The Role of Tongue, Sight and Feet in Spiritual Evolution

New Delhi (भारत)

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 “आध्यात्मिक विकास में जीभ, दृष्टि और पैर की भूमिका”

 दिल्ली (भारत), 2 अप्रैल 1976।

मैं इस बारे में बता रही थी कि एक माँ और गुरु होना कितना मुश्किल है, क्योंकि दोनों बहुत ही विरोधाभासी कार्य हैं। विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति के लिए जो आपके मोक्ष का प्रभारी होना चाहे, मोक्ष दायिनी होना, यह अत्यंत कठिन है। क्योंकि पथ इतना नाजुक और इतना जोखिम भरा है कि आप सभी को खुद ही आना होगा, उस पार चलना होगा। और अगर तुम इस तरफ गिरते हो या उस तरफ तुम्हारे लिए विपत्ति है। मैं आपकी चढ़ाई देख रही हूं, और मैं आपको मॉ के हृदय और गुरु के हाथ के साथ उपर आता हुआ देख रही हूं। और फिर मुझे गिरते हुए लोगों की झलक मिलती है। मैं उन्हें बताने की कोशिश करती हूं, “ऊपर आओ”। कभी-कभी मैं चिल्लाती हूं, कभी-कभी मैं उन्हें खींचती हूं, कभी-कभी मैं उनसे प्यार करती हूं, उन्हें दुलार करती हूं। आप खुद अपने ही अंदर अंदाजा लगा सकते हैं कि मैंने आपके भीतर कितना काम किया है, मैंने आपसे कितना प्यार किया है। लेकिन मुद्दा यह है की, आप अपने आप से कितना प्यार करते हैं।मैंने आपको बताया है कि, एक सहज योगी के लिए, सब कुछ साक्षी भाव की शक्ति से तय किया जाना चाहिए। अब साक्षी शक्ति मौन में है, यह बात नहीं करती है। यदि आप बहुत बातूनी व्यक्ति हैं, तो यह आप के लिए बहुत मददगार नहीं है। आपको संतुलन में आना होगा। पहली बार,  इस अवतार के दौरान,  मैंने बात करना शुरू किया है, और मैं इसलिए परेशान हो जाती हूं क्योंकि मैं इस तरह से बात करने की आदी नहीं हूं। इसलिए, आप लोगों के लिए, यह आवश्यक है कि आप तब तक बात न करें जब तक कि आप बात करने की आवश्यकता महसूस ना करें। और बहुत कम वाक्य, निर्णायक।

जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था, सभी अंगों में जीभ भटकाव में सर्वाधिक माहिर है। यदि आप अपनी जीभ पर महारत हासिल कर सकते हैं, तो आप एक तरह से अन्य सभी अंगों पर महारत हासिल कर सकते हैं। क्योंकि हर चीज को रुचिकर होना पड़ता है। उदाहरण के लिए, आप एक महिला को देखते हैं: यदि वह खुशगवार नहीं है, तो वह भले ही सुंदर हो सकती है, लेकिन आप उसे देखना नहीं चाहते, एक व्यक्ति के बारे में वह, जीभ फैसला करती है।

यदि आप कुछ खाना खाना चाहते हैं, यदि यह सुस्वाद नहीं है, तो आप उस भोजन को नहीं खाना चाहते हैं। इसका रुचिकर होना जरूरी है।

फिर एक विचार भी। एक सोच को खुशगवार होना पड़ता है। यदि यह मजेदार नहीं है, तो आप इसे नहीं रखना चाहते है।

तो, जीभ निर्णायक कारक है। जीभ की जड़ विशुद्धि चक्र तक जाती है, जो आपके अहंकार और प्रति-अहंकार को नियंत्रित करती है। या आप कह सकते हैं कि जीभ एक तरह से प्रति-अहंकार और अहंकार में परिलक्षित होती है। अपनी जीभ के माध्यम से, जब आप बोलते हैं, तो आप यह महसूस कर सकते हैं कि आप अहंकार के दायरे में हैं या प्रति-अहंकार के। वह व्यक्त भी करती है, वह निर्णय लेती है।

लेकिन अगर आप उसे समझते हैं, तो आप उसे संभालना जानते हैं। वह तुम्हारी दोस्त है। और सरस्वती स्वयं आपकी जीभ में निवास करती है।

