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Bharatiya Vidya Bhavan, मुंबई (भारत)

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Updesh – Bhartiya Vidya Bhavan- 1, 17th March 1975 Date : Place Mumbai Seminar & Meeting Type Speech Language Hindi

( … अस्पष्ट) उन सब के बारे में काफ़ी विशद रूप से मैने आपको बताया है। और जिस चैतन्य स्वरूप की बात हर एक धर्म में, हर समय की गयी है उससे भी आप में से काफ़ी लोग भली भाँति परिचित हैं। उस पर भी जब मैं कहती हूँ कि आप गृहस्थी में रहते हो और आप हठयोग की ओर न जायें, तो बहुत से लोग मुझसे नाराज़ हो जाते हैं। और जब मैं कहती हूँ कि इन संन्यासिओं के पीछे में आप लोग अपने को बर्बाद मत करिये और इनको चाहिये की गृहस्थ लोग दूर ही रखें। तब भी आप लोग सोचतें हैं कि माँ, सभी चीज़ को क्यों मना कर रहे हैं।  ऐसे तो मैं सारे ही धर्मों को संपूर्ण तरह से आपको बताना चाहती हूँ। इतना ही नहीं, जो कुछ भी उसमें आधा-अधूरापन भापित होता है उसको मैं पूर्ण करना चाहती हूँ। मैं किसी भी शास्त्र या धर्म के विरोध में हो ही नहीं सकती। लेकिन अशास्त्र के जरूर विरोध में हूँ और अधर्म के। और जहाँ कोई चीज़ अधर्म होती है और अशास्त्र होती है, एक माँ के नाते मुझे आपसे साफ़-साफ़ कहना ही पड़ता है। बाद में आपको भी इसका अनुभव आ जायेगा  कि मैं जो कहती हूँ वो बिल्कुल सत्य है, प्रॅक्टिकल है। जब आप अपने हाथ से बहने वाले इन वाइब्रेशन्स को दूसरों पे आजमायेंगे, आप समझ लेंगे, कि मैं जो कहती हूँ बिल्कुल सच बात कहती हूँ।  और पूर्णतया आपके हित के लिये और आपके उत्थान के मार्ग के व्यवस्थित रूप से प्रकाशित होने के लिये कहती हूँ। यही एक बड़ी शोचनीय स्थिति है  कि मानव सत्य को लेने में बहुत टाइम लगाता है। अगर झूठ कोई फैलाये तो मनुष्य उसे बहुत जल्दी मान लेता है। या कोई ऐसी चीज कि जिससे उसकी कमज़ोरियों को प्रबलता मिले या उसके अहंकार को पुष्टि मिले  तो मनुष्य उसको बहुत जल्दी आत्मसात कर लेता है। 

पर आज मैं आपसे थोड़ा सा हठयोग के बारे में और सांख्य के बारे में कहूँगी। क्योंकि शंकराचार्य ने भी साफ़ कहा है कि ‘न योगेन न सांख्येन’। योग और सांख्य से आपको आत्मसाक्षात्कार नहीं है। इसलिये, मैं कोई ये बात पहली मर्तबा नहीं कह रही हूँ। ऐसे अनेक मर्तबा लोगों ने कहा और आप जितने भी धर्म पुरुषों की ओर देखे तो किसी ने भी संन्यास नहीं लिया था, सिवाय नाथ पंथियों के। और उनका भी बड़ा बिकट मार्ग था। आप जानते हैं कि जनक राजा थे। और राजा जैसे रहते थे, लेकिन उनको लोक विदेही कहते हैं। इसलिये जानकी जी को वैदेही कहा जाता है। आप जानते हैं कि नानक भी विवाहित थे, और कृष्ण ने भी विवाह किया था । राम ने भी विवाह किया था और आप ही जैसे एक संसार के एक परिवार प्रिय  हुए लोग थे। किसी ने भी संन्यास आदि नहीं लिया, ना ही कहीं इन लोगों  ने योग को इतनी मान्यता दी। सिर्फ पतंजलि ने योग पर विशेष रूप से ध्यान दिया। लेकिन पतंजलि को भी लोग पढ़ते नहीं हैं। ये तो फिफ्थ हैंड, सिक्स्थ हैंड इन्फर्मेशन जो आती है योग के बारे में, उसी को मान लेते हैं। और उसी को विशेष समझ कर के और योग, जिसको की हठयोग कहते हैं वो करने लग जाते हैं। परिवार में जो सामान्य तरह के लोग रहते हैं, उनके लिये तो हठयोग अत्यंत हानिकारक होता है। अब वो क्यों होता है?  कैसे होता है?  ये मैं आपको समझाती हूँ। आप लोग ओपन माइंडेड से बैठे। दिमाग खोल के बैठेंगे तो आप अभी मेरी बात समझ जायेंगे।  मानव की जो शक्तियाँ हैं वो सीमित हैं। वो शरीर के अन्दर सीमित की गयी हैं। जब तक उसे आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है, जब तक उसका कनेक्शन उस सर्वव्यापी शक्ति से नहीं होता है, तब तक उसकी शक्ति जो है वो सीमित होती है। जैसे एक बैटरी का सेल है। जब तक बैटरी के सेल पे चीज़ चलती रहेगी, तब तक उसकी सीमित शक्ति रहेगी। पर अगर उसका कनेक्शन इलेक्ट्रिकल बेल से लगा दिया जायेगा, तो शक्ति पूरी समय आती रहेगी। मैं इसलिये बिल्कुल मॉडर्न बातों में समझाती हूँ, कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में हम इसे देख सकते हैं। अब जब आप हठयोग करते हैं तो उसमें ह और ठ दो नाड़ियों का वर्णन है। जिसे की सूर्य नाड़ी और चंद्र नाड़ी ऐसे कहते हैं। जिसे की हमारे यहाँ सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम कहते हैं। इन दो नाड़ियों को जब आप इस्तेमाल करने लगते हैं, जिसे इड़ा और पिंगला नाड़ी कहते हैं। इन दो नाड़ियों के उपयोग में हम हमारे पास जो सीमित है, बिल्कुल ही जो सीमित एनर्जी हैं, उसको इस्तेमाल करते हैं। जिस वक्त में हम ये कहते हैं कि हम शारीरिक व्यायाम आदि करते हैं तो वो समझ लेना चाहिये कि हम हठयोग तो कर ही नहीं रहे हैं। हम सिर्फ ‘हा’ योग कर रहे हैं। 

हठयोग का मतलब होता है कि उसकी जो छ: चीजें हैं वो पूरी करनी पड़ती है। यम, नियम आदि आप जानते ही हैं। वो जब तक आप पूरे नहीं कर रहे हैं तब तक आप बिल्कुल पार्शल योग कर रहे हैं और वो भी आप सिर्फ आपका ‘हा’ नाड़ी माने सूर्य नाड़ी का काम कर रहे हैं। सूर्य नाड़ी से आपका शरीर बढ़ सकता है और आपकी मेंटल कपॅसिटी शायद बढ़ जाये। लेकिन हम लोग तो कम से कम तीन चीज़ हैं ही। एक तो हम मेंटल हैं, इमोशनल  हैं और फिजिकल हैं। तो अगर हमने इन दो चीज़ों पर, विशेषत: शरीर पर, पूरी अपनी अगर सीमित शक्ति को अगर खींच लिया,  तो जो हमारी इमोशनल नाड़ी है, जिसको चंद्र नाड़ी कहते हैं, वो पूरी तरह से शुष्क हो जाती है। उसका सारा ड्रेन होते रहता है। वहाँ से सारा खींचते जाता है और वो आता है हमारे शरीर पर। और जब वो हम अपने शरीर के बढ़ाने के लिये उसका उपयोग करते हैं, तो जो हमारा इमोशनल बीईंग है वो बिल्कुल ही शुष्क हो जाता है। इसलिये आपने देखा होगा कि अधिकतर जो योगी लोग होते हैं एकदम बिल्कुल निष्ठर स्वभाव के होते हैं। उनमें हृदय होता ही नहीं मानो। और इस कदर क्रोधी और इतने इगोइस्टिकल होते है कि उनके जीवन को अगर आप समझ के पढ़े तो कभी कभी लगे कि ये तो एक तरह के इगोइस्टिकल मॉन्स्टर हैं। जैसे आप विश्वामित्र को पढ़े, क्या उस हरिश्चंद्र बिचारे के जान को लग गये। खुद तो संन्यासी थे, उसके भी जान को लग गये। वो अच्छा घर गृहस्थी में, अपने बीबी-बच्चों के साथ, बहुत धर्म से राज्य करता था। उस के जान का लग गये। उसके प्राण ले लिये और उसकी हालत खराब कर दी। आपने दुर्वासा को सुना है। उनका नाम अगर सबेरे लीजियेगा तो आपको तीन दिन तक खाने को नहीं मिलेगा। तीसरे जमदग्नि साहब थे, उनके क्या कहने। यानि यहाँ तक है कि पराशर मुनि के लिये कहा जाता है  कि उन्होंने भी एक बहुत ही एक गंदी बात अपने लाइफ में कर दी थी, सत्यवती के साथ। जिन्होंने की अपने हृदय को पूरी तरह से इम्प्टी तो कर दिया था, लेकिन अपनी काम वासनाओं पर वो कुछ भी नहीं अधिकार रख पाये। एक क्षण में उनका सभी तपस्या वगैरे भंग हो गयी। और आज ऐसे अनेक हैं आप जानते हैं। अपने यहाँ ऐसे अनेक ऋषि-मुनि हो गये। परशुराम जो थे, जिन्होंने कि गुस्से में आ कर के सारा समुद्र पी लिया था। किसी न किसी को भस्म कर दिया था। किसी न किसी को खत्म कर दिया था। आज तक आपने किसी से ये नहीं सुना होगा कि इनमें से किसी ने भी किसी का उद्धार किया होगा या कल्याण किया होगा। माने अपने अन्दर जो सीमित शक्तियाँ हैं, उस सीमित शक्ति में से अगर आप सिर्फ एक नाड़ी पर वो सारी शक्ति को अगर खींच ले, अपने फिजिकल बीईंग को अगर बढ़ाये या अपने मेंटल बीईंग को बढ़ाये, तो आपका जो इमोशनल बीईंग है वो बिल्कुल साफ़ कर जायेगा। और ऐसा आदमी जो है वो किसी भी हद तक पहुँच जाये उसका कुछ आप नहीं कह सकते हैं। क्योंकि उसका इगो बलवत्तर हो जायेगा। हठयोग को छोडिये। 

ये कराटे कर के एक जापनिज लोगों का एक इसी तरह का प्रकार है, जिससे वो कहते हैं कि हम अपना डिफेन्स कर लेते हैं। हम अपने प्रोटेक्शन के लिये चीज़ सीख लेते हैं। और अगर हम किसी पर एक जगह प्रहार करे तो एकदम हम उसे खत्म कर सकते हैं । कहते तो हैं, हम डिफेन्स के लिये कर रहे हैं। लेकिन उससे इतने इगोइस्टिक हो जाते हैं, इतने क्रूर हो जाते हैं, कि उसका उपयोग बहुत बार वो लोगों को मारने के लिये करते हैं और आप जानते हैं कि जापनिज लोगों में, कुछ-कुछ लोगों में बहुत ज्यादा क्रूरता इस कराटे के कारण आ गयी। आपका जो इमोशनल बीईंग है, आपका जो मन का स्थान है, आपकी जो लेफ्ट में जो नाड़ी है, वो सारी ड्रेन आऊट हो जाती है और जितने भी हठयोगी होंगे, उनकी मृत्यु कैन्सर से तो नहीं होगी। शरीर तो उनका बड़ा तेजस्वी दिखायी देगा । क्योंकि वो सूर्य नाड़ी पर चल रहे हैं। उनकी शकल बहुत अच्छी दिखायी देगी। औरते जो हैं वो भी आप देखियेगा,  कि वो बड़ी कौन्सियस होगी अपनी बॉडी की और फिगर की।  और ऐसी औरतें जिस घर में होगी वहाँ पर पति का जीना मुश्किल हो जायेगा। बच्चों का जीना मुश्किल हो जायेगा, सब की जान खा लेंगे। कि उनकी परफेक्शन करने में, पति कहेगा कि, भगवान बचाये रखें, ये कहाँ से संन्यासिनी मेरे घर में आ गयी। मेरी तो इस औरत ने जान ले ली। यहाँ ये क्यों रखा?  वहाँ वो क्यों रखा?  हर तरह से वो पति को खाती रहेगी। और उस खाने में वो ये सोचेगी कि, वो बड़ा धार्मिक कार्य कर रही है। उसको कभी ये नहीं लगेगा कि ये सब करने से मैं सब को दु:ख पहुँचा रही हूँ। मेरे बच्चों के लिये मैं जान ले रही हूँ। उनको भी मैं परेशान कर रही हूं। ऐसे ही बहुत से आदमी परिवार में होते हैं, कि वो हनुमान जी की तो वो पूजा करते हैं, लेकिन स्वयं हनुमान जी के नाना हो गये। घर में अगर मजाल नहीं कि कोई यहाँ से यहाँ पानी रखा दे। हो गया वो चिल्लाना शुरू कर देंगे। हमारे खानदान में भी एक ऐसे सत्पुरुष थे हैं, अभी भी जीवित हैं। उन्होंने सब के छक्के पंजे घर में छुड़ा दिये थे। लेकिन मैंने ही उनके मूढ़पनता उतारा और बाकि तो सब लोग उनसे थर्राते रहते थे। इस कदर वो शुष्क, इस कदर वो दूसरों के विचारों से, दूसरों के दुःखों से और दूसरों की तकलीफ़ों से अनभिज्ञ। इस कदर वो क्लोज्ड, इनसेन्सिटिव जिसको कहते हैं, कि संवेदनशीलता बिल्कुल उनमें नहीं रहती। और कम्पॅशन और लव की तो बात ही मत करिये। वो तो वो समझ ही नहीं सकते। अधिकतर लोग जो योग करते हैं, औरतें, चाहे आदमी, उनकी कभी भी घर में पटती नहीं। अगर दोनों करें तो तो भगवान ही बचाये रखें। उस घर का ही सत्यानाश हो जायेगा। लेकिन एक भी करें तो भी काफ़ी है। बीबी साहिबा जो है वो सिनेमा अॅक्ट्रेस होने के ख्वाब देखने लगाती हैं और आदमी अपने को सँडो बना के फिरता है। हम लोगों को क्या सँडो हो कर क्या करने का है?  हम को क्या कुस्तियाँ लड़ने की है?  आपको इतनी योगविद्या कर के करने का क्या है?  अरे भाई, साधारण तरह से रहने के लिये जो बैलेंस लाइफ़ चाहिये वैसे रहिये। हाँ, ठीक है, आपने थोड़ा बहुत आपने एक्सरसाइज़ कर लिया, ये ठीक बात है। लेकिन इतनी ज्यादा अतिशयता एक चीज़ को बढ़ाने की करने की क्या जरूरत है,  कि दूसरा आपका जो हृदय चक्र जो है वो बिलकुल मायनस हो जायेगा।  इतना मायनस हो जाये कि ऐसे आदमी को आप अगर दूर से देख लें, तो आप दूसरी तरफ़ से चक्कर खाते हैं। 

