The Role of Tongue, Sight and Feet in Spiritual Evolution New Delhi (भारत)

“आध्यात्मिक विकास में जीभ, दृष्टि और पैर की भूमिका”

 दिल्ली (भारत), 2 अप्रैल 1976।

मैं इस बारे में बता रही थी कि एक माँ और गुरु होना कितना मुश्किल है, क्योंकि दोनों बहुत ही विरोधाभासी कार्य हैं। विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति के लिए जो आपके मोक्ष का प्रभारी होना चाहे, मोक्ष दायिनी होना, यह अत्यंत कठिन है। क्योंकि पथ इतना नाजुक और इतना जोखिम भरा है कि आप सभी को खुद ही आना होगा, उस पार चलना होगा। और अगर तुम इस तरफ गिरते हो या उस तरफ तुम्हारे लिए विपत्ति है। मैं आपकी चढ़ाई देख रही हूं, […]