Gunateet – Beyond the Three Gunas

(India)

Send Feedback
Share

गुणातीत, 13 मार्च, 1975

जिसके होने का है उसी का होगा। अब उसमें ज़रूर है कि होने से पहले बहुतों में बाधाएँ पड़ जाती हैं। आप जानते हैं, गलत हो गई बातें, बहुतों के साथ तो बहुत गलतियाँ हो गईं। इस वजह से बाधा है। लेकिन किसी तरह से इन तीनों के चक्कर चल कर के और फिर पार करना ही है -आज नहीं कल, कल नहीं परसों। यह ऐसी अभिनव चीज़ है, जिसको कि जो देखो सो ही अपना उठा कर के नहीं कह सकता, यह होना पड़ता है – कुंडलिनी आपके सामने चलती हुई दिखाई देनी चाहिए, उसका स्पंदन उठता हुआ दिखाई देगा। अब देखिये – कि जो प्रणव सिर्फ़ हृदय में सुनाई देता है वो आपको throughout करेगा। आप अगर स्टेथोस्कोप (stethoscope) लेकर देखें उस आदमी को, उस आदमी को जब आप देखेंगे कि जिसकी कुंडलिनी ऊपर उठी है तो आपको पता चलेगा कि उसका अनहत अलग अलग अलग अलग points से हो गया।

अब देखिए कि कितना महत्वपूर्ण कार्य है कि त्रिगुण में बंटी हुई यह शक्ति एक शक्ति हो जाए कि जो गुणातीत है – जिसमें गुण नहीं हैं। कितना महत्वपूर्ण यह कार्य है, आज तक यह कार्य कभी हुआ नहीं पहले, और न होगा। लेकिन हमारे पास जो लोग आते हैं वह सब सारे आधे-अधूरे लोग हैं, वो समझते नहीं कि इसका महत्व क्या है। वो तो सोचते हैं कि दूसरी भी संस्थाएँ हैं और यह। दूसरी संस्थाएँ होएंगी – लेकिन सब संस्था इसी में आनी पड़ेंगी –नहीं आएंगी तो वे बेकार हैं। सारी संस्थाएँ जब तक त्रिगुण को गुणातीत नहीं करती हैं तब तक सब व्यर्थ हैं। और अगर वे उसमें रुकावटें डालती हैं तो बिल्कुल ही बेकार। किसी भी संस्था के विरोध में हम नहीं हैं, लेकिन वो संस्था होना चाहिए, माने संस्थापित होनी चाहिए, माणिक – माने यह कि जो इसी कार्य के लिए चल रही है। और जब उसकी रुकावट आ जाती है, उनके विचारों की, उनके excreation(?) की, उनके तौर-तरीकों की, उनके ढंगों की, जब मनुष्य के ascent में रुकावट आती है, तो सारे humanity के ही विरोध में वो संस्था है, सारे समाज के ही विरोध में यह सब संस्था हैं। हमारे यहाँ भी ऐसे बहुत कम लोग हैं जो इसके महत्व को समझ पाये हैं। सालों से रगड़ रहे हैं, पार भी हैं लेकिन इसके महत्व को नहीं समझ पाये। वो भी इधर-उधर चक्कर में ही घूम रहे हैं – बहुत से लोग ऐसे हैं। समझते हैं निकल जाते हैं, आते हैं निकल जाते हैं, फ़िर आते हैं निकल जाते हैं, फ़िर आते हैं निकल जाते हैं। नाम भर के लिए भी बहुत से लोग यहाँ पर हैं, बिल्कुल नाम भर के लिए। असलियत में जो इसे समझेगा, और जानेगा इसको अपने अंदर, वही इस कार्य को, उसका महत्व रखते हुए वो करेगा। लेकिन हमारे यहाँ brainless लोग भी बहुत हैं – उनको कितना भी समझाओ, उनकी खोपड़ी में नहीं घुसता। वो सोचते हैं कि वो बड़े सहजयोगी हो गए।

सहजयोगी का मतलब वो होता है जिसने अपने को गुणातीत में पा लिया हो। वही सहजयोगी है जिसने अपने को गुणातीत में उठा लिया हो। बाकी सब व्यर्थ है – कोई कहता है कि मैं अमका हूँ, मैं ढमका हूँ – सब व्यर्थ है, तुम कुछ भी नहीं हो, तुम गुणातीत में आए हो या नहीं? जैसे ही यह एक test आप अपने ऊपर लगाना शुरू करेंगे, आपका जितना मिथ्या है सब गिरता जाएगा और आप गुणातीत में खड़े रहेंगे। I (आई, मैं) जो है ख़त्म हो जाएगा, I(आई, मैं)।

अब बहुत से लोग बाधा लेकर के आते हैं हर समय। मैंने देखा है कि हमारे यह जो ग्रुप में लोग हैं यह लोग भी बहुत बाधा पकड़ते रहते हैं। किसी के husband (पति) पकड़ते हैं, किसी की wife, किसी के बच्चे। आपको पता नहीं है एक-एक बाधा निकालना कितनी मुश्किल की चीज़ है। जो लोग बाधा निकालते हैं वही जानते हैं – कि कितना problem हो जाता है – कल हमने किसी की बाधा निकाली तो जो हैं दामले थे वो कहने लगे माताजी ऐसा लगता है जैसे यहाँ से किसी ने बिल्कुल काट दिया है, यहाँ से जैसे कोई जला दिया हो। और आप लोग रोज़-रोज़ बाधा लेकर के चले आ रहे हैं। और ऊपर से कहो कि तुम्हारे अंदर बाधा है तो बुरा मानते हो, और घर पर जाकर बुरे काम करते हो। ऐसे लोगों के लिए, जो लोग बाधा निकालते हैं उनके परम उपकार मानना चाहिए। तुमने तो एक भी बाधा आज तक निकाली नहीं, तुम लोग तो एक भी बाधा खुद नहीं निकालते हो और दूसरों पर बोझा डाल रहे हो अपना कि बाधा निकालो, बाधा निकालो! किस लिए निकालें? कोई आपका ठेका ले रखा है?

