Lalita Panchami

मुंबई (भारत)

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ललिता पंचमी पूजा   दिनांक – 5 फरवरी 1976  स्थान – मुम्बई प्रकार – पूजा

इतना सब होते हुए भी बार बार इस तरह की बात बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं हमारा क्या फ़ायदा हुआ? इस प्रश्न में निहित एक बहुत ही छोटी सी छुपी हुई बात है कि हमें जो कुछ मिला है उसके प्रति हमें कोई भी उपकार बुद्धि नहीं है।ज़रा सी भी उपकार बुद्धि नहीं है कि हम सोचते हैं कि हमने क्या सहज में ही पा लिया। उपकार बुद्धि जिसे sense of gratitude अंग्रेजी में कहते हैं जब तक आपके अंदर होगा नहीं सब बात उलटी बैठती जाएगी।

आज का दिन बड़ा शुभ है। ललिता पंचमी है। ललिता का मतलब है सुंदर, अति सुंदर और ललिता गौरी जी का नाम है क्योंकि कल गणेशजी का जन्म हुआ है इसलिए आज गौरी जी का दिन मनाया जाता है। वैसे भी आप जानते हैं कि मेरी कुंडलिनि माने कुंडली का नाम ललिता है। लालित्य सौंदर्य को कहते हैं। मनुष्य वही सौंदर्य होता है, वही सुंदरतम होता है जिसमें sense of gratitude होती है। जिस इंसान में sense of gratitude ज़रा भी न हो वह इंसान पशुवत है। पशु में भी होती है। कुत्ते में भी होती है। एक कुत्ता उसको आप थोड़े दिन पालिये-पोसिये देखिये आपको आश्चर्य होगा वो किस तरह वफादार होता है। जैसे ही sense of gratitude आपके अंदर जागृत होगा वैसे ही प्रेम के दर्शन अंदर से आने शुरू हो जाते हैं। बहुत से लोग कहते हैं हम तो माँ आपको surrender हैं। मुझे हँसी आती है। मुझे क्या आप surrender होने जा रहे हैं। मैंने तो आपसे कुछ माँगा नहीं था। मैं तो देने भर के लिए बैठी हूँ और ना मेरा कुछ वास्ता है। किंतु यह जो परमात्मा है ना ,वह ज़रूर देखता है कि आपमें कुछ उस उपकार की बुद्धि है या नहीं। जब नहीं है मैं कुछ भी आपका recommendation करूँ वो सुनते नहीं हैं। इसलिए बहुत से लोग जो अपने को समझते हैं वो पार हैं, उनकी जागृति होगयी है, वो बड़े evolve हो गए हैं, अभी वहीं पर हैं। बिलकुल यूँ ही चल रहे हैं। अपने अंदर उपकार बुद्धि लानी ज़रूरी है। इसके बगैर सब चीज़ ugly हो जाती है। लालित्य उससे खत्म हो जाता है। लालित्य ऐसे इंसान में नहीं आता। लालित्य उसी इंसान में होता है जिसमें sense of gratitude होता है,जिसमें उपकार बुद्धि होनी चाहिए। 

आदमी पता नहीं कैसा अजीब इंसान है? कैसी अजीब चीज़ है कि वो अपने से इस तरह से compromise कर लेता है वो अपने अंदर का जो लालित्य है उसे भी नहीं पहचानता और अपने अंदर की जो ugliness है उसके साथ रहता है हर दम। और वो सोचता है कि उसी के साथ रहने से वो बड़ा भारी आदमी,इंसान होते चला जा रहा है। शुरू से ही देखिये, जन्म से ही देखिये परमात्मा ने हमारे लिए क्या नहीं किया? जानवर से हमें इंसान बनाया,यह सारी सृष्टि कितनी मनोरम, कितनी सुंदर और कितनी व्यवस्थित हम लोगों के लिए बनाई है लेकिन हमें उनके प्रति कोई sense of gratitude नहीं है। हम तो taken for granted हैं। हाँ! दिया! तो क्या हुआ! जैसे हम तो बड़े अधिकारी थे इन सब चीज़ों के लिए कि, मिल गया तो क्या हुआ? मनुष्य जब इस तरह की झूठी बातों में जीता है तब वो अपनी गंदगी भी नहीं देख सकता क्योंकि उसके लिए जो सच्चाई है वही दृष्टिगोचर नहीं होती। सच्चाई यह है कि आप अपनी गंदगी के साथ जी रहे हैं। आपके अंदर जो गंदे तत्व हैं उनपर आप जी रहे हैं। उसको वो नहीं समझ पाता क्योंकि वो अँधा है और उस अंधेपन को ही बड़ी चीज़ समझके उससे compromise करते हैं। उसे हम लोग भूत कहें, बाधा कहें कुछ भी कहें,कुछ भी नाम दीजिये। ये आदत लग जानी चाहिए हमारे अंदर,सब सहजयोगियों के अंदर, कि हमारी गंदगी की हम सफाई करें। जैसे कि हमारी आदत है, हाथों को कुछ गन्दा लग जाता है तो फौरन हाथ धो लेते हैं। यह तो मनुष्य सीखकर आया है। जानवर फौरन अपना हाथ नहीं धोता है। मनुष्य हाथ जल्दी से धो लेगा,नहा लेगा जल्दी से। सफाई कर लेगा अपने शरीर की। लेकिन इस मन के अंदर कितनी गंदगी हमारे अंदर बसी हुई है,जिसके साथ हम जी रहे हैं और जन्म जन्मान्तर तक जीते रहेंगे। आप गर सोचते हो कि इसी जन्म में ख़त्म होजाएगी तो ये सही नहीं। ये गंदगी जन्मजन्मान्तर तक चलेगी और उस जगह पहुँचा देगी जो महान गन्दी चीज़ है जिसे कि हम नर्क कहते हैं।