एक दिन मैं लखनऊ में थीं। वो जो हमारे महाशय जी, जो हमारे घर में बहुत ज्यादा रौब झाड़ते थे। तो उनकी आदत थी कि सबेरे वो एक तरफ़ से घूमने जाते थे। तो एक दिन मैंने देखा, कि मैं भी उस तरफ़ से घूमने जाती थी,  तो कुछ लोग बेतहाशा भागते निकले। मेरी कुछ समझ में नहीं आया, कि मुझे देख कर भाग रहे हैं कि उनको देख कर। क्या हो गया है? उसके बाद में वो सब लोग मुझे मिलने आये। वो कहने लगे,  भाभी जी माफ़ करना, हम बदतमीज ऐसे भागे लेकिन इस खूँखार जानवर को ले कर आप कहाँ निकलीं?  इस शेर बब्बर को ले के आप कहाँ निकली थी। वो तो उल्टे पैर ही दौड़ने लग गये। भगवान बचाये हमें, ये तो अभी डंडा ले के हमको मारेंगे।  उनसे बात करने जाईये, तो वो आपको खाने को दौड़ेंगे। कभी हँसना तो वो जानते ही नहीं हैं। उनको मालूम ही नहीं कि दुनिया में हँसना या स्मित या कोई ऐसी चीज़ है। बड़े सिरिअस होते हैं। और किसी का दुःख, किसी की तकलीफ़ को वो समझते ही नहीं। अगर आप उनसे कहें कि, ‘इस आदमी को बहुत दर्द है। इतना दर्द में पड़ा हुआ है।’ कहने लगेंगे कि, ‘देखो मैंने कैसे अपने दर्द को कंट्रोल किया, तुम भी करो।’ अरे  भाई वो कोई योगी नहीं है। तुमने अपने दर्द को कर लिया। लेकिन वो जानते नहीं, कि उनकी मृत्यु जो होगी वो हार्ट अॅटॅक से, हमेशा। जो सहजयोगी होता है उसका दोनों बॅलन्स होता है। उसकी वजह मैं बाद में बताऊंगी। लेकिन जितने भी योगी लोग होंगे, वो खट् से यूँ खत्म हो जायेंगे और पता ही नहीं चलेगा उनका, वो गायब हो जायेंगे। उसके बाद जब वो मरेंगे तो चार आदमी जोड़ना भी मुश्किल हो जायेगा। मैं आपसे बताती हूँ, ये जो योगी लोग मरते हैं तो मुश्किल से चार आदमी मिलते है। पाँचवा आदमी जो की हंडी उठाये, वो नहीं मिलने वाला। क्योंकि बाल-बच्चे तो पहले ही भागे रहते हैं और सारे दुनिया के लोग ऐसे लोगों से भागे रहते हैं। अब योग से लोग कहते हैं कि हम आपका रोग निवारण करें, भगवान बचाये रखें। इनसे आप रोग निवारण करने की जगह आपको ऐसे रोग लग जायेंगे कि आपकी बीबी कल कहेगी कि  मुझे तलाक दीजिये। भगवान बचाये रखें, आप की तो मैं बाधा ही नहीं रख सकती। आप के साथ मेरा निर्वाह नहीं हो सकता। आपने जो ये योग विद्या शुरू कर दी इससे भगवान बचाये रखें।  इसलिये हजार बार ये सोच लेना चाहिये कि योग परिवार में रहने वाले लोगों के लिये बड़ा ही खतरनाक है। लेकिन योग क्यों बनाये? किस व्यवस्था में बनाया गया  पतंजलि को?   कितने हजारों वर्ष पहले की बात है जब पतंजलि ने पातंजल योग निकाला। उस वक्त का योग है, वो सोसाइटी आज नहीं है। 

पहली तो बात ये  कि उन दिनों में हमारे यहाँ चार वर्णों की संस्था थी। आप तो जानते ही हैं कि पहले छोटे बच्चे पाँच साल के बाद में जंगलों में जा कर एक रियलाइज्ड सोल, गुरु के पास पढ़ते थे, रियलाइज्ड सोल। ये ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे नहीं, रियलाइज्ड सोल, उसी की व्याख्या गुरु होती है। इतना ही नहीं कि वो रियलाइज्ड सोल था, पर उसको सारा उसका शास्त्र भी मालूम था, रियलाइजेशन का। इसलिये वो जंगल में रहते थे, और उन्ही के नाम से युनिवर्सिटी चलती थी। जिसको हम गोत्र कहते हैं,  ये वही युनिवर्सिटीज है। और सगोत्र विवाह इसलिये मना था कि एक युनिवर्सिटी में रहने वाले बच्चे आपस में सब भाई-बहन के जैसे रहते थे। अच्छा, उसके अलावा उस उमर में आपकी हेल्थ बढ़ती है। आपकी ग्रोथ बढ़ती है। इसलिये आपको जरूरी है कि उस वक्त आपके शरीर को पोषक जितनी भी एनर्जी लगे मॅक्सिमम दी जाये। दूसरी बात, जो आपकी हृदय की बात है, जो प्रेम की बात है, एक तो गुरु उसको सम्भालता था। गुरु अपने प्रेम से उसको भरा रखता था। दूसरे जो वानप्रस्थाश्रम में ग्रॅँड पॅरेंट्स, उनके जो बाबा- दादी और नाना-नानी वो भी जंगल में बैठे रहते थे। तो वो लोग अपने बाल-बच्चों को प्यार करते थे और गृहस्थी में कोई भी योग नहीं था। वो अपने बच्चों को जो प्यार देते थे, उससे उनकी दसरी शक्ति जो थी, वो प्लावित होती थी।

विवाह के बाद में आप ही सोचिये कि कितना ड्रेन आपका पहले ही हो रहा है। मतलब ये कि आज कल की सोसाइटी में ऐसे ही आदमी किस कदर परेशान है। उसके पास टाइम ही नहीं की कुछ प्यार करें या किसी से दो मिनिट प्यार से बात करें। और उस पर योगी अगर कोई हो गया  तो आप ही सोचिये, ऐसे ही मियाँ-बीबी के हजार  झगड़े रहते हैं, तब तो आपने सत्यानाश ही कर दिया पारिवारिक जीवन का। पारिवारिक जीवन के सिवाय सहजयोग नहीं बनता है। ये भी एक बात विशेष है। साधारण तरह से जो पारिवारिक लोग हैं उन्हीं से ही सहजयोग होता है। इसलिये जो लोग संन्यास लेते हैं उनसे कहना ठीक है आप संन्यास लो और जंगलों में बैठो। जंगल में ही रहो। दो दिन बाद वहाँ से भाग के आयेंगे,  भेष बदल के। कल ही मुझे एक साहब मिले थे। वो मुझे कहने लगे कि, मैंने स्टॅटिस्टिक इकट्ठे किये हैं। मैं वहाँ गया था हरिद्वार।   हरिद्वार गया था। हरिद्वार मैं गया, वहाँ मैं गया और  वहाँ मैंने बहुत सारे सन्यांसियों से भेंट की। तो मुझे आश्चर्य लगा कि, ९९.९% और १% मैं इसलिये कहता हूँ कि मुझे ऐसा आदमी मिला नहीं। पर मैं कहता हूँ कि पर चांस होगा कुछ। वहाँ पर जितने भी लोग आये हये थे, वो लोग सब बता रहे थे कि साहब मेरी बीबी मर गयी तो मैं आ गया। मेरा बाप मर गया तो मैं आ गया। फलाना हो गया तो तो मैं आ गया। मेरे इन्कमटॅक्स वाले मेरे पीछे पड़ गये तो मैं आ गया। स्मगलिंग में पकड़ा जाता था तो मैं आ गया। मतलब जेल से बचने के लिये बहुत से लोग आ गये। और अपने पारिवारिक जीवन से बचने के लिये भी वहाँ आये हैं। दूसरे स्टाइल के लोग ये थे कि साहब मैं यहाँ पहुँचा। मैंने सोचा कि यहाँ कुछ खाने-पीने की व्यवस्था हो जायेगी। तो यहाँ देखता हूँ कि ये तो गेरुआ वस्त्र के लिये गेरुआ रंग भी नहीं मिलता है यहाँ। बड़ा मुश्किल काम है। और यहाँ बड़ा बुरा हाल है। आज कल तो दुनिया बिलकुल ऐसी खराबी हो गयी है कि संन्यासिओं को कोई कुछ भीख ही नहीं देती। जितने भिखारी दुनिया भर के थे, उन्होंने सोचा कि ये आसान है, थोड़ी सी भीख माँग कर के गेरुआ वसत्र लगा लो। और जा कर सब हिमालय में रहे। 

मैं अभी दिल्ली में थी तो कम से कम पाँच-छः आश्रम से चिठ्ठी आयी कि ‘माताजी, आप तो सारे संसार की पालन करने वाली हैं, आप साक्षात् शक्ति हैं। आप हम भिखारिओं के लिये, ये नहीं लिखा था, पर मैं कहती हूँ बीच में,  कि हम साधुओं के लिये आप वहाँ से ब्लँकेट्स और धोतियाँ और ये और वो भेज दीजिये। मतलब भिखारी नहीं लिखा था, उन्होंने अपने को साधु लिखा था। साधु माने जो साध लेते हैं। समझे न आप?  जो साध ले वो साधु। तो इस तरह से उनकी चिठ्ठियाँ मेरे पास हैं। आप बताईये, कि आपके समाज के उपर में पॅरासाइट्स के जैसे ये लोग लगे हैं। ये आपके दौलत के उपर में, माने कमाई आप करते हैं, मेहनत आप करते हैं, सब कुछ आप करते हैं और खायेगा कौन?  तो ये साधु बाबा! बताईये, ये तो कुछ मेहनत नहीं करता। ये तो कुछ नहीं करता। ये तो मोटा होते जा रहा है। और आप दुबले होते जा रहे हैं। इस तरह के साधु बाबा गाँव-गाँव, गली-गली घूमते हैं। और अपने शहर में भी काफ़ी ऐसे लोग बैठे हये हैं, जो अपने को संन्यासी कहते हैं। मैंने एक छोटी सी, कहना चाहिये कि एक सहज कविता मेरे मुँह से निकली थी कि, ‘तू ले संन्यास, पैसा मेरे पास।’ इस तरह के यहाँ पर आपको ऐसे लोग साधु मिलेंगे, कि आप उनको नमस्कार कर के, जा के अंत में संन्यास ही लीजियेगा। क्योंकि वो आप का लोगों से या तो इनसे पीछा छुडाओ या तो मुझसे छुट्टी कराओ। इन लोगों में इतनी सीरिअस, ये जो दिखाते हैं, ये जो इतना अपने पे पाखण्ड लाते हैं, इसको समझ लेना चाहिये। अब बहुत से यहाँ पर लेडिज लोग, अपने यहाँ खास कर के, इस बात को समझ लें। क्योंकि लेडिज लोगों को खास कर, सीताजी ने भी एक बार बड़ी भारी गलती करी थी। ऐसी गलती आप लोग रोज कर रहे हैं, कि कोई भी साधु बाबा आया तो चले उसके चरण में।   फिर वो अभी जेल से छूट के, कपड़ा बदल के आया हो। चाहे वो अभी किसी को दगा मार कर के  आपके घर में छुपने को आया हो। चाहे वो कुछ भी धंधा कर के आयेगा। औरतों को तो ‘अहाहा…! बाबाजी आये थे।’ ‘कौन बाबाजी?  ‘वो नहीं मालूम।’ ‘भारी भारी थे, बड़े तेजस्वी थे। मैंने तो उनको शरणागति दे दी।’ अरे पागल, वो कौन था?   वो तो पड़ौसी के यहाँ नौकर था। वहाँ से भागा है चोरी कर के। तुम को बुद्धू बना रहा है। दाढ़ी वाढ़ी बना के आ गया। तुम उनके पैर छूो।’ ‘नहीं, नहीं हम को बड़ा आनन्द आया!’ ‘क्या आनन्द आया?’  बाद में कहा, अहाहा…! क्या आनन्द आया।  साधु बाबा घर में आईये। साधु बाबा आके घर में आराम से रह रहे हैं।  देवीजी, माताजी और पिताजी उसके चरण रोज धो कर के पीते थे। करते करते देखा कि घर की लक्ष्मी गायब हो रही है। कहने लगे कि वो भाई, कहीं से कर्जा लो। उनका कुछ करने का है। उसके बाद साधु बाबा ने कहा कि, ‘अब हमारा स्थान, स्थान नहीं कह पाएंगे। संस्कृत तो जानते नहीं ज्यादा तर। ‘अ-स्थान, हमारा अस्थान यहाँ से हिलेगा।’ उनका अ- स्थान हिला, उसके साथ आपकी तिजोरी भी हिल जायेगी। ये नहीं हुआ, तो उन्होंने कुछ काम ही नहीं किया आपके ऊपर में। अगर असली नहीं होगा तो ऐसे ही धंधे करेगा। 

