Guru Purnima, Sahaja Yoga a New Discovery

मुंबई (भारत)

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Guru Purnima Puja. Mumbay (India), 1 June 1972.

Transcript Scanned from Hindi Chaytanya Lahari

वास्तविक जो चीज स्थित है, जो है ही उसका अविष्कार कैसे होता है? जैसे कि कोलम्बस हिन्दुस्तान खोजने के लिए चल पड़ा था तब क्या हिन्दुस्तान नहीं था? यदि नहीं होता तो खोज किस चीज की कर रहा था। सहजयोग तो है ही पहले ही से है। इसका पता सिर्फ अभी लगा है। सहजयोग, ये परम तत्व का अपना तरीका है। यह एक ही मार्ग है, मानव जाति को उत्क्रान्ति (Evolution) के उस आयाम में उस (Dimension) में पहुँचाने का एक तरीका है, एक व्यवस्था है, जिससे मानव उच्च चेतना से परिचित हो जाए. उस चेतना से आत्मसात हो जाए जिसके सहारे ये सारा संसार, सारी सृष्टि और मानव का हृदय भी चल रहा है। बहुत कुछ इसके बारे में लिखा गया है, पुरातन कालों से ही खोज होती रही, मनुष्य खोज कुछ रहा ही है हर समय, चाहे वो पैसे में खोज ले, चाहे वो सत्ता में खोज ले चाहे वो प्रेम में खोज ले, वो किसी न किसी खोज की ओर दौड़ रहा है। लेकिन उस खोज के पीछे में कौन सी • प्यास है वो शायद वो जानता नहीं। इसके पीछे में सिर्फ आनन्द की खोज है, आनन्द की खोज में वो सोचता है कि बहुत सी गर सम्पत्ति इकट्ठा कर ले तो उस आनन्द में लय हो सकता है। लेकिन ऐसे भी देश अनेक हैं जिन्होंने सम्पत्ति में बहुत कुछ प्रगति कर ली, बहुत कुछ पा लिया है और अत्यन्त दुखी हैं। आनन्द तो दूर रहा, हजारों लोग वहाँ आत्महत्याएं कर रहे हैं! सारी खोज के पीछे में आनन्द की प्यास आपको घसीटे चली जा रही है किसी अज्ञात की ओर, सारी ही खोजों में ढूँढते-ढूँढ़ते जब मनुष्य हार जाता है, और कहीं मिलता नहीं तो पर इसका बोझा बढ़ता जाएगा। अगर मैं कहू कि कोई बोझा न रखो तो उसका भी बोझा बनता जाएगा। इसी तरह की व्यवस्था परमात्मा ने हमारे अन्दर कर दी है कि मन से हम जो भी करेंगे वह बोझिल हो जाएगा और उस बोझे के नीचे हम दबे हुए उड़ नहीं सकते वहाँ पर जहाँ पर हमें जाना है। इसीलिए खोज आज तक अधूरी ही रही है। लेकिन नव निर्माण की बात मैं आप से करने वाली हूँ सिर्फ बात ही नहीं इसका अविष्कार, जो खोज निकाला है। उत्क्रान्ति के मार्ग में ऐसा नहीं होता रहा है कि कोई प्राणी अति विशेष Specialization में या विशेषज्ञ हो गया तो वो गिर जाता है, वो खत्म हो जाता है. इसी तरह से मनुष्य का भी हुआ जा रहा है कि इतना ज्यादा आपस की जो विरोध और Competiton चल रही है उससे मनुष्य ने भी अपने दिमाग को इतना ज्यादा विशेषज्ञ कर लिया है कि वो फटा चला जा रहा है उसका दिमाग और एक अब नया तरह का मानव आने की जरूरत है जो मन से परे उस शक्ति को जान ले जो इस मन को भी चलाता है और इस हृदय का भी स्पन्दन करता है। उस शक्ति को जानने के बारे में कितनी भी बातें आप करिए और कितना ही इस पर प्रयत्न करें आप वहाँ तक नहीं पहुँच सकते। ये बात निःसन्देह है। ऐसे तो सभी ने यहीं लिखा है जो मैं कह रही हूँ। कोई भी ऐसी विशेष बात तो कह नहीं रही हूँ। नानक जी को आप पढ़ें, कबीर दास जी को आप पढ़े, आप वशिष्ठ को पढ़ें, गुरुओं के गुरु जनक के बारे में आप पढ़ें, अपने देश में छोड़ो, बाहर के देशों में भी हजारों लोगों को जो पार हो चुके हैं हजारों वर्षों से ऐसा ही लिखते आए हैं, यही लिखते आए हैं जो मैं कह रही हूँ कि जो पाना है अकस्मात अन्दर होता है। लेकिन वो भी बेचारे कहते ही रह गए क्योंकि शायद वो भी उसे खोज नहीं पाए थे गर कोलम्बस हिन्दुस्तान नहीं खोज पाया था तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कुछ कम था और बाद में जिन लोगों ने उसे खोज लिया है वो उन्होंने उसे कोई नीचे गिराने के लिए नहीं खोजा। ये सामूहिक खोज है। आप भी जब उसे अलग-अलग होकर सोचते हैं तब इस तरह से बात बहुतों के दिमाग में आती है कि माताजी कुछ अलग ही बात कह रही है। नहीं। मैं इन सब खोजों की खोज का ही पता आपको दे रही हूँ। आज तक अत्यन्त कष्ट उठाकर के न जाने कितने मानवों ने इस पर ध्यान दिया । Psychologists ने भी दिया, Biologists ने भी दिया, बड़े बड़े Scientists ने भी दिया। वो भी एक हद तक जाकर के हार जाते हैं। बहुत बहुत सन्त और जो महन्त हो गए. Realized हो गए और उन्होंने भी पा लिया लेकिन दे नहीं पाए। इसका कारण समय है। परमात्मा के लिए समय अनन्त है। हम लोग उसे ऐसा सोचते हैं कि जो लोग पीछे हो गए और जो लोग आगे हो गए और जो लोग मर गए जो बड़े हो गए। कौन मरा है मैं ये पूछना चाहती हूँ ? कोई मरता ही नहीं। जितने भी मरते हैं परलोक में बैठते हैं और वापिस यहाँ लौट आते हैं। प्राणी मात्र से कुछ कुछ लोग मनुष्य हो जाते हैं लेकिन अधिकतर मनुष्य परलोक से वापिस यहाँ पर और यहाँ से परलोक! यही आना जाना लगा हुआ है। कोई मरता है तो हो सकता है कि आपमें से जो आज यहाँ बैठे हुए हैं ये भी जन्म जन्मांतर की खोज लिए हुए आज यहाँ पहुॅचे हुए हैं और उसको पा सकते हैं। अगर आप पा सकते हैं तो उसमें इतना वाद विवाद क्यों? एक साधारण सी बात है, मुझे बड़ी बचकाना सी लगती है, बहुत ही बचकाना सी बात है कि लोग हर एक चीज का राजकरण बना लेते हैं। एक माँ खाना खाने को दे वह धर्म की ओर मुड़ता है और धर्म की और जब