Seminar Day 2, Attention and Joy

(भारत)

1977-01-27 1 Seminar Day 2, Attention And Joy Bordi, India, transcribed, 50' Download subtitles: EN,PL,ZH-HANS,ZH-HANTView subtitles:
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[Hindi translation from Enlgish]

    चित्त और आनंद 

                                    3 ​​दिन के शिबिर का दूसरा दिन

 बोरडी (भारत), 27 जनवरी 1977।

…  बहुत ज्यादा भटकाव और चित्त को स्थिर कैसे करें| अब चित्त की गुणवत्ता आपके विकास की स्थिति के अनुसार बदल जाती है। उदाहरण के लिए, एक जानवर में …

तो इंसान में चित्त कहाँ रखा जाता है? यह एक निश्चित बिंदु नहीं है। आप कह सकते हैं, चित्त जागरूकता की सतह या किनारा है। जहां भी हमें जागरूक किया जाता है, चित्त उस बिंदु की तरफ मुड़ जाता है। यदि आप कोई मिलता-जुलता उदाहरण चाहते हैं, तो जैसे लोहे की सभी छीलन को चुंबक की ओर आकर्षित होने की शक्ति मिली है। , आप यह पता नहीं लगा सकते हैं कि, वह शक्ति कहां है – यह सब हो चूका है। जहां भी चुंबक रखा जाता है वहां लोह-छीलन आकर्षित होती हैं। हमारा चित्त भी ऐसा ही है कि,  जहां कहीं भी हम आकर्षित होते हैं, हमारा चित्त वहीं जाता है।

 इस मायने में कि इसका रुख शरीर के बाहर या अंदर कहीं भी किया जा सकता है, यह पूरे शरीर में विद्यमान है। शरीर के अंदर भी, अगर कोई दर्द हो या कोई परेशानी हो। यह नसों पर बहता है, यह पूरे तंत्रिका तंत्र पर बहता है, लेकिन मस्तिष्क में एक नियंत्रण केंद्र है। अगर इस पर प्रहार हो तब, हम बिना चित्त के सचेत रह सकते हैं| इसके अलावा, अगर किसी के विशुद्धि चक्र पर प्रहार करें, तो भी ऐसा हो सकता है। यदि किसी पर प्रहार किया जाए तब यह निचले चक्रों में भी हो सकता है| वह भाग अपनी चित्त शक्ति खो देगा क्योंकि आप उस भाग में महसूस नहीं कर सकते। अंतर यह है, कि यदि आप चाहें तो उन बिंदुओं पर चित्त दे सकते हैं, भले ही वे सुन्न हों। उदाहरण के लिए, यदि मेरा हाथ सुन्न है तो भी मैं उस पर चित्त डाल सकती हूं, इसका मतलब है कि मैं इसे देख सकती हूं, मैं इसके बारे में सोच सकती हूं। लेकिन हमारे शरीर में एक बिंदु ऐसा भी है जिस पर अगर प्रहार हो जाए तो हम सोच भी नहीं सकते, वे कहेंगे की हम बस बेहोश पड़े हैं, लेकिन आँखें खुली हैं, हाथ हिल रहे हैं, पैर हिल रहे हैं। वह बिंदु यहां विशुद्धि चक्र के बिंदु पर है। और अगर तुम यहां से एक रेखा उस बिंदु तक खींच सकते हो, जहां  मस्तिष्क के अंदर विशुद्धि चक्र का पीठ है,; उस रेखा पर कहीं भी यदि आप पर प्रहार हो तो आप चित्त- विहीन हो जाते हैं, आप कहीं भी चित्त नहीं डाल सकते | यह रेखा आज्ञा चक्र से भी होकर गुजरती है। क्योंकि जब यह बिंदु पीछे विशुद्धि चक्र पर यहाँ और, अंदर पीठ पर से जोड़ा जाता है, तब एक तरह का त्रिभुज बनता है और यह सारी रेखा या यह क्षेत्र आपके चित्त को प्रभावित कर सकता है। आपका दिल धड़क रहा है, आपके अंग हिल रहे हैं लेकिन आप कहीं भी चित्त नहीं लगा पा रहे हैं।

