6th Day of Navaratri, Your Beautiful Qualities will prove the Truth of Sahaja Yoga

Campus, Cabella Ligure (Italy)

Feedback
Share

1997-10-05 छठा दिन, नवरात्रि पूजा प्रवचन, कबेला,इटली

आज नवरात्रि का छठा दिन है । 

देवी के अनेक अवतरण हुए हैं, विभिन्न विभिन्न उद्देश्यों के लिए। लेकिन महान संतों  ने जब स्वयं का आत्मनिरीक्षण किया, जो मॉं की पूजा कर रहे थे तो उन्हें पता चला कि उन्होंने हमारे लिए क्या किया है । दूसरे दिन मैंने आपको बताया था कि धर्म, मनुष्य का अंतर्निहित गुण है। और वे दस हैं। यह हमारे भीतर पहले से ही स्थापित है, लेकिन हम भटक जाते हैं, धर्म से भटक जाते हैं और सभी समस्याएं सामने आती हैं, क्योंकि धर्म छोड़ना मानव का गुण नहीं है।

लेकिन देवी ने खुद हमारे लिए,हमारे भीतर पहले से ही बहुत सारे काम किए हैं, हालांकि हमें इसका बोध नहीं है । कहा जाता है कि “या देवी सर्व भूतेषु”- “वे सब लोग  जिनको आपने बनाया है” – अर्थात ज्यादातर मनुष्य – “आप क्या करती हैं? मनुष्य के अंदर आप किस रूप में मौजूद हैं? अब जरा आत्मनिरीक्षण करें कि आपके भीतर ये गुण हैं या नहीं, क्योंकि ये आपको देवी द्वारा दिए जाते हैं, आपके भीतर की शक्ति के द्वारा ।

जैसे: “या देवी सर्व भूतेषु शांति रूपेणा संस्थिता” – ये बहुत महत्वपूर्ण है, कि आप मनुष्यों के भीतर शांति के रूप में विद्यमान हैं । क्या आप ऐसे मनुष्य पाते हैं जो भीतर और बाहर शांतिपूर्ण हैं? बहुत मुश्किल है। लेकिन उन्होंने आपको यह दिया है कि, उन्होंने आपको वह शांति दी है जिसे आपको प्राप्त करना है। अब यह होता है, क्योंकि आप अपने मानव धर्म से गिर गए हैं । तो यह शांति जो उन्होंने आपको दी है, उसे आपको प्राप्त करना है, अपने उत्थान के माध्यम से, कुंडलिनी जागृति के माध्यम से। आप उत्साहित हैं, ठीक है। या, आप बदला लेना चाहते हैं, आप दूसरों को चोट पहुंचाना चाहते हैं, आप दूसरों को परेशान करना चाहते हैं, आप कभी-कभार आनंद लेते हैं, यहां तक कि सहज योगियों के तौर पर लोग दूसरों को चोंट पहुंचाने ,दूसरों को परेशान करने का आनंद लेते हैं। तो, फिर दूसरा वह कहती है: “या देवी सर्व भुतेषु प्रीति रूपेण संस्थिता”। प्रीति,प्रेम करने का गुण है, कि मानव को प्रेम करने का गुण दिया गया है। लेकिन, ऐसा है नहीं । क्योंकि पहली निरर्थक बात जो मनुष्य करता है,वो है ईर्ष्या। अब, मान लीजिए कि मैंने किसी को कुछ उपहार दिया, और कुछ उपहार किसी दूसरे को दिया । यहाँ तक कि सहजयोग में भी उन्हें ईर्ष्या महसूस होती है। बहुत आश्चर्य की बात है। आप ऐसा कैसे कर सकते हैं, जबकि देवी ने आपको प्रेम करने का गुण दिया है? इसके बारे में बहुत, बहुत सामान्य निरर्थक बात यह है कि मनुष्य बहुत ईर्ष्यालु हैं। लेकिन एक सहज योगी के रूप में आपको ये नहीं करना चाहिए, क्योंकि देवी ने जो गुण आपको दिया है, वह प्रेम करने का गुण है । वह गुण आप में दिखना चाहिए – इसके विपरीत आप बहुत ईर्ष्यालु हैं। इसका अर्थ है कि आप, श्री माताजी द्वारा आशीर्वादित सहज योगी नहीं हैं- नहीं । यदि आप आशीर्वादित हैं, तो आपको किसी प्रकार की ईर्ष्या नहीं होगी। और यह ईर्ष्या कभी-कभी इस हद तक जाती है कि अब वो, “कहते हैं,हम कबेला से हैं, और आप अल्बेरा से हैं”। खत्म!! ये तो एक दूसरे के बहुत करीब हैं, नाक के दो नथुनो की तरह पास पास हैं। लेकिन वो ईर्ष्या कर रहे हैं। ईर्ष्या,इस बारे में  होगी कि, “मां आप मेरे देश में क्यों नहीं आती, यदि आप उस देश में जा सकती हैं तो” । तो यह सब भी अज्ञान से आता है कि “यह मेरा है, यह मेरा है, यह तुम्हारा है.” यह ईर्ष्या इतने मजेदार तरीके से शुरू होती है कि हमें यह भी एहसास नहीं होता कि उन्होने हमें प्यार करने की शक्ति दी है। जबरदस्त प्यार करने की शक्ति। अशुभ शक्ति, हमारी नहीं हो सकती। लेकिन शुभ, धर्मशक्ति किसी से प्यार करने के लिए । मतलब,बिना किसी स्वार्थ और लोभ के, बिना किसी ईर्ष्या के। लेकिन मानव के दिमाग ने खुद को इतना चालाक विकसित किया है कि उसे गर्व है कि उसे किसी से ईर्ष्या हो सकती है। जैसा कि मैंने आपको बताया था इस ईर्ष्या से केवल लालच भीतर आता है, । एक सत्य है, क्योंकि आपको ईर्ष्या महसूस होती है – इसलिए आप वही चीज खरीदना चाहते हैं। इसके बाद आपको दूसरों से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए । यदि किसी को आपकी तुलना में बेहतर नौकरी मिली है, तो आपको उसके साथ प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए । ये सभी बातें विनाशकारी हैं और देवी की शक्तियां सृजनकारी हैं। वो आपको वे सभी शक्तियां देती हैं जो  पूर्णतः सृजनकारी हैं । तब वह कहती हैं, “या देवी सर्व भूतेषु”- ये संतों ने कहा है- “क्षमा रूपेण संस्थिता”। ‘क्षमा’, जिसे कि आप, क्या कहते हैं, माफी । दिल से क्षमा । ठीक है, कोई आपके लिए क्रूर रहा है, आपके लिए बुरा रहा है, आपका शोषण किया है, आपको परेशान किया है, लेकिन आपके पास शक्ति है,बड़ी शक्ति है माफ करने की । क्या हम उस शक्ति का उपयोग माफ करने के लिए करते हैं?