यदि आप अपनी जीभ को संभालना जानते हैं तो सहज योग बहुत अधिक बढ़ सकता है। क्योंकि जब सहज योगी के रूप में अन्य लोग से आप मिलते हैं तो, वे भी आपके बात करने के तरीके को देखते हैं, जिस तरह से आप खाते हैं, जिस तरह से आप रुचिकर हैं।

यह जीभ है जो फैसला करती है। यदि आप वास्तव में बहुत विकसित हैं, तो आप आश्चर्यचकित होंगे कि यदि आप कहीं पर कुछ खाते हैं,  यदि यह कुछ गलत है तो तुरंत जीभ उसे बाहर फेंक देगी। वह उसे ग्रहण नहीं करेगी।

यदि कुछ तथाकथित “प्रसाद”, जो किसी गलत प्रकार के आदमी द्वारा दिया जाता है, आपको दिया जाता है, तो आपकी जीभ तुरंत इसे फेंक देगी। यह इसे अंदर ले जाने में सक्षम नहीं होगी। और भले ही यह किसी भी तरह से पेट में नीचे चला जाए, फिर भी जीभ मस्तिष्क को सूचित करेगी कि, “इसे बाहर फेंक दो!” और मस्तिष्क पेट को सूचित करेगा कि, “इसे बाहर फेंक दो!” यह अगाह्य होगा।

तो, पेट में विष्णु की प्रतिक्रिया से, श्री कृष्ण की कार्रवाई तक – मेरा मतलब है, दोनों एक ही व्यक्तित्व – यह सब आपकी जीभ पर आंका जाता है। तो, आपको पता होना चाहिए कि आपकी जीभ कितनी शुद्ध, पवित्र होनी चाहिए। लेकिन जब आप इस जीभ से अपनी माँ का नाम लेते हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि यह पवित्रतम पवित्र होना चाहिए।

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप अपनी जीभ का उपयोग कैसे करते हैं। जो लोग बहुत ही निष्ठुरता से बात करते हैं, वे भी वैसे ही होते हैं जैसे बहुत मीठी बातें करने वाले: आपसे कुछ निकलवा पाने की मंशा।

जैसा कि मैंने आपको बताया है, यह अहंकार और प्रति-अहंकार को नियंत्रित करता है। यहाँ तक कि सहज योगी भी समझते हैं कि साक्षी भाव यहाँ विशुद्धि चक्र में है: इसलिए आपकी साक्षी शक्ति आपकी जीभ के अनुसार बढ़ेगी और घटेगी।

बेशक, यह सोलह उप-प्लेक्सस को नियंत्रित करता है। यह आंखों की मांसपेशियों को भी नियंत्रित करता है, यह इन सभी मांसपेशियों को नियंत्रित करता है, यह तालू को नियंत्रित करता है, यह दांतों को नियंत्रित करता है। यह कानों को नियंत्रित करता है। लेकिन कानों से आप जो कुछ सुनते हैं, आप इसे नियंत्रित नहीं कर सकते। जीभ से आप कर सकते हैं, क्योंकि यह वह चीज है जो प्रकट करती है, जो बाहर जाती है। कान के द्वारा आप दूसरों को कुछ भी नहीं दे सकते हैं, यह सिर्फ एक तरफा है। लेकिन यह जीभ दो तरफा कार्य करती है: आप किसी चीज को लेते भी हैं और किसी चीज को दे भी सकते हैं। इसका उद्देश्य दो तरफा है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है और इसीलिए हमें अपनी जीभ की देखभाल करनी होगी।

जब कुंडलिनी उठ रही है तो, इसका मतलब है निश्चित ही एक बात है, कि आपका ध्यान सूक्ष्म हो गया है: स्थूल से सूक्ष्म की ओर। लेकिन इसे सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतम बनना पड़ता है, और फिर उससे आगे जाना होता है। केवल सूक्ष्म बनकर ही, यह आज्ञा के भीतर से आता है। क्योंकि आज्ञा एक सुई के छेद की तरह है। तो यह वहां से होकर गुजरता है, वहां से सूक्ष्म के माध्यम से। उस सूक्ष्मता के कारण, आपका चित्त सब कुछ देखता है, लेकिन सूक्ष्म रूप में। अब, चूँकि यह आपके लिए एक नया अनुभव है, इसीलिए आप नहीं पहचान पाते हैं, की यह क्या है।