इसलिए  – जब आपको बोध प्राप्ति नहीं हुई होती है – तब सामान्य रूप से आप किसी चीज़ पर ध्यान देते हैं, तो वास्तव में आप, आपके मस्तिष्क केंद्रों के माध्यम से चित्त डालते हैं। बोध के बाद, आप अपने अन्य केंद्रों के माध्यम से भी चित्त डाल सकते हैं। आप चित्त डालते हैं। यह एक आत्मसाक्षात्कारी और गैर आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति के बीच का बहुत बड़ा अंतर है। या आप कह सकते हैं कि आप अपने अन्य केंद्रों के माध्यम से प्रभावशाली हो सकते हैं ,उन केन्द्रों पर चित्त डाल कर। आप अपने शरीर में बाधित केंद्रों को, जिन्हें आपने पहले कभी महसूस नहीं किया था, महसूस कर सकते हैं, । इतना ही नहीं, लेकिन आप अन्य लोगों के केंद्रों को महसूस कर सकते हैं। इसका मतलब है कि आपका मध्य तंत्रिका तंत्र [central nervous system] एक नई जागरूकता से आशिर्वादित हो रहा है, जिसके द्वारा वह आपको बता सकता है, आपसे संवाद कर सकता है, आपके केंद्रों द्वारा जो चित्त दिया गया है और साथ ही यह सूक्ष्म रूप से आपका चित्त दूसरों के केंद्रों में भी ले जा सकता है।

तो, पहली बात जो आपके साथ होती है, वह यह है कि आपका ध्यान सूक्ष्म हो जाता है। ध्यान रहे सूक्ष्मतर बनने का मतलब है कि आप गहरी चीजों को समझना शुरू कर दें। उदाहरण के लिए, एक पक्षी एक फूल देख सकता है लेकिन एक फूल की सुंदरता को महसूस नहीं कर सकता है। और एक व्यक्ति जिसने आत्मसाक्षात्कार नहीं पाया हो वह एक फूल की सुंदरता तो देख सकता है, लेकिन फूल के वायब्रेशन  को नहीं देख सकता है। तो आप सूक्ष्मतर बन जाते हैं, आपका ध्यान सूक्ष्मतर हो जाता है। आप निश्चित रूप से अन्य लोगों की तुलना में विकास के एक ऊँचे स्तर पर हैं।

अब हमें यह देखना है कि हम अपने चित्त का उपयोग कैसे करें।

आपने देखा है, जब आपको आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ था, तब भी, जब आप अपने बचपन से ही अपने हाथ में एक कला विकसित करना शुरू कर देते हैं, तब आप उस विशेष कला की निपुणता विकसित करते हैं, क्योंकि एक तरह का विशेष आवरण तंत्रिकाओं पर बढ़ता है। उसी तरह, जब आपको बोध होता है, तो मैं कहूंगी कि अब आप एक नए जन्मे व्यक्ति हैं, अगर आप अपने चित्त का सम्मान करना शुरू करते हैं तो धीरे-धीरे आप सहज योग में एक निपुणता विकसित कर लेते हैं। लेकिन इतने सारे लोग, जब उन्हें बोध प्राप्त होता है, तो वे बड़ी मुश्किल से दूसरी बार आते हैं। यदि वे दूसरी बार आते भी हैं, तो भी वे चैतन्य की भावना को अधिक विकसित नहीं करते हैं, वे अभी भी अपने दिन-प्रतिदिन के काम में व्यस्त रहते हैं, वे उन चीजों पर अपना चित्त बर्बाद कर रहे हैं जो आपको सूक्ष्मता की भावना नहीं देते हैं। अतः सूक्ष्मता, सहज की कला की निपुणता अपने-आप विकसित नहीं होती है। मैं एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण कहूंगी जो अधिक पढ़ा-लिखा है, जैसे ही उसे अपना बोध प्राप्त होता है वह उसका मिलान, जो कुछ उसने पढ़ रखा है, उससे करने लगता  है, इससे उसका चित्त फिर से व्यर्थ चला जाता है। वैसे भी, उनका चित्त इन पारंपरिक विचारों द्वारा तय किया गया है; उनमें से कुछ सही हैं, कुछ गलत हैं, कुछ बिल्कुल दोषपूर्ण हैं, कुछ बेकार हैं। कुछ केवल इसलिए हैं क्योंकि वे पैसा बनाना चाहते थे, उन्होंने कुछ कचरा प्रकाशित किया है।

