Shri Ganesha Puja

(भारत)

1991-12-15 Ganesha Puja Talk, Shere, India, DP, 44' Download subtitles: DE,ENView subtitles: Add subtitles:
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Shri Ganesha Puja Date 15th December 1991: Place Shere Type Puja

[Hindi translation (English talk), scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

महाराष्ट्र में श्री गणेश की पूजा के महत्व की हमें समझना है। अष्टविनायक (आठ गणपति) इस क्षेत्र के इर्द-गिर्द है और महाराष्ट्र के त्रिकोण बनाते हुए तीन पर्वत कुण्डलिनी के समान हैं। पूरे विश्व की कुण्डलिनी इस क्षेत्र में निवास करती है श्री गणेश द्वारा चैतन्यित इस पृथ्वी का अपना ही स्पन्दन तथा चैतन्य है। महाराष्ट्र की सर्वात्तम विशेषता यह है कि यह बहुत बाद में कभी भी आप सुगमता से यह विवेक उनमें नहीं भर सकते। तब इसके लिए आपको वहुत परिश्रम करना पड़ेगा। सहजयोग में यह विवेक तजी से कार्य कर रहा है और लोग वहुत बुद्धिमान होते जा रहे हैं। किसी भी मार्ग से हम चलें, हम पात हैं कि हमारो सारी समस्याएं मानव की ही देन है। जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है कि बाह्य जगत में जा भी प्रवृत्तियां या फैशन आयें आप उनसे प्रभावित नहीं हाते। आप अन्दर से परिवर्तित होते हैं। तब आप पूर्णतया जान जाते हैं कि दूसरे लोगों से क्या आशा की जाती उनसे किस प्रकार व्यवहार किया जाए, किस प्रकार बातचीत की जाए और उनके साथ किस सीमा तक चला जाए। यह सव विवेक से प्राप्त होता है। सहजयाग में आप सब अतियोग्य लाग विवेक को डतनी ही सुन्दर चित्त प्रदान करता है। श्री गणेश के चैतन्य प्रवाह के कारण चित्त एकाग्रित हो जाता है। पवित्रता तथा मंगल प्रदान करने के लिए श्री गणेश की सृष्टि हुईं। गणेश ही सभी का शुद्ध करते हैं । ये इनकी अवाधिता है जो आपको शुद्ध करती है तथा आपके चित्त को विचलित करने वाले अह तथा बन्धनों का दूर करती है। अच्छे चित्त वाले लोग बहुत से अच्छे कार्य कर सकते हैं जैसे अच्छी कलाकृतियाँ, अच्छा गणित और अच्छा संगीत। इन सब के लिए पूरे चित्त की आवश्यकता होती है। अच्छा चित्त श्री गणेश की देन है वे विवेक के दाता हैं। विवेक ही धर्म बन जाता है तथा अपके अस्तित्व का अंगे-प्रत्यंग बन जाता है। है तथा उन्हें क्या करना चाहिए। हैं। आपने बहुत कुछ पा लिया है और आप सभी कुछ जानते हैं। इस सबके बावजूद भी हमें दूसरों से व्यवहार तो करना ही है। किसी को रोकना नहीं हैं और न ही कोई कठोर या दु:खदायी बात कहनी है। यदि आप सहजयांग को फैलाने का प्रयत्न कर रहे हैं तो एक ही मार्ग है कि हम सबकी आप बुद्धिमान हो जाते हैं। यद्यपि वे शिशु हैं फिर भी अति परिपक्व हैं। सहजयोगी के अन्दर क्योंकि श्री गणेश जागृत होते करुणापूर्वक देखभाल करें। हैं इसलिए विवेक उनका अन्तर्जात गुण होता है। एक सन्तुलन एक उत्थान, वह व्यक्ति प्राप्त करता है तथा वह समझता है गणेश के माध्यम से संभव है। वे निर्विकल्प में हैं। उन्हें कोई कि यह उत्थान उसके लिए, उसके देश तथा पूरे विश्व के लिए हितकर है। वह सहजयोग के महत्व को जानता है। यह विवेक हमारे अन्दर रचित है और अपने अन्दर विवेक के इस सरोत का उपयोग सीखना हमारे लिए आवश्यक है। सहजयोग होते हैं। यह एक अवस्था है जो आपके अन्तस में बनी होनी में व्यक्ति विवेक प्रवाहित करने लगता है तथा इसे समझने भी लगता है। व्यक्ति अपनी मूर्खतापूर्ण बातें छोड़ देता है। श्री गणेश ही आध्यात्मिक जीवन की नींव के पत्थर हैं। इसी तो आप इस अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। अन्तरदर्शन कारण मरी बहुत इच्छा है कि अपने बच्चों के लिए हम उचित विद्यालय खोज सकें। उन्हें अच्छी शिक्षा मिले तथा उनकी उचित देखभाल हो क्यांकि उनका गणेश तत्व उनमें पहले से ही है। हमें केवल इसका पोषण करना है देखभाल करनी है तथा इसे बढ़ाना है। एक बार यदि एसा हो जाए तो बच्चे सुरक्षित हैं और उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचा सकता। गलतं चीजों स्वयं में विश्वास भी आना आवश्यक है। यह भी ओरी प्रश्न नहीं करना। न उन्हें कोई चिन्ता है और न कोई मोह। कांई कार्य करते हुए आप दो-विचारों में हो सकते हैं। हो सकता हैं ही कि आप दृढ़ न हां। परन्तु वे (श्री गणेश) सदा बहुत दृढ़ चाहिए। आप स्वयं पर चित्त को केन्द्रित कर यदि पता लगाने का प्रयत्न करें कि मेरे साथ क्या समस्या हेख में ऐसा क्यों हूँ? आपका बहुत सहायक होगा। अपने अन्दर के अवाधिता तत्व की पूजा करना सुगम मार्ग हैं। मान लोजिए हम किसी चोर से व्यवहार कर रहे हैं। तो हमें क्या करना चाहिए? उसके दोष का भूल जाना सर्वोत्तम है। इसकी चिन्ता नहीं करनी है। भूल जाइए कि इस व्यक्ति को ठीक करना है। भूल जाना ही विवेक है। एक बार जब आप दोषों को भूलने लगेंगे तो अच्छी बातें आपको याद रहेंगी। भूल जाइए किसने आपका अपमान किया, आपको कष्ट दिया या आपसे अनुचित बतांव किया। को वे कभी आत्मसात नहीं करेंगे। यदि वाल्यकाल में ही आप उन्हें कुण्डलिनी का ज्ञान तथा विवेक बुदझ्धि नहीं दे सकते तो

