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Dhule (भारत)

HINDI TRANSLATION (Marathi Talk)

वास्तव में धूलिया नगर का यह बहुत बड़ा सौभाग्य है कि राजकुंवर राऊल जैसी स्त्री यहाँ है। उनके प्रेम के आकर्षण से ही मैं यहाँ आयी हूँ। मैंने उनसे कहा था कि मैं धूलिया एक बार अवश्य आऊंगी। और यहाँ मुझे अंदर से अनुभूति हो रही है कि उनका भक्तिभाव और प्रेम कितना गहन है । हमारे देश में धर्म के संबंध में सब ने बहुत कुछ लिखा हुआ है और बहुत सारी चर्चायें भी हो चुकी हैं। मंदिरो में भी घंटियाँ बजती हैं। लोग चर्च में जाते हैं, मस्जिद | में जाते हैं। धर्म के नाम पर अपने देश में बहुत सारा कार्य हुआ है। परंतु वास्तव में जो कार्य है वह कहीं भी हुआ है ऐसा दिखता नहीं। हम मंदिर में जाते हैं, सब कुछ यथास्थित करते हैं। पूजा- पाठ भी ठीक से करते हैं, घर आते हैं पर ऐसा कुछ लगता नहीं कि हमने कुछ पाया है। हमारे अन्दर अंतरतम में जो शांति है, अन्दर जो प्रेम है ये सब हम कभी भी नहीं प्राप्त करते। कितना भी किया, तो भी ऐसा लगता नहीं कि हम भगवान के पास गये हैं और हमें वहाँ ऐसी माँ मिली है जिन की गोद में सिर रखकर हम आराम से कह सकते हैं कि हमें अब कुछ नहीं करना है। मेरा ऐसा कहना नहीं है कि मनुष्य ने मंदिर नहीं जाना चाहिये । जाईये, अवश्य जाईये। अगर आप को मधु (शहद) की पहचान कर लेनी है, तो यह ही ठीक रहेगा कि पहले फूल की बातें करेंगे। इसीलिये उन्होंने साकार देवताओं की प्रतिमायें निर्माण की, वह सब यही बताने के लिये था । मतलब उन्होंने फूलों के नाम बताये विष्णु से लेकर शिवजी तक और मुसलमानों में भी अली से वली तक| ईसाईयों में क्रिस्त से लेकर उनकी माता तक सब की वंशावली बन गयी। सब नामों की जानकारी हो गयी। पर फूलों के नाम जान कर शहद का कहीं अंतापता नहीं था। हम साकार पूजा करते हैं। विष्णु का नाम लेते हैं। आपने विष्णु का यह श्लोक सुना होगा, ‘शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्। विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम् । । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं….’ अब यहाँ तक विष्णु का वर्णन हो गया। पर उसका मर्म कहाँ है, ‘योगिभिध्य्यानगम्यम्’, योग से, जिन्हें ध्यान में जाना गया है, उसका यह वर्णन है, मैंने जाना हुआ नहीं है। प्रत्येक देवता के संबंध में, ‘ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो’, ध्यान में जा कर जो उसे देखता है, उस देवता का मैं वर्णन करता हूँ’ इस प्रकार से प्रत्येक स्थान पर हमें इशारा दिया गया है, पर होता क्या है कि हम इशारे पर ही रुक जाते हैं। अब दुसरी तरह के जो धर्म शुरू हुये, मतलब ईसाई धर्म कहिये या मुसलमानों का धर्म कहिये, उसमें उन्होंने बताया है कि देखिये, फूलों की बातें करने से शहद नहीं मिलता। हम शहद की बातें करेंगे। उन्होंने बताया, कि परमात्मा जो है वो निराकार है, साकार नहीं है । तो आप निराकार में जाईये । पर आप निराकार में कैसे जाएंगे? वे भी सारी बातें ही हो गयी| देखिये, फूलों की बातें कीजिये, या शहद की बातें याने बातें ही होती हैं। केवल बातों से परमात्मा को जाना नही जा सकता। इस से हुआ क्या है कि गाड़ी के पीछे घोडों को बाँधकर जोत दिया है और हम लोग गाड़ी को आगे चलाने बैठे हैं। और इस पर कहना कि, ‘धर्म की गाड़ी क्यों नहीं चलती?’ धर्म हमारे अन्दर, अंतरतम में है यह भी सभी ने बताया है। पर होता क्या है कि कितना भी बताया तो भी वह बताया हआ रहने के 19

Hindi Translation (Marathi Talk) कारण केवल बताने पर ही रह जाता है (कृति में नहीं)। कुछ दिन पहले मैं सिक्खों के एक गुरुद्वारे में गयी थी। तो उन्होंने वहाँ गाना शुरू कर दिया, ‘काहे रे बन खोजन जायी। सदा निवासी सा आलेपा तो ही संग समायी। पुष्प मध्य जा बांस बसत है, मुकुर माँ ही जब छायी। तैसे ही हरि बसे निरन्तर घट ही खोजो भाई ।’ अब गाते हुए बैठे हैं, ‘घट ही खोजो, घट ही खोजो।’ मैंने उनसे कहा, ‘क्या गा रहे हो? अगर आपको दवाई लेना है, औ बैद्यराज ने आपको दवाई दी और बताया कि थोड़ी सी सौंठ और चीनी मिलाकार खा लीजिये, तब आपको ठीक लगेगा। घर आकर आप लगातार कहते रहेंगे, ‘मैं सौंठ-चीनी लेता हँ, मैं सौंठ चीनी -लेता हूँ।’ ऐसा कहने से क्या दवाई बनने वाली है? हमारा तो ऐसा चल रहा है कि जो करना है वह हम करते नहीं, उसके बारे में केवल बातें करते हैं, बोलते रहते हैं। इसीलिये मैं कहती हॅठ कि हमने ध्यान में जाना चाहिये। पर ध्यान में कैसे जाना है यह बात तो कोई भी नहीं बताता। बोलने वाले बहुत सारे लोग हमें ऐसे मिलेंगे कि हमने प्रेम करना चाहिये, सारी दुनिया से प्रेम करना चाहिये। अजी, प्रेम कैसे करना आप सिखाते हैं | क्या? क्या आप इलेक्ट्रिसिटी का प्रेम कर सकते हैं? प्राकृतिक रूप से प्रेम हमारे अन्दर है और उसका अनुभव हमें अचानक इस प्रकार से होता है। हमें अपने बच्चों से प्यार लगता है, अपने पिता के लिये लगता है, पत्नी के लिये लगता है, पुरुष से लगता है। यह जो प्रेम है वह अकस्मात् आता है। सिखाने से किसी को प्रेम करना नहीं आता। तब तो धर्म भी हमें पढ़ा कर, सिखा कर नहीं आता। वह जन्म से ही हमारे अन्दर है। उसको जानना पड़ता है। अब कैसे जानना है? उस परमात्मा को कैसे जानना है, यह बताईये। कैसे करना है आत्मसाक्षात्कार? बहुत सारे लोग बताते हैं, ‘हाँ, हो सकता है। आप ऐसा कीजिये कि आप सिर के बल खड़े हो जाईये और रोज पच्चीस मिनट भगवान का नाम लीजिये।’ भी होने वाला नहीं है। यह सरासर झूठ है। आप केसरिया वस्त्र पहन कर नाचिये, कुछ कूदिये, उससे भगवान मिलेंगे।’ अगर वह इतना सरल-सुलग होता तो दो रूपयों में साड़ी रंगवा लेना और नाचना शुरू हो जाये, हो गया, भगवान मिल गये। तीसरा कोई बतायेगा, ‘नहीं, वैसा होने वाला नहीं है, आप मंदिर में जाईये नाम लेते बैठिये।’ अजी, नाम के बारे में तो ऐसा है, तुलसीदास जी जैसे बड़े संत आदमी, उन्होंने इतना बड़ा रामायण लिखा, हमेशा नाम लेते थे। रघुवीर श्रीराम स्वयं उनके पास तीन बार आये और तुलसीदासजी ने उन्हें तिलक लगाया, चंदन का तिलक, फिर भी पहचाना नहीं। अपने वे ‘हरे राम हरे कृष्ण’ वाले, मुंबई में मेंरे पास आये। उन्होंने मुझ से कहा, ‘माताजी, आप भगवान का नाम नहीं लेती ?’ मैंने कहा, ‘अरे, नाम लेने जैसा आपने तो भी कुछ जान लिया है क्या?’ किसका नाम ले रहे हैं 6. आप? कल मेरे दरवाजे पर आकर माताजी, माताजी कहेंगे और परसों रास्ते में भी मुलाकात होगी तो पहचानोगे मुझे? मैं कौन हूँ? यह तुम असल में पहचानने वाले हो क्या ? मैं कहती हूँ, ‘अंदर आईये, पहले उसे लाईये। एक बार भी नाम लेना मुश्किल हो जायेगा।’ फिर वे कहने लगे, ‘हम सबने संन्यास लिया, इतना बड़ा त्याग किया हमने। यह कर के, वह कर के, हम जंगल में गये। हम वहाँ फलानी चीज़ करते हैं, फलानी-वलानी चीज़़ करते हैं। आप घर में बैठी हैं। बच्चे, पोते-नाती सब कुछ हैं। आप यह कैसे करती हैं ?’ मैंने कहा, ‘बाबा, मैं आप लोगों को इतनी बात बताती हूँ, आपको मेरा चैलेंज है, मेरे घर का कुछ भी सामान, कुछ भी चीज़ उस परमात्मा की चरणों की धूलि के समान तो क्या? पर धूलि के छोटे से कण के समान भी होगी तो आप उठाकर ले जाईये।’ वे तैयार हो 20