फिर आराम के लिए भी, वह क्या करती हैं, कि वह आपको नींद प्रदान करती हैं-“या देवी सर्व भूतेषु निद्रा रुपेण संस्थिता”। जब आप थक गए होते हैं और आप सो नहीं सकते हैं तो वे आपको सुलाती हैं । वे आपको आराम देती हैं । तो वे विश्राम की शक्ति का कार्य करती है क्योंकि वे परानुकंपी तंत्रिका तंत्र के माध्यम से कार्य करती है । अनुकंपी तंत्रिका तंत्र आपको उत्तेजित कर सकता है, आपको उदास कर सकता है । लेकिन परानुकंपी आपको आराम देती है, आपके ह्रदय को आराम देती है, आपके शरीर को आराम देती है और पूरी तरह से आप स्वयं को तनाव मुक्त होकर माँ की गोद में  सोया हुआ महसूस करते हैं। लेकिन कई लोग हैं जो सो नहीं सकते । क्योंकि वे कुछ प्राप्त करने के बारे में सोच रहे हैं । यदि आप सो नहीं सकते हैं, तो आपके साथ कुछ गलत है। और जब आप सो नहीं सकते तो मैं भी सो नहीं सकती। जो कुछ भी सामूहिक रूप से हो रहा है, वह मुझ पर भी कार्य करता है । आप कुछ भी गलत करते हैं, तो वह मुझ पर भी असर करता है, विशेषकर, सामूहिक रूप से । आप इसलिए सो नहीं सकते क्योंकि आप ऐसी चीजों के बारे में सोच रहे हैं जिनका कोई मूल्य नहीं है ।

अब, सहज योग में हम जानते है इससे ऊपर उठने के लिए हमें निर्विचार चेतना में जाना होगा ।

लेकिन जब आपका अहंकार काम कर रहा है या … {यह बच्चा काफी परेशान कर रहा है। मैंने उसे हर समय दौड़ते देखा है। उसे अच्छे से बताओ । वह किसका बेटा है?] आप देखते हैं, भारत में आप बच्चों को बिल्कुल शांत पाएंगे । क्यों? क्योंकि मां बच्चे को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी उठाती है। हमने कई कार्यक्रमों को किया है, क्या आपने कभी किसी भी बच्चे को दौड़ते देखा है? कल भी वे यहां दौड़ रहे थे । इसका कारण यह है कि मां एक मां के रूप में जिम्मेदारी नहीं लेती है कि बच्चों को ठीक से बड़ा किया जाए । आप भी इतने उम्रदराज  हो, लेकिन मुझे आपको बताना है । आपके लिए जो भी अच्छा है, आपके समाज के लिए,जो ये नई पीढ़ी  है,इसके लिए । इस नई पीढ़ी के युग में यदि आप अभी भी सही तरीके से व्यवहार नहीं कर रहे हैं, असामान्य तरीके से कर रहे हैं, तो आप दूसरों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं? तो  माँ को आपको ये बताना पड़ता है ।

मां ने जो सबसे दिलचस्प बात आपके भीतर समावेश की है, वह है-“या देवी सर्व भुतेषु भ्रांति रूपेण संस्थिता”। वो आपको भ्रम में डालती हैं, क्योंकि कभी-कभी बच्चे तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि वे भ्रम का सामना नहीं करते। उन्हें भ्रम का सामना करना पड़ता है। वह आपको अनुमति देती है,अनुमति देती है एक बिंदु तक गलत जाने की,जहां आपको पता चलता कि आप भटक  गए हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण  है कि वह खेल रचती है,जैसा कि कहा जाता हैं यह महामाया का कार्य है। और हर धर्म में यह चर्चा की गई है कि हम इस भ्रांति के साथ खो जाते हैं ।

