Public Program

Birla Kreeda Kendra, मुंबई (भारत)

Public Program, Sarvajanik Karyakram – Birla Kendra Date 8th December 1973 : Place Mumbai

ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK .बीचोंबीच जाने वाली शक्ति उनसे जा कर के हमारे रीढ़ की हड्डिओं के नीचे में जो त्रिकोणाकार अंत में जो अस्थि है उसमें जा के बैठ जाती है। इसी को हम कुण्डलिनी कहते हैं। क्योंकि वो साढ़े तीन वर्तुलों में रहती है, कॉइल्स में रहती है, कुण्डों में रहती है। और जो दो शक्तियाँ बाजू में मैंने दिखायी हुई हैं, ये भी उसी त्रिकोणाकार, लोलक जैसे, प्रिजम जैसे ब्रेन में से घुस कर के और आपस में क्रॉस कर के नीचे जाती हैं। इस तरह से अपने अन्दर तीन शक्तियाँ मैंने यहाँ दिखायी हुई हैं। एक जो बीचोबीच में से जा कर नीचे बैठ जाती है और दो बाजू में जाती हैं । उसके अलावा लोलक की जो दुसरी साइड है या दिमाग की जो दूसरी साईड है उस में से भी जो शक्तियाँ जाती हैं वो दिखा नहीं रही हूँ। जिसे की हम सेंट्रल न्वस सिस्टीम कहते हैं। ये जो यहाँ मैंने तीन संस्था दिखायी हुई हैं, उसके जो बीचोंबीच संस्था है, उसे हम कुण्डलिनी कहते हैं। इसके अलावा जो संस्थायें हैं वो किस तरह से क्रॉस कर जाती हैं आप देख रहे हैं और क्रॉस करने के नाते इस में दो तरह के प्रवाह होते हैं। एक बाहर की ओर, और एक अन्दर की ओर। जो अन्दर की ओर प्रवाह जाता है, उसी से हमारे अन्दर पेट्रोल भरा जाता है। और जो बाहर की ओर प्रवाह जाता है, उसी से हम बाहर जा कर के किसी भी चीज़ को चिपक जाते हैं, इन्वाल्वमेंट हो जाती है। जानवर को किसी से इन्वाल्वमेंट है? मनुष्य को है। ‘ये मेरा है । ये मेरा बेटा है। ये मेरा भाई है। ये मेरा घर है। ये मेरा देश है।’ मेरा, मैं ये सब उसी कारण आता है, जो कि ये प्रवाह हमारे अन्दर में बाहर की ओर जाने की हमारी अन्दर शक्ति है वही खींच ले जाता है हमारी भरने वाली को। हम बाहर आसानी से छोड़े जाते हैं। जैसे आप सब का चित्त मेरी ओर बहुत आसानी से है। किंतु अगर मैं सीधी बात | कहूँ कि अपना चित्त आपस में और रखे। आप नहीं जाते| इससे सरस तो और होना ही नहीं है। किंतु ये नहीं हो पाता है। इसका कारण ये है कि हमारी बाहर जाने की शक्ति ज्यादा है और यही शक्ति हमें सिम्परथैटिक नाम की नर्वस सिस्टीम देती है, जिसके कारण हम हमारे अन्दर बसी हुई जो शक्ति है उसे इस्तमाल करते हैं। उसे हम उपयोग में लाते हैं। जो हमारे अन्दर के स्रोत हैं उसे हम खर्च करते हैं । वही हमारी सिम्परथैटिक नर्वस सिस्टीम है। और जो हमारे अन्दर धरती है, वो हमारी पैरासिम्पथैटिक है । माने जो हमारे अन्दर आती है और आ कर के स्थित है। इन्हीं दो शक्तिओं के कारण हमारे अन्दर इगो और सुपर इगो नाम की दो चीजें प्रतिक्रिया रूप बन जाती हैं। और उससे हमारे मस्तिष्क से दोनों तरफ में इस तरह से पड़दा पड़ जाता है, कि हम उस सर्वगामी, सर्वव्यापी शक्ति को भूल जाते हैं। ये कुण्डलिनी जो कि हमारे अन्दर पीठ की रीढ़ की हड्डी में जा कर के बैठती है, अपने को साढ़़े तीन कुण्डों में लपेटती है, उसका कारण क्या है, वो भी शास्त्रविदित है । लेकिन वो अभी मैं नहीं बताऊंगी। साढ़े तीन कुण्डों में लिपटी हुई ये कुण्डलिनी एकदम से उसकी जो लम्बाई है वो बढ़ जाती है और इसी कारण उसके बीच में तार टूट जाती है। तार टूट जाने के कारण अपने यहाँ पर बीच की नाड़ी जिसे हम सुषुम्ना नाड़ी कहते हैं, जिससे कुण्डलिनी उतरती है, उसके अन्दर एक थोड़ी सी गैप हो जाती है। जगह बन जाती है। ये जगह हमारे ন

Original Transcript : Hindi एक में बाहर से भी, यहाँ अगर डॉक्टर लोग बैठे ह्ये हो तो जानते होंगे …. और अॅवॉर्टिक प्लेक्सस में भी, ऐसी ही जगह हमारे अन्दर है। यही भवसागर है। यही आदिकाल में बनाया हुआ भवसागर है। जो पहले आदि कुण्डलिनी बनायी गयी और उस आदि कुण्डलिनी को बना कर के ही परमात्मा ने सारी सृष्टि की है। और उसी का संपूर्ण प्रतिबिंब मनुष्य है। परमेश्वर की सारी कृति का प्रतिबिंब मनुष्य है। जैसे ही बच्चा जीव धारणा करता है, उसके हृदय में स्पंदन होता है, वैसे ही शिव, ईश्वर, जिनकी कल मैंने बात की थी, ये आपके हृदय में विराजमान होते हैं। और वो दिखायी देते हैं एक अंगूठे के जैसे। कोई अगर चल रहा हो, कोई अगर जोर से चल रहा हो दिखायी देते हैं। आप को नहीं दिखायी देते हैं, लेकिन हमें दिखायी देते हैं। आपको नहीं दिखायी दे सकते हैं, माने ऐसा नहीं कि आपको नहीं दिखायी देगा। अगर आपके पास माइक्रोस्कोप है तो आप इसको देख पा रहे हैं और जिसके पास नहीं है वो नहीं देख पा रहे हैं। इसका मतलब ये नहीं की जिसके पास माइक्रोस्कोप है उसे दिखायी नहीं देगा। आप भी माइक्रोस्कोप पा लें और इसे देखे और जाने। हृदय में बसा हुआ यही जीव, इसी को हम लोग जीवात्मा कहते हैं। इसे लोग सोल कहते हैं। जब वो धारणा करता है तो लोग उसे जीवात्मा कहते हैं। के कुण्डलिनी, ये मैंने आपसे कहा, कि शक्ति है और हृदय में बसा हुआ …..(अस्पष्ट)। मनुष्य अन्दर शिव और शक्ति दोनों ही बसे हैं। उनका मीलन होना जरूरी है। नहीं तो मनुष्य तत्त्व में उन्हें ब्रह्म त्त्व की धारणा नहीं। हालांकि दोनों ही चीजें वहाँ पर हैं। जैसे की आपने अपने यहाँ गैस की लाइट देखी होगी। मुझे बड़ी मज़ेदार लगती है। उसके अन्दर भी आपने देखा होगा एक छोटी सी ज्योत जलती है और जब उसको पूरी तरह से आप खोल देते हैं, तब गैस ऊपर से दौड़ जाती है और गैस के कारण यहाँ लाइट आती है। इसी तरह मनुष्य में भी इनलाइटनमेंट जो आती है। वो भी बिल्कुल इसी तत्त्व से आती है कि पहले शिव की शक्ति हृदय में स्पंदित होती है और शक्ति जो है, शक्ति, आदिशक्ति जिसे कहियेगा, वो शिव स्वयं जो ईश्वर स्वरूप है, साक्षी स्वरूप है, और शक्ति जो कार्यान्वित होती है, वो कुण्डलिनी स्वरूप हमारी माँ है यहाँ त्रिकोणाकार स्थिती में बैठी है। इसका स्पंदन आदि हम आपको दिखा सकते हैं। यहाँ तो सब को कनव्हिन्स करते करते इतने साल बीत गये। मेरी तो समझ ही नहीं आता है कि इतनी बड़ी चीज़ के लिये इतने ज्यादा सब को लडाई, झगड़ा लेने की क्या जरूरत है। आखिर आप ही का कल्याण और मंगल ही तो हम चाह रहे हैं और जिनका हो गया है उनको तो ये बात मालूम है। किंतु इसके लिये लोगों को समझा समझा कर के आदमी पगला जाये। अगर मैं कल यहाँ एक हीरा रख दें और आपसे कहूँ कि ‘यहाँ एक हीरा रखा है। किसी को चाहें ले जाओ ।’ कोई भी मुझ से झगड़ा नहीं करेगा , डिबेट नहीं करेगा , ऑग्ग्युमेंट नहीं करेगा । ले कर पहले हीरा दौड़ेगा। वो ये भी नहीं सोचेगा की ये खरा है या खोटा। हीरे जैसे हजारों हीरे जिस शक्ति के द्वारा बने हये हैं, उस शक्ति के बारे में इतना संसार में मुझे समझाना पड़ता है। कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि सारा जीवन ही ऐसा है। क्या ऐसे लोग होंगे ही नहीं संसार में जो इसको समझ सकें ? क्योंकि ये तो ‘आ मास’ देने की बात है मैं कर रही हूैँ। बहुतों को देने की बात मैं कर रही हूँ। दो-चार लोगों को नहीं, अनेकों को होने की बात है और हो रही है। लेकिन जो होते भी हैं वो भी आधे-अधूरे । पूरी तरह से पाना नहीं चाहते हैं। इसी कारण मुझे, हालांकि नहीं कहना चाहिये, कि आपको ये खयाल है इतना नहीं आया, जितना में कर पा रही हूँ। 3

