Nirvicharita

मुंबई (भारत)

Nirvicharita “VIC Date 6th April 1976 : Place Mumbai Seminar & Meeting Type Speech Language Hindi

तुम लोगों को बुरा लगेगा इसलिये मराठी में बोलने दो। मैं कह रही हूँ कि तुम्हारे सामने जो भी प्रश्न हैं, उन प्रश्नों को तुम अचेतन में छोड़ो, वो मेरे पैर में बह रहा है। माने ये कि कोई भी प्रश्न , अब तुमको अपनी लड़की का | प्रश्न है समझ लो। उसमें खोपड़ी मिलाने से कुछ नहीं होने वाला। जो भी प्रश्न है वो यहाँ छोड़ दो। उसका उत्तर मिल जायेगा। अब तुम अगर सोचते हो कि इस चीज़ से लाभ होगा , वो नहीं बात। जो परमात्मा सोचता हैं तुम्हारे लिये जो हितकारी चीज़ है, वो घटित हो जायेगी । वो तुम कर भी नहीं सकते हो । इसलिये उसको छोड़ दो तुम क्यों बीच में तंगड़ियाँ तोड़ रही हो? तुम क्यों परेशान हो रही हो ? तुमको परेशान होने की कोई जरूरत नहीं। तुम छोड़ तो दो| जो तुम्हारे सारे प्रश्नों को सॉल्व करने के लिये पूरी इतनी कमिटी बैठी हुयी है, उनके पास छोड़ो तुम | सहजयोग में यही तो कमाल है, कि सर का बोझा उतर गया उनकी खोपड़ी पर। छोड़ के देखो। ऐसे कमाल होंगे, ऐसे कमाल होंगे, कि बस्। लेकिन मनुष्य की खुद्दारी की बात हो जाती है। आखिर तक वो यही सोचते रहता है कि, ‘मुझी को करना है। और सोचते रहिये, एक के ऊपर एक ताना, बाना चलता रहेगा। कितना भी आप करते रहिये। आखिर आप पाईयेगा, कि आप कहीं भी नहीं पहुँचे और पागलखाने में ही आप जाईयेगा। आपके प्रश्न हल करने के लिये बहुत बड़ी कमिटी बैठी हुई है। उसमें पाँचों तत्त्वों के अभिनायक बैठे हये हैं, ब्रह्मदेव। सारे धर्म को बनाने वाले बैठे हैं, विष्णु और सारे संसार की स्थिति ले कर के और लय ले कर के बैठे हये हैं, शंकर जी। उनको भी तो कभी कभी चान्स दो। क्या तुम्ही लोग सारे प्रश्नों को ठीक करोगे ? और जैसे ही आप निर्विचार में होना शुरू कर देंगे , आप देखियेगा, आपके अन्दर ये तीनो ही शक्तियाँ अपने आप बन जायेंगी। अपने आप सुलझ जायेंगी, धर्म, अर्थ और काम। बिल्कुल वो ठीक से। अपने अपने जगह बैठ जायेगी। निर्विचारिता में रहने से आपके अन्दर जो प्रश्न है, उसमें कॉस्मिक चेंज आता है। ये कोई अन्दरूनी घटना घटित होती है। उसके सूत्र पे घटना होती है। जैसे एक आदमी समझ लीजिये की शराब पीता है। मिसाल के तौर पर। वो मेरे पास आता है । ‘माताजी, ये शराब पीता है । उसकी शराब छुडाओ।’ उसकी कुण्डलिनी जागृत करते ही, उसकी कॉस्मिक दशा ऐसी हो जाती है, कि वो शराब पीता है तो उसको उलटी होती है। फिर ये भी हो सकता है कि शराब की भी जो मादक शक्ति है, उसको भी खत्म कर सकते हैं, जब शक्ति पे बैठे हैं, तो हर तरह की शक्ति को ले सकते हैं । जितनी डिस्टूक्टिव शक्ति है उसको भी खत्म कर सकते हैं। लेकिन आप जो ये अपने छोटे से दिमाग में, हर एक चीज़ को सुलझाने का प्रयत्न करते हैं, उसी में गड़बड़ हो जाता है। बिल्कुल निर्विचार। मेरे पैर पे भी लोग रहते हैं। तभी वो विचार में रहते हैं। मुझे इतना आश्चर्य होता है कि कम से कम मेरे पैर पे तो विचार छोड़ दो। वहाँ पे भी उनका चलता रहता है विचार। मैं कोशिश कर रही हूँ। हाथ-पैर चला रही हूँ, तांडव नृत्य हो रहा है और ये लोग इधर विचार ही कर रहे हैं । कम से कम मेंरे पैर में विचार छोड़ना

