Seminar

मुंबई (भारत)

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1975-01-23 Seminar Mumbai, (Hindi)

Hindi- Till 17:50
Marathi – 17:51 to 21:00
Hindi – 21:01 to 27:17
Marathi – 27:18 to 54:37
Hindi – 54:39 to 55:17
Marathi: 55:19 to 56:00

जैसे कोई माली बाग़ लगा देता है और उसको प्रेम से सिंचन करता है और उसके बाद देखते रहता है कि देखे बाग़ में कितने फूल खिल रहे हैं | वो देखने पर जो आनंद उस माली को आता है उसका क्या वर्णन हो सकता है| कृष्ण नाम का अर्थ होता है कृषि से, कृषि आप जानते हैं खेती को कहते हैं| कृष्ण के समय में खेती ही थी और कृष्ण के समय में उसके खून से सींचा गया था | इस संसार की उर्वरा भूमि को कितने ही अवतारों ने पहले सवांरा हुआ है | आज कलियुग में यह समय आ गया है कि उस खेती की बहार देखें, उसके फूलों का सुगंध उठाये, यह जो आप के हाथ में से चैतन्य लहरियाँ बह रही हैं यह वही सुगंध है जिसके सहारे सारा संसार, सारी सृष्टि ,सारी प्रकृति चल रही हैं | लेकिन आज आप वो चुने हुए फूल हैं जो युगों से चुने गए हैं कि आज आप खिलेंगे और आपके अंदर से यह सुगंध संसार में फैल कर के इस कीचड़ से, इस मायासागर से सारी ही गन्दगी को खत्म कर दे | देखने में ऐसा लगता है कि यह कैसे हो सकता है? माताजी बहुत बड़ी बात कह रही हैं, लेकिन यह एक सिलसिला है, contineous process (कन्टिन्यूअस प्रोसेस) है और जब मंजिल सामने आ गयी तब यह सोचना कि मंजिल क्यों आ गयी? कैसे आ गयी? कैसे हो सकता है? जब आप चल रहे थे तो क्या मंजिल नहीं आएगी? जब आप खोज रहे थे तो क्या आपका स्थान मिलेगा नहीं? लेकिन जब वो मिल गया है तब इसमें शंका की बात क्यों खड़ी हो रही है?

आज मैं आपको तीन शक्तियों के बारे में बताना चाहती हूँ कि परमेश्वर एक ही है, वो दो नहीं है अनेक नहीं है| मैं एक ही हूँ अनेक नहीं हूँ, लेकिन आपकी माताजी हूँ, मेरे पति की पत्नी हूँ, मेरे बच्चों की माँ हूँ, आपकी अलौकिक माँ हूँ, उनकी लौकिक माँ हूँ | इसी तरह परमात्मा के भी तीन अंदाज हैं, three aspects ( थ्री आस्पेक्ट्स) | पहले अंदाज से वो साक्षी स्वरुप हैं | वो साक्षी हैं अपनी शक्ति के खेल के जिससे वो देखते हैं, उसे हम ईश्वर कहते हैं और उनकी शक्ति को हम ईश्वरीय शक्ति कहते हैं या ईश्वरी कहते हैं| हमारे सहजयोग में उसे हम महाकाली की शक्ति कहते हैं | जिस वक़्त उनका यह साक्षी स्वरुप खत्म होता है माने जब वो और कुछ देखना नहीं चाहते वो नापसंद करते हैं, जब वो अपनी आँख मूँद लेते हैं अपनी शक्ति के खेल से, उस वक़्त सब चीज़ खत्म हो जाती है| इसीलिए उस शक्ति को हम लोग संहारक शक्ति कहते हैं| असल में संहारक नहीं है लेकिन वो सारे संसार के कार्य का नियोजन करती है और उसे खत्म कर देती हैं |

दूसरी शक्ति जो परमात्मा उपयोग में लाते हैं वो है उनकी क्रियात्मक शक्ति, जिससे वो सारे संसार की रचना करते हैं| उसमे बड़े बड़े ग्रह तारे निर्मित होते हैं जिससे वो पृथ्वी की एक परम पवित्र वस्तु तैयार होती है| इस अवस्था मे परमात्मा को हिरण्यगर्भ कहते हैं और उनकी शक्ति को हिरण्यगर्भिणि कहते हैं | हमारे सहजयोग में उससे महासरस्वती कहते हैं |

तीसरी परमात्मा की जो शक्ति है वो विराट स्वरुप विराट शक्ति है| जिस शक्ति के द्वारा संसार में जीव पैदा होते हैं | उनकी उत्क्रांति यानि evolution (इवोल्युशन) होता है| जानवर से मानव बनता है और मानव से अतिमानव बनता है, अतिमानव से परमात्मा बनता है | इस विराट शक्ति को सहजयोग में हम लोग महालक्ष्मी कहते हैं |

