Dhyan Aur Prathna, Second Talk

मुंबई (भारत)

1975-02-09 Prayer to the Almighty, 3' Download subtitles: EN,PL,THView subtitles:
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Dhyan Aur Prathna, Second Talk

सहजयोग में सबसे आवश्यक बात ये है, कि इसमें अग्रसर होने के लिये, बढ़ने के लिये आपको ध्यान करना पड़ेगा| ध्यान बहुत ज़रूरी है|  आप और चाहे कुछ भी न करें लेकिन अगर आप ध्यान में स्थित रहें, तो सहजयोग में प्रगति हो सकती है|

जैसे कि मैंने आपसे कहा था कि एक ये नया रास्ता है| नया आयाम है, dimension है; नई चीज़ है जिसमें आप कूद पड़े है| आपके अचेतन मन में, उस महान सागर में आप उतर गये हैं, बात तो सही है| लेकिन इसकी गहराई में अगर उतरना है, तो आप को ध्यान करना पड़ेगा|

मैं बहुत से लोगों से ऐसा भी सुनती हूँ कि “माता जी, ध्यान के लिए हमको time (समय) नहीं मिलता है|” आज का जो आधुनिक मानव है, modern man है, उसके पास घड़ी रहती है, हर समय time बचाने के लिये, लेकिन वो ये नहीं जनता है कि वो time किस चीज के लिए बचा रहा है? उसने घड़ी बनाई है वो सहजयोग के लिये बनाई है, ये वो जानता नहीं है|

एक साहब मुझ से कहने लगे कि “मुझे लंदन जाना बहुत ज़रूरी है और इसी plane (हवाई जहाज) से जाना ही है और किसी तरह मेरा टिकट बुक होना ही चाहिये और कुछ कर दिजिये आप, और Air-India वालों से कह दिजिये और कुछ कर दिजिये…|” मैंने कहा ऐसी कौन-सी आफत है? आप लंदन क्यों जाना चाहते हैं? ऐसी कौन सी आफत है? क्या विशेष कार्य आप वहां करने वाले हैं? कौन सी चीज है? कहने लगे ‘I must go there, I have to save time’ (मुझे जरूर जाना है, मुझे समय बचना है) “time is very important” (समय बहुत मूल्यवान है), मैंने कहा आखिर बात क्या है? ये time बचा कर भागे-भागे आप वहां क्यों जा रहे हैं? तो कहने लगे “वहां एक special dinner है (विशेष भोज) वो मुझे attend करना है और उसके बाद वहां पर Ball(Dance) है”| Time आप बचा किसलिये रहे हैं?

हर समय, आप ये सोच लीजिये कि जो हाथ में घड़ी बँधी है, ये सहजयोग के लिए और ‘ध्यान’ के लिये है| और सहजयोग के ही कार्य के लिये बाँधी हुई है, मैंने उसी लिये बाँधी है, नही तो मैं कभी भी नहीं बाँधती|

जिस आदमी का पूरा ही समय सहजयोग में बीतता है, उसको जरूरी नही कि आप घर का काम न करें| ये जरूरी नही कि आप दफ्तर का काम न करें; सारा ही कार्य आप करें पर ‘ध्यान में करे’, ध्यानावस्थित होकर के कार्य हो सकता है क्योंकि आप को ध्यान में उतार दिया है| हरेक काम करते वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं और निर्विचार होते ही उस काम की सुंदरता, उसका ‘सम्पूर्ण’ ज्ञान और उसका सारा आनन्द आप को मिलने लग जाता है|

समझने की बात है, ये लोग समझते नहीं हैं| इसलिये ध्यान के लिये अलग से time नहीं मिलता है, झगड़ा शुरू हो जाता है| लेकिन जब इसका मज़ा आने लगता है, तब आपको आश्चर्य होगा कि नींद बहुत कम हो जाती है और आप ध्यान में चले जाते हैं| निद्रा में भी आप सोचेंगे कि आप ध्यान में जा रहे हैं| कोई भी चीज छोड़ने की या कम करने की नहीं| लेकिन हमारी जो महत्वपूर्ण चीजें हैं-जिसे हम महत्वपूर्ण समझते हैं, वो बिल्कुल ही महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं| और जिसको हम बिल्कुल ही विशेष समझते नहीं हैं, वो हमारे लिये ‘बहुत कुछ’ हो जाता है| 

ध्यान करने के लिये एक छोटी सी चीज आपको याद रखनी चाहिये, कि जिस चीज पर ध्यान का आलाप छेड़ा जाएगा, जिस वीणा पर ये सुंदर गीत बजने वाला है, वो साफ होनी चाहिये| आप वो वीणा नही हैं, आप वो अलाप भी नही हैं, लेकिन आप उसको सुनने वाले है और उसको बजाने वाले है| आप उसके मलिक हैं| इसलिये अगर वो वीणा कुछ बेसुरी हो, उसके अगर तार जंग खा जाएं या उसके कुछ तार टूट जाएं, तो आपको जरूरी है कि उसको ठीक कर लेना चाहिये| अगर वो ठीक नही हैं, तो आपके जीवन में माधुर्य नहीं है| आप में वो सुंदरता नहीं आ सकती, आप में एक अजीब तरह का चिड़चिड़ापन, अजीब तरह की रुक्षता (dryness) और विचलितता दृष्टिगत होगी|