जैसे ही आपको बोध प्राप्त होता है, आप अपनी स्वयं की सतही जागरूकता पर वापस जाते हैं और इस सूक्ष्म का उस स्थूल से मिलान शुरू कर देते हैं, इसलिए आप फिर से अपने वायब्रेशन खोने लगते हैं। वास्तव में, मैंने छोटे बच्चों के साथ देखा कि,बोध प्राप्ति होने के बाद वे बहुत लंबे समय तक सोते हैं। वे कुछ समय के लिए थोड़ा निष्क्रिय हो जाते हैं। लेकिन अगर किसी बुजुर्ग को बोध मिलता है, तो वह तुरंत किताब की दुकान पर जाएगा, कुंडलिनी पर एक किताब खरीदेगा और इसके बारे में पढ़ना शुरू कर देगा।

तब आप में से कुछ, यह नहीं समझ पाते कि, आप कुछ और ही हो गए हैं, इसे हल्केपन से ले लेते हैं, “ठीक है, माताजी बहुत दयालु हैं; वह कहती है कि मैं पार हूं, लेकिन मैं कैसे विश्वास करूं? जैसे कि,विश्वास कर के वे मुझे कोई पैसा देने जा रहे हैं या मुझे नहीं पता कि वे क्या देने जा रहे हैं। “मैं वायब्रेशन  को आते हुए देख सकता हूं, लेकिन वायब्रेशन प्राप्त करने का क्या उपयोग है? उन्होंने हमें वायब्रेशन क्यों दिये?” फिर से उपयोगिता के स्थूल विचार पर वापस आए, क्योंकि अब तक मानव की प्रकृति सब कुछ केवल उपयोग के लिए बनाने की है। हर चीज़ उपयोग की जाना चाहिए, आप देखते हैं। मनुष्य समझता है कि उसका कोई पार नहीं है। इसलिए वह अपने आत्मसाक्षात्कार को उपयोगिता [काम में आने वाली चीज़ ] की श्रेणी में रखना शुरू कर देता है। “इसकी क्या उपयोगिता है? कितने लोग इसे प्राप्त करने जा रहे हैं? क्या होने वाला है? अनुपात क्या है? क्या है शेड्यूल? यह क्या है? वो क्या है?”

आपको यह सूक्ष्मता, आनंद लेने के लिए दी गई है। जैसे, अगर हम फूल की सुंदरता का आनंद लेते हैं, तो हम आनंद लेते हैं। क्या हम किताबों में जाते हैं और ढूंढते हैं कि, “हमें अपने इस आनंद के बारे में क्या करना चाहिए? इस फूल का आनंद कैसे लें? ” और फिर “क्या करना है?” और, “किसने फूलों के बारे में वर्णन किया है, तो चलो हम तुलना करते हैं कि क्या यह उस के अनुरूप है? ” लेकिन आम तौर पर यही किया जाता है और वास्तव में मैं नहीं जानती कि कैसे कहें, क्योंकि यह एक मूर्खतापूर्ण बात है। और मुझे केवल यह डर है कि, कभी-कभी, अगर मैं कहूँ, तो उन्हें बुरा लगेगा, और, जैसा कि मनुष्य हैं, वे बिना कारण बुरा मानते हैं | यह बहुत ही मूर्खता है।

बच्चे बहुत समझदार होते हैं। एक बार जब वे इसे प्राप्त करते हैं तो वे इसका आनंद लेना शुरू कर देते हैं। उन्हें तो बस मजा आता है। वे बस सोते हैं! वे बेफिक्र हैं। वे सोचते हैं, कि यह कुछ ऐसा है जिसका आनंद लेना है, “हमें इसका आनंद लेने दें।” तो बहुत शुरुआत में ऐसा ही होता है।

और आदमी को पता नहीं है कि कैसे उसने इस आधुनिक युग में, अपने विचारों और अवधारणाओं के अनुसार चीजों को व्यवस्थित करके, इस कलियुग में खुद को पहले से कहीं अधिक सतही बना लिया है। वह इतना अप्राकृतिक, इतना मूर्ख हो गया है कि आनंद और कुरूपता के बीच भेद कर पाने की बुद्धि, उसके पास नहीं है। वह बहुत उलझन में है।