आज इतना सुंदर दिन है कि मैं आपको उस नर्क की पूर्ण कल्पना देने, ना ही उसके बारे में बातचीत करना चाहती हूँ। लेकिन गन्दी से गन्दी कोई चीज़ आपके अनुभव में होगी जिसको देखते ही आपने तय किया होगा कि होगी इस तरह की वो जगह जो अपने अंदर आप बना रहे हैं। हाँ, माँ ने हमें जागृति दी है ठीक है। मानते है हम,माँ ने हमें पर किया मानते हो। फिर क्या? आगे? मानते हो माने मेरे ऊपर कोई उपकार कर रहे हैं क्या? इस तरह से लोग बातचीत करते हैं माने मेरे ऊपर उपकार हुआ जा रहा है। ऐसे लोगों का evolution कैसे हो सकता है।

आज हम यहाँ हवन करने वाले हैं विष्णुजी का। अब ये हवन क्या है इसे समझ लेना चाहिये। जो मनुष्य निर्मल मन से यहाँ बैठा हुआ है उसी पे उसका असर आने वाला है और जो अशुद्ध मन से यहाँ बैठा हुआ है उस पर कोई असर नहीं आने वाला है। उसके लिए ये व्यर्थ चीज़ है। हवन या पूजा, प्रार्थना, नमाज़, मंत्रोच्चार, तंत्र आदि सब कुछ। तंत्र माने जो गन्दी चीज़ है वो नहीं कुंडलिनी itself। ये सबकुछ हमें उस राह का मार्ग प्रदर्शन करते हैं। उस राह को आलोकित करते हैं जिस पर हमें उठना है। एकदम से चमका देती है triggering हो जाती है। अपने जीवन में वो चीज़ एकदम से trigger हो जाती है। जैसे हम एकदम कूद जाते हैं। इस सीमित जीवन से हम असीम में एकदम से कूद जाते हैं।

हवन में श्री विष्णु का हवन, सारे बम्बई शहर के लिए इसका फ़ायदा है क्योंकि मैं अपने हाथों से आज करने वाली हूँ। श्री विष्णु के हवन का मतलब ये होता है कि श्री विष्णु ही हमारे evolution के,हमारे उत्क्रांति के संयोजक,वे स्वयं ही उठकर करे श्री कृष्ण बने। श्री विष्णु के इस अनुष्ठान को हम सारे संसार में trigger कर देते हैं, उसमें चमक डाल देते हैं। उसमें एक नयी तरह की तरंगें उठा सकते हैं,जिससे मनुष्य की दृष्टि अपने evolution की ओर जाये कि और जिस तीन डायमेंशन में, जिस तीन चक्करों में वो फंसा है उसके बंधनों से, उसके bondage से वो छूट जाये। लेकिन यह भी समझना चाहिए कि परमात्मा को गुलाम लोगों से कुछ मिलने वाला नहीं है। जो गुलाम हैं वो परमात्मा को क्या नमस्कार कर सकते हैं? उस सारे ही बंधनों को छोड़ने के लिए, उस सारी ही चीज़ों को छोड़ने के लिए आपमें ताकत नहीं है ये हम जानते हैं। लेकिन तैयारियाँ आप रखें फेंक हम देंगे। आज से तैयारी रखें कि “जो जो मैं अपने अंदर झूठ लिए बैठा हूँ उन्हें मैं फेंक दूंगा।”