अपनी सफ़ाई रखो, अपने जीवन को साफ़ करो, अपने मन को साफ़ करो, नम्रता लाओ, और दुष्टता, छल, कपट, इधर-उधर लगाना, बातें करना, शिकायतें लगाना, लोगों को सन्मार्ग से हटाना, इतना महान पाप करना! इसके जैसे लोगों के लिए सहज योग में क्या मार्ग है? यह इतने निम्न स्तर के लोग हैं, आप सोच लीजिये, कि कहाँ तो मैं गुणातीत की बात कर रही हूँ और कितने लोग निम्न स्तर के इसमें टिके हुए हैं। बहुत ही निम्न स्तर के लोग इसमें आ गए, इतने निम्न स्तर के हैं, कि उनको कहीं भी कहीं परमात्मा के पास आने का अधिकार ही नहीं है। जो लोग बाधा निकालते हैं वही समझ सकते हैं, कि यहाँ मैं हज़ारों बाधाओं को निकालती फिरती हूँ, और फ़िर बार-बार आप लोग बाधा पकड़ के यहाँ आते हैं, और आपको थोड़ी सी बात में तो बुरा लग जाता है।

आपको गुणातीत में होना है। आप जब गुणातीत में उतर उठते हैं तो आपको देखते ही बाधा भाग जाती है, बाधा अंदर आ ही नहीं सकती। कम-से-कम इतना तो होना चाहिए कि जो हमारी बाधा निकालता है उसके कुछ उपकार रखो, उसके तक किसी को उपकार नहीं हैं। कल जो case हमने करी थी वो 16-17 साल से लड़का बीमार है, उसके पास हम गए, बिल्कुल बुरी हालत थी, वो थर-थर-थर­-थर कांपने लग गए हमारे सामने। और उसको हमने कोई एक-आधे घंटे में ठीक कर दिया। उसकी बाधा निकल गई दिमाग उसका खुल गया। इससे बड़के कोई इलाज इतना expedite हो ही नहीं सकता क्योंकि आप गुणातीत में उतर जाते हो। अब आप लोग जो बाहर से हो आए हैं, जिन्होंने इधर-उधर की ख़ाक छानी है, जिनके बहुत से self (?) पड़े हुए हैं, बहुत से लोगों को तो साधुओं ने curse करा है, उनकी families की families damned हैं, जिनको damn किया हुआ है ऐसी बहुत सी families हमारे पास आती हैं, उनका इतना उद्धार किया है, इतना उनके लिए किया है, इतनी मेहनत करी, लेकिन वो हमारी बुराई करते रहते हैं, अभी तक। वो हमारा नुकसान ही कर रहे हैं। वो यह नहीं समझ पाते कि गुणातीत में उतरने का कितना महत्वपूर्ण काम को हम कर रहे हैं, उसमें उतरना है जिससे हमारा लाभ होगा। आप मेरे पास आते हैं तो मेरे ऊपर नहीं उपकार कर रहे हैं, आप अपना ही बचाव कर रहे हैं, इसको समझ लीजिये। आपकी अगर हम बाधा निकालते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि आप भी कल ऐसे हो जाइए कि जो आप दूसरों की बाधा निकालें। इस दशा में आप आ जाइए कि आप दूसरों की बाधा निकाल सकें।

लेकिन ऐसे लोग यहाँ पर हैं जिन्होंने एक भी बाधा नहीं निकाली लेकिन बातें बहुत करते हैं। एक भी बाधा नहीं निकाल सकते हैं, रोज़ अपनी ही बाधा लिए आते हैं, किसी की बाधा नहीं निकाल सकते – हिम्मत ही नहीं है निकालने की! ऐसे आधे-अधूरे लोगों के साथ में कैसे काम होगा? ऐसे लोग… जो कि स्वयं की तो बाधा हटवाएँगे, तब तो गुणातीत में होएंगे, और दूसरों के अंदर भी, दूसरों के हृदय में भी ऐसा प्रेम अपना भरें, कि वो भी आपके जैसे गुणातीत हो जाएँ, गुणातीत हो जाएँ। मन में यही विचार आ जाए कि मुझे गुणातीत में उतरना है, बस इतना ही एक मन में विचार आ जाए, और मुझे कुछ नहीं चाहिए संसार से। आप देखिये लगन बहुत हो जाएगी आपको, और एकदम से यह कार्य बन जाएगा। आप इतने शक्तिशाली हो जाएंगे, इतने शक्तिशाली हो जाएंगे, कि आप स्वयं ही इस कार्य को कर सकेंगे। ऐसे ओग हैं हमारे यहाँ, ऐसे भी लोग हैं, यह भी बड़ा… ऐसे तो मैं बहुत खुश हूँ, ऐसे तो किसी भी जन्म में ऐसा नहीं हुआ, जैसा इस जन्म में हुआ। लेकिन इतने बेकार के लोग भी नहीं चिपक गए थे किसी जन्म में, इस जन्म में कुछ तो इतने useless और बेकार लोग चिपके हुए हैं, कभी-कभी ऐसा मन आता है कि किस तरह से इन्हें हटाएँ कि क्या करें? हटा दिया तो पीठ-पीछे और भी नुकसान करते हैं, और साथ में जोड़े रहो तो वो जब भी मौका मिलता है तब डंक मारते हैं। और वो सोचते हैं कि वो बड़े दुखी लोग हैं, दुखी-वुखी कुछ नहीं – उनके अंदर भूत है, बाधा है जो उनको ऐसी बातें सुझाता है। सब गलत काम कर रहे हैं, आपस में jealousy करते हैं, ईर्ष्या गुणातीत…