तो, सबसे पहले, केवल एक यही कारण नहीं, बल्कि कई कारण हैं। और जैसा कि मैंने आपको बताया, स्वाभाविक रूप से, यह बोध के पहले की मानवीय, स्थूल गतिविधियाँ हैं। यदि आप इस बीमारी को जहाँ से यह आयी है, वहीँ से समझते हैं तो, कभी-कभी इसे सुधार करना आसान होता है। आप बीमारी को इसके पिछले इतिहास को समझे बिना ठीक नहीं कर सकते। यदि आप इतिहास के छात्र हैं तो आपको पता चलेगा कि मानव ने कैसा व्यवहार किया है। मेरा मतलब है, आप बस चकित होंगे, इन लोगों के साथ क्या गड़बड़ है? भगवान ने एक दुनिया बनाई! मेरा मतलब सिर्फ यह है कि, मेरे जैसा व्यक्ति इस धरती पर आए, अचानक पाता है कि बहुत सारे देश बन गए हैं। ठीक है बन भी गए ,यदि आप पूरी दुनिया को एक साथ प्रबंधित नहीं कर सकते हो, लेकिन फिर लड़ाई चल रही है, एक-दूसरे को मार रहे हैं। अकारण सभी प्रकार की समस्या, मेरा मतलब है कि यह एक पागलखाना है!

इसलिए ऐतिहासिक रूप से यदि आप देखते हैं कि कैसे आदमी ने खुद को पागल बना लिया है – तो यह एक व्याख्यान में कहना आसान नहीं है (हंसते हुए) कि , आपको कई संस्करणों को लिखना होगा। मुझे लगता है कि पहले से ही कई लिखित पुस्तकें हैं। तो, आपके चित्त बिगड़ जाने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।

शारीरिक रूप से, जो लोग शारीरिक बाधा या शारीरिक परेशानी या ऐसा ही कुछ के लिए आते हैं, क्योंकि वे बीमार हैं, और कभी-कभार इनसे कुछ बेहतर लोग जिन्हें ऐसी समस्याएँ नहीं है क्योकि उन्हें निश्चित ही आनंद का राहत वाला भाग प्राप्त होता हैं। यदि उन्हें राहत मिलती है, तो उन्हें आनंद की बस कुछ छाया सी मिलती है, जिसे वे महसूस करते हैं और फिर, वे समझने लगते हैं कि इसका आनंद लेना है। लेकिन मैं कहूँगी, वे भी एक बार राहत पाने के बाद गायब हो जाते हैं। यह नहीं समझ पाते हैं कि स्वाद और आनंद लेने के लिए इससे बड़ा भी बहुत कुछ है।

और सहज योग में शारीरिक आनंद अपने आप में, अपने चित्त को सूक्ष्म बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। आपको अपना चित्त केन्द्रित करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन आपको अपने चित्त में सूक्ष्मता और सूक्ष्मता पाना होगा।

जैसा कि आप जानते हैं, चित्त केन्द्रित करना, एक बहुत ही गलत तरीका है। यह कुछ योगियों द्वारा किया गया था और आप जानते हैं कि इसका परिणाम क्या है: उनके चक्र सभी टूटे और समाप्त हो गए। जब उन्होंने आज्ञा चक्र पर अपना चित्त केंद्रित किया, तो आपने देखा कि आज्ञा चक्र टूट गया है। आप को अपना चित्त केन्द्रित नहीं करना है वरन उसे सूक्ष्म-सूक्ष्मतर बनाना होगा।

जैसा कि मैंने आपको बताया कि जब एक चुंबक को, पत्थरों के पास लाया जाता है तो, पत्थरों को कुछ नहीं होता है; आप किसी भी तरह से चुंबक को घुमाते हैं, वे वैसे ही रहते हैं। लेकिन जब आप इसे लोहे के बुरादे में ले जाते हैं, केवल, बुरादा चुंबक की ओर आकर्षित होता है। उसी तरह एक सहज योगी का ध्यान इतना सूक्ष्म होना चाहिए कि उसे वायब्रेशन महसूस हो, उसे वायब्रेशन के बारे में सोचना चाहिए, उसे वायब्रेशन खाना चाहिए, वायब्रेशन पीना चाहिए और उनका आनंद लेना चाहिए।