Hindi Translation (Marathi Talk) गये। इधर-उधर देखने लगे। मैंने कहा, ‘कुछ भी, आपको जो लगेगा वह उठा कर ले जाईये ।’ उन्होंने कहा, ‘उसके समान कुछ भी नहीं।’ मैंने कहा, ‘उसके समान अगर कुछ भी नहीं, तो आपने क्या छोड़ा है और क्या पकड़ कर रखा है?’ अजी, हमने कुछ पकड़ा ही नहीं तो किस चीज़ को छोड़ देंगे ? अब कल यह सागर हमारे सामने है और हमने अपने मन में ही तय कर लिया कि हमने इस सागर को पकड़ कर रखा है और हमारे नाम पर है, तो यह तो मूर्खता ही है ना? और बाद में कहते हैं कि हमने यह पकड़ा है और अब छोड़ दिया है। हमने पकड़ा नहीं और भला कौन पकड़ सकता है? मरने के बाद चाबियों के साथ सब कुछ यहीं रह जाता है, यह आपके ध्यान में नहीं है। कौन पकड़ता है और कौन छोड़ता है? ऐसी मूर्खता से अगर भगवान् मिल जाते हैं तो कहना पड़ेगा कि भगवान् भी मूर्ख हैं! अजी, भगवान् कितने शक्तिमान है, कितनी बड़ी शक्ति है उनकी ! अत्यधिक प्रचंड शक्तिवाला एक लौहचुंबक अगर किसी जगह पर है और हमने वहाँ जा कर कम शक्तिवाला लौहचुंबक ले कर उनके सामने कूद लिया, नाच लिया या फिर सिर के बल खड़े हो गये और इतना सब करने पर अगर वह आपके पास आता है तो आप कीजिये, पर क्या यह संभव है? केवल हमारे पास जो छोटी सी शक्ति है उसे केवल यूँ करके छोड़ दिया तो शीघ्रता से वह उसे खींच लेता हैं। भगवान् तो वहाँ खिंचने के लिये ही बैठे हैं। उनकी इतनी शक्ति इसीलिये हैं कि उन्हें आपको अपने अंदर खिंचना है। पर उनकी ऐसी इच्छा है कि आपकी इच्छा में यह होना चाहिये। आपकी इच्छा होनी चाहिये। जब तक आपकी इच्छा नहीं, तब तक वे आप पर जबर्दस्ती नहीं करेंगे। मनुष्य को उन्होंने अपने गौरव में खड़ा कर दिया है। सब इज्जत उन्हीं की है, उनकी ही सब स्वतंत्रता है। आजकल मुंबई में ढ़ेर सारे लोग हिप्नॉसिस इत्यादि करते हैं। इसका मतलब वे मोहिनी विद्या का उपयोग करते हैं। लोगों पर मोहिनी डाल कर पागलों जैसे उनको नचवाना, कुदवाना, क्या कैसे तरीके हैं। वे लोग हजारों रूपयों को खाते बैठ रहे हैं और उनके पास जाने वाले लोगों को यह बात अच्छी लगती है। लोगों को स्वतंत्रता नहीं चाहिये, आत्मगौरव नहीं चाहिये । आप स्वयं याने क्या हो? कितनी बड़ी बात है उस में! अभी-अभी प्रधानसाब ने बताया किसी एक भीक माँगने वाली के बारे में। कभी-कभी लोग भिखारी होते हैं, जान बूझ कर भिकारी होते हैं, यह हम नहीं जानते। मान लीजिये कि किसी एक जनम में कोई एक बड़ी महारानी है, पर उसे अपने पति से अर्थात् राजा से बहुत तकलीफ होती है। घर में यह परेशानी और रानी होने का बोझ अगर उसे बहुत ही हुआ होगा तो वह कह सकती है कि, ‘प्रभु, अगले जनम में आप मुझे एक भिखारिन बनाईये, पर रानी नहीं करना।’ तो उसका जन्म भिखारिन का ही होगा, पर अंदर से तो वह रानी है। उसके मिज़ाज तो रानी के ही रहेंगे। आपने बहत सारे धनवान लोग देखे होंगे, वे इतने गरीब होते हैं, केवल भिखारी! पर कोई गरीब लोग भी धनवान होते हैं, अंदर से ! तो आपने परमात्मा को जानने के लिये परमात्मा स्वयं प्रयास कर रहे हैं। परमात्मा स्वयं आपके लिये सारी तैयारी करते हैं। आपको बार-बार जन्म दे कर, आपकी पसंद की चीज़ों को कम करते -करते परमात्मा आपको वहाँ ला कर पहुँचाते हैं, जहाँ आपको धर्म दिखाई देता है। मतलब कोई मनुष्य बिल्कुल कर्मनिष्ठ ब्राह्मण है। ‘मेरे मन में सब मुसलमानों के लिये या म्लेंच्छों के लिये द्वेष है,’ ऐसा सोच कर कोई ब्राह्मण आज खड़ा हो गया , आपको आश्चर्य लगेगा, अगले जनम में वह पक्का मुसलमान बनेगा। मैं आपको बताती हँ कर्मनिष्ठता करने वाले तो 21

Hindi Translation (Marathi Talk) इतने सारे लोग देखे हैं। मैं तेहरान गयी थी। तेहरान में लोगों को ध्यान करने के लिये बिठाया। वे मुसलमान घंटी बजा रहे हैं, आरती उतार रहे हैं। इधर हम मुंबई में हमारे ब्राह्मणों को देखते हैं, तो वे वहाँ नमाज पढ़ते हैं! क्या पागलपन है। एक अतिशयिता पर जाते हैं और फिर दूसरी अतिशयिता पर जाते हैं! इसको छूना नहीं, उसको छूना नहीं, अगले जनम में आप हरिजन के रूप में ही जनम लेंगे! क्या आपका आपके जन्म पर अधिकार है? पर अगर आपने किसी का द्वेष किया, तो कल दुनिया भी आपका द्वेष करेगी । मैंने जैसा कहा वैसा ही मेरे पास लौट कर आने वाला है। जो आदमी इस अतिशयिता से बाहर निकल पड़ा है, उसके लिये मेरा सहजयोग बहुत ही सहज है। अगर आपको बताया कि इस बीज में से अंकुल निकाल कर दिखाईये । क्या कोई हमें अंकुर निकाल कर दिखा सकते हैं? हम एक भी बीज से अंकुर उत्पन्न नहीं कर सकते और क्या तेवर है आदमी के! अरे, एक मकान बनाया, तो उसमें क्या है? इंटे भी मरी हुई और मकान भी मरा हुआ! क्या उसमें सजीवता है? क्या हम एक भी जिवंत, सजीव काम इस दुनिया में कर सकते हैं? क्या आदमी के मिजाज और शान चढ़ गयी है अपने ही लिये ! वह खुद को क्या समझता है? हम कुछ भी करते नहीं। कहने लायक बात यह है कि जो कुछ हम कर रहे हैं, उसके बारे में हमें ऐसा लगता है कि हम कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि हम कुछ भी नहीं करते। ‘सब ‘वह’ कुछ परमात्मा ही करता है’ इस बात की भावना, अनुभूति हमें जब तक नहीं होगी और हम में दृढ़ नहीं होगी तब तक उस शक्ति का अनुभव आपको नहीं मिलेगा। कृपया किसी अंधे आदमी के समान आप मुझ पर विश्वास मत रखिये । अंधविश्वास से परमात्मा को पाना असंभव है। जैसा कि समझिये, इस कमरे के अंदर आप बाहर से आये। अंदर अंधेरा है। मैं इस कमरे की मालकिन हँ। मुझे इस कमरे के दरवाजे, खिड़कियाँ आदि सब मालूम है। आपके आते ही मैं कहूँगी, ‘यहाँ बैठिये। आपके लिये यहाँ दरी बिछाकर रखी है। यहाँ दिया है। उधर लाईट का बटन है। आप उसको धीरे-धीरे देखेंगे। आपकी समझ में आ जायेगा। अगर है तो विश्वास कीजिये, अन्यथा बिल्कुल ही विश्वास नहीं करना। इसीलिये कभी-कभी आस्तिक से नास्तिक अच्छा होता है। इसका मतलब यह नहीं कि आस्तिक खराब होते हैं। मेरा ऐसा कहना है कि किसी चीज़ से चिपका हुआ मनुष्य बहुत मुश्किल से इस समंदर में उतर सकता है। अगर आपको समंदर में उतरना है तो अपने ऊपर जो कुछ है, उसे छोड़ना ही पड़ेगा। इस सभामंडप में आने के लिये जो सीढ़ियाँ हैं, उन्हें तो आपको छोड़ना ही पड़ेगा। इसका मतलब यह तो नहीं कि सीढ़ियाँ खराब हैं? अगर आपने सीढ़ियों को नहीं छोड़ा तो आप अंदर कैसे आयेंगे? फिर दूसरा सवाल यह आता है, ‘माताजी, ऐसे कैसे हो सकता है? पहले एक-दो ही लोगों को आत्मसाक्षात्कार होता था। अब आप कहती हैं कि हजारों लोग, आत्मसाक्षात्कार पाते हैं? यह कैसे संभव है? मैं पूछती हूँ, ‘क्यों संभव नहीं?’ पहले किसी पेड़ को एक-दो फूल आते थे, अब हजारों फूलों से वृक्ष पर बहार आयी है, तो क्या हजारों फल नहीं होंगे? क्या जीवन में आपने ऐसा देखा नहीं ? जीवन में कुछ तो वृद्धि आयी होगी ही। और यह सब कलियुग में ही होने वाला है। अन्यथा सत्ययुग कैसे आयेगा ? कलियुग को बदलने के लिये सत्ययुग लाने के लिये ऐसा कुछ विशेष कार्य होना ही चाहिये। अगर नहीं हुआ , तो सत्ययुग का आना संभव ही नहीं। अब तो एक ऐसे स्थान पर जा कर मनुष्य खड़ा है कि वह वहाँ तो अच्छाई में जायेगा या तो फिर बुराई में । 22