इस तरह से संसार मे तीन शक्तियाँ हैं जो परमेश्वर की आभा को फैलाती है| पहली शक्ति जिसे ईश्वरीशक्ति कहना चाहिए, दूसरी हिरण्यगर्भिणि और तीसरी विराटांगना| सहजयोग का कार्य जो है वो विराट का कार्य है| मनुष्य के अंदर भी परमात्मा ने यह तीनो ही शक्तियाँ दी हैं | एक शक्ति से मनुष्य जो कुछ भी मरता है उसे संचित करता है वो महाकाली की शक्ति है| एक शक्ति से वो भविष्य के लिए वो चिंतन करता है planning (प्लानिंग) करता है , thinking (थिंकिंग) करता है सोचता विचारता है वो महासरस्वती की शक्ति है | और जिस शक्ति के द्वारा वो उत्क्रांति पाता है evolve (इवॉल्व) होता है वो महालक्ष्मी की शक्ति है | इन तीनो शक्ति का मिलाप विराट शरीर में उसके सहस्त्रार में है| वही आदि पुरुष है और उस जैसे मनुष्य को बनाने की पूर्ण व्यवस्था परमेश्वर ने की थी| फिर महालक्ष्मी शक्ति प्राणिमात्रों तक तो अपना कार्य सुव्यवथित करती रहती है | वो उसमे चयन करती है (चॉइस) choice करती है और ठीक लोगों को ठीक जानवरों को एक हद् तक उत्क्रांति तक पहुँचाती है, पर मनुष्य की दशा पर आने पर उसको पूर्णतया स्वतंत्रता मिलती है कि वो अपनी चेतना मे अपनी (अवेयरनेस) awareness में अपना ही उत्क्रांति का पथ खोजे और जाने कि उसकी कैसी उत्क्रांति हो गयी| न तो जानवर अपनी उत्क्रांति की बात सोचता है, लेकिन मनुष्य ही यह सोचता भी है और उसे देख भी सकता है जान भी सकता है जब उसके हाथ से यह (व्हायब्रेशन्स) vibrations आने लगते हैं | मंजिल तो आ गयी है, आप लोग आँगन में आ खड़े हैं | कितना सरल सहज है सब कुछ, किन्तु मनुष्य ही अपने को बड़ा complicate (कॉम्पलिकेट) कर लिया है, बहुत ही ज्यादा विक्षिप्त कर लिया है |मनुष्य के लिए बहुत कठीण हो जाता है कि वो साध्वी से रहे भोलेपन से रहे | और धर्म कुछ नहीं सीधा साधा बिलकुल बिलकुल भोलापन innocence (इनोसन्स)। लेकिन इतनी खोपड़ियों के ऊपर खड़े होकर के हम लोग innocence (इनोसन्स) की बात कैसे करें? इसलिए बहुत से छोटे छोटे बच्चे बहुत जल्दी से पार हो जाते हैं क्यों कि उनके अंदर भोलापन है| कलियुग में बहुत सी बातें हो रही हैं आप को शायद इसका अंदाज़ नहीं है | जैसे ही विराट शक्ति बहुत प्रबलित हो चुकी है, उसी वक़्त में पाताल लोक में जहाँ पर की waste (वेस्ट) मटेरियल जैसे अधोगति को गए हुए बहुत से पुरुष जिनको कि हम लोग राक्षस कहते हैं उनकी भी शक्तियां बलवत्तर हो रही हैं| दोनों शक्तियों का मुकाबला हो रहा है| एक शक्ति मृत है और एक शक्ति जीवंत है | मृत शक्ति कभी भी जीवंत शक्ति से शक्तिशाली नहीं हो सकती| किन्तु जीवंत शक्ति अत्यंत sensitive (सेंन्सिटिव) होती है | संवेदनशील होती है| इसी वजह से उसका पनपना जरा कठीण होता है| प्लास्टिक का फूल कभी भी असली फूल से सुन्दर महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है | किन्तु प्लास्टिक के फूल हज़ारों बनाये जा सकते हैं जीवंत फूल दो ही चार खिलते हैं | इसलिए जो लोग सहजयोग में पनते हैं सहजयोग में जिन्होंने जो कुछ पाया है वो लोग भी मुरझा जाते हैं | खिलखिल उठते हैं फिर मुरझा जाते हैं | एक माँ जैसे अपने आँचल में अपने बच्चों को बड़े दुलारसे संभालती है उसी तरह से सहजयोग पालता है पोसता है| लेकिन बच्चे में भी वो शक्ति है कि वो अपनी शक्ति को जाने | सहजयोग के बाद मनुष्य उस दशा को पहुँच सकता है |इस थोड़े से टाइम में पहुँच सकता है जिस के लिए बड़े बड़े ऋषि मुनियों को हज़्ज़ारों जन्म लेने पड़े और हज़्ज़ारों वर्षों की, युगों की, तपों की साधना करनी पड़ी | हम लोगों के परम भाग्य हैं कि इस समय हम सब लोग इस विशेष युग में पैदा हुए हैं | सामान्य ही लोग हैं असामान्य कार्य के लिए पैदा हुए हैं | असामान्य परदे के पीछे ही हैं | सब आपकी मदद कर रहे हैं | लेकिन सामान्य ही को विराट ने चुना हुआ है| अपने सहस्त्रार पे बैठने के लिए | क्यों कि सामान्य में शक्ति है असामान्य होने की | किन्तु सहजयोग में सबसे पहले बात है की अंदर में भोलापन होना चाहिए और शांति चाहिये। शांत , संतोष | संतोष है | किसी न किसी को कोई जो दुःख है कोई न कोई परेशानी है , उलझन है | लंडन में एक साहब कहने लगे “विएतनाम में इतना युद्ध हो रहा है | आप यह क्या बात कर रही हैं” | मैंने कहा “तुम कोई विएतनाम जा रहे हो? तुम क्या वहाँ के prime minister (प्राइम मिनिस्टर) हो तो तुम को उसकी परेशानी क्यों ? भाई तुम अपना अंदर का देखो” | छोटी छोटी चीजों से अपने जीवन को भ्रम नही देना है| एक आँख मे अगर तिनका भी चला जाये तो आँख ख़राब हो सकती है उसका कोई महत्व नहीं| शांत । क्यों कि वो समय आ गया है जब परमेश्वर का राज्य इस संसार में आने वाला है| संतोंष है| सहजयोगिओं को यह चाहिए कि और लोगों से ज्यादा शांतिपूर्ण रहे | संतोष से भरे रहे हैं खिले रहे और अपने आनंद से सारे संसार को भरते रहे | अंदर का चमत्कार सहजयोग दिखायेगा| बहुत जोरों में चर्वण चला है| मंथन चला हुआ है |