मुड़ता है तब भी वह बाहर ही खोजता है। कारण यह है कि जो वो खुद है स्वयं है वो खोजता है, इसलिए अपने से मनुष्य भागता है। हर समय अपने से भागता है दो मिनट अपने साथ नहीं बैठ पाता। उसको अगर दो मिनट अपने साथ बैठने को कहो तो वो कहता है प्रभु ये क्या मेरे लिए ये सजा हो गई। जिसको आजकल कहते हैं। आदमी अपने से इतना क्यों उलझा हुआ है? सोचने की बात है कि मनुष्य अपने से इतना क्यों जोर से भागा चला जा रहा है? क्योंकि वो अपने से अपरिचित है, अपने सौन्दर्य से, अपने वैभव से अपने ज्ञान से और अपने प्रेम से अपरिचित आनन्द की खोज बाहर की ओर करते हुए दौड़ रहा है। आनन्द बाहर है नहीं, यह अन्दर है, आपमें है, आप स्वयं आनन्द स्वरूप हैं। आप परमात्मा स्वरूप है ऐसा सब लोग कहते है। सिर्फ बातें करने से यह बात पूरी नहीं होने वाली है। मराठी में कहते हैं कि…..। चाहे हम आपको कहें कि आप निराकार को खोजें, चाहे साकार को खोजें तो सब बातें ही बातें तो हो गई, हजारों बातें हो गई, करोड़ों किताबें लिखी गई, न जाने कितने ही जीवन बर्बाद हो गए. इन्सान की खोज का कोई अन्त नहीं मनुष्य जो कुछ भी खोजता है अपने मनसे वो मन के दायरे में Limitations में खोजता है। मन से परे की जो बात है वो इस मन से समझने वाली है नहीं। अब जैसा मेरा भाषण है ये भी आपके लिए सिर्फ बातचीत ही है, ये भी एक बातचीत ही है क्योंकि इस बातचीत से आप उस परमात्मा को नहीं जानेंगे। जितनी भी मैं इस पर बात करती जाऊँ उतना ही आपके मन मिल जाएं। उसमें परमात्मा को कोई भी Interest नहीं है। हमने परमात्मा को समझने में ही गलती कर दी है। परम तत्व को परम ही देने में Interest है। ये बात आप लिख डालिए। और इस पर भी लोग सब बात करते हैं कि परम तत्व जो है वो कुण्डलिनीयोग से पाया जाता है, ऐसा भी बहुत लोग लिखकर के गए। लेकिन कुण्डलिनी योग से कोई सिद्धि पाई जा सकती है ऐसी बात कहीं भी लिखी नहीं गई है। जिन्होंने सिद्धियों पाई हैं वो नहीं लिखते कि कुण्डलिनी से सिद्धियाँ आती हैं, कभी भी नहीं। कुण्डलिनी आपकी माँ हैं, आपके अन्दर बैठी हुई हैं, आपको पुनर्जन्म देने के लिए। वो आपको सिर्फ पुनर्जन्म देंगी, आपको सिद्धियाँ देकर के परलोक में फेंकने वाली वो मूर्ख माँ नहीं है। जितनी समझ आपके पास है उससे कहीं अधिक समझदार है वो कहीं अधिक प्रेममय हैं। वो आपको गलत जगह में, असत्य में ढकेलने वाली दुष्ट माँ नहीं हैं । कुण्डलिनी के योग से जब तक परमतत्व की पहचान नहीं होती है तब तक वो कुण्डलिनीयोग नहीं है और वही सहजयोग है। और इसकी व्यवस्था कितनी खुबसूरती से परमात्मा ने हमारे अन्दर की है, वो भी एक समझने की बात है। जब बच्चा माँ के पेट में आता है तो जड़-तत्व से उसका सारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार वो सब बना देता है लेकिन उसके अन्दर जब प्रकाश आता है वो माथे के तालू में से जिसे क्रि Fontanelle Bone अंग्रेजी में कहते हैं और नीचे उतरता है और अपना Brain जिसका आकार त्रिकोणाकार एक त्रिकोण के जैसा है उसमें से यही शक्ति गुजरते वक्त तीन हिस्सों में बँट जाती है ये सब परमात्मा ने किस खूबी से किया है ये जानने के लिए यहाँ पर कोई डॉक्टर हो तो वो समझ कह रही हूँ, कि सारा Sympathetic Nervous System सुषुम्ना नाड़ी है जो कि बीचों-बीच है. और उसकी पहचान एक है कि जब कुण्डलिनी उठती है तो आँख की पुतलियाँ बड़ी हो जानी चाहिए। ये तो साधारण बाहर की पहचान है किसी भी “doctor” से आप पूछ लें कि जब para sympathetic nervous system activate होती है तो पुतलियाँ “dilate” होनी चाहिए। और बाहर भी हम आपको दिखा सकते हैं अगर आपकी नजर खुली हुई हो तो क्योंकि आपको तो हर एक चीज का कोई न कोई proof ही देना पड़ता है नहीं तो कुछ समझ में नहीं आती बातें इसका भी एक proof है कि गर आप हमारे किसी कार्यक्रम में आए तो आज ही आपको दिखा देंगे। कुण्डलिनी का स्पन्दन भी आप देख सकते हैं। आप जानते हैं। कि सबसे पहले त्रिकोणाकार अस्थि पर कभी भी कोई स्पन्दन होता नहीं वो हम दिखा सकते हैं आप गर देखें कि त्रिकोणाकार अस्थि में स्पन्दन होता है, फिर धीरे धीरे स्पन्दन ऊपर की ओर उठता है और इसके साथ-साथ बीच-बीच में किसी-किसी जगह ज्यादा स्पन्दित होता है। वही अपने केन्द्र हैं। ये आपको दिखाया जा सकता है। और इसको आप देख सकते हैं और उसकी प्रचीति देख सकते हैं। जब कुण्डलिनी सुषुम्ना से उठेगी तभी आप पार हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए परमात्मा ने न जाने क्यों एक बड़ी जबरदस्त condition लगा दी है। एक बड़ी भारी अटकल है इसमें, जो देना ही पड़ता है। वो यह कि कुण्डलिनी सुषुम्ना पर तभी आएगी जब परमात्मा का असीम प्रेम उस आदमी में उतर पड़ेगा जब तक वो प्रेम मनुष्य में उतरेगा नहीं, कुण्डलिनी उठने वाली नहीं चाहे आप कुछ कर लें। वो नाराज हो सकती है, गुस्सा हो सकती है। लेकिन कुण्डलिनी कभी भी सकता है। इसी को हम Sympathetic और Parasympathetic Nervous System कहते हैं। हमारे शरीर के अन्दर ही दो ऐसी शक्तियों विराजमान है कि जिसके बारे में हम बहुत कुछ कम जानते हैं और जिसके बारे में हमें पता लगाने में बड़ी दिक्कतें होती हैं खासकर के Parasympathetic Nervous System के बारे में अपने योग शास्त्र में इसे सुषुम्ना, ईडा