आप बताइये मैं क्या कह रही हूँ और यहाँ लोग हैं जो आदमी ज़रा ऊँचा उठ जाए तो jealousy करते हैं। अगर jealousy करते हो तो उठो उसके जैसे! पहले तो यह बताओ कि तुम लोगों ने सबने किस-किस ने कितनी बाधाएँ निकाली हैं? यह बात करो! यहाँ पर seniority इसी पर रहेगी कि किसने कितनी बाधाएँ हटाईं, कितनों को पार किया। यहाँ की seniority, government seniority नहीं है कि आपने recommendation कर दिया तो seniority होएगी। कितने लोगों की बाधाएँ आपने निकाली हैं? आपने कहाँ-कहाँ हाथ लगाया? इस पर seniority होएगी, government seniority यहाँ नहीं चलने वाली। वही आदमी सीनियर माना जाएगा जो अपने हाथ में तलवार लेकर के धर्म के लिए खड़ा होगा – प्रेम की तलवार है! इसमें आप कुछ false सर्टिफ़िकेट नहीं दे सकते हैं। कोई गलत बात आप कह नहीं सकते, जब तक वाइब्रेशन्स नहीं आएंगे तब तक नहीं आएंगे, आप चाहे उसमें कितना भी कहो, आएंगे नहीं तो नहीं आएंगे। जब आएंगे तब आएंगे। तब आपको पता हो जाएगा, उसमें कोई शंका नहीं रह जाएगी, कुछ कहने की बात नहीं है। पर आ गए तो आप एकदम से बढ़िया नहीं होने वाले, हाँ अगर ऐसी पूर्व संचित हों, आप बड़े आदमी हों ऐसे कोई, तो हो भी सकते हैं, लेकिन ऐसे बड़े आदमी बहुत कम हैं! अधिकतर साधारण, mediocre लोग हैं, अधिकतर!

उम्र-वुम्र से इसमें कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, किसी भी उम्र में हों, 96 साल के एक साहब एक बार पार हुए थे हमारे यहाँ, अब तो वह रहे नहीं, वैसे आए थे उसके 2-3 साल वो बिल्कुल, ऊपर जब चढ़ के आए थे तो उनको कुर्सी पर लाये थे, बहुत बुरी हालत थी, लेकिन बहुत बड़े जीव थे। आखिरी उनका, समझ लीजिये, समय आ गया था लेकिन वो पार हो गए, पार होने के बाद वो पैदल उतर के नीचे गए, और बहुत बार। वो था एक बहुत बड़ा जीव! उसके बाद 2-3 साल जीवित रहे, और मृत्यु हो गई। उनके, उनके जैसे लोग बहुत कम होते हैं। उम्र से भी नहीं होता है। जिसको यह खयाल आया कि मेरा उम्र ज़्यादा है, वो गया काम से! परमात्मा के लिए उम्र-वुम्र कुछ नहीं होता उसके लिए समय होना चाहिए। सिर्फ़ गुणातीत में उतरने का इतना अच्छा तरीका आज आया हुआ है, इसको अगर आप मान्य नहीं करेंगे, और इसको स्वीकार्य करके इसके अंदर उतरेंगे नहीं, और इसको सबल नहीं करेंगे, और इसमें आप समर्थ नहीं होंगे, तो हो सकता है कि सारे संसार का संहार हो जाये और दूसरी कोई रचना हो जाए। चलिये वो भी मंज़ूर हैं हमें, हमको तो वो भी मंज़ूर है, लेकिन आप लोगों को मंज़ूर है क्या? इसीलिए समझा रही हूँ कि अपने awareness में, अपनी चेतना में ही यह गुणातीत की स्थिति आप पाइए। वैसे लोग show-off करते हैं बहुत ज़्यादा, बहुत show-off करते हैं, ऐसा दिखाते हैं कि आ-हा-हा-हा, इनसे बढ़के कोई dedication में है ही नहीं। लेकिन माँ तो सबको जानती है अंदर-बाहर में, तुम्हारी कुंडलिनी ही तुमको खूब अच्छे से जानती है, वही तुमको बता सकती है कि तुम गुणातीत में हो या नहीं, तुम गुणातीत में उतरे हो या नहीं। ध्यान में होना माने गुणातीत में रहना – गुणों से परे! सर्वगुणों से परे जब आप हो गए, तभी तीनों गुण आपके अंदर से बहना शुरू हो जाते हैं, कि आप चेतनामय हो जाते हैं, आप प्रणवमय हो जाते हैं, और आप उठ जाते हैं, ascent कर जाते हैं, उत्थान हो जाता है! क्योंकि आप दूसरों का भी उत्थान करते हैं।