लेते हैं। वर्तमान में रहते हुए आप थकते नहीं क्योंकि न तो आप भूत की सोचते हैं न भविष्य की। प्रसन्नतापूर्वक रहते हुए आप चीजों को सुधारते हैं। इस प्रकार आप अपने तथा दूसरा को कठिनाइयों से बचाते हैं। विवक का अभ्यास व्यक्ति का करना चाहिए और पूर्णतया वर्तमान में रहने का भी उदाहरणतया घर से बाहर जाते हुए आधे रास्ते जाकर बहुत से लोगों को याद आएगा कि वे कुछ भूल गए हैं। इसके लिए वे वापिस आयंग आदि….. कुछ भी ने सहजयोग में एक बात निश्चित है कि आपको दुःख देनं वाले स्वयं कष्ट पायेंगे। अत: उन्हें क्षमा कर दीजिए। उन्हें शांत कीजिए। इस प्रकार की विवेक बुद्धि हममें होनी चाहिए। लोगों के पीछे नहीं पड़ना है किसी को भयभीत नहीं करना है और न ही किसी से कठोरता से व्यवहार करना है। ध्यान ही एक एसा मार्ग है जिसके द्वारा आप अपना दायां और बायां (झुकाव) त्याग कर अपने मध्य में स्थिर हो जाते हैं तथा अपने अस्तित्व तथा विवेक का आनन्द लेते हैं। अपने जीवन का एक अहं भाग हम कष्ट परेशानियाँ झेलने तथा दूसरों को परेशान करने में व्यतीत करते हैं। हमारे पास समय है कहाँ? उस समय यदि आप वर्तमान में हों ता आदि भूलें। विवेक स्वतः कार्य करता है। यह एक महान शक्ति हैं। यह किसी भी प्रकार की भूल, हमले या मूर्खता का सामना कर सकता है। अत: हमें चाहिए कि विवेक को विकसित कर इसे परिपक्व करें। हजारों लोगों की कृण्डलिनियां हमें जागृत करनी हैं। पर हम तो व्यर्थ की चीजों में फंसे हुए हैं। हमारा विवेक समाप्त ही जाता है। सर्वोच्च स्तर के लोगों में भी विवेक नहीं है क्योंकि वे भी पलायन करना चाहते हैं। तंग आकर सन्यास ले आज की पूजा में हमें विवेक की याचना करनी चाहिए तथा इसके लिए हमें वर्तमान में रहना होगा। परमात्मा आपको धन्य करें।