Original Transcript : Hindi हमारे बीच में बीचोबीच जो गैप है, बीचोबीच जो ….. है, ऐसी ( अस्पष्ट) पहले आदिशक्ति की हुई, और उसी ….. में हम जानते हैं कि नाभि पे ही हमें माँ अपना दान देती है। अपना रक्त देती है माँ। इसी तरह से इस आदिशक्ति माँ ने ही अपना रक्त इसी आदि मानव कहना चाहिये, या आदि मानव की जो कल्पना है, उसकी नाभि पे ही पहले… जैसे कि कोई हम बड़ा भारी कारोबार तैय्यार कर लें। तो हम क्या सोचते हैं कि इसका एक चेअरमन हो जाये। इस तरह से हम अलग-अलग जगह बना दे। इसका एक वाइस चेअरमन बना दें। इसमें दो-चार लोग बनाते हैं। इसी तरह से आदिशक्ति ने भी मानव की रचना करने से पहले इस सब का विचार किया और पंचमहाभूत से तैय्यार की हुई पृथ्वी, जो हम आपको दिखा सकते हैं वही हम आपको दिखायेंगे, इस पंचमहाभूत से निर्माण की हुई शक्ति के लिये सब से पहले कोई न कोई पालनकर्ता चाहिये। उस पालन कर्ते का अधिष्ठान करना जरूरी है। पालन कर्ता पहले बनाने पर ही सृष्टि बनानी चाहिये । इसलिये यहाँ नाभि चक्र पर श्री विष्णु की रचना की। ये सत्य है, इसको मैं साइंटिफिकली प्रूव्ह कर सकती हूँ। मैं तो यहाँ हिन्दू धर्म की या किसी धर्म की विशेषता ले कर नहीं आयी हूँ। सभी धर्मों में अपनी विशेषता है। सिर्फ हमारे अन्दर वो जीवंतता नहीं है। श्रीविष्णु साक्षात् अपने नाभि पर बसते हैं क्योंकि जब हम कुण्डलिनी की जागृती लोगों को देते हैं और जब उनका नाभि चक्र गड़बड़ में रहता है, तब हम देखते है कि श्रीविष्णु का नाम लेने से नाभि चक्र जो है खुल जाता है। लेकिन नॉन रियलाइज्ड आदमी को नहीं लेना चाहिये। नॉन रियलाइज्ड आदमी उसी तरह का होता है, जैसे कि आपका कनेक्शन तो लगा नहीं और आप टेलिफोन घुमा रहे है। जो रियलाइज्ड आदमी किसी आदमी को जागृति देते वक्त ये देखें कि उसकी नाभि चक्र पे कुण्डलिनी उठ नहीं रही है, अपनी जगह पे श्रीविष्णु का नाम लें और श्रीविष्णु के नाम से कुण्डलिनी वहाँ पर उठ खडी होती है। श्रीविष्णु की स्थापना में, श्री लक्ष्मी जी में उनकी शक्ति है हम लोग जानते हैं। ये बहुत अच्छा है हिन्दुस्तान में है कि ये सब बातें बचपन से हम अपनी दादी अम्मा और नानी अम्मा से सुनते आये हैं । अब अगले जनम की तो मैं नहीं कह सकती की कि यहाँ लोगों का क्या होगा? लेकिन आज जो हाल है उसमें अभी ऐसे बहत लोग हैं, जो श्रीविष्णु को तो जानते ही हैं। श्रीविष्णु एक सिम्बल के रूप में नहीं है। जिसे की हम सिम्बल समझते हैं। सिम्बल से कहीं अधिक है। जैसे कि साइकोलॉजी में, बड़े बड़े साइकोलॉजिस्ट ने कहा हुआ है, कि मनुष्य स्वप्न में ऐसे ऐसे सिम्बल्स या प्रतीक देखता है, जो युनिवर्सल है, जो सार्वजनिक है, सब जगह वही वही दिखायी देता है। जैसे अगर किसी आदमी की मृत्यु होने वाली हो और उसमें अगर कोई हथियार इस्तेमाल होने वाला हो, तो उसको एक विशेष तरह का तिकोन दिखायी देता है, चाहे वो चाइनीज हो , चाहे वो इंडियन हो, चाहे वो अमेरिकन हो, वो पढ़ा लिखा हो या नहीं। ऐसे हजारों उदाहरण उन्होंने दिये हैं, और उसका सोल्यूशन निकाला कि कोई न कोई ऐसी शक्ति हमारे अन्दर में है, जिसको कि वो कहते हैं अनकॉन्शस। युनिवर्सल अनकॉन्शस। ऐसी कोई न कोई शक्ति हमारे अन्दर बसी हुई है, जो इस तरह की सभी बाहर की ओर है। ये जो शक्ति है, ये जो शक्ति हमारे अन्दर इस तरह के प्रतीक रूप में है, वही शक्ति है हमारे अन्दर के प्रति जब हम गहरे में उतरते हैं, जब आत्मा के प्रति गहरायी में बैठते हैं तब उन्हें हम लोग देखते हैं । 4

Original Transcript : Hindi श्रीविष्णु का स्थान हमारे नाभि चक्र पे है। और नाभि में श्रीविष्णु जिस सागर पे लहरा रहे हैं, वो प्रेम का सागर है। श्रीविष्णु के नाभि से, कहा जाता है, कि ब्रह्मदेव की व्युत्पत्ति की हुई सभी बात नाभि से ही कार्य होने का है। इस नाभि पे ही माँ ने, श्री ब्रह्मदेव, जिन्होंने सारी सृष्टि की रचना की है उनको निर्मित किया है । इसमें कोई धर्म की बातें मैं आपको बताऊंगी, कि सारे ही धर्म हमारे इसी कुण्डलिनी में बसे है और हम, बाहर में इंटिग्रेशन करना चाहिये, सब धर्मों को एक लाना चाहिये, ऐसी बेकार की बातें क्यों करें। हमारे अन्दर ही हम इंटिग्रेटेड है। हमारे अन्दर ही हम सब्लिमेटेड है। हम जरा अन्दर झाँकना तो देखें। जब सृष्टि की पहली पहली रचना हुई, सब से पहले परमात्मा ने श्री गणेश जी की रचना की। सब से पहले। उसका कारण है, गौरी जी ने परमात्मा …. आदिशक्ति ने ..(अस्पष्ट) सिर्फ माँ ही है । जिन लोगों के हाथ से वाइब्रेशन्स जा रहे हैं, वो जानते हैं कि जमीन पर भी वाइब्रेशन्स आते हैं। गौरी जी साक्षात् जो आदिशक्ति का ही रूप है, उनके बदन में छुये हुये मैल से, मतलब जड़ तत्त्व से जो बने थे वो हैं श्रीगणेश। श्रीगणेश का होना बहत आवश्यक है। क्योंकि श्रीगणेश चिर के बालक हैं । अनंत के बालक श्रीगणेश हैं। जो कि पवित्रता के अवतार हैं। पावित्र्य ही उनका धर्म है, पावित्र्य ही उनका कर्म है। और वो पावित्र्य में ही जीते हैं। ऐसे श्री गणेश की रचना सब से प्रथम उन्होंने, जो सब से नीचे प्रथम जो मैंने दिखाया है, मूलाधार चक्र पे उनकी माता ने, गौरी ने स्थापना की। क्योंकि सारी सृष्टि व्यर्थ हो जायेगी, जब पवित्रता संसार से उठ जायेगी। आज पवित्रता के पीछे लोग हाथ धो के पड़े हैं। आपको पता नहीं, कि मॉडर्न कह कर के और बड़े विचारवंत कह कर के, इंटलेक्च्युअल कह कर भी पवित्रता पर जो लोग हाथ डालते हैं, वो जानते नहीं हैं कि सारे मानव जाति का आधार पवित्रता है। बात शायद बहुत लोगों को पसन्द नहीं है। उसकी मैं माफी चाहती हूँ। लेकिन जो सही बात यही है कि पवित्रता के सिवाय सारा संसार हिल जाता है। इसलिये पहले श्रीगणेश किया। श्रीगणेश की रचना हमारे स्वाधिष्ठान चक्र पे क्यों नहीं करी और हमारे नीचे मूलाधार चक्र पे क्यों करी? इसकी भी एक विशेष बात है। श्री गौरी जी के एक ही चक्र ले कर के वो आये थे, पहले ही चक्र पे, मूलभूत चक्र पे। ऐसा कहा जाता है कि गौरी जी नहा रही थी और उन्होंने अपने बाथरूम के दरवाजे पे ही उनको बिठा दिया । बड़ा सिम्बॉलिक है ये । वो जब नहा रही थी तब उनकी पवित्रता की रक्षा करने के लिये वो, वो एक माँ है, माँ अपनी पवित्रता की रक्षा करने के लिये एक छोटे से बालक को बिठा देती है। इसका अर्थ यही है कि जब भी हम धर्म में उतरना चाहते है, जब भी हम परमात्मा से एकाकार होना चाहते है, तब उस शक्ति के बारे जो हमारी माँ कुण्डलिनी स्वरूप यहाँ बैठी हुई है, उसके प्रति एक छोटे बालक जैसा अबोध स्वभाव होना चाहिये। बहुत से लोग सेक्स पर आज खड़े हो कर बातें कर रहे हैं कि सेक्स को सब्लिमेट करिये और उससे कुण्डलिनी जागेगी। साफ़ साफ़ समझ लीजिये इस बात को कि सेक्स अपनी माँ को ….(अस्पष्ट) से ही, बात करने से, आप लोगों को तो सेक्स्युअल हो जाये। कुण्डलिनी आपकी माँ पहले ही यहाँ बैठी हुई है। पहले ही आप सब्लिमेटेड है। आपकी जो माँ इतनी पवित्र है। आपके साथ जन्मजन्मांतर से आपका साथ देती है। आपको सम्भालते हये आज तक यहाँ आयी है। और अभी जब मैं उसको जागृती देते का प्रयत्न करती हूँ, तो आप ही की तरह से कहती है मुझ से कि, ‘नहीं पहले मेरे बेटे को ठीक करो । मेरे बेटे का ये चक्र ठीक नहीं है। इसे तुम ठीक करो।’ इसी कारण मुझे आपकी तंदरुस्ती भी ठीक करनी पड़ती है। 5