आप में से कोई लोग नए भी आये हैं यहाँ पर| कोई लोग बहूत पुराने हैं| कोई नए आते हैं खट् से कहाँ से कहाँ पहुँच जाते हैं और कोई पुराने हैं यही बैठे हैं |नितांत परमात्मा की असीम कृपा पर जिसे विश्वास है | जो जानता है कि सारी सृष्टि का रचेता वही है और सबको पार लगाने वाला वही है | वो एक क्षण में ही सहजयोग में पार हो के वही जाके जम जाता है और एक बार जम जाता है फिर वो कभी भी उतरता नहीं | अपने विश्वास को दृढ़ करो क्यों कि आप के हाथ से चीज़ बह रही है | आपने इसके करिश्मे और चमत्कार देखें हुए हैं | अपने पर विश्वास करो | अपने को जानो | बहुत कुछ और भी हो रहा है | बहुत से बच्चे छोटे छोटे बच्चे मैंने देखें हैं जिन्हे बहुत बड़े बड़े जीव जो के आपके बाप दादा हैं जन्म ले रहे हैं आपकी मदद करने | दस बारह साल के अंदर में बहुत बड़े बड़े लोग इस संसार मे आ जायेंगे | उनकी स्वागत की तैयारियां करनी है | उनको पहले सूली पे चढ़ाया गया था| उनको मारा पीटा गया था| वो सब आज जन्म लेने वाले हैं| एक नवीन युग इस संसार में आने वाला है| परीक्षा का थोड़ा सा समय है परमात्मा पे विश्वास रखिये | सारे धर्मों का .. सारे धर्मों का आशीर्वाद और आशा कि मनुष्य परमात्मा पथ पे पहुंचेगा वो सत्य होगा| अब हम लोग थोड़ी देर ध्यान में जायेंगे |

(17:50)

काही अत्यंत दुःखी लोक आहेत रडत असतात सकाळपासून संध्याकाळ पर्यंत. अन्न पचत नाही त्यांना काय फायदा. जिथे खायला नाही ते रडतात, ज्यांना खूप खायला आहे तेही रडतात. आत्महत्या करतात. जे आजारी आहेत तेही रडतात जे आजारी नाहीत तेही रडतात. काय ठेवलंय. सगळा वेडेपणा आहे. मागायचं तर ते मागा जे अस्सल आहे. आम्ही अस्सल द्यायला आलोय. तुम्ही काय नकली गोष्टी मागता आमच्याकडे. तब्येत बरी करून द्या, अमक ठीक करून द्या, तमक करून द्या. अर्रे होईल ते त्याच काय. अस्सल तर माल घ्या आधी. त्याचं मूल्य नाही आणि संसारात संबंध महत्वपूर्ण तेच आहे. ते मिळाल्याशिवाय आनंदच मिळणार नाही. काहीही बाकी सगळं व्यर्थ ठरत. असं परिसासारखं जे आहे ते मागा. असं मागणारे असते तर देणारे आम्ही आहोत इकडे बसलेलो. पण आहेत कुठे मागणारे. आईला मागायचं असेल तर विशेषच मागितलं पाहिजे. असलं तसलं काय मागायचं . भाडॊञी. सगळी कमाई देऊन टाकू तुम्हाला. मागा तर खरी. सगळी पुण्याई तुमच्यासाठी लावून टाकू पणाला उभे तर राहा. तुमच्या चरणावर येऊन पडलो तरीसुद्धा तुमच्या लक्षात येणार नाही कि केवढी तळमळ आतून आहे. समजलं पाहिजे. डोळे मिटा ध्यानात जायचंय प्रेमानी. सगळे प्रेमाचे खेळ आहेत. अगदी शांतपणे डोळे मिटायचेत. काही करायचं नाहीये. स्वतःचं जे तुमच्यातील आहे ते बीज वर येणार.

(21:00)

कुछ भी करने का नहीं है| आपके अंदर जो बीज सुप्त अवस्था में है वही परमचेतना है | आखें बंद करके अपने विचारों के और देखें | जो लोग बीमार है, शारीरिक कष्ट में हैं, लक्ष्मी जी की अवकृपा से पीड़ित हैं, हर तरह की पीड़ा है वो तो सब ठीक होगी ही| लेकिन जो असली में मांग है उसका आना जरूरी है | सब लोग मेरी और ऐसे हाथ करें| और अभी तक जो भी पीछे का है मरा हुआ अपना ज्ञान, अपने दुःख, अपनी तकलीफें, और जो कुछ भी आगे का सोच रखा है आशा निराशा और दुनिया भर की चीज़े, जिससे आप त्रस्त हैं उस सब को छोड़ कर के इस क्षण, इसी क्षण, now at this moment (नाउ अॅट दिस मोमेंट ) जागृत हो जाये| Present (प्रेझेंट) में ही जागने से यह चौथा आयाम forth dimension (फोर्थ डायमेंशन) खुलेगा | न तो यह future (फ्यूचर)में है न तो यह past (पास्ट) में है | उसे इसी क्षण में वो मिलना चाहिए यही क्षण महत्वपूर्ण है| जहाँ आप बैठे है इसी क्षण वहाँ कूदना है और उसके आगे भी बढ़ना है | इसी क्षण में जागना ही सहजयोग है | spontaneous salvation (स्पॉनटेनिअस साल्वेशन )|

हिलना डुलना कुछ न करें | आँख बंद करके अपने माथे की और सहस्त्रार पे जहाँ पर spontaneous bone (स्पॉन्टेनियस बोन) होता है वहां पर चित्त देव महान है | अपना चित्त रखे | फ़ोर्स नहीं करे | सहज में ऊपर में सोचें क्या हो रहा है | जैसे यहाँ बैठे बैठे आप घर की बात सोचते हैं | शान्ति पूर्वक और धीरे धीरे आपके हाथ में पहले हो सकता है किसी किसी को थोड़ी बहुत जलन हो | थोड़ी बहुत | इसे जरा झटक ले अगर जलन हो तो| और अगर जलन नहीं हो तो सीधे सीधे ऐसे ही हाथ रखे | और आपको ऐसे लगेगा के अंदर एकदम ठंडी ठंडी हवा आ रही है | और माथे की और जब दृष्टि करेंगे तो ऐसा लगेगा के कोई भी विचार आ नहीं रहा है | यह निर्विचारिता की बात है | आप निर्विचार हो जाये |

