Public Program, Parmatma ka swarup

मुंबई (भारत)

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Parmatma Ka Swarup 3rd March 1975 Date : Place Mumbai Seminar & Meeting Type Speech Language Hindi

जगह खरीदने के लिये दो लाख बीस हजार रूपया चाहिये। कोई आसान काम नहीं है। इसलिये जितना बन पड़े उतना दे दें। जगह अपने ही लिये, अपने बच्चों के लिये हो जायेगी और वहाँ पर मेडिटेशन तो होगा ही लोगों का। क्यूअर भी होंगे, पार भी होंगे लोग। और बहुत बड़ा धर्म का कार्य है। अपने धर्म के लिये हम लोगों ने खर्चा ही नहीं किया है । अपने बारे में ही सोचते रहते है। सेल्फ सेंटर्ड। कोई धर्म भी करो । धर्म के बगैर संसार में कुछ अधर्म आ जायेगा। अधर्म आ जायेगा तो तुम्हारे पैसे का भी तुमको सुख नहीं मिलने वाला। तुम्हारे बच्चों का तुमको सुख नहीं मिलने वाला। किसी चीज़ का नहीं। धर्म की स्थापना के लिये वो जगह बना रहे हैं। आपको मालूम है, मुझे पैसों की बिल्कुल जरूरत नहीं। मैं खुद उसमें रुपया दंगी। मुझे किसी के भी रुपये की, पैसे की भगवान की कृपा से कोई जरूरत नहीं। लेकिन सबको इसमें मदद करनी चाहिये । बहत से लोग ऐसे हैं कि माताजी के पास आते हैं, ‘माताजी, मेरे बाप को ठीक कर दो, मेरे बहन को ठीक कर दो। मेरे भाई को ठीक कर दो।’ पचासों को ठीक करने के लिये आते हैं। लेकिन जब पैसे की बात आती है, तो रफूचक्कर! उस वक्त कोई बात नहीं। ऐसा भी करने से कोई , मैं किसी से नाराज नहीं होने वाली। ये तो अपने अपने धर्म की बात है। जो देगा वो बड़ा भारी अधिकारी होगा। जिसको धर्म करना है उसका अधिकार है। उसकी समझ है। वो पाने वाला है। मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये। आप जानते हैं इस बात को बहुत अच्छे से। आप ही के लिये जगह बनानी है और उसके लिये रुपया इकठ्ठा करना पड़ेगा। उस जगह की तारीख भी हो गयी है, इसलिये रूपये की जरूरत है। सबको चाहिये ये सोच के कि ये करने से हमें धर्म मिलेगा। धर्म का हम कार्य कर रहे हैं। उसके लिये जिससे जितना बन पड़ेगा वो देना चाहिये । हम हमेशा अपने बाल बच्चों को, रिश्तेदारों को हमेशा देते रहते हैं। लेकिन धर्म में हम क्या दे रहे हैं? वैसे ही एक प्रोग्रॅम इसके लिये कर रहे हैं, उसके सोविनियर के लिये है। जिसको भी, मदद कर सकते हैं जो लोग वो भी हमसे ले जायें और वो ले जा के घर में नहीं रखें। उसको बना कर के और उसमें कुछ पैसा दे कर के और ले आयें। ऐसे ऐसे लोग हैं। मिसेस लाड हैं अभी। देखो बेचारों की कैसी हालत है! उसने पहली मर्तबा, जैसे सुना वैसे ही अपनी गाँठ के १०१ रुपया ला कर के, इस परेशानी में ला कर दे दिया। बहत बड़े रईसों को देखिये । इतने कंजूस, इतने मक्खीचूस होते हैं। अपने बच्चों के लिये करते हैं, लेकिन धर्म के कार्य के लिये नहीं करते। शराब पियेंगे। उसमें रूपया उड़ायेंगे लेकिन धर्म में नहीं उड़ायेंगे। फालतू जगह, सिनेमा में, इधर, उधर खर्च करेंगे । और इससे फायदा उठाते हैं। ये नहीं की वाइब्रेशन्स से फायदा नहीं उठाते। फायदा उठाते हैं। लेकिन धर्म में जागते नहीं। आप से मैंने पहले बताया था, कि एक शक्ति तीन में बँट जाती है और तीन गुणों में काय्यान्वित होती है। त्रिगुण में वो कार्यान्वित कैसे होती है? पहली शक्ति, जिसे कि हम महाकाली की शक्ति कहते हैं। जो आदिशक्ति का ही स्वरूप है। उससे संसार में स्थिति होती है। चीज़ होती है। क्रियेशन होता है। जिससे हम होते हैं। उस शक्ति से ही स्थिति नहीं भी होती है। जैसे स्वीच ऑन भी हो सकता है, ऑफ भी हो सकता है। उसी के कारण हम नष्ट भी हो सकते हैं पूरी तरह से। अगर परमात्मा ने ये सोच लिया कि वो आँख मूँद लें और उस शक्ति का कार्य न देखें, तो इसी ন