अब ,हमारे भ्रम क्या हैं? हमारे पास अहंकार का भ्रम है । पुरुषों में भ्रम है कि वे बहुत शक्तिशाली हैं, और वे जो चाहे कर सकते हैं और वे इसके लिए दंडित होने वाले नहीं है ।और महिलाएं वे भी उसी तरीके से व्यवहार करती हैं। वे यह नहीं समझतीं कि यह एक भ्रम है जो मां ने हमें दिया है, यह पता लगाने के लिए कि हम गलत हैं । क्योंकि अगर आप किसी को बताते हैं, “यह गलत है, आप ऐसा न करिए”, फिर भी वे इतने परिपक्व नहीं हैं इसलिए वे गलत काम करते रहेंगे ।

तो मां कहती है, ठीक है, जाओ। बहुत अच्छा,बढ़िया है। बहुत अच्छी बात है। आप समुद्र में कूदेंगे? कूदिए”। फिर जब आपको एहसास होता है कि आप एक भ्रान्ति में हैं, तभी आप वापस लौट सकते हैं। अन्यथा, बिना किसी समस्या के आप वापस नहीं लौट सकते। आप में से बहुत-से हठी हैं, इतने आत्म सचेत हैं। कोई आप से कुछ भी कहे,आप सुनेंगे नहीं।  मानसिक स्तर पर हम आपको जो कुछ भी समझाने की कोशिश करते हैं, आप नहीं सुनेंगे। इसलिए, भ्रांति, भ्रम मस्तिष्क से परे है। यह मस्तिष्क से परे है। यह जटिल लोगों के लिए कई बार बहुत अच्छी तरह से काम करता है । अब, जब आप माँ के स्थान पर हैं, तो स्वाभाविक रूप से आप नहीं चाहतीं कि आपका बच्चा  बर्बाद हो। वे जिम्मेदार महसूस करती हैं, और वे सोचती हैं कि: “अब परमात्मा के साथ उनका संबंध जुड़ गया है, और इस संबंध को नहीं तोड़ा जाना चाहिए, जिसमें उन्हें हर समय आशीर्वादित और खुश रहना चाहिए। यह सब हमारे भीतर है,बिल्कुल हमारे बचपन से हमारे भीतर निर्मित, लेकिन हम भूल जाते हैं, धीरे -धीरे हम इसे खोने लगते हैं ।

शायद झूठी मर्यादाये ऐसी हैं या शायद अहंकार ऐसा है,और हो सकता है कि वे भूल जाते है कि वे आत्मसाक्षात्कारी हैं । मैं आपसे बात कर रही हूं – ऐसे लोगों से जो आत्मसाक्षात्कारी हैं। मैं उन लोगों से बात नहीं कर रही हूं जो पहले से ही खो चुके हैं या जो अभी सहज योग के रास्ते पर हो सकते हैं । लेकिन जिस तरह से आपको बड़ा किया गया है, जिस तरह से आपको बहुत मधुरता से बताया गया है,प्यार से, स्नेह के साथ, दयालुता के साथ -और यदि आप उसे नहीं समझते हैं, तो आप भ्रांति में चले जाते हैं । उदाहरण के लिए, यह भी कहा जाता है कि: “या देवी सर्व भूतेषु लज्जा रूपेण संस्थिता”। लज्जा, मैं नहीं जानती कि इसे कैसे वर्णन करें, यह शर्म नहीं है । यह आपके शरीर को लेकर एक तरह के संकोच की बात है। अब वो सोंदर्य प्रतियोगिताएं करते हैं। भारत में भी सौंदर्य प्रतियोगिताएं हुईं । [आप क्यों लिख रहे हैं? वह क्या लिख रहे हैं ? लिखने की कोई जरूरत नहीं है, सब टेप होगा। ठीक है?] लज्जा रुपेण संस्थिता,का मतलब है कि आपको अपने शरीर को लेकर शर्म होनी चाहिए। यह विशेष रूप से महिलाओं के लिए है ।आप देखिये,एक बच्चे के रूप में  महिलाऐं बहुत शर्मीली होती हैं। आप छोटी लड़कियों को देखते हैं, वे बहुत शर्मीली होती हैं। वह शर्म धीरे-धीरे गायब हो जाती है, लेकिन शुरुआत में वे मुझ से भी शर्माती हैं। वे मेरे सामने आती हैं, वे अपना सिर नीचे कर लेतीं हैं। वे नमस्ते भी नहीं कहेंगी । बहुत प्यारी। और वे अजीब कपड़े पहने हुए लोगों को पसंद नहीं करती । मुझे याद है, एक बार मेरी नातिन,उसने एक मैग्ज़ीन देखी जिसमें एक महिला स्विमिंग पोशाक में थी । उसने कहा, “तुम क्या कर रही हो?अच्छा होगा अपने कपड़े पहन लो, अन्यथा मेरी नानी आ जाएंगी और  आपको बहुत मारेंगी ” उस महिला से कह रही थी कि; और फिर उसने वह खोली और एक आदमी की पोशाक देखी सिर्फ एक छोटी, छोटे नेकर के साथ। मुझे नहीं पता कि वे ऐसा क्यों करते हैं। और फिर उसने कहा, “ये जो है, बिल्कुल बेशर्म व्यक्ति लगता है। अब उसका बुरा समय आने वाला है। और उसने इसे बंद कर दिया । और फिर उसने नौकरानी से कहा, “इसे जला दो, जला दो इसे। मैं देखना नहीं चाहती। इतनी छोटी लड़की! वह जानती थी कि यह गलत है ।