जब तक आदमी ऊँचा नहीं गया नीचे वाले को कैसे खींचेगा? इसकी पहचान यह है कि आप ऊंचे चले गए क्योंकि आप दूसरे को भी अपने साथ ऊपर खींच रहे हैं। यह शक्ति भी आपके अंदर आ जाती है कि आप किसी की ओर जैसे हाथ गलती से भी कर दें तो उसकी कुंडलिनी जागृत हो जाएगी। आप बैठे-बैठे देखिये किसी को ऐसे धीरे से कर दीजिये देखिये उसकी कुंडलिनी जागृत हो जाएगी। यूं करते ही कुंडलिनी किसी की जागृत हो, कितनी बड़ी कमाल की चीज़ है, बड़े-बड़े साधू-संतों, और इनको बैरागियों को नहीं हुआ, जो तुम लोगों को हुआ है – तुम यूं करके ऐसे कर दो, कुंडलिनी जागृत हो जाएगी। उँगलियों के इशारे पर जब कुंडलिनी घूमने लग गई, तब भी अपना महत्व नहीं समझे तो क्या करें, तब भी वही रहे। मराठी में कहावत है कि, “आधि होती दासी, राज्यपद चाले, तिचे हिंदणे राहिले”। पहले दासी थी, उसको रानीपद आ गया, लेकिन उसका घूमना-फिरना जो था दासी जैसे वो नहीं गया, वैसा ही है। तुम राजा लोग हो, तो तो राजा बन जाते हैं, कोई मुश्किल नहीं, पर दासी लोगों को रानी बनाना मुश्किल काम हो जाता है, उनका दिमाग तो भी घूमते रहता है, और वो अपने घूमने को ही बहुत बड़ी चीज़ समझते हैं कि वाह! वाह! वाह! वाह! क्या चार चाँद लगाए हैं। प्रगति उनके अंदर से कुछ भी नहीं होती, किसी तरह से साफ हो गए किसी तरह से, फ़िर पकड़ गए, फ़िर साफ हो गए फ़िर पकड़ गए, बिल्कुल कुछ प्रगति नहीं बस यूं ही चलते रहते हैं डांवाडोल, किसी की बाधा-वाधा कुछ नहीं निकाल सकते, लेकिन अपने को बहुत बड़ा आदमी समझे बैठेंगे, बड़ा मुश्किल काम है!

आपका सर्टिफिकेट सिर्फ़ इस पर है कि आपने दूसरे की कितनी बाधाएँ निकाली। बस! यह समझ लीजिये। गुणातीत का सर्टिफिकेट इसपे है कि आपने कितनों को realization दिया है। हर एक दिन तो आप बगैर कुछ सोचे-समझे ही सबको दे सकते हैं। आपने छोटे बच्चों को भी देखा है कि यूं कर देते हैं तो चली जा रही है ऊपर कुंडलिनी खड़-खड़ खड़-खड़ खड़-खड़ खड़-खड़! उसमें कोई विशेष नहीं। लेकिन कितने लोगों को realization दिया? कितनों की आपने बाधाएँ निकाली? आप क्या सबकी बाधाएँ निकाल सकते हैं? हर प्रकार की बाधा को आप हाथ डाल कर निकाल सकते हैं? अगर आप निकाल सकते हैं तो आप कमाल के हैं। बहुत से लोग यहाँ पर आए थे इतने बाधा से पीड़ित, कुछ तो पागलखाने से आए थे, और वो ऊपर उठ गए। और यह जानना चाहिए कि हमारे पूर्व जन्म के भी बहुत से हमारे ऊपर शाप हैं, हमारे कर्मों के बहुत शाप हैं। फिर इस जन्म में भी बहुतों को, इन गंदे लोगों ने शापित किया है, खानदान के खानदान तबाह हैं। इसलिए अपने को गुणातीत में समर्थ बनाओ। तो सारी-की-सारी अपने आस-पास की बाधाएँ भाग कर खड़ी हो जाएंगी, सब कुछ भाग जाएगा, सब कुछ शांत हो जाएगा, और आप एक समर्थ राजा के जैसे राजा बनेंगे। कोई भी बाधा आप के ऊपर छूने नहीं वाली, आप एक बार बाधा को हाथ लगा कर भगाना तो देखिये, झाड़ू मारना सीखिये! किसी तरह की भी बाधा आप के आस-पास में टिकने नहीं वाली। अभी देखिए, इनका एक किस्सा सुनाएँगे, अभी 2-3 रोज़ हुए आए हैं, 4-5 हुए, उस दिन को मिले। इनकी wife पे बहुत बड़ी बाधा थी, उदाहरण के लिए, और यह पार हो गए लेकिन इनको बीवी की अपनी बाधा पकड़ ली। मैंने इनको जूते का हिसाब बताया – मैं जब भी देखती हूँ जूते मार रहे होते हैं। और अब यह इतने साफ़ हो गए हैं – इनको मालूम है कि जूते से बाधा भागती है। तो बीवी का नाम लिख के, अपना नाम लिख करके रोज़ बाधा मारते रहते हैं, बाधा निकालते रहते हैं। साफ हो गए हैं अभी देखिए साफ़-साफ़ बैठे हुए हैं, वाइब्रेशन्स आ रहे हैं, कोई प्रॉब्लम नहीं, कोई आफ़त नहीं, कोई कुछ नहीं। जैसे ही हिम्मत कर लीजिये वैसे ही पहले तो बाधा भाग जाएगी। सिर्फ हमारे कुंकुम के नाम से यह डरपोक लोग भागते हैं, इनमें कोई शक्ति है? आप किस चीज़ के लिए डर रहे हैं? आप सिर्फ कह दीजिये कि इसको अभी भगाता हूँ तो भाग खड़ी होएगी पहले ही थर-थर कांपना शुरू कर देगी। ऐसी कोई घबराने की चीज़ नहीं है बाधा, लेकिन आपकी शक्ति पे बहुत निर्भर होता है। इसलिए हर बार गए बाधा पकड़ के आ गए, फिर आए फिर ठीक हो गए, फिर आए फिर पकड़ आए, फिर – यह क्या तमाशा चला है – धोबी का घर! कभी कपड़े पहनने का मौका ही मुझे नहीं मिलता है, जब भी देखती हूँ तो यह अपना ही यह पकड़े चले आ रहे हैं… (break in recording)