और पिंगला ऐसी दो नाडियां बताई हैं। ईंडा और पिंगला ये दोनों ही अपने शरीर में Sympathetic Nervous System का उद्भव करती है। माने उसका जड़तत्व जो है वो Sympathetic Nervous System है। अब ऐसा समझ ले कि परमात्मा ये Petrol अपने सिर में यहाँ से भर देते हैं और Petrol भरते वक्त वो कुछ ऐसी घटना घटित होती है कि प्रिज्म के अन्दर से गुजरने वाले उनके किरण आपस में इस तरह से आकर के और फिर मुड़ जाते हैं, जिसे Reflect होना कहते हैं और फिर नीचे जाकर के उनकी ईडा और पिंगला, ऐसी दो नाडियाँ बनती है और जो बराबर बीचों बीच शिखर पर से बीचों बीच उतरने वाले किरण, आपकी कुण्डलिनी बन करके जो त्रिकोणाकार अस्थि, अपने मज्जा तन्तुओं के नीचे बना हुआ है, उसमें वास करती है। इससे एक बात तो जाहिर हो गई कि हमारी कुण्डलिनी जो है वो ऐसी जगह बैठी हुई है जिसका सम्बन्ध सेक्स से कुछ नहीं है। अब आप गर किताबें पढ़े तो कुण्डलिनी शास्त्र पे तो आप सब जान जाइएगा कि ऐसा होता है, वैसा होता है, ये है वो है लेकिन कुण्डलिनी को उठाने वाले वो बहुत कुछ मुझे भी मिले हैं और मैनें भी जाने हैं वो सब Sympathetic से आपको ले जाते हैं, सुषुम्ना से उठाते नहीं है। उसकी एक पहचान है, आप में से गर कोई Doctor होगा तो समझ लेगा इस बात को जो मैं नहीं उठ सकती है जब तक वो असीम प्रेम सुषुम्ना के अन्दर जगह बनी हुई है, खास इसकी जगह बनी हुई है, हमारे नाभि चक और अनहत् चक के बीच में एक बड़ी सी जगह बनी है। जब तक उसके अन्दर ये प्रेम उतरेगा नहीं तब तक सुषुम्ना से यह प्रवाह उठने वाला नहीं। जैसे समझ लीजिए कि दो सीढ़ियों हैं और बीच में एक सीढ़ी है, उस सीढ़ी में और हममें कुछ अंतर है। क्या ? इस अन्तर को आप किसी भी तरह से लाँघ नहीं पा रहे है, उसमें कोई पुल नहीं है जिसको आप लांघकर जाए। और ये दो सीढ़ियां बराबर ईडा और पिंगला नीचे जमीन पर लगी हुई हैं. Sympathetic Nervous System की Left और Right ये दोनों ही जमीन पर लगी हुई है और बीच वाली अधान्तरी लटकी हुई है जो परम में पहुँचाती है। अब Sympathetic Nervous System की जो दोनों सीढ़ियाँ है, अब अगर कोई Psychologist हो तो मेरी बात समझ सकता है, वो एक जो Left Hand की तरफ से है, ओर है वो आपको पहुँचा देती है, Ego में अपने अहंकार में, और जो Right Hand Side में है वो आपको पहुँचा देती है आपके Super ego में प्रतिअहंकार में ये दोनों मिलकर के हमारे माथे पर छा जाते हैं, जैसे कि कोई Balloon न हो! इस तरह से ऊपर आ जाते हैं और आकर के इस जगह जहां हमारा तालू होता है, उस पर आकर के दोनों मिल जाती हैं। कभी कभी तो ये पूरे सारे सिर पर ही छा जाते हैं। कभी तो प्रतिअहंकार जबरदस्त होता है और कभी अहंकार जो भी ज्यादा जबरदस्त होता है वो हमारे दिमाग पर छाया हुआ है और आकर के वो हमारे इस मार्ग को रोक देते हैं, बन्द कर देते हैं। अब जो Petrol हमारे अन्दर Para Sympathetic Nervous System से मरा गया था, जो कुण्डलिनी से भरा गया था, उसका गेट बन्द हो गया। अब हम अलग हो गए, अब हमें लगा कि भई हम कोई है! अब अहंकार शुरु हुआ, हमें लगा कि हम हैं। अब यही है भागने का अपने से भागने का कारण है क्योंकि हम जो हैं, हमको हम जानते ही नहीं कि हम क्या हैं। आप मेरी ओर इतना चित्त लगाकर के जो सुन रहे है मैं आपकी ओर अपना चित्त नहीं लगा सकती। मैं कहूँ आप अपनी ओर चित्त लगाए तो आप लगा ही नहीं सकते हैं क्योंकि आप बह गए हैं उस प्रेम में जो आप है। एक जो प्रतिहकार है. Super ego है, उस पर बोझे जितने भी हमारी ओर से बढ़ते जाते हैं, हर तरह के बोझे, उसमें आप कह सकते हैं कि इस तरह के बोझे जिसमें हम आप को सिखाते हैं ये करो, वो करो, ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए, इधर नहीं जाना चाहिए, उधर नहीं जाना चाहिए, ये नहीं खाना, वो नहीं खाना चाहिए, इस तरह की चीजें या ऐसा कहें कि हम बड़े बड़े भाषण देते हैं लोगों को कि आपको हिन्दुस्तानी बनना चाहिए, आपको जापानी बनना चाहिए, आपको इससे नफरत करना चाहिए, उससे नफरत करना चाहिए, हम हिन्दु हैं, हम मुसलमान है, हम इसाई है, अनेक तरह के सब Conditionings जो हैं ये बोझ हैं उससे यह Super ego दब जाता है। और जो अहंकार है वो ये कहता है नहीं हम तो ये हैं, हमें ये करना चाहिए. वो करना चाहिए। जो कहता है नहीं करना चाहिए वो तो Super ego है और जो कहता है करना चाहिए वो ego है। असल में हम न तो कुछ नहीं करते हैं और न तो कुछ करते हैं। करने वाला तो कोई और ही है। बेकार ही में बचकानापन है करने वाला अपना काम तो करता ही है और करेगा ही। लेकिन यही जड़ता हमारे अन्दर दोनों है कि हम उस Petrol को इस्तेमाल करते हैं। इन दोनों ईड़ा और न पिंगला से अपने Sympathetic Nervous System से, इससे हम अपने को Conditioning कर लेते हैं, बोझे में डाल लेते हैं। अब बीचोंबीच सुषुम्ना नाड़ी है। अब बहुत से लोगों ने मुझसे ऐसा भी कहा कि माताजी आप तो इनके विरोध में बोलते हैं, उनके विरोध में बोलते हैं। भाई मैं किसी के विरोध में नहीं बोल रही हूँ। लेकिन तुम तो गलत सीढ़ी पर चढ़ गए न, उससे तो उतारना पड़ेगा ही, जो बीच की सीढ़ी में तुम्हें चढ़ाना है। इसमें किससे मैं विरोध कर रही हूँ? मेरी समझ में नहीं आता कि इसमें किसी से विरोध करके