Hindi Translation (Marathi Talk) अगर मनुष्यों ने इस बार ऐसा निश्चय किया नहीं कि हमें सत्ययुग लाना ही है तो पूरा संसार नष्ट हो जायेगा इस बारे में कोई भी शक नहीं। पर हमारे मस्तक के अंदर जो पुरानी चीजें पक्की बैठी है, उसको थोड़ा खाली करना चाहिये । इसका कारण ऐसा है कि बहुत सारे लोगों ने कोई और आये थे इ.इ.। हाँ जी, आये होंगे। उन्होंने आपको कहीं कुछ दिया क्या? आपको आनंद दिया है क्या ? आपको शांति दी है क्या? प्रेम क्या है यह आपको बताया क्या ? प्रेम तो हाथों से बहना चाहिये, बहुत कुछ पढ़ा है। हमने बहुत सारे गुरुओं को देखा, साधु आये थे। वे खट्…खट्…खट् हाथ से ऐसे निकल जाता है। हमारे ये शिष्य जो वहाँ बैठे हैं। कहते हैं कि, ‘मैं लोगों को ठीकवीक नहीं करता क्योंकि समय की कमी है। मेरी इच्छा है डॉक्टर्स को बनाने की। बहत ज़्यादा चिकित्सा करने वाला व्यक्ति अगर फालतु चीज़ों से चिपक बैठा, तो उसे समंदर में ढ़केलना भी कैसे? जिसे समंदर में जाना है, उसने तो किनारा अवश्य छोड़ना ही है। अब तक के केवल किनारे पर घूमते रहे, यहीं सच है। अन्यथा कोई आनंद देख लेता, किससे प्रेम बहता । कहीं तो भी शांति का उद्गम होता। पर मुझे कहीं भी कुछ भी दिखा नहीं। मैंने इतने सारे साधु-संन्यासी देखे हैं, उनमें से किसी एक में भी वह चीज़ नहीं देखी जो आज हमारे इन लोगों में है और आप लोगों में भी आ जायेगी। उस दिन मैं वसई गयी थी| सौ लोग पार हो गये। आपको आश्चर्य लगेगा। और वह घटना इतनी आश्चर्यजनक है! कितना अद्भुत है वह! लोगों को लगेगा कि यह संभव नहीं, पर है। कहने की बात यह है कि बचपन से मेरा जन्म ही ऐसी स्थिति में हुआ था कि मेरे पास जो चेतना थी और जन्मजन्मांतर में मेरे पास यह चेतना रही। पर इस जनम में जब तक मैं लोगों को यह नहीं दंगी जो कि कायम ही मेरे साथ जन्म लेती है, तो केवल भाषण देने से नहीं चलेगा । लोगों को केवल यह बताकर कि, ‘आप प्रेम कीजिये, आप अच्छे लोग बनिये। इससे कुछ नहीं होगा। ऐसे बताने वाले बहुत सारे आ कर गये भी। पुस्तक लिखने वाले बहुत ही आकर गये। पर हुआ क्या ‘यह करो, वह करो’ और बस! व्यवस्था कुछ ऐसी होनी चाहिये। मैंने इन लोगों को कहीं तो भी, कैसे तो भी, पाँचवी मंजिल तक लाकर रख दिया है। लोगों को लगेगा कि श्रीमाताजी ने हमें कुछ सिखाया है। और जो कुछ दिख रहा है, उसके उस पार भी और कुछ है। जब उसे लोग देख पायेंगे, उस पार का भी वे देखने लग जायेंगे, तभी उनहें लगेगा कि हाँ, तो भी कुछ है। अन्यथा भगवान् की सब बातें झूठी हैं। अब हम लोगों में देखिये युवा लोग कितने कम हैं, बहुत ही कम है युवा लोग! मैं बड़ोदा गयी थी, वहाँ युनिवर्सिटी में मेरा भाषण आयोजित किया गया था । हमारे सब लोगों ने कहा, जाने नहीं देंगे, श्रीमाताजी।’ क्योंकि आते जाते केवल यही धंधे , किसी की प्रेतयात्रा निकालो, किसी को मार दो| ‘हम क्यों हमारे युवा वर्ग की ऐसी स्थिति है? इसका कारण हम हैं। धर्म के नाम पर इतना सारा पैसा खर्च किया, इतनी दौड़ धूप की! वे जानते हैं कि इन लोगों ने महामूर्खों को पाल कर रखा है। तो हम क्यों इस महामूर्खता की झंझट में पड़े? हमने कुछ तो भी दूसरी चीज़ करनी चाहिये, और इसीलिये उन्होंने मारधाड़ का काम शुरु किया । इस प्रकार से हमारे युवाओं की स्थिति ऐसी है। पर अमरिका के युवाओं की स्थिति ऐसी नहीं है। अमरिका के | युवाओं को यह बात समझ में आ गयी है कि उनके पास आईन्स्टाईन इ. है पर उन्होंने धर्म को नहीं पाया है। तो वे किसलिये क्रोधित होंगे? वे नहीं जानते कि उनमें कितने सारे दोष हैं। और यह भी नहीं जानते कि धर्म नाम की चीज़ क्या होती है। इसीलिये उन्होंने कहा, ‘छोड़ दो इन सब चीज़ों को। हमें ना माँ चाहिये, ना बाप! हम समूह बना कर 23

Hindi Translation (Marathi Talk) रहेंगे और जैसा हम चाहते हैं वैसा जी लेंगे। हमें न पैसा चाहिये, न और कुछ! ये सब धंधे पैसों से ही होते हैं।’ और सब कुछ छोड़ कर निकल पड़े! इससे किसको फायदा होने वाला है? हमने कितना भी सोचा तो भी हम या तो इस चीज़ को पकड़ेंगे या तो उस चीज़ को। हम जमीन पर खड़े हैं। उस समय तो कुछ भी छोड़ना नहीं है। कहीं भी हो, आदमी मज़े में खड़ा होता है। हमारे अंदर ही परमात्मा ने इसकी बहुत सुंदर व्यवस्था कर रखी है। हमारी साक्षात माँ हमारे पेट के अंदर है। हमें जन्म देने के लिये ही वह लगातार वहाँ बैठी रहती है कि हमें पुनर्जन्म दे कर हमें उस राज्य में ले जाने वाली है। कि जहाँ से आप कुछ दूसरे ही बन जाएंगे। वह साक्षात् आपके अन्दर बैठी है। परंतु लोगों को | में इसकी कल्पना नहीं है। हमारी नज़र है कहाँ? आज कल तो पैसा कितना मिलता है इस पर ही! या तो चुनाव खड़े होकर देखेंगे या तो लोगों की थोड़ी बहुत सेवा कर लेंगे। इसके उस पार हम जा ही नहीं सकते। और वैसे भी हम जा नहीं सकते। प्रयास करने पर भी हम धर्म में उतर नहीं सकते। जैसे घोड़े पर सवार है। इस तरीके से इसको बचाओ, उसको बचा कर रखो, इस समय को बचा कर रखो, उस समय को बचा कर रखो! किसी चीज़ के लिये समय बचा कर रख रहे हैं आप? अजी, हमें कहाँ समाधान कहाँ है, इसी बात को देखना है। सचमुच यह मनोवृत्ति परमात्मा ने ही हमें दी है। घड़ी भी भगवान् की ही दी हुई है। बाहर जो सब कुछ है, वह अन्दर से ही आया हुआ है। सो घड़ी भी इसीलिये दी है कि आप समय की बचत करे। अगर मनुष्य को थोड़ासा भी खाली समय मिला, तो वह घबरा जाता है। फिर जाता है कहीं सिनेमा विनेमा देखने के लिये| थोड़ासा भी समय अकेला बैठ कर व्यतित नहीं कर सकता। अगर पाँच मिनट के लिये अकेला बैठने के लिये कहा तो वह स्वयं अपने से मिल नहीं सकता। भाग जाता है वहाँ से। क्योंकि उसे इस बात का एहसास है कि वह स्वयं गंदा है। वास्तव में हम सब स्वयं इतने सुंदर हैं। मुझ से अगर कहा गया, ‘तीन महीने आप इस कमरे में बैठिये,’ तो मैं बहुत खुशी से वहाँ बैठूंगी। मुझे उसके लिये कुछ भी तकलीफ नहीं होगी। इसलिये नहीं कि मैं सुंदर हूँ पर इसलिये कि आप कितने सुंदर हैं इस चीज़ को मैं यहाँ बैठकर देख सकती हूँ। आपको कल्पना ही नहीं कि कितनी सुंदरता है। अब आज के सहजयोग को सरल भाषा में आपने ऐसे समझ लेना चाहिये। बात यह है कि कुंडलिनी के शास्त्र पर बहुत सारी पुस्तकें लिखी गयी हैं। उनमें से कितने सारे लोगों को यह कहना है कि कुंडलिनी बिगड़ती है। अगर किसी ने कुंडलिनी उठायी तो तकलीफ होती है, यह होता है, वह होता है। लोग तो बहुत सारे तरह की बातें कहते हैं। सच बात तो यह है कि जो लोग कुंडलिनी उठाते हैं वे ऐसा समझते है कि यह एक यांत्रिक चीज़ है। मेकॅनिकल बात है। या तो फिर उस पर सेक्स जैसा गंदा आरोप करते हैं। कुंडलिनी आपकी माँ है। माँ आपने किये हुए सब खून माफ कर सकती है। अगर आपने उसे भार भी दिया तो उसकी जबान से एक अक्षर भी नहीं निकलेगा। पर अगर आपने उस पर सेक्स का आरोप किया तो क्या वह चिढ़ नहीं जायेगी? जो लोग ऐसा कहते हैं कि कुंडलिनी क्रोधित हो जाती है वे इस प्रकार के गंदे इल्जाम उस पर लगाते हैं। वास्तव में अगर ऐसा कोई व्यक्ति है जिस में परमात्मा का प्रेम बह रहा है तो जिस प्रकार हम झाड़ को पानी देते हैं; वैसा पानी देते हैं, तो बिल्कुल सहजता से जैसे फूल से फल बन जाता है, वैसे आप भी फल बन जाते हैं। पर पानी तो देना ही पड़ता है ना? अगर आपने उस पर मिट्टी का तेल डाल दिया तो ? पानी जीवन है। मिट्टी का तेल मरी हुई चीज़ है। मृत चीज़ों से कुंडलिनी जागृत नहीं हो सकती। अब सरल शब्दों में कुंडलिनी का अर्थ समझ लीजिये। यह मेरे सामने जो माइक है ना, जिस के द्वारा मैं बोल 24

Hindi Translation (Marathi Talk) रही हूँ, उसे हमने पहले तैयार कर के रखा है। बिल्कुल ठीकठाक! देवताओं ने भी मनुष्य को ऐसे ही सिद्ध कर के रखा है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह शिक्षित हो या अशिक्षित, हिंदुस्तान का हो या इंग्लैंड का या फिर अमरीका का, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह माइक मशीन जिस सुंदरता से बनाया गया है वैसे ही परमात्मा ने मनुष्य को बना कर उसके अंदर जो कनेक्शन है, उसे लगाकर रखा है। अब यह कनेक्शन परमात्मा से जोड़ना इतना कार्य याने सहजयोग है। बिल्कुल सीधीसादी बात है वह इस प्रकार है। उसका बहुत शास्त्र है। उस पर पुस्तक भी निकल रही है। अगर किस की इच्छा हो, तो वह पढ़ सकता है। अब तक मैंने पुस्तक लिखने का काम हाथ में नहीं लिया था क्योंकि पुस्तक लिखी कि बाइबल को लेते हैं वैसे हाथ में लेकर बैठ गये। इसमें यह लिखा है, उसमें वह मंत्र है और फिर बैठे हैं मंत्र को याद करते हुए। इसलिये पुस्तक लिखने में भी मुझे हिचकिचाहट लगती है । भाषण के बारे में भी वही बात है। भाषण सुनने वाले में भी बहत सारे लोग ऐसे हैं कि उसमें से इतना ही पकड़ कर रखते हैं जिससे कि हम किसी चीज़ से अटक कर नहीं रहे , बाहर रहे । मैं तो कहती हूँ कि भूल जाईये मेरा भाषण भी। सब कुछ भूल जाईये। जैसे आप सीढ़ियाँ चढ़ कर आये और अंदर आ गये, वैसे ही सब भुल जाना है। मंत्र नहीं बोलने का, गुरु नहीं कहने का, जाप नहीं करने का। ये सब कोई विचार हैं। दो विचारों के बीच में एक छोटीसी जगह रहती है। आपका यह जो पूरा ध्यान मेरी तरफ है उस ध्यान को उस छोटीसी जगह से अंदर ले जाने का है। इसलिये कोई भी विचार, चाहे वह गुरु हो, या मंत्र हो, या भगवान का नाम हो, आपके लिये वह विचार ही है। और यह एक बार होने के बाद ही गुरु अर्थवान हो जाते हैं, श्रीराम की मूर्ति अर्थपूर्ण हो जाती है, प्रत्येक वस्तु अर्थपूर्ण बन जानी है। अब मैं जिस शॉल पर बैठी हूँ उसमें भी बीमारों को ठीक किया, इसीलिये इसमें कोई अर्थ है। मेरे पैरों को धो कर जो पानी ले गये उससे बहुत सारे रोगी मेरे वाइब्रेशन्स हैं। मेरे पैरों के फोटो लेकर इन लोगों ने बहुत सारे ठीक हो गये। यह बिल्कुल सच बात है। पर मुझे उस पर कोई भी आश्चर्य नहीं लगता। आपको जरूर आश्चर्य लगता होगा क्योंकि परमात्मा की यह जो शक्ति है उसीसे इस सृष्टि की रचना की गयी है, तब यह छोटीसी बात करने में क्या विशेषता है? रोग बिल्कुल जड़ से निकाले जा सकते हैं । परंतु उसके लिये प्रत्येक व्यक्ति ने अपने अंदर की शक्ति प्राप्त कर लेनी चाहिये। पूर्ण स्वतंत्रता में प्राप्त कर लेनी चाहिये। आजकल गुरु भी ऐसे निकले है, कि एक पैसे में पचास ! जहाँ देखो वहाँ हर एक गाँव में गुरु निकल कर आये हैं। अमरिका में तो इनका भंडार ही खुल गया है। वहाँ जा कर ये क्या करते हैं? तो मोहिनी विद्या के अस्त्र आप पर डाल देते हैं और आपके पास जितने सारे पैसे होंगे उसको माँग कर हड़प लेना और उस पर चैन से जिंदगी काटना! मैं आपसे पूछती हूँ कि परमात्मा के कार्य के लिये पैसों की क्या जरूरत है? यह तो बिल्कुल सरल बात है। परमात्मा का कार्य तो मूल्य के बिना ही होना चाहिये । इस दुनिया में जो कुछ महत्वपूर्ण है, वह तो विनामूल्य ही होता है। हमारी सांसे जो चलती हैं, हमारा हृदय जो चलता है, वह कैसे चलता है? डॉक्टरों से पूछिये। वे कहेंगे, सब कुछ स्वयंचालित है। तो फिर यह ‘स्वयं’ है कौन ? बताईये वह ‘स्वयं’ कौन है जो इस सबको चलाता है और वह भी कितनी सहजता से! यह महत्त्त्वपूर्ण कार्य भी इसी प्रकार होना चाहिये। अगर यह मुश्किल है तो नहीं होने वाला! हम यहाँ से भोजन कर सकते हैं, पर यहाँ से जा कर हाथ पैर तोड़ कर अगर भोजन किया, तब तो खाना खाया, अन्यथा नहीं, इतनी सहजता से हमने कैसे खाना खाया? इस प्रकार से विचार करने की बात है! मैं माँ का 25

