वो जो हमारे लिये कर रहे हैं, और जो कुछ हो रहा है, वो सब चीज़ अत्यंत सुंदर है। और किसी भी परिश्रम के बगैर,  सहज में ही घटित हो जाती है।

बड़े ही मुझे आनन्द की बात है, कि हैद्राबाद में आप लोग इतने सहजयोगी हो गये हैं। अब सहजयोग में इसके दो अंग हैं,  मेरा ऐसा कहना है कि इन दोनों अंगों को सम्भालना चाहिए। एक तो अंग ऐसा है  कि जिसमें ध्यान-धारणा आदि करनी चाहिये।  घर में अपने व्यक्तिगत रूप से भी हमें ध्यान धारणा जरूर करनी चाहिये।  और हमारे अन्दर के दोषों को निकाल देना है। ध्यान-धारणा की जो हम लोगों की प्रणाली है  बहुत ही सरल सहज है। एक सवेरे दस मिनट, शाम को १०-१५ मिनट बैठने से भी ध्यान-धारणा हो जाती है। पर पहले अपने अन्दर कौन सा दोष है  उसे देख लेना चाहिये।  बहुत बार लोग ये नहीं समझते कि समझ लीजिये कि कोई राइट साइडेड है, कोई लेफ्ट साइडेड है, तो वो उल्टे इलाज करने शुरू हो जाते हैं।  इसलिये पहले जान लेना चाहिये कि हमारी कौनसी दशा है,  हमारा कौनसा चक्र पकड़ रहा है,  हम कहाँ हैंये सब आप लोग जान सकते हैं।  आप जब फोटो की ओर ध्यान करेंगे, तो आप जान लेंगे कि आपके इस चक्र में दोष है  कि उस चक्र में दोष है।  उसको पूरी तरह से समझ करके,  पूर्ण उसके ज्ञान के साथ मेंउसको आपको सुलझा लेना चाहिये।  उसको सुलझाने के बाद में ये व्यक्तिगत हो गया।  फिर आपको सामूहिकता में उतरना चाहिये। और सामूहिकता में उतरते वक्त आपको जान लेना चाहिये कि अपना हमें दिल खोल लेना चाहिये।  जिस आदमी का दिल खुला नहीं है  वो सामूहिकता में उतर नहीं सकता।  बहुत से लोग संकुचित प्रवृत्ती के हो गये हैं। कारण उन्होंने वो जाना नहीं कि दुनिया कितनी अच्छी है और कितनी हम उसे अच्छी बना सकते हैं।  जिसने अच्छी व्यवस्था देखी ही नहीं जिसने अच्छा सुन्दर सा संसार देखा ही नहीं,   उनको विश्वास ही नहीं होता कि ऐसा संसार हो भी सकता है।  इसलिये वो अपने संकुचित हृदय से रहते हैं और दूसरी बात उसमें ऐसी होती है कि जब हम औरों की ओर नज़र करते हैं तो पहले हमें उनके दोष दिखायी देते हैं। जब हम दूसरों के दोष देखने लगते हैं, तो हमारे अन्दर ज़्यादा दोष आ जाते हैं। लेकिन हम उनके गुण देखें,  उनकी अच्छाई देखें और उनकी सुन्दरता को देखें, तो हमारे अन्दर भी वो सुन्दरता आ जायेगी और उस आदमी के जो दोष होते हैं, वो भी लुप्त हो जायेंगे। जब दूसरा कोई है ही नहींजब वो हमारे ही शरीर का एक अंग मात्र है, तो फिर उसमें दोष देखने से क्या फायदा, दोष को हटाना ही चाहिये। और दोष को हटाने का सबसे अच्छा तरीका है, कि उसको किसी तरह से सुलझा कर प्रेम भाव से ही उसको हटाया जाता है। क्योंकि अपना सारा कार्य जो हैवो प्रेम की शक्ति का है, और प्रेम ही सत्य है और सत्य ही प्रेम है। जो प्रेम की शक्ति को इस्तेमाल करेगा,  वो बहुत ऊँचा उठ जा जाता है। हृदय को खोल कर के,  प्रेम से, आपको दूसरों की ओर देखना है।  इस तरह से एक तो ये आपका अंग है जिसमें आप अपने व्यक्तिगत व्यष्टि में प्रगति करते हैं,  और एक आप समष्टि में प्रगति करते हैं जो दूसरों के साथ मेलजोल प्यार हो जाये। 