एक सहजयोगी को एकदम निश्चित मति से ध्यान में बैठना, देखना, बहुत बड़ी चीज हो जाती है मेरे लिये| और वही मैं देखती हूँ कि कुछ सहजयोगी गहराई से अंदर चले जा रहे है और कुछ सहजयोगी बहुत विचलित हैं| ये नही मैं कहती कि सभी लोग उतनी दशा में पहुँच सकते हैं या नही| लेकिन जो कुछ भी बन पड़े वो इस जीवन में करना ही चाहिये| उपार्जन का जितना भी समय है, वो इसी में बिताना चाहिये| और जो कुछ भी मिल सके, सभी इसी में मिलना चाहिये बाकी कुछ हो या नहीं|

अधिकतर लोगों को मैं ये देखती हूँ, इधर-उधर की पचासों बातें करेंगे, लेकिन ध्यान की बात, अपने मनशुद्धि की बात, अपने अंदर के आनंद को उभारने की बात कितने लोग, आप लोगों में से करते हैं? “इसने ये कहा, उसने वो कहा, ऐसा हो गया, ऐसा नहीं करना चाहिए था, वैसा नहीं करना चाहिये था” – ये क्या सहजयोगी को शोभनीय होगा? जब आपके पास निर्विचार की इतनी बड़ी संपत्ति है, तो क्या उसको पूरी तरह से उघाड़ देना चाहिये या नहीं| ये तो आप जानते हैं कि क्षण-क्षण आप उसे पा रहे हैं; और हर क्षण उसे आप खो भी रहे हैं| ये हरेक क्षण कितना महत्वपूर्ण है, इसे आप देखिये| कौन-सी छोड़ने की बात, कौन-सी पकड़ने की बात कोई भी ऐसी बात मैंने आप से आज तक तो की नहीं होगी| लेकिन ये आपका भ्रम है| आपका मन आपको भ्रम में डाले दे रहा है| तो तुम क्या घर-ग्रहस्थी छोड़ दोगी? मैंने घर-ग्रहस्थी छोड़ी है जो आपसे मैं घर-ग्रहस्थी छोड़ने को कहती हूँ? आप जानते हैं कि आपसे कहीं अधिक मैं मेहनत करती हूँ| लेकिन मैं थकती नहीं हूँ क्योंकि मेरे आनंद का स्त्रोत आप लोग हैं| जब आपको देख लेती हूँ, बस खुश हो जाती हूँ| तबीयत सारी बाग-बाग हो जाती है|

जिस चीज का महत्व है, उधर दृष्टि रखिये| आप को पूरी तरह से मैं ये नहीं कहती की चौबीसों घण्टे इसमें आप यहीं बैठे रहिये| जहाँ भी बैठे है, वहां बैठे रहिये-ये मतलब है मेरा| जहाँ भी जमे हैं वहाँ जमे रहिये, अपने स्थान पर, अपने सिंहासन पर|

कुछ लोग इसलिये प्रगति करते हैं और कुछ लोग नही करते| शारीरिक बीमारियां आप लोगों की, बहुतों की ठीक हो गई हैं| बहुतों के पास बीमारियां नहीं हैं| लेकिन अभी भी मानसिक प्रश्न है|

सब बातें भूल जाइए| हर इंसान इसका पाने का अधिकारी है| आपका जन्मसिद्ध हक है, क्योंकि ये ‘सहज’ है, आप ही के साथ पैदा हुआ है| लेकिन ध्यान करना ही होगा और वो भी समष्टि में लेकिन उसको organise करने की आप लोग इतनी चिंता न करें| उसकी व्यवस्था करने की आप इतनी चिंता नहीं करें| वो कार्य हो रहा है, वो हो भी जाएगा| क्या हर्ज है अगर दस आदमी ज्यादा आएं चाहे दस आदमी कम| हज़ार बेकार के लोग रखने से दस ही कायदे के आदमी हो सो ही सहजयोग के लिये ‘विशेष चीज’ है|

आप उनमें से बनिये जो दस ‘अच्छे’ आदमी हैं| जो ऐसे लोग हैं, जो सहजयोग का कार्य अत्यंत प्रेम से करते हैं और उसमें मजा उठा रहे हैं, उसमें बह रहे हैं, उसमें अग्रसर हैं, और एक अग्रिम श्रेणी में जाकर के खड़े हो जाते हैं| जैसे कि हिमालय संसार में सबसे ऊँचा है| उसकी ओर सबकी दृष्टि रहती है| ऐसे ही आप बनें| आप ही में आप हिमालय बन सकते हैं और आप देख सकते हैं की दुनिया आप की ओर आँख उठा कर कहे कि बनूँ तो मैं इस आदमी जैसा बनूँ जो सहजयोग में इतना ऊँचा उठ गया| ये अंदर का उठना होता है, बाहर का नहीं| और मैं सबके बारे में जानती हूँ कौन कहाँ तक पहुँच रहा हैं|