आना चाहिये । फिर धीरे-धीरे ये आदत बनते जायेगी । निर्विचारिता की। बसू एक छोटीसी चीज़ है, कि निर्विचार में रहना सीखो। कोई भी आपका प्रश्न हो निर्विचार में रहो। ऐसे मैं आपको सुझाव देती रहती हूँ। आपका ये चक्र क्यों पकड़ता है, वो क्यों पकड़ता है। छोटी छोटी बातें हैं उसको समझ लेना चाहिये। आपका शरीर ठीक रखो, मन ठीक रखो। मन की भी बहत सारी बीमारियाँ होती है। औरतों को बीमारी होती है कि आदमियों के पीछे मैं मरूं, खास कर के। आदमियों को और बीमारियाँ होती है। मन की अनेक बीमारियाँ होती है। उधर जरा सा चित्त रखो। निर्विचार में रहो। एक छोटी सी चीज़ करने से ही आपका जो स्वयं, हृदय में बैठा हुआ स्व है, उसका प्रकाश फैलना शुरू होगा और वही प्रकाश है जो आपके अन्दर वाइब्रेशन्स की तरह बह रहा है। ये आपके अन्दर बसा हुआ परमात्मा का जो अंश है, स्व, सेल्फ, उसका प्रकाश सारे संसार में जाता है और लौट के आपके पास आ जाता है पॅराबोली में। अनेक उसकी लहरें चलती हैं। गोल गोल घूम कर के आपके में जो आ जाता है। अपनी जो बाती है उसे ठीक रखो। आपका शरीर ठीक रखो, हदय आपका दीप है। आपकी जो शक्ति है तेल दीमागी जमाखर्च जो है उसमें खर्च न करो । लौ को सीधे लगाओ| ये लौ का उपर का हिस्सा है, उसको माँ से चिपका लो। उसके पैर में बाँध दो | सीधी उठेगी लौ। निर्विचारता में निर्भीकता से जलती है। और ऐसा आदमी कहीं खड़ा होगा तो उसकी तेजस्विता को देख कर लोग कहेंगे कि, ‘भाई, तुम्हारे कौन हैं? ये तुमने किससे पाया है?’ यही सहजयोग के लिये आप लोगों को करना है। जहाँ तक हो सके गुरु निर्विचार रहें। हम तो धक्का दे ही रहे हैं कुण्डलिनी को। आपको भी वहाँ रखने की कोशिश कर रहे हैं। आप भी जरा कोशिश करें। कोई विचार नहीं आना है और अपना माथा किसी के आगे मत झुकाना। याद रखना, किसी के आगे जा कर माथा नहीं झुकाना है। कोई भी हो। बहुत से लोग सहजयोगी, सहजयोगी कह के माथा झुकाते हैं। मैंने देखा है। ये सब फालतू की बातें करने की जरूरत नहीं। मूर्तियों में भी देख के जिस के वाइब्रेशन्स ठीक है, तो ठीक है। मूर्तियों से आप बहुत बड़ी मूर्तियाँ हैं । आप स्वयं एक मंदिर हैं। क्या वो मूर्ति थोड़ी आपके वाइब्रेशन्स जानती है! वो तो उसमें से वाइब्रेशन्स बस आ ही रहे हैं, बस और क्या हो रहा है। आप तो अपने हाथ भी चला सकते हैं। दूसरों को आप जागृति दे सकते हैं। किसी के चक्र खराब हो उसको आप ठीक कर सकते हैं। मूर्ति तो वहाँ बैठी वाइब्रेशन्स छोड़ रही हैं। | सहजयोग में बम्बई सेंटर में बहुत काम हुआ है। इसमें कोई शक नहीं। और लोगों ने बहत अपने को ऊँचा उठा दिया है। और वैसे भी महाराष्ट्र में बहुत काम हुआ है। एक छोटे से गाँव में राहुरी में, बहुत काम हुआ है। जितना आप गहरा उतरेंगे उतना गहरा काम होगा। अपने को बहुत ज्यादा लोग नहीं चाहिये। थोडे ही लोगों से काम बन जायेगा। लेकिन जो भी हो वो पक्के हो। (मराठी) आता काही प्रश्न असतील तर विचारा. राजकारण हो तो कृष्ण के जैसा। जिस राजकारण के कारण संसार का हित है, वही राजकारण एक सहजयोगी को करना चाहिये। याने कैसे? मैं करती हूँ। आप लोगों को पता नहीं राजकारण। राजकारण इस तरह से करना