जिसका मेलजोल दूसरों के साथ नहीं बैठता है  तो उसको सोच लेना चाहिये कि वो सहज नहीं है। जिसका जो प्रश्न खड़े कर देता है,  जिससे लोगों को तकलीफ़ हो जाये,  जिससे आपस में प्रेम न बढ़े,  बैर बढ़ जाये,  आपस में झगड़ा हो जाये,  ऐसा आदमी सहज नहीं है।  और ऐसे आदमी से बचके रहना चाहिये।  क्योंकि ऐसा आदमी, एक भी अगर आम खराब हो जाये तो सारे आम वो खराब कर सकता है।   तो वो आदमी इधर से उधर लगाएगा इधर से उधर बात करेगा, इसके खिलाफ़ बोलेगा, उसके खिलाफ़ बोलेगा।  इसलिये किसी भी सहजयोगी की निंदा सुनना हमारे सहज में एक पाप सा है।  क्योंकि उसको सुनने से हमारे कान खराब हो जाते हैं।  और उससे हम उस आदमी के प्रति एक तरह से गलत तरीके से कहना चाहिये  कि उसके प्रति हमारा जो विचार होता है वो ठीक नहीं रहता है।

आपको जब दूसरों से व्यवहार करना है तो देखना चाहिये कि हमारे अन्दर कितना औदार्य है। हम कितनी क्षमा कर सकते हैं,  हम कितने प्यार से उससे बोल सकते हैं।  उनको हम कितने नज़दीक ले सकते हैं।  क्योंकि ये सब हमारे असली रिश्तेदार हैं।  बाकी की रिश्तेदारी आप तो जानते ही हैं कि कैसे होती है।  लेकिन जो असली रिश्तेदारी है वो सहजयोग की है,  और जब आपको पता होना चाहिये कि चालीस देशों में आपके भाई-बहन बैठे हुये हैं।  और जब कभी आप उनसे सब मिलेंगे तो आपकी तबियत खुश हो जायेगी।

दूसरी जो स्थिति है,  उसमें है सहजयोग का प्यार होना और सहजयोग का प्रचार।  ये भी अत्यावश्यक है विशेषत: औरतों के लिये,  स्त्रियों के लिये, क्योंकि स्त्री जो है, वह शक्तिस्वरूपिणी है।  उसको समझ लेना चाहिये कि कौनसा चक्र पकड़ता है, तो कौनसी उँगली पकड़ती है, कौन से पैर में उँगली पकड़ती है।   उसको कैसे निवारण करना चाहिये,  उसके क्या दोष हैं,  उसेसे क्या बिमारियाँ हो सकती हैं।    किस तरह से हम लोगों को ठीक कर सकते हैं।   कौन से दोषों से हम जान सकते हैं कि कौन से चक्र पकड़े हुए हैं।   उसका निवारण कैसे करना चाहिये,  आदि जो कुछ भी ज्ञान है, कुण्डलिनी के बारे में ज्ञान क्या है, आदि।   सब बैठ करके, मनन करके, सोच करके, और आपको जान लेना चाहिये।  लेकिन अधिकतर लोग सहजयोग में आने के बाद उसके ज्ञान की ओर ध्यान नहीं देते।  उनको ज्ञान नहीं रहता है और सहजयोग करते रहते हैं।  तो उसका ज्ञान होना अत्यावश्यक है। क्योंकि ऐसे तो दुनिया में बहुत से लोग आये,  जो कि हम देखते हैं कि पार हैं।  बच्चे हैं बहुत सारे, वो भी ऐसे पैदा होते हैं जो कि सहजी हैं।  लेकिन उनको सहज का ज्ञान नहीं है।   तो माँ लोगों को चाहिये कि वो जानें सहज क्या चीज है।  उससे वो अपने बच्चों को भी समझ जायेंगे और ये भी समझ जायेंगे कि कोई बच्चा जो कि सहज में पैदा हुआ है।   वो क्यों ऐसा करता है, उसकी क्या बात है।  वो समझने के लिये इसका ज्ञान होना बहुत अत्यावश्यक है।  जिन लोगों को इसका ज्ञान नहीं होता है वो लोग समझ नहीं पाते कि क्या बात कर रहे हैंये क्या कर रहे हैं, औरों पे इसका असर नहीं आता है।  इसका इसलिये बुद्धि से ज्ञान होना बहुत जरूरी है।