शक्ति से हमारा संहार भी होता है। लेकिन ये जो शक्ति है इसमें क्या निहित है? इसमें कौन सा स्वरूप परमात्मा का है? मैंने आपसे कहा था, उसे ईश्वरी शक्ति कहते हैं। वो परमात्मा का ईश्वरी अंश है। इसे की परमात्मा साक्षि स्वरूपत्व में बैठे रहते हैं। और हमारे अन्दर में भी साक्षी स्वरूपत्व आता है। किंतु साक्षी स्वरूपत्व का संसार में अभियान क्या होता है? कार्यान्वित कैसे होते है? जिसे आज हम वाइब्रेशन्स कर के जानते हैं, वो इसी शक्ति से बहने वाले स्पंदन का नाम है। ये जो शक्ति हमारे अन्दर से बह रही है, आपके अन्दर से ये जो वाइब्रेशन्स आ रहे हैं, ये वही शक्ति है। वो सर्व भूतों में हैं। सर्व जगह में हैं। चाहे वो चीज़ मरी हो, स्थिति में हो, जिवंत हो हर में ये वाइब्रेशन्स हैं। माने अणु-रेणु, मॉलेक्यूल्स, अॅटम्स, सब के अन्दर ये शक्ति स्थिति बन कर के, विटनेस बन कर के रहती है। इसको बहुत से लोग चैतन्य लहरी भी कह सकते हैं। लेकिन मैं इसे चैतन्य नहीं कहूँगी। चैतन्य तो परमात्मा की पूर्ण शक्ति का अगर नाम है, तो इसे आप चैतन्य नहीं कह सकते। लहरी मात्र कहिये। परमात्मा के प्रेम की लहरियाँ। उसके प्रेम का स्पंदन। मनुष्य मात्र में भी वो शक्ति हृदय में रहती है और वहाँ स्पंदित रहती है। मनुष्य मात्र में हृदय में जो स्पंदन होता है प्राण का, वो यही शक्ति है, इसलिये उसको आप प्राणशक्ति भी कह सकते हैं और यही वो शक्ति है जिसके कारण संसार में प्राण हैं, माने लाइफ। जिसको आप लाइफ कहते हैं। दूसरी शक्ति जिसे की हम ब्रह्मा की शक्ति कहते हैं या माँ सरस्वति की शक्ति कहते हैं। जिससे सारा संसार बना हुआ है। जिसके कारण सारी सृष्टि की रचना हुई। जिसके कारण सब ग्रह-गोल, चंद्र, सूर्य, पृथ्वी आदि सब जितना भी मैटर है वो बना। उस क्रियेटिव फोर्स को आप महासरस्वती की शक्ति कहते हैं। वो शक्ति हमारे भी पेट में हैं और विराट के भी पेट में है। वो सब प्राणिमात्र के पेट में स्थित है । उसे आप कह सकते हैं कि वो इवॉलविंग फोर्स है। अगर किसी अमिबा को भूख न लगती, तो वो इवॉल्व नहीं होता। उसका उत्थान नहीं होता। वो शक्ति हमारे पेट में स्थित है। जिसको की हम लोग रजोगुण के नाम से जानते हैं। जो कार्यान्वित होती है, जिसके कारण मनुष्य इस दशा में पहुँचा है, इसे इवोल्यूशन कहते हैं। तीसरी शक्ति इसके बराबर बीचोबीच होती है। जो विराट के सहस्रार में, नीचे जो लिंबिक एरिया है, चेतना, चेतना स्वरूप होती है, जिसे अवेअरनेस कहते हैं। चेतना स्वरूप जो शक्ति हमारे बुद्धि में है उसे हम महालक्ष्मी की शक्ति कहते हैं। इस शक्ति का कार्य भी ऐसा है कि जो कुछ भी संसार में हो रहा है , उसे जानना। जैसे कि एक अमिबा को भूख लगे या किसी जानवर को भूख लगे और वो किसी चीज़़ की ओर उठा। उसने अपनी गर्दन उठायी। उसकी गर्दन बड़ी होने लग गयी। लेकिन उसकी भूख पूरी ह्यी या नहीं इसको जानने की शक्ति ही ये शक्ति है और इसी को लोग सत्त्वगुणी शक्ति कहते हैं। इन तीनों शक्तियों को जब एकाकार हम पाते हैं तभी सॅल्वेशन होता है। ये गुणातीत दशा है। माने आपके हाथ में से वाइब्रेशन्स बह रह हैं, जैसे ही आप पार हो गये, ये इसका प्रूफ है। इसकी आपको चेतना भी हैं। आप जानते हैं कि आपके अन्दर से वाइब्रेशन्स बह रहे हैं। आप ये भी जानते हैं कि दूसरों के अन्दर वाइब्रेशन्स है या नहीं। आप ये भी जानते हैं कि उसकी कुण्डलिनी कहाँ अटक रही है। और तीसरे, आपके अन्दर वो भी शक्ति आ गयी कि आप

दूसरों को इवॉल्व कर सकते हैं। आप दूसरों की जागृति कर सकते हैं। दूसरों को पार कर सकते हैं। क्या आप समझ सकते हैं कि आप इतने बड़े हो गये हैं कि आप दूसरों को इवॉल्व कर रहे हैं? आपके दिमाग में भी ये बात नहीं आती। आप समझ भी नहीं सकते कि तीनों शक्तियाँ आपके अन्दर में एकत्रित हो कर के बह रही हैं और इसलिये आपकी चेतना भी है। आप जानते भी हैं। यही गुणातीत दशा है। इन तीनों दशाओं को जब हम पार कर लेते हैं तो चौथी दशा में आते हैं जहाँ पे तीनों का मिलन हो गया हो। एक ही धारा बन गयी हो। यही फोर्थ डाइमेंशन हैं। यही चौथा डाइमेंशन है। और इस चौथे डाइमेंशन