Hindi Translation (Marathi Talk) एक उदाहरण देती हूँ। ‘मैंने तुम लोगों के लिये खाना बनाया है। भूख लगी है क्या? थाली तैयार है। अगर भूख होगी, तो सीधे से बैठ जाओ। अन्यथा क्या आप कहते रहो, ‘माँ, आप कहाँ गयी थी? कहाँ से लाया है आपने? यह सब कुछ। और कैसे बनाया है आपने ?’ कल के अगर मैंने आपको एक रेडिओ उपहार में दिया, तो तत्काल आप उसको उठा कर ठीक तरह से देखेंगे और सुनेंगे? या फिर आप उस रेडिओ का इंजिनिअरिंग पहले देखेंगे और कहेंगे, ‘पहले हमें इसका इंजिनिअरिंग बताईये, अन्यथा हम रेडिओ नहीं सुनेंगे। अगर रोजमर्रा की जिंदगी है तो मनुष्य यह तर्कवितर्क नहीं करेगा । मान लीजिये कि मैंने कल यह कह दिया, ‘यहाँ एक हीरा है।’ अगर दिल्ली में यह बात अनाऊन्स हो गयी , तो लोग दिल्ली से प्लेन लेकर यहाँ आयेंगे उस हीरे को देखने ! हीरा ऐसा ही बिलकुल तैयार है। जरा ले कर तो देखिये, बाद में देखेंगे क्या कुछ होता है! पर धर्म के बारे में आदमी बिलकुल उलटा ही चलता है। बिना पैसे के आप इतना सारा कैसे देती है? क्या वह इतना सरल, सहज है ? यह तो उल्टी बात हुई। अभी अभी बताया है कि जो कुछ महत्त्वपूर्ण होता है, वह बिल्कुल सहज, सरल होता ही है। कितने सारे लोगों ने मुझे अमरीका में बताया, ‘श्रीमाताजी, हर एक व्यक्ति हमसे डेढ़ सौ से तीन सौ डॉलर तक लेता है। और आप यहाँ एक पैसा भी नहीं लेती, यह क्या है?’ मैंने कहा, ‘देखिये, आप बताईये कि उसकी कीमत कितनी लगानी है। मेरी तो समझ में ही नहीं आता उसकी कीमत क्या है! आप ही लगाईये उसकी कीमत!’ और कहा कि ये सब ऊटपटांग लोग है। आपको मूर्ख बनाने यहाँ आये हैं। और आप मूर्खों जैसे उन्हें पैसा | देते हैं! क्या मिला आपको? आप के शरीर पर ठीकठाक गेरूयें वस्त्र पहनायें, अपनी मालायें डाल दी और अब घूम रहे हैं कुद का इश्तिहार करते हुए! और आप भी खुश हो जाते हैं कि आप भगवान के लिये कितना सारा करते है। दस साल के बाद आप जब पागल हो जाएंगे तो मेरे पास दौड़ते आयेंगे। हुए इसमें बताने की बात यह है कि ये प्रकार परलोक विद्या से होते हैं। ये जितने सारे बाबाजी हैं वे सब परलोक | विद्या ही करते हैं। आपके ऊपर भूतों का स्थान बना कर उस भूत से सारे कार्य करवा लेते हैं। आपका पैसा निकाल लेंगे। आपके बाल-बच्चों को बरबाद कर देंगे, आपको रास्ते पर लाकर खड़ा कर देंगे और फिर आपनी पोटली बाँध कर निकल पड़े अमरिका की ओर। अपना सारा थाली लोटा समेट कर वहाँ बैठे कितने सारे गुनहगार हुए आज वहाँ अमरिका में हैं। लोगों की आँखों में धूल झोकने की कला वे जानते हैं। आपको आश्चर्य लगेगा कि इस कलियुग में आज पाँच राक्षस और पाँच राक्षसियों ने जन्म लिया है । और अपना अपना रंग दिखा रहे हैं। स्वयं को रावण नहीं कहेंगे, तो देव, भगवान आदि कहलवा लेंगे। आप नहीं पहचान पायेंगे उनको! उनमें मायाजाल है। आपने मायावी राक्षसों के बारे में सुना ही होगा। उन सब राक्षसों ने अभी जन्म लिया है। और हम ‘बाबाजी आ गये, बाबाजी आ गये और हम को दो सौ रूपये निकाल के दिया!’ ऐसा कहते हुये मूर्खों जैसे उनके पीछे दौड़ते हैं! अरे, दो सौ रूपया तुमने काहे को दिया? तुम तो करोड़पति हो ! किसी गरीब को दो ना !’ सब धनवानों के गले में हीरों की मालायें डाल दी गयी हैं। उनके पास हीरों की क्या कमी है? अगर देना ही है, तो गरीबों को दो। एक बार मेरे एक रिश्तेदार आयें और मुझसे कहा, ‘मुझे बाबाजी ने हीरे की अंगूठी दी है। खूब धनवान है।’ मैंने उनसे पूछा, ‘आपके पास कितनी अंगूठियाँ हैं?’ ‘होगी दस बारह।’ मैंने कहा, ‘तो ये और तेरहवी काहे को ले ली भाई?’ कहे, नहीं, वो मेरी भक्ति को देख के दिया।’ मैंने कहा, ‘अरे, भक्ति क्या बाजार में मिलती है क्या? पागल हो कि रूपये 26

Hindi Translation (Marathi Talk) देकर बाजार में खरीदो।’ उन्होंने कहा, ‘ऐसे कुछ ज़्यादा रूपये नहीं दिये। मैंने कुछ पाँच छः हजार रूपये दिये। मन में आया कुछ तो रूपया देना चाहिये, अंगुठी दे दी।’ उन्होंने उस अंगुठी में भूत को बिठा दिया है। ये महाशय इधर अंगूठी घुमाते हैं और वह भूत सब कुछ बता देता है उधर ! यह परलोक विद्या है और सारे के सारे राक्षस कलियुग में आये हैं और इधर मैं यहाँ प्रेम की बातें बता रहा हूँ लोगों को! और कहती हैं कि ‘सहजयोग में आईये! अपना ही दीप अपने अन्दर जलाईये तो सारा अंधेरा चला जायेगा। इस अंधेरे को मार कर चिल्लाने पर वह नहीं जाने वाला! यह अंधेरा तो हमारे दीप से जाने वाला है। आपमें प्रत्येक में इतना प्रखर दीप है कि वह इन सबको जला कर, आँच लगा कर समाप्त कर देगा और वह दीप प्रेम का है। प्रेम की एक विशेषता है। समंदर की एक ढ़ाल होती है और समुद्र कितना भी बढ़ता जाये, वह ढाल भी बड़ी होती रहती है। प्रेम भी इसी प्रकार से बढ़ कर बड़ा हो जाता है। प्रेम का दर्पण सर्वत्र ऐसे संबंधों में सबसे ऊपर है। इस दर्पण में सारा जगत् अंदर है। अगर वह मंत्र आपके अंदर में बहना शुरू हो गया तो सब कोई अपना लोटा- थाली, बिस्तर समेट कर भाग जाएंगे। ऐसे लोग इस संसार से ही चले जाने चाहिये। मैं तो इतना भी कहँगी कि यदि श्रीकृष्ण आये तो वे कंस को मार डालेंगे । कंस मरने पर भी बार-बार जन्म लेगा। श्रीराम आये तो रावण के शरीर को केवल मारते हैं। और रावण फिर से जन्म लेता है। उससे तो अच्छा यह है कि ऐसी परिस्थिति आ गयी है कि उसका परिवर्तन अगले जन्म में तो साध्य कर सकेंगे। अपने इस धूलिया में यह कैसे होगा यह देखते है। मैंने इस नगर की पुण्यता के बारे में बहुत कुछ सुना है। श्रीव्यास का स्थान भी कहीं आसपास है। यहाँ के वातावरण में ऐसे तरंग हैं। मुझे अंदर से एहसास हो रहा है। कार्य हो सकता है। पर एक दो चीज़ों के बारे में मैं आपसे कहती हूँ कि आप जिद मत कीजिये। अगर बच्चा जिद करता है, तो माँ के लिये बहुत परेशानी होती है। कितना समझाया, कितनी बार समझाया, पर बच्चे हठ करते ही हैं। अब बहुतहो गयी यह ज़िद और हठ। हम आये हैं तो ले लीजिये। अगर द्वार पर गंगा आयी तब आपने ग्रहण नहीं किया, तो कब करेंगे? पर अगर आपकी गागर पूरी तरह से लबालब भरी है, तो गंगा भी क्या कर सकती है? अगर सूरज आपके द्वार पर आया और आपने द्वार खोला ही नहीं तो दोष सूर्य का नहीं। परसों कोई महाशय आये और कहने लगे, ‘श्रीमाताजी, देखिये , मेरी लड़की उसको ठीक किया तो हम आपको मान जाएंगे।’ मैंने कहा, ‘मैं किसी को ठीक नहीं करती।’ आपको कल्पना ही बहुत बीमार है। अगर आपने नहीं है कि मैं कुछ भी नहीं करती। मैं केवल बीच में खड़ी हूँ। जैसे कि यह माईक बीच में खड़ा है और बोल रहा है। कल के यह भी कह सकता है कि, ‘मैं बोल रहा हूँ।’ मैं कुछ भी नहीं कहती। मैं बीच में खड़ी हूँ। अगर ‘उसको ठीक करना है, तो करेगा , या तो फिर नहीं करेगा । मेरा कुछ भी नहीं। मेरे उपकार भी नहीं और मुझे कुछ लेना देना नहीं। मैं तो केवल बीच में खड़ी हूँ। आखरी में एक कहानी बताती हैँ, मज़ेदार, राधा और कृष्ण की! एक बार राधाने मुरली से शिकायत की कि, ‘क्यों तुम सदैव कृष्ण के मुँह से लगी रहती हो? तुझ में ऐसी क्या विशेषता है?’ तब मुरली ने कहा, ‘अरी पगली, मेरी तो एकही विशेषता है, कि मेरी कोई भी विशेषता नहीं। मैं तो खोखली हो गयी हूँ। मुझमें तो कुछ भी नहीं बचा । अगर मैं कहीं बीच में खड़ी हो गयी, तो उसका सुर बिगड़ेगा ना?’ आपको भी वैसे ही खोखला होना है। खोखला 27