भौतिक पक्ष में, कई लोग मुझे बताते हैं कि, “हम उनके घर गए और उन्होंने मुझे लड्डू दिए और मुझे खाना पड़े। आप क्या कर सकते हैं, माताजी? “वास्तव में, आप देखिए, वे लड्डू के आकार की ओर आकर्षित हो गए। उन्होंने इसे खाया, लेकिन उन्होंने उन लड्डूओं के वायब्रेशन को नहीं देखा, उन्होंने बस इसे खा लिया और फिर उन्हें पेट की परेशानी हुई। जब उन्हें पेट में तकलीफ होती है, तो वे कहते हैं, “माताजी, हम अपना वायब्रेशन खो चुके हैं, अब क्या करें? हमने लड्डू खाए। ” लेकिन अगर आपने देखा कि उस लड्डू में कोई वायब्रेशन नहीं है, तो आपको यह कहना चाहिए कि, “आज मुझे कुछ भी खाने की अनुमति नहीं है ,” या ऐसा ही कुछ, और आपको उन्हें नहीं खाना चाहिए!

यदि आप एक जन्मजात आत्मसाक्षात्कारी बच्चे को देखें तो,  वह कभी नहीं खाएगा। यहां तक ​​कि मां बच्चे को पीटती है तो भी, वह कहता है, “ठीक है, मुझे पीट  दो, लेकिन मैं इसे नहीं खाऊंगा !” चूँकि वे गन्दगी को खाने वाले नहीं हैं, ऐसे बच्चों को बहुत ही जिद्दी माना जाता है, उन्हें लगता है कि वे अड़ियल हैं। चूँकि वे जानते हैं, ” इसमें कोई वायब्रेशन नहीं है, इसलिए हमें यह क्यों खाना चाहिए क्योंकि हमें आनंद नहीं आएगा।” तो भौतिक पक्ष पर आपने, ऐसी कई ग़लतियाँ की हैं। यदि आप अभी हाल को ही लें, तो माना की अपनी आदतें ही लीजिए जैसे कि आपको अपने बालों को खींचने की आदत है। कोई महिला थी जिन्हें अपने बाल खींचने की आदत थी और वह यहाँ गंजी हो जाती थी, फिर वहाँ गंजी हो जाती थी, फिर यहाँ गंजी हो जाती थी और बाल इस तरफ बढ़ जाते थे, फिर वह यहाँ गंजे सिर रखने की आदी हो गई थी। फिर वह अपने बाल यहाँ से खींचेगी। इस तरह की एक स्त्री! इसलिए वह मेरे पास इलाज के लिए आई। कल्पना कीजिए! तो मैंने उससे कहा, “तुम ऐसा क्यों करती हो?” वह कहती है, “अब मेरा चित्त ऐसा ही है, हमेशा मेरे बालों को खींचने लगता है।” मैंने कहा, “क्या करें? आपको ऐसा ही चित्त मिला है! ” तो, आप जानते हैं कि, जब भी वह अपना हाथ वहाँ रखती थी,उसकी बड़ी बहन उसके हाथ पर पिटाई करती थी। उसने कहा, “तुम मुझे पीटो, अगर तुम मुझे नहीं पीटोगी तो मैं तुम्हें पीट दूंगी।” लेकिन मार-पीट चालू रही और हर कोई उन्हें देखता था कि, “वे आपस में क्या कर रही हैं?” और फिर भी, आप देखते हैं, वह इसे रोक नहीं सकी! सभी आदतें इस बंदर के कामकाज की तरह हैं। वे सभी ऐसी ही हैं, क्योंकि पदार्थ हमेशा हमारे चित्त के ऊपर हावी होने के प्रयास में है, और इसलिए हमारी आदतें बन जाती हैं। कुछ आदतें ठीक, सुविधाजनक और उपर बताई सुविधा जैसी हैं।

मेरा मतलब है आप जानते हैं,कि कुछ लोग आदतों को ख़त्म करने के लिए कहते हैं कि “हम न तो जमीन पर बैठेंगे और न ही कुर्सी पर।” “तो तुम कहाँ बैठोगे?” “हम बैठे हुए की मुद्रा में बने रहेंगे और, हम उस तरह का अभ्यास करेंगे।”

मेरा मतलब है कि, आपको ऐसी बकवास करने की ज़रूरत नहीं है। मेरा मतलब है कि कुछ चीजें ठीक हैं, अति पर नहीं जाना चाहिए। लेकिन कुछ आदतें जो हमने हासिल की हैं, वह ज्यादातर फैशन के कारण है। और हम इसलिए शुरू करते हैं, क्योंकि किसी के धूम्रपान करने पर, वह आपको मजबूर करता है, वह कहता है “ठीक है”|  एक अन्य बुरी आदत जो हमें मिली है वह है, किसी को ” नहीं ” ना कह पाना ।