में जब हम चलने लगते हैं तभी हम गुणातीत दशा में जाते हैं जहाँ गुण हम से छूट गये। तब यही चैतन्य, इसे कहना चाहिये, जहाँ आप अॅबसल्यूट नॉलेज, अॅबसल्यूट लव, अॅबसल्यूट ब्लिस इन तीनों के साथ में संबंधित है। और इसको करने के लिये जो शक्ति अपने अन्दर में बचीखुची रखी जाती है, जिसे रेसिङ्यूअल एनर्जी कहना चाहिये, वो शक्ति नीचे हमारे त्रिकोणाकार अस्थि में छिपी हुयी है और वही इस्तेमाल में आती है। और वही इन तीनों शक्तियों को छेद कर के एक कर देती है। और तभी आप और गुणातीत दशा में जाते हैं। और तभी आप में चैतन्य हो जाता है। माने ये की आप इन तीनों चीज़ों से भूषित हो जाते हैं। जिसके कारण आपके हाथ में से वाइब्रेशन्स बहना शुरू हो जाते हैं | जिसके कारण आप दूसरों की कुण्डलिनियों को पहचानने लगते हैं और जिसके कारण आप दूसरों को भी रियलाइजेशन दे सकते हैं। ये तीनों शक्तियाँ जब कार्यान्वित होती हैं तब उसकी चेतना हमें रहती नहीं। हृदय हमारा झलक रहा है। लेकिन आपके हृदय के ठोके आपके सर से सुन नहीं सकते। हृदय पे अगर कोई प्रेशर हो, तो हम उसे जान नहीं सकते। हमारे पेट में अगर कोई शिकायत हो रही हो, तो हम उसे समझ नहीं सकते। सिवाय इसके की थोड़ासा दर्द होगा। लेकिन जब आप गुणातीत दशा में चले जाते हैं, तो आप अपने को हर एक चक्र में पकड़ सकते हैं, कि मुझे कहाँ तकलीफ़ हो रही है। आप अपने को पकड़ लेंगे। कहेंगे, ‘माँ, मेरा आज्ञा पकड़ गया। मेरा आज्ञा पकड़ रहा है। पहले आप जानते नहीं थे। ये मशिन और आप एक ही थे। आपको पता ही नहीं था कि मशिन कहाँ खराब है। आप भी पकड़ते थे तो आपको पता नहीं था। और आप बीमारियाँ पकड़ते थे, आपको पता ही नहीं था । वो तो अब भूत जब आप गुणातीत में उतर गये हैं, उस वक्त आपको ये समझ में आने लगा कि ये मिस्टर जो है, ये अलग है और हम अलग हैं। ये कोई मशिन है। इसका आज्ञा पकड़ गया है, इसका व्हील खराब हो गया है, इसका डायनॅमो उतर गया है। आप खुद ही कहते हैं कि, ‘मेरे मूलाधार पर पकड़ आ गयी।’ आप खुद ही कहते हैं, मुझे नहीं कहना पड़ता है। लेकिन जब तक ये फर्क अच्छे से नहीं पता होता है तब तक बड़ी मुश्किलें रहती हैं साधना में। तब तक आदमी ऊपर से नीचे ही करते रहता है। गुण से गुणातीत, गुण से गुणातीत। घूमते रहता है। और उसको अगर कोई कहें कि तेरा आज्ञा पकड़ गया है तो उसको बड़ा गुस्सा आता है। उसको अगर कोई कहें कि तेरा हृदय पकड़ गया है तो उसको बड़ा गुस्सा आता है। लेकिन जब उसको पता होता है कि ये मशिन ही है भाई, कोई अलग है। ये पकड़ गयी होगी तो पकड़ ही गयी होगी। इसको मारपीट के हम ठीक कर लेंगे। तब उसको बुरा नहीं लगता है और तभी उसको ठीक भी कर सकता है। तब वो सुबह से शाम तक अपने को जूते मारता है, कि ये जो जूते मारता है वो अपने को नहीं मारता है, लेकिन इस मिसआयडेंटिफिकेशन को मारता है। जो आपके शरीर है। ऐसे ही आदमी की साधना ऊपर हो सकती है और जो आदमी अभी भी उस चक्कर में घूम रहा है, जो अपने

को उससे निगडीत रखता है, उसकी साधना कुछ नहीं हो सकती, वो चाहे अपने को कुछ भी कहे। अब ऐसे लोगों में मैं देखती हूँ अपने यहाँ, कुछ तो अभी भी ….(अस्पष्ट) है, बिल्कुलहै। कुछ थोड़े उपर आ गये हैं, आधे-अधूरे और कोई बहुत पहँचे ह्ये। अब जो बहुत पहँच गये हैं उनको मैं जानती हूँ, आप नहीं जानते हैं। और जरूरी है कि जो बहुत पहुँच गये हैं वो नज़दीक मेरे ज्यादा आ सकते हैं। क्योंकि वो मुझे ज्यादा समझ पाते हैं। उनसे एकतानता होती है, तन्मयता होती है। और मैं देखती हैँ कि लोग उनसे जेलसी करते हैं । ये छोटेपन की बात है। जेलसी आपने की और हृदय चक्र आपका पकड़ गया, खटाक्। मुझे कहने की जरूरत नहीं। आपकी फौरन उंगली मैं जलना शुरू हो जायेगी। नहीं कुछ बोलती। आप जेलसी किसी से करिये आपका हृदय चक्र इतना जबरदस्त पकड़ेगा। मैं नहीं कहती हैँ। इतना जोर का हृदय चक्र आपका पकड़ेगा कि आप घबरा जायेंगे। मैं कुछ नहीं कहूँगी। आप