Original Transcript : Hindi आपका अगर दिमाग खराब है तो आपका दिमाग भी ठण्डा करना पड़ता है। तभी कुण्डलिनी ठीक से खड़ी होती है। ऐसी माँ जो सिर्फ आपको देना ही चाहती है, जो आपके पुनर्जन्म के लिये आप ही के साथ बसी हुई है, उसके साथ ऐसा अन्याय कर रहे हैं। इंटलेक्च्युअलिज़म के नाम पर मेरे ख्याल से इससे बढ़ कर और महद् अन्याय है। मैं तो कहती हूँ, कि क्राइस्ट को भी लोगों ने क्रूसीफाइ कर दिया, इसकी बात नहीं, लेकिन जो अपनी माँ को इस तरह से अपमानित करते हैं वो अपनी कुण्डलिनी को खो देते हैं। इतना ही नहीं लेकिन जन्मजन्मांतर तक माँ सुप्तावस्था में पड़ी है। ऐसा करने से सिर्फ उसका क्रोध उठता है और वो जो बाजू में दो नाड़ियाँ दिखायी है इड़ा और पिंगला उन दोनों नाड़ियों पे नाचती है। उसकी गर्मी के कारण मनुष्य नाचता है, उठता है, चिल्लाता है, चीखता है, इतना ही नहीं उसकी बदन पे फुंसियाँ आ जाती हैं और इसलिये लोग कहते हैं कि कुण्डलिनी को हाथ न लगायें। ये वही लोग कहते हैं जो स्वयं नहीं जानते ब्रह्मा का पावित्र्य, वही लोग कहते हैं जो स्वयं अबोध बच्चे के स्वभाव को नहीं पहचान सकते, जो उन्हें होना है। इस तरह की बातें वही लोग समझाते हैं, जो स्वयं कुछ न कुछ गलत रास्ते पर रहें और दुनिया को भरमाना चाहे। जो कि राक्षसों की योनि के लोग होते हैं, उन्होंने ऐसी ही व्यभिचार कर कर के …. योनि प्राप्त की और वही आपको व्यभिचार की बातें सिखाते हैं कि अपने माँ पर आप सेक्स लादिये, सेक्स को आप सब्लिमेट करें। सेक्स को आप शरीर की, जैसे की घर में मोरी (बाथरूम ) होती है। एक मोडी होती है। उस मोरी पे, मोरी के रास्ते पर ही उन्होंने श्रीगणेश को बिठाया है कि कहीं उधर उस तरह से से कोई इधर आ न जायें और लोग उल्टा काम करते हैं। सारे लोग ये उल्टा ही काम करें। और इसलिये आप जहाँ जहाँ पढ़ते हैं ऐसे ऐसे कुण्डलिनी जागृत होती है। इसका बड़ा बड़ा नाम दे रखा है। अभी मेरे ध्यान में कितने ही लोग ऐसे आये। मुझे कभी कभी बड़ा आश्चर्य होता है, उनको ये कुण्डलिनी जागृति कैसे करायें ? अब वो कहते हैं कि हमारी कुण्डलिनी जागृत हुई। कहते हैं कि पाँच बजे बराबर आपकी जागृति हुई। अब सोचना चाहिये कि भगवान के पास क्या घड़ी है कि वो पाँच बजे आपकी जागृति करेंगे। ये तो कोई जीवंत चीज़ है, जो स्पॉन्टॅनियसली, सहज में ही आप में जागृत होती है और प्लावित फूल है । ये पाँच बजे फल हो जायेगा।’ ऐसा कोई कह दे। इसी तरह की बात है, कि हम कुण्डलिनी पाँच बजे जागृत कर दें।’ ये सब होती है। जैसे कि एक फूल है वो फल हो जाता है। हम ऐसा भी कह सकते हैं क्या कि, ‘साहब, ये स्मशान की प्रेत पूजा है। आदि चीज़ों के बारे में मैं कल बताऊंगी। इस कुण्डलिनी को उठाने से पहले श्रीगणेश की आराधना करनी चाहिये। करते ही है और करना चाहिये । इसमें धर्म और अधर्म की कोई बात नहीं है। श्रीगणेश कोई हिन्दुओं का ठेका नहीं। हिन्दू अपने को बहुत समझ रहें हैं कि हम श्रीगणेश के ठेकेदार है। अभी मैं पूना में गयी थी तो वहाँ बहुत ब्राह्मणों ने मेरा विरोध किया और कहा कि, ‘उनको हम यहाँ भाषण देने नहीं देंगे।’ तो मैंने कहा, ‘आप में से जो ब्राह्मण है मेरे सामने आयें। मैं देखना ‘आप चाहती हूँ कौन ब्राह्मण है?’ तब आ के यूँ यूँ थरथर काँपने लगे। मैंने कहा, ‘क्या, ये क्या है?’ कहने लगे, ण दे सकती हूँ कि नहीं दे सकती हूँ।’ कहने लगे कि, शक्ति है इसलिये।’ मैंने कहा, ‘मैं शक्ति हँ , तो मैं यहाँ भ ‘हमें ष ये विश्वास नहीं था पर हम बैठेंगे।’ उसके बाद जब वो पार हो गये तो हँस हँस के बताते हैं कि, ‘कितने हम बेवकूफ़ थे।’ ब्राह्मण हैं कौन ? जब तक आप दूसरे नहीं हो जाते, जब तक आप द्विज नहीं हो जाते, जब तक