वहाँ अपने नसीब के मारे हजारों लोग मेरे पास लंदन में आते हैं। दिल्ली में आये, कि ‘माताजी, इनसे पिंड छूड़ाओ। वो हमारे पीछे में लग गया। वो हमारे पीछे में लग गया।  इन से कैसे क्या करें?’ लेकिन अभी भी जो लोग इस चक्कर में हैं। उनसे अगर कहो कि, ‘ये साधू बाबा के पीछे तुम क्यों मरते हो?’ तो उनको बड़ा बुरा लगता है। लेकिन जब उनका पूरा चटमुंडन हो जाता है, तब वो मेरे पास आ के कहते हैं। कि, ‘माताजी, वो तो हम को मुड़ा के चला गया। इतनी सिरिअस ये बात है और हँसी भी आती है, मनुष्य की महामूर्खता पे। अब मैंने आप से बताया है कि चंद्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी, पर अपना बैलन्स नेचर ने खुद ही ड्राल दिया है। आपको करने की जरूरत नहीं है। आप काहे को अपने पीछे लगे हुए हैं। आप बैलन्स लाइफ़ लीड करें। नॉर्मल लाइफ़ लीड करें और साधारण तरह से रहें। कोई जरूरत आपको नहीं है कि आप कोई द्राविडी प्राणायाम करें। मैं देखती हूँ कि कुछ लोगों को सबेरे उठ के सर के बल खड़े होते हैं। हमारे सामने एक साहब रहते थे, पाटिल साहब। वो चार बजे उठ कर के जो लटक जाते थे। तो वो करीबन छ: बजे उस लटकन से उतरते थे। और उनके घर में उनकी बहु से झगड़ा, लड़के से झगड़ा। सारा घर परेशान कि बुढ्ढा मरे तो आफ़त छूटी। जब वो बुढ़्ढ़ा मरे भी तो उन्होंने अपने बच्चों के लिये कुछ नहीं छोड़ा, सारा दान कर गये दूसरे योगाश्रम को। ( … अस्पष्ट) वहाँ भी जितने बुढे मरेंगे वो भी इस तरह से हो जायेंगे।  और ये भी हार्ट ही के पेशंट थे। लेकिन वो हमेशा सर के बल अपने शीर्षासन में लटके रहते थे। अब ये पागलपन देखिये कि  मैं अगर योग के विरोध में कह रही हूँ तो लोग कहेंगे कि, ‘माताजी, ऐसा क्यों कहती हैं?’  पर भाई, तुम ही सोचो, कि क्या जरूरत है इतना द्राविडी प्राणायम करने की?  ठीक है, अपना शरीर ठीक से चलना चाहिये इसलिये थोड़ा बहुत एक्सरसाइज कर लिया हो गया।  लेकिन चौबिसों घंटे, हर समय वही सर के बल खड़े रहने की क्या जरूरत थी आपको?  सब से पहली चीज़ है प्रेम करना सीखो। परिवार या संसार, या संसार का जो सारा परिवार है, या उससे भी बढ़ के मैं कहूँ, कि सारी ही सृष्टि, सारा ही विश्व, सारा ही प्रेम की धूनी पर चल रहा है। प्रेम को छोड़ कर के ये किसने कहा है आपसे तमाशा करने के लिये।   इस तरह की सब चीज़ें करने की कोई जरूरत आपको नहीं है। 

अब वो दूसरे एक और निकले हैं आजकल वो जो बजा बजा कर के लंदन में घूम रहे हैं। उन्होंने अपने भारतीय संस्कृति को और चार चाँद लगा दिये हैं। उनका अगर आपको मैं किस्सा सुनाऊँ तो आप तो कहियेगा कि, ‘इनको माताजी, आप थप्पड़ मार के क्यों नहीं चली गयी?’  वहाँ पे बांड स्ट्रीट पर कॅबेरे डान्स उनका चलते रहता है। सिर्फ सर में वो बाल चटमुंडन करते हैं। और वो होती हैं न चोटी, जिसको बोदी बोलते हैं और मराठी ( … अस्पष्ट मराठी) में जिसको ‘शेंडी’ कहते हैं। वो अपने यहाँ चिपका के उसके वहाँ ड्रेसिंग होता है। हेयर ड्रेसिंग, वो ड्रेसिंग बिकता है। एक एक के दाम पाँच-पाँच सौ रुपया। उसको यहाँ चिपका चिपका कर के और वहाँ नाचते हैं। और नाचते वक्त में उनको बेचारों को धोती तो कभी पहनना आता ही नहीं बेचारों को। तो भी धोती पहनते हैं, औरतें साड़ियाँ  पहने रहती हैं। उनको साड़ी भी पहनना नहीं होता और धोती भी नहीं पहनना आता। अरे भाई, हमारा ड्रेस है,  हमारे को दे दो।  अगर तुम को पहनना भी है तो कायदे से पहनो और हमारे ढंग से चलो। एक तो वहाँ की औरतें साड़ियाँ पहन भी नहीं सकती। उनकी चाल ही घोड़े जैसी है। ऐसे ऐसे चलती है। हम लोग तो ऐसी ऐसी चलती हैं न, वो लोग ऐसी ऐसी चलती हैं। 

अगर हम अभी वहाँ गये थे लखनौ में। वहाँ किसी की शादी हो रही थी। तो वहाँ देखा कि सब लोग ऐसे ऐसे चल रहे थे। बीच में कोई घोड़े जैसा कूद रहा था। साड़ी सब पहनी थे। मैंने कहा कि ये कौन भाई , घोड़े जैसा कूद रहा है?  तो सामने जा के सुना कि एक बहू अमेरिका से आयी हुई हैं। मैंने कहा समझ गए। और उसको चलते तो चप्पल में बन नहीं रहा था बिचारी को। खसकते खसकते घोड़े जैसी ऐसी ऐसी चल रही थी। और उनके बाल भी आयाल घोड़े के जैसे थे। उन लोगों को इसकी आदत नहीं। घोड़े जैसे वो लोग चलतेहैं। घोड़े जैसे वो रहते हैं। उनका तरीका ही घोड़े जैसा उनको क्या किया जाय?  वो साड़ी पहनने से पहले उनको चलने का ढंग आना चाहिए। लेकिन वहाँ जो औरतें आप सोचिये बांड स्ट्रीट में, आप सोचिये, जिन्होंने कभी साड़ी बाँधी नहीं। वो साड़ी बाँध के और ये लोग धोती बाँध के जो वहाँ कैबरे डान्स करते हैं। मारे लज्जा के आपको लगता हैं कि प्रभु, ये क्या?  और वहाँ लोग मज़ाक में पार्टीज वार्टीज़ में करते हैं, कि ‘माताजी, आप ये साड़ी पहने हैं। माताजी, आप ये चीज़ पहने हैं। और आपको कोई प्रॉब्लेम नहीं होता?’  मैंने कहा, ‘किस का?’  कहने लगे, ‘हमने बांड स्ट्रीट पर देखा कि सब धोतियाँ और साड़ियाँ खुल जाती हैं।’ हमने कहा, ‘भाई, ये तो जन्मजन्मांतर का हमारा पेहनावा है। और यही हमारी लज्जा भी। और इसको आप कहिये कि ये भारतीय संस्कृती को बढ़ा रहे हैं। तो भगवान बचाये रखें। ऐसे लोगों से कहना कि, ‘हम ही को बढ़ाने दीजिये हमारी संस्कृति, जो हमारे रग रग में है। आप मेहेरबानी से हमारी संस्कृति को मत बढ़ायें।’ 

ये बात रही आपके हठयोग की जिसको की आप हठ कहते हैं। हालांकि हठ पे चलते ही नहीं, ‘ह’ पे ही चलते है। और ह ठ में से जब ‘ठ’ पे आते हैं तो भगवान ही बचाये। ‘ह’ का मतलब होता है कम्प्लीट अॅक्सीनन्स। ये नहीं खाओ, वो नहीं खाओ। मेरे पच्चीस सोमवार करने है। मुझे इतने लक्ष जो है, वो शिवजी को चढ़ाना है। अब एक देवीजी आयी थीं अलाहाबाद से, महा ब्राह्मणी बन के। वो एक यहाँ महाराष्ट्रीयन बेचारे ब्राह्मण हैं, उनके घर में ठहरे। अब वो बड़े आदमी की रिश्तेदारिण थी, तो भाई ठीक है, उन्होंने अपने घर पे ठहरा दिया। जब वो चली गयीं। उसके बाद में उनके घर के सब लोग ठीकठाक हुए। उसके बाद में उन्होंने आ के कहा कि मेरी खापर पणजी भी ऐसी नहीं थी, जैसे ये औरत थी। मैंने कहा, ‘क्या हुआ?’  कहने लगी कि ‘आते ही साथ उन्होंने अपने पती को डाँटना शुरू कर दिया।  तुमको मालूम है कि मैं नल का पानी नहीं पीती हूँ। मेरे लिये कुँओ का पानी क्यों नहीं भरवा के रखा?’  पती बेचारा रात में कावड़ ले कर के  कुवे पे गया। वहाँ से जा कर के पानी लाया। सबेरे उठ के उसने चिल्लाना शुरू किया कि ‘मुझे तो कितने लक्ष वो जो है शिवजी पर चढ़ाने के है, बेल के पत्र और वो लाना पड़ेगा। तो वो ओले की कहते हैं न जो गीले बदन जा के लाये। अब वो गीले बदन मलबार हिल पे गया तो उसने उसको पकड़ के मारा। वो जो वहाँ के आदमी थे। उन्होंने कहा कि तुमसे किसने कहा कि इतने बेल के पत्र पे चढ़ने के लिये?  उसी गीले बदन में वो ढूँढते, ढूँढते, कहाँ से वो नौकर को वो गया और उस ने ला कर के उसको दिया। उस पर चार डांट कि तुमने पत्ते ठीक से नहीं देखे। एक तो वो चार बजे जा के तोड़ने का। उसको क्या दिखायी देगा? उसको इतना डाँटा, इतना डाँटा। लेकिन शाम को इसको 107 बुखार आया। और वो बेचारा कहने लगा मैं तो बीमार हो गया। मुझे अस्पताल में भेज दीजिये। उसके बाद दुसरा नौकर आया। उसको जब पता चला, कि इनका काम करने का है, तो उसको तो वैसे ही हुड़हड़ी भर के आयी। उसने कहा, मुझे मलेरिया का अॅटॅक आ गया। वो भी चला गया। फिर ये बिचारे जो उनके पतिदेव थे, वो दौड़े, उनको भी पेड़ पे चढ़वाया। उनसे भी सारा काम करवाया। अंत में वो भी हार गये। पाँच दिन तक। उन लोगों ने फिर मुझे फोन किया कि, ‘माताजी अपने प्रभाव से इनका स्थान बदलवाईये।’ तो फिर वो पूना गयीं | वो जहाँ जहाँ गयीं उनके उपद्रव मशहूर हैं। उसके बारे में बड़ी जाहिरात हुई। और जिन साहब से रिश्तेदारी थी, उन्होंने कहा कि, ‘साहब, मैंने तो खुद बचाने के लिये उनको भेजा।’ मैंने कहा कि, ‘हम लोग आपको आ के डंडा मारेंगे। आप मेहेरबानी कर के ऐसे दिव्य लोगों को कहिये कि, वहीं त्रिवेणी में बैठ कर के, वहीं जप करें और मौन में रहें। दूसरों को इस झंझट में ना फसाये।’ (….मराठी) – कळलं का बायकांना काही?  कळतंय की नाही?  अच्छा, अब ये हुआ व्यय फालतू का, जो हठयोग में भी लोग करते हैं। और इस तरह की पूजा में। आप पूजा में चलें। अब ये दूसरा प्रकार है पूजा में जाने का, मंदिरों में जाने का। मैं मंदिर के विरोध में कभी भी नहीं हूँ, ना तो मैं किसी धर्म के विरोध में। मैं धर्म में ही हूँ। लेकिन मंदिर में जो गणेश जी बैठे हये हैं, वहाँ नहीं आप जा सकते। गणेश के  पास जो भूतनाथ बैठे हुये हैं  वो आपके आज्ञा चक्र पे  चट से आपके लगा दिया और आप पे चढ़ गया भूत। मैं तो सिर्फ मंदिर गयी थीं। 

