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जानवर में, जो प्रश्न होते ही नही है, जो मनुष्य में होते है। जानवर के लिए तो कोई प्रश्न ही नही होता। वो सिर्फ जिता है। जिस शक्ति के सहारे वो जिता है। उसकी और भी, उसका कोई प्रश्न नही होता है। कि वो कौनसी शक्ति है, कि जिसके सहारे मै जिता हूँ। उसकी वजह ऐसी है, की ये चैतन्य शक्ति, क्यौकी सारी सृष्टी की रचना करती है, उसकी चालना करती है। उसकी व्यवस्था करती है। वो प्राणीमात्र, में बेहती हुई और गुजर जाती है। क्योकी इंसानने उसके एक विशेष कारण उसके एक विशेष तरह के, जीवन, से संबंधीत ऐसी कुछ रचनाऍ हो जाती है, की जिससे मनुष्य, उस शक्तिसे वंचित हो जाता है। इसको अगर हम समझे तो साधारण शब्दो मे इस तरह से कहा जाएगा, कि मनुष्य में जो अहंकार हो जाता है। वो प्राणीमात्र में नही होता। मनुष्य की दिमागी हार ये है। वो बहोत ही और तरह का है उसका दिमाग एक त्रिकोणाकार है। और इस त्रिकोण में जब ये शक्ति बच्चा तिन महीने के माँ के गर्भ में होते समय अंदर कि और गुजरती है, तो वो एक रिफरॅकशन (refraction) जिसे अंग्रेजी मे कहते है। विलीनीकरण जिसे कहते है। विकेंद्रिकरण कहते है। उससे तीन हिस्सो में बट जाती है। एक तो हिस्सा जो की सर के माथे के पिछे, सीधा हि निचे गुजर के जाता है। और बाकी दो हिस्से जो, की सर के दो कोणो में से निचे गुजर के, और घुम करके पिछे की और चला जाता है। इस तीन तरह की शक्ति की वजह से ही मनुष्य, प्राणीमात्र से एक उंची दृष्टी से देखता है। ये जो शक्ति हमारे सर मे, त्रिकोण मे से गुजरती है, और त्रिकोण के कोन के तरफ से जब गुजरती है, तो उसमे भी एक कोन आ जाता है। और उसी कोन के कारण उसकी शक्तियाँ दो तरह से बदल जाती है अगर आप लोग फिजीक्स जानते हो तो समझ लेंगे कि शक्ति हमेशा सीधीही गुजरती है। लेकीन वो जब इधर ऐसे गुजर जाती है, जब वो ऐसे जाना पडता है उसका बदलता हुआ रूख उसको दो शक्तियों मे बाट देता है, जिसे काँपोनंटस्(components)कहते है। एक ऐसा बाहर की और जाती है, एक निचे कि और जाती है। बाहर कि और जानेवाली शक्तिके कारण कि मनुष्य के अंदर मे बाहर कि और दृष्टि आजाती है। जैसे के जानवर है वो अगर इस स्टुल पे आकर बैठ जाए तो ये सोचेगा की स्टुल पे बैठु। पर मनुष्य अगर स्टुल पे बैठ जाए तो सोचेगा कि ये स्टुल में कैसे पालू। ये कहाँ से आया? इसको किसने बनाया? इसका बनानेवाला कौन? कोईसीभी चिज को देखते हि साथ उसमें लपट जाए। क्योकि इंसान को देखता है। उसकी और भी वो लपट जाता है। जानवर में ये बात नही। वो बस जिता है। उसका अगर मालिक आया तो खुश हो जाता है। कोई पराया आदमी आया तो फिर भौंकने लग जाता है। कोई अगर चोर आया तो उसके उपर भौंकने लगता है। अब वो ये नही सोचता है कि मै इसे अपनालू। इस माइक को मै लेलू। इस टेबल को मै लेलू। इसको कहते है पझेशन उसका उसके दिमाग में ख्याल ही नही आता। उस में सौंदर्य कि भी दृष्टी नही आती। वो ये भी नही सोचता है कि कोई चिज सुंदर है या असुंदर है। इसका रंग अच्छा है या बुरा। इससे उसे कोई मतलब नही। लेकिन मनुष्य किसी भी वस्तु विशेष में लिपट लेता है। फिर वो आगे बढ करके, ये सोचने लग जाता है के, मैं जो हूँ, मेरी जो सत्ता है, मै कोई एक विशेष हूँ। जैसे के हम पैदा होते ही ये सोचने लग जाते है के हम निर्मला हम हिंदुस्तानी हम हिंदू है, मुसलमान है, ईसाइ है, इस तरह से जो कुछ भी बाहर कि उपाधियाँ है। उससे लिपट जाते है। ये जो बाहर जाने की प्रवृत्ती है। ये मनुष्य के त्रिकोणाकार मस्तिष्क की जो स्थिती है, उसकी वजह से है। गर मनुष्य बाहर न जाए तो उसके आगे कोई प्रश्न ही नही आएगा। जैसे कुत्ते-बिल्लीयाँ उनके आगे कोई प्रश्न नही। इनके अंदर से सारी चेतना गुजर के निचे चली जाती है। इनके आगे कोई प्रश्न ही नही। कोई इनके रूह के अंदर रिऍक्शन नही। लेकिन हमे ऐसा है। के हम जब किसी भी चिज कि और देखते है तो उसके प्रती हमारा रिऍक्शन होता है। इसी कारण हमारे अंदर एक आगे से निकलनेवाली ऐसी शक्ति होती है। पिछे