Hindi Translation (Marathi Talk) होने के बाद ही हमें समझेगा कि हमारे अंदर कितना सुंदर संगीत है! और बहुत सारी सुंदरता होने पर भी आनंदमय है। हमारे अंदर से कुछ तो भी धीमे-धीमे झरता रहता है। उस प्रवाह को केवल शुरू कर देना याने सहजयोग है। मुझे आशा है। खास कर के बच्चों को इस में जल्द फायदा हो जाता है। बच्चों को बहुत जल्दी फायदा होता है क्योंकि वे सीधे सादे, भोले-भाले जीव होते हैं। झट से पार हो जाते हैं। और पार होने के बाद मुझे कहते हैं, ‘इधर से जा रहा है और इधर से नहीं जा रहा है!’ बच्चे बिल्कुल सही बताते हैं। झट से कहना शुरू कर देते हैं। मुंबई में एक दस वर्ष का मुसलमान लड़का है, वह पार हो गया और मस्त हो गया। बिल्कुल सही बताता है। आपको आश्चर्य होगा कि किसी एक को बाधा होगी तो इसके हाथों में जलन होती है। और बाबाजी के जितने शिष्य है, उनके हाथ में भी जलन होने लगती है। बहतों के हाथों में ब्लिस्टर्स आते हैं, बड़े-बड़े फोड़े आते हैं, ये सारी शक्तियाँ हैं और काम कर रही हैं। मुंबई में मेरा एक ड्राइवर है। मैं कहती हैँ कि वह एक राजा आदमी है। और पूर्वजन्म में वह राजा ही होगा। उसने (राजा ने) देखा होगा कि ‘मेरे रथ का जो सारथि है वह मुझसे अधिक सुखी है। उसने भगवान के पास कहा, ‘भगवन, मुझे अगले जनम में सारथि बनाईये। इस राजपद से मैं थक गया हूँ, बेस्वाद हो गया हूँ।’ इसलिये वह उस जनम में सारथि बन गया पर तबियत तो राजा की ही है उसकी ! तो धनिकता किसको कहते हैं? किसी के पास सोना है तो किसी के पास चाँदी है। वह गरीब हो गया। केवल अलग-अलग प्रकार है। वास्तव में जब मनुष्य शांत हो कर जाता है, तब उसे किसी भी चीज़ की जरूरत होती ही नहीं । सब उसके पैरों के ठोकर के नीचे होता है। क्या चांदी, क्या सोना, क्या हीरे, सभी तो पत्थर हैं। महाशय क्या यह धनिकता, अमीरी है? अमीरी तो मन की होती है। अब मेरा ही उदाहरण देती हूँ। मुझे दो दिन खाना नहीं मिला तो भी चलता है। सोने के लिये पलंग नहीं होगा तो भी चलता है और हम जमीं पर भी सो लेते हैं। हम संत हैं। हमें क्या? अजी, संतों को आराम क्या होता है? आराम तो उनके चरणों के पास होता है। तो कहने की बात यह है कि छोड़ दीजिये इस अमीरी और गरीबी को और मिल लीजिये उस परमात्मा से! परमात्मा जो अंदर से ही पूरी अमीरी आपको देते हैं | इस पूरी सृष्टि में जो कुछ हुआ है, जिसे हम पैसा, धन, वैभव कहते हैं यह सब परमात्मा के पैर की उंगलियों के बराबर, यहाँ तक एक उंगली के बराबर तक नहीं। सत्ययुग आना चाहिये। सत्ययुग आने के बाद क्या कमाल होने वाली है। मैं उस युग की प्रतीक्षा में हूँ। पर पहले वह भारत में आयेगा या अमेरिका में इस पर सवाल उठता है। हिंदुस्थान के आदमी अभी तक चक्र से बाहर निकले नहीं हैं, ऐसा मुझे बहुत बार लगता है। और हमारी मुंबई की, देखते हैं। धुलिया में किस प्रकार बन सकता है, जमने पर हैं। उसकी कृपा और प्रेम निरंतर बह रहा है। हम मुंबई में ध्यान के प्रयोग करते हैं। अगर आपकी इच्छा हो तो ही ध्यान में जाना है। ध्यान में हमें केवल आँखें मूंदकर बैठना है। कुछ भी नहीं करने का। अगर हम कुछ करने के लिये निकल गये तो निश्चित रूप से हम भगवान से निकल जायेंगे| भोजन करने जिस प्रकार आराम से बैठते दूर हैं उस प्रकार से ही बैठना है। सहज वृत्ति से बैठना है। जो शक्ति मेरे अंदर से दौड़ती है वह आपके अंदर से भी दौड़ती जायेगी। आप बीमार होंगे तो ठीक हो जाएंगे। अगर आपको कोई परेशानी होगी, तो वह शक्ति हमें उससे अवगत करायेगी। पर आप पूरी तरह से स्वस्थ है और यदि आप किसी चीज़ से चिपके नहीं होंगे तो आप बड़ी सहजता से 28

Hindi Translation (Marathi Talk) निर्विचार हो जाएंगे। विचारें के उस पार जाएंगे। असल में विचारों के उस पार जाना यह बहुत मुश्किल बात है, | ऐसा लोग कहते हैं। पर मुझे वैसे नहीं लगता। हाँ अगर कोई आदमी बड़ौदा जाने के लिये निकल पड़ा है और अगर वह अमरिका जाकर जापान से हो कर बाद में अगर बड़ौदा पहुँचने वाला हो, तो फिर ऐसा ही होने वाला है। पर हम रास्ता जानते हैं इसलिये यह अत्यंत सरल बात है। बिल्कुल सहज मार्ग से सहज होने वाला है वह ! अत्यंत सहज है। अत्यंत सहज भाव से आप बैठिये। धीरे से आपको लगेगा कि आप निर्विचार हो गये हैं। निर्विचार होने पर आप हाथ ऊपर उठाईये। ये लोग जा कर देखेंगे कि आप निर्विचार हुए या नहीं। अगर आप निर्विचार हो गये हैं तो आपको कान में बतायेंगे । आज यहाँ ऐसे बहुत सारे लोग आये हैं, जो रोग पीडित, बीमार हैं। उनमें अगर कुछ बच्चे होंगे, बहुत ही छोटे बच्चे होंगे, तो उन्हें बाहर ले जाईये | क्योंकि वे बच्चे रोयेंगे या ऐसा ही कुछ करेंगे जिससे दूसरों को तकलीफ होगी। पंद्रह-बीस मिनट में जो कुछ परिणाम होगा वह निकल आयेगा। तो आज तक किसी को भी इतनी सी भी परेशानी नहीं हुई। तो आपको भी नहीं होगी। हजारों लोगों की कुंडलियाँ जागृत हो गयी और उधर भी हजारों लोग पार हो गये। उन्हें आत्मदर्शन हो गया है। किसी को भी कुछ भी नहीं होने वाला। पहली अनुभूति तो यह होगी कि आप निर्विचार हो जायेंगे | साइन्स में जिसकी केवल चर्चा की गयी है, उसके बारे में जैसे आप सब एकदम से जान लेते हैं, वैसे ही वह बहुत सरल है। परसों मैंने बताया था कि अगर कमरे के अंदर अंधेरा है और आप बाहर से आये और एकदम से अंदर आ गये और आपकी आँखें बंद होगी तो आपकी समझ में कुछ भी नहीं आयेगा। अगर आपका हाथ पकड़ कर किसी ने कहा कि, यहाँ दिन है (रात नहीं), आप बैठिये, तो थोड़ी देर कुछ-कुछ टटोलने के बाद आप देख पायेंगे। एकदम से पूरा कमरा तो समझ में नहीं आयेगा। पर मान लीजिये कि ऐसा कोई होगा, जो कमरे में लाईट डाल सकता है और सारी की सारी चीज़ें देख सकता है। इसलिये यदि कोई कर्ता होगा तो आपकी ऑठखें फटाकु से खोल सकता है। आपको अंदर सब कुछ दिख सकता है। अमरीका में लोगों की आँखें अच्छी तरह खुल गयी हैं हमारी तुलना में! क्योंकि उनका सब कुछ हो गया है, पैसा हो गया, घर हो गया, द्वार हो गया! यह मन भी कितना मजेदार है जरा देखिये। आपका ही मन देखिये और यह आप का गुण भी है। आप कहेंगे कि मुझे अब एक घड़ी खरीदनी है। तो आप पागल की तरह दौड़ेंगे, घड़ी खरीदने के लिये ! घड़ी खरीदने के बाद लगा कि इस में तो कुछ भी मज़ा नहीं है। फिर दूसरी ओर दौड़ना, फिर तीसरी तरफ! हमेशा हमारी दौड़-धूप चली ही रहती है। हमारा चित्त जिधर जाता है, वहाँ वह हमारे साथ जाता है। पर उसका हर समय आनंद नहीं आता। हर समय वह बताते रहता है कि मुझे आनंद नहीं आया । मुझे आनंद मिला नहीं। मुझे विराम मिला नहीं। तो कुछ दूसरी चीज़ खोजनी है ऐसी आपकी कल्पना होती है। तो इस तरह मन लगातार इधर-उधर भागता रहता है। पर अगर आपने उसको दबा कर रख दिया होगा, उस पर अत्याचार किये होंगे, तो यह मन अंत में आपकी मदद नहीं करेगा । तो इसलिये मन के तरह-तरह के प्रकार है। जब आप ध्यान में बैठे रहते हो तब, मैं देखती हूँ, आपका यह मन बीच ही खड़ा हो जाता है और आपसे कुछ तो भी कहता है। घोड़ा देखता है कि वह कहाँ तक जा सकता है। अगर मालिक ने घोड़े से कहा कि, ‘उसके साथ दोस्ती मत करो और यह देखो कि मुझे इस जगह पर जाना है ।’ तो वह 29