आप देखिये ” ‘नहीं’ कैसे कहते, वे सभी शराब पी रहे थे और उन्होंने हमें पेय की पेशकश की और हमने कहा कि ‘नहीं’, लेकिन वे हमें मजबूर कर रहे थे। तब आप जानते हैं,पीने के लिए ‘ ना ‘ यह बहुत बुरा लग रहा था,  और … और उन्होंने मुझे पीने के लिए एक कप या, गिलास दिया और फिर मैंने सोचा, ‘ठीक है, मैं बहुत कम घूंट लूँगा,’  एक दिन आप जानते हैं और फिर मैंने यह ऐसे लिया। और फिर देखिये, मेरे संबंधी, वे आए और उन्होंने हमें रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया और हमें जाना पड़ा, और फिर देखिये,उन्होंने वहाँ एक कैबरे नृत्य शुरू किया, और हमें देखना पड़ा, आखिरकार एक नग्न महिला को ना देखना कितना बुरा लगेगा न। “(हँसते हुए)

“ओह, हम बहुत मासूम लोग हैं!” तो हम सफाई देते हैं, “अब क्या करें, यह समाज है, यह फैशन है, यह शैली है, यह ऐसा ही है।”

लेकिन एक सहज योगी एक विशेष है, वह एक चुना हुआ है। चूँकि आपने खुद अपना मान नहीं किया है। तुमाला किम्मत नई समझी (मराठी) आपने अपने आप को उतना महत्व नहीं दिया है जितना मैंने आपको दिया है। वास्तव में बहुत कम लोगों को इस तथ्य का अहसास होता है कि, इस तरह की बोध प्राप्ति के लिए माताजी ने जरूर बहुत महान कुछ किया होगा। यह काम करने के लिए खुद उन्होंने बहुत श्रम दिया है,  अपने सारे जीवन में उन्होंने जबरदस्त तपस्या की होगी। और इस जीवन में भी उन्होंने दिन-रात बहुत मेहनत की होगी। और यहां हम, जब हम इसे प्राप्त करते हैं, तो पूरी चीज को कितना सामान्य ढंग से लेते है, हम इसके बारे में ऐसे हैं।

मैंने सोचा था कि आप तुरंत अपना महत्व जान लेंगे और आप सोचेंगे कि आप कुछ महान हैं और आपको यह बोध और आत्म-साक्षतकार मिला है, लेकिन ऐसा नहीं है। और आप जीवन में स्थूल चीजों से समझौता करना शुरू कर देते हैं।

आप में से ही किसी एक को एक बड़ी आबादी का नेतृत्व करना है। आप में से एक इन सभी का नेतृत्व कर सकता है। नेता समझौता नहीं करते हैं, नेता जिनका नेतृत्व करते हैं,उन लोगों की समस्याओं को हल नहीं करते हैं बल्कि, वे उन्हें हल करने के लिए समस्याएं देते हैं। वे उनके ऊपर खड़े हैं, वे उनसे बहुत ऊपर हैं, वे समझौता नहीं करते हैं, वे झुकते नहीं हैं। दूसरे उनके सामने झुकते हैं।

यदि प्रकाश सड़कों पर गिरने और लड़खड़ाने लगे, तो वह व्यक्ति क्या करेगा जो प्रकाश को हाथ में लेकर चल रहा है? आप सभी मशालों की तरह हैं और आपका जीवन और एक व्यक्तित्व किस तरह का होना चाहिए, यह आपको तय करना है।चित्त यही – प्राथमिकताएं देता है।

जब आप समझते हैं कि कैसे आपका शारीरिक अस्तित्व, उपस्थिति, आपका यह शरीर स्वच्छ करना है,  उसे सुंदर होना है, नम्र होना है, दयालु होना है, दयालु होना है, शिष्ट होना है, प्रतिष्ठित होना है।

मैंने लोगों को समूहों में देखा है, जब आप नीचे बैठे होते हैं, तो इस तरीके से व्यवहार करते हैं [कि] यहां तक ​​कि एक सामान्य शिक्षित व्यक्ति भी ऐसा व्यवहार नहीं करता है। कारण यह है, आपको अभी तक यह एहसास नहीं हुआ है कि आप नेता हैं और लोग आपको देख रहे हैं। एक प्रकार की मस्ती होनी चाहिए, अपने आप से संतुष्ट होना चाहिए।