लेकिन जिस तरह से आजकल हम अपने शरीर के दिखावे के साथ जा रहे हैं,तो उससे कई बार मुझे लगता है कि ये सभी डिजाइनर मर जाएंगे या दिवालिया हो जाएंगे, क्योंकि इन दिनों लोग इतने छोटे कपड़े पहनते हैं । किसी भी कलाकार के लिए अपना काम दिखाने या अपनी कला दिखाने के लिए कोई जगह नहीं है कि वह आपको कैसे तैयार कर सकता है। जापान में मैंने उन लोगो से पूछा कि(यह लंबे समय पहले की बात है), अब तो जापानी भी अमेरिकी हैं, लेकिन उस समय – मैंने कहा, “यह कैसे आप इन कपड़े को पहनते हैं, ये कीमोनोज़, इतनी अच्छी तरह से तैयार किया, बहुत महंगा, और इसे पहनने में समय लगता है?”। तो उन्होंने कहा कि,”देखिए, अगर भगवान ने एक सुंदर शरीर बना दिया है, तो यह उसकी कला है और हमने  इसे सजाने के लिए अपनी कला बनाई है। तो हम करते क्या है, इसे सजाने के लिए हमारी कला बनाते है ।

मुझे वास्तव में यह पसंद आया, क्योंकि भारत में यही बात है। अगर कोई महिला है, उसे साड़ी पहननी है, जिसे बहुत कलात्मकता से, बहुत खूबसूरती से बनाया गया है, केवल उसके शरीर को सजाने के लिए, केवल शरीर का सम्मान करने के लिए । लेकिन ऐसा लगता है कि ये सब अमेरिका के प्रभाव के साथ चला गया है, मैं तो कहती हूँ, जो कर रहे हैं, वे बुद्धिहीन लोग हैं, बिल्कुल बुद्धिहीन, कुछ भी नहीं है उन से सीखने के लिए ।

केवल २०० साल पुराने लोग और हम उनके तरीके से व्यवहार करना शुरू कर देते हैं, हम यह भी नहीं देखते कि उनके देश के साथ क्या हो रहा है, वे किस तरह के लोग हैं, वे कैसे रहते हैं, उनके विचार क्या है, जीवन में उनका लक्ष्य क्या है ।

हर झूठे गुरु ने उनका शोषण किया है, क्योंकि वे बुद्धिहीन हैं। अगर उनके पास दिमाग होता तो वे उन्हें कभी स्वीकार नहीं करते । हां, उनके पास दिमाग है कि एक कंप्यूटर कैसे चलाते हैं और कैसे एक टेलीविजन चलाते हैं -यांत्रिक बातें । लेकिन जहां तक उनके अपने शरीर का सवाल है, वे नहीं जानते कि इसे कैसे संभालना है । भारत में उन्होंने एक सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित की और कई समझदार लोगों ने इसका विरोध किया, क्योंकि यह आपके शरीर को बेचने और पैसा बनाने जैसा है। वेश्यावृत्ति और इसमें क्या अंतर है? यदि आप को अपने शरीर को बेचकर पैसे मिलते है, तो यह वेश्यावृत्ति है। आपको अपना शरीर बेचना नहीं चाहिए। ये वो नहीं है जो देवी ने आपके साथ किया है । लेकिन आपको अच्छी तरह से परिधान पहनना चाहिए, अलग-अलग अवसर हैं, उन अवसरों पर, जिस तरह से यह है वैसे पहनना चाहिए।

एक दिन मैंने एक बहुत अच्छी साड़ी,जिसे हम पैठणी कह्ते हैं एक महिला को उपहार के रूप में दी । और एक किताब का विमोचन समारोह  किया था, और ये महिला वहां आयी थी । तो मैंने कहा, आपने  पैठणी क्यों नहीं पहनी? उसने कहा, “क्योंकि, यहां पर कोई शादी नहीं है । मैं इस समारोह के लिए पैठणी कैसे  पहन सकती हूँ ? वहाँ शादी होनी चाहिए । बहुत ही प्यारी – “शादी में मैं पहन सकती हूं।

