Unidentified Talk (Extract on Agnya Chakra)

(भारत)

1970-01-01 Unidentified Hindi Talk Extract on Agnya Chakra, 9' Download subtitles: SKView subtitles:
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1970-0101 Unidentified Hindi Talk (Extract on Agnya Chakra)

बैठे थे, प्रोग्राम में आये थे, तो भी कुछ न कुछ अपनी विपदा सोचते रहे । अरे ! मेरे साथ ये हुआ, मेरे साथ वो हुआ, ऐसा हुआ, वैसा हुआ । और माताजी से मैं कब बताऊं, मेरी विपदा क्या हुई? माताजी आप देवी हैं, मेरी ये विपदा है| बजाय उसके कि जो कहे जा रहे हैं उसको समझें, अपनी ही अंदरूनी बात को ही सोच-सोच करके आप चली गई उस बहकावे में ।  और उस बहकावे में आपको कैन्सर की बीमारी हो गई, नहीं तो ये बीमारी हो गई, वो बीमारी हो गई । वैसे ही मानसिक बातें हैं । हम मन से क्या सोच रहे हैं? मन में हमारे कौन से विचार आ रहे हैं? सब यही ना कि हमको ये दुःख है, वो दुःख है, ये पहाड़ है । लेकिन सोचना क्या चाहिए – काउन्ट  यॉर ब्लेसिंगज़ (count your blessings)। अपने पे कितने आशीर्वाद हैं परमात्मा के ।

ये दिल्ली शहर में करोड़ों लोग रहते हैं, कितनो को सहज योग मिला है? हम कोई विशेष व्यक्ति हैं, कोई ऐसे-वैसे नहीं कि अपने चित्त को बेकार करें। हमें सहज योग मिला है । इसकी धारणा होनी चाहिए अंदर से और उस अंतर्मन में उतरना चाहिए। उसी से ये जो झूठी मर्यादा है सब छूट जाएगी और अगर आप नहीं तोड़िएगा, तो किसी न किसी तरह से ऐसे कुछ आपको अनुभव आयेंगे कि ये टूटते जायेंगे । जिस चीज को आप सोचेंगे कि ये हमारा अपना है। आप कहेंगे हम दिल्ली वाले हैं। एक दिन ऐसा आएगा कि दिल्ली वाले ही आपको ठिकाने लगायेंगे। आप बोलेंगे की हम नॉएडा वाले हैं, तो नॉएडा वाले आपके पीछे बंदूक लेके लग जायेंगे । तब आपकी समझ आ जायेगा कि मैं क्यों कहता था की मैं नॉएडा वाला हूँ? फिर आप जब दौड़ेंगे दिल्ली वालों के तरफ तो दिल्ली वाले बोलेंगे, “तुम तो नॉएडा वाले हो तुम क्यों आये इधर?” तो न घर के, न घाट के, ये हालत आपकी हो सकती है ।

उसकी वजह यही है कि आपका चित्त ही ऐसा है, जो न घर का, न घाट का । जब तक इस गहराई में नहीं उतरेंगे, तब तक आप अपने को अगर सहजयोगिनी कहें, सहजयोगी कहें, तो भी मैं मानती नहीं इस चीज को । क्योंकि सहजयोगी का पहला लक्षण ये है कि वो शांत चित्त होता है और अत्यंत सबल – किसी से डरता नहीं है । सबल है । और उसका जीवन अत्यंत शुद्ध होता है , उसका शरीर शुद्ध होता है, उसका मन शुद्ध होता है । और आत्मा के प्रकाश से वो सारी दुनिया में प्रेम फ़ैलाता है । जो आदमी प्रेम नहीं कर सकता वो हमारे विचार से सहजयोगी बिलकुल है ही नहीं, वो तो पहली ही सीढ़ी नही  चढ़ा ।

जैसे आकाश में आप देखते हैं की बहुत सी पतंगे चल रही हैं, लेकिन वो किसी के हाथ में होती हैं। अगर कोई भी पतंग कट जाये, हाथ से छूट जाये, तो न जाने वो कहाँ चली जाये । वही हाथ आत्मा है । तो अपने चित्त को अपनी आत्मा की ओर रखके अपने को शुद्ध करके जाना ही सहजयोग में तपस्वरुप है। इसके लिये आपने आज हवन किया, ये  भी तप है क्योंकि अग्नि जो है सब चीजों को भस्म कर देती है। उसी तरह से आपके तप से आपके अंदर जो भी इस तरह के दुर्विचार हैं, या गलत इस तरह की मर्यादाये हैं वो सब टूट जाएँगी । आनंद पाना ये आपका अधिकार है और आप आनंद को पा सकते हैं और पाया है आपने आनंद को । लेकिन आनंद बांटने के लिये अपने अंदर गहराई होनी चाहिए ।