मुझे क्या करना है? मैं तो आपको बता रही हूँ कि आप गलत सीढ़ी पर चढ़ गए हैं। सभी उतर आइए। मैं तो बड़े बड़े गुरुजनों से मिलने जाती हैं, उनसे बात करती हूँ कि आप कर क्या रहे हैं? कुछ करने से परमात्मा नहीं मिल सकता। इन लोगों से कुछ करवाइए नहीं, ये करने धरने से परमात्मा मिल नहीं सकता। ये आपको मैं क्या बता रही हूँ आप वशिष्ठ पढ़ें, नहीं तो आदिशंकराचार्य को पढ़े जो कि historical चीज है। उनको पढ़े, उन्होंने भी यही कहा है कि आप परमात्मा को पाने के लिए कुछ कर नहीं सकते। लेकिन अन्तर है, उनमें और मुझमें जरा सा थोड़ा सा फर्क है। इतना ही अन्तर है कि उन्होंने कहा था कि परमात्मा को पाने के अधिकारी बहुत ही कम हैं, इसलिए ठीक है कि कुछ भक्ति में रहें और कुछ अपने ऊपर में योग लगाकर अपने मन को अनुशासित करें। लेकिन उन्होंने नहीं कहा था कि अनुशासित हो, फिर चाहे वो किसी भी तरह का हो और वैसा भी मन जो विषयों के पीछे दौड़ता है और अपने को जिसे indulgence कहते हैं, दोनों ही मन इस कार्य के लिए व्यर्थ हैं। ऐसा सुन्दर मन जो छोटे बच्चों जैसा निष्पाप हो, वो ही इस परमात्मा को पाने का अधिकारी है। ऐसा उन्होंने साफ-साफ कहा है। लेकिन कौन पढ़ता है उनको? कोई पढ़ता जो नहीं ना! प्रश्न तो ये है कि हम लोग सभी को पढ़ते हैं और उसमें से उनको ज्यादा पढ़ते हैं जिन्हें धर्म के बारे में कुछ मालूम ही नहीं। और मालूम भी है तो थोड़ा बहुत मालूम है जो अपने को बहुत हिन्दु कहलाते हैं उनको पहले आदिशंकराचार्य को पढ़ना चाहिए। आदिशंकराचार्य ने ही तो हिन्दु धर्म की संस्थापना करी थी, फिर आदिशंकराचार्य को क्यों नहीं पढ़ते हैं? दुनिया भर के लोगों को पढ़ते हैं, उनको क्यों नहीं आप पढ़ते? उनको आप जानते क्यों नहीं? उनमें मुझमें जो अन्तर है वो इतना ही है वो कहते थे बहुत ही करोडो में एक दो होते हैं मैं कहती हूँ करोड़ो में लाखों तो है हीं। ये आशावाद का अन्तर नहीं हैं यह समय का अन्तर है। समा ऐसा है कलियुग का समा है ही बड़ा घनघोर युद्ध का समय है। अन्धकार और प्रकाश का घनघोर युद्ध का समय चल रहा है। आपको पता नहीं क्योंकि आप तो मुझे ही देख रहे हैं। अपने से परे आप किसी को देख नहीं पा रहे लेकिन जो लोग Realized हैं वो जानते हैं कि कैसा कैसा जंग बाँधा गया है। Negative और Positive forces दोनों अपना जोर बाँध रहे हैं। Sympathetic और para sympathetic का पूरा जोर है Sympathetic. Para Sympathetic को छूकर चली जा रही है और Sympathetic कितनी भी छू ले गर Para Sympathetic अनन्त से एकाकार हो जाएगी तो उसमें भरता ही रहेगा कितना भी आप Petrol खर्चा करें, गर पेट्रोल पम्प ही लगा हुआ है तो फिर क्या डरने का? ये सारे Sympathetic का प्रश्न है, Sympathetic at uit Active Consciousness की side है, जहाँ से आप सारा काम करते हैं, हमे आगे बढ़ना चाहिए। उस पर उनका चित्त मेरा लड़का जो है वो ठीक हो जाए, मेरे बच्चे जो है वो ठीक हो जाएं, मेरा पति जो है वो ठीक हो जाए! फिर कोई कहेगा, वो मेरे पैसे का मामला है ठीक हो जाए! चित्त कहाँ है? अब आप Realized हो गए तो भी चित्त वही है जिसे आप छोड़कर आए हैं। जिसने चैतन्य पर चित्त रखा है वो बहुत ऊँचा उठ गया है। आपके बीच में भी ऐसे लोग बैठे हुए हैं जो पढ़े लिखे हैं, देवता स्वरूप है, यह लोग वन्दनीय है, यही देवता हैं, इन्हीं को देवता कहना चाहिए जिनका Rebirth हुआ है बेकार की बातें करने वाले लोगों से झगड़ा करने की किसी को भी कोई जरूरत नहीं। जिनको आना हो आए नहीं आना है नहीं आए। उनसे झगड़ा करने की इस पर बाद विवाद करने का समय है ही नहीं क्योंकि वो लोग वाद-विवाद ही करते रहेंगे। आदिशंकराचार्य ने भी कहा था न कि निम्न कोटि के लोग, उनको तो ठीक है वो अपना किसी तरह से अपने मन को अनुशासित करें और किसी तरह से अच्छे से रहें, चोरी चकारी से बचें एक अच्छे सामाजिक घटक बन कर रहें किन्तु परम को पाने वाले लोग परम की ओर दृष्टि रखने वाले लोग, ऐसी चीजों से सन्तुष्ट होने वाले नहीं । जब तक परम आपने पाया नहीं आप को मेरे ऊपर भी बिल्कुल विश्वास नहीं करना चाहिए। इस ढकोसलेबाजी की बिल्कुल जरूरत नहीं किसी भी चीज आपको कोई भी 1 बताए आप कुछ विश्वास न करके पहले अपने अन्दर पा लीजिए तभी आप मेरे ऊपर भी उपकार करेंगे। यहाँ कोई बाजार खोलना नहीं है, पैसा कमाना नहीं है, माल कमाना नहीं है। सिर्फ मुझे यहाँ मनुष्य का परिवर्तन करने का है। इस जन्म में नहीं हुआ तो अगले जन्म में देख लेंगे तो हमें 1 अनन्त में ही रहने की आदत सी है। लेकिन अब भी 1 Energy इस्तेमाल करते हैं, वो गर अति इस्तेमाल हो तो कैंसर जैसा रोग हो जाता है और जिस तरफ में Super Ego होता है वो ज्यादा इस्तेमाल हो तो पागलपन आ जाता है। हम किसी को ठीक ठाक नहीं करते हैं। यह भी कहना कि हम बीमारियों ठीक करते हैं एक तरह से गलत ही बात है क्योंकि वो तो Para Sympathetic Nervous System जो कि इन दोनो ही System को ठण्डा कर देती है अपने आप ही मनुष्य जो है वो ठीक हो जाता है। गर कोई पागलपन होगा तो वो भी ठीक हो जाएगा और कोई गर आपके अन्दर में Over Activity से कैंसर जैसा रोग होगा तो वो भी ठीक हो जाएगा। कैंसर का इलाज सिर्फ सहज योग है और कोई उसका इलाज संसार में नहीं है यह बात सिद्ध हो जाएगी। हम