से निकलनेवाली शक्ति के कारण हमारे अंदर उसका रिऍक्शन मात्र ही ईगो और सुपर ईगो अहंकार और प्रति अहंकार नाम कि दो संस्थाऍ तैयार हो करके यहाँ पे एकत्रित होती है। उसके एकत्रित होने के कारण यहाँ से हम सारे तरह से अलग ही हट जाते है। उस चारो और मे जो हमारे शक्ति विराज है। उस शक्ति के हम बद्ध है। हम अलग हो गए। आप अलग हो गए। आप अलग हो गए। आप अलग हो गए। हम सब अलग-अलग खडे है। वास्तविक हम एक ही शक्ति की देन है। जैसे की कोई हमारे अंदर पेट्रोल भर दिया हो और हमे यहाँ खिच लाए। इस शक्ति में से जो बिच में से शक्ति गुजर के जाती है वो हमारे रिड की बिच कि हड्डी से निचे कि जो त्रिकोणाकार अस्थि है, उसके अंदर जाके लपटके साढे तिन चक्र मे बैठती है। कुंडो में बैठ जाती है। इसलिए उसको कुंडलिनी कहते है। ये शक्ति अभी दिखाई नही देती। इसलिए बहोत से लोग कहेंगे कि आप जो कह रही है बात कैसे सही मानले? लेकिन ये एक हात से पोहोचने तक आपको दिखाई देगा। जैसे की आपको हम कहे कि मायक्रोस्कोप से आपको बहोतसी ऐसी चिजे दिखाई देंगी जो इन आँखोंसे नही दिखाई देंगी। लेकिन मायक्रोस्कोप आपको मिलना चाहिए। अगर आपको मायक्रोस्कोप नही मिला तो आप उस चिज को देख नही सकते। तो एक स्थिती ऐसी आजाती की जिस मे आप इन शक्तियों को देख सकते है। कहाँ बैंठी है, किस तरह से बैठी है, उसका आकार लेकिन ये निराकार मे शक्ति जा करके अंदर बैठी रहती है। जिस वक्त में कुंडलिनी जागृती होती है। हमारे यहाँ जो लोग आए है। और जो लोग अब पार हो चूके है। जो काफी इस काम को जानते है। वो भी बता सकते है। जब कुंडलिनी आपकी जागृत होती है। गर कोई मेरे सामने झुका हूँआ हो तो, उसके पिठ से इस रिड कि हड्डी के पिछे मे, उसका स्पंदन दिखाई देता है। आप कभी भी श्वास यहाँ तो लेते नही, इस तरह। लेकिन उसका उपर, उठना और गिरना आप देख सकते है। चाहे आप पार हुए हो, चाहे नही हो। बहोत से लोगोमे ये दिखाई देता है। सब मे दिखाई नही देता। लेकिन जिस मे कुछ रूकावट उसमे काफी अच्छेसे दिखाई देती है। काफी देर तक आप देख सकते है की वहाँ संदन है। ये शक्ति वहाँ स्थित रहती है। वहाँ बैठी रहती है। यही कुंडलिनी है। जो बैठी रेहती है, उस समय तक जन्मजन्मांतर तक वही कुंडलिनी आप के अंदर मे पनपती रेहती है। और चिज जैसे टेप होता है उस तरह से रेकॅार्ड करती रेहती है। इनको क्या क्या तकलिफ है? ये मेरा बेटा है। इसे क्या क्या परेशानियाँ है? इसके शरीर मे क्या क्या तकलिफ है? इसके मन मै क्या तकलीफ है? और इसको किस चिज की तकलिफ है। वो सब कुछ आप के बारे में जानती है। आपके माँ के अनेक बच्चे हो सकते है। पर इस माँ के आप ही एक बेटे है। आप ही एक है। अब मेरा जबसे जन्म हुआ, में ये देखती थी। कि हर एक इंसान कि कुंडलिनी वही जमी बैठी है। वो उठती ही नही। वजह क्या है? इसका उठने का जो मार्ग निश्चीत है। जिसे वो उठेगी, जिसे वो जानती है, कि इसी मार्ग से मुझे उठना है। इसके बिचमे एक बहोत बडी जगह है। जो की बाहर भी जो डॅाक्टर लोग है समझ सकते है। के हमारे अंदर, यहाँ भी ये हमारे व्हॅाइड वेगस नर्व्ह और आँरटिक प्लेक्सेस के बिच में कुछ भी नही। उसी तरह से हमारी जो बिच की सुषुम्ना नाडी है। उससे भी ऐसी जगह है। सभी इंसानो में ये जगह बनने के कारण वो कुंडलिनी शक्ति भी है। मैं येही नही समझ पाती थी के कुंडलिनी शक्ति उठेगी तो किस तरहसे उठेगी। उस गॅप को भरने का इलाज जो ढुंडा गया है, वही सहजयोग है। ये जब कुंडलिनी शक्ति उठती है, तो ये उपर जा करके और फिर से उसी मार्ग से उपर जा करके आपको एकाकार कर देती है। उस शक्ति से जो कि हमारे चैतन्य को भरती है। जैसे के आप समझ लिजीए के पेट्रोल हमारे अंदर पहले भरा गया था, उसके बाद उसे हमने इस्तमाल कर लिया। हमारे बाहर जानेकी प्रवृत्ती से हमने इसे इस्तमाल कर दिया। अब नया पेट्रोल भरने के लिए फिर से ये कॅप खुल गया है। और उसके लिए कुंडलिनी ही उसे खोल देती है। और उपर किसी ग्रेस के निचे वो आप के अंदर मे शक्ति पुरी समय दौडती रहती है। जब ये चिज घटित