सहजयोग का आप कल्याण नहीं कर सकते हैं। आपको कल्याण करना है सहजयोग से।आप अपने को सोचते हैं कि आप सहजयोग के कल्याण के लिए यहाँ आए हैं तो आप बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं क्योंकि सहजयोग साक्षात् परमात्मा का साक्षात्कार है। इससे जिसे लेना है, जिसे बढ़ना है वही आगे जा सकता है और जो देने यहाँ आएगा वो कुछ भी नहीं पा सकता। देना तो दूसरी बात है। सहजयोग के प्रति उपकृत होना चाहिए। उपकृत होने का मतलब अंदर भावना ये होनी चाहिए कि आपके बड़े उपकार हैं, इतनी कृपा हमारे ऊपर हुई कि हम पार हो गए। कुंडलिनि का पूर्ण साक्षात्कार हमें हुआ और हम उंगलियों के इशारे पर कुण्डलिनियाँ उठा रहे हैं। क्या मजाल है किसी की इस तरह से कर सकें। बातें करने वाले बहुत देखे होंगे आपने, लेकिन कुण्डलिनियों को उंगलियों पर नचाने वाले ये जो आप लोग यहाँ बैठे हुए हैं पता होना चाहिए कि परमात्मा के प्रति किस कदर उसके आगे झुकना चाहिए और उसके उपकार मानना चाहिए कि “हे प्रभु, हमारी क्या, हमारी ऐसी कौन सी विशेष बात थी कि तुमने हमारे ऊपर इतना उपकार किया? किसलिए आप इस तरह से हमारे ऊपर धर आए हैं प्रभु? क्या हमारी हस्ती थी? हमने क्या किया? आखिर कौन से ऐसे पुण्य हमने जोड़े थे जिसके लिए तुम इस तरह से हमारे ऊपर धर आए और सारी कुण्डलिनी हमारे सामने खोलके रख दी।” उसका सारा का सारा सूक्ष्म से सूक्ष्म ज्ञान आप लोगों में है। मूर्खों की बात छोड़ दीजिए। महामूर्खों की बात आप करते हैं, जो कि अपने को सोचते हैं कि हम बड़े हो गए हैं। आप लोग यहाँ उल्लू बनने आये हैं या अक्लमंद बनने आये हैं यह सोचके आएँ। मैं आपको यहाँ उल्लू बनाने नहीं आयी हूँ या आपको enticement में डालकर आपको उल्लू बनाकर और आप लोगों को चढ़ाती हूँ। वास्तविक में आपको चढ़ना होगा उस सीढ़ी पर। एक ही तरीका है आधे अधूरे मन से ना आइये। पूरे मन से समर्पण में। पूरे मन से कि प्रभु तुमने कितना दिया हमें, हम क्या करें तुम्हारे ? दुनिया की चीज़ मांगते हैं कभी कभी, सत्ता मांगते हैं ,पैसा मांगते हैं। छोटी छोटी चीज़ों में आप लोग अभी तक उलझे हुए हैं। जिस परम तत्व की मैं बात करती हूँ वो सभी चीज़ देखने वाला है। योग,क्षेम,वहाम्यहं कह दिया है देख लेगा आपका। और ऐसी कौनसी चीज़ें हैं जो उससे बढ़के संसार में हैं। इस परम तत्व से बढ़कर ऐसी कौन सी चीज़ दुनिया में है जो उसकी तुलना में खड़ी भी हो सकती है, जिस तत्व के सहारे सारा संसार चल रहा है उसके अंदर डूब जाने पर, उस अमृत को पाने के बाद, आप क्या नहाने का पानी पीने की बात करियेगा मुझसे? इसलिए आपके ऊपर उसके आशीर्वाद की जो छाया है वो आपको महसूस नहीं है। उसका पता नहीं लगता क्योंकि आप अभी भी किनारे पर डुबकियाँ मार रहे हैं। आज श्री विष्णु के इस सत्र में पूर्ण यही ध्यान रखिए कि आपके evolution के लिए किया जा रहा है, मुझे कोई ज़रूरत नहीं है। इतना ही नहीं ,आज बम्बई शहर में, वातावरण में यह तरंगें जाकर चमकाएंगे। इन तरंगों की वजह से सारे बम्बई शहर में जो विष्णुमयी उत्क्रांति की चिंगारियाँ जलेंगी। इसको समझ लेना चाहिए ये बड़ी मत्त्वपूर्ण चीज़ है। हो सकता है आज आप दस-पाँच आदमी बैठे हैं,लेकिन आप सबका पूरा चित्त यहाँ होना चाहिए। पूरी तरह से आप यहाँ concentrate करिये। इधर उधर मत देखिये। एक आदमी आता है आपकी आँख उधर घूमती है। आपका चित्त यहाँ रखिये। पूरी तरह से अपने को समर्पित रखें। जब आप लोग माँगेंगे तभी होगा। आप लोगों के माँगे बगैर नहीं होने वाला। मेरे करने से