जानते हैं थोड़े से ही दिन में यह बात सिद्ध हो जाएगी और हमने बहुतों का इलाज भी जो किया है कैंसर का वो भी लोग यहाँ बैठे हुए हैं, वो भी बता सकते हैं । तो भी, एक बात पहले और शुरू से ही कह रही हूँ कि चित्त हमारा कहाँ है? चित्त क्या उस कैंसर पे है जो इस शरीर को जर्जर किये हुए हैं जो कि जड़ है? हमारा चित्त गर चैतन्य पर है तो •अन्य की बात सोचनी चाहिए। जब तक हम अपना चित्त चैतन्य की ओर नहीं रखेंगे तो जड़ भी हमें सताएगा सारा काम चैतन्य का है जड़ता का कोई काम ही नहीं है। हमको इतनी आदत जड़ता की हो गई है कि मनुष्टी छोटी जड़ बातों से चिपक जाता है, छोटी छोटी जड़ बातों से जैसे में आपसे कहूँ कि एक स्त्री हमारे पास आती थी, उनको Realization हो गया और वो काफी अच्छे से देने वगैरा लग गई। लेकिन Realization का मतलब भी यह तो नहीं कि आप व्यस्त हो गए, आपका पुनर्जन्म हो गया आप निरक्षर हो गए। अब यह सोच लेना चाहिए कि जो कोई मर चुके हैं वो मर चुके हैं। उनकी बातें करके मत घबराइये। चित्त को अपनी ओर रखें। शायद उनमें से आप एक हो जिन्होंने कुछ कुछ लिख दिया था, हो सकता है कि आप ही वो बड़े भारी लोग हों जिन्होंने बहुत कुछ लिखा हो और आज भी यहाँ जन्म लेकर आए हैं, अपना दावा लेने आए हैं। जो हो चुका सो बीत गया। सहजयोग में जो साधक होता है उसे कुछ भी नहीं करना चाहिए। जो डूब रहा है पानी में वो कुछ न करे तो अच्छा है। लेकिन बाकी के तैराक लोग उसे बचाते हैं और उसे उठाते हैं। यही साधारण तरह से सहजयोग आप समझ लें। जो लोग अपने में उतर गए हैं, जो लोग पार हो गए हैं, जो अपने अन्दर एकाकार अपनी शक्तियों से हो गए हैं, वही सब कुछ करेंगे। आप शान्त बैठिएगा जो अभी तक पार नहीं हुए हैं। आपके सूत्र में आकर के वो आप को प्यार देंगे, आपके सूत्र में आकर वो आपके चकों को ठीक करेंगे क्योंकि आप अभी अपने चकों को जानते ही नहीं। जब आप पार हो जाएंगे तब आप मेरी बात जानिएगा कि हाँ यहाँ चक है, यह चक्र घूम रहा है, वो चक चल रहा है, उनका ऐसा चक्र है। तभी आपको Collective Conscious जिसे कहते हैं सामूहिक चेतना उसका आभास होगा। पहले ही से नहीं नहीं करने वाले लोगों का यह स्थान नहीं है और न ही उनके लिये यहाँ पर कोई व्यवस्था की जा सकती है। ऐसे लोग जो कि आप है, चाहे वो कितने भी Condition में हों लेकिन जो सच्चाई चाहते हैं और जो चाहते हैं कि हमारे अन्दर परिवर्तन हो जाए, वो सिर आँखो पर हमारे और मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस जन्म में ही उनको मिलेगा चाहे उनकी कैसी भी Conditioning हो गई हो, चाहे उनकी कुण्डलिनी . 1 रही है उसका भी राजकरण बना लेते हैं, कैसे कार्य चलेगा? ये राजकरण नहीं है। ये तथ्य है, ये सत्य है। एक बहुत बड़ी खोज है। यहाँ पर जो लोग Realized लोग बैठे हैं वो समझ रहे हैं, मैं क्या कह रही हूँ। धर्म की खोज में मनुष्य परलोक ही तक पहुँच पाया है, अभी तक परम तक नहीं पहुँच पाया। और जो परम तक पहुँचे भी थे वो परम को नीचे नहीं ला सके और लोगों के लिए ये बात सत्य है। जैसे आपके अनेक जन्म हुए हैं मेरे भी अनेक जन्म हुए हैं। इन सब बड़े-बड़े खोजने वालों से मेरा भी बहुत नजदीकी संबंध रहा है और वो लोग जितने मेरे अपने हैं शायद आप लोगों के नहीं हैं। जो लोग बड़े-बड़े झण्डे लगाते हैं कि हम मुसलमान हैं, हिन्दु हैं, ये हैं, वो है, वो सिर्फ एक वकीली लेकर के झूठमूठ से आए हैं। उनके पास कोई भी guarantee नहीं है कि पिछले जन्म में हो सकता है जो हिन्दू है वो मुसलमान रहा हो, जो मुसलमान है वो इसाई रहा हो। जब जन्म जन्मांतर की बात है, जब अनन्त की बात तो सोचना भी उसी Level पर, उसी स्तर पर होगा। वो पर ऐसा है कि नही, जो कुछ परम तत्व कठिन है वो gross नहीं, जो कुछ परम है वो जड़ है वो जड़ नहीं। जो कुछ जो सूक्ष्म है वो जड़ नहीं। इस बात को आप ठीक से समझ लें। वो जड़ में प्रकाशित हो सकता है किन्तु परम जड़ में Interested नहीं है, उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। जैसे कि बहुत से लोग मुझे बताते हैं कि वे एक साधू-सन्त थे वो परमात्मा से कुछ माँग रहे थे और इनको परमात्मा ने दे दिया। दिया होगा, लेकिन परमात्मा ने नहीं दिया, ये मैं बता सकती हूँ। परमात्मा को इसमें कोई भी Interest नहीं है कि आपके इतने बच्चे पैदा हो जाएं या आपको ज़मीन मिल जाए, आपको घर मिल जाए, आपको दुनिया भर के ऐशो आराम के साथ कैसा भी खिलवाड़ हो गया हो। खिलवाड़ बहुत हो चुके हैं, पर मैं कहती हूँ कि किसी की भी कुण्डलिनी में खराबी आ गई हो, उसपर लोग मुझे कहते हैं कि आप विरोध कर रहें हैं! भई पागलपन की बात है! एक माँ है जो बच्चे की कोई चीज बिगड़ी देखती है तो उससे वो बताती है तो किसी का विरोध नहीं करती है तुम्हारी अबोधिता में, सादगी में गर तुम्हारा कुछ बिगाड़ हो जाए, तो उसको हम बैठे हुए हैं उसे ठीक करने के लिए। लेकिन पहले ही इस तरह की बात सोच लेना ये कौन सी आर्तता है? यह कौन सी माँ है? गुरु का आज, गुरु पूर्णिमा का आज दिवस है और सहजयोग का पूर्णवर्णन विषद रूप से करना इतने छोटे समय में सम्भव नहीं। मेरा आज विचार था कि काफी विषय पर मैं कह सकूंगी लेकिन मैं जानती हूँ कि यह विषय अत्यन्त विषद सागर की तरह, और अनेक ध्यान की क्लास में मैंने लोगों को