एक लड़का अभी दिल्ली में हमारे पास क्यूअर के लिये लाये। उसको हमने वाइब्रेशन्स दिये। वो ठीक हो गया। उसके बाद उनसे कहा कि, ‘देखो, भाई, ये गंडा डोरा उतारो।’ तब ठीक हो गया वो। गंडा डोरा उतारो।’ उसके बाद दूसरे दिन वो आये। फिर वही वैसे के वैसे। मैंने कहा, ‘इतनी मेहनत करी एक घंटा, दो घंटा और फिर वैसे के वैसे कैसे हो गये। आज्ञा चक्र कैसे पकड़ा?’ ‘हम तो कहीं भी नहीं गये माताजी।’ तो मैंने कहा, ‘टीका कहाँ का है?’  कहने लगे, ‘भैरव के मंदिर में गये। भैरवनाथ का लगाया।’ मैंने कहा, ‘भैरवनाथ को और कोई धंधा नहीं। वो कहाँ से लगाने गये। ये कहाँ से लगा के आये तुम?’   मैंने फिर उसको मिटाया, सब कुछ किया। फिर वो मंदिर का नाम पूछा। फिर वो पूजारी का नाम पूछा। फिर उसको चप्पल मारें। तब कहीं जा कर उसका छूटा। सारे दुनिया भर के जितने राक्षस हैं, उन्होंने सब मंदिरों का ठेका ले लिया। विवाह वो करेंगे नहीं। क्यों करेंगे?  वो तो ब्रह्मचारी हैं, पर्मनंट ब्रह्मचारी हैं। हमारे यहाँ ऐसे ऑर्गनाइझेशन भी हैं। जो कहने लगे कि, ‘साहब, हम ब्रह्मा हैं।’ ‘ब्रह्मा माने क्या?’  ‘हम विवाह नहीं करते।’ ‘ठीक है, विवाह नहीं करते।’ पुरुष भी विवाह नहीं करते, औरतें भी विवाह नहीं करती। लेकिन सब होता है, बाकी सब। विवाह नहीं करते। बड़ी अच्छी जगह है। चलो भाई,  सामूहिक सारा मामला बना हुआ है। बड़े आनन्द से रह रहे हैं। 

और खास कर के जो योग में जो लोग होते हैं। उनको क्या हो जाता है, कि वो इतने ठूठ जैसे हो जाते हैं, इतने ठूठ जैसे हो जाते हैं, कि कोई उनके साथ बैठ नहीं सकता।  खास कर सावित्री का मंत्र कहने वाले लोग। सावित्री का मंत्र जो है वो आपको एक दम ठूठ जैसे बनायेगा। क्योंकि उसमें, उसका निचोड़ कर के जो मिट्टी बच जाती हैं न वो होती है। सावित्री का मंत्र ही वो चीज़ है। जिसमें की आपको कहा जाता है, मतलब जैसे ये है, कि ये दीप है। दीप के अन्दर में ज्योत है। वो सिर्फ दीप ही की बातें हैं, अलग जगह की भू : भूः है, भुवः है, ये सब चीजें हैं। लेकिन वो दीप के अन्दर जो चीज़, जलने वाली जो चैतन्य शक्ति है, उसकी उसमें बात नहीं है। सिर्फ दीप के ही डिफरन्ट डिफरन्ट फॉर्म बतायें हैं। अब आपने वो रटना शुरू कर दिया। अब जो लोग ऐसा करते हैं, उन लोगों को बड़ा प्रॉब्लेम हो जाता है कि किसी समाज में वो फिट ही नहीं होते। क्योंकि जहाँ भी वो जायेंगे, वहाँ लोग अगर जिस कुर्सी पर वो बैठेंगे वहाँ उनका बंठा ढार। उसके घर में दर्शन दिये वहाँ गड़बड़। तो वो करते करते उनको ये लगता है कि चलो, किसी आश्रम में बैठें। चलो, पाँडेचरी जायें। चलो, वहाँ जायें। अब वहाँ सब ऐसे फूट मियाँ बैठे हुये हैं। तो इन लोगों का आपस में में पटता है। क्योंकि सभी ठूठ हैं। तो इस वजह से इस तरह से ऑर्गनायझेशन्स फिर बन जाते हैं।  इसमें सब ठूठ लोग बैठ कर के ये प्लॅनिंग करते हैं कि औरों को कैसे ठूठ बनाया जायें। औरों का कैसे बंठा ढार करें। ये सारी व्यवस्था होती रहती है। और क्रोध, इतना इन लोगों में क्रोध होता है, कि आप उनसे एक मिनिट बात नहीं कर सकते। आपने बात की तो उन्होंने  बस तडाक से आपके ऊपर एक जो मरी हाथ। तो आपने सोचा, कि अरेरेर…! ये लोग कभी किसी का कभी कल्याण नहीं कर सकते। क्योंकि जिस के हृदय में प्रेम ही न हो, जिसके वो अन्दर करुणा जिसे कहते हैं, वही न बह रही हो, जिसके अन्दर किसी भी प्रकार का माधुर्य ही न हो, वो मनुष्य किसी का कल्याण कैसे कर सकता है?   इसलिये आपको ऐसे अति कोई भी मार्ग में नहीं जाना चाहिये। हालांकि ऐसा सुना है कि गवर्मेंट ही उसको करा रही है। तो, तो भगवान ही बचाये रखें। पहले ही क्या, फिर जब कहते हैं मराठी में कि राजा ने ही मारना शुरू कर दिया, तो अब क्या करें?  अब गवर्मेंट ही ऐसा योग शुरू करा देगी तो भगवान बचाये। 

कोई भी अपना उपाय सहजयोग से जितना आसानी से कर सकता है, सरलता से कर सकता है, उतना योग से नहीं कर सकता। एक क्षण में भी हो सकता है। सहजयोग से इलाज एक क्षण में होता है। जो आदमी पार हो जाता है, वैसे भी वो विमुक्त ही हो जाता है। क्योंकि उसका कनेक्शन जो जुट जाता है। उसके अन्दर शक्तियाँ जो आने लग जाती हैं। उसका कोई उसके शक्ति पे निर्भर नहीं होता है। जो चारों तरफ फैली हुई शक्ति है, वही उसके अन्दर से दौड़ने लग जाती है। तो उसका जो फिजिकल बीईंग है, उसका जो इमोशनल बीईंग है, उसका जो मेंटल बीईंग है वो पूरी तरह से प्लावित हो जाता है। और इस वजह से ऐसे आदमी डायनॅमिक हो जाते हैं। और वो दिन भर मेहनत करते रहेंगे। उनको थकान नहीं होती। वो आकर्षक होते हैं। उनके साथ आपको बैठने को मन करता है। ऐसे दस आदमी साथ बैठते हैं। तो उसमें मज़ा आता है। अब ये है की सौ में एकाध आदमी दुष्ट होता ही है। आप नहीं कह सकते की सब के सब होगे। एकाध आदमी होता ही दुष्ट है। उसको कितना भी करो, उसका वो दोहरा स्वभाव नहीं जाता। उसकी वो गन्दगी नहीं जाती। बहुत कोशिश करे, तब भी वैसे के वैसा ही रह जाता है। थोड़ा अंतर होता है। फिर वैसा होता है। फिर होता है। मुश्किल से चलता है। लेकिन इसमें फस्स्ट क्लास लोग भी बहुत हो जाते हैं। लेकिन आप अगर दस योगियों के साथ बैठिये, तो आप बाहर चले जाईये नहीं तो अपने को इन्शुअर कर लेंगे। क्योंकि दो कुस्ती वाले तो बैठ भी सकेंगे साथ में। पर दस योगी साथ में बैठ गये, तो चकनाचूर। 

अभी एक सेमिनार हुआ था। तो मैंने एक-दो से कहा, भाई, जरा देख के आओ, मजा देख के आओ।  तो ऐसी वहाँ जूता पैजार हयी, ऐसी जूता पैजार हुयी कि जो देखने गये थे तो भागते भागते आये। अपना सर बचा के कि, ‘माताजी, ये क्या आपने माया कर दी।’ मैंने कहा, ‘मैंने क्या माया करी?’ तो ये तो तमाशा है ही। एक योगी उससे लड़ रहा है कि, ‘मैं तुझ से बड़ा हूँ।’ वो कहने लगा कि, ‘मैं तेरे स बड़ा हूँ।’ तो वो जो अफ़सर लोग वहाँ बैठे थे, वो मुझ से कहने लगे कि, ‘माताजी, ये लोग तो अपने को योगी कहते हैं,  और ये कुर्सी के लिये तो हम से ज्यादा खुल्लम खुल्ला लड़ रहे हैं।’ और गाली-गलोच सब कुछ। और तू ऐसा, के तू क्या समझता अपने को। एक कह रहा था मैं शिव का भक्त हूँ, मैं कृष्ण का भक्त हूँ। शिव और कृष्ण वहाँ सर  पकड़े बैठे हुंगे, कि वाह भाई ये मेरा भक्त कब से हो गया?   इस तरह का तमाशा सारे ही दिल्ली में चला हुआ था। वो जो न्यूज पेपर वाले थे, प्रेस वाले, वो मेरे पास आये कि, ‘माताजी, इसको आप स्टॉप करिये। ये क्या नान्सेन्स चल रहा है! इसे क्या ये फॉरेनर्स समझेंगे? और इधर टेलिविजन भी साथ में लगाया हुआ है। ३५ लाख रूपये तो एक योगी ने डोनेट करे थे अपने इसके लिए। पर उनका तो ऐसा कचुम्बर हुआ कि वो तीसरे दिन आये नहीं। उनके तो सारे ही पैसे डूब गये बेचारों के। ३५ लाख रूपये, उन्होंने पता नहीं कहाँ से ला के उसपे लगाये। ऐसे अॅकॅडमिशियन से और इस तरह के आर्टिफिशिअल लोगों से, कृत्रिम तरीकों से परमात्मा को नहीं बुलाया जाता। परमात्मा हृदय में है। जिसके हृदय के अन्दर में परमात्मा की आस नहीं वो परमात्मा को पा ही नहीं सकता। जो लोग अपने को अॅकॅडमिक बना रहे हैं, और उसको सारा एक बड़ा भारी, अॅकॅडमिक उसका उन्होंने बड़ा भारी विवरण दिया, बड़ा भाषण दिया। हालांकि उनके सर पे ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई भूत नाच रहा हैं। वो क्या बोल रहे थे, वही जान रहे थे। बाकी तो किसी के तो समझ में ही नहीं आया, कि वो क्या बक रहे हैं। ऐसे लोग अगर आप का संचालन करें तो आपको अपनी स्वतंत्रता पे पूरा भरोसा रखना चाहिये। और अपनी स्वतंत्रता पे खड़ा होना चाहिये। एक तो ये भी जानना चाहिये कि ये लोग सिर्फ पैसे के लिये कर रहे हैं। पैसा बड़ी गंदी चीज़ है। अगर आज मैं यहाँ बक दूँ आपको कि मेरे ऑर्गनायझेशन में पचास हजार रुपया रखा है। आप से मैं कहती हूँ कि आप से दस गुना ज्यादा लोग यहाँ आयेंगे। लेकिन सब मक्खियाँ आयेंगी। असली लोग नहीं आयेंगे। सारी मक्खियाँ आयेंगी। वो पैसा है, जो पैसा रखा गया है वहाँ पर। हम योगा सेमिनार में बोलेंगे हमारा इतना ये होगा, महत्त्व होगा, ये होगा। फिर लोग हमारे पास में आयेंगे। हम बड़े माने जायेंगे|   और इसी सब चीज़ों से, इसी एक  मिथ्या चीज़ों के पीछे में इन लोगों ने ये योग जो है,  बेचारे सीधे साधे गृहस्थी में रहने वाले लोगों को, उनको खोखला बना दिया। 