आप ही अपनी रुकावट हैं| और कोई आप की रुकावट नहीं कर सकता| कोई भी दुनिया का आदमी आप पर मन्त्र-तन्त्र आदि ‘कोई’ चीज़ नहीं डाल सकता| आप ही अपने साथ अगर खराबी न करें और पहचाने रहें की कौन आदमी कैसी बातें करता है, आप खुद ही समझ लेंगे कि इस आदमी में कोई न कोई दुष्टता आ गयी है, तभी वो ऐसी बातें कर रहा है, नहीं तो ऐसी बात ही न करता वो| जैसे गलत बात वो कर रहा है, इसमें कोई न कोई खराबी है| उसमें साथ देने की कोई जरूरत नहीं| फिर चाहे वो आपका पति ही हो, चाहे आपकी वो पत्नी हो| उससे लड़ाई-झगड़ा करने की, उलझने की ‘कोई’ जरूरत नहीं| वो अपने आप ही ठीक हो जाएगा|

इतना ही नहीं आप ये भी जानते हैं कि आपमें कोई खराबी आ जाए तो आप किस तरह से उसे हाथ चला कर भी ठीक कर सकते हैं, क्योंकि आपके हाथ के अंदर ही वो चीजें बह रही हैं| असल में आपकी उँगलियों में ही ये सब जो भी देवता मैंने बताए हैं ये जाग्रत हैं, इन पाँचों उँगलियों में और इस हथेली में, सारे देवता यहां जाग्रत हैं| लेकिन बहुत जरूरी है कि इन जाग्रत देवताओं का कहीं भी अपमान ना हो| इनको बहुत ही संभाल के और जतन से रखना चाहिये| इनकी पूजा होनी चाहिये| अपने हाथ ऐसे होने चाहियें कि पूजनीय हों| लोग ये सोचें कि ये हाथ हैं या गंगा की धारा| गंगा ही की धारा बहे| जिस वजह से गंगा पावन हुई वही (वाइब्रेशन) चैतन्य, आपके अंदर से बह रहे हैं| जिस चैतन्य शक्ति से सारी सृष्टि चल रही है, वही आपके अंदर से बह रही है, ये आप जानते हैं|

फिर जिन हाथों से, जिन पांव से ये चीज बह रही है, उसको ‘अत्यन्त पवित्र’ रखना चाहिये| मेरा मतलब धोने-धवाने से नहीं है| इसमें जो भी आप काम करें, अत्यंत सुंदरता से, सुगमता से और ‘प्रेम’ से होना चाहिये| ‘सबसे बड़ी’ चीज ‘प्रेम’ है|

ध्यान में गति करना, यही आपका कार्य है, और कुछ भी आपका कार्य नहीं है, बाकी सब हो रहा है| और आप में से अगर कोई भी जब ये सोचने लगेगा कि मैं ये कार्य करता हूँ और वो कार्य करता हूँ, तब आप जानते हैं कि मैं अपनी माया छोड़ती हूँ और बहुतों ने उस पर काफी चोट खाई है| वो मैं करूंगी| पहले ही मैंने आप से बता दिया है, कि कभी भी नहीं सोचना है कि मैं ये काम करता हूँ या वो काम करता हूँ| “हो रहा है|” जैसे “ये जा रहा है और आ रहा है|” अब सब तरह से अकर्म में-जैसे कि सूर्य ये नही कहता कि मैं आपको प्रकाश देता हूँ| “वो दे रहा है|” क्योंकि वो एकतानता में परमात्मा से, इतनी प्रचंड शक्ति को अपने अंदर से बहा रहा है| ऐसे ही आपके अंदर से ‘अति’ सूक्ष्म शक्तियाँ बह रही हैं क्योंकि आप एक सूक्ष्म मशीन हैं| आप सूर्य जैसी मशीन नहीं है, आप एक “विशेष” मशीन हैं, जो बहुत ही सूक्ष्म है, जिसके अंदर से बहने वाली ये सुंदर धाराएं एक अजीब तरह की अनुभूति देंगी ही, लेकिन दूसरों के भी अंदर| उनके छोटे-छोटे यंत्र हैं, मशीनें है, उनको एकदम से प्रेमपूर्वक ठीक कर देंगे|

ये जो शक्ति है, ये प्रेम की शक्ति है| इस चीज़ का वर्णन कैसे करूं मैं आप से? इस मशीन को ठीक करना है, तो आप किसी भी चीज़ से रगड़-मगड़ कर के ठीक कर दें, कोई आप screw (पेच) लगा दें, तो ठीक हो जाएगा| लेकिन मनुष्य की मशीन जो है वो प्रेम से ठीक होती है| उसको बहुत ज़ख्मी पाया है| बहुत ज़ख्म हैं उसके अंदर में| बहुत दुखी है मानव| उसके ज़ख़्मों को प्रेम की दवा से आपको ठीक करना है| जो आपके अंदर से बह रहा है, ये वाईब्रेशन सिर्फ़ “प्रेम” है| जिस दिन आपकी प्रेम की धारा टूट जाती है, वाईब्रेशन रुक जाते हैं|

बहुत से लोग मुझसे कहते हैं “माता जी हमको बाधा हो गई| हमारे हाथ से वाइब्रेशन बंद हो गए|” आपके अंदर से प्रेम की धारा टूट गई| प्रेम का पल्ला पकड़ा रहे, सिर्फ प्रेम का-वाईब्रेशन बहते रहेंगे| क्योंकि ये ही प्रेम परमात्मा का जो हैं, वही बहे जा रहा है| और वही बह रहा है|

इतनी अद्भुत अनुभूति है, इतना अद्भुत समां आया हुआ है| क्या ये सब व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि आपने इसमें पूरी लगन से मेरा साथ नहीं दिया?