Original Transcript : Hindi आपका फिर से बर्थ नहीं होगा, तब तक आप ब्राह्मण नहीं। ऐसे ही तेहरान में हम गये थे तो वहाँ मुंडों और ये लोग और कहने लगे कि, ‘ये काफ़िर है और इनको हम हर जगह ही बेकार नज़र आते हैं, सारे धर्म वालों को। इनकी बात पे मत जाओ। ये तो नमाज़ पढ़ा नहीं सकती। हमने कहा, ‘नमाज़ ही पढ़ा रहे है समझ लीजिये।’ कहें कि, ‘हम मुसलमान हैं। मैंने कहा, ‘मुसलमान का मतलब समझाईये।’ मुसलमान का मतलब है, जो फिर से पैदा हये। ‘आप हुये हैं?’ कहने लगे, ‘हाँ, ह्ये हैं।’ मैंने कहा, ‘तो हमारे सामने नमाज़ पढ़ो।’ नमाज़ तो पढ़ा गया, लेकिन उनकी हालत ऐसे ऐसे होने लगी। मैंने कहा, ‘यही आप मुसलमान हैं। मेरे सामने दो मिनट भी आप हाथ नहीं कर पाते। आपकी आँख भी बंद नहीं हो पाती। आप आँख बंद करते तो आपकी आँख भी लपक रही है। कहने लगे, ‘आप तो जादू कर रहे हैं।’ मैंने कहा, ‘जादू कर रही हूँ, मंत्र कर रही हूँ। आपमें अगर मुसलमानियत है तो रोक लीजिये।’ ऐसे ही धर्म के नाम पर ठेका मार कर नहीं बैठ सकते। उसकी अँथॉरिटी किसी को नहीं है। जब तक धर्म को जाना नहीं तब तक किसी के झंडे लगाने से कोई नहीं। ये तो ऐसा ही हुआ कि हिन्दुस्तान में आ कर कोई झंडा मार दे, ‘ये मेरा हो गया।’ हिन्दुस्तानी की पहचान है ऐसे ही धार्मिक कार्य से है। एक बार एक अंग्रेज ने पूछा कि, ‘हिन्दुस्तानी क्या पहचान है? हिन्दुस्तानी बड़े अपने को समझते हैं। हिन्दुस्तानी की क्या पहचान है ?’ मैंने कहा, ‘बड़ी अच्छी ….है हिन्दुस्तानी पहचानना, एक अंग्रेज पहचाना तो बताती हूँ।’ कहने लगे, ‘क्या पहचान है?’ मैंने कहा, ‘एक हिन्दुस्तानी के गले में आप हार पहना दीजिये, वो एक मिनट में उतार देगा । लेकिन अंग्रेज को पहना दिया तो दिनभर वो पहन के घूमेगा, रात को आपने खाने पे बुलाया तो फिर पहन के आयेगा। ये हिन्दुस्तानी की पहचान है।’ मैंने कहा। ऐसे ही धार्मिक आदमी की भी पहचान होती है। बाहर से एकाध आदमी आपको बुरा लगता हो लेकिन धार्मिक आदमी धर्म में खड़ा हुआ अन्दर होता है। बाहर नहीं होता। अन्दर से जो धार्मिक होता है वो दूसरी बात है। और बाहर से जो लंपट और झूठ बोलने वाला और ढोंगी और भोंद आदमी, कभी भी धार्मिक नहीं होता। और इसी वजह से हमारा धर्म सारे संसार का धर्म ….गया। किसी को विश्वास ही नहीं रह गया कि हिन्द धर्म में जिसको की आदि शंकराचार्य जैसे कितने महान संतों ने, इतना महान स्वरूप दिया था, जो कि स्वयं एक रियलाइज्ड था। उसको कहाँ ले जा के गिरा दिया हमने। कहाँ मोहम्मद साहब और कहाँ उनका धर्म। कहाँ ईसामसीह और कहाँ उनका धर्म। देखते नहीं बनता ये लोग कहाँ अँधे जैसे उल्टे ही चले जा रहे हैं। ये हमारी माँ कुण्डलिनी यहाँ बैठी हुई है और इसी में श्रीगणेश उनकी रक्षा कर रहे हैं। वहाँ बैठे हये हैं। लेकिन वो बालक हैं। बालक बेचारे रक्षा कर रहे हैं। लेकिन आततायी जब उन पर आक्रमण करते हैं तो माँ अन्दर से | फूँकार करती है और उसी तरह सारे ही कुण्डलिनी के दोष आते हैं। उसके बाद नाभि चक्र पे मैंने आपको बताया है, श्रीविष्णु की स्थापना है और स्वाधिष्ठान चक्र जो कि हमारे निर्मिती के लिये बनाया गया है। जैसे हमारे औरतों का जो यूट्स होता है, वो अऑर्टिक प्लेक्सस से कंट्रोल होता है जिसे हम स्वाधिष्ठान चक्र केंद्र से ही स्थापित करते हैं। जो कुछ भी हम निर्मिती करते हैं वो सब स्वाधिष्ठान चक्र पे है। जो कि यहाँ मैंने छ: नंबर पे दिखाया है । जैसे कि कोई बड़ा भारी लेखक, या कोई बड़ा भारी संत, जो कुछ भी ओरिजिनल आदमी बनाता है, वो सरस्वती की आराधना कर के ही होता है। सरस्वती इसकी अधिष्ठात्री है। इसकी

Original Transcript : Hindi अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है। इसलिये हमेशा गणेश के बाद हम लोग सरस्वती की पूजा करते हैं। और इन सब पूजा में और सब चीज़ों में कितना अर्थ है वही मैं सिद्ध करने के लिये आयी हँ। जिसको ये लोग आडंबर कहते हैं वो कितनी महान चीज़ है लेकिन उसके अन्दर का गहरा अर्थ, उसके अन्दर की गहनता जिन्होंने समझी नहीं, जो साइन्स के झंडे लगा कर घूम रहे हैं, उनको भी में दिखाना चाहती हूँ कि साइन्स में इसका क्या अर्थ है। बिल्कुल साइन्स भी वहीं से आया हुआ है। अगर सरस्वती जी ना हो तो आइनस्टीन को पता न चलता कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी क्या है? आइनस्टीन ने भी अपनी किताब की शुरूआत में ही कहा है कि, ‘मैं तो परेशान हो गया काम करते करते, किताबें पढ़ते पढ़ते और उसके बाद मैं थक कर किसी उद्यान में बैठ कर के सोप बबल्स से खेल रहा था। साबून के बुलबुले से खेल रहा था।’ तो उसमें उन्होंने कहा हुआ है, ‘व्हेन समटाइम वेअर अननोन द थिअरी ऑफ रिलेटिविटी डॉन अपॉन यू।’ इशारा उसी तरफ है, कि सारी निर्मिती हमारे अन्दर ही तो हो रही है। जो कुछ बाहर है वो जाना होगा। उसके बाद कहा है मैंने आपको पाँचवा जो चक्र है, नाभि चक्र, उसमें श्रीविष्णु की स्थापना हुई। श्रीविष्णु की स्थापना है विष्णु पालन करते हैं। उनकी पत्नी….। जैसे सरस्वती भी बनायी हुई बड़े सोच के बनायी। इसमें सोच-विचार बड़ा गहरा है। जो द्रष्टा है उन्होंने नहीं बनाया है। परमात्मा ने उनको बनाया है। इसलिये उनका सोच- विचार बड़ा अच्छा है। आप उस सरस्वती जी की मूर्ति अपने सामने रखे। वो श्वेतवस्त्रा है। श्वेतवस्त्रा का मतलब ही ये है…..(अस्पष्ट)। जैसे बहुत से लोग मुझ से कहते हैं कि माँ, ‘आप सफ़ेद क्यों पहनती है?’ ‘मैं ….हँ। वैसे मैं हमेशा तो पहनती नहीं हूँ।’ लेकिन ध्यान के समय जरूर सफ़ेद पहनती हूँ क्योंकि मनुष्य का चित्त जो है वो मेरे रंगों में न उलझ जायें। इसलिये सरस्वती को श्वेत वस्त्रा बनाया हुआ है और उसके हाथ में जो वीणा दी हुई है, बड़ी जोरकस है। वीणा अपने यहाँ का एक आदि गीत यंत्र है, वाद्य यंत्र है और उसका अर्थ ये है कि, आदमी को संगीत है। उतना ही मालूम होना चाहिये जितना एक सरस्वती के दिवाने को मालूम आपने देखा होगा कि बहुत से पढ़े लिखे लोग इतने बेस्वाद होते हैं, पूजा पाठ में सरदर्द हो जाये। उनके अन्दर जरा भी स्वाद, निखार जरा भी नहीं। अब बात करने लग गये तो बोअर हो जाते है। एक मिल गये। उन्होंने तो सारा पांडित्य ही हम पे डाल दिया। ऐसे पढ़े लिखे लोगों से लोग भागते हैं। ऐसा आदमी कभी भी सरस्वती का पुजारी नहीं हो सकता। पढ़ा लिखा होना और सरस्वती का पुजारी होना बहुत ही महदंतर है। हर एक पढ़े लिखे आदमी में संगीत का और हर एक कला का ज्ञान होना जरूरी है। सिर्फ एक ही चीज़ का स्पेशलाइजेशन कर लेने से आप विद्वान नहीं हो सकते। आप सरस्वती के पुजारी है। जो आदमी एक चीज़ को जानता है उसको सब कुछ जानना जरूरी होता है। ये सरस्वती की पहचान है। अब जैसे मुझे एक चीज़ समझ नहीं आती, वो है इकोनोमिक ऑफ ह्यूमन लॉज, जो चीज़ मेरे समझ से परे है, शायद हो सकता है, कि ये सब कुछ बहुत आर्टिफिशिअल है। शायद इसी वजह से मैं नहीं समझ पायी। कला में मनुष्य को गति लेनी चाहिये, जब वो अपने स्वाधिष्ठान चक्र में पूरित होता है । उसके बाद नाभि चक्र पे श्री लक्ष्मी जी का स्थान है। श्री लक्ष्मी जी, का भी देखिये , बड़ा सुन्दर सा स्वरूप बना है। उनके दो हाथ में कमल है। एक हाथ ऐसा है और एक हाथ ऐसा (अॅक्शन)। अभी जो वाइब्रेशन्स ले रहे हैं 8.