आसानी से, इतने प्रेम से, इसमें हँसते-खेलते आप लोग, कोई भी उसमें गंभीर बात नहीं, कोई भी उसमें दुखदाई बात नहीं, आप दुखी हैं अपनी ही वजह से, क्योंकि आप अपने बारे में कुछ कल्पना कर बैठे हैं, वैसी कोई बात नहीं है, आप स्वयं चैतन्य स्वरूप हैं और आप हो सकते हैं – हर घड़ी आप हो सकते हैं, हर क्षण आप से योग बना हुआ है, अगर नहीं होते तो क्यों होते आप, आप छू गए, खुल गए…

मेरी ओर ऐसा हाथ करें – हाँ अगर किसी को कोई प्रश्न हो तो पूछ लें आज, अगर किसी को प्रश्न हो तो, कल फिर मैं नहीं आऊँगी, यहाँ पर हालांकि ध्यान होगा, जिसको आ सकते बनेगा आइये, आपस में बातचीत करें, आपस में पूछें, आपस में सीखें और आपस में जान लें, यहाँ बहुत जानकार लोग आते हैं। सब लोग आपस में मिलकर के इसे सीख लें और इसके मास्टर बनें, जितने लोग आएंगे उतना ही उनको फायदा होगा। अच्छा यह बताइये, आपको कोई प्रश्न हो तो पूछिए…

साधक – माताजी आपने बोला कि दूसरा बाधा डाल देता है, हम तो ऐसे ही सुने हैं, और पढ़े हैं या सीखें हैं, कि भई अपना ही कर्म बाधा देता है, कोई दूसरा किसी को हानि नहीं…

श्री माताजी – वो दोनों चीज़ साथ चलती हैं। देखो, ऐसा है अगर तुम आँचल संभाल के चलो, तो तुम्हें कीचड़ नहीं लगता, लेकिन अगर तुम आँचल फैल के चलाओ, तो कीचड़ लग जाता है। दोनों ही चीज़ – हम ही अपना कपड़ा गंदा करते हैं, पर गंदगी भी तो कपड़ा गंदा करती है! दोनों चीज़ – mutual, जैसे समझ लो, तुम्हारे अंदर, तुम कहीं खड़े हो, अब कोई हमारे विरोध में बात कर रहा है, समझ लीजिये, सहज योग के विरोध में बात कर रहा है, तुम लोगों ने उसके साथ हाथ जोड़ लिया, हाँ भई ठीक है क्या कह रहे हो, हो गया, तुम पकड़ गए! गंदगी तुमको पकड़ गई, पर दूसरे ने भी डाल दी! अगर तुम पूर्णतया समर्थ हो तो कुछ नहीं पकड़ सकता। संस्कृत में एक श्लोक है – ‘या नवे भांडने लग्न संस्कार:’। यानि यह है कि बर्तन जो है उसको, मिट्टी का बर्तन है उसको जब तक पूरी तरह भूञ्ज नहीं लिया जाता, तब तक उसमें संस्कार लगते जाते हैं। और जैसे ही वो भूञ्ज के पूरा तैयार हो जाता है उसमें कोई संस्कार नहीं लगता। ऐसी चीज़ है, कि अभी-अभी तुम realized हुए हो, अभी-अभी छोटे से बच्चे हो, अभी तुम पर कोई भी असर पड़ सकता है! लेकिन जब तुम बिल्कुल स्थिर हो जाओगे तो कुछ नहीं बाधा आएगी, फिर तुमको लगेगा कि ठीक है इस घड़े पे कुछ है धो डालेंगे। यह घड़ा, तुम अलग हो जाओगे। इस घड़े को सोचोगे, इस यंत्र को सोचोगे, यह यंत्र है, यह मेरी मोटर है, इसमें सफाई करने की है, चलो ठीक है। फिर दूसरा इसको गंदा कर सकता है, आप नहीं कर सकते। दूसरे ने इसपे गंदगी डाल दी अब दूर से, आप उसको साफ कर देंगे, आपका कोई involvement नहीं। ऐसे हमने देखे हैं, यदि मैंने आपसे अमरनाथ के बताया था…उन्होंने कहा माताजी देखिये आज मेरा आज्ञा चक्र पकड़ा है, और विशुद्धि चक्र पकड़ा हुआ है। हालांकि बहुत पहुँचे हुए पुरुष हैं सहज में, लेकिन उन्होंने कहा आज पकड़ा है मेरा।