सर पकड़ के बैठ जायेंगे। चक्र पकड़ जायेगा। खुद ही पकड़ जायेगा आपका। कोई मैं आपको तकलीफ़ नहीं दे रही हूँ। अपने आप ही पकड़ जायेगा। धीरे धीरे वो भी अकल आने लग जायेगी। जब ये होने लगेगा तब ये भी अकल आ जायेगी कि जूता मारना चाहिये गुरु को अगर माताजी ने कहा है तो। सर्वसाधारण उपाय कर लिये अब एक उपाय सिर्फ करो कि अपने को अपने से हटा लो। वो हटाये कैसे ? सब लोग यही प्रश्न पूछते थे सदियों से कि ये कैसे हो? ये तो कृष्ण ने कह दिया कि साक्षी स्वरूप हो जाओ | कैसे ? ये कैसे हो? ये जंपिंग कैसे हो? कैसे हम पायें? इस चीज़ को हम कैसे मान लें कि ऐसा होता है? जिस प्रतिबिंब को हम देख रहे हैं वो प्रतिबिंब जहाँ से आ रहे हैं वो हम कैसे हो जायें? हम तो प्रतिबिंब पर बैठे हैं ये कैसे हो जायें ? हम सब्जेक्टिव कैसे हो जायें? अब आप हो गये। हो ही गये! ये तो बात पक्की है। नहीं तो आपको अपना आज्ञा चक्र कैसे समझ में आता है! और आपकी नाभि जो पकड़ रही है और यहाँ काट रही है। अपने आप से हाथ झटके जा रहा है। लेकिन वो सहज और सरल में मिल गया। उसका कोई दाम नहीं पड़ा। कोई मेहनत नहीं पड़ी। मैंने तो अपनी खेती कर ली। खेती में कुछ बीज होते हैं, जो सड़े, गले होते हैं। उन पर आप कितनी भी मेहनत करो , कुछ भी करो , ब्रेनलेस, हार्टलेस, यूजलेस, कुछ भी नहीं बनता उनसे। कितनी भी मेहनत करो, फिर वही आयेंगे , फिर वही करेंगे । आप सब कर लो। प्यार कर लो, डाँट लो, बोल लो, कुछ भी कर लो। अब उनको चलो, फिर उनको चलने दो अगले दस दशक। पन्द्रह जनम में कभी न कभी कुछ होगा। इसी तरह से इसके सर्कल्स बनते जाते हैं। इन सर्कल में कुछ लोग आ जाते हैं। कुछ लोग बाहर के सर्कल में रहते हैं और जो बिल्कुल आऊट ऑफ सर्कल हैं वो फेंके जाते हैं। वो अपने को बहुत अकलमंद समझते हैं कि, ‘साहब हम तो दूर ही है, हमें कोई मतलब नहीं।’ पाया कुछ भी नहीं। यहाँ आने से आपको क्या देने का है? आपको तो लेने का ही है। ये तो ऐसा ही हो गया कि कोई भंडारे में आ के कहें कि, ‘भाई मैं इतना अकलमंद हँ कि मैं तो गया ही नहीं भंडारे में।’ गंगा के पास जा के कहे कि, ‘मैं तो गंगा में नहाने नहीं गया मैं तो अपना ही कुँओं में नहा रहा हूँ।’ ऐसे ही अकलमंद लोग है। और जो गंगा में नहाते हैं। उसमें ड्ूबकियाँ लगाते हैं, इन्होंने हिम्मत की हुई है। इसमें कूद रहे हैं। वो सोचते हैं कि ये बेवकूफ़ हैं। और गंगा से गुस्सा हो रहे हैं कि इनको क्यों इतना कूदा रही हो? अरे भाई, वो ही कूद रहे हैं। मैं क्या कूदा रही हूँ? तुम लोग बाहर किनारे पे खड़े हो कर उनसे जल रहे हो। वो कूद रहे हैं तो कूद रहे हैं। वो कूद रहे हैं क्योंकि उनमें कुदने की शक्ति है। तुम में शक्ति नहीं कूदने की? यहाँ बैठे बैठे समय बरबाद करने से अच्छा है कि थोड़ा समय तो गंगा में उतर आओ। इसलिये कुछ लोगों की प्रगति बहत होती है और कुछ लोगों की नहीं। मुझे

अनेक बार लोग प्रश्न पूछते हैं कि, ‘माताजी, किसी किसी की इतनी प्रगति क्यों ? और किसी किसी की क्यों नहीं?’ हिसाब ही आप ही का है। आप जितने अग्रेसर होंगे उतनी आपकी प्रगति होगी। जितने आप पीछे रहेंगे उतनी आपकी नहीं होगी। एकदम सीधा हिसाब है। अब कोई अगर दरवाजे से आया और मैं यहाँ बैठी हूँ। तो ‘यहाँ क्यों बैठे हो? में वहाँ क्यों खड़ा हूँ?’ इसका कोई जवाब है? जवाब ये कि आप वही खड़े हैं। मैं उसे क्या करूं? यहाँ बैठी हूँ, इसलिये मैं बैठी हूँ। आप उठ कर चल के क्यों नहीं आते इधर ? वो नहीं आयेंगे। वहाँ से सवाल पूछेंगे कि, ‘ये क्यों आगे गये? मैं क्यों यहाँ हूँ?’ पाँव उठाओ, सीधे चलो। पर साधी, सरल चीज़ हमारे दिमाग़ में नहीं आती। हम तो कॉम्प्लिकेटेड ब्रेनलेस हैं न! इस मामले में बिल्कुल ब्रेनलेस हैं हम लोग। कॉम्प्लिकेटेड बातें ही समझ में आती है। पहले ही मैंने बताया कि इसमें कोई एज्यूकेशन नहीं हो सकता है। इसमें कोई दान नहीं हो सकता है। इसमें कुछ नहीं हो सकता। तादात्म्यता आनी चाहिये। अंतरंग में पूरी तरह से स्वच्छता रख कर के, अगर आप तादात्म्य होना सीखें, इसमें पूरी तरह से झुकना सीखें । अपने को पूरी तरह से झुकाना सीखे । आपकी प्रगति है। लेकिन छोटी छोटी बात है। बेकार बात है। आदमी बिगड़ जाता है। आदमी का दिमाग है कि क्या? समझ में नहीं आता। अरे तुम्हारे लिये तो महान परम सत्य देने के लिये हम खड़े हैं। और सब के सामने निर्भयता से हम कह रहे हैं। ये सारे जितने बड़े बड़े साधु-संन्यासी है ये सब जंगलों में जा के छिपे हुये हैं। उनकी हिम्मत नहीं इतना सत्य कहने की। वो कहेंगे तो उनको आप सब चढ़ा देंगे सूली पर। मुझी को क्या कम करते हो? मेरा भी जहाँ देखो अपमान करते ही रहते हो। छोड़ते नहीं मुझे भी! मेरी पीठ पीछे भी मेरी भलाई करते हैं। बहुत से लोग हैं यहाँ। कोई हर्ज नहीं। बहरहाल मुझे किसी से भय नहीं । आपने शेरनी को देखा होगा, कि उसके बच्चे पर कोई हाथ डालें। तो वो खूँखारती है। वो नहीं सोचती कि मेरे पर किसने बंदक लगायी और किसने तलवार लगायी । वो सब से लड़ती है। वही हाल हमारा है। हमें किसी से भय नहीं है और ना भय हमें करने की जरूरत है। हम तो खुले आम साफ़ बता रहे हैं कि जो हैं वो है और जो नहीं है वो नहीं है । पहले जमाने में ऐसा होता था कि लोग जब कोई किताब वगैरा लिखते थे जिसमें कोई सत्य होता था, जैसे डार्विन कहता था, कि जब उनको कोई सत्य लिखना था, तो उसने कहा कि, मेरे मरने के बाद छापना तुम।’ आखिर सब को भय लगा रहता था कि सत्य को पियेगा कौन? जैसे सत्य को देखा आँखें धूँधला गयी। घबराहट हो गयी उस सत्य से आदमी को। कुम्हलाने लग गया। उसने सोचा कि मार डालू उसको। हमारे बस का ये सत्य नहीं है। आदमी को तो असत्य चाहिये, वो चाहता है कि मेरे पास असत्य हो। मैं असत्य पे ही खड़ा रहँ। सत्य को पीने की शक्ति उसमें नहीं होती। सत्य को आकलन करने कि शक्ति उसमें नहीं होती है। इसलिये वो असत्य को ही सब कुछ मान लेता है। और जो आदमी सत्य बोलता है उसको क्रूस पे चढ़ा देता है। उसको मार डालता है, उसकी हालत खराब कर देता है, उसकी दृष्टता करता है सब। उसको सहन नहीं हो सकता है। ये सत्य के साथ है। सत्य को झेलने की आज कलयुग में शक्ति है। मैं ये जानती हूँ। आज तक नहीं होगी। लेकिन अब शक्ति है। लेकिन जो सत्य है उसका पड़ताला भी मैं आपको प्रॅक्टिकली यहाँ दिखा रही हूँ। अभी इन्होंने अभी मुझ से कहा कि, ‘मेरा राइट हैण्ड बंद हो गया माताजी ।’ मैंने कहा, ‘बैठो, दस जूते मार के आओ उनको।’ जैसे मारा, देखिये, अभी सामने बैठे हैं। इनके वाइब्रेशन्स शुरू हो गये। अभी मैं इधर ही बैठी हूँ। ये प्रॅक्टिकल तुम देख लो। ये प्रॅक्टिकल तुम्हारे सामने है । इस प्रॅक्टिकल के लिये और कोई किताब दिखाने की नहीं है मुझे। किसी का और पड़ताला नहीं देने का। किसी का फलाने ये नहीं कहता, ढिकाने ये नहीं कहता। मैं अभी

तुमको यही दिखा देती हूँ। तुम देख लो है कि नहीं है । तुम दूसरों की कुण्डलिनी पर देख लो कि तुम्हारे हाथ चलते हैं कि नहीं चलते है। तुम ये देख लो कि तुम्हारे समझ में इनके ये चक्र आ रहे हैं कि नहीं आ रहे हैं और जो चक्र हैं वो हैं या नहीं है। प्रॅक्टिकल रिलीजन है । हवाई रिलीजन नहीं कि भाई , सच बोलो। क्यों बोले प्रॅक्टिकल, बिल्कुल साहब सच? सच बोलने से तो जेल जाते हैं क्यों बोले सच ? इसलिये सच बोलो, कि झूठ बोलोगे तो वाइब्रेशन्स बंद हो जायेंगे। हिसाब किताब साफ़। आप देख लीजिये, किसी औरत की तरफ़ आपकी नज़र बूरी तरह से उठती हों तो आपके वाइब्रेशन्स बंद होना ही चाहिये। लिख लीजिये आप।| हाथ में अगर शराब इस भावना से ले ली, की पीना है, वाइब्रेशन्स बंद। उसी वक्त। मेरा कोई रिस्ट्रीक्शन्स नहीं है। मैं तो इधर बैठी हुई हूँ। मैं लंडन में भी बैठी रहँगी, तो भी तुम देख लेना की वाइब्रेशन्स बंद। मैं मना नहीं करती तुमसे। मैं नहीं कुछ कहती हैँ। लेकिन तुम देख लेना। तुमने सिगरेट पी है तो विशुद्धि चक्र पकड़ गया। पता चला कि ‘दर्द हो रहा है माताजी।’ ‘क्यों हो रहा है।’ मैंने कहा, ‘तुमने सिगरेट पी थी?’ ‘हाँ’ फिर अब दर्द सॉल्व। अब असली बम्मन हो गये हो। अब असली मुसलमान हो गये हो और अब असली धर्मात्मा हो गये हो। अभी धर्म की अवहेलना नहीं चल सकती। अब उसको खोपड़ी पर ले कर चलना चाहिये। धर्म को आपको अपने साथ लेना पड़ेगा। अगर जहाँ भी आपने धर्म छोड़ा वाइब्रेशन्स बंद। सीधा हिसाब-किताब लगता है। ज़रा सा उसका अपमान कर दिया वाइब्रेशन्स बंद। छोटी छोटी चीज़ों में आप देखेंगे कि वाइब्रेशन्स बंद। जैसे आज हमारा टाइपिस्ट है, कहने लगा, ‘माताजी आज टेप नहीं चल रहा है।’ मैंने कहा, ‘जरा दिखाओ तो क्या बात है?’ तो देखा कि जहाँ से मैं बोल रही थी नां वहाँ पर एक कल थी। वो ऑफ थी। मैंने कहा, ‘बेटे, ये ऑफ है, उसको जरा ऑन कर दो।’ उसने कहा, ‘देखिये, कितना बारीक यहाँ पे अॅडजस्टमेंट है।’ मैंने कहा, ऐसी ही ह्यूमन बिईंग्ज में सारे अॅडजस्टमेंट्स है। कोई भी अँडजस्टमेंट्स बंद हो गया वाइब्रेशन्स बंद। इसका जजमेंट है वाइब्रेशन्स। कौन सद्गुरु हैं और कौन गुरुघंटाल! दो ही जात हैं। गुरुओं में दो ही जात होती हैं। एक तो सद्गुरु होते हैं या गुरूघंटाल! बीच में कुछ नहीं। बीच में कोई चीज़ नहीं होती। जिसको सर्टिफिकेट भगवान ने दिया है, जिसके हाथ में वाइब्रेशन्स आ रहे हैं, जो पार है और जिसने इस ज्ञान को जाना है, वो धर्म सीखा सकता है, बाकिओं को कोई अधिकार नहीं, कि गुरु बन के बैठे हये हैं। मेरे सामने तो यूं यूं होते हैं सब गुरु लोग। फिर क्यों होते हैं ? जिसके पास में धर्म है और जिसको परमात्मा ने अपॉइंट किया है, वही, वही इन्सान संसार में धर्म सिखा सकता है। बाकी जितने सिखाते हैं वो गुरुघण्टाल है, जिसमें कुछ राक्षस हैं, महाराषक्षस हैं, कोई अतिदुष्ट हैं, कोई साधारण हैं। आप चाहे इलेक्शन में, झूठ बोल के इलेक्शन की सीट ले लीजिये। उसकी पनिशमेंट इतनी नहीं होती है। ज्यादा से ज्यादा आपको फाइन हो जायेगा, नहीं तो आप जेल चले जाओगे | ज्यादा से ज्यादा आपको फाँसी हो सकती है। लेकिन धर्म के मामले में, जिसने भी ऐसे तरह के धंधे किये हैं उसके लिये बहुत बड़ी सजा मिल सकती है। उसके लिये पाताल लोक से ले कर के ….. पर तक इतनी भयंकर …… बनायी गयी की इन लोगों से बच के रहना चाहिये। क्योंकि सन्मार्ग से परावृत्त करना, सन्मार्ग से लोगों को हटाना, अपने मतलब के लिये, पैसे के लिये, उससे स्मगलर बच जायेंगे, चोर बच जायेंगे, पर ये नहीं बचेंगे। सिर्फ अपने अहंकार के लिये, अपने नाम के लिये,

पैसा कमाने के लिये या किसी गंदी तृष्णा के लिये, ये अगर धार्मिक बन कर के गुरु बने हुये हैं, तो उनको कड़ी सी कड़ी सजा मिलने वाली है। इसलिये आप भी उनके साथ में सहभागी मत होईये। उससे भागिये। वो तो खुद जायेंगे ही, अपने साथ आपको भी घसीट के ले जायेंगे| असल-नकल की पहचान नहीं थी तब तक ठीक था। दूर लेकिन अब असल-नकल की पहचान आ गयी है। वाइब्रेशन्स से आप जानिये। इस पे शंका करने की कोई बात नहीं। उसी तरह से वाइब्रेशन्स आप ने पा लिये। जब आपने इसको जान लिया, जब आपके अन्दर परमात्मा ने ये वरदान दे दिया, उस वक्त किसी भी तरह से, काया, वाचा, मन से इसका अपमान करना भी एक महाघोर पाप है। क्योंकि मुफ़्त में मिल गया है। इसलिये उसकी अवहेलना मत करो। बहुत बड़ा धर्म है। बड़ी मुश्किल से आदिशक्ति ने तुम्हें सजाया है। इस दशा में लाया है और तुम्हारे उपर अपना प्यार उंडेल दिया है। अब उसका अपमान पिता को बिल्कुल सहन नहीं होगा और उसके साथ छलना मत करो। क्योंकि ये माया है। माया में, आदमी के समझ में आयेगी नहीं बात, क्योंकि इतनी आसानी से पाया है कि धर्म का आपको मालूम ही नहीं, उसका मूल्य क्या है? कितनी बड़ी चीज़ आपने पायी है। सहज में ही इतना बड़ा धन मिल गया है। इसलिये उसकी अवहेलना आप करते हैं। लेकिन आपको पता होना चाहिये। इसकी कीमत आप हैं। पहले