चाहिये कि खूबी से उस आदमी का हित निकाल ले। होशियारी से उसकी जो अच्छाईयाँ हैं उसको उठा लें । सीधे हाथ से तो आप लेने वाले नहीं। तो उसपे कुछ चॉकलेट चढ़ा कर के आप के मँह में दे दिया । मुझ से बढ़ के कोई राजकारणी नहीं है। बच के रहो। बड़ी राजकारणी हँ मैं। अगर कोई ज्यादा निगेटिव होता जाता है तो उसका भिडा देती हूँ दूसरे निगेटिव आदमी के साथ में। लड़ते रहो वा मरते रहो । लेकिन मेरा जो राजकारण है वो तुम्हारे हित के लिये है। क्योंकि सीधे रस्ते आने ही नहीं वाले। तो राजकारण खेलना पड़ता है। फिर अंत में आते है। लेकिन विज्ड़म किस चीज़ में है? कि हम अपना अच्छा देखें । हम अपने अच्छे का सोचे। हम अपना हित सोचे। ये हित की गंगा बह रही है। दूसरी निगेटिविटी आदमी में किस तरह से आती है। अपने तरफ नज़र रखें । पहले ये कि, निगेटिविटी में हम किस से ज़्यादा दोस्ती करते हैं? हम किस से ज्यादा मिलते हैं? मिलना बंद करिये। फौरन बंद करिये। कोई अगर पचास साल से उतरते हैं तो वो ग्रुप बना लेंगे। ग्रुप बनाने के लिये इन्सान को कुछ लगता ही नहीं है। तो भगवान ने आपको ग्रुूप में पैदा किया है? अभी तो इंटरनैशनल लेवल पे उतरने की बात है। उसके बाद युनिवर्सल लेवल पे उतरने की बात है। अभी तो गिरगाव, दादर ही हो रहा है इधर। तो एक बड़ा भारी हम लोगों का जो दुश्मन है वो है राजकारण। जो हमारे अन्दर बैठा हुआ है। एक दुश्मन है हमारा बहुत बड़ा। काम-क्रोध-मद-मत्सर वो तो बहुत साफ़ है। लेकिन ये चोरी छुपे बैठे ह्ये अपने अन्दर में एक बड़े दुष्ट जीव है जिनका नाम है राजकारणी स्वभाव। तो अपने से कहना चाहिये, ‘ओ , मिस्टर राजकारणी, जरा चुप रहिये आप। हमको मत पट्टी पढ़ाईये। बड़ा चोर बैठा हुआ है अन्दर में। उसका ख्याल रखो। दूसरी निगेटिविटी कैसे आती है ? कि हम मिस आयडेंटिफाइड हैं किसी चीज़़ से। माने कि ये , हम कहें, यहाँ तक की हम हिन्दुस्तानी हैं। आप कोई हिन्दुस्तानी वगैरा नहीं। आप इन्सान हैं। ये बात बिल्कुल सत्य है। अब उसकी ओर बारीक बारीक में आईये । होते होते, अब मैं किस का नाम लँ, कि हम उस गणपति के पास में रहने वाले हैं, या उसकी जो मिट्टी है वो हमारे फलाने गाँव से आती है, तो हम सब एक हैं। इस कदर के मिस आयडेंटिफिकेशन महामूर्खता के, मनुष्य के दिमाग में हमेशा रहते हैं। जब आप अनेक जन्मों में विश्वास करते हैं, तो आप ये किस प्रकार कह सकते हैं, कि आज आप ब्राह्मण हैं तो कल आप चांभार भी हो सकते हैं। और हो सकता है कि आप मुसलमान से आज आ कर के, यहाँ ब्राह्मण बने बैठे हैं। क्या आपको पता है आपका पास्ट क्या था? तो अपना जो गत है, जो भूत है, जो पास्ट है, उसका भी अगर सत्य आप देख ले, उसका भी अगर आप मत्यर्थ देख ले, उसका भी अगर आप तत्त्व ये पहचान ले, तो आप उसको भी बिल्कुल समझ सकते हैं कि ये सब बकवास है। याने आप देख सकते हैं कि मैंने, मिट्टी कहाँ से इकट्ठी की है, मूर्खता की। एक जनम में तो मैं मुसलमान था, एक जनम में मैं राजा था, एक जनम में मैं भिखारी हूँ। ये मिट्टी मैंने मूर्खता की कैसे इकट्ठी की है। उसके तत्त्व को देखना चाहिये और उसका त्त्व महाकाली का है। उसका तत्त्व महाकाली का है, अगर उसको आपने समझ लिया कि ये जो कुछ भी हमारा पास्ट है, ये हमारी बेवकूफ़ी के कारण वहाँ जमा है। ‘मैं इसकी लड़की, मैं शिवाजी महाराज की फलानी, ठिकानी।’ होगी, कौन शिवाजी महाराज? कहाँ हैं वो? है मेरे सामने तो पूछो। वो कहाँ और आप कहाँ! वो आयेंगे तो घोड़े पे आयेंगे। हम

यहाँ के ब्राह्मण आये हैं, हम वहाँ के वो आये हुये हैं पोपसाहब, हम फलाने आये हये हैं। ये सब मिसआयडेंटिफिकेशन इस जनम के बहुत सारे हैं। ये भी एक तरह से पास्ट ही हैं क्योंकि इस मूवमेंट में तो नहीं है। इस समय तो नहीं है। इस समय ये आयडेंटिफिकेशन। इस समय में आप क्या है? एक ही तत्त्व हैं कि आप सब मेरे बेटे हैं। इसके सिवाय और कोई सत्य नहीं । सबको मैंने अपने सहस्रार से जन्म दिया है। इसके अलावा दूसरा कोई भी सत्य नहीं। यही एक सब से बड़ा महान सत्य है। इसे शिरोधार्य करें। जो इसको नहीं शिरोधार्य करता वो कभी भी सहजयोगी ऊँचा उठ नहीं सकता है। वो दूसरों को हमेशा खींचता रहेगा । अपनी निगेटिविटी से दूसरों को खींचता रहेगा। वो अपने को बहुत अकलमंद समझें, कुछ भी समझें लेकिन उसको जानना चाहिये कि न तो वो खुद उठ रहा है न तो वो दूसरों को उठने देगा। आप सब एक ही माँ के बेटे हैं और सब युनाइटेड हैं। इतना ही नहीं एक ही शरीर के अन्दर पनपने वाले आप महत्त्वपूर्ण चक्र हैं। ये आप जानते हैं कि नहीं जानते! विराट के अन्दर अनेक छोटे छोटे सेल्स हैं। अनेक छोटी छोटी पेशियाँ हैं। उसमें से आप जागृत पेशियाँ हैं। आप जागृत हैं। आप में से कोई वो पेशियाँ हैं जो हृदय में है। कुछ हैं वो ब्रेन में हैं। कुछ हैं वो उसके लंग्ज में हैं। कुछ हैं वो उसके पेट में हैं। जो जो जागृत ऑटोनॉमस काम हैं, उसके अन्दर की पेशियाँ आप लोग हैं। आप बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस चीज़ का आयडेंटिफिकेशन, तादात्म्य आप में नहीं है। आप ऐसे तो बहुत महत्त्वपूर्ण बनते हैं। हम ये हैं, वो हैं, वो हैं। हमारे लिये क्या हैं? हम धूल के बराबर हैं। लेकिन ये रिलेशन ट्ू सहजयोग । सहजयोग के साथ संबंधित जब आप हैं तभी आप महत्त्वपूर्ण हैं। नहीं तो आपका परमात्मा को कोई भी माहात्म्य नहीं है। समझ लीजिये आप।| आप व्यर्थ हैं परमात्मा को। ऐसे हजारों उठा के फेंक देंगे वो। उसके पाँव के के बराबर है। आपका माहात्म्य तभी है जब | धूल आप सहजयोग के रिलेशन में कहाँ तक उठते चले जाते हैं । हिन्दुस्तानी आदमी की शरीर व्यवस्था, उसकी मानसिक व्यवस्था, उसका सब कुछ एक अलग ढंग का है। चीनियों का अलग ढंग का है। अंग्रेजों का अलग ढंग का है। सब ने अपना अपना बना लिया है, मटका। सब ने अपने अपने मटके बना लिये हैं । किसी का कैसा शेप है, किसी का कैसा शेप है। उसमें कोई हर्ज की बात होनी ही तो नहीं चाहिये। लेकिन उसके अन्दर का माल मसाला भी एक विशेष रहता है। जैसे आप मराठी घर में जाओ, | वहाँ अलग तरह की फोडणी (बघार) देते हैं। यू.