एकदम अंदर से शांत हो कर बैठिये | एकदम से शांत होकर मन से कहना हो गया बहुत कुछ समझा रहा है मत मुझे समझा बुझा, मुझे वही जाना है | यही मन है जो आपको बहका रहा है यही आपकी परीक्षा कर रहा है उसे कहना बस कर दे ।

सहजयोग समष्टि में बनता है | एक व्यक्ति का नहीं है | एक individual (इंडिविजुअल) नहीं है | आप सब एक विराट के अंग के रोम रोम है | एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है | सब एक ही शरीर के अंग अंग है यह आप जानिएगा | collective consciousness (कलेक्टिव कॉन्शियस) में, सामूहिक चेतना | आप अकेले नहीं है | आप एक शरीर के अंग प्रत्यंग है | दूसरा कोई है ही नहीं | सब अपने ही है | इसे आप जानिए |

जो आज आए हैं पहले कभी नहीं आए हैं वो बैठे ही रहे | जो लोग पहले आ चुके हैं और जो पार हो चुके हैं जो लोग जानते हैं वो धीरे से उठके पीछे की और जायेंगे | एक एक कर के धीरे जाए पीछे में खड़े हो जाए और बाकी लोगों को देखें| कोई डिस्टर्ब नहीं करें , धीरे धीरे उठे पीछे में जाये और देखें और जो लोग अभी आये हैं वो बैठे रहे आँख बंद करके धीरे से | और जिनके हाथ में से vibrations ( व्हायब्रेशन्स) आ रहे हैं नए आये हुए लोगों के जो नए आये हैं जिनके हाथ में से vibrations (व्हायब्रेशन्स) आ रहे हैं नए लोगों के जिनके हाथ में से कुछ चीज़ बहाना शुरू हो गयी हो वो हाथ ऊपर करें |

(27:17)

परम पूज्य माताजींने दिनांक २२ january 1975 रोजी sritom येथे केलेले भाषण.

आता काल भारती विद्याभवन मध्ये परमेश्वराच्या तीन शक्तींबद्दल सांगितलं होतं आपल्याला. पुष्कळ लोक असं म्हणाले कि आमच्या डोक्यावरून गेलं. तेव्हा हृदयातून जाणारं काहीतरी सांगायलाच पाहिजे. डोक्यातून आतमध्ये खरंच काही घुसत नाही. जे लोक फार मोठे मोठे शास्त्रज्ञ, शिकलेले, सुशिक्षित आणखीन आचार्य वगैरे वगैरे आहेत त्यांच्यामध्ये सहजयोग घुसत नाही. असे मी पुष्कळ विद्वान पाहिलेत. आणि एक साधारण मनुष्य अशिक्षित, ज्याला धड कपडा नाही, खायला नाही अशा माणसामध्ये सहजच सहजयोग घुसतो. शिक्षणाने परमेश्वर जाणता येत नाही. असं म्हटल्याबरोबर सगळे शिक्षणाचे अधिकारी मला मारायला उठतील. शिक्षणाने संसारातल्या सर्व लौकिक गोष्टी जाणता येत नाहीत. पण परमेश्वराच्या कार्याला जाणण्यासाठी दुसरे मार्ग पाहिजे, दुसरे गुण पाहिजेत. पैकी मुख्य गुण म्हणजे भोळेपण. ज्याला इंग्लिश भाषेमध्ये इंनोसन्स (innocence) म्हणतात. लहान मुलांमध्ये असतो बघा भोळेपण. काही काही मोठी माणसं पण फार भोळी असतात हॊ. ठगवली जातात. अशा लोकांना लोक त्रास हि जास्त देतात. छळतातही फार. म्हणूनच सगळ्या संत लोकांना फार छळलंय ह्या जगानी आणि आज हि छळताहेत. त्याचाच रडू येत कधीकधी. आपण जी मंडळी पार झालेली आहात ती सुद्धा संत मंडळी आहात. संतच नव्हे पण देवता स्वरूप. आज देवतांच्या ठिकाणीच तुम्ही आलात. हीच देवता हेच ते देव. ज्यांचं वर्णन आपण पुराणात वगैरे वाचलेलं असेल. हे देव जागविले गेलेत आपल्यामध्ये. हे देव पण आलेलं आहे आपल्यामध्ये. तेव्हा अशा देवपणामध्ये भुतं हि पिंगा घालणारच आणि तुम्हाला त्रास देणार. देऊ देतं. कुठवर त्रास देणार. जिथेपर्यंत त्यांची मर्यादा आहे. त्यांची मर्यादा फक्त तीन आयामात (teen dimension) तीन डायमेन्शनमध्ये चालते. म्हणजे जे काही लौकिक आहे तिकडे. फार तर तुमच्या शरीराला प्राप्त करतील. करू देतं. शरीर हे नश्वरच आहे. तुमच्या मनाला दुखापत होईल होऊ देतं. पण तुम्हाला एक बालेकिल्ला दिलॆला आहे मी. दाखवलेला आहे मी. जो तुमच्याच आत मध्ये आहे. तो म्हणजे निर्विचार स्थिती. आपल्या सगळ्यात आहे. तुम्ही जर त्या किल्यात बसलात तर कुणाची हिम्मत नाही तिथे पाय ठेवण्याची हे लक्षात ठेवा. पण त्या किल्ल्यात बसण्याची सवय लावली पाहिजे. श्री कृष्णाला रणछोडदास म्हणतात. रणछोडदास म्हणजे दुसरं तिसरं काही नसून त्या सगळ्या दुष्टांचा मारा चुकवून आपल्या बालेकिल्ल्यात शिरला तो म्हणून त्याला रणछोडदास म्हणायचं. आणि हे सगळे बसले बाहेर बोंबलत.
पुष्कळ काळी विद्या सुरु झालेली आहे हॆ आपल्याला माहितीये. घाणेरडे लोक घाणेरडे प्रकार करत आहेत हे आपल्याला माहिती आहे. ते तुम्हाला त्रास देतात हेही मलाही माहितीये. छळतात. करून करून करणार काय. आम्ही बालेकिल्यात आल्यावर बघून घेऊ म्हणावं. पण तुम्ही आपला बालेकिल्ला विसरला नाहीत. हे संरक्षणाचा स्थान कधीही मानवाला लाभलेलं नव्हतं ते आज महामुश्किलीने तुम्हाला मिळालेलं आहे. त्याच द्वार उघडलेलं आहे त्याच्यात बसा.