अवतार में, और मुनुष्य में, यही अंतर है, यह बड़ा भारी अंतर होता है। जैसे कि आपका आज्ञा चक्र अगर पकड़ा, तो आपको वो दुख देगा, आपके लिए नुकसान करेगा, आपको परेशान करेगा। लेकिन अवतार का अगर आज्ञा चक्र पकड़ा है तो उसकी डबल शक्ति बढ़ेगी, ट्रिपल बढ़ेगी, four times। और उसका आज्ञा चक्र पकड़ा है माने के उसके आज्ञा चक्र में हज़ार गुना ज़्यादा सैन्य तैयार हो गए। उसको अगर बुखार आ जाए, तो हज़ारों लोगों के बुखार उस बुखार से ठीक हो जाएंगे। उसके अंदर antibodies तैयार होंगी, यही फ़र्क है। अभी तक कोई मनुष्य अवतार नहीं बना है। इसीलिए कहते हैं कि बड़ों के पैर दबाने चाहिए, अगर आपने बड़ों के पैर दबाये, तो बड़ों के अंदर के जो, जो दुख हैं, वो हमारे अंदर सुख बन के आ जाते हैं। यही बात अवतार के अंदर है, कि अवतार, एक शरीर में, जहाँ पर भी कोई चीज़ ज़्यादा हिलने लग जाती है वहीं वहाँ ज़्यादा शक्तियाँ भ्रमित होती हैं। antibodies तैयार हो जाती हैं और वो जा कर के ख़त्म कर देती हैं। जैसे एक यह है कि मुंबई शहर में समझ लीजिये बहुत ज़्यादा ज़ुकाम हो रहा है। तो कोई अगर अवतार हो तो उसको भी ज़ुकाम हो जाएगा। और उसके ज़ुकाम के कारण सबका ज़ुकाम ठीक हो जाएगा। Antibodies तैयार हो जाती हैं, जैसे आप जानते हैं न वो virus infection जैसे है, अपने inoculation वगैरह देते हैं, vaccination, वही चीज़ है। यही अंतर है एक अवतार व्यक्ति में और एक साधारण व्यक्ति में। वैसे अनेक अवतार हुए लेकिन पता ही नहीं चला लोगों को, कौन हुए थे – बाद में तो पता चल ही गया! किसी-न-किसी कारण हरेक ने खोज ही लिया कि कौन कैसे अवतार हुआ। और कोई प्रश्न है तो पूछ लीजिये।

साधक <अस्पष्ट>

श्री माताजी – क्या? Colitis में? आप हमारे पास आए थे क्या meditation करने?

साधक <अस्पष्ट>

श्री माताजी – कब आए थे?

साधक <अस्पष्ट>

श्री माताजी – पर आपके एक ही दो दिन आने से तो नहीं होगा न बेटे! आपको अगर colitis है, तो आप ऐसा करिए, कि एक हाथ colitis जहाँ पर है वहाँ पर रखें, और एक हाथ हमारी ओर। पहले अपना colitis ठीक कर लो, उसके बाद में पार हो जाओ! वो कुंडलिनी खुद ही नहीं उठने वाली, वो तो तुम्हारी माँ है न मुझे सताती है, कि पहले इसको ठीक करो, तभी मैं उठूँगी। उसिलिए मैं तुम लोगों को ठीक कर रही हूँ, नहीं तो मैं कोई डॉक्टर थोड़ा ही न हूँ!

साधक Left hand रखें?

श्री माताजी – Left hand रखिए। पर ऐसे भी मैंने बहुत से लोग देखे हैं जो कि बिल्कुल मरणासन (पर) थे, deathbed पर! और मैं वहाँ गई, और उन्होंने कुछ अपनी बीमारी के बारे में नहीं सोचा, पार हो गए, उनकी बीमरी भी ठीक हो गई, और वो भी ठीक हो गए, और बाहर घूम रहे थे। ऐसे भी लोग मैंने देखे हैं, यह तो अपने-अपने चित्त की बात है। अगर आपके लिए शरीर महत्वपूर्ण हो, तो फिर घोटाला हो जाता है। जो ऐसे सोचे कि होय चाहे नहीं हो मुझे क्या करने का है? शरीर मेरा ठीक हो चाहे नहीं हो मुझे तो पार होने का है, वो तो ठीक होना ही हुआ, automatically, लेकिन वो पार भी हो जाता है।

कोई प्रश्न हो तो पूछें।

अधिकतर जो पार हो गए उनको प्रश्न ही कम रहेंगे। जो ज़रा पार नहीं हुए उनके अंदर प्रश्न ज़्यादा रहेंगे, क्योंकि निर्विचारिता आने के बाद नहीं आता है न इतना!

साधक <अस्पष्ट>

श्री माताजी – नहीं मतलब घर में अगर आपके यहाँ देवी-देवताओं के फोटो हैं (तो) अच्छी बात है,उसमें कोई हर्ज़ नहीं।लेकिन देवी-देवताओं के भी फोटो जो मनुष्य ने बनाई हैं, वो परमात्मा में लीन होकर बनाए हुए हैं। इसलिए वो बहुत अधिकतर photographs जो होती हैं वो exactly बनाते ही हैं, कि जैसे हैं ही, जैसा उनका स्वरूप अपने अंदर है, वैसे बनाते ही हैं – लेकिन वैसा नहीं होता है। अधिकतर मैं देखती हूँ, कि वैसे चित्र बहुत ही कम होते हैं, अधिकतर। और उसका कारण यह है कि जहां से आप खरीदते हैं, उस दिन मैं खरीदने गई थी एक चित्र, मैंने कहा कि वह ले आएंगे, उस चित्र का कुछ उपयोग था, तो वहाँ देखा तो जहाँ चित्र बिक रहा था वो आदमी खुद ही बाधा में था। और वो भगवान के फोटो के साथ राक्षसों के भी फोटो बेच रहा था। तो वहाँ पर इतनी गंदी-गंदी बाधाएँ थीं कि एक फोटो मुझे कायदे का मिला। फिर उसमें से एक फोटो मैंने खरीदा मैंने कहा चलो इसको भी ले चलते हैं घर पर देखेंगे। फिर बड़ी मेहनत करी, यह किया वो किया, भगवान के फोटो में कोई चप्पल भी नहीं मार सकता है क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर मैंने कहा छोड़ो इसको विसर्जन करो, किसी अपने realized आदमी से, कोई आर्टिस्ट या कोई फोटो बनवाएंगे तब ठीक होएगा, वैसे तो बनने नहीं वाला।