आप देखिए,सब अवसरों, स्थानों पर,जहाँ  उत्सव मनाया जाना है । जैसे भारत में जब महिलाएं मंदिर में जाती हैं या मूर्तियों या किसी भी चीज की पूजा करती हैं, तो वे वह सब पहनेंगी जो देवी के सामने जाने के लिए जरूरी है । कल्पना कीजिए कि लोग यहां इस कार्यक्रम के लिए आ रहे हैं, मैं नहीं जानती कि वे इसे क्या कहते हैं, लेकिन जूट की तरह, जूट के कपड़े – पहनते हैं हिप्पियों की तरह, मेरा क्या होगा? मैं पतली हवा में गायब हो जाउंगी,बस मैं आपको इतना बता सकती हूं । इसलिए शरीर के प्रति सम्मान होना चाहिए। उन्होंने पहले यही कहा है- “लज्जा रूपेण संस्थिता”। अब आप कह सकते हैं कि ऐसे लोग हैं जो नदी में स्नान करते हैं,ऐसा और वैसा,और उसे न्यायोचित ठहराते हैं । लेकिन आप संत हैं! आप आत्मसाक्षात्कारी आत्माएं हैं! आपको उन लोगों को देखने की जरूरत नहीं है जो अभी तक पार नहीं हुए हैं और जो दुर्व्यवहार कर रहे हैं।आपको वह करना चाहिए जो एक संत को  करना चाहिए। देवी ने आपको कितने सारे गुण दिए हैं। अन्य है-“क्षुधा रूपेण संस्थिता”। वे ही हैं जिन्होंने हमें भूख दी है। हमे अपना खाना खाना होता है। आजकल पतले होने का एक प्रचलन है या जो कुछ भी आप कह सकते हैं।और आप जानते हैं कि कई बीमारियां विकसित हुई हैं। एनोरेक्सिया, और इस तरह की, क्योंकि महिलाऐं थोड़ा ही खाना चाहती हैं । आप जो चीजें खा रहे हैं, उसे बदल सकते हैं, लेकिन सिर्फ अपने शरीर की देखभाल करना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। केवल शरीर ही महत्वपूर्ण नहीं है । जो महत्वपूर्ण है वह है आपकी आत्मा। और ये वही है जो आपको कुंडलिनी देती है। ये वही है जो आपको एक विधि देती है जिसके द्वारा आपका उत्थान होगा। लेकिन हर समय शरीर के बारे में चिंतित रहते हैं। यह बात मैं समझ नहीं सकती । खासतौर पर महिलाएं,जो  शक्ति हैं। इसके बाद एक और बात यह है कि वे एक प्रचलन (फैशन) का अनुसरण करतीं हैं। प्रचलन पागलपन है। जब मैं युवा थी मैं इसी तरह से ही मेरे ब्लाउज पहनती थी । लेकिन भारत में भी प्रचलन की शुरुआत हुई। वे आस्तीन के आकार को बढ़ातीं थीं, फिर आस्तीन के आकार को कम कर दिया, फिर कुछ यहां तक चले गए।

मैंने सोचा, “यह क्या बकवास है? क्यों इस तरह से पैसे बर्बाद करना है”?  आपके पास एक विशेष बनावट  है, और यह पारंपरिक रूप से स्वीकार किया गया बनावट  है, जो आपके पास होना चाहिए। प्रचलन  के अनुसार, आप अपनी आस्तीन के आकार को बढ़ाना और कम करना क्यों चाहते हैं। “यह प्रचलन है”। प्रचलन कौन बनाता है? देवी? देवी ने प्रचलन बनाया है? प्रचलन किसने बनाया है? ये भूखे, लालची लोग? जो आपको मूर्ख बना रहे हैं। और आप प्रचलन का अनुसरण करने की कोशिश कर रहे हैं। अब, उदाहरण के लिए, मैंने कहा कि आपको अपने सिर में तेल डालना चाहिए, कम से कम शनिवार को पर्याप्त तेल डाल लें और फिर अपने सिर को धो लें। लेकिन आप ऐसा नहीं करेंगें और फिर आप अपने बालों को खोना शुरू कर देंगें। मैं समझ सकती हूं अगर आपके पास समय नहीं है, आप बहुत व्यस्त व्यक्ति हैं-लेकिन क्यों? क्यों,वो सब न करें जो खुद की देखभाल के लिए भी जरूरी हो। तो, आप अपने शरीर को पतला करने के लिए तो देखभाल करेंगी, आप अपने बाल खो देंगी, दृष्टि कमजोर हो जाएगी, आपके दांत गिर जाएंगे, और आप बहुत जल्द ही बुड्ढी अम्मा बन जाएंगी । यही पुरुषों के साथ भी है, मुझे बताया गया है आजकल पुरुष भी ब्यूटी पार्लर जा रहे हैं। मुझे लगता है,बहुत ज्यादा पैसा और मूर्खता एक साथ है। इसकी कोई जरूरत नहीं है। यदि आप एक अच्छा, स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं – तो आपको व्यायाम करना होगा और ध्यान करना होगा। यदि आप ध्यान करते हैं तो आप शांतिपूर्ण हो जाते हैं। उस शांति के साथ, आपको आश्चर्य होगा, आपके पास इतनी ऊर्जा होगी । कितनी ऊर्जा सोचने में बर्बाद कर दी जाती है,और आप क्या सोचते है? यदि आप किसी से पूछते हैं “आप क्या सोच रहे हैं?” “सब कुछ.” लेकिन “सब कुछ” का मतलब क्या है? आप इतना क्यों सोचते हैं? सोचने की क्या जरूरत है? यह एक आदत है, मानव की आदत, हर चीज के बारे में सोचते रहतें हैं।

उदाहरण के लिए, अभी, यहां तीन कालीन हैं। अब, अगर मैं उस पर ध्यान देती हूं तो मैं सिर्फ देखती हूं कि वे कितने अच्छे हैं; मैं बस आनंद उठाऊंगी – कलाकारों ने जो किया है उसका आनंद लूंगी, बस  इतना ही। कोई शब्द नहीं – कुछ नहीं। बस अपने भीतर आनंद। लेकिन अगर आप किसी और से पूछें, तो वह बस यह कहना शुरू कर देंगे, “ओह, यह अच्छा नहीं है।वह अच्छा नहीं है।  बहुत कुछ, यह कीमत, वह कीमत, यह बात है, वह बात है । उस कलाकार का आनंद खत्म हो जाता है। आप उस खुशी को नहीं पा सकते, वह खुशी,जिसको हम खोज रहे हैं । हम जो खोज रहे हैं वह खुशी है, और यहां तक कि जब आपको ऐसा करने का तरीका मिल गया है तब भी आप इसे प्राप्त नहीं करते हैं। क्योंकि सोचना, एक प्रतिक्रिया है, हर चीज के प्रति प्रतिक्रिया है, और यह जीवन को बहुत दुखी बनाता है, यह उस व्यक्ति के जीवन को भी जो सोचता है और दूसरों का भी। मैं आपको एक उदाहरण दूंगी। यह सब हमने किया यह सिर्फ इसलिए कि यहाँ बहुत भारी बारिश और कई बार बर्फ गिरने की भी समस्या है । तो मैंने सोचा कि एक अच्छी बात है एक अच्छा काम किया है और यह बहुत अच्छी तरह से किया गया है, हमें यह मिल गया ।