बताया है। इतना ही नहीं जो लोग Realized है. उस स्तर पर आ गए हैं कि इस बात को समझें क्योंकि उनके हाथ से वो प्रवाह निकल रहा है, वो आनन्द लहरियाँ बह रही हैं, वो प्रेम की लहरियाँ बह रही है जिससे वो समझ सकते हैं कि Collective Consciousness क्या है, सामूहिक चेतना क्या है। इसको भी समझना चाहिए कि ये कौन सी चीज है। अभी बहुत से लोग आपमें ऐसे भी होंगे जो मेरी ओर हाथ करके बैठें तो आपके अन्दर ऐसा लगेगा कि जैसे हाथ थरथरा रहें हैं, कंपकंपा रहे हैं। आपको ऐसा लगेगा और मुझसे लोग कहेंगे ये Vibrations आ रहे हैं। ये Vibrations नहीं हैं। वो तो आप हमारे विरोध में हैं, आपमें कोई चीज हमारा विरोध कर रही है पूरा समय ये जो हम प्यार आपको दे रहे हैं उसके विरोध में थरथरा रहे हैं। ये आप हमारे विरोध में खड़े हैं इस लिए आप थरथरा रहे हैं, वो Vibration नहीं हैं और Vibration तो तभी हम मानते हैं जिस वक्त आपके सहस्रार का चलना रुक जाए। कबीर दास जी ने कहा है कि शिखर पर अनहद बाजोरे शिखर पर अनहद् की आवाज आती है, माने हृदय में जो स्पन्दन है वैसी आवाज आने लगती है ये तो हुई जबतक टूटा नहीं, जब टूटने पर सारी ही आवाज टूटकरके, सारी ही आवाज टूटकरके आप परमात्मा से एकाकार हो जाते हैं तब न कोई आवाज आती है, न कोई चीज दिखाई देती है, न कोई चीज दृश्यमान होती है। बहुत से लोग कहते हैं कि हमें दिव्यदृष्टि है, हमें दिव्य फैलाना है। ये सब किसलिए? दृष्टि से क्या होता है? दृष्टि से क्या मिलने वाला है? दृष्टि से ही गर सब कुछ मिलने वाला होता तो फिर खोज काहे की? इस दृष्टि से मिलने वाला वो नहीं और इस कान से सुनने वाला वो नहीं है। किन्तु इसको जानना है अन्दर से जिसने उसे अन्दर से जाना है वही उसे समझ सकता है। दृष्टि से तो बहुतों को दिखाई देते हैं, बड़े बड़े करिश्में दिखाई देते हैं, बड़े बड़े लोगों को चित्र दिखाई देते हैं। मुझे बहुत से लोग आकर बताते हैं कि उसको चमत्कार हैं। मैं कहती हूँ बेटे उससे परे रहो। यह सब परलोक, सब मरी हुई चीजें हैं। इससे परे परमात्मा एक अनुभव है ये एक अनुभव है। इससे परे परमात्मा है, इसे छोड़िए यह सब कुछ छोड़कर निराकार में जब आप एकाकार परमात्मा से होंगे तब इन सब चीजों का अर्थ बनेगा जो साकार बनी बैठी है। इस आनन्द लहरी से लोगों ने बहुतों को ठीक भी किया, बीमारियाँ ठीक हुई। लेकिन जो सबसे बड़ी जो चीज हुई है, जिसका मुझे बहुत आनन्द है, कि दस आदमी पार हो गए। सबने मिलकर सामूहिक किया, पार हो गए। अब आप यह कहेंगे कि इतनी जल्दी कोई पार होता है? नहीं होते, बहुत से नहीं होते, चार चार साल से लोग हमारे पास आ रहे हैं, बहुत बड़े-बड़े लोग हैं, कोई तो बहुत भारी Minister Saheb हैं, कोई गवर्नर साहब हैं, कोई कुछ है ! नहीं होते तो नहीं होते, हमें इससे क्या करना? हमें किसी से पैसा तो लेना है नहीं कि आप हमें दो हजार दे दीजिए, हम पार कर दें, Certificate दे देंगे! जो नहीं हुआ सो नहीं हुआ, जो हुआ सो हुआ। अभी हम अमेरिका गए थे। वहाँ पर एक साहब बहुत बड़े राजा है वो कहीं के वहाँ मिले, वो हमारे साथ थे वो हमसे कहते हैं ये क्या श्रीमाताजी जो आता है आप उसको पार करते हैं हमको नहीं करते हैं, हमनें क्या किया? हमनें कहा बेटे हम तुमसे कुछ कहेंगे नहीं क्योंकि तुम्हें दुख होगा। तुम धर्म पर इतना लेक्चर देते हो तुम कभी धर्म में उतरे हो क्या? यह रात दिन जो तुम अपनी जान को मारे ले रहे हो वो किसके मारे ? तुम जरा इसे छोड़ो, थोड़ा सा परमात्मा पर छोड़ो। चार दिन बीत गए उसने कहा भई आज तो हम मान गए, हम India में गए तो सब लोगों ने हम से कहा कि तुम तो भईया एकदम पार हो गए और तुम हमारा कार्य करो तुम हम को रुपया दो और ये करो सबने हमें Certificate दिया! मैने कहा मेरे पास नहीं चलता बेटे क्या करूं? वो तो जो होएगा सो होएगा। इसमें किसी की चापलूसी किसी की Recommedation कुछ नहीं चाहिए। ये इतना Ultra modren है कि इस पर किसी का असर नहीं चलता। जो होगा सो होगा, जो नहीं होगा सो नहीं होगा। अब जो नहीं हुए वो नाराज हो जाते हैं और मेरे खिलाफ जाकर कुछ कुछ बोलने लग जाते हैं। कुछ बोलें, अब हम क्या करें जो नहीं हो रहे तो! हम तो चाहते हैं कि सबको हो, रात दिन मेहनत कर रहे हैं कि आपको हो जाए लेकिन आप नहीं होते हो तो हम क्या करें? आपकी रुकावट है। ये भी सोचना चाहिए कि किसी को कहते हैं, किसी को नहीं कहते और सब लोग कहते हैं कि हाँ हो गया, जितने भी खड़े हैं कहते है हाँ हो गया तो हो और गया। सब लोग कहते है कि इसका सहस्रार चल रहा है. मैंने कहा नहीं सब का ही चल रहा है। इसमें से कोई तो सत्य होगा। बीमारी को ठीक करना सहज योग का कार्य नहीं ये जान लेना चाहिए क्योंकि बहुत से लोग ये कहते हैं उन्होंने भी ठीक किया, उन्होंने ठीक किया किया होगा, कैसे किया होगा? पता नहीं सहजयोग से सिर्फ कुण्डलिनी की जाग्रति और परमात्मा को पाने की ही बात है और कोई नहीं है। और ये कार्य जो है इसका आप जड़ से सम्बन्ध नहीं जोड़िए कभी भी इसका जड़ से सम्बन्ध जोड़ करके इसको जड़ में नहीं आप जान सकते। क्योंकि बीमारियों तो हजार तरह से ठीक हो सकती है। आपने सुना होगा डॉक्टर लैंग एक आदमी था, लन्दन में बहुत बड़ा डॉक्टर वो मर गया अकस्मात वो मर गया उसकी इच्छाएं अतृप्त थी तो एक