विवाहित मनुष्य के लिये मना है कि वो हठयोग पे जायें। बिल्कुल ही मना है। क्योंकि हठयोग से पहली चीज़ जो होती है उसे कहते हैं, इंपोटेन्सी। पहली चीज़ आयेगी इंपोटेन्सी। आप हठयोगी को देखियेगा कि वो इंपोटेन्ट होता है। पहली चीज़़ है। क्योंकि जब उसका ड्रेनेज शुरू होगा, तो पहला वो मूलाधार चक्र पे ड्रेनेज होगा और ऐसा आदमी इनोसन्ट बिल्कुल नहीं होगा। बड़ा चालाक होगा (….… अस्पष्ट.)। हठयोग को समझने के लिये, उसको चलाने के लिये और उसको करने के लिये वो व्यवस्थायें होनी चाहिये, कि जो पतंजलि के वक्त में थी। वो आज हैं नहीं। आज कल तो ग्रँड पॅरेंट्स को तो छोड़ो, अपने सास-ससुर को भी कोई घर में नहीं टिकने देता। और माँ-बाप जो हैं, रात-दिन बच्चों को, ये सोचते हैं कि कहाँ से ये बला घर में आ गयी। ऐसी हालात में जितना भी आपके पास ड्रेन है, उसे खत्म करना चाहिये। आपके जितने टेन्शन्स हैं,  उसको हटाना पड़ेगा और नॉर्मल तरीके से आप रहियेगा। जैसे नॉर्मल विवाहित लोग रहते हैं। उस ढंग से आप रहिये। एक्स्ट्रिमस होने से सहजयोग नहीं काम करेगा। जो लोग एक्स्ट्रिमस टेम्परापेंट पे हैं उनपे सहजयोग नहीं चलता है। और लोग फिर ये सोचते हैं कि माताजी, आपने हमको क्यों नहीं पार कराया?   क्या बात है?   हम क्यों नहीं पार हुये?   क्योंकि आप अॅबनॉर्मल आदमी हैं।  अॅब्स्टिनन्स, कि ये नहीं खायेंगे, वो नहीं खायेंगे, भूखे मरेंगे। जो लोग भूखे मरते हैं जान बूझ कर के, ऐसे तो बहुत मर रहे हैं बेचारे। वो तो हो जायेंगे पार। लेकिन जो जान बूझ कर के भूखे मर रहे हैं वो कभी पार नहीं होगे। आप अपने अन्दर बसे हुये अन्नपूर्णा का अपमान कर रहे हैं।  इसका मतलब नहीं कि आप बकासुर हो जाईये, बिल्कुल भी नहीं। वो दूसरी साइड़ है। लेकिन अॅब्स्टिनन्स के साइड में बता रही हूँ, कि एक्स्ट्रिम अॅब्स्टिनन्स जो है वो नहीं करना चाहिये। सिर्फ एक ही चीज़ का अॅब्स्टिनन्स हो सके, सहजयोग से पहले तो अच्छा है नहीं तो बाद में तो मैं छुड़ा ही देती हूँ, वो है शराब। शराब और स्मोकिंग भी थोड़ा बहुत, क्योंकि दोनों ही हमारे अवेअरनेस पे काम करते हैं। हमारी चेतना पे पड़ते हैं। इसलिये दो चीज़ को छोड़ने का प्रयत्न करना चाहिये। ये अगर छूट जायें तो ठीक है और नहीं छूटे तो बाद में मैं ध्यान में आपका छुडा दूंगी। 

अब दूसरी साइड़ देखिये। जिसको कि आप सांख्य कहते हैं। की ये इमोशनल साइड़ है । कि आपके बच्चे ही आपके सब कुछ हो गये। अब वो बच्चे की मरे जा रहे हैं उसके लिये आपको फिर दुनिया में कुछ नहीं दिखायी देता। उस बच्चे के लिये आप दस बच्चे मार डालेंगे पर उस बच्चे को आप बचायेंगे। ये सांख्य हुआ, इंडलजन्स। शराब पीना, औरतों के साथ बहुत ज्यादा मतलब रखना। अपनी स्त्री को छोड़ कर और औरत के प्रति दृष्टि उठाना। आदि, सभी बिल्कुल वही चीज़ है। वो चाहे थोड़ी हो चाहे ज्यादा हो। ये आज के समाज में बहुत बड़ी बीमारी लग गयी है।  ये उसके बारे में पहले भी मैंने आपसे कहा था कि फ्लर्टिंग की चीज है, ये कुछ नहीं पर आज्ञा चक्र की बाधा है, ये भूत है। जिस आदमी की आँख फिरती रहती है, हर समय उसमें भूत होता है और उसकी आँख जब  किसी औरत पे पड़ी तो उसको भी भूत लग गया। ये छूत की बीमारी है। वो भी ये धंधे शुरू करती है। करते कुछ नहीं है, सिर्फ आँखें चलती रहती हैं। बस करना धरना कुछ नहीं उस में। आँखें चलती रहती हैं। लेकिन भूत आपका आज्ञा चक्र पकड़ जायेगा। इसलिये जिस आदमी का चित्त इस तरह का ऐसा चंचल होता है, उसका आज्ञा चक्र छुडाना मुश्किल होता है। इसलिये लोग आज कल कहते हैं कि हमारे सर में बड़ा दर्द होता है। हमें सर की बड़ी शिकायत हो जाती है। जो लोग बहुत ज्यादा काम करते हैं और जो काम में पहले ही संलग्न हैं, वो अपनी एनर्जी ऐसी ही ड्रेन आऊट कर रहे हैं। उसके अलावा ऐसी कोई बीमारी वो लगा नहीं, जैसे योग की या इस तरह की इंडल्जन्स की। तो वो चलते चलते खत्म हो जायेंगे। बहुतों के लिये आपने सुना होगा कि वो फलाने अफ़सर थे। बस, उन्होंने वो दो कदम चल गये, तीसरे कदम पे ख़तम। आप अगर उनकी जीवनी पढ़ियेगा, उनको सारे शौक थे। उसी शौक में आपका इतना दारूण मृत्यु हो गया। मेरा मतलब मृत्यु सब का ही होता है। लेकिन किसी का ऐसा शुभ होता है और किसी का इतना अशुभ होता है। इसलिये जिस शक्ति को परमात्मा ने अपने को दिया हुआ है, उसको पवित्रता से इस्तमाल करना चाहिये । जब आप इंडल्जन्स पे आते हैं, तो आपकी पवित्रता की भावना छूट जाती है। पवित्रता का मतलब ये नहीं होता है कि, किसी चीज़ से आप भागिये। बिल्कुल भी ये नहीं होता है। पवित्रता एक अपनी एक अपने अन्दर की एक स्थिति है। जैसे कमल का आप पत्ता जिसका आपको उदाहरण दिया जाता है, उसकी अपनी स्थिति है। उस पे कोई चीज़ टिकती नहीं। उसका चित्त ऐसा है कि उस पे कोई चीज़ टिकती नहीं। ऐसी स्थिति जब तक नहीं आ जाती तब तक आपके अन्दर के जो बैठे हुए देवता हैं वो पूरी तरह से जागृत हो ही नहीं सकते। ये धर्म की स्थिति जिसमें की पवित्रता एक बड़ी भारी संक्षिप्त है। और इसके गण जो हैं गणेश है। और गणेश की मदद के बगैर कोई भी कार्य नहीं हो सकता और गणेश की विशेषता यही है, कि वो इनोसन्ट है, वो बच्चे हैं। अपने माँ के प्रति जो बच्चा पूरी तरह से संलग्न होता है, वो बहुत चरित्रवान हो सकता है। बहुत चरित्रवान भी हो सकता है। और ये चीज़ें कोई करने से नहीं आती हैं। ये अन्दर होने से होती हैं। जब तक आप सहजयोग में पार नहीं हो जाईयेगा आपको कठिन जायेगा। पार हो जाने के बाद में इस धर्म की स्थापना करना आपके लिए इतना आसान हो जायेगा। क्योंकि आप देखियेगा कि एक ही माँ के पेट से इतने बच्चे पैदा हये हैं। मेरे ही सहस्रार से इतने बच्चे पैदा हये हो। तब आपस में वही भाई–बहन का रिश्ता आ जायेगा। जिस जगह ये रिश्ता टूटेगा, जिस जगह इसमें कोई भी किल्मिष आ जायेगा, जिस जगह इसमें कोई गड़बड़ी आ जायेगी, आप फौरन देखियेगा कि आपका चक्र पकड़ेगा। और पूरी तरह से पकड़ेगा और आपके वाइब्रेशन्स बंद हो जायेंगे और आप कहेंगे कि माँ, क्या हो गया? आपकी अगर नज़र इधर-उधर घूमती है। यहाँ भी ध्यान में आ कर के, में कुछ भी नहीं करूंगी। आपके वाइब्रेशन्स बंद।  मैं कुछ भी नहीं करती हूँ। आप ही ने बंद कर दिया। कुछ नहीं किया मैंने। बहुत से लोगों के वाइब्रेशन्स टूट जाते हैं। खास कर बूढ़़े लोगों को, मैं विशेष रूप से। बहुत एक आश्चर्य की बात है, कि जवान लोग तो इसको कंट्रोल कर भी लेंगे क्योंकि इनकी शक्तियाँ अभी भी इंटॅक्ट है लेकिन बूढ़े लोगों को अगर ये आदतें लगी तो मुश्किल से छूटती हैं। जिन बूढ़े लोगों को इस तरह की  आदतें लगी हुई हैं, उनका बुढ़ापा तो आ गया है, लेकिन उनके अभी आज्ञा चक्र पे वो जो भूत बाधा आ गयी है। इसलिये बूढ़े लोगों को इस तरह विशेष रूप से इधर ध्यान देना पड़ता है, कि वो अपनी पवित्रता को बनाये रखें। सब संसार में अपनी लड़कियाँ हैं, अपनी बहनें हैं, अपनी माँयें हैं, यही पवित्र रिश्ते को मानना चाहिये। और एक अपनी पत्नी से ही यह संबंध स्थापित करना पड़ेगा। और वो भी पत्नी अगर खराब हो, बुरी हो, जो भी हो, ये आपके पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार मिला है। आप कोई भी एक्स्प्लनेशन दे, वो एक्स्प्लनेशन परमात्मा को मंजूर नहीं है। क्योंकि आपके वाइब्रेशन्स बंद हो जायेंगे| वो जैसे भी हो, ये आपका भाग्य है। ये आपका पूर्वसंचित है, ये आपकी गड़बड़ियाँ पहले ही हो चुकी हैं। उसके लिये परमात्मा से क्षमा माँगें। उनसे माफ़ी माँगे। उसको ठीक करें। आप अपनी पत्नी को  भी सहजयोग से बहुत फर्क कर सकते है, उसे टॉलरेट करें। लेकिन उसके बहाने पर कोई भी सहजयोगी कहें कि नहीं साब मैं ये करूंगा, वो करूंगा और गड़बड़ काम करूंगा, तो आपके वाइब्रेशन्स बंद हो जायेंगे, चाहे और कुछ हो न हो। ये इंडल्जन्स में आया है। 

अॅब्स्टिनन्स में एक और चीज़ बड़ी खराब आ जाती है, वो है कट्टरता। आदमी कट्टर हो जाता है। मैं तो बिल्कुल हिंदू हूँ, कट्टर हिंदू। मैं तो कट्टर मुसलमान हूँ। जब कट्टर हो गया तो कटार चल गयी। जो आदमी कट्टर हुआ उसके वाइब्रेशन्स गायब। अभी एक लड़की आयी थी वहाँ दिल्ली में। बड़े मज़ेदार केसेस दिल्ली में आये थे। जरा यहाँ रेअरली आते हैं। उसको बहुत दिन से माइग्रेन था, इतना ज्यादा। मुझे क्या पता ये कौन है?  क्या है?  आ गयी, मैंने कहा, भई ठीक है, बैठो। मैंने कहा कि, तुम में कोई कट्टरता है क्या?  तो कहती है कि,  मेरे में तो कोई नहीं, मैं तो भगवान को बहुत याद करती हूँ।  मैंने कहा, ‘कौन से भगवान को?’ कहने लगी कि, ‘मैं तो भई हिंद धर्म वाली हूँ। तो हिंदू धर्म के जितने भी भगवान है, उतने सब को मैं मानती हूँ।’ मैंने कहा, ‘अच्छा, देखो बेटे, तुम ऐसा करो कि यहाँ पर नाभि चक्र पे जनक जी का नाम लो। चाहे तुम दत्तात्रेय जी का नाम लो। वो तुम्हारे आदिगुरु हैं, लिया उसने। कहने लगी कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैंने कहा, ‘अच्छा, तुम अपनी ये उंगलियाँ कान में डाल के ‘अल्लाह हो अकबर’ कहो और पैगम्बर साहब का नाम लो।’ फौरन उसकी सरदर्द चला गया। उसने कहा कि, ‘माँ, ये कमाल हो गया, क्या मेरा सिरदर्द किस वजह से था?’   मैंने कहा, ‘क्योंकि तुम कट्टर हो।’ किसी को आप नफ़रत करेंगे तो सरदर्द होगा ही आपको। अधिकतर बीमारियाँ आप में इतनी हैं, क्योंकि आप किसी न किसी कारण, किसी न किसी बहाने आप किसी से नफ़रत करते हैं। परमात्मा ऐसे आदमिओं की क्यों मदद करेगा! आप ही बताईये। क्योंकि आप और नफ़रत करें! आप अगर किसी  को और नफ़रत करते हैं तो परमात्मा आपको और शक्ति देगा कि आपको बीमारी आयेगी। वो भी आपसे नफ़रत करता है। नफरत ऐसी चीज़ है कि मनुष्य के पास एक पॅराबोली होती है उसकी। जाती है दुसरे की तरफ़ और नफ़रत ही वापस आती है। आप अगर दूसरे के प्रति प्रेम रखिये, तो प्रेम जाता है और प्रेम ही माँगता है। इसी से सारे आपके दूसरे जो षड़रिपु है, सब इसी तरह के है। ये सभी के सब छूट तभी सकते हैं, जब आपका कनेक्शन दसरों से हो जायेगा। आप अगर कहें कि मैं अपना इसको पकड़ लूँ, मैं अपने मन को काबू में कर लूँ।  मैं अपने क्रोध को काबू में कर लूँ। तो आप ( … अस्पष्ट) हो जायेंगे। आप अगर झूठ बोलना ठीक करेंगे तो आप जा कर जुआ खेलेंगें। सब कंडिशनिंग होती है। लेकिन जब तक आपका कनेक्शन उस परम से नहीं होता है, परम तत्त्व से, तब तक ये हो नहीं सकता। एक और चीज़ जिससे आपके वाइब्रेशन्स रूक जाते हैं। ये बताने में, इसमें कोई अहंकार की बात नहीं है, लेकिन सत्य बात है, कि आपने वाइब्रेशन्स सिर्फ सहजयोग के द्वारा पाये। जिस दिन आप सहजयोग के विरोध में कुछ भी कार्य करते हैं, या हमारे खिलाफ़ कोई भी बात कहते हैं, मैं चाहे नाराज़ न हूँ, लेकिन गण बैठे हुए हैं, आपको फौरन खत्म कर देंगे। 