हरेक बात आप खुद भी जान सकते हैं, और न जानने पर मैं भी आपसे हरेक बात बताने के लिए हमेशा तैयार रहती हूँ| लेकिन थोड़ा-सा इसमें एक आप से सुझाव देने का हैं, कि आप इसके अधिकारी तो हैं या नहीं, इसे सोच लीजिये| क्योंकि आप मेरे ध्यान में आते हैं-जैसे मराठी में बहुत से लोग कहते हैं,-“जमून आले” इससे आप अधिकारी ‘नही’ होते| आप अधिकारी इसलिए होते हैं, कि आपके अंदर वो गहराई आ गई|

जैसे एक गागर है| जितनी गहरी होगी, उतना पानी उसमें समा जाएगा| अब अगर वो नहीं है तो उसमें पानी डालने से क्या फायदा, वो तो सब पानी निकल जाएगा| अपनी गहराई आप ध्यान से बढ़ाते हैं| ध्यान पर स्थित होइये| ध्यान में जाइये| ध्यान में जो विचार आ रहे हैं उनकी ओर देखते ही आप निर्विचार हो जाएंगे| निर्विचार होते ही उस अचेतन मन में-‘अचेतन’, सुप्त चेतन नहीं कहेंगे-अचेतन मन में अपनी चेतना के सहित आप जाएंगे| आपकी चेतना, आपकी conciousness खत्म नहीं होती| वहाँ आप चेतना को जानेंगे| ये पहली मर्तबा इंसान के शरीर के अंदर हुआ है, की आप अपना भी शरीर जानते है और दूसरो का भी जानते हैं| और दूसरों के बारे में आप सामूहिक चेतना से जानते हैं की इसके अंदर क्या हो रहा है|

इसका महत्व अभी बहुत कम लोग जानते हैं| क्योंकि सब लोग मुझसे कहते है कि, “माता जी, सबसे अगर आप रुपया लें, तो सब लोग समझेंगे क्योंकि लोग पैसो को बहुत मानते हैं|” पैसा एक भूत है| पैसा लेने से अगर आप इसका महत्व समझें तो बेहतर है कि आप न ही समझें| कोई भी पैसा देने से इसका महत्व आप नहीं समझ सकते| अपने को ही पूरी तरह से देना होगा| और वो देने में कितना मिलने वाला है| जो आप सात गुने खड़े हुए हैं वो तो एकदम साक्षात मिल जाएगा|

ध्यान में समष्टिरूप में ही आप को आना होगा, ये ज़रूरी है| चाहे महीने में एक बार ही आएँ, लेकिन जहाँ सात लोग बैठते हैं, वहीं बैठ कर ध्यान करना चाहिये| चाहे आप अपना एक छोटा ग्रुप बना लें जहाँ आप हफ्ते में एक बार मिल सकें और एक बार बड़े ग्रुप में मिलें| क्योंकि मैंने आपसे बताया था कि ये “विराट” का कार्य हैं|

जैसे शरीर का एक-एक अंग-प्रत्यंग जो है, उसको जागना है| जितना जागृत होता जाएगा, वैसे-वैसे दीप जलते जाएंगे| आप लोग जो घर में बहुत भी ध्यान करते रहें, मेरे आने के बाद आप जानते हैं, कि आप लोगो ने पाया कि कुछ प्रगति नहीं हुई| लेकिन यहाँ छ:-सात आदमी जो रोज आते थे और ध्यान करते थे, उन्होंने बहुत प्रगति कर ली|

ध्यान में अगर आप की आँखें फड़क रही हों, तो समझ लेना चाहिये कि आज्ञा चक्र पर कोई चोट हो रही हैं। उसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है। अपना आज्ञा चक्र अगर खराब है तो उसे ठीक कर लेना चाहिये। क्योंकि आपका आनन्द कम होता है।

आपका शरीर अगर हिल रहा हो ध्यान में, और आप आराम से बैठ नहीं सक रहे हों, तो समझ लेना चाहिये आपके मूलाधार पर ही चोट हो गई है ये और भी dangerous situation (खतरनाक परिस्थिति ) हो जाती है। मूलाधार पर जब चोट हो जाती है, उसका भी इलाज़ करा लेना चाहिये। वो भी लोग जानते हैं किस तरह से मूलाधार चक्र को ठीक करना चाहिये।

जानने को तो आप लोग मेरे लेक्चर सुन-सुन के सब शास्त्र जान लें. लेकिन मैं देखती हूँ कि जो लोग थोड़े ही दिन पहले आए हैं, वो आप लोगों से कभी-कभी बहुत जोरों में जल्दी आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि यें पढ़ाने-लिखाने की बात है ही नहीं।