हो जाती है। उस वक्त आपको ऐसा लगता है, कि आपके हात के अंदर से कोई शक्ति बैह रही है। अब आश्चर्य कि बात है की शुरू से जब से चैतन्य शक्ति अपना कार्य कर रहि है। तब से जड शक्ति और चैतन्य शक्ति, दोनों शक्तियाँ साथ-साथ है। जैसे कि एक पेड है, पेड के अंदर उसकी चैतन्य शक्ति है लाइफ है तभी तो न वो पनप रहा है। लेकिन आप उसे देखते नही। देख रहे है आप किस पेड का बल है। माने जड शक्ति का आपने कर लिया। चैतन्य शक्ति हमेशा जड शक्ति को चलाती है, रेग्युलेट करती है। और अपना काम करती रेहती है। लेकिन उस पेहली मरतबा जब आप रिअलाईज होते है। तब वो दिखाई देती है। तब उसका प्रार्दुभाव होता है। मॅनिफेस्टेशन होता है। पेहली मरतबा आपके अंदर से बहने तब लगती है जब उपर से उसका प्रभाव खुल जाता है। और अंदर से आने लगती है हाथ में ठंडे-ठंडे व्हायब्रेशन्स आने लगते है। लेकिन आप अगर उस दशा में पोहोच जाते है। जहा र्निविचारीता स्थापित हो जाती है, अंतरमय। अब अगर यहाँ कोई सायकोलाँजिस्ट हो तो समझ सकते है। वो इसको युनिर्वसल अनकाँशिअस कहते है। कोई भी व्याधि हो, कोई भी व्यक्ति हो, इस में, कॅन्सर कि बिमारी भी ठिक हो सकती है। जिससे कि लोग बहोत ज्यादा है। और जो आज आया भी इसीलिए है शायद की सहजयोग को लोग लाभ पा सके। पुरी बिमारी से ****** जो कोई आदमी पार हो जाते है, उनको कभी भी कॅन्सर कि बिमारी नही होगी। क्योकि वो जानते है, कि कॅन्सर किस तरह से होता है। बहोत से लोग ये भी कहते है कि बडे-बडे लोग थे जैसे की रमण मर्हषि थे, उनको कॅन्सर होग या था। राम कृष्ण परमहंस को कॅन्सर हो गया था। हो गया था। लेकिन उनको कोई बतानेवाला नही था कि कैसे ठिक किया जाए। इस व्हायब्रेशन्स के बारे में भी बहोत कम लोगोंने लिखा है। और सबसे तो कमाल ये है कि सिर्फ आदिशंकराचार्यने ही इसके बारे मे लिखा। लेकिन जो अपने को बडे हिंदू भी कहलाते है, वो आदिशंकराचार्य को नही जानते। आदिशंकराचार्यने सिवाय सहजयोग के और कोई बात नहि कही। उन्होने ये ही कहाँ के, न सांख्ये, न योगे। सांख्य से, योग से, किसी भी चिज से परमात्माको नहि पाया जाता, वो सहज मे हि हो जाता है। अपने आप हि, स्पाँनटेनिअस ग्रोथ होता है। जो, और उन्होने कोई जाती-वाती बनाई नही। वो भी ये कह गए को तिन तरह के संसार मे लोग होते है। एक तो ये की जो बहोत ही निम्न शरीर के होते है, जिनकी इतनी हानि होती है। के ये पुरी तरहसे अधिक पुरे ह्युमन बिइंग डेव्हलप नही। माने समझलिजीए ये माइक है। ये अगर पुरी तरहसे अभी मशिन तैयार नहि हुई है। उसका मेन्से कनेक्शन लगाने कि कोई जरूरत भी नहि और फायदा भी नहि। इस तरह के जो लोग है वो भक्ति रस मे पडे रहते है। उनका कुछ फायदा नहि होनेवाला। दुसरे ऐसे लोग है, कि जिनका मन इधर-उधर बहोत दौडता है। और उसके कारण वो बुरे काम करते है। या ऐसे काम में जुटे रहते है जिसके कारण कि जिससे उनकी शक्ति बहोत क्षीण हो जाती है। ऐसे लोग योग में पडे कि जिससे कि वो योग से कुछ अपने को बचाए। लेकिन एक तिसरे तरह के लोग होते है। जो कि इससे आर और इसकी शुद्धि को भी खोते है। उनके अंदर ये अद्भुत घटना घटित हो जाती है। अब उनमे मुझमे यही अंतर है। कि वो कहते है की करोडो मे एकाद होते है। मै करोडो मे लाखों कहती हूँ। लाखों कहती हूँ। यहि एक बात है। इन मे हमारे मे अंतर है। हो सकता है कि छटि शताब्दि मै ऐसे हि लोग रहे हो। लेकिन जैसे आज मै देखती हूँ कि इनमे से हजारो इस चिज को पा रहे है। ये कुंडलिनी जागृती के प्रति भी आपने बहोत कुछ पढा होगा। अगर आप उस किताबो को पढे हो तो शायद आप यहाँ न आते। क्युकि उसके बारे मे ऐसा बताया कि कुंडलिनी जागृती किए तो बदन में बडे बडे फुन्सियाँ निकल आती है। या बडि आगसी होती है। कोई लोग कहते है कि उसमें आदमी पागल हो जाता है। दुनियाँ भरकी चिजे लोग कहते है। इसमे ऐसा कुछ भी नहि होता। लेकिन वास्तविक ये लोग जिसको कुंडलिनी जागृती कहते है ये कुंडलिनी कि जागृती नहि है। ये कुंडलिनी को नाराज करते है। क्योकि जब कुंडलिनी मध्य मार्ग से उठती ही है और उठती रहती है। उसको और जगह से किसी भी तरहसे हम अगर उठाने का प्रयत्न करे तो वो गलत होगा। मध्य मार्ग से वो तभी उठ सकती है कि ऐसा हि आदमी जो संपूर्ण परमात्माके चैतन्य स्वरूप में प्रेम को हि बाट रहा है। वहि उस जगहसे धर सकता है। जो मनुष्य के बिचोबिच मिल जाए। वास्तविक ऐसे लोग बहोत कम होते है। थे..। हम तो कहेंगे अब बहोत लोग ऐसे हो गए है। इन्ही लोगोंको रिअलाईझड् केहना चाहिए। जिनके अंदरसे चैतन्य शक्ति बेह रहि है। जब ऐसे हि लोग आप को जागृती दे..