Hindi Translation (Marathi Talk) झट से तैयार हो जाता है कि, ‘चलिये, आपको जहाँ जाना है वहाँ मैं ले चलता हूँ।’ पर इसलिये घोड़े के साथ दोस्ती करनी होगी। मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि घोड़े से मित्रता कीजिये । पर कहाँ जाना है? कैसे जाना है ? यह कोई भी नहीं जानता। किसी को भी यह जानकारी नहीं कि वहाँ कैसे जाना है ? यह अपने आप हो जाता है, अपने आप ही घटता है, यह कोई नही जानता! साइन्स की दूसरी बाजू देखनी है तो शरीर की दृष्टि से देखिये। साइन्स में डॉक्टर आदि लोग पूछेंगे कि कुंडलिनी इ.क्या होती है? जब बच्चा माँ के पेट में दो महिने का होता है, तब उस जीवात्मा में यह जीवशक्ति आती है। वह मस्तक तालु से अंदर प्रवेश करती है और पृष्ठवंशीय स्पाइनल कॉर्ड, जो कि त्रिकोणाकार अस्थि है, उसमें जा कर बैठती है। यह कुण्डलिनी शक्ति बीच में रूक रूक कर जाती रहती है। उससे .. …बनते रहते हैं और बाहर डॉक्टर्स उन्हे प्लेक्सेस या पैरासिंपथेटिक नर्वस सिस्टम कहते हैं। उनसे अगर पूछेंगे कि यह ऑटो, स्वयं, जो हृदय को चलाता है वह कौन है ? तो उसका जवाब नहीं है उनके पास ! मैं अमरीका में कितने सारे न्यूरोलॉजिस्टस् से मिली। उन्होंने कहा कि कैन्सर को हम इसलिये ठीक कर नहीं सकते कि इस पैरासिंपथेटिक नर्वस सिस्टम को कैसे शुरू करना है? यह हम कैसे कर पायेंगे? मैंने जब उनको प्रॅक्टिकल कर के बताया तो उन्हें आश्चर्य बहुत लगा कि मैं नर्वस सिस्टम को कैसे चला सकती हूँ। यह बाहर से दो प्रकारों से दिखता है। उनमें से एक याने आपकी आँखें डायलेट, बड़ी हो जाती हैं। आप में जो रिअलाइज्ड लोग हैं, उनकी आँखें देखिये। उनकी आँखों की तारकायें बड़ी और बिलकुल काली होती है। सोचिये, कि इससे बड़ा चमत्कार इस दुनिया में क्या हो सकता है? हाथ को हिलाकर तीन सौ रूपये निकालना यह कोई चमत्कार नहीं। अंगूठियाँ इ.निकालना यह कोई चमत्कार 6. नहीं। ये सब भूतो के प्रकार है। एक बार खूब मजेदार घटना हुई। ब्राह्मणों के घर बारात आयी। आप जानते हैं कि यू.पी. में बड़प्पन और अहंकार का कितना बड़ा दिखावा होता है। सर्दी का मौसम था। बारातियों में कुछ लोग खामखाँ परेशान करने पर उतारू थे। उन्होंने कहा, ‘हमें दही-बड़े ही चाहिये । ‘ अब देखिये दही-बड़े बनाना इतना सरल और सहज तो नहीं है। वहाँ ब्राह्मण सर्दी के दिनों में दही-बड़े नहीं बनाते। वहाँ एक बाबाजी थे | उनके पास अगर संदेश भेजा गया कि बाबाजी, ऐसी वस्तुयें लाकर देते थे। उनके पास संदेश आया कि, ‘आपको जितने रूपये चाहिये, उतने लीजिये पर हमें दही-बड़े ला दीजिये।’ बाबाजी सकपका गये। उन्होंने कहा कि, ‘मैं दही-बड़े ला देता हूँ, पर मैं वहाँ रुकूंगा नहीं। पैसा देकर वहाँ से निकल आऊंगा।’ ‘ठीक है, आप पैसे लीजिये और निकलते बनिये।’ उन्होंने गिनकर पैसे दिये और बाबाजी ने दही-बड़े ठीक से सजाकर दिये। कमरा बंद कर दिया। अंदर दही-बड़े थे। सबने पेट भर कर खाये और बाबाजी रफूचक्कर हो कुछ मांतग (मांग) आये। हमारे यहाँ बाजा बजाने वाले होते हैं वैसे वहाँ भी होते हैं। आने पर झूठन साफ करते हैं। तो उन्होंने कहा, गये ! सब पैसे लेकर गायब! दूसरे दिन सुबह उस बाड़े में ‘हमारे उधर से कूल्हड लेकर कौन आया था ? हमने उधर दही-बड़े बनाये थे। किसने ये दही-बड़े यहाँ लाये ?’ सब ब्राह्मण चिढ़ गये। बाराती रूठ गये। तो समझ लीजिये कि जो भूत रहते हैं वे ऐसे काम करते हैं। वे अपनी सूक्ष्मता किसी भी जड़, घनी चीज़ में डाल कर उसे सूक्ष्म बना देते हैं। और ला कर रख देते हैं। आप उसे देखते नहीं। यह तो भूतविद्या है। पर क्या वे भूत शांत रहने वाले हैं, चूप बैठने वाले हैं? कल तो वे उस बाबाजी को ही खा डालेंगे । 30

Hindi Translation (Marathi Talk) अजी, हम भी हैं। देखिये, अगर हमने किसी को दो पैसे भी दिये तो भी हम यह बात पूरी तरह से ध्यान में रखते | हैं। ‘देखिये, उस दिन मैंने उसे दो पैसे दिये थे और वह मेरे उपकार को मानता तक नहीं।’ अगर हम नहीं भूल सकते, तो क्या भूत अपने किये हुए उपकार को भूलेंगे ? उन्होंने आप पर थोड़ासा भी उपकार किया होगा, मान लीजिये कि किसी आदमी को बीमारी से मुक्त कर दिया। इंग्लैंड में ऐसा है एक डॉल्लेन नाम का आदमी था। वह मर गया और उसका भूत किसी सैनिक पर सवार हो गया। उस भूत ने उस सैनिक से कहा कि, ‘मेरा लड़का फलां-फलां जगह पर रहता है, तो जा कर उसे बताओ कि मैं उसका बाप हूँ।’ वह आदमी वहाँ गया और उस लड़के को बताया तो लड़के को बहुत ही आश्चर्य हुआ। तब उसने कहा, ‘तो ठीक है, मुझे दो-चार सबूतवाली चीजे बताईये।’ उस सैनिक ने बताया, ‘ये चीज़ें है, वो चीज़ें हैं।’ उस लड़के ने पक्का पहचान लिया। और पूछा, ‘तो अब क्या करना है?’ उस भूत ने कहा, ‘तू अब मेरा क्लिनिक खोल दे। और सबको बता दो कि अगर किसी को कुछ बीमारी होगी, तो उन्होंने अगर हमें चिठ्ठी लिख कर दी, तो भी हम उन्हें दवा तैयार कर देंगे और वे ठीक हो जाएंगे।’ और शुरू हो गयी क्लिनिक। उस डॉक्टर के बहुत सारे मित्र थे और वे भी भूत थे वे सब मिल कर काम करने लगे । पर काम करने के बाद अपना किया हुआ उपकार तो भूत नहीं भूलने वाले। मतलब कि उनके और दस भूत आपके घर में आ गये। और फिर आप माताजी के पास ! ‘माताजी, यह क्या परेशानी है?’ आज कल ऐसे तरह- तरह के भूतों के फैलाने वाले बड़े-बड़े एजंट्स आ गये हैं। कुछ लोग तो केवल भाषण से भी आप पर भूत डाल सकते हैं। भाषण दिया कि लोग गोल-गोल चक्कर लगाते हैं, चक्कर लगा कर नाचने लगते हैं। भाषण देने वाले की तारीफ भी करते हैं। और भाषण वालों को तो ऐसे ही लोग चाहिये, पैसा कमाने के लिये सत्ता कमाने के लिये ! इस तरह शास्त्रीय, वैज्ञानिक दृष्टि से, शारीरिक दृष्टि से भी, हमारे शरीर में जितने प्लेक्सेस हैं, उतने ही चक्र हमारे शरीर में हैं। ऋषि-मुनियों ने बहुत वर्ष पहले लिखे हुए चक्र और इन लोगों वाले, देखिये, बिल्कुल एक जैसे हैं। अब मूलाधार चक्र हम कहते हैं तो मूलाधार चक्र को अंग्रेजी में पेल्विक प्लेक्सस कहते हैं। यहाँ अगर कोई डॉक्टर होंगे तो मैं क्या कह रही हैूँ उसको वे समझ जाएंगे । पेल्विक प्लेक्सस को चार सब प्लेक्सेस होते हैं। मूलाधार चक्र की भी चार ही पंखुड़ियाँ, चतुर्दल होते हैं। मतलब उस कमल की चार पंखुड़ियाँ होती हैं। जब मनुष्य साधारण स्थिति में होता है तब आपको पेल्विक प्लेक्सस की केवल धारायें दिखती हैं। जो मनुष्य पूरी तरह से प्रकाशित है उसका पेल्विक प्लेक्सस बिल्कुल कमल की चार पंखुड़ियों के समान दिखता है और बीचोबीच ऐसा गोल दिखता है और अगर आप देखने लगे तो आपको कुछ भी नहीं दिखेगा, पर उस गोल के अंदर अगर हम लोगों जैसे लोगों ने देखा तो उस गोलाकार में एक बिंदु दिखता है और उस बिंद के अंदर क्या दिखता है- श्रीगणेश! तो आपको आश्चर्य होगा। श्रीगणेशजी तो हमारी बनायी हुई देवता नहीं। हमने तो कुछ भी नहीं किया। सब कुछ अंदर से ही आया हुआ है। श्रीगणेशजी यहाँ दिखते हैं। श्रीगणेश दिखने के पहले उनकी सूँड दिखती है। बहुत सारे द्रष्टा उस सूँड को ही कुण्डलिनी मानते हैं। देखिये , कितनी बड़ी गलती है यह ! सेक्स पेल्विक प्लेक्सस का एक अंग है और कुण्डलिनी वहीं बैठी है इस तरह उल्टा प्रचार कर के सब गड़बड़ घोटाला कर रखा है। और वह घोटाला भी इतना बड़ा हो गया 31