सहज योगियों के एक समूह में, आप इन बातों को बहुत ध्यान से और स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। एक व्यक्ति है जिसकी आँखें अभी भी घूम रही हैं, चारों ओर: वह एक सहज योगी है; वह नीचे बैठा है, वह इधर देख रहा है, उधर देख रहा है, उस तरफ देख रहा है, कौन आ रहा है, कौन जा रहा है। बेशक, आप कह सकते हैं, यह व्यक्ति अभी भी उस सतही अवस्था में है। हालाँकि माताजी द्वारा खिंच लेने के कारण आप देखिये,उसका ध्यान यहाँ पर था, और उस पर लटका हुआ हैं! (हंसते हुए) लेकिन फिर भी वह व्यक्ति खुद के चित्त को अभी भी बाहर की ओर सतही चीज़ो में घसीट रहा है। तो, उस प्रकार के लोगों के बारे में परेशान मत हो।

लेकिन यहां तक ​​कि अब वह व्यक्ति जो की, कहते हैं, चौकस: हम चौकस कह सकते हैं, क्योंकि, आप देखते हैं, शब्द इतने सटीक नहीं हैं। यहां तक ​​कि अगर आप ऐसे व्यक्ति को ध्यान से देखें, तो आप पाएंगे कि उसकी दो शक्तियाँ बहुत ही सूक्ष्म तरीके से कार्यरत हैं: एक उसका सूक्ष्म अहंकार है, दूसरा एक सूक्ष्म प्रति-अहंकार है। जब तुम सूक्ष्म हो जाते हो, अचानक तुम, सूक्ष्म की शक्तियां भी पा लेते हो।

आइए हम इसके अहम् पक्ष को देखें। आप अपने अंदर इतने सूक्ष्म तरीके से,महसूस करना शुरू करते हैं – कि आप पहचान नहीं पाते हैं कि यह अहंकार है, वैसे भी यह इतना सूक्ष्म है की पहचान पाने की दृष्टी से बहुत ही सूक्ष्म है – चूँकि अब आपको  सुधार करने की शक्तियां मिल गई हैं। आपको लगने लगता है कि अब आपके पास कुंडलिनी उठाने की शक्तियां हैं। देखें कि किस प्रकार से यह आपके अंदर बैठ जाता  है। तब आप महसूस करने लगते हैं कि आपके पास खुद को व्यक्त करने की शक्तियां हैं, क्योंकि आपको लगता है कि आपने सहज योग सीख लिया है, और अब आप इसका सार जानते हैं और आप इसके बारे में बात कर सकते हैं। यह सूक्ष्म अहंकार आप में विकसित होता है। और चौथे प्रकार का सूक्ष्म अहंकार तब विकसित होता है, जब आप देखते हैं कि दूसरे व्यक्ति का प्रति-अहंकार विकसित हो रहा है। यह सबसे खतरनाक है!

ऐसा होता है कि कुछ लोग, जिनके प्रति-अहंकार विकसित होते हैं, अब चूँकि उनके पास पिछले गुरु, पिछली समस्याएं थीं: जिस तरह से वे अपने पंथ का पालन करते रहे हैं, कुछ गलतियां वगैरह। उनकी गलतियों के कारण, उनका प्रति-अहंकार विकसित होता हैं। आप देखते हैं की उन्हें कुछ हो रहा है। जैसे, मिस्टर एक्स वाई को देखते है की: उसे प्रति-अहंकार आ रहा है, उसमें कुछ नकारात्मकता बह रही है, इसलिए सूक्ष्म रूप से उसका अहंकार , उस बल के खिलाफ विकसित होना शुरू हो जाता है।

अब वह इसे एक सकारात्मक शक्ति कहता है, यह एक सकारात्मक शक्ति है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन वह सीमा लांघ जाता है। जब वह उस तरह से सीमा लाँघ जाता है, तो वह दुसरे व्यक्ति के प्रति-अहंकार को धकेलने की कोशिश करता है और वह हावी हो जाता है। उसे लगता है कि वह सही काम कर रहा है। बेशक, वह एक तरह से कर भी रहा है, लेकिन केवल एक सीमा तक। और फिर वह बहुत गर्म स्वभाव का हो जाता है। वह दूसरों के बारे में टिप्पणी करता है। वह कठोर बातें कहता है। इस प्रकार सूक्ष्मतम बिंदु शुरू होता है। एक बिंदु तक सब ठीक है, केवल एक बिंदु तक, क्योंकि, इसमें मैं कहूंगी कि गणेश और यीशु को निर्णायक बिंदु माना जाना चाहिए।