देंगे जो पार हो गए है। जो रिअलाईझड् लोग है। तब आपको कभी भी कुंडलिनी का कोईसा भी प्रार्दुभाव दिखाई नहि देगा। जैसा कि लोग बता रहे है। बिलकुल तथाकथित है ये बात। इस तरह कि घटना घटित होगी। हमारे सामने हजारो लोगोंकी जागृतीयाँ हुई है। बंबई शहर मे दस हजार कम से कम लोगोंकी जागृती की है। और पार भी करे करीबन तीन हजार से उपर चार हजार करीब। केहते है तीन और चार के बिच में लोग पार हो गए। लेकिन किसी भी आदमी को इस तरह कि तकलिफ होते हुए हम ने देखा नहि। जैसा वो कहते है। हा थोडा बहोत जरूर, रेझिस्टंन्स जिसे कहते है, वो देखा है। क्योकि हम तो इधरसे प्यार दे रहे है। हो सकता है आपको कोई नफ्रत कर रहा हो, और आपके अमदर बसा हुआ हो। वो जरूर थोडा आपके शरीरको हिला सकता है। आपको कोई दुख दे सकता है। लेकिन वो भी थोडे देर में नष्ट हो जाता है। और वो भी भाग खडा हो जाता है। क्योकि जब वो देखता है कि यहा प्यार हि आ रहा है तो वो भी, जैसे कि उजियारे को देखके अंधेरा भाग जाता है। वो भी इसी तरह लेकिन कोई भी इंसान को हमने आज तक देखा नहि जिसके बदन में फोडे आए हो, या फुंसियाँ आए हो, या वो पागल जैसे हो गए हो। एसी भात है। अभी कुछ दिन पहले हम एक जगह गए थे तो एक साहब हमारे इस तरह से पाव पकड कर बैठे। उस दिन कहा कि एसे पाव पे न बैठिए। उनका कहे कि ऐसे बैठने दिजीए नहि तो मै तो मेंढ के जैसे कुदता हूँ। तो मैंने कहाँ ये क्यूँ, कहले मेरे गुरू ने बताया जब कुंडलिनी कि जागृती होती है। तो आप सब मेंढक के जैसे करने लगते है। तो उसको हमने कहा कि तुम्हारी तो अभी जागृती ही नही हुई है। और बहोत मुस्किल काम है जागृती होना। क्योकी बिच कि जो सुष्मना नाडी है, जिस में कि ये जगेह बनी हुई है। उसके अलावा हमारे अंदर और दो नाडीयाँ है, जिसे के सिंपेथॅटिक नरव्हस सिस्टिम कहते है। इसे हम ईडा और पिंगला कहते है। इन नाडियों के तप्त हो जाने से ही ये सब काम होता है। और जब आप कुछ भी परमात्मा के नाम पे करते है, उस वखत आप में वो गरमी आ जाती है। यानी आप ऐसा सोच लिजीए कि अगर आपने अपने घर का हिटर उसमें पानी डाले बगैर अगर चला दिया देखिए क्या हालत होती है। पेहले उसे प्रेम का प्यार का पानी भरीए। जबतक उसमें प्यार का पानी नही पडेगा तबतक वो कार्य बन नहि सकता। इसी तरह से जब हम बगैर उस परमात्मा को पाए हुए, उसकी शक्ति को पाए हुए उसके नाम पर कोई भी काम करते है या क्रिया करते है। उसी वक्त हमारी ये सिस्टिम, ये सिंपेथँटिक नर्व्हस सिस्टम वो चलने लग जाती है। इडा या पिंगला। कोईसी भी नाडी के चलने से क्रिया शक्तिके बढनेसे जो आपकी शक्तियाँ वो खतम होने लगती है। गर आपकी इडा गर बहोत चलेगी। तो आपको कँन्सर जैसी भयंकर बिमारी होगी। ओव्हर अँक्टिव्हिटी जिसे कहते है। और अगर आपकी पिंगला बहोत ज्यादा चल गई तो आपका कंडिशिनींग बढ जाएगा। आपके अंदर में जिसे कहते है, भूत बाधा आदि ये सब चिज। इसे दोनोंही तरह के, क्रिया का करना निषिध्द माना है। लेकिन जब आप वहि हो गए तब आप कुछ कियाही नही करते। जैसे कि अभी ये माईक है, ये क्या क्रिया कर रहा है। सिवाए इसके कि मै जो बोल रही हूँ वही आप सब तक पोहचा रहा है। इसी तरह से आप भी एक खोकली चिज हो जाते है, एक हॅालो परस्नॅलिटी हो जाते है। जिसके अंदरकि ये शक्ति अपने आप बहने लग जाती है। इस खोकलेपन को, आपके अंदर बसी हूई, आपकी कुंडलिनी प्रस्थापित करती है। कुंडलिनी आपकी माँ है। माँ आपके अंदर पहले हि से बैठि है, माने के आप पेहलेसे सब्लिमेटेड