Hindi Translation (Marathi Talk) है। कुण्डलिनी आपकी माँ है। सेक्स से उसका कोई संबंध ही नहीं । उस पर अगर आपने सेक्स का आरोप किया तो वह चिढ़ती है। उससे आपके शरीर पर आग जैसे प्रखर जलने वाले बड़े-बड़़े फोड़े उठते है। और आप पुस्तक लिखते हैं कि कुण्डलिनी को हाथ मत लगाईये । वह आप पर चिढ़ जाती है। चिढ ही जायेगी! अरे, वह आपकी साक्षात् माँ है और आप उस पर ऐसे गंदे इल्जाम लगा रहे हैं? अब देखिये श्रीगणेशजी का सब कितना सुंदर है। श्रीगणेश चिरबालक है । इटर्नल चाईल्ड, चिरबालक है । तब हमारा मन हमें कहता है कि, प्रभो, जो हमारे अंदर में बैठा है, वह क्या कहता है कि जब आप अपनी आध्यात्मिकता में उतर जाएंगे, अध्यात्म में, तब सैक्स की भावनाओं के बारे में आपकी स्वयं की भावना, अनुभूति छोटे बच्चे जैसी होनी चाहिये । हमारी माँ की ओर हमारी दृष्टि छोटे बच्चे जैसी होती है। जब आप छोटे बच्चे जैसे हो जाएंगे तब आपकी माँ आपको मिलेगी, अन्यथा नहीं मिलेगी। जिन लोगों को यह घमंड रहती है कि हमने यह पुस्तक पढ़ी है, वह पुस्तक पढ़ी है, उनका रिअलाइझेशन कभी भी नहीं होगा। माँ की बात ही ऐसी होती है। रामदास स्वामी ने कहा है, ‘आई, स्व…..’ जब आप थोड़े और बड़े हो जाएंगे, देखते हैं आप क्या करते हैं! जब छोटा, नन्हा बच्चा होता है, तब माँ उसको ठीक समय पर दूध देती है, उसका संगोपन करती है। अगर आप छोटे बच्चे जैसे हो गये, तो जो कुछ पढ़ा वह सब बेकार है। हम छोटे बच्चे हैं, तब माँ भी समझती है। खट् से आपका रिअलाइजेशन हो जाएगा। बहुत लोगों का नहीं होता। लोग कहते हैं, ‘श्रीमाताजी, ऐसा कैसे हुआ? आपकी इच्छा हो गयी तो होना ही चाहिये।’ हमें कोई भी इच्छा होती ही नहीं । यह आश्चर्य की बात है। आपको रिअलाइज्ड़ करने की हमें इच्छा ही नहीं है, और न किसी दूसरे चीज़ की। किसी भी चीज़ की इच्छा हमें नहीं है। निरिच्छा! पर उस (परमात्मा) को करना है इसी कारण वह मेरे लिये कर रहे हैं। दिखने के लिये तो मैं आपके सामने हूँ। पर अंदर से तो उसका काम शुरू है। आपसे वह कुछ नहीं कहेगा। उसका कारण क्या है यह मैं बता सकती हूँ। उसका कारण यह है कि आपमें वह बाह्य स्थिति आ गयी है। स्वयं को बहुत बड़ा या शिष्ठ व्यक्ति समझ कर देखिये, आपका रिअलाइझेशन कभी भी नहीं होगा। आप होंगे बहुत बड़े अमीर- सेठ, पर वहाँ भगवान् के सामने आप कौन हैं? परमात्मा के सामने न भिखारी की चलती है न किसी सेठ की! एक छोटासा बच्चा, जो भिखारी नहीं है वह भी चल जाता है। सीदे- सादे छोटे बच्चे से आप पूछ कर देखिये, बिल्कुल सीधी बात है। हमारे पड़ोस में एक लड़का था। वह बहुत जल्दी बोलने लगा था। तब मैंने उस लड़के से पूछा, ‘बेटा, तुम कौन हो, हिंदुस्तानी हो?’ उसने कहा, ‘नहीं।’ ‘जापानी हो?’ ‘नहीं। ‘मुसलमान हो?’ ‘नहीं। ‘तो तुम कौन हो?’ उसने कहा, ‘माँ तुम भूल गयी। मैं तुम्हारा मुन्ना हूँ, यही सत्य है। एक ही सत्य है, मैं तुम्हारा बच्चा हूँ कितने साल से तुम्हें खोजते रहे हैं।’ ये सब झूठे, नकली लेबल्स! हिंदुस्तान में जन्म लिया, तो हिंदुस्तानी हो गये। पाकिस्तान में जन्म लिया, तो पाकिस्तानी हो गये! जब आप जन्म लेते हैं, तो क्या ये सब आपके मस्तक पर लिखा हुआ रहता है? हिंदुस्तान को भी किसने बनाया? मनुष्यों ने ही बनाया। भगवान को भी आश्चर्य लगता होगा कि यह सारा मैंने कभी भी बनाया नहीं। अजी, भगवान को सृष्टि में रंग भरने होंगे। सब सृष्टि जब भगवान ने बना कर रखी, तब हमने एक को हिंदुस्तान किया, एक को अमरिका किया, यह किया, वह किया, उस पर वादविवाद! हम ब्राह्मण, 32

Hindi Translation (Marathi Talk) हम हिंदू, हम स्त्रियां, हमें तुलसीदासजी ब्रह्मचारी बन कर आये। तुलसीदासजी रिअलाईज्ड नहीं थे और अगर होते, तो भी नहीं बताते। उन्होंने बताया कि ‘मैं बालब्रह्मचारी हूँ। (यह झूठ है। वे बालब्रह्मचारी नहीं थे। उनकी पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया, इसलिये वे ब्रह्मचारी हो गये।) इसलिये मैं स्त्रियों का मुख नहीं देखता।’ मीराबाई ने उन को उत्तर दिया, ‘इस वृंदावन में कृष्ण को छोड़कर और कोई पुरुष रहता है, ऐसा मुझे लगा नहीं। मेरे सब बच्चे यहाँ रहते हैं ऐसा मुझे छूना नहीं है, इ.इ.। यह एक पागलपन है। एक बार मीराजी वृंदावन गयी थी। वहाँ लगता है।’ तब उस मनुष्य को शर्म लगी और उसने कहा, ‘माँ, मुझे क्षमा कीजिये।’ यह हमारी नज़र का फर्क है। यह सब हमारी दृष्टि का भेद है। जेठानी जी के लिये सारा संसार ही अगर उनका बेटा है, मेरे बच्चे हैं तो यह भी अपना ही बेटा है। उनमें सबसे बड़ा बेटा ९२ साल का था। था का मतलब अभी थोड़े दिन पहले ही वे चल बसे। मैं भूली नहीं । उनको पुनर्जन्म दिया। इसलिये जब हमारी वृत्ति में पाप नहीं होता, तो सब कोई हमारे बच्चे ही हैं । परंतु स्त्री को स्त्री ही होना चाहिये और पुरुष को पुरुष ही रहना चाहिये। (ऐसा नहीं कि स्त्री और पुरुष ऐसे ही कहीं तो भी जा रहे हैं?) इस तरह से ऐसा व्यवहार हमारे सहजयोग में नहीं चलेगा। ऐसे कुछ लोग होते हैं कि पुरुष होने पर भी स्त्री और स्त्री होने पर भी पुरुष। ऐसा यहाँ कुछ नहीं चलेगा । सहजयोग के लिये पुरुष ने पुरुष ही होना चाहिये, बलदंड और स्त्री ने सौम्य, मृद् ही होना चाहिये, एक स जैसे। तब अमरिका में औरतों ने मुझे कहा, ‘तो आप पुरुषों का ही राज हम पर थोंप रही हो!’ मैंने कहा, ‘वे क्या राज करेंगे? वास्तव में हम ही रानियाँ हैं। जैसे कि स्त्री अकेली ही घर में सब का बोझ उठाती है। हम बहुत शान्ति से वह सारा बोझ उठाते हैं। स्त्री शान्त है पर स ही शक्तिशाली है। पूरे परिवार को वहीं चलाती है। श्रीरामजी ने सीताजी से कहा, ‘तुम वन में जाओ।’ सीता अगर मॉडर्न औरत रहती तो फरियाद करती। ‘सब लोगों के समक्ष मुझ में विवाह करके मुझे ले कर आये हो और अब मुझे कह रहे हो, वन में जाओ?’ दो लड़के हुए रहते तो और फरियाद करती! ये तो सब मॉडर्न लोगों के काम हैं। सीता को देखिये , चुपचाप वन में चली गयी ! पूरा कलंक झेलती रही। लड़के हो गये, उनका संगोपन, पालन-पोषण किया। अपने पति पर जो क्रोध था वह बच्चों पर क्रोध कर जताया नहीं। यहाँ औरतें पति पर का क्रोध बच्चों पर निकालती हैं। स्त्रियों का अर्थ क्रोध को निगल कर आनंद देनेवाली। वे ही स्त्रियां हैं, वे ही नारी का रूप, नारी हैं। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवताः।’ जो आनंद की वर्षा करती हैं, वे ही स्त्रियां हैं। उन्होंने पुरुषों से स्पर्धा नहीं करनी चाहिये और पुरुषों ने भी सीता को घर से निकलवाने वाले धोबी जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिये। सीता जैसे घर से निकल गयी, वन में रही ( उसकी सेना वैसी ही रही ? ) उसकी पवित्रता को कौन छुअेगा?’ वह अकेली वन में रही। इतने दिनों तक शायद आप नहीं जानते होंगे कि सीता को श्रीराम ने फिर से पाया, तब श्रीराम ने उसको पुकारा, पास में बुलाया, तब उसने उनको कहा, ‘देखिये , मैंने आपका त्याग किया, मेरे त्याग को देखिये, मैंने मेरा ही त्याग किया है।’ और निकल गयी वह, धरती में समा गयी। श्रीराम पर भी किसी ने कलंक नहीं लगाया। वह समा गयी अपनी पृथ्वी में । ऐसा बोलते हैं कि श्रीराम ने ‘सीता, सीता’ पुकारते हुए शरयू नदी में आत्महत्या की। यह तो पुरुषों का व्यवहार हो गया। पुरुषों ने पुरुष ही होना चाहिये और स्त्रियों ने स्त्रियां ही होना चाहिये। उसमें ही सुंदरता है। स्तरियां जैसी हैं वैसी ही सुंदर दिखती हैं। भले ही उन्हें थोड़ी देर हो जाये या जल्दी करना है। इतना 33