आप के हाथ अगर थरथरा रहे हैं, कंपकंपा रहे हैं, तो भी समझ लेना चाहिये कि कुछ न कुछ आपके अन्दर बहुत बड़ी खराबी हो गई है। उसमें जूते मारने का इलाज सबसे अच्छा हैं। कल एक साहब आपने देखा होगा कि वहाँ कहने लगे कि “माता जी, मैं वहाँ एकदम जड़ हो गया।” फिर मेरे सामने आकर यूँ-यूँ करने लगे। उनसे मैंने पूछा कि तुम्हारे गुरु कौन हैं? तो कहने लगे कि “एक भागवत् सा. हैं पूना में।” तो मैंने कहा वो क्या करते हैं? तो कहने लगे कि “उन्होंने एक spiritual centre बनाया हुआ है उन्होंने मुझे दीक्षा दी।” मैने कहा दीक्षा क्या दी? ये हिलने की दीक्षा दी? कहने लगे कि “मैंने सोलह साल में बीमारियाँ उठाई, मेरी नौकरी चली गई, ये हो गया, वो हो गया। ” मैंने कहा तुम्हारे अक्ल नहीं आई? अगर तुम्हारे गुरु हैं, तो तुमको ये सब होना नहीं चाहिये।

कितने रुपये दिये? ” अभी तक 5-6 हज़ार रुपये दे चुका हूँ centre को।” मैंने कहा अच्छा 5-6 हजार रुपये देकर के सारी बीमारियाँ तुमने अच्छे से मोल ले लीं। फिर उसके भूत-वो जो भागवत् साहब थे उनको जूते मारे और वो जो उनका centre था, उसको भी जूते मारे तब उनका हाथ ठहरा और वो ठीक हो गए-ये तो आप ही के सामने सब हुआ था, बहुत से लोग वहाँ थे।

लोगों से साफ-साफ बात कर लेनी चाहिए कि आपके कोई न कोई गुरु हैं, आपके अन्दर कोई न कोई बाधा है। कोई न कोई गड़बड़ है, उसमें कोई बुरा मानने की बात नहीं। 

लेकिन मैं देखती हूँ कि एक को जरा सी भी बाधा पकड़ रही हो तो दूसरा बाधा वाला बराबर, उसके साथ में खड़ा हो जाएगा। लाइन से वहाँ खिंच जाते हैं एक साथ। और पता हो जाता है ये सारे बाधा बाले साथ बैठे हैं| असल में ऐसा बैठना नहीं चाहिये।

 सब को अलग-अलग बैठना चाहिये, अधिकतर; जैसे कि कोई ग्रुप बना लेते हैं। “बहुत” गलत बात हैं। जैसे कि ठाणे वाले आए तो ठाणे वाले साथ बैठ गए, फलाने आए-ऐसा नहीं। अलग-अलग बैठिये। बहुत जरूरी हैं। सब इकट्‌ठे होकर मत बैठिये।

 दूसरी बात ये है कि जैसे कोई बुड्ढे हैं, उम्र में ज्यादा हैं, बुजुर्ग हैं, कुछ बीच के हैं, कुछ छोटे हैं। छोटे बच्चों को तो ऐसी कोई विशेष बात नहीं है लेकिन जो बीच के और ये लोग हैं, ये सब अलग-अलग बैठें। जो वृद्ध हैं, वो जवान लोगों के साथ बैठें। जो जवान हैं वो बूढ़ों के साथ बैठें। चार पाँच जवान इकट्‌ठे हो जाएँ तो भी आफत हो जाएगी। और चार-पाँच बूढ़े इकट्‌ठे हो जाएँ तो भी आफत हो जाएगी। आप देख लीजिए; होता है! जवानी और बुढ़ापे की जो समझ है, दोनों बाँटने की चीज़ है। वो भी सामूहिक चेतना में आप बाँट सकते हैं। बड़ों को समझदारी चाहिए, wisdom चाहिये; जरूरी है। “बहुत” wise होना चाहिये। बड़प्पन चाहिये, बड़ा दिल चाहिये। और छोटों को मानना चाहिये, बड़ों को मानना चाहिये। और छोटों में activity (कार्यवाही) ज्यादा होनी चाहिये, बड़ों से। बड़े आदरणीय हों तो उनका आदर होगा। पर बड़ों को आदरणीय होना चाहिये और छोटों को बड़ों का आदर करना चाहिये।

अनादर तो वैसे भी एक सहजयोगी का दूसरे सहजयोगी से करना नहीं, क्योंकि आप लोग सब देवता स्वरूप हैं| ये सब आप ध्यान में समझ सकते हैं| आपसी बातों से, दूसरो के बारे में आंतरिकता से अगर आप सोचे तो आप फ़ौरन समझ लेंगे कि ” अरे भई उनका तो ये आज्ञा चक्र पकड़ा है, इसीलिये ऐसा हो रहा है|” “अरे भई उनका तो हृदय चक्र पकड़ा है, इसीलिये ऐसा हो रहा है। ” “इसीलिये स्वर ठीक से नहीं निकल रहे हैं” आपको “बुरा” नहीं लगेगा। दूसरों को भी बुरा नहीं लगेगा|