जब क्रूस पर चढ़ाया गया तो ईसा मसीह ने बुरा नहीं माना। केवल इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने उन सभी के लिए क्षमा माँगी। लेकिन अगर उनकी माँ को किसी ने छुआ भी होता, तो उन्होंने अपने ग्यारह रुद्रों को प्रकट कर मार दिया होता। यही तो बात है।

जब आपकी माँ की बात आती है, तो निश्चित रूप से, आपके अहंकार और प्रति-अहंकार का एक अर्थ होता है। लेकिन इससे परे, यदि यह प्रत्येक सहज योगी पर निर्देशित होना शुरू हो जाती है, तो आपको नहीं पता चलता कि कहां संतुलन करना है। उदाहरण के लिए, ऐसे लोग, उनके साथ कुछ भी किया जाता है तो, वे खुद की पहचान माँ के साथ बनाते हैं, और वे सोचते हैं, “नहीं, नहीं, उन्होंने मुझे यह कहा है, इसका मतलब है कि यह माँ के लिए भी कहा है।” ऐसा नहीं है ।

आपको समझना चाहिए कि कहाँ आपकी आलोचना की गई है और कहाँ आपकी माँ की आलोचना हुई है। ये दो अलग चीजें हैं। यही कारण है कि मैंने कहा समझने का बिंदु ईसा मसीह मसीह है। जब उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया, तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया, हालांकि वह अपनी माँ के साथ बहुत अधिक एकाकार थे। लेकिन फिर भी वह उस भेद उस संतुलन को पहचान सके। जब आपको सूली पर चढ़ाया जाता है, तो आप मसीह नहीं होते। लेकिन अगर कोई भी माँ के खिलाफ कुछ भी कहता है, तो निश्चित रूप से।

अब खुद को समझने की कोशिश करो। अब आप खुद को देख रहे हैं। मैं जो भी कह रही हूं, आप खुद देख रहे हैं। यह आपके भले के लिए है। इस प्रकार से  आप कहीं न कहीं एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढते हैं जो प्रति-अहंकार से आक्रांत होता है। सबसे पहले, प्रति-अहंकार पर आक्रमण बहुत, बहुत गहरा और सूक्ष्म है, यह अत्यंत गहरा है। यह आपके अंदर इस तरह से आता है, कि आप इसे समझ नहीं पाते हैं।

दूसरा व्यक्ति जो तथाकथित रूप से बहुत सकारात्मक है, वह सोचेगा की, “वह व्यक्ति नकारात्मकता ग्रसित है।” लेकिन उसे पता नहीं चलेगा कि वह नकारात्मकता के प्रति अपनी सकारात्मकता की हद को पार कर रहा है। क्योंकि एक बार जब आप इस रेखा को पार कर जाते हैं तो आप उस तरफ जाते हैं। एक बार जब आप इस रेखा को पार कर लेते हैं तो आप उस तरफ जाते हैं।

इसलिए इस बिंदु को पार करने के तुरंत बाद आप नकारात्मक होते जा रहे हैं। और यह सहस्रार है, ब्रह्मरंध्र है। ब्रह्मरंध्र से परे, यदि आप नीचे धकेल रहे हैं, तो आप पार करके दूसरी तरफ जा रहे हैं। आप अन्य लोगों के हाथों शिकार हो रहे हैं।

अब, आपको खुद को आंकना चाहिए और देखना चाहिए, “अब, नमस्ते मिस्टर एक्स, अब आप कैसे व्यवहार कर रहे हैं?”  तुम देखते हो, तुरंत तुम साक्षी हो जाते हो,स्वयं का साक्षी। अब, कैसे अहंकार और प्रति-अहंकार? आप कभी-कभी कुछ लोगों में देखते हैं कि कभी अहंकार प्रति-अहंकार को दबाता है और कभी प्रति-अहंकार अहंकार को दबाता है। मैंने देखा है। वे नहीं जानते कि वे अहंकारी हैं या दबे हुए है। वे वास्तव में नहीं जानते हैं। वे तय नहीं कर सकते, क्योंकि यह हर समय परिवर्तित होता रहता है।

इसलिए मैं कहती हूं, “बैठक।” [मतलब] कि आपको बैठना होगा, बसना होगा। अपने आप को देखो। “क्या मैं स्थिर हूं?” अपने आप में देखो।