है। बहोतसे लोग ऐसी भी बात करते है, के हमारे सेक्स को सब्लिमेट करना है। ये सब बेकार कि बाते है। आप पहले हि से सब्लिमेटेड है। आपको सब्लिमेशन का कोई सवाल हि नही है। आप पहले ही से, जैसे हि निचे बैठते है, और इस तरहकी गलत धारणा लेकर के भी जो लोग चलते है। वो ही अपनी माँ का ही स्वयं अपमान करते है। और इसी कारण इनकी कुंडलिनी तो जगती नही, लेकिन उसका जो क्रोध है कुंडलिनीका जो क्रोध है, वो आपके सिंपॅथॅटिकपर दौडने लग जाता है। और पुरी तरह से ये गरमी जो है करलो, लोगोको पागल कर देती है। क्रिया योग आदि आपने बहोत कुछ सुना होएगा इस तरह कि बहोतसी चिजे है, जो लोग करते है। अब बहोतसे लोग है जो जपतप आदि भी करते है। जपतप करना भी बाहर कि बात है। आप परमात्मा के नाम पे कुछ भी नहि कर सकते। यहा के आजके आप इतना भी सोचले, के हम कुछ भी जिवंत कार्य कर ही नही सकते। मनुष्य अपनी भ्रम मे ही ये बात सोचता है, कि मैं कुछ करलू। बिल्ली, कुत्ते कुछ ऐसा सोचते नही। हम वो ही कर सकते है जो मरा हूँआ काम है। जैसे की एक पेड मर गया तो उससे हमने एक खंबा बना लिया। इसको खडा कर दिया। सब मरी हुई चिजे कोई भी चिज जिवीत नही। और बिजली और आपके प्रकाश है, लाईट जो ये इलेक्र्टिसीटी है या लाईट और ये सब जो इलेक्र्टिसीटी आदि, जितनी भी, जो कुछ भी, आप शक्तियाँ जानते है, ये सब जड शक्तियाँ है। इसमें से जिवंत शक्ति एक भी नही। आप कोईसा भी जिवंत कार्य नही कर सकते। माने आप एक फुल में से एक फल नही निकाल सकते। एक बिज में से आप एक पेड नही निकाल सकते। लेकिन मनुष्य को ऐसा भ्रम रहता है, के मै सब कुछ करलू। और जो ऐसे करोडो काम करता है उसके आगे आपकी शक्ति हो ही क्या सक्ति, के आप कुछ कर नही सकते। गर समझलिजीए, कोई बडा भारी ऐसा मॅग्नेट हो, बहोत शक्तिशाली हो, और उसके आप छोटीसी एक मॅग्नेट, आप कर क्या सकते है उसको अपनी तरफ खिचने के लिए सिवाय इसके की अपने अंदर जो मॅग्नेट है उसे खतम कर दे, इतने ही का काम है। मनुष्य कुछ कर ही नही सकता। और करता नही है, ये भ्रम में बैठा हुआ है, कि वो करता है। क्योकी उसके अंदर ईगो और सुपर ईगो दोनोका प्रार्दुभाव हो जाता है, मॅनिफेस्टेशन हो जाता है। वो एक भ्रम को बना देता है। कि मनुष्य कुछ करता है। वास्तविक परमात्माने आपको उन्हीके आपके लिए बनाया है। हमही परमात्माके शरीर है। जैसे के हमारे शरीर मे जो शक्ति बेह रही है, वो इन उंगलिय़ोंसे कार्यांवित है। ये जितनी भी उंगलियाँ ये हमेशा शरीरके एक स्वरूप में दिखायी देती है। माने जड है। हम ही उसकी जड स्वरूप है। जो हमारे अंदर से वो कार्यांवित रहेगा। वो स्वयं शक्ति स्वरूप है। वो सब कुछ जानते है। वो सब कुछ करते है। वो सब प्लानिंग करते हुए है। वो बारीक बारीक चिज को जानते है, क्योकि वो निराकार है। वो साकार मे हमारे ही अंदर कार्यांवित है। निराकार और साकार का कोई भी चरण नही। जब आप कुंडलिनी पर आयीएगा तो आश्चर्य होगा कि, किसी भी धर्म का किसी भी धर्म से झगडा नही। हा अर्धम होएगा तो होगा। इसामसीने एक जगह ऐसा कहा है कि, दोज हु आर नाँट अगेंस्ट मी आर विथ मी। कितनी बडी बात उन्होने केह दि, कि जो मेरे खिलाफ है वो अपने नही, माने जो चैतन्य के खिलाफ अपने नही, वो सब मेरे नही, या तो अपनी कुंडलिनी में भी देख सकते है, कि आपकी कुंडलिनी स्वयं न जाने कितने चक्करो में आप पडे। जैसे के पुर्व जनम मे समझ लिजीए मुसलमान रहे हो कमस कम हिंदुओ को तो माननाही पडेगा जो पुर्व जनम को मानते है। हो सकता है की आप चायनिज रहे हो। जिस चिज को आप नफ्रत करते रहे होंगे वही आज आप पैदा भी हूए होंगे। क्योंकी उस वखत आज नफ्रत करते थे तो, आज इस जनम मे हो सकता है, कि आप इसलिए पागए है कि जाने कि जिसको आप नफ्रत केहरहे सोचिए वो बात इतनी बुरी नही। गर पहले जनम में आप बडा ही आसथित्य है। परमेश्वरसे अत्यत अटूट विश्वास हो। कि हाँ परमात्मा है, परमात्मा है। और आपको परमात्मा नही मिला और आपने इसीसे अगर कुदकशि करली है, तो इस जनम में जरूरी नही है कि आप नास्तिक भी है। आप चाहे