कुछ नहीं होता। अवतरण भी सबका माँगा हुआ होता है। जब तक कोई माँगता नहीं तो यहाँ किसी को फुर्सत नहीं अवतरण लेने की, आफत करने की। अवतरण में ही समझ लेना चाहिए कि आपकी माँग है। लेकिन माँगने वाले इतने अधूरे क्यों हो? पूरी तरह से अपने चित्त को इधर लाएँ। पूरा चित्त यहाँ समर्पित रखें और आज का जो हमारा हवन है बहुत यशस्वी हो सकता है। इससे बहुत कार्य हो सकते हैं। लन्दन में हमने ऐसा ही एक हवन किया था। उसका बड़ा ही परिणाम लन्दन में आया। एकदम आबोहवा बदल गयी। आपकी आबोहवा बदलने की ज़रूरत है। इससे यहाँ का जो atmosphere है वो जागृत हो जाएगा। कभी कभी इतने ज्यादा vibrations मेरे शरीर में से बहते हैं लेकिन वह वातावरण में जा नहीं पाते।  क्योंकि वातावरण उसे ले नहीं पा रहा है। आप लोग भी पूर्णतः जागृत अपने vibrations पहले ठीक कर लें। नतमस्तक हो करके आह्वान करें। और जब उनका अवतरण हो ,जब वो जागृत हों तब आप उसे अंदर लें। जितनी भी यहाँ पर सामग्रियाँ हैं, उन सामग्रियों के द्वारा आप उनके सामने से यह कह रहे हैं कि हम आपसे उपकृत हैं। आपके हमारे ऊपर अनेक उपकार हैं। ये हम दिखा रहे हैं आपको। ये लीजिये लकड़ियाँ जो आपने हमें दी,हम आपको देकर दिखा रहे हैं। हम कैसे बताएँ! ये है। हवन का मतलब ये है। और उसी के साथ साथ उस उपकार बुद्धि के कारण, उस sense of gratitude के कारण आपके अंदर जितना भी मैल है, जलने दीजिये इस अग्नि में। और ये अग्नि आपको पवित्र कर सकती है,अगर आप इस भावना से इन चीज़ों को यहाँ दे रहे हैं। कुछ कठिन काम नहीं है। कोई मुश्किल चीज़ नहीं है। हम तो हैं आपके साथ खड़े हुए। हर एक चीज़ देखने के लिए, हर एक चीज़ को जानने के लिए। कभी आपको समझाते हैं, कभी आपको डाँटते, कभी आपको प्यार करते, जैसे कि माँ को करना चाहिए। बच्चों को समझना चाहिए कि माँ अगर हमारे भले के लिए कुछ कह रही हैं तो ये माँ ही कर सकती हैं और कोई कर ही नहीं सकता। ये आपके परम् भाग्य हैं, ऐसा सोचना चाहिए और उपकार मानने चाहिए इस चीज़ से। ज़रूरत है,क्योंकि इस सबके पीछे है माँ का प्यार, उसको आपको पहचानना चाहिए। आपको अगर प्यार की पहचान नहीं है सहजयोग आपके लिए व्यर्थ है क्योंकि सारा ही ये प्यार ही का दर्शन है। आपस में एक दूसरे में उस प्यार का आपको दर्शन होता है। लेकिन जब तक पूर्ण चित्त स्वच्छ करके आप दूसरों के दर्पण में अपने को नहीं देख पाएँगे उस प्यार को भी आप पहचान नहीं पाएँगे। आप तो अपना जो विद्रुप रूप है वही दूसरों में देखकर दूसरों को विद्रुप समझते हैं। आशा है, मुझे आशा है, अब मैं भी आप जैसी बातचीत करने लगी हूँ कि इस यज्ञ से, इस हवन से हम लोगों के हृदय स्वच्छ हो जाएँ और हमारे उत्क्रांति में बहुत मदद मिलेगी। और उस असीम के किनारे में आप जाकर इस तरह से टिक जाइएगा कि वहाँ से लौटने की बातचीत नहीं होगी।

आज बड़ा शुभ दिन है और गणेशजी की बात समझ लेनी चाहिए। गणेश सिवाय अपने माँ के और संसार में किए चीज़ को नहीं जानते और इसलिए सबसे उच्चतम स्थान पर वो बैठे हुए हैं। माँ के प्रति पूरी तरह, क्या उनकी माँ ने उन्हें कभी डाँटा नहीं होगा? क्या उन्होंने उनको कभी समझाया नहीं होगा?

हर चीज़ को शिरोधार्य करने वाले उस गणेश का स्मरण करके हम लोग अब अपने हवन को पूरी तरह से सम्पन्न करेंगे और आप लोग भी इसमें पूरी तरह सम्मिलित हों और शंका कुशंका करते हुए न बैठिएगा। क्योंकि आप में से अधिकतर लोग पार हैं। जो लोग पार नहीं हैं उनको भी फ़ायदा होगा। ज़रूर होगा, अवश्य होगा।

आप सबको अनंत आशीर्वाद!