Original Transcript : Hindi वो समझ सकते हैं, इसका अर्थ क्या है और दो हाथ में कमल होने का मतलब ऐसा है जो कि आदमी रहित होती है स्त्री और दो हाथ। एक सामान के लिये है, एक शोभा होने के लिये| कंजूष आदमी कभी भी रईस नहीं होता। जो कंजूष है, उसको रईस नहीं कहना चाहिये। वो कंजूष भी है और पैसे वाला भी है। जिसके घर में शोभा है, जो कला का पुजारी है, जो कला को बनाने वाला है वही रईस आदमी है। और कमल का जो कोझीनेस है, उसकी जो आरामदेयता है, जैसे कि कोई भी भँवरा आ जायें उसे अपने पास में बुला लेता है, ऐसा जो है वही आदमी कमलापती कहा जाये। लेकिन हमारे यहाँ तो हर एक आदमी सोचता है कि मैं लक्ष्मीपती हँ। लक्ष्मी जी का पति होने के लिये विष्णु जैसा पालनकर्ता चाहिये, जो सारे संसार की ओर एक पिता की दृष्टि रखे और सारे संसार को अपना एक कुटुंब समझ के उसके लिये रोता है और ऐसे पैसे वाले तो बहुत हैं, लेकिन अपने रिश्तेदारों को सम्भाल की जो चिंता नहीं कर सकते, वो लक्ष्मीपति कैसे? जो सारे ही संसार के सुख-दु:ख नहीं पाता। उनके सुख-दुःख को सम्भालने वाला है, वही लक्ष्मी का पुजारी है। इसी को हम इनलाइटेन्ड इंडस्ट्रियलिस्ट कहते हैं। ऐसे अपने देश में अगर हो जाये तो अपने प्रश्न ही छूट जाये। लक्ष्मी जी का एक हाथ ऐसा होना और एक हाथ ऐसा होना बड़ा अच्छा है। इस हाथ का अर्थ ऐसा होता है कि लक्ष्मीपति को दान जरूर करना चाहिये। दान अव्याहत करना है। अपने आप करना चाहिये। दान करने में भावना नहीं होनी चाहिये की हम दे रहे हैं। देना का कोई मतलब ही नहीं। बगैर दिये हमें वो चुभ रहा था इसलिये हम निकाल ही दिये। और ये हाथ ऐसा होने का मतलब है हमारा आश्रय है। हमारे आश्रित है में जब कोई आदमी | दौड़ के आता है और कहता है, ‘भाई मैं बहत परेशान हूँ। किसी तरह से मेरी मदद करें।’ पहले ही हमारे चार दरवाजे बंद हो जायेंगे। उसको भगाने के लिये पाँच आपके दरबान खड़े रहेंगे। ऐसे आदमी को मैं लक्ष्मीपति नहीं कहँगी । लोग कहेंगे कि, ‘आप देने लग जायेंगे तो इसका तो कोई अंत नहीं । मरने वालों का तो अंत नहीं।’ ऐसी बात नहीं। आपके दरवाजे जो आये उसको मोड़ना गलत बात है। लेकिन आप शायद जानते नहीं हैं, कि थोड़ासा दिया हुआ कितना बड़ा हो जाता है। बहुत बड़ा हो जाता है। मैंने अपने छोटे से जीवन में, मेरे पति की कोई विशेष तनख्वाह नहीं है, मतलब ऐसे कोई बड़े रईस आदमी नहीं है, लेकिन मैंने देखा है, जहाँ भी कहीं मदद की, जहाँ थोड़ा कर भी दिया, वो हजार गुना मेरे पर बरसा है। मेरी फॅमिली पर बरसा है। मेरे लोगों पर बरसा है और दुनिया पर। अपना देना | कभी भी व्यर्थ नहीं गया। एक उदाहरण के लिये बात बताऊँ। हम दिल्ली में रहते थे तब एक शरणार्थी आयी और मेरे पास आ कर कहने लगी कि, ‘माँ, कल मुझे बच्चा होने वाला है, ये सब मुझे प्यारा लगा। हमारे पास कोई जगह नहीं। आप के पास इतना बड़ा घर है हमें जगह दे दीजिये।’ मैंने कहा, ‘हाँ, आ जाओ। रह जाओ।’ मेरे पति आये, घबरा गये। कहने लगे, ‘तुम कितनी भोली हो। किसी को भी घर में रख दिया। कल अगर कोई आफ़त आ जायेगी । मैंने कहा, ‘आ जाये तो आ जाये। अगर अपना बच्चा अपने घर में आ जाये तो आफ़त आ सकती है। इसमें कौन सी बात है। वो कहने लगे, ‘तुम्हारी तो बात समझ में आती नहीं। मैंने कहा, ‘अच्छा, चलो भाई, बाहर का कमरा खाली पड़ा है, उसमें रख दिया। कौन सी आफ़त आ गयी ।’ उनका भी कहना व्यावहारिक है और हम अव्यावहारिक है। व्यवहार हमें ज्यादा मालूम है तो आप समझ लीजियेगा आगे। वो हमारे घर में रही। उसके साथ में एक मुसलमान

Original Transcript : Hindi और वो हिन्दू थी, उसकी पत्नी। और वो मुसलमान उनके मित्र थे तो उनको भी भगा लिया था अपने घर में रखा था। मैंने कहा, ‘चलो, दोनों यही रहो ।’ फिर वहाँ पे दिल्ली में आ कर के और सब लोग आ गये और कहने लगे कि, ‘इस घर में भी एक मुसलमान छिपा हुआ है। हमको मालूम है, नौकरों ने बताया है।’ तो उन्होंने आ कर मुझ से पूछा। मैंने कहा, ‘आप विश्वास रखते हैं,’ मेरा कुंकु देख के पहले घबरा गये, ‘तो यहाँ पर कोई मुसलमान नहीं। आप चले जाईये।’ वो चले गये। उसके बाद वो मुसलमान साहब, जो एक बहुत बड़े शायर है, आज हिन्दुस्तान के बहुत बड़े शायर है। वो मुझे बहुत मानते है। अपने काव्यों में भी उन्होंने वर्णन किया है। लेकिन वास्तविक मैं तो उनको नहीं जानती थी। इतना बड़ा शायर, उसको मैं अगर …. नहीं देती, तो आज वो खत्म, इतनी बड़ी कवितायें जो लिखी वो सब खत्म है। वो जो थी मेरे साथ वो आज हिन्दुस्तान की बहुत बड़ी सिनेमा अॅक्ट्रेस है। बहुत बड़ी। और उसको एक बार, मैं कभी उसको बाद में मिली नहीं। वो बार बार मुझे खोजती रही। में चली गयी इधर-उधर, जहाँ मेरे पति जाते रहे। उसके बाद मैं बम्बई में आयीं, तो हमारे कुछ नवयुवकों ने सोचा कि एक सिनेमा बनायें । मुझ से कहने लगे कि ‘देवीजी से कहिये कि इसमें अॅक्ट करें।’ मैंने कहा, ‘मैं उसे नहीं कहँगी। ‘ कहा, ‘क्यों ?’ मैंने | वो आयीं। मुझे देख कर वो रो पड़ी। कहने लगी, कहा , ‘उससे एक बंधन है। उसे छोड़ दे ।’ जिस दिन मुहर्त हुआ, ‘माँ, तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि ये तुम्हारा है!’ मैंने कहा, ‘इसलिये मैंने नहीं बताया कि मैं जानती थी, कि मेरा सोच कर तुम एक बार इस पे ठान पड़े। मैंने कहा तुम्हारा सोच-विचार है।’ इस तरह से न जानें कितने ही बार, हजारों मैं आपको उदाहरण दे सकती हूँ, कि दिया हुआ कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। रोका हुआ जरूर व्यर्थ हो जायेगा। कल अगर आपके यहाँ पर डिमॉनीटाइझेशन हो जाये तो गया। कल कुछ गड़बड़ हो गयी तो गया। दीजिये, दोनों हाथों से दीजिये। घबराईये नहीं। इस हाथ से आप दे रहे हैं और इस हाथ से आप के पास आता है। भी खाते हैं, जो लक्ष्मी जी के अपने नाभि चक्र पर … .होने का यही कारण है, कि हम लोग जो कुछ १ कुछ भी पाते हैं, पेट में हमारे जो भी अन्न जाता है, उसकी पचन क्रिया श्रीविष्णु जी के हवाले है। इसलिये जिन जिन को डाइबेटिस होता है, अधिकतर वो अगर दान करें तो ठीक हो जाये। आपको आश्चर्य होगा कि डाइबेटिस के लोगों को मैं हमेशा कहती हँ, कि आप दान करें। दान, जो देते हैं वो मुड़ कर अपने पास हज़ार गुना आता है और मनुष्य के लिये बड़ा आशीर्वादित है। इसी तरह से पेट के जितने भी विकार हैं, जितने भी पेट के विकार है, सारे ही विकारों का इलाज श्रीविष्णु है। श्रीविष्णु का अवलंबन करने का मतलब ही है, कि हमारे अन्दर दानशूरता है। जो आदमी बड़ा हो जाता है, उसको पेट की शिकायत कम रहती है। ये कुछ है ऐसा। आपको दिखने में अजीब सा लगता है, पर ऐसी बात है। आप कर के देखियेगा। जिनको भी पेट की शिकायत हो आज जा कर कहीं, किसी को दान कर दें। किसी का पेट भर के आया आप देखियेगा आपका पेट हल्का हो जायेगा| ये शास्त्रोक्त बात है क्योंकि हमने इसको बहुत बार अजमाया है और लोगों ने भी आजमाया है कि इस से बड़ा फर्क पड़ता है उसके बाद हृदय चक्र में मैंने आपसे पहले ही कहा था, कि शिवजी ईश्वर स्वरूप में है। शिवजी का हमारे अन्दर में होना आवश्यक ही है। क्योंकि वही साक्षी हैं। वही क्षेत्रज्ञ जिसे कहते हैं, वो हैं । वो सब को जानने वाले, | वही साक्षी हैं। हमारे अन्दर कोई न कोई एक ऐसा बैठा हुआ आप सब को प्रतीत होता है, जो सब हमारा जानता है। हम अगर झूठ बोलते हैं तो, सच बोलते हैं तो, अच्छे बोलते हैं तो, दान देते हैं तो, बड़े होते हैं तो, छोटे होते हैं तो, 10