और जो चौथी चीज़ जो बहुत जरूरी है, सहजयोग का प्रचार।  अगर आप एक कमरे में बेठे हैं और एक दरवाज़ा खुला है,  यहाँ से अब आपको हवा मिल रही है लेकिन अगर दूसरा दरवाज़ा आपने खोला नहीं,  तो हवा का सर्क्युलेशन रुक जायेगा।  हवा का जो प्रवाह है, वो रुक जायेगा। इसी तरह से हम लोग जब दूसरों को सहजयोग से प्लावित करते हैं, उनकी मदद करते हैं, उनको रियलाइज़ैशन (realization) देते हैं, उसका प्रचार करते हैं।  उसके बारे में बोलते हैं  अपने रिश्तेदारों को बताते हैं उनको घर पे बुला-बुला कर, चाय पिला-पिला करके, ये सहजयोग देते हैं। तब  जब तक आप प्रचार नहीं करेंगे,  तब तक आपकी प्रगति नहीं हो सकती।  क्योंकि आप जानते हैं कि जब पेड़ बढ़ता है, उसकी शाखायें बढ़नी चाहिये और उन शाखाओं के नीचे,  उसकी छाया में अनेक लोगों को बैठना चाहिये।  नहीं तो ऐसे अनेक पेड़ हैं, पर हम लोग तो वट वृक्ष के जैसे हैं,  और इसलिये हमें चाहिये कि हम इसके प्रचार में पूरी तरह से सहाय करें।   उसके लिये जो-जो जरूरतें होंगीवो हमें करनी चाहिये।   उसकी ओर हमें मुड़ना चाहिये, उसके प्रति हमें पूरी तरह से समर्पित होना चाहिये। और अपना पूरा समय हम सहजयोग के लिये क्‍या कर सकते हैं, हम सहजयोग में कौनसा प्रदान कर सकते हैं।

इसमें आप जानते हैं कि पैसा–वैसा नहीं लिया जाता, पर अब जैसे कि आपको कार्यक्रम करना है। तो मैंने सुना कि एक ही नागोराव साहब सारा पैसा दे रहे हैं, ये बात अच्छी नहीं है।  अभी से आप थोड़े–थोड़े पैसे इकट्ठे कर लेंऔर जब हम आयें,  तो ऐसा होना चाहिये कि सब को उसमें तन मन धन से, हर तरह से मदद करनी चाहिये।  और उसमें आपको बड़ा मजा आयेगा।  ऐसे हम लोग और तो खर्चे करते ही रहते हैं ये खरीद, वो खरीद हैं; एक चीज़ नहीं खरीदी और सोचा कि सहजयोग के लिये रख दी।

बहुत से लोग सहजयोग में ऐसे भी हैं, जो पूरे समय सहजयोग का विचार करते हैं।  क्योंकि वो ये सोचते हैं कि इससे सारे समाज का, सारे सृष्टि का, एक परिवर्तन हो जायेगा।  और सारे संसार में आनन्द का राज्य आ जायेगा और हम लोग सारे सुख से रहने लगेंगे।  और जो कुछ वर्णित किया गया है स्वर्ग,  वह इस संसार में उतर आयेगा।  इतने दिव्य और महान कार्य के लिये सब लोग सोचते हैं कि हम इसमें पूरी तरह सम्मिलित हो जाएं।  लेकिन ऐसे लोग जो सहजयोग में हैं वो बड़े ऊँचे पद पर हैं और वो बड़ी ऊँची स्थिति में रहते हैं।  और इसी में आनन्दित रहते हैं कि हम सहजयोग में बैठे हैं।  उनका बिज़्निस (business) चलता है, उनको पैसे मिलते हैं। उनके सारे प्रश्न छूट जाते हैं,  कि जो प्रॉब्लेम्स (problems) हैं वो हल हो जाते हैं। और उनकी समझ में ही नहीं आता कि कोई प्रॉब्लेम (problem) ही नहीं रहा।  ये प्रॉब्लेम भी छूट गया, वो प्रॉब्लेम भी छूट गया, सब ठीक ठाक है।

सो इस प्रकार का जो हमारे अन्दर जागरण हो जाये और हम सत्य की सृष्टि में उतर जाएं   तो अपने आप हम देखते हैं कि कितनी रूढियाँ और कितने गलत संस्कार हमारे अन्दर इतने दिनों से आये,  और वो हमारे अन्दर घर कर के बैठे हैं, और उससे हमारी प्रगति नहीं हो सकती।  तो चाहे कुछ भी हम सोचते रहे होंगे पिछले इस में, कुछ भी हमारे माँ-बाप ने बताया हो, कु  छ भी हमारे समाज ने हमें समझाया हो।   हमारे ऊपर एक बड़ा भारी उत्तरदायित्व है,  जिम्मेदारी है, रिस्पॉन्सिबिलिटी (responsibility) है। कि हम ऐसा समाज बनायें कि वो शुद्ध निर्मल हो और उस शुद्ध निर्मल में हमारी धारणा रहे और उस धर्म में हम स्थित रहें।

आप सबको मेरा अनन्त आशीर्वाद।