बघते बरं कोण तुम्हाला छळतंय आणि कुठून तुम्हाला हे आजार होणार आणि रोग होणार. त्या बालेकिल्यात तुम्ही बसलं पाहिजे. घरची सगळी मंडळी जरी विरोधात असली तरी त्यांच्या डोक्यावर टिच्चुन बसलं पाहिजे. काय करता तुम्ही आमचं ते बघू यात. सारा समाज तुमच्या विरोधात उभा असला तरी त्या बालेकिल्यात उभ झालचं पाहिजे. आणि शेवटी सबंध जर विश्व जरी तुमच्या मागे लागलं तरी तुम्ही त्या बालेकिल्यात बसल्यावरती कोण येणार आहे आत. आणि ज्या दिवशी तो आतमध्ये आला त्यादिवशी तोही पार झाला. हि अशी कमाल आहे. हा चमत्कार हातात आहे आपल्या. ओढा सगळ्यांना आपल्या बालेकिल्ल्यात. सगळ्यांनाच बघुयात. मग कोणाशी हात करणार कारण इथे सगळे एक आहेत हे कळलं या महामूर्खाना मग. हे जेवढे महामूर्ख फिरत आहेत ते स्वतःचेच नर्क बनवत आहेत. आणि ह्या वेळेला जर दडपले गेले तर नरकात तर उठू नाही देणार त्यांना. तेव्हा सावध राहा. असं घाबरण्यासारखं काहीच नाहीये. जर तुमची पूर्ण तयारी असेल तर या बालेकिल्ल्याचा मोठा किल्ला तयार करूयात. या कलियुगात कोणाची हिम्मत नाही कि समोर येऊन माझ्याशी मुकाबला करतील. पाठीमागून लहान लहान पोरांना धरून मारणारे हे हत्यारे लोक आहेत. त्या तिकडे लक्ष देऊ नका. काहीही तुमचं वाकड होणार नाही आणि कधीही होणार नाही. पण आपलं छत्र मात्र डोक्यावरती ठेवा. त्यांच्या कह्यात येऊ नका तुम्ही.

त्या दादरला तुमच्या अशी दोन चार मंडळी बसलेली आणि त्यांनी हॆ काळॆ विद्येचं सुरु केलेला आहे. कितीतरी लोकांच्या घराची धूळ धान करून ठेवलेली आहे. मला माहितीये , मी मागे सुद्धा सांगत होते आपल्याला माहित आहे. त्यातले दोन गेले सोडून गेले दादर. अजून आहेत. त्यांना कुणाचं कल्याण करायचं नाही. स्वतःच पोट भरायचं. पैसे कामवायचेत. कमवा म्हणावं सगळेच कमावताहेत पैसे. पण नाव देवाचं घेतलेले आहे त्यांनी. देवाच्या नावावरती पैसे कमावतात आहेत त्याला हरकत आहे. पण देवाच्या नावावरती जर तुम्ही भुतं विकू लागलात तर मात्र तुम्हाला क्षमा करणं कठीण आहे. परमेश्वर कधीही अशा लोकांना क्षमा करणार नाही. पूर्वीची भुतं कशी directly (डायरेक्टली) भुतं होती. पण आता देवाच्या नावावरती भुतं विकणारी हि मंडळी. गंडे दोरे हातात बांधायचे आणि तुमच्या घरात भुतं पाठवायची. सर्रास हे धंधे चाललेत. आमच्या लंडनला तर इतकं आहे कि मला आश्चर्य वाटलं कि हे लंडन आहे कि भुतनगरी आहे. तिथे पाय ठेवल्याबरोबर मात्र नुसता भुतांचा सुळसुळाट. सगळी भुताटकी उभी करून ठेवलेली आहे. ज्या ख्रिस्तानी सांगितलेली होतं कि कोणत्याही भुतांच्या मार्गावर जाऊ नका. भुतांची कार्य करू नका. ते सगळे ख्रिश्चन लोक स्मशानात जाऊन तिथून रक्त आणून राख आणून आणि धंधे करतात. प्लँचेट (planchet ) काय करताहेत. म्हणजे ज्या गोष्टीला मना केल तेच करताहेत. हे ख्रिस्तांनी सांगितलं तसं एक नानक साहेबांनी सांगितलं. स्पष्टपणॆ कोणीही बोललं नव्हतं या भुताटकीबद्दल. आणि जॆ हे सगळे ख्रिश्चन लोक जे आपल्याकडे ब्रिटिश म्हणून फिरत होते पूर्वी मोठे आता त्यांच्या मानगुटीवर बसलेत सगळॆ तॆ. गल्लोगल्ली भुतांचेच कारखाने उघडून ठेवलेले आहेत. त्यांच्या अक्कलेला काय म्हणावं मला समजत नाही. आणि मी भुताटकीच्या विरुद्ध बोलते तर लोकांना ते पटत नाही. फरक एवढाच आहे कि आपण लोक त्याला देवाचं नाव देतो, ते त्याला भूताचच नाव देतात. त्याला ते सैतान त्रास म्हणतात विच त्रास म्हणतात . आपल्यासारखा खोटेपणा नाही त्यांच्यामध्ये.