ऐसा होता है, इसलिए अब आपके फोटो में वाइब्रेशन्स कैसे हैं वह पहले देख लो, अब यहाँ तक है कि अभी परसों पूजन हुआ था यहाँ पर आप जानते हैं, तो इन लोग मंगल सूत्र लेकर आए, मैंने कहा था मैं कोई लूँगी नहीं कोई भी सिर्फ़ artificial चीज़ लेकर आना token के तौर पर, तो एक प्लास्टिक का मंगल सूत्र ले आए। अब लाकर पहना दिया मेरे को, वो फूल गली में से खरीद कर लाये थे। अब उसमें इतने गंदे वाइब्रेशन्स थे कि मेरी यहाँ पर बहुत सारी antibodies तैयार हो गयीं, यह जो नाभि की, अपना विशुद्धि चक्र। इधर में एकदम से antibodies तैयार हो गईं। तो मैंने कहा कहाँ से पता नहीं क्यों यहाँ पर इतने ज़ोर से श्री कृष्ण एकदम से जागमान, ज़ोर मार रहे हैं, क्या हो गया, कौन ऐसे शत्रु आ गए इधर में, किसको मारने निकले हैं? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसके बाद दो-तीन दिन मैंने पड़ताला, मैंने कहा देखें क्या चीज़ है क्या नहीं है आखिर, मैंने सोचा कोई, बाहर कोई बात हो रही है कि क्या बात है? उसके बाद मैंने वो मंगल सूत्र को देखा मैंने कहा अरे! इसी में तो गंदे वाइब्रेशन्स हैं, फिर उसको निकाला। फिर जिनसे कहा वो फिर उन लोग के सबके हाथ जलने लग गए। कहने लगे, “माताजी! आपने कैसे यहाँ बर्दाश्त किया पता नहीं!” हमने कहा हमारा क्या बर्दाश्त करना, वो तो हमारे दानव (या तांडव) सब लोग थे तो…और उसमें सब कृष्ण के दुश्मन सब वही हैं, मेरे गर्दन में आ कर फंस गए तो वो अपना खुद ही मारे डाल रहा था, मेरे तो कुछ करने का है ही नहीं।

तो वाइब्रेशन्स तो खराब होते ही हैं, तो बहुत से लोगों के होते हैं। अब यहाँ जो सहज योगी लोग आते हैं आप क्या सोचते हैं सबके बड़े अच्छे वाइब्रेशन्स होते हैं? आकर बैठते हैं यहाँ औरतों को भी कुछ-कुछ देखते हैं लोग! बुड्ढे-बुड्ढों को मैंने देखा है। ऐसे भी गंदे यहाँ आते हैं। उनके भी वाइब्रेशन्स खराब होते हैं। कोई सहज योगी हो जाने से, माताजी के पास आने से सब कोई महा-पवित्र नहीं हो जाते। अंदर से पवित्रता आनी चाहिए। ऐसे मैंने बहुत से देखे हैं लोग। उनकी नज़र इधर-उधर चलती रहती है। मन में गंदे-गंदे विचार आते रहते हैं, planning होते रहता है कि माताजी का काम कैसे खत्म करें। ऐसे भी बहुत से लोग हैं। और वो अपने को अपनी ही दिशा-धुन में रहते हैं, वह सोचते हैं कि माताजी दूसरे के लिए कह रही हैं, हमारे लिए नहीं कह रहीं। ऐसे भी होते हैं, सब तरह के लोग होते हैं।

इसी तरह से परमात्मा की भी बात है। अभी ऐसे देखिये तो अपने जितने भी चिरंजीव हैं, वो हैं ही। फिर अपने जितने भी बारह अंग आप जानते हैं कि गणपति हैं, वो कहीं हैं, उसमें कोई बात नहीं, बहुत वाइब्रेशन्स हैं उनमें, कोल्हापुर की भवानी हैं बहुत वाइब्रेशन्स हैं, यहाँ माउंट मेरी की जो जगह है इसमें बहुत वाइब्रेशन्स हैं, बहुत ज़्यादा, इसमें भी वाइब्रेशन्स हैं। कहीं भी जाइए, यह महालक्ष्मी के temple में, यहाँ भी बहुत वाइब्रेशन्स हैं, मुम्बा देवी में बहुत वाइब्रेशन्स हैं, सभी जगह। पर उसके सामने ही यह भूत बैठे हुए हैं। वो आप जाते ही साथ आपके टीका लगा देंगे, लगाओ आप पैसा बस! आपने भूत पाँच रुपये में खरीद लिया जाओ, मरो आप! वो तो बेचारे अपने बैठ गए अपनी जगह में, मंदिर वाले, और आपके मिल गए यह भूत। यह ऐसे ही सब है। यहाँ सिद्धिविनायक बहुत पहुंचे हुए हैं, इनको भी मैंने जागृत किया है… (break in recording)