Soldier था वियतनाम में उसके Superego में वो घुस गया। उसको कहने लगे तुम London चलो मेरी लड़की के घर वहाँ पहुॅचे तो उन्होंने उनसे कहा उनको कहो कि मैं आया हूँ तुम्हारे अन्दर तो लड़के ने कहा इसका क्या विश्वास? तो उन्होंने उसको सब बताया, जो कुछ भी उनके बीच में गुप्तवार्ता, Secret हुए थे वो सब बताए। उसको विश्वास हो गया। उसने कहा तुम फिर से मेरा Organisation शुरु करो, मैं तुम्हारी मदद करूंगा क्योंकि यहाँ परलोक में बहुत से डॉक्टर हैं जो Menifest करना चाहते हैं, जो अवतरित होना चाहते हैं। उनका बड़ा भारी International Organisation है. सच्चे लोग हैं, कहते हैं हम लोग झूठे नहीं इसको भगवान का नाम नहीं देते हैं। उन लोगों का ऐसा है कि उनको आप चिट्ठी लिख दीजिए तो वो आपको लिखकर भेजते हैं कि दस बजे उतने Time पर कोई आदमी आपके पास आकर कुछ कर जाएगा, आप आराम से देखते रहना। और बराबर उसी वक्त आपको कुछ लगता है कि कुछ हुआ अपने अन्दर में और आप ठीक भी हो गए। बहुत से लोग ठीक भी हुए है लेकिन तो भी ठीक करने से केवल शरीर ही तो ठीक किया है, उससे परम तत्व तो किसी ने नहीं पाया! परम तो मिला नहीं, ये शरीर तो यही छूट जाएगा और फिर वहाँ जाकर फिर यहीं आना है और जिन पर वो ऐसे प्रयोग कर रहे हैं वो ये भी नहीं जानते, वो भी अबोध है, वो भी उनका बचकानापन है! वो जानते नहीं है कि जिस Spirit को वो आज इस्तेमाल कर रहे हैं वही कल उलट कर हमारे ऊपर आएंगे। मैं सोचती हूँ Dr. Lang थोड़ा सा जानते थे, नहीं तो अपनी लड़की के अन्दर क्यों नहीं घुसे? वो एक Soldier के अन्दर जाकर क्यों घुसे? और Spirit का देह जो होता है उस पर ये जड़ नहीं होता, इसलिए बहुत कुछ देख सकता है बनिस्बत हमारे। जिसको कि आप Para Psychology कहते हैं, जिसे कि आप आत्मा का आशीर्वाद कहते हैं, जो कूदना होता है, जो चीखना होता है, चिल्लाना होता है और सम्मोहन करना होता है सारा Spirit का काम है। उसमें कुछ अच्छे Spirit भी होते हैं कुछ Spirit बहुत ही….. जैसे हम हैं वैसे Spirit भी हैं। इसमें राक्षस भी होते हैं, महादुष्ट भी है। आप उन्हें आज देख नहीं रहे, हो सका तो बाद में आपको में दिखा भी दूंगी, जैसे आज में आपको कुण्डलिनी दिखा रही हूँ। ऐसा समय आजाय तो मैं आपको ये भी दिखा दूंगी। लेकिन है। उनका वास्तव्य आप देख सकते हैं, उनका असर आप देख सकते हैं, उनका असर आप देख सकते है और हर एक धर्म में उनके बारे में लिखा है। हिन्दुओं में सुर-आसुरों की बात लिखी है। जो है सो है। जब आप positive की बात करेंगे तो Negative आपको दिखाना ही पड़ेगा कि ये positive है और ये Negative है जो धर्म और अधर्म की बात नहीं कर सकता वो हवाई बात है सिर्फ धर्म की बात करने से कैसे होगा?धर्म भी है और अधर्म भी है। उसकी पूरी सारी रेखा है, जो धर्म है वो अधर्म नहीं हो सकता, जो अधर्म है वो धर्म नहीं हो सकता। इसका Confussion कलियुग की वजह से कर दिया, लेकिन ऐसी बात नहीं है, जो Negative है Negative है जो positive है वो positive है। जो Negative चीज है उसको समझ लेना चाहिए। Negative का मतलब है मरी हुई, Dead sympathetic में बैठी हुई वो है, और उस Negative का असर बहुत ज्यादा उस जगह जब होता है जहाँ पर मनुष्य जड़ होता है जैसे बम्बई शहर में हम लोग बहुत जड़ हो गए हैं। रात दिन पैसों की उनकार, Election के झण्डे! इन सब चीजों में इतना चित्त उलझा रहता है। रात दिन यह पढ़ पढ़ कर और सुन सुनकर मनुष्य का चित्त ही नहीं जाता है वहाँ पर Enquiry ही नहीं है, खोज ही नहीं है! अरे हम क्यों जी रहे है! क्या यही सब करने के लिए? उनके गुण्डे ने वहाँ मारा, उन्होंने जाकर उनकी बुराई करी, उन्होंने जाके उनको ऐसा किया! क्या यही सब करने के लिए हम संसार में आए हैं? मनुष्य का चयन गलत है। इस जड़ तत्व से बहुत बच कर रहिए लेकिन ये जड़ तत्व तो आपका अपना घिराव है। इसके अलावा भी collective subconscious है। जिसे 1 कहना चाहिए परलोक। उससे भी उत्थान हो रहे हैं, वही उत्थान हमारे सहजयोग में सबसे ज्यादा हो रहे हैं। और जिस आदमी पर ऐसा कुछ हो गया हो उसके लिए बहुत कठिन हो जाता है कि वो सहजयोग में परमात्मा को पाए। इसमें दोष हमारा नहीं है। सच बात है इसमें हमारा कोई भी दोष नहीं। दोष न आपका है न हमारा है। थोड़ा आपके कर्मों का जरूर होगा नहीं तो आप ऐसी जगह क्यों गए जहाँ पर जाकर के आप पर ऐसा दोष लग गया? सतर्कता में स्वयं ही अपने आप होने वाला जीवन का विकास यही सहजयोग है। भूत-प्रेत Spirit, सन्त भी, इनसे आप परम नहीं पा सकते, वो मरे हुए लोग हैं। परम सिर्फ जिन्दा में ही आ सकता है, मरे हुए में गर जाता है तो क्यों वो यहाँ आ रहे हैं हमारे ऊपर में, वहाँ क्यों नहीं बैठते? जिन्दा होना चाहिए। आदमी जब तक जिन्दा नहीं होगा, सतर्क नहीं होगा, उसकी चेतना जब तक पूरी तरह से जागृत नहीं होगी तब तक उसके अन्दर सहजयोग नहीं उतर सकता पूर्ण जागृत अवस्था में जो चीज आप पाते हैं वो ही परम है। समाधि में लोग सोचते हैं कि आँखे ऊपर हो गई गुरु हो गए हम दो-दो घण्टे बैठे हुए हैं। यह सहजयोग से नहीं होने वाला ये सब आपका Subconscious है जिसे कि मैं कहती हूँ मृतलोक, जिसमे आप उतर रहे हैं। इसका कोई भी आपको चिरस्थायी फायदा नहीं है। जिस मनुष्य को परम पाना है उसको सोच लेना