Hindi Translation (Marathi Talk) व्यवस्थित नहीं चलने वाला। हमारे यहाँ स्त्रियों के कुछ कुछ उदाहरण हैं। नूरजहाँ, क्या गजब की औरत थी। नूरजहाँ सलीम से प्यार करने लगी थी आरै सलीम से ही उसे शादी करनी थी। पर अकबर ने उसकी शादी दूसरे आदमी से कर दी। तब वह निकल गया और कलकत्ता के पास जा कर वहाँ रहने लगा। फिर उसने पति की पूरी सेवा की। बहुत साल वह वहीं रही। जब सलीम राजा बन गया, तो उसका राज चलते हुए नूरजहाँ का पति मारा गया। नूरजहाँ को मालूम हुआ कि सलीम ने ही उसे मारा है। भगवान जाने यह सच था या झूठ! पर इसका व्यवहार देखिये। वह भी मुसलमान ही थी ना! देखिये, उसका व्यवहार सीता से कुछ कम नहीं। जब यह सलीम उसके पास गया, उसके पैरों पर गिर गया, पर उसने कहा, ‘मैं नहीं आऊंगी। तब उसे गिरफ्तार कर ले गया। तब उसने कहा, ‘खबरदार, मुझे छूना नहीं।’ उसकी हिंमत नहीं हुई। जब उसको गिरफ्तार किया गया, तब वह एक छोटे से मकान में जाकर रहती थी। फिर सलीम उसकी वियोग से बीमार हो गया। तब सलीम की माँ को उस पर दया आयी और उसको बताया, ‘मैं आपकी सेवा करूंगी बाईजी!’ नूरजहाँ नहीं जानती थी कि यह औरत उसकी (सलीम की) माँ है। उसने नूरजहाँ की खूब सेवा की। तब नूरजहाँ ने उससे कहा, ‘तुम्हें जो चाहिये वह मांग लो। मेरी सेहत ठीक है। जो कुछ चाहिये, दे दूंगी। मतलब अगर मेरे बस की बात होगी, हाथ में होगी, तो दे दंगी। उस औरत ने कहा, ‘मैं इतना ही माँगती हूँ कि आप मेरे बेटे से शादी कर लीजिये।’ नूरजहाँ ने कहा, ‘हाँ, कर लूंगी।’ इतना बड़ा शहेनशाह, उससे शादी करने के लिये वह तैयार नहीं थी, पर इस औरत के बेटे से शादी करने तैयार हो गयी, इस गरीब औरत के बेटे से! वह औरत वहाँ गरीब स्त्री बन कर आयी थी, बाद में नूरजहाँ को मालूम हुआ कि जिससे शादी करनी है वह तो शहेनशाह ही है! फिर वह शादी हो गयी। तो देखिये, स्त्रियों का कैसे रहता है । इस देश की एक-एक औरत के बारे में देखिये वे कैसी हैं! स्त्रियों का सब कुछ अद्वितीय है। इन औरतों के बल पर, दम पर ही सारी सृष्टि रूकी हुई है। पुरुष जुल्म करते हैं। कितने भी जुल्म करने दो। इन औरतों की हिंमत के सामने वे कुछ भी नहीं कर सकते और इसके बावजूद भी जो स्त्री प्रेम की वर्षा करती है वहीं सचमुच स्त्री है । तो धर्म में ऐसे लोग रहते हैं। जो स्त्री पूर्ण रूप से स्त्री के स्वरूप में आयी है, और जो पुरुष पूर्ण रूप से पुरुष हो कर आया है, ऐसे ही लोग हमारे धर्म में आ सकते हैं। जो लाग आधे-अधूरे रहते हैं, वे पहचाने जाते हैं। झट् से सामने आ जाते हैं। मैं जो कुछ बता रही हूँ, वह सब कुछ शास्त्रीय दृष्टि से हमारे शरीर में है। सब प्लेक्सेस हमारे | शरीर में हैं। इसका मतलब बुद्धि से भी आपने पहले ही उसे मान्यता दी है। अब में आपको समझाने का प्रयास करती हैूँ। आपके लिये वह मधु (शहद) जैसा है। कितना भी बताया कि मधु का स्वाद ऐसे रहता है, वह ऐसे होता है, वैसे होता है, तो भी जब तक आप उसका अनुभव नहीं लेते, उसका अपने ऊपर परिणाम नहीं देखेंगे, तब तक मेरा भाषण व्यर्थ है। सबूत के तौर पर मैं कह सकती हैँ कि साइन्स में हम जिसे पैरासिंपथेटिक नर्वस सिस्टम कहते हैं उसे और जिसे मैं कुण्डलिनी कहती हैँ, जिसे मैं जागृत करती हूँ, उसे मैं कंट्रोल कर रही हूँ। कुण्डलिनी का पूर्ण रूप से वर्णन, उसका उठना, उत्थापन आदि और उससे मिलने वाले अलग-अलग आकृतियाँ और उससे हमें मिलने वाले फायदे, उससे हमें क्या-क्या फर्क होता है, इस सब की एक विवेचनात्मक पुस्तक मैं लिखने वाली हूँ। पर इतनी पूरी पुस्तक पढ़ कर भी जब तक आपको असली चीज़ मिलती नहीं, तब तक केवल पुस्तक पढ़ कर मज़ा नहीं आयेगा। इसलिये पहले प्राप्त कर लेना है , जिन्हें मिलता है उन्होंने और अधिक 34

Hindi Translation (Marathi Talk) प्राप्त करना है, क्योंकि बिना बाँट कर मिलने वाला नहीं है। बहुत सारे अमीरों के घर में ऐसी अवस्था रहती है कि जैसे कोई मर गया हो। इतने अमीर हैं, इतना सारा पैसा घर में है फिर भी लगता है कि कहीं हम श्मशान में तो नहीं आ गये? बाँट देना चाहिये। अरे, आप पैसे क्यों बाँट रहे हो , प्रेम बाँटिये। हमारे यहाँ लक्ष्मी का रूप कितना सुंदर है। लक्ष्मी को स्त्री का रूप दिया गया है। अर्थात् वह मातास्वरूप होनी चाहिये। जिस मनुष्य के पास लक्ष्मी उसने माँ के रूप में होना चाहिये। आपके कितने सारे अपराधों को माँ भूला देती है। लक्ष्मी वाला आदमी अगर अपने नौकर को पीटता है, तो वह लक्ष्मीपति नहीं, पैसोंवाला है। लक्ष्मी के हाथों में दो कमल हैं। कमल का अर्थ क्या है? तो कमल के समान शोभा होनी चाहिये। उसके चेहमरे में, आचरण में, बोलने में हर एक चीज़ शोभनीय होनी चाहिये। मुँह से लगातार गालियों की बौछार हो रही है और इन्हें कहते हैं लक्ष्मीपति ! ये कैसे लक्ष्मीपति हो गये ? लक्ष्मीपति कमल के समान होना चाहिये। कमल के समान घर और उसका रहन-सहन भी सुंदर होना चाहिये ने और आराम देने वाली जैसे भँवरा कमल में जाकर सो जाता है वैसे ही! कोई भी नहीं तो घर के चार कुत्तों के साथ लक्ष्मीपति भी भौंकने तैयार ! लक्ष्मी की पहचान और आगे बतायी गयी है कि लक्ष्मी का एक हाथ ऐसा रहता है। इस हाथ का अर्थ यह है कि आपको आश्रय है। अगर कोई आपके पास आश्रय के लिये आया और अगर आप आसरा दे नहीं सकते तो आप ऐसे कैसे लक्ष्मीपति हैं? अपने ही बाल-बच्चों को पैसा दे कर गड़बड़ होने वाला क्यों होगा लक्ष्मीपति ? कुछ दिनों के बाद जानवरों में भी यह स्थिति समाप्त हो जाती है। पर हम मनुष्यों में जानवरों से भी बदतर अवस्था है। बूढ़ा होने तक बच्चों के लिये पैसा जुटाना और फिर लड़का बड़ा होने पर उसने बूढ़े के पैसे निगल लेना। पर अगर किसने कहा कि, ‘गरीब को कुछ दे दो तो, बाप रे बाप! ऐसे पैसे मांगने वाले तो रोज-रोज ही आते हैं।’ ‘मेरा बेटा, मेरी बेटी’ इसी में आप जाएंगे! शुरू-शुरू में आपके बच्चे आगे आएंगे, ‘लीजिये, लीजिये,’ अजी, सभी आपके बच्चे ही हैं! हमारा मान होना चाहिये, हमारी बीटिया को अच्छा लगना चाहिये, मैं, हम, हमारा, हमारी! अंत में ये ही बच्चे आपको सताते हैं। तो ऐसे प्रेम का कुछ अर्थ ही नहीं । स्वार्थी प्रेम का अर्थ प्रेम की मृत्यु! एक वृक्ष में से बहने वाली शक्ति, या पानी अगर केवल एक फूल में ही जा कर बैठ गया तो पूरा वृक्ष ही मर जाएगा। ऐसे प्रेम से क्या लाभ होने वाला है? लक्ष्मीपति की पत्नी बैठी होती है और उसके पड़ोस में बाजू में एक स्त्री होती है। उस स्त्री के शरीर पर फटे कपड़े के नाम पर चिंदी तक नहीं। उस पैसे वाली र्त्री को खेद नहीं होगा। दूसरों की पीड़ायें देख कर जो हृदय विगलित, द्रवित नहीं होगा, वह क्या हृदय है या पत्थर? यह सब काम मैं अपने हृदय के भरोसे पर, ताकत पर कर रही हूँ। आप नहीं जानते, केवल हृदय के दम पर करती हूँ। हृदय चक्र का खेल है। आपने देखा है कैसे मेरे हाथ पर कुण्डलिनी खेलती है। सब प्रेम का चक्कर है। परमात्मा ने पूरी सृष्टि प्रेम से ही बनायी है। जिसे हम क्रिएटिव काम कहते हैं वह सब प्रेम की शक्ति है। केवल प्रेम, प्रेम, प्रेम! जिस मनुष्य के पास प्रेम नहीं, वह हृदय खोल कर किसी को अपने हृदय के पास ले नहीं सकता। ऐसे मनुष्य को भगवान नहीं मिलेंगे। अगर आपने किसी पंडित को सौ रूपिये दिये और उसने भगवान का कुछ (पूजा पाठ) किया तो उससे आपको भगवान नहीं मिलने वाले। भगवान तो प्यार के भूखे है और अगर उसी प्रेम के सागर 35

Hindi Translation (Marathi Talk) में आपने डुूबकी लगा दी तो दूसरा कौन है? इस हाथ ने इस हाथ की सेवा करने पर, कहना कि, ‘अरे, मैंने कितनी 6. सेवा की तुम्हारी!’ वैसे तो आप सब मेरे शरीर में ही हैं। पूरे शरीर में एक ही शक्ति बहती है। अगर इस उंगली को कुछ हो गया तो झट से यह दूसरी उंगली आगे आती है। अब आप देख ही रहे हैं कि जो लोग पार हो गये हैं वे अपने खुद के पैसे खर्च कर के आपके धूलिया में आये हैं। उन्हें आपसे न पैसा चाहिये न और कुछ! अपना पैसा खर्च कर आपके पास आये हैं। किसलिये ? आपको भवसागर से बचाने के लिये! क्योंकि अंदर से प्रेम बह रहा है। इस प्रेम के कारण ही मैं आपके पास दौड़ती आयी हूँ। अगर यह प्रेम मेरे पास नहीं होता तो, मेरे पास इतनी संपदा है, बाहर की छोड़ दीजिये, अंदर की संपदा है, मुझे कोई जरूरत नहीं है। पर करुणा! अंदर की करुणा इतनी अधिक मात्रा में होती है कि अंदर का आनंद भी बेकार होता है। जन्मजन्मों से जुटायी है। इस जन्म में बिना दिये कोई मार्ग नहीं। आपके लिये दिन-रात एक कर रही हूँ। आपने भी इसमें थोड़ी सहायता करनी है। 36