इसलिए शारीरिक पहलू पर, आप क्या खाते हैं, आप क्या देखते हैं, आपको क्या पसंद है, पूरी प्राथमिकताएं बदलनी चाहिए। जो सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए वह ” सहज ” है; हर परिस्थिति में, हर पद्धति में, एक आदत – सहज।

सहज का मतलब आपके साथ पैदा हुआ है, सहज का मतलब आसान नहीं है। बहुत से लोग भ्रमित हो जाते हैं। अब आपको अपना अधिकार जो आप के साथ ही जन्मा था, मिल गया है। इसलिए आपके लिए, यह जानना आवश्यक है कि आप एक सहज हैं और आप कुछ भी ‘ असहज ‘स्वीकार नहीं करने वाले हैं । यह सहज का अर्थ है! सहज का मतलब है कि आप हर चीज़ के ऊपर, अंधेरे के ऊपर,  सहज का प्रकाश ले जाएं और अंधकार को जो कि ‘असहज ‘ है स्वीकार न करें। तो आपको कोई आदत कैसे हो सकती है जो आपको भावनात्मक बंधन देती है?

सहज का मतलब है कि आपके पास एक विशेष, सूक्ष्म जागरूकता है। एक राजा सड़कों को साफ नहीं करता है।

आपका चित्त भौतिकता में आसानी से खो जाता है, क्योंकि आप अपने अथवा दूसरों के सभी पुराने असहज तरीकों में लिप्त हो जाते हैं। आप जीवन की ‘असहज ‘ प्रणाली में खो जाते हैं। आपको पूरी दुनिया की सारी प्रणाली को बदलना होगा जिससे की लोग सहज बन जाए ना की ‘ असहज ‘। केवल तभी पूरी चीज आपके लिए सहज बन पाएगी।

सहज योगियों में यह एक बड़ी गलतफहमी है। वे सोचते हैं “ओह! जब यह सहज आएगा, तब हम यह काम करेंगे, तब हम चारों ओर घूमेंगे और लोगों से बात करेंगे – यह सहजता से आना चाहिए, “ ऐसा बिलकुल नहीं करना। यह बहुत गलत रवैया है। ‘सहज’ का अर्थ है कि आपको अपने भीतर सहजता का प्रकाश मिला है और आप कुछ भी असहज कैसे सहन कर सकते हैं …

(रिकॉर्डिंग में विराम)

… जहाँ तक आपके जीवन का संबंध है, इसका मतलब है कि आपको अवश्य पता होना कि क्या कपड़े पहनना है, कैसे बात करनी है, कहां जाना है, किससे मिलना है, आपके भाई कौन हैं, आपकी बहनें कौन हैं और आपके पुत्र कौन हैं,आपके माता-पिता कौन हैं। इसी से आपका चित्त भटक जाता है।

फिर आपकी स्थूल आदतें: आपका पुराना जीवन जैसा वहां था, जिसे सिर्फ निकाल फेंकना है, समाप्त होना है। और इस तरह तुम आगे नहीं जा सकते, क्योंकि अगर तुम जाओगे, तो तुम यहाँ पकड़ोगे और वहाँ फँसोगे, तब तुम अपनी गर्दन तोड़ोगे, तुम मेरे पास आओगे, “माँ, मैंने अपनी कमर तोड़ ली है और ऐसा हुआ है, यह हुआ है, यह दर्द हो रहा है, मैं गर्म हो रहा हूं, मुझे सिरदर्द हो रहा है, मैं यह कर रहा हूं। ” जब तक आप सहज नहीं बन जाते, तब तक यह आप पर काम करता रहेगा। लेकिन आप आपका स्व क्यों नहीं बन जाते?