नास्तिक हो या आस्तिक हो परमात्मा तो है ही। उनको मानने ना मानने से वो मिटते थोडी है। और हम होते ही कौन है जो उनको मिटा दे। अगर ये उंगली माने चाहे नही माने इसके अंदर शक्ति है। इससे कोई फरक नही पडनेवाला और इसका मानना न मानना उसका कोई मानना भी क्या है। कोई अर्थ भी क्या है। इसको तो सिर्फ यही चाहीए के इसके अंदर से जो शक्ति चल रही है जो इस बुद्धिसे कनेक्टेड है। वो जो भी केह रही है, जो भी करा रही है, वे सिधे सिधे कर रही है। इसमे राधाजी का एक बङा सुंदर उदाहरण है। यहाँ पे राधाजी के प्रेमी बहोत बैठे है। इसलिए मै बताने चाहती हूँ। एक बार राधाजी को कृष्ण की मुरली से बहोत ईर्शा हूई। तो उन्होने कृष्ण से कहा की, इस मुरली कि क्या विशेषता है जिस को तुम हमेशा अपने मुखसे लगाए रहते हो। तो उन्होने कहाँ तुम उसीसे जाके पुछलो। तो उन्होने मुरलीसे पुछा के तुम्हारी क्या विशेषता है जो तुम हमेशा उसके मुख मे लगे रहते हो। तो, मुरलीने कहा के अरे पागल तुझे नही मालूम, मेरी कोई विशेषता नही ये ही तो मेरी विशेषता है। मै पुरी तरहसे खोकली होगई हूँ, इसिलीए तो वो बजाता है। अगर मै कही भी खडी हो गई उसका तो सारा राग हि खराब जाएगा। मतलब पुरी खोकली होगई हूँ। तो कहते है की राधाजीने कृष्णसे कहा था के अगले जनम तुम मुझे अपनी मुरली बनाव। इसी तरहसे हम भी एक खोकले हो जाते है। पर खोकले होने का मतलब ये नही के आप कार्यसे छूट जाते है। बहोतसे लोग कहते है की ये हमारी जिम्मेदारी नही। वास्तविक आपकी कोई जिम्मेदारी है नही। लेकिन लोग कहते है कि ये हमारी जिम्मेदारी है। क्योकी गलतफैमी मे बैठे है। जैसे की हम इसके इस छत्र के निचे बैठे हुए है और ये खंबे इसको पकडे हुए है। गर कोई अज्ञानी हो तो अपना हाथ उसे बेकार मे लगाए रखेगा। के मै उसको पकडे हूए हूँ। लेकिन जो ज्ञानी है, जो जानता है। के उसके लिए खंबे खडे हूए है। संभालनेवाले हम कौन है। उसी तरह से, जब तक अज्ञान रहता है, तो मनुष्य यह सोचता है के मै ही सब चिज करने लगा हूँ। और वो काम कर लेता है। और अगर मै इस झंझट मे पड गया, तो मै कोई साधू सन्यासी और ये हो जाऊगा। और मै कुछ काम हि नही कर पाऊगा। वास्तविक आप तभी हि ठिक से काम कर सकते है, जब आप विचारोंसे परे हो। क्योकी आपके अंदर कि शक्ति इतनी अद्वितीय है, और इतनी गेहेन है। और इतनी हि ज्यादा शक्तिशाली है, के जैसे हि वो आपके अंदर से बहने लग जाती है, आपके तो चार चांद लग जाते है। आपके बातचित में, बोलने में हर एक चिज में आप एक कमाल का जोहर दिखाते है। लोग आश्चर्य मे हो जाते है के कैसे के ये हो गया। अब यहा मिस माणिकलाल बैठि हुई है उनका उदाहरण हम आपको बता रहे। के जबसे इनकी जागृती होकर ये पार होई। उनके लिए कुछ ऐसी ऐसी चिजे होती है। के ये कुछ केहती है कि, मुझे लगता है मै देखती हूँ के क्या हो रहा है। ऐसे ऐसे लोग जो साधारण भी कविता नही कर पाते थे। जब वो पार हो गए उसके बाद वो ऐसी ऐसी कविता करते है। एक लडकी थी साधारण आठवी की बिलकूल साधारण माने घर बैठकर रंगवंग फैला करती थी उसके बाद जब वो पार हो गई, उसके बाद उसके एगझिबीइशन्स होना लग गए। और लाखो रूपया उसने और कमा लिया। कोई गर समझ लिजीए पॅालिटिशीयन भी हो। जिस वखत वो साक्षी हो जाता है। तो पुरी तरह से सारी चिज को देखलेता है। और इसके अलावा जब उसके आश्रय में पुरे खडे हो जाते है। जब आप उसको पुरी तरह से आप मान लेते है। उसके भी हजारों दस्तक आपके आस पास कुछ केह रहे है। देवता मंडराने लगते है। आपको समझ में नही आता की कैसे काम बन जाता है। कैसे लोग आ जाते है। कैसे चिज बन जाती है। किस तरह से चिज आ जाती है। और कैसे पुरा काम होता है। इतनी कमाल कि चिजे हो जाने लगजाती है, के मनुष्य आश्चर्य होने लगता है। कि ये चिज कैसे बन गई, वो चिज कैसे बन गई। लेकिन दृष्टि मनुष्यकी इसपर नही होना चाहीए, इससे हमारा मटेरीअल गेन क्या होगा। बहोत से लोग कहते है कि कुंडलिनी शक्ति जगा दिजीए तो हमारे अंदर शक्ति आ जाएगी। असल मे आप तो बिलकुल शक्ति वीन हो जाते है। लेकिन