लेकिन बुरा लगना, यही “बहुत बड़ी” बाधा है। मेरी भी बात का लोग बुरा मानते हैं तब फिर औरों का क्या करेंगे। मेरी कोई भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिये। मैं आपके बिल्कुल हित के ही लिये सारा काम करती हूँ, ये आप जानते हैं। कोई भी बात की चर्चा होते वक्त ये देखना चाहिये कि हम सिर्फ यही चर्चा कर रहे हैं न कि ‘हमारी कुण्डलिनी कहाँ है, ‘हम कहाँ जा रहे हैं, कैसे उठ रहे हैं’। बाकी सब चर्चाएं व्यर्थ हैं। ‘हम धर्म में कहाँ तक जागृत हो गए हैं। हम कितना पा गए हैं, कितना आनन्द परमात्मा का लूट रहे हैं’, ये ही अनुभव आपस में बताना है। और इसी को आपस में जानना है। और बाकी सब व्यर्थ है बाकी सब चीजों में मौन ही बेहतर चीज है। जब इस तरह के सहजयोगी हो जायेंगे तो बड़ा अन्तर हो जाएगा। “बहुत बड़ा अन्तर”।

सहजयोग का प्रतिबिंब आपसे फैलने वाला है। और जिससे प्रतिबिंब पड़ता है वो एकदम ‘साफ’ चीज होनी चाहिये। और उसकी प्रतिबिंबित होने की शक्ति अगर पूरी तरह से जाग उठे तब कोई भी मुश्किल नहीं रह जाती। सहजयोग और किसी चीज़ से नहीं – किसी भी चीज़़ से नहीं – आप बड़े-बड़े organisations (संगठन) कर दीजिये, आप बड़े-बड़े मंत्र-जागरण कर दीजिये, और गाने हो जाएं और music (संगीत) हो जाए – इससे नहीं होने वाला। इन सब चीजों से कुछ भी नहीं होने वाला है।

मैंने तो इतने कभी पार लोग देखे नहीं जितने आज देख रही हूँ। ये अहो भाग्य है हमारा कि ऐसे मैं देख रही हूँ। किसी भी युग में इतने पार लोग, मेरी दृष्टि के सामने नहीं रहे। ये “परम्” भाग्य की बात है।

लेकिन जैसा कि मैं कहती हूँ कि modern time (आधुनिक युग) में पूरे साधु कोई नहीं हैं। आप ही लोग पहले बहुत बड़े साधु थे और संसार में रमे हुए नहीं थे, जंगलों में रहते थे। आज आप ने संसार ले लिया है और संसार में आप रमे हुए हैं । लेकिन अपनी साधुता में उतरते ही क्या मज़ा आ जाएगा! इस गंगा-जमुना में ही एक सरस्वती बहना शुरु हो जाएगी।

ध्यान में जाते वक्त किसी भी तरह की बाहर की आवाज आपको भूल जाती है। अगर कान में भी आप उंगली डालें और सहस्रार अगर आपका पूरी तरह से खुला हुआ है-तो इसकी पहचान है-पूरी तरह से आप ऑँख कान को बंद कर लें, आप सुन सकते हैं। इसीलिये जो वो लड़के आए थे, जो सुनते नहीं थे, उनको थोड़ा-थोड़ा सुनाई देने लग गया।

अगर आपका सहस्रार खुल जाए, तो limbic area में-डाक्टर लोग सब जानते हैं कि वहाँ पर subtle points होते हैं, subtle centres (सूक्ष्म केन्द्र) होते हैं, उनको excite करने से वही काम होता है, जो नाक, कान, मुँह और सब अपने शारीरिक जितने भी organs ( अंग ) हैं, उससे होता है। उसी सहस्रार को हम जागृत कर लेते हैं जो सारे शरीर को यहाँ संभाले हुए हैं और आपको सारे ही-जैसे सुगंध है-हरेक चीज़, नाक की कोई जरूरत नहीं है आपको। फिर आप श्वास भी यहाँ से ले सकते हैं। सारा का सारा ही शरीर अगर भ्रष्ट हो जाए तो भी आप यहाँ से सब काम कर सकते हैं लेकिन (भ्रष्ट) होता नहीं। शरीर तो आपका खिलते ही जा रहा है। शरीर तो सुन्दर होते ही जा रहा है। बीमारियाँ तो भाग ही गई हैं। वो तो सब चीज ठीक हो ही गई। कोई थोड़ा-बहुत हो भी जाते हैं, तो ठीक हो जाते हैं।

ध्यान में बढ़ने के लिए एक गुण बहुत जरूरी है। बहुत ही जरूरी है। उसको कहते हैं innocence-भोलापन, स्वच्छ, एक छोटे बच्चों जैसा innocent child, इसीलिये आपने देखा है कि छोटे बच्चे फट-से पार हो जाते हैं। चालाक लोग, cunning लोग, अपने को जो बहुत होशियार समझते हैं, बस उनकी परमात्मा की तो इच्छा नहीं होती, बस अपनी होशियारी दिखाते रहते हैं, वो नहीं पाते। “पूर्णतया” innocent होना चाहिये।