अब, इस इटली में,बहुत से सोचने वाले लोग हैं,। बहुत सारे । यही कारण है कि यह प्रगति नहीं कर रहा है । अब हमने तीन साल पहले आवेदन किया था। तीन साल से वे हमारे पैसे बैंक में बंद रखे हुए हैं, कल्पना करिए । और पहली बार उन्होंने कहा, ठीक है, सब कुछ ठीक है, यह सब ठीक है । आप इसे ले सकते हैं । इसमें इन तथाकथित इटली वासियों के सत्तर हस्ताक्षर थे। और फिर वही लोग, वे ये कहने के लिए आए, “नहीं, नहीं, नहीं, आपको इसे तांबे मे बदलना होगा.” मैंने कहा, क्यों? “क्योंकि सौंदर्य की दृष्टि से तांबा बहुत अच्छा होगा.” लेकिन क्या वे बेवकूफ लोग नहीं जानते, , कि तांबा वैसा ही दिखेगा, जैसा ये दिख रहा है? एक ही महीने के बाद  उनका रंग एक जैसा होगा? यह सौंदर्यशास्त्र का विचार है, और अब मैंने उनसे कहा है, हमें आपकी भूमि नहीं चाहिए, आप इसे अपने पास रखें, हमें हमारे पैसे वापस दे दो। इस तरह एक साधारण सी बात। क्यों? क्योंकि उनके पास एक समिति है, जैसे कि “रेजुने, बिजूने, सिजुने” है। आपको इस सब बकवास से गुजरना होगा, क्योंकि वे सभी बहुत गंभीरता से, कुर्सियों पर बैठते हैं,  “हमें चर्चा करनी चाहिए, हमें परामर्श करना चाहिए, हमें सभी से पूछना चाहिए, और फिर यह और वह” ।

और अंततः क्या होता है? किसी भी प्रकार की कोई प्रगति नहीं। कोई शांति नहीं। हो सकता है, मैं नहीं जानती, शायद कुछ चालाकी पूर्ण सौदों की जरूरत है, जिसके बारे वे मुझे बताते हुए शर्म महसूस कर रहे हैं । मैं नहीं जानती कि बात क्या है, लेकिन फिर भी मैं समझ नहीं पाती, जब एक कार्यालय कहता हैं, “हां” और फिर, जब यह वापस आते है, तो ये कहते हैं, “नहीं” । तीन साल। इसलिए मैं जो कहना चाह रही हूं कि बहुत ज्यादा सोचना अहंकार की निशानी है। लेकिन, उन्हें कोई समाधान नहीं मिलता, किसी भी तरह का कोई समाधान नहीं मिलता। वे समाधान कभी नहीं पा सकते। क्योंकि वे सिर्फ चर्चा कर रहे हैं, बहस कर रहे हैं, सोच रहे हैं-उनके पास कोई समाधान नहीं है । अब जरूरी है कि सहज योगियों को आत्मावलोकन करना होगा, आत्मावलोकन- आंतरिक । आत्मावलोकन,आंतरिक निरीक्षण है। आत्मनिरीक्षण,”मैं क्यों सोच रहा हूं? मैं क्या सोच रहा हूं? सोचने की क्या जरूरत है?

आप निर्विचार हो जाएँगे। अपने दिमाग को आप स्वयं को मूर्ख न बनाने दे । यह दिमाग एक बंदर की तरह है, मैं आपको बता रही हूं, वास्तव में यह एक बंदर की तरह है। और जब यह काम करना शुरू करता है तो यह आपको इस छोर से उस छोर तक कूदवाता है, उस छोर से इस छोर तक। और यदि आप किसी तथाकथित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, और यदि यह प्राप्त नहीं होता है तो आप सबसे दुखी व्यक्ति होते हैं। मैंने देखा है लोगों को,जो कुछ बेतुकी चीजों के बारे में सोच कर दुबले हो जाते हैं। और आप देख सकते हैं इस सोच से,कि वैश्विक स्तर पर भी क्या सामने आता है । चंद्रमा पर जाने की क्या जरूरत है? इतने सारे लोग भूखे हैं, मर रहे हैं । मंगल ग्रह पर जाने की क्या जरूरत है? उन्हें वहां से क्या मिलने वाला हैं? क्योंकि उन्होंने एक आदत बना ली,पहले वे भारत आए, फिर चीन गए, फिर इस पर गए, फिर उस पर गए; वे बैठ नहीं सकते, ठहर नही सकते हैं। वे घर में भी नहीं ठहर सकते।