अगर आप गंगाजी में जाएँ और इतनी  छोटी सी एक कटोरी ले जाएँ तो आप कटोरी भर पानी लेके आ जायेंगे । लेकिन जो आप गागर लेके जायेंगे तो आप गागर भर के ले आ सकते हैं । पर अगर आप ऐसा कुछ इंतजाम कर लें कि पूरे समय गंगाजी से पानी बहता आये अपनी तरफ, तो आपके चारो तरफ़ गंगा ही बहते रहे । तो किस स्थिति में आप हैं वो देखना चाहिए । क्या आप कटोरी भर पानी सहजयोग से ले रहे हैं? कि अपने ही सीमित आनंद में हैं? या सबके आनंद के लिये हैं? और अगर आप स्वयं ही इसका स्त्रोत हैं । तो जो आज्ञा का चक्र है ये तप है, ये तप है । गहराई को  छूने के लिये जरूरी है कि तपस्विता चाहिए । फ़ैल हम जाते हैं बहुत । सहजयोग बहुत जल्दी फैलता है । कभी आप प्रोग्राम में देखिएगा, मुझे तो यही डर लग रहा है कि वो उस हॉल (hall) में पूरे पड़ेंगे कि नहीं? कि क्या होने वाला है? फैलेगा बहुत जल्दी । लेकिन गहरे कितने उतरे हैं ? तो गहराई के लिये तपस्विता की जरूरत है ।

अब तप का मतलब हम ये नहीं कहते कि आप बैठके उपवास करो । जरूरी नहीं है, पर अगर अपना चित्त अगर खाने पे है तो उसे हटाना है । मेरा चित्त कहाँ है इसको देखना ही सहज योग की तपस्विता है । क्योंकि चित्त से ही आप आज्ञा अपनी ख़राब करते हैं । कहाँ है मेरा चित्त? मैं क्या सोच रहा हूँ? इस वक्त मैं क्या कर रहा हूँ ? क्या सोच रहा हूँ? ये अपना चित्त अगर आप देखें, अंतर्मन को हमेशा अपने सामने रखें, तो आपका चित्त जो है वो आज्ञा में प्रकाशित हो जायेगा । यही तपस्या है कि अपने चित्त का निरोध और अपने चित्त का अवलोकन और चित्त का विचार ।

अभी देखिये आपका चित्त कहाँ गया? मैं बात कर रही हूँ, चित्त कहाँ है? चित्त की बात करते ही चित्त कहाँ गया । इतना विचलित चित्त है । मैं बात कर रही हूँ और आपका चित्त कहाँ है । सो चित्त की ओर नज़र रखना, चित्त का निरोध, माने जबर्दस्ती नहीं । लेकिन अब आत्मा के प्रकाश में, अपने चित्त को देखने से अपना चित्त जो है वो आलोकित हो जाता है । एकाग्र हो करके अपना चित्त देखना चाहिए ।  किसी भी चीज को देखना है । जैसे अब ये खम्भा है मेरे सामने, इसमें सुंदर से फूल लगे हुए हैं । अब हर कटाक्ष में निरीक्षण हो जाता है। ये सारा मुझे अब याद है, कहाँ पर, कौनसा, कहाँ, कितना अंतर रह गया है, क्या हो गया? पूरा का पूरा चित्र सा बन गया । क्यूंकि ये चित्त की जो एकाग्रता है, उसी से ये चित्र बनता है । उसी से आपकी स्मृति अच्छी हो जाती है । सब चीज पूरी तरह से आप जान सकते हैं । चित्त से ही सब चीज जानी जाती है ।

लेकिन चित्त अगर विचलित हो, तो आप कोई भी चीज को गहराई से नहीं पकड़ सकते । हर समय घूमते रहेगा तो कोई चीज याद ही नहीं रहेंगी । अब देखिये आप, मैं तो हर जगह देखती हूँ जैसे एअरपोर्ट पे, बात इनसे कर रहे हैं, देख रहे हैं उधर, इधर देख रहे हैं, उधर देख रहे हैं। याद कुछ भी नहीं रहा – कौन है? क्या है ? सो शुद्ध चित्त जो होता है वो एकाग्र होता है । और एकाग्र चित्त वही चीज लेता है, जो लेना है । जो नहीं लेना है, उधर देखता ही नहीं, उसको दिखाई ही नहीं देता । हट जायेगा चित्त वहां से, अपने आप । क्यूंकि वो इतना शुद्ध है कि अशुद्ध चीजों से वह मलिन हो ही नहीं सकता । जा ही नहीं सकता । तो ये अब आप ही के हाथ में है कि आप अपने अंदर देखें कि मेरा चित्त कहाँ जा रहा है? यही तप है । सहजयोग का तप सिर्फ यह है की मेरा चित्त कहाँ है? मैं कहा जा कहाँ हूँ? मेरा मन कहाँ जा रहा है? अगर ये तप आपने कर लिया, तो आज्ञा को आप लांघ गए । और सहस्रार में तो कोई प्रश्न ही नहीं क्योकि हम बैठे ही हुए हैं।