बहुत से लोग इस बात को नहीं जानते, और वो सोचते हैं कि हम ही ने पा लिया और हम ही कुछ कर लेंगे। ( … अस्पष्ट) ये कोई विशेष ही शक्ति की वजह से काम हो रहा है। नहीं तो आज तक नहीं हुआ होता पहले। अब आपके सामने कहने में कोई हर्ज नहीं। क्योंकि आप में से बहुत से लोग इस बात को साक्षात् कर चुके हैं। ये कोई विशेष शक्ति ही के कारण हो रहा है। और ये कोई आप के करने से होने वाला नहीं है। बहुत से लोग सोचते हैं कि हम भी कर ले तो हो जायें। इस तरह के अभी दिल्ली में ही एक ऐसी लेड़ी थी कि जिनको हमने रियलाइजेशन दिया। और रियलाइजेशन देने के बाद उनके मेरे अन्दर ये भावना आ गयी, कि हम भी माताजी हो गये। और वो सब को सिखाने लगी की ऐसे करो, वैसे करो, मेरे पाँव पे आओ, चरण छूओ। ये करो, वो करो। उनके तो वाइब्रेशन्स बंद हो ही गये, और कोई शंका नहीं। लेकिन  जिन्होंने उनके पाँव छूअे थे, उन सब के ही वाइब्रेशन्स बंद हो गये। तो वो रोते रोते मेरे पास आये, कि माताजी, वो तो कह रहे थे कि आप के बाद मैं ही हूँ। मैंने कहा, ‘अरे भाई, मैंने तो ऐसा कहा नहीं था । अब आगे क्या करें?’  ये भी एक बड़ी भारी चीज़ है जिसको समझ लेना चाहिये। क्योंकि आपको मुफ्त में मिल गया। आप अपने वाइब्रेशन्स पा चुके हैं। इसलिये ये भी समझना चाहिये, कि ये चमत्कार जो घटित हुआ है, वो ऐसा ही नहीं हुआ। उसमें कोई न कोई विशेष शक्ति का खेल हुआ है। और ऐसा आज तक नहीं हुआ था। ‘न भूतो न भविष्यति’ इसकी बात भी नहीं की। जो आज हो गया है, वो क्यों हुआ है? आज तक किसी ने भी ये नहीं बताया था, कि इस उंगली पर या इस उंगली पर, ये ये चक्रों पे चलता है। और इसका ही नहीं, लेकिन दूसरों का भी इवॉल्विंग आपके हाथ में जो दिया गया है एक विशेष शक्ति का है। ये आज हमें मुँह खोल के कहना पड़ता है, कि ये आपके लिये अकल की बात है।

आपके अगर अकल हो, आप इसे सोचे और समझे तो आप जान सकते हैं कि ये वाइब्रेशन्स आपको कहीं भी नहीं मिल सकते। और कहीं मिलते ही नहीं। ये आपके अपने हैं इसमें कोई शंका नहीं है। लेकिन वो जहाँ से मिले हैं और जिसने ये कार्य किया, उसके प्रति पूर्णतया जब तक आप समर्पित नहीं होंगे, तब तक आपके वाइब्रेशन्स का फ्लो हो ही नहीं सकता है। और इसकी गवाही यहाँ पर देने वाले कम से कम कुछ नहीं तो ५०% लोग हैं। शरणागत हो जाओ। शरणागति के बगैर होता नहीं। और आदमी इतना अहंकारी है, उसको हमने वाइब्रेशन्स दे दिये। उसको हमने ठीक कर दिया। उसको सब कुछ कर दिया। उसको सब समझा भी दिया। तो भी उसके शरणागति नहीं आती। पर अभी अगर किसी को अँधे अंगूठी निकाल कर दे दिया तो हो गये उस के पैर पे। सब बेच बाच के उसके चरणों में चले जायेंगे। सब कुछ छोड़ कर के उसपे कवितायें लिखेंगे, उसपे किताबें लिखेंगे। उस पे ये लिखेंगे, उस पे वो लिखेंगे। 

लेकिन हमारे यहाँ ऐसे लोग हैं आप जानते हैं। जिनपे की अभी केस भी करने का ये लोग सोच रहे हैं। कि यहाँ से मेरा भाषण चुरा के ले गये और वहाँ पे अपना बना के बेच दिया।  ऐसे भी लोग यहाँ पे हैं। उनके वाइब्रेशन्स नहीं हैं। अरे किताब लिखने से क्या?  आप कितना लिखेंगे?  आप जानते  ही क्या हैं, यहाँ तो सारा का सारा समुंदर के समुंदर पड़ा हुआ है। दो-चार बातें हम कह देते हैं वो आप लिख देंगे किताब में। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है! समाज, संसार असलियत को जान लेता है, आज नहीं कल। और लोग थूकेंगे उन लोगों पर। मैं तो कहती हूँ कि कोई जरूरत ही नहीं, ऐसों पे केस क्या करना?  वो अपनी ही कर्मगति से जायेंगे। क्योंकि ठीक है, आपको लिखना ही चाहिये। क्योंकि ये सत्य है आपको कहना ही पड़ेगा। लेकिन कहना पड़ेगा कि ये कहाँ से आया है। ये परमात्मा का विधान है। 

हमारे फोटो के सिवाय अगर आप काम करना चाहेंगे तो नहीं कर सकते। और अगर कोई ऐसा सोचे कि हमारे फोटो के बगैर ही काम हो जायेगा, तो नहीं होता है। इसके लिये बहत से लोग यहाँ पर बता सकते है, इसलिये आप उनसे पूछे तो वो आपको बता सकते हैं। कि ये बात बिल्कुल सही है कि माताजी के नाम और फोटो के बगैर काम नहीं हो सकता। सहस्रार पे ही ये स्थान है। इसलिये सहस्रार के मंत्र में हमारा नाम होना अत्यावश्यक है। एक हम अभी गये थे किसी बाबाजी के पास में, वो रियलाइज्ड हैं, खुद। लेकिन अहंकार तो अभी उनमें है। और उस अहंकार में उन्होंने जो नाम लेना शुरू कर दिया तो उसमें उन्होंने कहा कि, ‘सिर्फ माताजी कहेंगे, माताजी निर्मालादेवी नहीं कहेंगे। सब के सहस्रार बंद हो गये। बाद में उन्होंने कम्प्लेंट करी एक हमारी वहाँ शिष्या हैं उससे कि, ‘क्या बात है?  इस मंत्र पे तो चलता नहीं, सहस्रार खुलते नहीं। क्या बात हो गयी?’  उसने कहा, ‘अच्छा, कहिये आप मंत्र!’ जब कहना शुरू कर दिया, तो उन्होंने देखा,  उन्होंने व्हेरी नाइसली वो नाम निकाल डाला। उसने कहा कि, ‘माताजी के बगैर ये चलने नहीं वाला सहस्र पे। अभी आपको मैं दिखाती हूँ।’ जैसे ही उसने मेरा नाम लेना शुरू किया , तीन नाम के अन्दर उन्हीं के खुद के वाइब्रेशन्स खुल के बहने लगे। हालाकि वो रियलाइज्ड कब के हुये हैं। ये सही बात है। आज आप के सामने मैं मुँह खोल के ये बात मैं इसलिये कहना चाहती हूँ, कि जो गलतफ़हमियाँ हैं उसको दूर कर लो। दिल्ली में इसके कारण बहत ही उपद्रव हो गया। बहुत ज्यादा उपद्रव हो गया। और उसी उपद्रव के कारण स्वरूप बहुत से लोगों के वाइब्रेशन्स खो गये थे। फिर वहाँ भी मुझे उनसे खुले रूप से कहना पड़ा, और आप से भी आज में फिर से खुले रूप से कह रही हूँ। इसमें आप का कोई भी अहंकार ड्बाने की बात नहीं। आप की माँ मैं ही हूँ। ये जान लेना चाहिये। अपनी माँ को स्वीकार्य करने में जो आदमी झिझकता है और उससे आँख चुराता है, उस आदमी में धर्म ही नहीं, ये समझ लेना चाहिये। आपने वाइब्रेशन्स मुझ से ही पाये हैं और मै ही आपकी माँ हूँ। इस बात को आपको स्वीकार्य करना ही होगा। इसमें आपका कुछ नहीं जाता है। आप बगैर माँ के पैदा नहीं हये हैं। जो आदमी ऐसा कहता है कि मैं बगैर माँ के पैदा हुआ है, उससे बढ़ के महामूर्ख कोई नहीं हो सकता। आपने वाइब्रेशन्स हवा में नहीं पाये हैं। अगर पाने के होते तो हमारा आना ही व्यर्थ हो जाता। इसलिये अपने माँ को स्वीकार्य करें। माँ का (…(अस्पष्ट.) बहुत बड़ा होता है। ईसामसीह जो कि इतना बड़ा आदमी था, उसने सूली पर भी चढ़ के अपने माँ से कहा, ‘कि माँ तेरा बेटा कहाँ हैं?  और तू कहाँ है?’  वहाँ पर भी उस सूली पर, जब कि उसके बदन से लहू बह रहा था, तब भी उसने अपनी माँ को याद किया। जो अपनी माँ को भूल सकते हैं वो दुनिया में हर चीज़ को भूल सकते हैं। सारे संसार का कोई सा भी धर्म, राष्ट्र धर्म लो, समाज धर्म लो, कोई सा भी धर्म ऐसे आदमी के अन्दर नहीं आ सकता है, जो अपनी माँ को नहीं मानता। इसलिये जो आपने वाइब्रेशन्स पाये हैं, और जो लोग पाने वाले हैं उनको ये पता होना चाहिये कि माँ का इससे पूरा ही संबंध है और अधिकार है। हालांकि इसमें आप दे कुछ भी नहीं सकते। आपका अधिकार ही है। आपका लेने का अधिकार है। मेरा तो देने का अधिकार है। मुझे आपसे लेना कुछ नहीं है। लेकिन अगर आपके वाइब्रेशन्स कल खो गये, तो फिर से मैं मुँह खोल कर आप से नहीं कहने वाली, इस बात को आप समझ लें। हर एक आदमी के लिये ये बात प्रमाण है। और यहाँ पर ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने इसके अनुभव लिये हैं, एक्स्परिमेंट किये हैं और देखा हुआ है। कल मैं दूसरी बात बताऊंगी। जो कि बहुत जरूरी है, जिसे आप भूतबाधा आदि कहते हैं। वो क्या चीज़ हैं?  वो है या नहीं? और वो किस तरह से अॅक्ट करती है? और उसका क्या इफेक्ट होता है? ये सब कुछ डिटेल्स में मैं कल बताऊंगी। लेकिन आज जो है मैंने योग पे बताया है, हठयोग पे, जो सूर्यनाड़ी पर काम करती है, अधिकतर। अब आपको प्रश्न हो तो थोड़े पूछ लें। फिर हम लोग ध्यान में जायेंगे।  जिनके भी प्रशन हों पूछ लें।  जिसको भी कोई  प्रशन हों उसे पूछ लें। 

प्रश्न : (अस्पष्ट ) 

श्री माताजी : ( … अस्पष्ट मराठी)