Original Transcript : Hindi सब को जानने वाला हमारे हृदय में साक्षिस्वरूप जो बैठे हुये हैं, वो परम ईश्वर, वही आत्मास्वरूप, हमारे हृदय में विराजमान हैं। लेकिन हृदय चक्र तक पहुँचने के लिये जो मैंने बीच की गॅप दिखायी है, यही सारा भवसागर है। इसके बीचोबीच श्रीविष्णु का स्थान और उसके ऊपर में ब्रह्मदेव बैठ कर के सारी सृष्टि की निर्मिती करते हैं । सारा भवसागर बनाया है। अब ये भवसागर बनाने के बाद प्रश्न ये हुआ कि मनुष्य को किस तरह से पार किया है। मनुष्य भी बन गया, अब इसको पार कैसे किया जाये? इस मनुष्य को पता कैसे हो? इसमें ब्रह्मत्त्व कैसे आयें? माने इसमें बैठे हये शिव और शक्ति का मिलन कैसे हो ? योग कैसे बनें? इसके लिये एक विशेष तरह की व्यक्ति संसार में तैयार की। जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के तत्त्व को पकड़ के बनायी गयी, जिसे हम श्रीदत्तात्रेय जी के नाम से मानते हैं। श्रीदत्तात्रेय कोई नहीं हैं, लेकिन आदिगुरु हैं। मेरे भी गुरु हैं। अनेक जन्मों में उन्होंने मुझे सिखाया हैं। श्रीदत्तात्रेय जी के जन्म के बारे में सुन कर और उनके अनेक जन्मों के बारे में सुन कर आप लोग स्तंभित हो जायेंगे | कितनी बड़ी भारी बात हम लोग भूल गये हैं। श्रीदत्तात्रेय जी के जन्म अनेक, पहले तो हम कह सकते हैं कि उनका जन्म राजा जनक के दशा में हुआ। जब उनकी लड़की श्री सीताजी, स्वयं साक्षात् शक्तिस्वरूप है। उसके बाद उनका जन्म मछिंद्रनाथ, झोराष्ट्रर और मोहम्मद साहब , जिनको की हम सोचते हैं, वो बिल्कुल दूसरे ही तरह के आदमी थे। वो हर तरह के प्रयत्न किया करते थे। पहले तो संसार में श्रीदत्त, आदि लोगों ने ये सिखलाया, कि इस तरह से अलग अलग हमारे अन्दर में प्रतीक स्वरूप इतनी चीज़ें हैं। वो कहते हैं, ‘लोग इसी प्रतीक को पकड़ गये। मूर्तीपूजा में फँस गये।’ उनका मतलब ये था कि इस मूर्ति से परे उस शक्ति को पहचानें । इसलिये पहले मूर्ति की बात की। जैसे कि फूल होता है। फूल में बैठे शहद के लिये फूल की बात पहले उन्होंने की थी। लेकिन लोग उसी फूल को चिपक गये। तो फिर ऐसे उन्होंने अवतार लिये, जिसमें उन्होंने शहद की बात की। उसमें उन्होंने पुनर्जन्म की बात जान बुझ कर नहीं की। क्योंकि पुनर्जन्म की बात अभी, सब लोग मुझे पूछते हैं कि, ‘माताजी, हमारा पहला जनम बताईये।’ जो गया जनम है उसको क्यों जानना चाहते हैं? आज का ही जनम ठीक है। इसी में पार हो जाईये। उसमें क्या विशेषता है? आप राजा थे या महाराजा थे या भिखारी थे, इससे क्या अन्तर होने वाला है। इसीलिये उन्होंने इस पर बात नहीं की। मोहम्मद साहब भी उसी दत्तात्रेय जी के अवतार है और उसी के अवतार राजा जनक थे। और उसी के अवतार नानक जी, जिनकी बहन नानकी जी थी , वो थी, वही आदिशक्ति थी । वही सीताजी। अब आपको और बताऊँ तो और आश्चर्य आयेगा, कि जो शिया पंथ शुरू हुआ था मोहम्मद साहब के बाद, उनकी जो लड़की फातिमा थी, वो भी थी आदिशक्ति और उनके जो दो बच्चे थे, हसन और हसेन, बाद में जब उन्होंने देखा कि संहार करने के बाद भी मनुष्य की समझ में नही आया, तो फिर वह बुद्ध और महावीर के नाम से पैदा हये और उन्होंने अहिंसा का धर्म संसार में ला कर के कोशिश की कि शायद अहिंसा को आने से ही ये लोग पार होंगे। लेकिन नहीं बना पाये। अब कहाँ किसी से आप लड़ रहे हैं, किस से आप झगड़ा कर रहे हैं। मैं तो हमेशा कहती हूँ, कि अगर एकाध मुसलमान अटक गया तो उसे कहती हैँ कि ‘तू दत्तात्रेय का नाम ले।’ और अगर कोई हिन्दू अटक जायें तो मैं कहती हैँ कि, ‘मोहम्मद साहब का नाम ले।’ आपको पता नहीं की जो आज बड़े भारी हिन्दू बने, पहले जनम में मुसलमान रहे। 11