यहां तक ​​कि आप दबाव को महसूस कर सकते हैं, वास्तव में आप बल को इस ओर से उस जाता हुआ महसूस कर सकते हैं। आप दबाव को इस तरफ से उस ओर गति करता हुआ महसूस करेंगे। इसे मध्य में लाने का प्रयास करें।

अब, अहंकार और प्रति-अहंकार, जब वे इस तरह से चलते जाते हैं,  कह सकते हैं, डगमगाते हुए| यह इस तरह होता है: एक पल में आप खुद को ठुकराया हुआ, निराश, तंग महसूस करना शुरू कर देते हैं: “बकवास!” बाहर जाओ!”। दूसरे ही पल आप खुद पर सवार , दूसरे लोगों पर सवार होते हैं । आप दूसरों को “बाहर निकलने  के लिए कहते ! ये गलत है! मैं उस आदमी को पसंद नहीं करता ! “कहते दीखते हैं  “वह बंदा आया, उस बंदे ने मुझे पकड़ लिया!” “यह बात हुई, यह बात हुई!” दो चरम सीमाएँ जिन पर आप जाते हैं। यह सहज योग का तरीका नहीं है।

सहज योग – सह-ज का अर्थ है कि आप साक्षी हैं। सह-ज। इसका दोहरा अर्थ है। सहज शब्द का प्रयोग आमतौर पर एक ऐसी चीज़ के लिए किया जाता है जो ‘सरल’ है – सहज। आप एक सहज विधि में हैं, इसका मतलब है कि आप एक साक्षी हैं, आप इसे देखते हैं। इन वृक्षों को देखो, वे सिर्फ साक्षी हैं, वे कुछ भी नहीं कह रहे हैं, वे सिर्फ वहां हैं। यह ‘होना’ है यह सिर्फ इस बिंदु पर ‘ होना ‘है। क्या हम वो हैं?

हर गति, किसी भी चीज का सामना करते समय । तब आपको कुछ भी आयोजित करने में कोई समस्या नहीं होगी। हमें आयोजन करने में समस्याएं इसलिए हैं क्योंकि आप साक्षी भाव में नहीं हैं।

आपको दो तरह के लोग मिलेंगे; एक, जो कहेगा, “मैं बहुत पीड़ित हूँ”, दूसरे,  जो कहेंगे, “नहीं, मैं  नहीं!” फिर वे अदल-बदल भी करते हैं, उनके दृष्टिकोण अदल-बदल करते हैं। वे मेलजोल कर सकते हैं (वह हंसते हुए)। लेकिन आप बिलकुल यह जान सकते हैं कि इसे कहां रोकना है। तुम साक्षी हो जाते हो, मौन।

एक मिनट बात करने के बाद आप बस चुप हो जाते हैं। यह सबसे अच्छा तरीका है, मुझे लगता है, मैं कह सकती हूं, आपकी जीभ के लिए मौन, यह एक व्यावहारिक तरीका है। जहां तक ​​संभव हो चुप रहें और देखते रहें। लेकिन कुछ लोग मौन हो कर विचार मग्न होते हैं, यह सबसे बुरा काम है जो आप कर रहे हैं। नहीं, मौन और देखना। न तो सोचना, न कि दूसरों को चोट पहुँचाने की योजना बनाना। और फिर अचानक आपका वाक्य सामने आएगा जो इतना गन्दा, इतना कटना, इतना भयावह, इतना विष से भरा हुआ होगा, कि आप सोचते हैं, “यह कहाँ से आया है? हे भगवान!” ऐसी चुप्पी बिल्कुल बेकार है।

यह बहती नदी की तरह होना चाहिए। नदी की अपनी गहराई है, ऊपर से यह बह भी रही है। यह ऐसा एक-रूपता है। उस तरह का मौन होना चाहिए। मजबूरन नहीं, बल्कि एक साक्षी मौन। यहां तक ​​कि वह व्यक्ति बात भी कर रहा है [लेकिन], अंदर, मौन का प्रवाह है। आप उस मौन के साथ एक हैं, यह हर समय आप को पूर्ति कर रहा है। और आप देख सकते हैं कि हर पत्ते में, पत्ते की हर गति में, आप मौन को बहते हुए देखते हैं। वे बोलते भी नहीं हैं, लेकिन वे प्रकट होते हैं। उसी तरह, आप बोलते नहीं हैं, आप प्रकट करते हैं। बेशक, मनुष्य उनसे ऊँचे हैं क्योंकि वे बोलते हैं, लेकिन यदि भाषण एक बोझ, एक समस्या, एक काटने का यंत्र बन जाता है, तो बेहतर है कि बोलना न पड़े।