साधक <अस्पष्ट>

श्री माताजी – गुणातीत, याने तीन गुणों से परे! तीन गुण माने मैंने कहा कि एक गुण से जो है आप स्थित होते हैं, प्रणवस्वरूप। दूसरे गुण से, जिससे कि आत्मा के स्वरूप भी होते हैं, और दूसरे गुण से आप conceptive होते हैं, जो आपके पेट के अंदर में, आपने देखा है जितनी भी शक्तियाँ हैं, वो वह शक्ति है, जिससे आप creative होते हैं। तो एक शक्ति वह है जिससे आप स्थित होते हैं, जिसको हम प्रणवरूप कह सकते हैं, दूसरी शक्ति वो जो है जो पेट में कार्य करती है, जो कि दो sympathetic nervous system हैं – एक तो left और एक right. पहली वाली left है, दूसरी वाली right. और तीसरी जो है वो parasympathetic nervous system है, जो बीचोंबीच है। यह आपकी evolutionary है। यह evolutionary शक्ति आपको चेतन मन में नहीं होती है, आपका evolution आज तक का जो है चेतन मन से नहीं हो रहा है, unaware हो रहा है। लेकिन जब आप सहज योग से पार हो जाते हैं, माने आपकी कुंडलिनी जो आपके अंदर शक्ति बैठी हुई है वही evolutionary शक्ति है, वो use नहीं होती है, वो residual होती है, वो रुकी रहती है, वो कभी इस्तेमाल नहीं कर सकते आप। वही उठती है और आपको ऊपर में वहाँ ढकेल देती है आज्ञा चक्र को तोड़के, जहाँ पर आप गुणातीत हो जाते हैं, जहाँ तीनों चक्र एक जगह मिल जाते हैं। तीनों शक्तियाँ एक जगह मिल जाती हैं, आप integrated हो जाते हैं। इसीलिए आपके अंदर से हाथ के वाइब्रेशन्स बहते हैं, प्रणवरूप, पहली, आप प्रणवरूप हो जाते हैं। दूसरे creative power आपके अंदर आ जाती है जिसके कारण आपकी जितनी physical शक्तियाँ हैं वो ठीक हो जाती हैं, आपकी तंदुरुस्ती ठीक हो जाती है। Creative power आपके अंदर पूर्ण होने लगती है कि आपकी कार्य की जितनी भी शक्तियाँ हैं वह ठीक हो जाती हैं, आप creative हो जाते हैं, आप दूसरों की कुंडलिनियाँ भी देखने लग जाते हैं। और तीसरी शक्ति जो आपके अंदर आ जाती है वो है वो आप खुद evolve हो जाते हैं, आप खुद ascent कर जाते हैं, आप ऊंचे उठ जाते हैं। उसकी पहचान यह है कि आप दूसरे को हाथ पकड़ के उठा सकते हैं। यह तीनों शक्तियाँ एक हो जाती हैं गुणातीत में। इसलिए निर्विचारिता में जब आप पहुँच गए, तो आप गुणातीत में गुणों से परे चले गए, आपकी तीनों ही शक्तियाँ integrate हो करके आपके अंदर से बहने लगती हैं।

(In Marathi…) आपका एक-आधा अगर कोई विशेष point है तो कहिए। Particular point नहीं समझा तो वह बताइये। क्योंकि ऐसे general कहने को तो बहुत कुछ है, टेप में कहा है मैंने, आप टेप सुन लीजिये। (Marathi ends) इसमें टेप जबकि बहुत important है, आज तक मैंने यह बात पहले नहीं बताई थी, कि realization में क्या चीज़ होती है, कि तीनों शक्तियाँ कैसी गुणातीत होती हैं। इसलिए उसको आप सुन लीजिये।

साधक <अस्पष्ट>

श्री माताजी – हाँ वही।वो fourth dimension है। तीन dimension में आप सत्वगुण में भी रहते हैं, और रजोगुण में रहते हैं, तमोगुण में रहते हैं। तमोगुण से आप स्थित रहते हैं, रजोगुण से आप activate करते हैं, और सत्त्वगुण से आप evolve होते हैं। Human stage तक आप evolve हो गए। या धर्म की भावना आपके अंदर आती है, रजोगुण से आप यह सोचते हैं कि इसके परे कोई चीज़ है, abstract की बात आप करते हैं, इस संसार से परे कोई चीज़ है, उसकी ओर दृष्टि जाती है आदमी की, यह सत्त्वगुण से जाती है। जानवर कभी नहीं सोचता है धर्म की बात। Fourth dimension आदमी में तब छूता है जब वह गुणातीत में उतरता है। यह fourth dimension है। माने तीन dimensions तो पहले मैंने आपसे बता दिये, इन तीन गुणों के, और fourth dimension तब है जब आदमी सारे ही इन तीनों से परे निर्विचार में उठ जाता है, universal unconscious में होता है, universal unconscious में। जिसे कि psychologists Id कहते हैं, आई (I) डी (D) Id. यह psychologists ऐसा कुछ नहीं मालूम बेचारों को अभी छोटे-छोटे हैं। थोड़ा-बहुत जानते हैं इधर-उधर का पकड़ा हुआ है, वो बताते रहते हैं। सम्यक पूरा वो कैसे जानेंगे उनको माँ ने उनको थोड़ा ही न… वो भी खोज रहे हैं, बच्चे हैं, लेकिन थोड़ा-थोड़ा जानते हैं। अब जो लोग एक रस्ते से आना शुरू कर जाते हैं वो मार्ग को काट डालते हैं। उसके लिए आपके लिए बना के रखी है कुंडलिनी, आपके अंदर बैठी हुई है चुपचाप, उसको आप इस्तेमाल कभी भी नहीं कर सकते, वो कभी भी उठ नहीं सकती। जब आपका evolution होगा, ascent होगा, तभी वह उठती है और आपको गुणातीत में फेंक देती है।