इसको जान लीजिये, क्या पाईये । इसको गांभीर्य को समझ लें। इससे खेल नहीं कर सकते। इससे खिलवाड़ आप नहीं कर सकते। इससे पॉलिटिक्स आप कर नहीं सकते। इससे चारसौ बीसी आप कर नहीं सकते। अगर किया है, मेरे मन में तो किसी के प्रति, कभी भी, आज तक भी, कोई भी दुर्भावना नहीं आयी और ना आ सकती है। क्योंकि मेरे पास पीक टाइम है। लेकिन एक शक्ति, बहत बड़ी, आपके उपर बैठी हुई सब चीज़, खेल को देख रही है। और उससे बच के रहिये आप| बार बार मैं कहती हैं। ये महान धर्म की चीज़ है । अब आपको वाइब्रेशन्स आने के बाद में आप शराब पीते हैं। बहत बड़ा पाप है। मैंने पहले ही कहा है कि अपने चेतना का अपमान नहीं कर सकते। अपना ही अपमान है, क्योंकि आपके अन्दर शक्ति का दीप जला हुआ है। उसके अन्दर धर्म का तेल जलाना चाहिये। धर्म का मतलब मेरा वो नहीं है, पाखण्ड। धर्म का मतलब मेरा, धारणा है। अपनी पूरी तरह से आपको इज्जत करना चाहिये। क्योंकि आप स्वयं एक मंदिर हैं। इसमें परमात्मा ने अपना दीप जलाया है। इस शरीर की आपको सेवा करनी चाहिये। इस शरीर का आपको विचार रखना चाहिये । उसको सुन्दर रखना चाहिये। अपने मन को भी सुन्दर, स्वच्छ रखना चाहिये। उसके अन्दर गन्दे विचार नहीं आने देना चाहिये। अब आप में कोई कंडिशनिंग नहीं होगा। कोई प्रॉब्लेम नहीं होगा। आप तय कर लें कि, ‘नहीं, मुझे नहीं करने का है। मुझे धर्म के रास्ते पे खड़ा रहने का है।’ दुनिया की कोई भी शक्ति आप पर आक्रमण नहीं कर सकती। आप तय कर लें। कोई कुछ भी बात बकवास करें, मुझे उससे कोई मतलब नहीं। मुझे अपना ही धर्म का 6. मार्ग नियत है। उस में मुझे उठने का है। इसलिये नहीं की मैं दुनिया से कोई सुपिरिअर हो जाऊँ। लेकिन इसलिये की जो सब से सुपिरिअर चीज़ है, जो सब से ज्यादा डायनॅमिक चीज़ है वो मेरे अन्दर से बहें। पूरी तरह से बहें और मैं उसका एक सिर्फ वाहन हो जाऊँ। मनुष्य महामूर्ख भी है। अत्यंत मूर्ख है। उसकी मूर्खता देख कर के समझ में नहीं आता की ये लोग पढ़े-लिखे हो कर के, बड़े बड़े पदों पर हो कर के, बड़े बड़े हृद्दों पर रह कर के भी और इतने पैसे वाले हो कर के सोचते हैं कि ০

हमने बड़ा सच पा लिया है। लेकिन इतने महामूर्ख है कि इनकी बुद्धि ही त्याग दी। इनके पास सुबुद्धि ही नहीं है । ये सोच नहीं सकते की किस चीज़ पर अपने को अटका के रखा है। इसका कोई तौल नहीं है। उनके लिये ज्यादा महत्त्वपूर्ण, अभी अगर एक सिनेमा अॅक्ट्रेस आ जायें, तो लगे सब दौड़ जायेंगे। अभी एक प्रोग्रॅम में मुझे बुलाया था। वहाँ कुछ सिनेमा अॅक्टर और अॅक्ट्रेस थे। सब के सब चक्र पकड़े ह्ये हैं उन लोगों के। उनके बीच में मुझे बिठा दिया। मैं देखने लगी कि सब लोग उन्हीं को देखने के लिये दौड़ रहे हैं। सिनेमा अॅक्ट्रेस में क्या रखा हुआ है ? अधर्म, महा अधर्म ! उस अधर्म को देखने के लिये क्यों दौड़ रहे हैं? क्यों मनुष्य इतना लालायित दौड़ रहा है? किसलिये उसे पकड़ना चाहता है? उसे क्या मिलने वाला है? उसकी जो कमज़ोरियाँ हैं, उसकी जो विकनेसेस हैं, उसके लिये उधर दौड़ा चला जा रहा है। इसलिये आपको पता होना चाहिये, कि ये जो चैतन्य की लहरियाँ हैं, इसकी बेसीस है धर्म। इसका बेसीस धर्म है। आप झूठ बोलें। मक्कारी करें और आप चाहें कि आपके वाइब्रेशन्स के बहें। नहीं हो सकता है। और फिर देखिये जो बहते हैं। सारा डायनॅमिक हो जाता है। सारी चीज़ एकदम खुल डायनॅमिक हो जाती है। अभी एक साहब कहने लगे कि, ‘हमारे घर में, माताजी, मैं काफ़ी रुपया कमाता हूँ, लेकिन खर्च हो जाता है । मेरे घर में पैसा नहीं।’ मैंने कहा, ‘तुम्हारी बीबी का नाभि चक्र पकड़ा है। उसकी सफ़ाई करो।’ अब वो अगर अकलमंद होगा तो सोचेगा कि माताजी मेरे भले के लिये कह रही हैं। एक बेवकूफ़ होगा तो कहेगा कि मेरी बीबी का कभी नाभि चक्र नहीं पकड़ता। फिर उससे मैं बात क्या करूँ? आखिर ये कहने में मुझे क्या लाभ होने वाला है? मैं जो कह रही हूँ, किसलिये कह रही हूँ? इससे तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारा मंगल हो, तुम्हारा भला हो। इसलिये कह रही हूँ। आप लोगों में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने काफ़ी कुछ पा लिया है। काफ़ी कुछ उतर गये हैं और काफ़ी अन्दर गहन हो गये हैं। और ऐसे ही आप बढ़ते रहेंगे । अभी एक-दो महिना मैं यहाँ पर हँ। बाद में चली जाऊंगी। कोई बात नहीं। सृजन बहुत हो गया है। बहुत से लोगों ने पा लिया है। लेकिन उसमें आपको ये पता होना चाहिये, कि चौथा आयाम, फोर्थ डायमेंशन की बात है । तीन आयाम की बात नहीं कि, ‘मेरे पति की नौकरी नहीं रहती। उसको जरा नौकरी दिलवा दीजिये माताजी। मेरे भाई का फलाना ये हो गया, ससूर को लकवा मार गया, उसको ठीक कर दीजिये माताजी।’ ये सब थ्री डायमेंशन की बात है। आपको जो पाने का है, वो आपका कल्याण और आपका मंगल है। उसको ही सोचो। किसी और की बात इस मामले में मत सोचो। फिर देने के समय औरों को सोचिये और लेने के समय अपनी ही सोचो । होंगे, होंगे, अपने बैठे रहे होंगे। एक साहब और आये। मैंने उनसे पूछा कि, ‘आपकी बीबी की नाभि आपने कैसे ठीक करी?’ कहने लगे. ‘सुबह रोज उसको मैं जूते मारता हूँ।’ कोई सोचेगा, कि माताजी ने क्या कहा, कि उसको पकड़ के जूते मारे। नहीं, उसका नाम ले के उसको जूते मारते हैं। उसकी नाभि गयी। उसकी हालत ठीक हो गयी । ‘पर अभी पूरी नहीं | छूट छूटी।’ मैंने कहा, ‘क्यों? बीबी के साथ तुम भी जूता मारो। तब छूटेगी । ‘ जब उसने खुद अपने को जूता मारना शुरू कर दिया , उसकी नाभि छूट गयी। पर बीबी पहले मानती नहीं थी, जो अपने को अकलमंद समझती थी। बहुत नुकसान उन्हीं का था। घरवालों का था, सब का था। लेकिन जिद कि मैं अपने को जूता ही नहीं मारूंगी। अपने को

बहुत बड़ा समझती थी। और सत्य ऐसी चीज़ है कि आदमी सुनना नहीं चाहता। फौरन आँख चुरायेगा उससे। कोई सत्य बात कहो, फौरन आँख चुरायेगा। क्योंकि वो चाहता है कि सत्य जो हये हैं, असत्य है, वही होना चाहिये । अगर माताजी वही बात नहीं कह रही जो मुझे पसंद है । माताजी बहुत बेकार है। लेकिन जो तुमको पसंद है वो तुम्हारे लिये मंगलमय है या नहीं, वो तुम्हारे लिये हितकारी है या नहीं, ये भी तो सोच लो। अगर नहीं है तो माँ को सही बात बतानी चाहिये ना बच्चों को। कोई माँ ऐसी होगी जो अपने बच्चों से कहेगी कि, ‘जा बेटे, तुझे पसंद है तो आग में अपना हाथ जला के आ जाओ।’ ऐसी कोई माँ आपने देखी है क्या ? कितनी भी बेअकल हो, गँवार हों, दुश्चरित्र हो, कुमाता हो, वो नहीं कर सकती ऐसा काम। तो मुझे क्यों ऐसा सोचते हो आप, कि मैं आपसे कहूँगी की जाओ, आग में हाथ जलाओ। इतनी बड़ी हिम्मत, इतनी निर्भयता, तुम लोगों के प्यार के लिये ही तो कर रही हूँ। नहीं तो बड़े बड़े लोग ये बातें कहने में थर्रते हैं । आप जानते हैं। बहुत सोच समझ कर के, चोरी – छपे, कहीं पे एकाध माँ ने छोड़ दिया। फिर बैठ गयें। खुले आम इस तरह से कोई बात नहीं कर पाता। तुम लोगों की ही हिम्मत ले के मैं बात कर रही हूँ। तुमको भी चाहिये कि जो सत्य है उसी पे खड़े हो । उसको मानो। उसमें हम भी कुछ नहीं । सत्य ही सब कुछ हमारे अन्दर जो है सो है। और हम जो मिथ्या है उसको टूट ही जाने दो| इस तरह का विचार कर के इसमें आगे बढ़ो। फिर देखो तुम कितने सबल होते हो, कितने शक्तिशाली होते हो, जब कोई बड़ा भारी प्रवाह भी होगा तो कोई ऐसी चीज़ होनी चाहिये कि वो उठा सके। वो तार भी तो ऐसे हो जो पक्के, मजबूत हो, जो सत्य के ही कसौटी पे कसे गये हो । और ऐसे जो लोग है, इस तरह से जिन्होंने पाया है, जो इस तरह से मजबूत हो गये हैं। .कर के और सारे संसार के वो खुद तो मजबूत हैं ही, और दूसरों को भी मजबूत कर रहे हैं। दूसरो को भी कल्याण का जो मार्ग है, उस मार्ग पे वो फूल बन के छा जाते हैं। आज भाषण काफ़ी हुआ, लेकिन थोड़ी देर ध्यान में जाना जरूरी है। बगैर ध्यान के तो कोई होती ही नहीं बात।