है कि जो मैं सतर्कता में, पूरी स्वतंत्रता में पाऊँगा वही मैं पाऊँगा। पूरी स्वतंत्रता आपको, यहाँ तक किसी भी तरह का भक्ति भाव मेरे प्रति न हो, बिल्कुल नहीं होना चाहिए। जैसे एक साधारण सौम्य स्त्री होती है वैसे ही मैं हूँ घर गृहस्थी का एक साधारण स्त्री हूँ, ऐसा ही समझ लीजिए कुछ विशेष हूँ ये सोचना ही नहीं। ऐसा ही सोचकर आइए। ये स्वतंत्रता भी होनी चाहिए। तभी आप पाएंगे चाहे आप दस हों, चाहे आप एक हो, हमारे लिए काफी है। इसके number से नहीं होता है हालांकि number भी, बढ़ाना होगा। Number जरूर बढ़ाना होगा इसमें कोई शंका नहीं । कार्य जोरों में गर हो जाए तो हो सकता है। हालांकि परम उपर से बहुत अलग है। एक नव निर्माण के लिए एक नई चेतना के लिए, एक नए तरह के मानव की इसमें व्यवस्था की हुई है। इस Para Sympathetic में एक प्रेम है, एक ज्ञान है, एक सौन्दर्य शैली मनुष्य की रचना होनी ही पड़ेगी और होके ही रहेगी। आप लोगों ने इतनी देर तक मेरा भाषण सुना है, गुरु पूर्णिमा के दिन मुझे यही कहने का है कि इस जन्म में मैं गुरु हो गई और तो किसी जन्म में ये कार्य नहीं किया था। पहली मरतबा गुरु का कार्य करना पड़ा। शायद वो भी माँ को ही गुरु होना पड़ता है। ये कलियुग का मामला है इसलिए नितांत परमात्मा की जो भी शक्ति है ये किसी माँ के हृदय से बहे, उसी की करुणा और उसी के प्रेम में कुण्डलिनी को संजोया जाए और उस शिखर तक पहुँचा दिया जाए जहाँ पर कि वो अपने दोलन में अपने आनन्द में अपने स्थान में विराजित हो! ये आज हमारे ही भाग्य में है, इसीलिए इस जन्म में ये गुरु का स्थान स्वीकृत किया है। माँ गुरु बन जाए. ऐसा कहीं होना बड़ा कठिन है क्योंकि माँ अत्यन्त कोमल होती है। गुरु तो मार भी देगा, पीट भी देगा डॉट भी देगा, लेकिन माँ एक भी कठिन शब्द बोलते वक्त उसके हृदय में कचोटती है, तकलीफ होती है- बहुत ही, और जब वो देखती है कि मेरे बच्चे कितनी साधना से आए हुए हैं और इनको किस तरह से इनको संजोकर के संभाल करके, प्यार से उस किनारे ले जाना है। तब उसकी जिम्मेदारी भी इतनी बढ़ जाती है। उसका सारा व्यक्तित्व ही दूसरा हो जाता है। लेकिन आदिकाल से ही लोग कहते आए हैं कि माँ से बढ़कर गुरु कोई नहीं है। गुरु उसी को मानिए जो आपसे बड़ा हो, बड़ा हो, जो आपसे बड़ा परमात्मा हो। रामदासस्वामी ने गुरु के बारे में ऐसा कहा था कि गुरु उसे मानिए जो स्वयं तो पारस है ही दूसरों को छूते ही सोना नहीं बना देता उसे, पर पारस बना देता है। जैसा खुद है वैसा ही दूसरों को बना देता है। और इसीलिए ये माँ स्वरूप चीज है माँ बच्चों में होती है। बच्चों के गौरव में गौरव मानती है। इसलिए इस जन्म में शायद परमात्मा की यही इच्छा रही कि ये प्रेम और ये ज्ञान एक माँ के अन्दर से आपको मिले। अभी हम लोग ध्यान में जाएंगे इसके बाद में, आप लोग आर्तता से इसमें बैठे। अपने विचार, अपने विरोध, इनको छोड़ दें थोड़ी देर के लिए। इसलिए कि आपको अपना मंगल और कल्याण करना है। अपने साथ अच्छाई है, अपने साथ बुराई है, किसी भी एक चीज को पकड़े बैठे हुए हो तो उसे छोड़ दीजिए थोड़ी देर के लिए हमें आपसे कुछ लेना देना नहीं और आपकी स्वतंत्रता हमें छीननी नहीं किसी भी तरह किसी भी कीमत पर मैं आपकी स्वतंत्रता छीनती नहीं। जैसे लोग पागल जैसे किसी के पीछे दौड़ते हैं, हजारों रुपया उन्हें दे देते हैं, चीजें दे देते हैं! अरे चीजें लेते किसलिए हो? गुरु वो जो आपसे कुछ नहीं लेता। गुरु को आप क्या देंगे? आप मुझे कुछ नहीं दे सकते, आप मुझे Vibration भी नहीं दे सकते, आप को आश्चर्य होगा कि आप मुझे Vibrations भी नहीं दे सकते ! एक दिन मेरे पैर में चोट लगी तो एक Doctor थी, वो कहने लगी, माताजी मैं आपको Vibration दूँ?” मैने कहा देखें दो तो सही। जब वो Vibration देने लगी तो चोट की जगह से इतनी तेज उनको Vibration आई कि वो खुद ही ध्यान में चली गई। कहने लगी इस जगह से Vibrations आ रहे है। और मेरी जो चोट थी वो एकदम से हल्की होने लगी। गुरु वो जो आपसे कुछ भी न ले सके, जो शिखर पर बैठा हुआ है वो नीचे की ओर बहेगा, उसकी और कोई नहीं, कुछ नहीं बहेगा सब समझ की बात है। 1 गर में किसी से कहती हूँ बेटे मुझे मत दो क्योंकि ये सब ढकोसला है, आप मुझे कुछ भी नहीं दे सकते। उल्टे आप कुछ माँगते हैं मुझसे तो सारा का सारा व्यक्तित्व जो है वो खौल उठता है, अन्दर से सारी की सारी प्रभावशाली शक्तियाँ दौड़ने लग जाती है कि किस तरह से प्रेम से में इस बच्चे को सम्हालू! जरा सा कोई कुछ मांग ही ले! परम, परम मांगिएगा। आज की गुरु पूर्णिमा के दिन मेरा आपको बहुत आशीर्वाद है और जितने Realized लोग हैं उनको विशेष रूप से, और उनसे मेरी विनती है कि जैसे अपने पाया है दूसरों को देने का पूरा प्रयत्न करें। उनको भी समझाने का प्रयत्न करें। हो सकता है वो लोग आपसे नाराज हो जाएं, गुस्से हो जाए, मारेंगे, पीटेंगे ये कुछ भी नहीं है, इससे कहीं अधिक हमने सहा है, इसलिए कुछ भी नहीं। याद विवाद करेंगे, आपको नहीं मानेगे, कोई हर्ज नहीं छोड़ दीजिए उन्हें, जो आपको मानते हैं उन्हीं पर यह अनुग्रह करें। यहाँ तो केवल देना है. आपको देना है, आप दे सकते हैं, सब मेरे बच्चे। मेरा प्यार संसार में सब जगह पहुॅचे और घर घर दीप जलें। बहुत बहुत आप सबका धन्यवाद