पण इथून एक्स्पोर्ट केलंय तुम्ही. पुष्कळ एक्स्पोर्ट झालंय. इथून गेलेत तिकडे मोठे मोठे भुतांचे राजे तिकडे भुतं घेऊन आणि काय पैसे कमावलेत. एकेका माणसाजवळ 35-35 रॉल्स रॉईस आहेत. एका रॉल्स रॉईसला 8 लाख किंमत पडते सॉरी 10 लाख रुपये किंमत पडते . हे तिथे इंगलंडला सुरु झालेलंय. आता हिंदुस्तानात काही कमी नाहीये तुमच्यात. तुम्हाला धर्म हवा कि अधर्म हवा हे तुमचं पहिल्यांदा ठरवलं पाहिजे. जर धर्म हवा असला तर खऱ्या गोष्टीवर उभे राहा. ज्याला खोट्या गोष्टी हव्या असतात त्या माझ्याजवळ नाहीत. माझ्याजवळ चमत्कार नाहीत, कि तुम्ही म्हणाला कि मला एक अंगठी द्या. माझ्याजवळ मेडिटेशन आहे. माझ्याजवळ तुमच्यामधली शक्ती घेण्याची तुमच्यामधली जी आतमध्ये परमेश्वराने एवढी संपत्ती दिलेली आहे ती उघडण्याची कला शिकवायची आहे मला. मी म्हणते एवढ्या अंगठया वाटताहेत हे लोक तर आपल्या हिंदुस्थानाचा सबंध प्रॉब्लेमच सॉल्व्ह (problem solve) करा म्हणावं. यांना Prime minister (प्राइम मिनिस्टर) करा तुम्ही. सगळ्यांना अंगठ्या वाटतील. श्रीमंत लोकांना कशाला अंगठ्या वाटता. तिकडे वाटा ना आहेत पुष्कळ आमच्या इकडे गरीब लोक. गरिबांकडे लक्ष नाही या लोकांचं. श्रीमंतांच्या खिशाकडे आहे. आणि हे श्रीमंतसुद्धा मुर्खासारखे तिथेच जाणारं. असा हा प्रकार चाललेला आहे. आज हि दयनीय दशा या देशाला आली त्याला कारण हि भुतं आहेत हे तुम्हाला माहित नाही. तेव्हा अशा लोकांना थोड्याश्या फायद्यासाठी मुळीच मदत करू नये. आणि ह्यांच्या दारात उभा राहू नये. कोणी भुताटकीच्या गोष्टी केल्यात त्या दारात उभं राहू नये. किती म्हटलं तरी धर्मातचं सगळं. धर्माचाचं सबंध आहे लक्ष्मीपासून इथून तिथंपर्यंत जेवढं काही संसारातल आहे ते सुद्धा धर्मातच आहे. आणि त्याच्या पलीकडचं सुद्धा धर्मातच. सगळं धर्माचेच बनवलेलं आहे. धर्माच्या पलीकडे काहीही नाही. आणि त्याच्या पलीकडे जे आहे ते तुम्हाला सांगण्यासारखं सुद्धा नाही. सात नरकाच्या पिढ्या आहेत. ते भोगायचे असलं आणि या मनुष्य योनीतुन त्या किड्यांच्या योनीत जायचं असलं तर या मार्गावर तुम्ही चला. तोंड उघडून या गोष्टीबद्दल बोलायला पाहिजे. हे सगळे जादूचे खेळ बंद करा. त्याबद्दल भ्यायची काही गरज नाही. आतली जादू झाली पाहिजे. आतमध्ये प्रकाश आला पाहिजे आणि त्याच्या ज्या आनंदात सगळीकडे ही बहरलेली फुलं आहेत त्याचा सुगंध पसरला पाहिजे. म्हणजे हे चिख्खल जे आहे ते बदलून त्या ठिकाणी कमळाचं सरोवर निर्माण होईल.

ही वेळ आलेली आहे. संबंध सृष्टी त्या वेळेला तयार आहे. पंच महाभूत तुमच्या मदतीला उभी आहेत तिकडे सगळे मोठे मोठे अवतारपुरुष या कार्यासाठी आशीर्वाद देतं आहेत. आणि सगळ्यांची ही पूर्ण तयारी आहे कि तुम्हाला काहीही काहीही लागल तरी आम्ही तयार आहोत. पण फक्त हे मानवाच्या हातात आहे कि आता हा निश्चय झाला पाहिजे कि आम्ही धर्मात आहोत कि अधर्मात. आम्ही धर्माला उभ राहणार आहोत कि अधर्माला उभे राहणार आहोत. धर्म तुम्ही पैशाने विकत नाही घेऊ शकत . परमेश्वराला तुम्ही बाजारात काढलेलं आहे. हे धिंधवडे तुम्ही धर्माचे केलेले आहेत. साध्या भोळ्या लोकांना फसवून धर्माची हि विटंबना केलेली आहे त्याची पापसुद्धा भोगालीच पाहिजॆत. पण सगळ्यात मोठं पाप म्हणजे संतांना त्रास देणे आहे. जे परमेश्वराच्या शोधात आहेत त्या लोकांना मार्गापासून दूर करणं याच्यापेक्षा मोठं पाप संसारात काही नाहीये. आणि त्याची शिक्षा इतकी भयंकर आहे कि सांगण्यासारखी नाही. तेव्हा अशा कार्यात कोणीही पडू नये. धर्म जितका सुंदर आहे जितका मार्गदर्शक आहे , धर्म जितका प्रेम देणारा आहे, जितका मायाळू आहे जितका सगळ्यांना आपापसात घेणारा आहे तितकाच धर्म ज्वाजल्य आहे तो जाळून टाकील पोळून टाकील संहार करून टाकील सर्वांचा. त्या धर्माची शक्ती आहे तशी अग्नीची असते हे लक्षात ठेवा.