 जो लोग बीमार हैं, ( … अस्पष्ट मराठी) नहीं-नहीं, मैं बताती हूँ बेटे, उसको तो कुछ समझना ही नहीं चाहिये। उसको  क्या समझना है?  वो तो अनएज्युकेटेड, छोटे छोटे बच्चे हैं वो तो जल्दी से पार हो जाते हैं। वो कोई एज्युकेशन थोड़े ही है उसका। ये तो प्रकृति की अपनी एक प्रक्रिया है। इसका कोई एज्युकेशन नहीं। जितना पढ़ा लिखा हो, मुश्किल जाता है मुझे। जितने पढ़े लिखे होंगे, भगवान बचायें रखें उनसे। सरदर्द हो जाता है मुझे। जितने कम पढ़़े हैं उतना ही अच्छा है। क्योंकि पढ़ के वो भी एक अहंकार, एक तरह का विचित्र अहंकार उस आदमी में होता है। कोई जानने की जरूरत नहीं। तुम पहले लाइट जला लो। तुमको कोई जानने की जरूरत है कि ये लाइट कैसे जलाना है?  कोई जानने की जरूरत नहीं। बस बटन दबा दो जल जायेगा। फिर उसके बाद में तुमको इंजिनिअरिंग समझाऊंगी नां! सबको समझाया है, तुमको भी समझाऊंगी। उसका जो गुह्य से गुह्यतर है, सारा ही, जितना भी देवी का प्रादु्भाव हुआ,  उसने जिस तरह से शक्ति से कार्य किया और आज इस कलयुग में वो करने वाली है, वो सभी बताऊंगी। उसमें कोई शंका की बात नहीं। 

प्रश्न : (अस्पष्ट)

श्री माताजी : कोई विश्वास रखने की जरूरत नहीं। बिल्कुल भी नहीं। बिल्कुल आप विश्वास नहीं रखिये। लेकिन आप इसका मतलब नहीं कि आप अविश्वासी हैं। उसको खुले रखें, अपने दिमाग को आप खुले रखें। विश्वास रखने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। विश्वास रखने से कभी कभी और भी कोई दोष हो जाता है, कि आप मेरे पे परम विश्वास से आये, ये दोष हो सकता है। आपको विश्वास रखने की जरूरत नहीं है। आप हिलते क्यों हैं, शांति से बैठिये। आपको विश्वास रखने की जरूरत नहीं है। कोई भी ऐसी चीज़ करने की जरूरत नहीं है। आप सिर्फ जैसे बैठे हैं ऐसे बैठे रहिये। अकस्मात आपके अन्दर प्रकाश आ जायेगा । आपको क्या सूर्य पे विश्वास करना पड़ता है क्या, कुछ नहीं। क्या ये जो पत्तियाँ हैं सूर्य पे विश्वास करती हैं जिनका रंग हरा हो जाता है, सूर्य के प्रकाश से। सब अपने आप से होता है। आप विश्वास करें चाहे न करें, परमात्मा तो है ही। विश्वास करना और न करना  उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। न विश्वास चाहिये न ही उसका एज्युकेशन चाहिये। न ही उसके लिये कोई बलप्रयोग चाहिये कि उसके लिये कोई शक्ति चाहिये की सर के बल आप खड़े हैं कि नाच रहे हैं कि कूद रहे हैं। कुछ भी नहीं चाहिये। कुछ मुँह पर आप एक्स्प्रेशन मत लाईये। यहाँ किसी को ठगा ठगी नहीं करने की है। आप ही को पाना है। बहुत से लोग में देखती हूँ कि ऐसा विकट मुँह बना लेंगे, कहीं हँसने वाला, कहीं कुछ। वो सोचते हैं कि इससे ही कुछ एम्प्रेशन मार देंगे। एम्प्रेशन तो भगवान पे पड़ना चाहिये। अगर आप का संचित है तो हो जाता है। आज नहीं कल, कल नहीं परसो। आप हिल क्यों रहे हैं, कण्ट्रोल करिये। 

प्रश्न: पुनर्जन्म है क्या ? ….(अस्पष्ट)  

श्रीमाताजी : किसको हाँ, है, अनेक जनम होते हैं पुनर्जन्म अगर मुझ से पूछो तो मैं कहूँगी। तो उसकी सिद्धता तुम्हें बाद में आयेंगी। उसको सिद्ध भी कर सकते हैं। लेकिन आप अपने पुनर्जन्म पे नहीं जायें। उसकी वजह ये है कि मैंने देखा है कि हिंदू का जो माइंड होता है जो आज हिंदू हैं, ये पहले मुसलमान भी रहे होंगे।   इनका जो माइंड होता है इसमें पुनर्जन्म की भावना बड़ी तीक्ष्ण होती है। उसके कारण वो पास्ट में ज्यादा रहते हैं कि हम पिछले जन्म में क्या थे?  अरे भाई, कुछ भी रहे होंगे। आज क्या है?  अभी, प्रेझेंट, इस मुमेंट, ये जरूरी चीज़ है। इसलिये पुनर्जन्म पे आप चित्त न दें। जो भी हो पुनर्जन्म हो गया होगा, कोई हर्ज़ नहीं। आप के जो कुछ कर्म है  वो पीने के लिए ही मैं बैठी हूँ, उसका शोषण ही करने के लिये मैं बैठी हूँ। सब कुछ कर लो, लेकिन सिर्फ इतना करो  कि प्रेम से, अपने प्रति प्रेम से, और सारे ही समाज के प्रति प्रेम से बैठो।  सिर्फ प्रेम से अपनी ओर देखो।  किसी के प्रति कट्टरता मत रखो। किसी के तरफ द्वेष भाव नहीं रखो। अत्यंत प्रेमपूर्वक रहो। फिर किस को अपने मन से हटाना है, कौन राक्षस हैं?  कौन दानव हैं?  वो भी मैं आपको बाद में बता दूंगी। 

प्रश्न : ….(अस्पष्ट) 

श्रीमाताजी : हाँ, आप पार हो गये।  माने ये पार होने का भी एक मैंने कुछ ऐसा देखा है, कि हमारी ऐसी कल्पना होती है, कि पार होने का मतलब ये कि हम कृष्ण बन गये। ऐसा नहीं होता है। जो नहीं होता सो नहीं होता, जो होता है वो होता है। उसमें कोई हमारे कहने की चीज़ नहीं होती। पहले निर्विचारिता आती है आप के अन्दर में। जैसे ही आज्ञा चक्र को कुण्डलिनी लाँघ जायेंगी आप निर्विचार हो जायेंगे। आप में एक तरह की ब्लँकनेस आ जायेंगी। लेकिन सर में बहुत हैवीनेस रहेगी। लाइटनेस नहीं आने वाली है। और जिस वक्त में आज्ञा चक्र को लाँघ कर के कुण्डलिनी ब्रह्मरंध्र को छेद जायेगी, तब एक तो आप एकदम लाइट हो जायेंगे। आपके हाथ में कुछ ऐसा लगेगा, कुछ ठण्डी-ठण्डी, ठण्डी-ठण्डी लहर सी आ रही है। किसी किसी में शुरू शुरू में गरम गरम सी आयेगी।   जैसे ही ठण्डी-ठण्डी आने लग जायेगी, लाइटनेस भी आने लग जायेगा। थोड़ी देर में, वो काफ़ी आने के बाद एकदम आप लाइटनेस फील करेंगे और अंदर से ऐसा लगेगा कि आप निर्विचार भी हो गये हैं, लेकिन आप पूर्णतया सतर्क, पूर्णतया आप सतर्क हैं। माने आप सोये हुए नहीं हैं। आप सतर्क हैं, ऐसा आपको लगेगा।  फिर उसके बाद बहुत से लोग कहते हैं कि, ‘माताजी, जब हम निर्विचार हो गये, उसके बाद हमें एकदम निर्विकल्प हो जाना चाहिये।’ होना तो चाहिये। हमारी तो यही इच्छा है, पर होता नहीं।  इसमें से हमारे जो हमने पाँच-छः साल आज मेहनत करी है लोगों पर, उसमें से हम कहेंगे कि ५% लोग ऐसे हैं, कि जो एक बार पार हो गये तो निर्विकल्प पे ही खड़े हो गये। ऐसे भी लोग हैं। बहुत ही वो ऐसे लोग हैं, कि वो बहत ही पीछे रहते हैं।  मैं जानती हूँ कि पॉइंट्स कहाँ है, वो कहाँ पे बैठे हैं। लेकिन ऐसे बहुत कम लोग हैं। अधिकतर लोग निर्विचारिता में उतरते हैं। मतलब क्या है कि आप यहाँ बीचोबीच आ कर के यहाँ के यहाँ, यहाँ के यहाँ करते रहते हैं। यहाँ से आप अपना इगो, सुपर इगो दोनों को देखते हैं और वो नीचे भी उतार सकते हैं आप, उसको निकाल सकते हैं। अनेक उसके विधित हैं, उसको आप निकाल सकते हैं। उसको बाद आपको सारी विधियाँ, उसकी सारी मुद्रायें, उसका तरीका, ये जो है इस तरह से घुमाना और ये सब कुछ, आप सीख सकते हैं। वो हम लोग सिखायेंगे। लेकिन आप पकड़ते जायेंगे। लेकिन आपको पता होगा आपको पकड़ गया है। माने अभी, जैसा मैंने कहा, मैं जनार्दन स्वामी जी से मिलने गयी थी। जैसे मैं गयी, वो बड़े भारी साधु-पुरूष हैं और वो नागपंथीय पार आदमी है। तो उन्होंने देखते ही साथ मुझ से कहा, ‘माँ, मेरा आज्ञा पकड़ा और मेरा विशुद्धि पकड़ा है। दोनों को जरा साफ़ कर दीजिये।’ मतलब ये की आप देखते हैं कि आपका आज्ञा व विशुद्धि पकड़ा है। माने आप देखने लग जाते हैं। आप के अन्दर अवेअरनेस आती है। आपको अभी तक मालूम नहीं ‘मेरा हृदय कहाँ चल रहा है। मैं कहा चल रहा हूँ।’ पर जब  आप सहजयोग में पार हो जाते हैं तब आपको फौरन लगता है कि यहाँ से कुछ उठ रहा है, कुछ जा रहा है। फिर आपको लगता है यहाँ पकड़ गया, वहाँ पकड़ गया है। फिर आप ऐसे-ऐसे कर के उसको निकाल दीजिये, तो निकल जायेगा। यहाँ कुछ कर दीजिये वो निकल जायेगा। वो कैसे निकालने का वो हम बताते है। माने आप और आपकी मोटर कार जो है, वो अलग हो जाती है। फिर आप अपनी मोटर कार भी साफ़ कर सकते हैं। उसको ठीक भी कर सकते हैं। ये चीज़ पहले हो जाती है जो निर्विचार आदमी हो जाता है, उस वक्त। पर निर्विचारिता आने के बाद भी, जब तक आपकी स्थिति थोड़ी सी जमती नहीं है, श्रद्धा में।  क्योंकि अब श्रद्धा शुरू होती है, जब जानने के बाद। जब वाइब्रेशन्स आ गये तब श्रद्धा में आना पड़ता है। तब आप जबरदस्ती कभी यहाँ आयें, पता नहीं आयें कि नहीं आयें, हो रहा है कि नहीं हो रहा है। इस तरह से आप करते रहेंगे, तो बनने वाला नहीं मामला। जरा सा उसमें स्टेडीनेस जैसे आपके अन्दर आ जायेगी वैसे ही आप देखियेगा कि आप के हाथ से आप लोगों की कुण्डलिनियो को आप जागृत करेंगे।   कुण्डलिनी को आप जागृत करेंगे। इतना ही नहीं आप कुण्डलिनी को जागृत करेंगे। (मराठी… साइड में बातचीत) 

प्रश्न : ….(अस्पष्ट मराठी…) 