किसी को दुख देना भी, किसी को तकलीफ देना भी innocence के “विरोध” में है। इतनी भरी हुई खोपड़ियों के ऊपर बैठ करके क्या हम innocent हो सकते हैं? किसी के हृदय में चोट लगे, वो आदमी innocent नहीं हो सकता। innocent का मतलब ही ये होता है कि फूल की जैसे खिली हुई चीज़ जो सिर्फ दुनिया को सुगंध ही देती है। किसी को भी तकलीफ या दुख देना नहीं चाहिये। हाँ, कभी-कभी लोग उनकी मूर्खता की वजह से किसी चीज़ को दुख मान लेते हैं-वो ठीक है। पर अपनी तरफ से आप निश्चित हो करके कभी भी किसी को दुख या तकलीफ नहीं देना चाहिए|

आपके पास तो innocence का switch है नहीं।  मैंने देखा था कि देखें आप लोगों ने ऐसा, कोई switch बनाया है। अगर हो तो वैसे innocence का switch दबा लीजिये तो आप देखेंगे कि आपका आज्ञा चक्र एकदम “साफ” हो जाएगा। पर innocence का switch आप लोगों के पास है नहीं; दया का switch है नहीं, शांति का switch है नहीं। ये सब switches आपके अन्दर अभी तक लगे नहीं हैं। पहले आप सब अपने देवता जगा दीजिये, अन्दर में जो बैठे हुए हैं, फिर उसके बाद एक-एक सारे सब के switch भी लग जाएंगे।

पर सबसे आसान innocence का switch लगाना है, क्योंकि हम लोग एक बार बहुत innocent थे जब हम लोग पैदा हुए थे, जब छोटे थे। छोटे बच्चों के साथ रहने से innocence आता है। उनकी बातें याद करने से बहुत innocence आता है। जो लोग innocent हो जाते हैं, वो परमात्मा के राज्य के अधिकारी हो जाते हैं ।

ध्यान में सिर्फ आप ही अपनी ओर विचार करें कि मेरा मन इस वक्त में कौन-सी चालाकी में लग रहा है इधर-उधर। महामूर्खता का कार्य कर रहा है। इतना बस देखते ही आप “निर्विचार”- “निर्विचारिता”-यही innocence है।

आप लोग अब जब ध्यान में जाएंगे, बहुत देर तक ध्यान नहीं करेंगे हम लोग। लेकिन ध्यान में जाते वक्त आप सिर्फ ये देखें कि आप का कौन-सा चक्र पकड़ रहा है। क्योंकि आप लोग जो पार हो चुके हैं आप को अच्छी तरह से मालूम है। उंगलियों पर आपको जान पड़ेगा, कौन-सी उंगली थोड़ी-सी जल रही है। जो भी आपकी उंगली जल रही है, उस पर आप बंधन डाल लें तो वो छूट जाएगी। अगर आपकी उंगलियां ज्यादा ही जल रही हों तो हाथ झटक लीजिये, वो छूट जाएगा, आप जानते हैं। बंधन डाल दीजिये।

लेकिन निर्विचारिता की ओर रहें और चित्त जो है सहस्रार की ओर रखें। और जो लोग आज नए आए हैं उनको भी देखना होगा कि वो पार हुए हैं या नहीं। उनको क्या खराबी है, उनको क्या तकलीफ है, वो निकाल देंगे। ये सारी तकलीफ जो है, बाह्य है।

ये भी एक बड़ा भारी समर्पण है जहाँ शक्ति दोनों side (तरफ) से आती है left and right sympathetic nervous system का जो यहाँ ये expression है, उस रास्ते से। और इसके बीच में ही सुषुम्ना नाड़ी है। ऐसा करते ही सुषुम्ना नाड़ी अन्दर चलना शुरु हो जाती है। लेकिन ये जागृत होनी चाहिये। अगर ये जागृत नहीं है, इसका मतलब सुषुम्ना चल नहीं रही है। और जागृत का मतलब ये है कि आपके अन्दर सारी उंगलियों में से धीरे-धीरे ठण्डी-ठण्डी ऐसी हवा आने लगेगी। अगर आपके अन्दर ऐसी ठण्डी-ठण्डी हवा जा रही है; पूरी तरह से आप ‘निर्विचार’ हैं उस ‘तरण्य में’ ध्यान में हैं तो आप बढ़ रहे हैं, आगे आप चले जा रहे हैं। जैसे कि आप aeroplane में बैठते हैं, आपको पता नहीं आप कहाँ जा रहे हैं, लेकिन आप कहीं पहुँच जाते हैं ।

जब तक हम यहाँ पर हैं, ये जरूरी है कि जो सहजयोगी आप लोग हैं, ज्यादा इसमें part (हिस्सा) लें और आगे बढें। और जाने के बाद भी अपना समष्टी-रूप खराब न करें। आपसी बेकार की बातें बोलने पर आप कुछ न कुछ दंड देखेंगे। जिसने भी कोई सहजयोग के सिवाय, अन्दर की बात के सिवाय बाहर की बात जरा भी करी, उसको दंड। बाहर की कोई भी बात नहीं करनी। अंदर ही की बात करें।