कुंडलिनी आपकी शक्ति शाली नही है। परमात्माकी शक्ति आपके अंदर से बेह जाती क्योकी आप बिलकुल ही शक्तिहीन हो करके उसके आगे समर्पित हो जाते है। जो कुछ भी आजतक सारे धर्मो में बताया गया है उसका सार मात्र एक ही है के आप अपने को जानीए और इसका जानने का मार्ग भी एक मात्र है, वो है सहजयोग एक स्पाँटेनिअस ग्रोथ जिसे कहना चाहीए। जो अंदर से हि अपने आप घटित होता है। बुद्ध को भी सहजयोग सेही मिला था। वो इधर उधर हजार जगह भटक के एक दिन थक कर पडे हुए थे और जब थके हुए, लेटे हुए थे, उस वखत में उनकी कुंडलिनीने कहाँ के मेरा बेटा बहोत थक गया है। किसी तरेहसे उसे धरो, उसी वक्त वेग उनके सर पर आ कर रुक गई, और निचेसे कुंडलिनीने उनका सहस्त्रार तोड दिआ और वो पार हो गए। कोई हि आदमी आजतक सहजयोग के सिवाए पार नहि हुआ है। सिर्फ यही है, के जैसे हम अब चार डुपले लेन में आने के लिए, पहले हजरत गंज गए फिर वहा से सुटारे हो तो दिल्ली में है तो चलिए अब यहाँसे लखनौ छोड करके हम दिल्ली में आए फिर दिल्लीमे घुम करके हमने देखा के इधर गए, उधर गए, वहाँ से घुमते घुमते किसी तरह से लोगोंने कहाँ साब ये तो यहि है आप हि के अंदर में बैठा। आप कहाँ जा रहे। तो लोगोंने सारा घुमना हमारा देखा। के ये तो पेहले यहाँ गए थे, फिर वहा से वहाँ गए थे, फिर जापान गए थे। फिर वहा चायना गए थे। फिर वहा से घुम घाम कर के यहा मिले। वो सारे घुमने घामने जो गडबड हो गई थी। वो अभी भी लोग पकडे हुए है। लेकिन जिसने पा लिया है, वे अधिक्तर समाधिस्त हो जाता है। इसका उदाहरण सबसे अच्छा उदाहरण हमारे ज्ञानेश्वर जी है। जब उनकी कुंडलिनी जागृत हुई थी। जो छटा अध्याय लिखा है तब उनकी जागृत हुई थी। और जब वो पार हो गए तबतक उनकी ज्ञानेश्वरी पुरी हो गई थी। उस वखत उन्होने समाधी लेली, क्योकी जब पा लिया तभी तो को सब व्यर्थ यहि पाली। अब इतना सब कुछ लिख दिया सब बेकार नहो जाए। समाधी हि ले लेते है। सारी हि खोज व्यर्थ हो जाती है। लेकिन व्यर्थ कुछ भी नही होता खोज से हि आदमी उस दशा में पोहच जाता है। जहाँ उसे पाता है। ये खोज हि है। कुंडलिनी आपके साथ खडीखडी सारी चिज रेकाँर्ड करती है। मनुष्य पहले पैसे में खोजता है। पझेशन्स में खोजता है। उसके बाद जब उससे भी, के कहता है के क्या रख्खा है। सब जंग है, जैसे अमेरीकामे। तब उसकी कुंडलिनी कहती है, अच्छा चल ये नही। उसका फिर जनम होता है। तो वो फिर एक सत्ता में खुश रहेना है। फिर सत्ता को देखो। फिर सब सत्ता भी देख डाली। तब वो कहता है इस में क्या है। फिर वो कहता है चलो धर्म में खोजते है धर्म भी तो बाहर है। हमारे सारे धर्म बाहार आ गए है। अंदर का धर्म कोई जानता हि नही। बात सब अंदर के धर्म कि है लेकिन तभी के सब बाहर है। इस वजहसे वो बाहर खोजता है। धर्म नही खोजता। गुरू बनाता है। मंत्र करता है। मंदिर जाता है। परमात्मा को पुकारता है। लेकिन सारे धर्मो का तत्व ये है कि इसे पा लेना है। जो लोग पार हो चूके है। ऐसे कितने भी गुरू हो गए है। जैसे गुरूनानक है। वो कहते है के सहज समाधी लो। सहज समाधी लागे। वो कहते है, काहे रे मन खोजन जाई, सदा निवासी, सदा अलेपा तोहे संगत पुष्प मध्य जो बास बसत है, मुकर मे माही वे ठाई तैसे हि हरी बसे निरंतर घट हि खोजो भाई। अब हम गा रहे है, रट रहे है, घटही खोजो भाई ये तो ऐसा ही हुआ के किसी डाँक्टर ने प्रिस्क्रिपशन दिया के तुम अॅनासिन लेलो तुम्हारे सरदर्द हो रहा है, तो हम रट रहे, अॅनासिन लेलो, अॅनासिन लेलो लेगा कब गर पेशंट लेगा हि नही तो कसर कर जाएगा। घट के अंदर खोजने का मतलब ये है के घट के अंदर स्थापित हो जाओ। इस को खोजा नहि जा सकता। अपने आप हि हो जाता है। जब आपका समय आ जाता है तो। और हजारो लोगोंका समय आ गया है। जो आप लोग यहा बैठे हूए है, आप आपना पूर्व जनम जानते नही। हजारों सालोंसे ये खोज है जो आपको यहाँ लायी है। इसके कारण आप अपने हि अधिकार में पा लेता है, हम तो यहाँ कुछ कर नहि रहे जैसे समझ लिजीए के आप बँक में जाते है, और आपना चेक देकर अपना पैसा मांग