ह्या वेळेला बोकाळले दिसतंय आणखीन जास्त या दादरला मला. कसले कसले रोग, कसले कसले त्रास आज आम्ही आपल्या आई बहिणी मुलं सगळ्यांना देत आहोत. आम्हीच देत आहोत. दुसरं कोणी देत नाही. कुत्री मांजरी देत नाहीत आपल्याला त्रास. आम्ही माणसंच माणसाला देऊन राहिलोत. माणूसच माणसाचा गळा कापतोय कोणी दुसरं येऊन कापत नाही तुमचे गळे. कारण माणसातच राक्षस घुसलेत. आणि माणसातच भक्त आहेत. भक्तांचे गळे कापणं हेच राक्षसांचं कार्य आहे. जर ते केल नाही तर ते राक्षस कशाला. पण त्याही पेक्षा बिकट अवस्था अशी आहे कि प्रत्येक संतांमध्ये राक्षस घुसलेला आहे आता मी तरी काय करू. ज्याला आपला मुलगा करते त्याच्यात राक्षस घुसला आता करू तरी काय मी. त्याला धड मारता हि येत नाही आणि जवळ हि घेता येत नाही. काय या आईची दुर्दशा. आपल्या मुलांना भेटायला आले तर एक एक राक्षस डोक्यावर घेऊन बसलेले आहेत. आता मी काय करू. अरे ते राक्षस फेका डोक्यावरचे. कशाला उचलून धरलय डोक्यावर. काय दिलंय तुम्हाला या राक्षसांनी. हे आज खायला नाही प्यायला नाही. हि धरा हरली तुमच्यापुढे. तो सूर्य हरला तिकडे तुमच्यापुढे. त्या समुद्राने सुद्धा आपलं अंग टाकलेलं आहे कि संपलं बुआ या मानवाच्या मूर्खपणाने.

संत माणसांना त्रास देणाऱ्या माणसाने हे लक्षात ठेवावं कि दोन चार पैशासाठी जर आम्ही एका संताला जर त्रास दिला तर ह्याच जाब आज नाही जन्म-जन्मांतरापर्यंत आम्हाला द्यावा लागणार आहे. मला हे माहिती आहे कि आज ज्या समाजात अशी दोन चार मंडळी येऊन बसलेली आहेत पैसे खाऊ .त्रास देण्यासाठी इथे येऊन बसलेली आहेत. लक्षात ठेवाव. त्या राक्षसांची मीच आई आहे आणि तुमची मीच आई आहे. पण तुमच्या बचावासाठी त्यांना पुष्कळदा मारलेल आहे आणि आणखीन मारणार आहे. काळजी करू नका.

स्वतःचाच जीव आहे पण मारणार आहे त्यांना मी. बघू देतं थोडीशी माणसं होतील त्यांच्यातील मग बघू देतं. पण तुम्ही त्यांच्या खेळण्यात आणि खेळाव्यात येऊ नका. खोट्या गोष्टींनी असली पोटं भरत नाहीत. साऱ्या देशाचा नाश तर झालाच आहे पण पुढल्या येणाऱ्या पिढीचा नाश करू नका. मोठं मोठाले जीव आता जन्माला येत आहेत. त्यांच्यासाठी नरक तुम्ही करू नका. त्यांच्या स्वागतास काही तरी विशेष रचना करा काहीतरी सौंदर्यपूर्ण करा त्यांच्यासाठी. काय केलंय तुम्ही आपल्या मुलांसाठी इथे. आम्ही उभे आहोत काय पाहिजे ते मागा ते देऊ पण सुबुद्धी कुठून देणार आम्ही. आम्ही सुबुद्धी कुठून आणू उसनी तुमच्यासाठी. सुबुद्धी तुमचीच तुम्हालाच पाहिजे. तेवढी मात्र तुम्ही आणा बाकी मेहनत आम्ही करायला तयार आहोत. तुमच्यात आहे ते. ते बीज तुमच्यातच आहे. अगदी खरी गोष्ट आहे तुमच्यातच ते बीज आहे.
वाल्याचा वाल्मिकी झाला तो ज्यामुळे झाला ते तुमच्यात आहे. त्याला काही वाल्मिकी व्हायचं नव्हता. तेवढी सुबुद्धी हि नव्हती पण ज्यावेळेला डोक्यात आलं कि दोन चार पैशांसाठी मी माझी आत्मा मारतो आहे त्याच दिवशी त्याने हे ठरवलं. त्याच दिवशी त्यानी हा निश्चय केला कि झाला पुष्कळ केल हे .कोणासाठी करतोय मी माझ्यासाठी मी काय केलेल आहे. हा विचार एकदा घ्या. मी माझ्यासाठी काय केलेल आहे. तुमच्यासाठी मी तळमळतेय. माझा जीव तळमळतोय तुमच्यासाठी. क्षणोक्षणी.