Original Transcript : Hindi मैं जब ईराण में गयी तो वहाँ देखती हूँ कि ध्यान में बैठे हये लोग घण्टा चला रहे हैं और तिलक ले रहे हैं और आरती कर रहे हैं। क्योंकि जो एक अतिशयता पे रहता है, वो दुसरी अतिशयता पे जाता है, पेंड्यूलम की तरह। घण्टों बीचोबीच न ….न मुसलमान। सब तो हमारी पेट ही में घुसा हुआ है। आप देख रहे हैं कि आप जब मेरी ओर हाथ कर के ध्यान में, आज सबेरे लोगों ने ऐसा हाथ किया था और अभी भी आप लोग कर रहे हैं, बहुत फायदा रहेगा। ये नमाज का …. । लेकिन क्या मुसलमान जानते हैं कि ये क्या चीज़ है? या हिन्दू जानते हैं शायद? और सर पे हाथ रखने की चीज़ ख्रिश्चन्स में, आप जानते हैं कि बाप्टाइज जब करते हैं तब सर पे पानी डाल के, सहस्रार पे पानी डालते हैं। उसके बाद हमारे हृदय में बसे हये श्री शिवजी को, उनको जानना, बहत कठिन बात है। वो अत्यंत भोले हैं, माने ये की वो सिर्फ देने वाले हैं। वो सिर्फ देखते रहते हैं, सुपरवाइजर है। वो शक्ति का सारा खेल देखते रहते हैं। लेकिन जब कुण्डलिनी उठ कर के हृदय चक्र के ऊपर चली जाती है, हृदय में है, हृदय चक्र में नहीं। मैंने सुना की कोई बड़े भारी लेखक हैं, उन्होंने कहा है कि हृदय यहाँ पे होता है। हृदय तो यहीं हैं, हृदय चक्र जो कि बीचोबीच है, वहाँ पे सिर्फ सुषुम्ना, उसका कार्य, वो शक्ति अलग ही रहती है, जब तक वो ऊपर की ये ब्रेन की ये जो प्लेट है, उसे मूर्धा कहते हैं वहाँ तक नहीं पहुँचती, तब तक शक्ति जो है, अकेली, वहाँ जा कर वो जब बरसने लगती है, दोनों साइड में, तब हृदय की साइड में उसका शीघ्र मिलन होता है। और जब नीचे की नाभि पर वो मिलते हैं तभी ब्रह्मतत्त्व तैय्यार हो कर के, ऊपर जाता है, और ऊपर का ये आज्ञा चक्र, जो कि जुड़ा हुआ है, वो खुल जाता है। शिवजी के पत्नी के बारे में जो कुछ भी कहा गया है, वो बिल्कुल सत्य है। देवी माहात्म्य आप पढ़े हैं । उसमें भी का एक भी अक्षर गलत नहीं। मार्कडेय स्वामी जी बहुत बड़े द्रष्टा थे। उनका एक भी अक्षर झूठ नहीं है। एक अक्षर बिगडा हुआ नहीं। मुझे तो कभी कभी आश्चर्य लगता है, कि मनुष्य में कहाँ तक और कैसे देखा इस बारीकी से। आप तो कहते हैं कि सब माया है और माया होते भी इतना माया को पहचाना। ये भी मनुष्य की कमाल है। लेकिन मार्कडेय स्वामी का नाम भी किसने सुना। उन्होंने जो …. सदी में श्री दर्गा जी का वर्णन किया है । वो बिल्कुल सही बात है। क्योंकि भवसागर से जब लोग पार करा रहे थे, तब उनको मदद करने के लिये उस शक्ति को अनेक रूप धारण करना पड़ा। और जब शक्ति आयीं, अपने आप इस संसार में उतरती हैं तो अकेले ही उतरती है। तब वो अनेक देवियों के रूपों में आ कर के उन्होंने सारे राक्षस जो कि भक्तों को सता रहे थे, उनको मारा, उनका संहार किया। लेकिन कोई फायदा नहीं। संहार किया तो फिर जिंदा हो गये, कलियुग में सारे फैल गये। वो फिर से आ गये हैं, लेकिन उस वक्त में, भक्त को सम्भालना ही था। उस वक्त में पार करने की बात कहाँ? वहाँ तो ऐसी हालत थी कि शरीर तक मनुष्य का, शरीर तक वहाँ कोई बात नहीं थी, कि वो शरीर ही बच जायेगा। इसलिये भगवती के नाम, से जानते हैं। उनका संहार किया गया। वही जो देवी है, जिसको की हम आदिशक्ति के नाम, उन्होंने ये शिवजी की पत्नी बन कर के, उस समय बहुत लोगों का संहार किया । उसके बाद आज्ञा चक्र, आज्ञा चक्र पे हम जब आते हैं, तो आपको आश्चर्य होगा कि बहुत ही आधुनिक काल में आ गये। मोहम्मद साहब के पहले, थोड़े ही दिन पहले ही, ईसामसीह का जन्म हुआ। ईसामसीह साक्षात् राम स्वरूप है। साक्षात् गण है। आप सोचते हैं कि गणेशजी जो है वही ईसामसीह है। उनका जो क्रॉस, यहाँ पे मैंने 12

Original Transcript : Hindi क्रॉस बताया है, वही वो क्रॉस है, जो कि श्री गणेश है, जिनका की आप ने देखा होगा कि स्वस्तिक बनाया गया। वही श्री गणेश के प्रणव स्वरूप है, वही प्रणव स्वरूप आदमी बन कर के संसार में आया, वही ईसामसीह है। ईसामसीह ने ही संसार में भूत निकाले। और किसी ने नहीं निकाले। उन्होंने तो मार ही डाले सबको। ये सभी कहते हैं उन्होंने ही मारे। ईसामसीह को मैं पहले इसलिये बता रही हूँ, कि विशुद्धि चक्र पे श्रीकृष्ण हैं। लेकिन ईसामसीह की जो माँ थी वो स्वयं राधा थी। इसलिये उसके स्वरूप मैं पहले उनको बता रही हूँ। ये आज्ञा चक्र पे जहाँ .. दिखाया गया वहाँ हैं। वहाँ श्रीकृष्ण जो थे, उनकी पत्नी राधा, रा माने चेतना, धा माने धारणा करने वाली, राधा, ये विशुद्धि चक्र पे कार्य करती है। अब यहाँ पर भी, अब डॉक्टरों से पूछे तो सोलह सब प्लेक्सेस हैं हमारे सव्व्हायकल प्लेक्सेस में उनके भी सोलह कलायें हैं। वो संपूर्ण है । लेकिन संपूर्ण होने पर भी कार्य उतना पूरा इसलिये नहीं हो पाया, सारा जीवन ही दुष्टों से लड़ते लड़ते खत्म हो गया। इतने महा दुष्ट …..कि व्यर्थ हो गया उनका सारा। हालाकि सारा जो कुछ भी लीला का वर्णन है ये सहज ही है। ये सहजयोग है। आपको आश्चर्य होगा , उनका मटकी का फोड़ना और पेट में सब लोगों को बंधवा लेना, राधाजी की मटकी फोड़ना सब में सहजयोग है। क्योंकि वो वाइब्रेटेड पानी जमना से ले जा रही थी। उनके पाँव जमना जी में पड़े रहते थे । जमना जी का पानी वाइब्रेट होता था। उससे उठा के ले जाती थी। वो पानी गली में पड़ जाये, रास्ते में पड़ जाये, इसलिये मटकी वो फोड़ते थे। क्या राधाजी इस बात को जानती नहीं थी! पूरी तरह से जानती थी| लेकिन उस वक्त ऐसे हॉल होते और लोगों से बात की जाती कि, ‘भाई तुम लोग ध्यान में जाओ ।’ लोग कहते कि, ‘क्या पागल हो गये। हम तो घर- गृहस्थी के आदमी, हम कहाँ ध्यान में जायेंगे!’ असल में सहजयोग घर-गृहस्थी के आदमिओं में ही हो सकता है। इन संन्यासिओं में अब नहीं हो सकता। इसलिये श्रीकृष्ण ने सहजयोग के प्रयोग के लिये साधारण गोप-गोपियाँ, साधारण तरह के रहने वाले, लोगों को ही चुना। आप नहीं जानते कि जो लोग सोचते हैं कि बड़े संन्यासी और तपस्वी, और फलाने, ढिकाने हो सकते हैं, हो जायें, उन से किसी का तारण नहीं हो सकता। किसी का साल्व्हेशन नहीं हो सकता। हाँ, ये जरूरी है कि एक बड़ा भारी योगी, एक बड़ा भारी तपस्वी हो गया, वो किसी को भस्म करना चाहे तो भस्म कर सकता है। किसी को आँख खोले तो भस्म हो गये। आपने भगीरथ प्रयत्नों को पढ़ा है, कि भगीरथ प्रयत्न में बताया गया है कि बेचारे उस भगीरथ के बाप-दादाओं को ही उसने भस्म किया । ये भी कोई बड़ी भारी चीज़ है, कि जिसको देखो आप भस्म कर रहे हैं। ऐसे ही पातिव्रत के आदमी जो सावित्री की शक्तियाँ हैं, जो सावित्री की बात करतें हैं, गायत्री की बात करते हैं, ध्यान रखें कि वो लोग अन्दर से कभी भी शांत, सुख और प्रेममय नहीं हो सकते। हाँ, वो तेजस्वी हो सकते हैं, प्रखर हो सकते हैं। क्योंकि चन्द्र नाड़ी जो यहाँ मैंने दिखाया है इस पर विजय है। उस तेजस्विता को पा कर करना भी क्या है? आज उसको भस्म किया , कल फिर वो अपने को भस्म करेंगे। कितने भी और बड़े साधु, बड़े अपने को समझते हैं कि हमने इस तत्त्व को पा लिया, उस त्त्व को पा लिया, लेकिन वो ये नहीं जानते कि प्रेम तत्त्व को नहीं पाया बाकी सारे तत्त्वों को पा लिया । और ऐसी ही बड़ी बड़ी पतिव्रतायें, भगवान बचाये रखें उन लोगों से, जिन्होंने कि सावित्री की शक्ति को अपने अन्दर में समा लिया था, उन्होंने कौन सा बड़ा भारी तारण कार्य किया। मेरे कृष्ण को तक उन्होंने साग दे कर 13