लेते है। उनको देना हि पडेगा, नहि तो जाऐगे कहा। अगर हम आपको रिअलायझेशन नही देंगे तो जाऐगे कहाँ. देना हि पडेगा, होना हि पडेगा। क्योकी आपका वो अधिकार है। आप जो भी पा रहे है, अपने अधिकार में पा रहे है। आपकी इच्छा हि नही होगी जबतक आपका स्वयं इतना अधिकार नही। आपकी इच्छा कि बगैर कोइसा भी कार्य लेकिन हम कोई एक बात जरूर जान लेनी चाहिए। के हम क्या असलियत चाह रहे या नकलीयत चाह रहे। आपको कुंडलिनी जानती है। आपको वा सब कुछ जानती है आपके बारे में लेकिन आपके स्वतेत्रता कि वो इज्जत करती है। कि अपनी स्वतंत्रता में जिस दिन आप ये तैकरले के हम परम चाहते है, उसी दिन कुंडलिनी आपकी उठेगी। उसी दिन आपका सहस्त्रार खुल जाएगा। के हमे और कोई चिज नहि चाहिए। हमे सिर्फ परम कि चिज मांगनी है। हमे शरीर का कुछ नही चाहीए, और कुछ नहि चाहीए। हम उसी परम पिता, परमात्मा, परमेश्वर। उसी छत्र छाया में अपने को, जागते हुए पाना। ये जिसने एक बार सोचलिया वो पार हो गया। कुंडलिनी के बारे में आप के अगर कोई सवाल हो तो आप मुझसे पुछे। कुंडलिनी विषय तो बहोत बडा है। और इसका इतना कुछ, अब यहाँ पर जो कुछ लोग है। दो चार लोग ऐसे आए हूए है हमारे साथ में के जो रिअलाइझ भी नहि है। लेकिन उस दशा से रिअलाइझ्ड है। जिनसे आप पुछे के वो दुसरोंको रिअलायझेशन दे सकते है। जैसे आप पार होते है। आप, स्वयं आपके इशारे पर कुंडलिनी नाचती है। इशारे पर। आप खुद मेहसुस करीएगा। हजारो आदमीयोंकी आप ऐसे करके कुंडलिनी उठाते है। ये लोग बिलकुल साधारण तरहसे लोग है। नॅारमल लोग है। अंदर से आपको उनकी शक्ति का कुछ भी पता नही लग सकता है। के कितनी शक्ति है। लेकिन एक इशारे पर इनकी कुंडलिनी उठगी है और ये लोग पार हो गए। ऐसे जिस दिन हजार आदमी तैयार हो जाऐगे, बहोत बडा कार्य हो सकता है। और एक नयी नेख, तैयार होगी। एक नए तरह के लोग एक नयी संस्था ऐसी कि जो अंदरसे चिज को पाएगा। बाहर ढकोसले ढोंग पैसोसे नहि पाएगा। अपनी अपनी अंदर कि आर्तता से, अपनी अपनी परमेश्वर कि लगनसे हि पायी हुई इस चिज के जो लोग है इनकी आयु नब्बे सालसे तो किसी कि कम नही। साक्षी स्वरूप आदमी जो होता है, उसमे कितनी भी देन हो, उसमे कितनी भी पावर्स हो कुछ भी हो, लेकिन वो उसे अहंकार में कभी नही देखता है। उसको अहंकार नही होता। क्योंकी वो जबभी देता है केहता है मेरे अंदरसे जा रहा है। ये हो रहा है। ये चल रहा है। इनका नही चल रहा। उनका चल रहा। अब आपका बेटा भी होएगा, तो भी आप उसे नही केह सकते कि हाँ ये पार हो गया। वो तो जब होता है, तब वो पता चल जाता है, के हो गया है। अंदर से ऐसे व्हायब्रेशन्स आने लग जाते है। आपके भी अंदर व्हाब्रेशन है। अगर आप कहे जबरदस्ती ताबिज को कराइये, वो नही हो सकता। उसमें कोई रेकमंडेशन नही चल सकता। कोई पॅालिटीक्स नही चल सकता। कोई प्रेशर नहि चल सकता। कोई रिश्ता नही चल सकता। कोई पैसा नहि चल सकता। कोई सा भी फॅाल्सहुड, जिसके कारण से मितथ्या कोई सी भी चिज उसको पकड नही सकती। सत्य जो है, वो है होना और घटित होना। कोईसा भी कार्य, कार्यक्रम, कोई सी भी तरीका इसको बनता नही। अपने आप हि लेकिन तो भी, अपने मन कि और ये दृष्टि जरूर ला सकते। के मनुष्य में अहंकार इतना ज्यादा है। इतना सुक्ष्मतल है। के उसे जैसे हि मै केहती हूँ कुछ भी नही करने का है। तो वो चकाचौद हो जाता है। गर मैं कहू सर के बल खडा होना है तो वो ठिक है। लेकिन जो चिज एकदम हि मूफत मिलनेवाली है। और एकदम बगैर किसी इसके मिलनेवाली तो मनुष्य का विश्वास नही बैठता। क्योकि वो अपने अहंकार पे बडा विश्वास करता है। परमात्मा के अहंकार को वो जानता नही। के वो चाहे तो ऐसी ऊंगली घुमा करके सारी सृष्टिकी सृष्टि बदल देगा। और चाहे तो इस सृष्टी मे एक एक छोटे छोटे कण में भी वो दिप जला देगा। आप लोगोंको वाकेही गर कोई सवालत होतो पुछिए और नही तो हम लोग थोडासा मेडिटेशन में जा करके और प्रयोग करे। क्योकि जबतक अनुभव नही होता है तबतक सब बातचीत बातचीत रेहती है। और बातचीत में क्याँ रखा हुआ है। आ रहे है।