श्रीमाताजी : ….(अस्पष्ट मराठी…) आप अगर एक बार पार हो गये और जरासी निर्विकल्पता है  तो आप ध्यान में ही रहते हैं। आप ध्यान में ही रहते हैं। आप हर समय ध्यान में रहते हैं। फिर क्या सूतक, कौन क्या?  और कौन क्या?  हर समय आप ध्यान में ही रहते हैं। लेकिन विशेष दिनों का कुछ-कुछ असर होता ही है। जैसे महाशिवरात्रि के दिन एक विशेष रूप (..अस्पष्ट ) होता है। इन सब दिनों का बड़ा महत्त्व होता है।  वो  दिन मैंने सबको मैंने एअरकंडिशन्ड में डाल दिया था।  सबकी हालत थुर थुर हो रही थी, तो वो हो सकता है। लेकिन तो भी जैसे सूतक के दिन आपका मन अगर दुःखी रहता है तो ज्यादा ही ध्यान में रहना चाहिये। उसमें इससे कोई अशुभ तो कभी होता ही नहीं । इससे कभी भी अशुभ नहीं होगा, याने आपको आश्चर्य होगा। एक साहब थे उनको बाधा ने पकड़ा, आप समझ लीजिये। और उनके कारण दस और सहजयोगियों को पकड़ा। अब दस सहजयोगी उनसे बहुत इम्प्रेस्ड हो गये थे पहले से ही, अब उन्होंने पकड़ा। तो मैंने कहा कि उसको तुम लिख कर के और पच्चीस जूते लगाओ। इक्कीस वैसे कहते हैं, इक्कीस जूते लगाओ।  उन्होंने उसको इक्कीस जूते लगायें। ये लोग तो छूटे नहीं पर वो छूट गया। क्योंकि वो इन दस आदमिओं ने उसको लगाये थे उसको उतने जूते दस मर्तबा लगें और ये लोग अपने को जो मार रहे थे, वो एक ही मर्तबा लगे । जूता भी मारिये तो भी आप छूटेंगे। कुछ भी करियेगा उद्धार ही होगा। हम आपको अगर डाँट दें, तो भी उद्धार होगा। हम आपको प्यार कर लें तो भी उद्धार होगा। मतलब उद्धार ही होने वाला है। इससे संहार होने वाला नहीं, उद्धार ही होने वाला है। आप अगर कहें कि, माताजी, फलाने मेरेको बहुत सता रहे हैं, उसको मार डालिये।’ मैं उसको मारने को जाऊंगी, तो उसका उद्धार हो जायेगा। वो अच्छा हो के इधर आ जायेगा। ट्रान्सफॉर्मेशन ही होगा। इससे और कुछ होने ही नहीं वाला। जैसे अब कोई कहता है, कि इसको हटाओ। ये | मिनिस्टर अच्छा नहीं इसको हटाओ। मैंने कहा, इसको हटाना काहे को? उसी को बदल देते हैं न, ट्रान्सफॉर्मेशन हो जायेगी। इससे कोई आदमी निकलेगा नहीं, हटेगा नहीं। ट्रान्सफॉर्मेशन होगा। कोई अगर महादुष्ट होगा, तो विचलित हो जायेगा। उसको परेशानी हो जायेगी। फिर धीरे-धीरे वो भी अपने चक्कर में आ जायेगा।  ये ट्रान्सफॉर्मेशन का तरीका है। फिर आप उसको चाहे डाँटो, चाहे मारो। चाहे उसको कुछ भी करो । चाहे वाइब्रेशन्स दो, चाहे उसके बारे में सोचो। आप उसपे बंधन डालो। आप देखियेगा उसका ट्रान्सफॉर्मेशन हो जायेगा। किसी का बिगड़ने नहीं वाला। अब जैसे बहुत से लोग है, मेरी सासू मुझे बहुत सताती है। मैंने कहा ठीक है। सासू को चप्पल नहीं मार सकती तो अधर्म हो जायें । तो ठीक है तुम उसपे बंधन डालते बैठे रहो, सासूजी के नाम से। थोड़े दिन में पता चला की सांसू जी आयी। एकदम लाल-लाल उसका मुँह हो गया, उसकी हेल्थ बड़ी अच्छी हो गयी। और कहने लगी कि, ‘मुझे तो तुम पे इतना प्रेम आ रहा है कि पता नहीं क्यों इतना तुम्हारे उपर प्रेम आ रहा है।’ वो आश्चर्यचकित कि यही वो है क्या?  ये कैसे हा गया?  उधर वो भी जवान दिखने लगी। उसके मूँह पे भी एक तेज़ आ गया। इससे सिर्फ ट्रान्सफॉर्मेशन होगा। क्योंकि मनुष्य में ही भगवान होने की भी क्षमता है और राक्षस होने की भी क्षमता है। इसलिये मनुष्य भगवान की ओर जायेगा।  चाहे आप उसके लिए आप कुछ भी करे आप चित्त में उस आदमी के लिये विचार ही लाये, उसी वक्त वो आधा छूट जायेगा। उसको आप मारो, डाँटो, पीटो, कुछ भी करो।  उसका भला होगा। एक दशा में जाने के बाद। ये नहीं की आप पार हो गये और मारना शुरू कर दिया। एक चीज़ को समझ लेना चाहिये, जान लीजिये। ये ट्रान्सफॉर्मेशन का तरीका है, ट्रान्सफॉर्मेशन है। कोई चेंज करने का नहीं।  कुछ चेंज करने का है। मनुष्य बदल जाता है। और कोई प्रश्न है? 

प्रश्न : ….(अस्पष्ट मराठी…) 

श्रीमाताजी : नहीं, ऐसी तो बात नहीं है। छोड़ने की बात नहीं है। लेकिन उसका शास्त्र सीखना पड़ता है।  अब जैसे आपको बताते हैं कि सीधी बात है, कि ज्यादातर लोग हैं राम का नाम लेते हैं, ज्यादातर लोग। हमारे यहाँ तो इसकी बीमारी बहुत लोगों को है। अब राम आपके हृदय चक्र में हैं, स्थित है। अब वो राम का नाम लेते हैं, हदय चक्र ही उनका पकड़ा रहता है। क्योंकि क्या है कि जहाँ से नाम लेने का है उसका मार्ग बंद है और आप उसी पे ठोक मार रहे हैं। ठोक मार रहे हैं। इस वजह से आपका राम नाम पकड़ा रहेगा। तो अब ऐसे आदमी का अगर हृदय चक्र ही पकड़ा हुआ है। तो रियलाइजेशन के बाद में हम रियलाइजेशन देते वक्त राम ही का नाम लेते हैं। लेकिन हमारा कनेक्शन है, इसलिये उसका दरवाजा खुल जाता है। लेकिन तो भी उसको केअरफुली रहना चाहिये। कि अपने हृदय चक्र पे ज्यादा चोट न करें। ये समझ लीजिये, किसी आदमी को पेट का कैन्सर है। और वो कृष्ण का नाम ले रहा है तो उससे उसको कोई फायदा नहीं होने वाला। उसको तो किसी गुरु का नाम लेना चाहिये। क्योंकि वैष्णवी पॉवर जो है धर्म की, उसे इस्तेमाल करना पड़ता है, कैन्सर के लिये। अब किसी का, अगर आपका विशुद्धि चक्र पकड़ा हुआ है, किसी का माने ये कि विशुद्धि चक्र नाम से विशुद्धि चक्र, पहली चीज़ पकड़ेगी फिर जिसका नाम लोगे वो चक्र पकड़ेगा। जिन्होंने भी नाम लिया वो मुश्किल काम है और जिन्होंने अति लिया तो वो अति मुश्किल काम है। तो आपने अगर नामस्मरण किया है, यहाँ से, कृष्ण के लिये लिया तो बस यही पकड़ेगा। लेकिन आपने अगर किसी का, शिवजी का किया, तो हृदय चक्र और ये कॉम्बिनेशन जम गया। अब दोनों को छुड़ाना पड़ता है। अच्छा, फिर हम शिवजी से छुड़ायेंगे। और कृष्ण से ही छुड़ायेंगे। अब आपको पता होना चाहिये कि आपका कौनसा चक्र पकड़ा है और उसी को आपको छुड़ाने के लिये आपको कौनसा नाम लेना चाहिये। संध्या भी, या कोई सी भी चीज़ हो, इसका जब आपको आपको शास्त्र पता नहीं, अशास्त्र से काम करना सहजयोग के विरोध में होता है। सब कुछ अत्यंत शास्त्रीय, उसका प्रोटोकॉल है, उसका तरीका है, उसका ढ़ंग है। ये तो हम बात-बात पे बताते रहते हैं। जैसे एक हरिद्वार हम गये थें। यहाँ हैं एक महाशय बैठे ह्ये हैं, बहुत वो भी एक बहुत पहुँचे हये पुरुष है। लेकिन वो बेचारे, उन सब से मैंने कहा था कि गंगाजी मेरे सर पे नहीं चढ़ सकती। इसलिए आप सर पे मत ड्रालना, चाहे और कहीं पानी पड़ जायें। लेकिन केअरफुल रहना, मेरे सर पे मत डालो। लेकिन उन्होंने शायद सुना नहीं शायद, हो सकता है। उन्होंने थोड़े से पानी की छींटे मेरे सर पे ऐसे डाल दिए। फौरन गंगा उसे खिंच के ले जाने लगी। मुझे मालूम था, जैसे ही पानी पड़ा पहले मैंने उनका पैर पकड़ लिया। वो बच तो गये, लेकिन १०७ बुखार से सात दिन पड़े। प्रोटोकॉल होता है हर एक चीज़ का। आप अगर मेरी ओर अगर पैर कर के बैठें, वाइब्रेशन्स गायब। सब चीज़ की इज्जत होती है। ये चीज़ हिन्दुस्तान के लोगों को आती है। अमेरिकन लोगों को भगवान  भी माफ़ कर देता है, वो जानते नहीं। क्योंकि उनको कुछ समझता ही नहीं है। कि किस तरह से इसका होता है?  सब जिस तरह सब संपन्न करना चाहिये उस तरह से पूर्ण संपन्नता है। उसकी श्रद्धा है, उसका तरीका है। एक एक प्रोटोकॉल है। आप कौन सी उंगली से कुमकुम लगायें। हर एक चीज़ का है। इस उंगली से, आपका आज्ञा चक्र का है। हर एक चीज़ में आपको पता होना चाहिये कि ये उंगली आपको कहाँ इस्तेमाल करनी चाहिये। ये कहाँ इस्तेमाल करनी चाहिये। इसका क्या अर्थ होता है। सब धीरे – धीरे, आपने जितने भी यहाँ, जिसको रिच्यूअलिजम कहते हैं, वो कहाँ से आया?  वो क्यों आया?  ॐ का क्या मतलब है?  सब चीज़ आप समझ लीजिये। इन सब चीज़ में अर्थ है। और जो प्रार्थना है, परमात्मा से प्रार्थना करने की होती है। जो नमाज़ है, जो बाप्तिज्म है, ये सब चीज़ों का अर्थ आपको सिर्फ सहजयोग में लग सकता है। क्योंकि अभी पहली मर्तबा आपके वाइब्रेशन्स शुरू हो गये। जब तक आपके अन्दर वो इलेक्ट्रिसिटी नहीं आयेगी तो आप क्या उसका उपयोग दिखायेंगे, हवाई बात हो जायेगी। ये पंखा चलने लग जायेगा। ये होने लग जायेगा। पहले बिजली तो आये। बगैर उसके क्या?  जैसे हर एक चीज़ के बटन यहाँ लगे हुये हैं, आप दबा रहे हैं एक बटन, चल दुसरी चीज़ हो रही है। उसका सारा शास्त्र सीखने के बाद आप अँधे जैसे जो आज तक करते आये हैं, वो आपको पहले शुरू में छोड़ना होगा, पूरी तरह।  जब आप पूरी तरह से उसको छोड़ेंगे, तब उसके शास्त्र के अनुसार पूरा आप सीख लीजिये, सब समझ लीजिये, तब आपको पता होगा। जैसे आज ही  उन्होंने पूछा कि कुम्भ की स्थापना क्या चीज़ होती है?  उसी पर मैंने आधा घण्टा  उनको सुनाया। उन्होंने कहा  ये तो कहीं शास्त्र में लिखा नहीं।  मैंने कहा, ‘भाई, उस वक्त लिखते तो क्या फ़ायदा होता?  आज तुम लोग समझते हो तो बता रहे हैं।’ बहुत सी बातें आप ये कहेंगे कि माँ  हमने कभी नहीं पढ़ा। ऐसा नहीं था। लेकिन उसका साक्षात् होगा, मतलब आप देख सकेंगे कि ऐसी ऐसी चीज़ है। अभी ये  लोग  बैठे  जो ऐसे ऐसे ऐसे हाथ कर रहे हैं  न, ये लोग सब जानते हैं कि कहाँ हमारा कौनसा चक्र पकड़ा है?   कैसे हमको कुण्डलिनी उठाना है?   किस तरह से हमको बंधन लेना है?  ये सब लोग जानते हैं। जो लोग जानते नहीं हैं, वो सोचते हैं कि पता नहीं ये क्या कर रहे हैं?  मंत्र विद्या क्या कर रहे हैं?   इसका एक तरीका होता है। इसका एक ढंग होता है। अभी किसी का भी आज्ञा चक्र पकड़ गया तो वो यूँ पकड़ के बैठ जायेगा। वैसे तो विचार से आप अपने सारे चक्रों को साफ़ कर सकते हैं। जब गति आपकी ऊँची हो जाती है तब आप इतने हाथ-पैर नहीं हिलाते हैं। कि जरासा कम हो जाता है। जरा सी ऊँची गति पर पहुँचने पर आदमी फिर मन से ही उस चीज़  को सफ़ाई करता है। चित्त से ही उस चीज़ को सफ़ाई कर सकता है। अच्छा, अब जायें ध्यान में। जो लोग बीमार हैं, परेशान हैं, वो लोग भी ऐसे हाथ करें हमारी ओर। और कम से कम चार दिन ध्यान में जरूर आईये। चार दिन में आप जरासा अच्छे से स्टेडी हो जायेंगे। स्टेडीनेस की जरूरत होती है। कोई गॅरंटी किसी की चीज़ नहीं है। ये होना पड़ता है। आप आँख बंद करें । और जो आप पार हो जायेंगे तो हमको  ही ( …खुद ही.. – अस्पष्ट) पता हो जायेगा। लेकिन आप लोग भी आँख बंद कर के और देखें, आपके अन्दर अगर ठण्डा ठण्डा आ रहा हो। और आपके विचार अगर ठहर गये हो, तब आप देखिये अपने अन्दर। दूसरों को मत देखिये। एक आदमी आया तो एक आँख उठा के देख लिया। ऐसी चंचलता होगी तो कभी कुछ न होगा,  शांति से।