Original Transcript : Hindi के खत्म किया। जिन्होंने उसको तक नहीं पहचाना ऐसी पतिव्रतायें किस काम की। बहुत ही सेल्फिश हैं। इसमें कोई ऐसी बात नहीं, जो सारे समाज के लिये, सारे संसार के लिये करुणामय है। विचार करेंें आप! इसलिये जो जो लोग ईड़ा नाड़ी पर काम करते हैं। वो भी वहीं हैं और जो पिंगला नाड़ी जो दसरी नाड़ी बतायी गयी हैं, उस पर काम करते हैं वो भी वही हैं। माने जो बहुत …. करते हैं, माने संन्यास लोग, ये लोग, वो लोग, ये लोग भी वही हैं और जो लोग कहते हैं कि नहीं ये भी खाओ, वो भी खाओ, मद्य लो, खाओ, पिओ, वो भी वही हैं। इधर वो भूत योनि लाते और इधर ये तेजस्वी योनि लाते हैं। दोनों से देश का, आपके इस विश्व का कुछ भी संकट दूर नहीं हो सकता, न ही उसमें प्रेम स्थिती आ सकती है, न ही हमारे अन्दर तारण आ सकता है। तारण करने वाला जरूर था, इसलिये वहाँ पर ….स्थापना हुई और राधा जी तक, आपको आश्चर्य होगा मेरी स्वयं राधा है, वो भी तारण है, वो भी एक बड़ा भारी तारण है। सीताजी , जो कि राम की पत्नी थी। विवाहिता थी । उसके साथ समाज ने जो अन्याय किया । उसको घर से निकाल कर के, उसको दोषी कर के, कलंकित जो किया तब ये बड़े बड़े तेजस्वी लोग क्यों आँख बंद कर के बैठे थे ? उन लोगों ने तब क्यों नहीं कहा, कि हमारी ये माँ हैं? इनको तुम घर से निकाल रहे हो । इन्होंने अग्निपरीक्षा दी है। तब इनके मुँह क्यों बंद हो गये थे ? इनकी तेजस्विता कहाँ गयी थी? इनकी अकल कहाँ मारी गयी थी? उस वक्त में बड़े एक से एक लोग थे। किसी ने कोई बात तक नहीं की। उनको ही अकल देने के लिये राधा जी ने कृष्ण से लौकिक विवाह नहीं किया। फिर भी सारा संसार कृष्ण का नाम राधा-कृष्ण से जानता है। लेकिन उसे विवाह का बंधन, लौकिक विवाह का बंधन भी बहुत मान्य है और इसी कारण कोई बच्चा नहीं है। किंतु उसके अगले जन्म में जब वो मेरी बन कर आयीं तब उस के लड़के ने चार चाँद लगाये थे, जो कि कुमारी दशा में, कोई कठिन काम नहीं है कुमारी दशा में बच्चा पैदा करना। अगर आप रियलाइज्ड सोल है और आप उस दशा में हैं, जैसे आज मैं सहस्रार से हजारों बच्चे पैदा कर रही हैँ। क्या मुश्किल हैं, अगर कोई चाहे तो अपने भूल से भी ऐसा बच्चा पैदा करे। अपने गर्भ से भी ऐसा बच्चा पैदा करे। कोई ऐसी कठिन बात नहीं है। लेकिन उन्होंने ये कर के दिखाया। और आज हालांकि उसका वो लौकिक दृष्टि से लेकिन आज दनिया के आगे मेरी एक बड़ी भारी महासती मानी गयी। उसको लोग डिवाइन मदर कहते हैं। ये उसके बच्चे का काम है। ऐसा बच्चा परमात्मा स्वरूप, लेकिन उसको भी किसी ने नहीं छोड़ा। उसकी जान खा ली। ३४ साल की उम्र में सब ने उसे मार ड़राला। इसी समाज ने जो बड़े अपने को हिन्दू, मुसलमान और फलाने, कहते हैं, उस वक्त में वो किस रूप में आ गये । ये जो समाज के बड़े ठेकेदार हैं इन्हीं लोगों ने उनको मारा। किसी को ये नहीं लगा कि इतना बड़ा महान आत्मा इस संसार से बिदा ले रहा है। इतनी छोटी सी उमर में असहाय, इस संसार से उन्हें जाना पड़ा। आज हजारों उनके नाम पर इन लोगों ने धर्म बनायें। इसका क्या अर्थ है? धर्म तो कुछ बन ही नहीं पाया। कहाँ वो और कहाँ उनके बनाये हये धर्म। उन्होंने एक ही चीज़ पर बहुत जोर दिया था, कि हमारे अन्दर जो विनाशी शक्तियाँ हैं, जो निगेटिव फोर्सेस हैं, जिसको की वो शैतान कहते थे, जिसको की वो भूत कहते थे, स्पिरीट कहते थे, उनको निकाल देना। और आज सारा ख्रिश्चनिझम जो है वो सिर्फ स्पिरीट पे ही काम करता है। शर्म की बात हैं कि जिस चीज़ को उन्होंने हमेशा ही मना किया वही चीज़ हम बार-बार कर रहे है। जैसे मोहम्मद साहब ने बार बार यही कहा कि ‘कम से कम शराब मत पियो।’ तो मुसलमान जितना शराब 14

Original Transcript : Hindi पीते हैं उस पर कविता लिखी है और संसार में कहीं आपको नहीं मिलेगा । मतलब मैं कहती थी कि मोहम्मद साहब की तरफ से, मैं पूछती हूँ कि क्या यही मुसलमान धर्म है ? ईसामसीह की तरफ से मैं पूछती हूँ कि क्या यही ईसाई धर्म है? और आदि शंकराचार्य की तरफ से आप सब से पूछती हूँ कि क्या हिन्दू धर्म यही है? कि जो मिथ्या पर ही बैठे हैं और सारे जग को मिथ्या बताने वाले आदि शंकराचार्य को ठिकाने लगा रहे हैं। इस आज्ञा चक्र पे उनका वास है। हमारे यहाँ जो लोग आज्ञा चक्र तोड़ते हैं और आज्ञा चक्र पर जो आदमी पागल होता है, जिनको साइकोसोमॅटिक ट्रबल्स होते हैं, उनको कि लोग कहते हैं कि इनको साइकोलोजिकल ट्रबल है। हमारे साइकोलोजिस्ट भी हैं, वो भी बहुत बड़े आदमी हैं। वो भी इस पर काम कर रहे हैं। वो भी ईसामसीह का नाम लेने से ही भूत भागते हैं। फट् से भूत भागते हैं। एक उनका नाम काफ़ी है। लेकिन हम लोग किसी का भी नाम कहीं भी रटते रहते हैं। उसकी जगह तो जाननी चाहिये। इसकी वजह तो जाननी चाहिये। उसका अॅप्लीकेशन तो मालूम हो । ये सभी कुछ मैं बताना चाहती हूँ। लेकिन आपके समझने पर भी, आपके पाने पर भी बहुत कुछ निर्भर है । आज्ञा चक्र के बाद सहस्रार में एक हज़ार हमारे अन्दर, नौ सौ तरह की नाड़ियोाँ हैं, ऐसे डॉक्टर्स कहते हैं। एक हजार नहीं कहते, मैंने इसे देखा है। कैसे दिखायी देता है? कोई समझ लें। बड़ा सा कमल हो। जैसे कि बाइबल में उसे कहा है टंग्ज ऑफ फ्लेम माने की किसी लपटों की कोई ऐसी जीभें लगी हुई हैं। जैसे कोई आग की लपट हो, उसी की जीभें, इस तरह से इतना बड़ा ऐसा, इस से थोड़ा बड़ा ऐसा कमल है। बहुत सारी लपटें सर में ऐसे ऐसे दिखायी देती है। और उसके बराबर बीचोबीच अपने वो ब्रह्मरंध्र है, जो सहस्तरार में जिसको छेड़ने के बाद। जब रियलाइझेशन होता है तब मनुष्य इसी को छेड़ता है। पा लेता है । बहुत समय भी हो गया और आज का विषय भी कुछ विचित्र सा था। नया सा था। आज और कल में में इसको बताऊंगी कि सहजयोग से कैसे छेदा जाता है। कल मेडिटेशन में आयें। जो कुछ भी मैंने कहा है वो सब बेकार है, सब व्यर्थ है जब तक आपको ये अनुभव नहीं होगा, तब तक ये सभी व्यर्थ हैं । अनुभव के बाद ही आपको ये बाद समझेगी। लेकिन बगैर बताये हये कोई प्रत्यंतर भी नहीं आता। इसलिये मैंने इसे बताया है और आप लोग भी ऐसा ही समझें की बताया हुआ सब खत्म हो गया। कल मेडिटेशन का समय है। उस वक्त आप आईयेगा। आज मेडिटेशन नहीं हो पायेगा शाम के वक्त में। कल सबेरे काफ़ी देर तक मेहनत करेंगे। जिससे आप लोग पार हो जायें । और लेक्चर भी होगा और मेडिटेशन भी होगा। परमात्मा के लिये थोड़ा सा समय हम को देना है। थोड़ा सा समय दे दीजिये। ज्यादा मुझे नहीं चाहिये। आप ही का अपने से परिचय कराने के लिये, बिल्कुल थोड़ा समय अगर आप दे दें तो काम बन जायेगा। इतने लोग पार हो गये हैं कि मैं बहुत खुश हूँ। और आशा है कि कल आप लोग से पार हो जायेंगे। जिसको आप जान लें। जिस चीज़ की हम बात कर रहे हैं और जिसके बहुत कारण इस सारी सृष्टि की रचना हो गयी , सारी सृष्टि अंत पे आ के खड़ी हो गयी है। सारे सृष्टि की दारोमदार आप पे है। इसमें कुछ नहीं करना होगा। न कुछ लाना होगा, न ही कुछ देना होगा। अगर कुछ मुझ से ले सके तो मैं बड़ा आपका धन्यवाद समझती हूँ। 15

H.H. Shri Mataji Nirmala Devi