सहज योगी को एक और बात पता होनी चाहिए, कि सहज योग के लिए आंखें बहुत महत्वपूर्ण हैं। जब कुंडलिनी ऊपर उठती है, तो पुतलियों का फैलाव होता है, क्योंकि आपने बच्चों को देखा है कि कैसे उनकी आंखें आप को देखती हैं। वे जो कुछ भी हो रहा है, उसे ग्रहण करते रहते हैं – बस, खामोश ग्रहण, पूरा मौन दर्शन आंखों से गुजर जाता है।

और इसलिए आंखें बहुत महत्वपूर्ण हैं आपको अपनी आँखों को अपने अंतर में,  हृदय में स्थिर करना सीखना चाहिए। अपने हृदय में नत हों।अपनी आँखें अपने हृदय में स्थिर करो । मैं उस तरह से कहती हूं, लेकिन मुझे नहीं पता कि क्या आप ऐसा कर सकते हैं। लेकिन अगर आप ऐसा कर सकते हैं तो चीजों को करने का एक बहुत अच्छा तरीका है।

हरेक को देखना , सभी को ताकना, यह या वह देखते रहना आपकी आंखों के लिए बहुत बुरा अभ्यास है, यह बहुत बुरी आदत है। चेहरे की तुलना में शरीर के निचले हिस्से को देखते हुए, धरती, धरती पर अपनी आँखें नीचे रखने की कोशिश करें। क्योंकि चेहरा, अगर आपको इस तरह बनाया गया है कि आप चेहरे को देख सकते हैं तब तो ठीक है , लेकिन आप अभी तक ऐसे बने नहीं हैं। सबसे अच्छी बात पैरों को देखना है। और आपकी आंखें उनके स्थूल भाव, पैरों को छूएंगी, जहां से चैतन्य की अनुभूति ऊपर, ऊपर की तरफ होती है, और कुंडलिनी बेहतर उठती है।

वास्तव में जो लोग कुंडलिनी के कम उठ पाने से पीड़ित हैं, अगर वे उनके पैरों पर तेल मालिश कर सकते हैं और उनके पैरों को धो सकते हैं, तो यह बहुत अच्छी बात है। इसलिए ईसा-मसीह ने अपने शिष्यों के पैर धोए। काश मैं ऐसा कर पाती, अगर आप मुझे सूक्ष्मता में अनुमति दें। क्योंकि संपूर्ण स्थूलता पैरों में है, और अगर आप किसी को अपनी आंखों से छूते हैं, मैं आत्मसाक्षात्कारी लोगों  के लिए कह रही हूँ,उनके पैर, उनकी अधिकांश स्थूलता गायब हो जाएगी। और आपको उनके साथ इतनी समस्या नहीं होगी। इसलिए मसीह ने अपने शिष्यों के पैर धोए। आप अपने पैर भी धोएं  और उन्हें साफ रखें  ताकि सतहीपन निकल जाएं।

मैंने संक्षेप में समझाया है, लेकिन यदि आप मुझसे प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो पूछें, क्योंकि अभी भी मुझे पता है कि सहज योगी उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहे हैं जितना वे कर सकते थे।

क्योंकि इस  कुंडलिनी को उपर और अधिक उपर तक लाना मेरे लिए संभव है, लेकिन फिर इसे अपने स्थूल रूप में ग्रहण करना आपका अपना काम है जिसे आपको करना है। मराठी में जैसा कि वे कहते हैं, “दा अदि करतजा मग पईया” – मैंने आपके लिए सबसे ऊपर, गुंबद  का निर्माण किया है,अब गुंबद को आपने सहारा देना है । मैं आपको गुंबद तक ले गयी हूं, लेकिन आप इसे धरातल पर नहीं ला पाते, क्योंकि या तो आप खुद से निराश हैं – लेकिन निराश हो कर आप क्या हासिल करने जा रहे हैं? – या फिर, आप दूसरों से निराश हैं। बस मौन बनो और साक्षी बनो। जैसा कि साईं बाबा ने कहा है, “सबुरी”, धैर्य, इससे आता है।

प. पु. श्री माताजी निर्मला देवी|