खास कर पुरुष। यदि आप ट्रेन से यात्रा कर रहे हैं, भले ही ट्रेन दो मिनट के लिए रुकती हो,पुरुषों को बाहर जाना होगा । पत्नी को अब चिंता रहेगी। और जब ट्रेन चलने लग जाएगी तो वे अंदर कूद जाएंगे। मुझे लगता है कि यह एक विकृत दिमाग है,  मैं ऐसा सोचती हूँ । और ऐसा भी क्यों कहे की वो बन्दर की तरह हैं? क्योंकि बंदर भी ऐसा नहीं करेंगे। ऐसा कुछ है कि वे  एक ही स्थान पर स्थिर नहीं रह सकते हैं । अब, ध्यान में आपको स्थिर बैठना है, एक स्थान पर, यहां से वहां, वहां से वहां,कूदने के लिए नहीं। यह बहुत कठिन है । महिलाओं को अन्य समस्याएं हैं । वे खाना पकाने के दौरान  ध्यान करेंगी। उनके पास समय नहीं है! उनके अपने दोस्त हैं, उन्हें खरीदारी पर जाना है, चीजें खरीदनें के लिए और घर को हर तरह के तुच्छ पदार्थ से भरना है । उनके पास किसी भी चीज के लिए समय नहीं है।

वे बहुत साहसी भी होती हैं। वे व्यवसाय करना चाहती हैं, वे ऐसा करना चाहती हैं, वे वैसा करना चाहती हैं । ध्यान के लिए उनके पास समय नहीं है। इसलिए, ठहराव का बहुत महत्व है। खुद के साथ ठहराव। तो, एक बार किसी ने मुझसे कहा, “माँ, अगर हम ठहर जाते हैं, तो हम बहुत मोटे हो जाएंगे। ठीक है, कोई फर्क नहीं पड़ता – लेकिन आप स्थिर हो जाइये। ध्यान न करने के लिए हर तरह के बहाने हैं। “हां, मां, मैं ध्यान,करता हूं लेकिन आप को पता है, इस आधुनिक समय में इतना मुश्किल है । हमारे जीवन में संकट हैं, हमारे जीवन में समस्याएं हैं । लेकिन वास्तव में आप चकित हो जाएंगे,कि जब मेरे परिवार में या सहज योग में कोई संकट आता है,मैं तुरंत  निर्विचार हो जाती हूं।

तत्क्षण मैं निर्विचार हो जाती हूं, क्योंकि समस्या का समाधान परमचैतन्य से हो जाएगा। परमचैतन्य समस्या का समाधान करने करने वालें हैं, मुझे विचार क्यों करना चाहिए? भूल जाइए। परमचैतन्य को देखने  दीजिए। यदि आप अपने परमचैतन्य पर निर्भर नहीं हैं, तो यह आपकी मदद नहीं करते हैं। आपको कोई समाधान नहीं देतें हैं। फिर आप अपने दिमाग के साथ गोल- गोल और गोल-गोल घूमते हैं और काम करते हैं।

यह वही है जिसे आपको निश्चित रूप से जानना चाहिए, कि आप दिव्य प्रेम की सर्वव्यापी शक्ति से जुड़े हुए हैं। यह वो प्रेम नहीं है जो बेवकूफ है- प्रेम जो विचार करता है। प्रेम, जो सच है । प्रेम, जो खुशी है । यह सब आपके भीतर निर्मित, और अब आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो गया है, तो अपने आप को विकसित करने की बजाय, आप सिर्फ उन चीजों की ओर भागते हो जिनका कोई मूल्य नही हैं। और कई सारे सहज योगी खो जाते हैं । मुझे हाल ही में किसी ने बताया था कि हमने करीब सौ सहज योगी खो दिए हैं, क्योंकि उन्होंने एक और सहज योगी का अनुसरण करना शुरू कर दिया, जिसने चीजों को देखना शुरु कर दिया । इसलिए अब वे भी देखना चाहते थे। यदि आप कुछ देख सकते हैं इसका मतलब है कि आप वहां नहीं हैं, सीधी सी बात है  । अगर कहें, मैं एक पहाड़ की चोटी पर हूं, तो मैं वहां हूं । लेकिन अगर मैं पहाड़ से दूर हूं तो मैं इसे देख सकती हूं । जितना अधिक आप किसी चीज को देखते हैं उसका अर्थ है कि आप इससे दूर हैं। क्या आप इस बात को समझ गए?

तो सूक्ष्म! सूक्ष्म,स्थिति यह है कि आप स्वयं वो हो । तो, आप अपने आप को कैसे देख सकते हैं? यह बात सहज योगियों को समझनी चाहिए। कोई भी कह सकता है – “माँ, ओह नहीं, वो वह देख सकता है, उसने आपके आस-पास आभा-मण्डल देखा, वह इस चीज को देख सकता है। तो, आप कैसे देख सकते हैं? क्योंकि तुम वही हो, जिसे तुम नहीं देख सकते ।