तुमच्यामध्ये दिवा लावायचं. दिवा लावायचाय तुमच्यात असा दिवा जो साऱ्या संसारात पसरला आहे. या भारतातच तो दिवा लागणार आहे. आपल्याला आश्चर्य वाटेल आज घाबरू नका. दोन चार दिवसांची हि ढकल आहे. हे काढून घ्या दिवस. उद्या लहरींच्या माथ्यावर तुम्हीच जग जाऊन बसणार आहात. हे लक्षात ठेवा. ह्याला एकच कारण आहे सगळं खराब असलं आमच्या भारतात मानतो आम्ही, तरी एक कारण आहे आईचा अपमान अजून करायला आम्ही शिकलेलो नाही. आईच्या इज्जतीची आम्हाला इज्जत आहे. जोपर्यंत हे तुमच्यात राहील तोपर्यंत ह्या देशाचं स्थान कधीही बदलणार नाही. हि भोग भूमी आहे हि योग भूमी आहे. हे तुम्ही ठरवायला नको तर हे परमेश्वरानेच ठरवलेलं आहे आधीच . आणि त्या देशात तुम्ही जन्मलेले लोक स्वतःला काय कमी समजता काय. का खायला नाही म्हणून. अरे तुम्हीच लोक असे राहू शकता. त्या लंडनचे लोक थोडी राहू शकतात असे. त्यांना तर एवढीशी जराशी कॉलर कमी जास्त झाली तर रडायला बसतात. हे तुम्ही जे लोक खरोखर संन्यासी लोक आहेत. कि कुठं झोपताल आणि कुठं खताल आणि कुठंही राहताल तरी मजेत आहात. आईचा आशीर्वाद आहे तुमच्या. आपल्या आईची बेइज्जती करायची असेल तर करा आणि मग भोगा त्याची फळ. आईशी रुसता येत रागावता येत बरोबर आहे. पण मानवास जर कोणतं उच्च नातं असेल तर ते आईच आहे तिच्यातच तुम्हाला देवाचं दर्शन होतं. आणि ह्या देशाची आई आहे ती एवढा सहन करून घेते तिकडे काही नाही. मुलांना दहा वर्षांची झाले कि काढून टाकतात घरातून. आणि मुलांनी घरात जर कामं नाही केली तर पैसे घेते ती जेवणाचे. ती आई तिकडे राहते. मुलगा मेला तरी चालेल पण त्याच्यावरती दोन पैसे खर्च करायला नकोत कारण लिपस्टिकला पैसे पाहिजेत त्या 90 वर्षाच्या म्हातारीला.

आणि तुम्ही आपल्या आईच्या काय इज्जती करून ठेवलेल्या आहेत ते बघा. तिथे दैत्य आई जन्माला येते आणि भारतासारखी आई कुठेच नाही जगात. तुम्ही जाऊन बघून या. पण तिचे हे हाल करून ठेवलेले आहेत. हलणार तुमचा पण धर्म मग. धर्म हलवला नाही पाहिजे. आपल्या आईची बेइज्जती करायचा जो काही मनसुबा आहे तो सोडून टाका आता. ते पैसे बिसे परत करा. सगळं माहिती आहे आम्हाला. आम्ही तर तुम्हा लोकांना ओळखत नाही काय. बरं , काही असलं तरी ह्या जन्मात आत्ता पार व्हायचं . आधी लाडू खाऊया मग बघू. त्याच्यापेक्षा आईला काय आनंद वाटणार आहे. सगळा स्वयंपाक सुंदरपणे करून ठेवला आणि मुलावर रागवायचं म्हणजे काय हे. पण करावं लागत. तेव्हा आता जेवायला बसा, आरामात. आरामात जेवायला बसा. आणि अमृत घ्या. अमृत मिळवून घ्या. प्रेमाचं अमृत तुमच्यातून वाहू दे सगळ्या जगामध्ये. आणि साऱ्या जगाची दिशा बदलायला बसलोय आपण. काय लहान लहान गोष्टी घेऊन बसलाहेत. जगाच्या इतिहासात या गोष्टी जाणार आहेत. लक्षात ठेवा ज्या ज्या लोकांना मूर्खपणा केलेला आहे. एकेकाची नाव जगाच्या समोर जाणार आहेत आणि लोक थुंकणार आहेत त्याच्यावरती. त्यांच्या मुलांवर थुंकतील. त्यांच्या मुलांच्या मुलांवर थुंकतील के हां हेच ते घाणेरडे लोक ज्यांनी हे हे कार्य घाणेरडे केलेलं आहे. आपलं कार्य उज्ज्वल करा. आपला चेहरा उजळ करा. मुलांना हेच द्यायचं आहे.
ध्यानात जा डोळे मिटा.

(54:37)

असल में जो आज भाषण दिया था उसको मराठी सिवाय मजा नहीं आता | वीरपूर्ण भाषा जो है न, वो हिंदी जमती नहीं अपने को| ये मराठी में जमता है| मुझे माफ़ कर दीजिये हिंदी में बातचीत करी| हिंदी में बातचीत करी इसलिए माफ़ कर दीजिये| ये जरा किसीके लिए कहा था वो आपके लिए था भी नहीं|

डोळे मिटा. नाव वगैरे घेऊ नये सध्या . या वेळेला नाव घेऊ नका. भटकलेले पुष्कळ लोक असतात. गुरु बिरू बरेच केलेले आहेत. काय आहेत गुरु ? कोण गुरु आहेत ? कोण गुरु नाहीयेत? कोण गुरु आहेत ,कोण गुरं आहेत हे कसं ओळखायचं? त्याला काहीतरी जाणीव असते आतमध्ये ते कसं समजायचं ? ते vibrations (व्हायब्रेशन्स) नी कळतं. हातामध्ये येणाऱ्या ह्या चैतन्य लहरींनी कळतं कि कोण गुरु आहे नि कोण गुरु नाही. तेव्हा ते आधी शिकून घ्या आणि मग गुरु करा. आधीच काय करताय वेड्यासारखे. डोळे तर घ्या. आधी गुरु बिरू सगळे तिकडे ठेवा. नमस्कार करून सगळ्यांना ठेवा बाजूला. आता सध्या तुम्हीच तुमचे गुरु आणि आम्ही तुमची आई.