अपने-अपने चक्रों को साफ करिये। उसमें ‘कोई’ शर्म की बात नहीं है। जिसके-जिसके चक्र पकड़े हैं वो बाहरी चीज है। बिल्कुल हिम्मत से सारी सफाई करके और नीचे डाल दें। जिसके भी हाथ जल रहे हैं, निकाल दें| हमारे भी हाथ जल रहे हैं-निकालियेगा नहीं तो क्या करियेगा? बैठ भी नहीं सकते।

और भी तरीके आप जानते हैं बहुत सारे, ध्यान में अपने को सफाई करने के। इसमें कोई बुराई की बात नहीं है, अगर मैं किसी से कह दूँ कि आप पानी में पैर डाल कर बैठिये और इस तरह से निकालिये। इसमें कौन-सी बुराई की बात है? इसमें क्या बुरा मानने की बात है? कितना पागलपन है, किस बात पर लोग बुरा मान जाते हैं? वो सोचते हैं “माता जी ने क्या कह दिया।” आप क्या कोई बड़े भारी saint (सन्त) हैं? यानि बड़े-बड़े saint तक ये काम करते हैं, आपको पता नहीं है।

जैसे मैंने कबीर दास जी के लिये कहा कि “दास कबीर जतन से ओढ़ी” कबीर दास भी अपने लिये कहते हैं कि “मैंने जतन से ओढ़ी भई”-जो कि इतने बड़े महापुरुष थे। फिर आपको इसमें बुरा मानने की कौन-सी बात है?

जरा-सा किसी से कहा कि भई मटका लेकर आओ, तो बुरा मान गए; फिर इतना बड़ा-बड़ा मटका लेकर आते हैं।

‘बेकार’ की बातें, ‘मूर्खो’ जैसी अपनी जो कल्पनाएं हैं अपने बारे में उसको “त्याग” दीजिये। “बचकानापन” है, बचपना नहीं। child-like होना चाहिये childish नहीं।

अब हम लोग ध्यान में जाएंगे| मैंने जैसे कहा है पहले अपने को प्रेम से भर लो। आप जानते हैं मैं आपकी माँ हूँ। पूर्णतया आप इसे जानें कि मैं आपकी माँ हूँ। और माँ होने का मतलब होता है कि सम्पूर्ण security है, संरक्षण है। कोई भी चीज़ गड़बड़-शड़बड़ नहीं होने वाली| आप मेरी ओर हाथ करिये। और धीरे-धीरे से आँख बन्द करके और अपने विचारों की ओर देखिये, आप निर्विचार हो जाएंगे। आपको कुछ करने का है ही नहीं। आप जैसे ही निर्विचार हो जाएंगे, वैसे ही आप अन्दर जाएंगे।

पहले अपने से इतना बता दो कि आज से निश्चय हो कि किसी को कोई सी भी चोट मैं नहीं पहुँचाऊँगा। और सब को प्रभु तुम क्षमा कर दो, जिन्होंने मुझे चोट पहुँचाई हो। और मुझे क्षमा करो क्योंकि मैंने दुनिया में बहुत लोगों पर चोट की है।

आप जो भी कहेंगे वही परमात्मा आपके साथ करेगा। आप उससे कहेंगे कि “प्रभु शांति दो”, तो तुम्हें शांति देगा। लेकिन आप मांगते नहीं हैं शांति। “संतोष दो”, तो वो तुम्हें संतोष देगा, तो वो मांगते नहीं हैं।

“मेरे अंदर सुन्दर चरित्र दो” तो वो चरित्र देगा।

अब प्रार्थना का अर्थ है, क्योंकि आपका connection हो गया है परमात्मा से|………..

………..”मेरे अन्दर प्रेम दो। सारे संसार के लिये प्रेम दो।”…………”मुझे माधुर्य दो, मिठास दो।”

जो भी उनसे मांगोगे, वो तुम्हें देगा। और कुछ नहीं मांगो। अपने लिये ही मांगो।………….”मुझे अपने चरण में समा लो।”…………..”मेरी बूँद को अपने सागर में समा लो।”

“जो भी कुछ मेरे अन्दर अशुद्ध है, उसे निकाल दो।” परमात्मा से जो कुछ भी प्रार्थना में कहोगे, वही होगा।……………..”मुझे विशाल करो। मुझे समझदार करो । तुम्हारी समझ मुझे दो। तुम्हारा ज्ञान मुझे बताओ।” 

“सारे संसार का कल्याण हो, सारे संसार का हित हो। सारे संसार में प्रेम का राज्य हो। उसके लिये मेरा दीप जलने दो। उसमें ये शरीर मिटने दो। उसमें ये मन लगने दो। उसमें ये हृदय खपने दो।” 

सुन्दर से सुन्दर बातें सोच करके उस परमात्मा से मांगें। जो कुछ भी सुन्दर है, वही मांगो तो मिलेगा। तुम असुन्दर मांगते हो तो भी वो दे देता है। बेकार मांगते हो तो भी वो दे ही देता है। लेकिन जो असली है उसे मांगो, तो क्या वो नहीं देगा?

यूँ ही ऊपरी तरह से नहीं, “अन्दर से”, आंतरिक हो करके मांगो।