पी में जाओ तो वहाँ अलग तरह का। ‘घरोघर मातीच्या चुली’ असल्या तरीसुद्धा। हर एक का अलग अलग तमाशा बना के रखा है। अब ये भी मिस आयडेंटिफिकेशन कितना जबरदस्त है, कि हम लोग सब अलग अलग हैं। हमारे अन्दर एक ही सुगन्ध अपना ही बह रहा है। इससे कम से कम तादात्म्य कर लेना चाहिये। पहला सत्य ये है कि तुम लोग सहजयोगी हो। माने माताजी निर्मलादेवी के सहस्त्रार से तुम लोग पैदा हये हो। और दूसरा सत्य ये है कि तुम सत्य से ही तादात्म्य कर सकते हो । असत्य से नहीं । जैसे ही तुमने किया, तुम्हारे वाइब्रेशन्स बंद हो जायेंगे। अगर तुम मुझे भी कहो कि, ‘माँ, तुम ये करती हो तो हम सब करते हैं।’ देखिये , हम ही जब सब करते हैं तो ये भी करते हैं। उसकी भी रिस्पॉन्सिबिलिटी हमें लेनी चाहिये । पर तुम ने भी तो कोई खराबी की है अपनी! हम जो बात कर रहे हैं उस तरह से चलो, तो सब ठीक होने वाला है। इसलिये जितनी भी इस तरह की गलत धारणायें हैं उसको बैठ कर के, लिख कर के कि मेरी खोपड़ी में ये आया, वो आया, फलाने जगह से,

क्योंकि मेरी माँ ने ही यह पढ़ाया था, क्योंकि मुझे स्कूल में ये पढ़ाया गया। फिर मेरे देश में ऐसा पढ़ाया गया। ये सब गलत बातें मुझे निकाल के दीजिये। तभी सहजयोग , ये सहजयोगी एक ऊँचे पत्ते के लोग, अपने आप ऊपर उठायेगा। जैसे चलनी आप घुमाईये, तो चलनी में ऐसे लोग उपर आ जाते हैं और बाकी सब नीचे। परमात्मा से एकात्म। एकात्मता आनी चाहिये। प्रभु, परमेश्वर से दोस्ती जोड़नी चाहिये । उसके सर्वशक्तिमान स्वरूप से एकाकार होना चाहिये। इसको जब आप समझ लेंगे और उसको अपने से तादात्म्य करना चाहिये। सत्य तो सब जानते हैं। ऐसे लेक्चर देने वाले बहुत हो गये। लेकिन इस तरह से अपने को तादात्म्य करते ही आप उधर नहीं बैठे, आप यहाँ आ के बैठ गये। साइड बदल गयी आपकी। सूर्य की तरफ़ आप मुख नहीं कर रहे हैं। आप स्वयं सूर्य हो गये। अभी आपने सिर्फ सूर्य की तरफ़ किया है। फिर आप स्वयं सूर्य हो जायेंगे | अपनी क्षुद्रता को देखते जाओ| अपने छिद्रों को नापते जाओ । मैं मुख तुम सब को सूर्य बनाना चाहती हूँ। इसके सिवाय में और कुछ नहीं चाहती। जो लोग अभी तक इस चीज़ को नहीं समझ पाये हैं और जान नहीं पाये वो छोटी दृष्टि के हैं। उनमें वो विशालता नहीं आयेगी। लेकिन तुम लोग सब अपने को विशाल बनाओ। दूसरा चाहे छोटा हो जायें आप अपने को अलग अलग तरह से विशाल बनाओ। विशालता से ये सब क्षुद्रतायें जो हैं ये खत्म हो जायेंगी। अपनी ओर दृष्टि करने पर, अपने दोष देखने पर अपने को कोई कंडेम्न करने की जरूरत नहीं है। अपने को बुरा मानने की जरूरत नहीं है। क्योंकि वो भी एक तरीका भागने का है। ये बड़ा भारी भागने का तरीका बनाया है मनुष्य ने। ये मैं समझ गयी अब। उसका ऐसा तरीका है कि उसने ऐसा कह दिया कि ‘मैं हूँ ही खराब ! माताजी, मैं बहुत खराब आदमी हूँ।’ बसू वो तो बेशरम हो गये आप। जैसे कि कहते हैं कि हिपोक्रसी दुनिया में नहीं होनी चाहिये। बेशम्मों से हिपोक्रिस अच्छे होते हैं मेरे विचार से। बेशर्म जैसे रस्ते पर खड़े हो कर ‘मैं बदमाश हूँ। मैं किसी से डरता नहीं। मैं बदमाश हूँ।’ तो सभी बेशर्म हो गये उसके साथ में। इससे बेशर्मी बढ़ेगी। हिपोक्रसी से कम से कम बढ़़ेगा नहीं मामला। बीच का रास्ता है। अपने दोषों को देखो। और जैसे बदन में कलंक लगाया है उसको पोछ दो। उसका बखान भी करने की मेरे पास जरूरत नहीं। ये तुम्हारा, तुम्हारे अन्दर, तुम्हारे साथ, तुम्हारा मामला है। तुम अपने को ठीक कर लो। ये तुम्हारा प्राइवेट मामला है। जब तक वो मेरी नज़र में नहीं आता मैं भी उसको नहीं कहती। नज़र आने पर भी मैं उसको नहीं कहती हैँ। बहुत देर तक में रुकी ही रहती हूँ। हाँ, लेकिन जब वो बहुत ही मारक हो जाता है, जब उसे सहजयोगी पे हाथ आने लग जाता है, दुसरों का नुकसान होने लगता है, तब किसी से कहती कि देखो करने की जरूरत नहीं है किसी तरह। ऐसा नहीं करो। कोई मेरे पास आ कर के कन्फेशन तुम आप अपने ही अन्दर अपनी स्वच्छता को देखो। अपना वरण करो। अपना स्वागत करो। अपनी इज्जत करो। अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाओ। अपने को उँचा उठाओ| अपना गौरव करो । गौरव करने योग्य बनो । जो भी तुम कर रहे हो , उससे क्या तुम्हारा गौरव हो गया या तुम्हारी बुराई हो गयी ये तुम खुद समझ सकते हो। इतनी अकल हर एक आदमी में है। लेकिन अब कोई भी चीज़ ऐसी नहीं करो जिससे की तुम्हें गौरव छोड़ना पड़े। अंधेरे में, कलियुग के घोर अंधेरे में, तारे बन के तुम्हे ही चमकना है। जितना अंधेरा गहनतम है, तारे बन के उसी में तुम्हें चमकना है। तुम ही मार्गदर्शन करने वाले हो संसार में । हम क्या मार्गदर्शन कर सकते हैं। क्योंकि हम ने न कोई मार्ग चला है और ना

हम कहीं पहुँचे हैं। हम जहाँ हैं वही हैं और वही रहते हैं। लेकिन तुम लोग मार्गक्रमण कर के आये हो। तुम लोग उठे हो। तुम्हें लोग देखेंगे। हमारे लिये तो सब कहते हैं कि, ‘वो तो हैं ही सेंट, वो तो होली है । शी इज होलीएस्ट ऑफ द होली। उनका हमारा क्या मुकाबला!’ तुम्हारे ही तारे जगाने के हैं। अपनी क्षुद्रताओं को कम करो । एक दूसरे सहजयोगियों को क्रिटीसाइज मत करो। बहुत बुरी बात हैं क्योंकि हर सहजयोगी एक ही शरीर का अंग -प्रत्यंग है। इससे महामूर्खता क्या होगी कि कोई इस हाथ से उस हाथ की उंगलियाँ काट रहा है। अगर दूसरे सहजयोगी में कोई प्रॉब्लेम है और आप अगर सोचते हैं प्रेम में तो साइलेंटली उसको बंधन दीजिये। उसको जूते मारिये। ठीक करिये। पर अपने को भी बाद में जूते मार लीजिये। हालाकि ये जरूर बात है, कि जो आप लोग पिछले वर्ष थे उससे कहीं अधिक आज उजले हैं और जो पाँच-छः साल पहले थे उससे कहीं अधिक सुंदर हो। धीरे- धीरे प्रगति तो हो ही रही है। कोई गिर नहीं रहा है। कुछ ऐसे होते हैं वो गिर जाते हैं, झड़ जाते हैं, निकल जाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ उपर बढ़ती जाती है। चित्त आपका अपने ऊपर और हमारे ऊपर रहे। काम बन सकता है।