इसलिए ऐसे तमाम लोग जो कभी-कभी बहुत लोकप्रिय होते हैं, सहज योग की शुरुआत में आपको नियंत्रित करने और आपको मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं। और फिर आप बाहर निकाल दिए जाते है। तो, हम इसे निर्णय कहते हैं। छलनी के बाद छलनी के बाद और छलनी हैं जिनमे होकर आपको गुजरना है। जहां आप इसके या उसके लिए आसक्त हो,या कि,आप इसके या उसके लिए गिरें, ये सभी बातें निहित हैं आपके कदम -दर- कदम में, कि आप कैसे पहुंच रहे हैं। आप उस बिंदु पर पहुँच रहे हो, जहाँ आपका विनाश पक्का है। क्योंकि आपको आत्मा बनना है। आपको आध्यात्मिक जीवन में उपर उठना होगा। और अगर आपकी गति नीचे की ओर है, तो कौन आपकी मदद  कर सकता है? यह एक बहुत ही दिलचस्प समय है जैसा कि मैंने आपको बताया था,ये अंतिम निर्णय का समय है । और इस समय हमें सावधान रहना होगा कि हम स्वयं के न्यायाधीश हैं । कोई आप को यह नहीं बताएगा है कि आपका ये पकड़ रहा हैं और आप का वो पकड़ रहा है । आप खुद इसे महसूस कर सकते हैं कि आप किन चक्रों पर पकड़ रहे हैं। जो कुछ भी मैं अपने दम पर कोशिश कर सकती हूं आपकी सभी समस्याओं को सोख लेने की, जो कुछ भी संभव है करतीं हूँ, आपको उदीयमान(ऊंचा),और उदीयमान रखने के लिए, लेकिन मुझे क्या लगता है कि आप की मदद करने का ये तरीका, आपको इतना मजबूत नहीं बनाएगा, क्योंकि आपको हमेशा लगता है कि, “आखिरकार, मां मेरी समस्याएं सोख लेंगी.” अगर मुझे सौ पत्र मिलते हैं तो उनमें से नब्बे सहज योगीयों के होते हैं जो किसी न किसी परेशानी से जूझ रहे हैं। मैं चकित हो जाती हूं, ये सभी गुण पहले से ही आप में जागृत है, वे आप में हैं । आप उनका उपयोग करें। कोई कहेगा, वह व्यक्ति मुझे परेशान कर रहा है, पत्नी मुझे परेशान कर रही है, पति मुझे परेशान कर रहा है । बस क्षमा कर दें! बस क्षमा कर दें! आपकी क्षमा की शक्ति कमज़ोर है। इसके अलावा संतों ने जो लिखा है उससे कहीं ज्यादा आपको सत्य की शक्ति मिली है। आप वास्तविकता जानते हैं । उन संतों की तुलना में बहुत अधिक जिन्होंने देवी की प्रशंसा की है । यदि आप सोच सकते है कि आप किस स्तर पर बैठे है तो आप गिरेंगे नहीं,आपको ज्यादा नीचे नहीं जाना होगा।  समस्या केवल यह है कि आपको यह जानना होगा कि आपके उत्थान को आध्यात्मिक होना होगा, और पहले से ही ये गुण बहुत अच्छी तरह से संतुलित रूप में आपके भीतर डाले गए हैं। धर्म से बढ़कर। धर्म हो सकता है, आपके पास हार मानने या गिरने की शक्ति हो सकती है, लेकिन ये शक्तियां आपके भीतर कभी नष्ट नहीं होतीं। मुझे याद है एक बार मैं पहली बार अमेरिका गयी थी और मैं एक सज्जन से मिली थी । अगले दिन वो आए और उन्होंने मुझसे कहा, मां, मैं बदल गया हूं, मैं बदल गया हूं, मैं बदल गया हूं । क्या हुआ? “” आप जानतीं हैं, मैं अपने चाचा से घृणा करता था, मैं उससे कभी बात नहीं करना चाहता था, उससे बहुत नाराज था, लेकिन इस बार, जरा सोचिए, कल मैं उनसे मिला, मैंने जाकर उन्हें गले लगाया, और उन्हें चूमा, और मैंने कहा, ‘ अब, मैंने आपको माफ कर दिया है, आपको पूरी तरह से माफ कर दिया है, अब इसके बारे में दोषी महसूस मत करें । वह मुझे इस तरह से देखने लगे ।” इसलिए कुंडलिनी जागरण के साथ आपके ये सभी सुंदर गुण जो होने चाहिए , आ जाते हैं। और फिर आपकी  उदारता, आपका  सुंदर अस्तित्व, जो आत्मा से प्रकाशित है, दुनिया को सिद्ध करेगा कि सहज योग सत्य है।

कल के सुंदर नाटकों ने हमें दिखाया है, लेकिन आपके भीतर ये मानसिक संतुष्टि नहीं होनी चाहिए कि “मुझे बोध हो गया है, अब मैं यह हूं” । नहीं । नहीं। मानसिक नहीं। यह एक स्थिति है, यह एक स्थिति है, और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए, आपको वास्तव में ध्यान करना होगा और हर रात, हर सुबह,ध्यान के लिए समय निकालिए। जितना अधिक आप ध्यान करेंगे उतना ही बेहतर होगा। कोई बहाना या खुद को यकीन दिलाना,नहीं किया जाना है । सब कुछ महत्वहीन है। आपका उत्थान बहुत महत्वपूर्ण है, यदि आप वास्तव में इस कलियुग में इस दुनिया को बचाना चाहते हैं – 

मुझे लगता है कि आज मैंने आपको यह बहुत स्पष्ट कर दिया है कि आपके भीतर पहले से कौन से गुण विद्यमान हैं ।

वे वहां मौजूद हैं। वे धर्म नहीं, बल्कि गुण हैं। वे आपके भीतर ही हैं, केवल एक ये चीज कि आपने अपना ध्यान विरोधी दूसरी चीजो की ओर मोड़ लिया है, अन्यथा ये सभी गुण पहले से ही आपके भीतर समावेशित हैं। वे पहले से ही वहां मौजूद हैं। और कोई भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकता,आप को स्वयं को छोड़कर। अगर आपने उन्हें नष्ट कर दिया है तो कोई मदद नहीं कर सकता।

परमात्मा आप सभी को आशीर्वादित करे ।