उदाहरण के लिए,  एक इंसान कुत्ते की तरह नहीं सो सकता है, उदाहरण के लिए। अगर चूँकि चारों ओर कुत्ते हैं, वह कुत्ते की तरह सोना शुरू कर देता है तो, उसे दर्द होने वाला है। उसी तरह अगर आप असहज इसलिए बन रहे हैं क्योंकि सभी असहज हैं, तो आप मुश्किल में पड़ने वाले हैं। क्योंकि कुत्ते को महसूस नहीं हो रहा है, हालांकि उसे दर्द हो रहा होगा, लेकिन वह इसे महसूस नहीं कर रहा है। लेकिन आप इसे जरुर महसूस करते हैं । जिस व्यक्ति का अभी तक पुनर्जन्म नहीं हुआ है, वह इसे महसूस नहीं करता है, उसे समस्या होती है, लेकिन वह इसे महसूस नहीं करता है, आप इसे महसूस कर सकते हैं, और आपको निश्चित ही इसे छोड़ देना होगा, जितनी जल्दी उतना बेहतर होगा! यदि आप इसे छोड़ नहीं देते हैं तो आप फिर से उसी अंधेरे में जा रहे हैं और यह नया अंधेरा नारकीय हो सकता है, यह भयानक हो सकता है।

मनुष्य के रूप में मर जाना बेहतर है, क्योंकि तब आप फिर से जानवरों के रूप में जन्म ले सकते हैं, यह, वह। लेकिन पुनरूत्थान पा कर और सत्य जान कर अगर आप फिर से अपनी पूर्व की आदतों पर लौटते हैं, तो यह बहुत खतरनाक हो सकता है। इस प्रकार में आप के चित्त को आपके सूक्ष्म अस्तित्व पर थोड़े भय के साथ जमाती हूँ । सूक्ष्म अस्तित्व केवल आनंद ले सकता है। सुबह आपने ध्यान का आनंद लिया, आप सब सूक्ष्मतर बन गए, मैंने आपको वहीं धकेल दिया। लेकिन आपको याद करके, जो कुछ भी हुआ है, उसे याद करके, शारीरिक रूप से आप कितना अच्छा महसूस करते हैं, यह याद रख कर आपको अपने आप को सूक्ष्मतर  बनाए रखना होगा।

घड़ी देखना, इंसान की सबसे बुरी आदतों में से एक है। यह मेरे लिए बहुत दर्दनाक है कि,  जब मैं बात कर रही हूं तो लोग घड़ी देखते हैं। मैं अभी इसे सहन नहीं कर सकती! क्योंकि अब आप स्थान से परे, समय से परे हैं। समय बचाकर आप क्या करने जा रहे हैं? आपने अब तक क्या किया है? जो आपकी प्राथमिकताओं को दर्शाता है। हमारी प्राथमिकताएं बदलनी चाहिए और जब आप आनंद लेना शुरू करेंगे तो आप उन्हें आसानी से बदल सकते हैं। एक बार जब आप दिव्य प्रेम, अमृत का स्वाद चख चुके हैं, तो आप गंदा पानी पीने वाले नहीं हैं। लेकिन आप सबसे पहले आपको जो आनंद मिला था वह याद रखें। यह एक तरीका है सुधरने का, तथाकथित, आपकी सूक्ष्मताएं जमाने का ।

यह चित्त है जो जीवन की सतही चीजों से आच्छादित हो जाता है, यहां तक ​​कि इसके भावनात्मक पक्ष में भी, उदाहरण के लिए, आपके रिश्ते हैं। हमने कुछ सहज योगियों को ऐसे ही गूम होते हुए देखा है। लोगों के साथ उनके कुछ बहुत ही स्थूल रिश्ते थे, यहाँ तक कि गुरु, और उनमें से कुछ के दोस्त थे और कह सकते हैं कि, कुछ अन्य गंदे रिश्ते, और वे छोड़ नहीं सकते थे और वे खो गए।

इसलिए आपको बैठना होगा और यह पता लगाना होगा, “मैं क्यों स्वयं का आनंद नहीं ले पा रहा हूं? मैं हारा हुआ हूं। क्योंकि वे चीजें, अगर वे आनंद देने वाली होतीं, तो मैं एक से दूसरे चीज़ की तरफ नहीं भागता। उन्होंने मुझे कभी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं किया; तो फिर से उनके पास क्यों वापस जाना? “

भावनात्मक आनंद, जिसे आप कुछ बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं, को भी आपके चित्त और सूक्ष्मता के नए आयाम में आकलन करना चाहिए। आप किसी को अपने बहुत निकट-और-प्रिय के रूप में मानते हैं और आपके बीच एक व्यावसायिक संबंध है, या किसी प्रकार का है … मुझे नहीं पता, लोगों के किस प्रकार के मानवीय संबंध हैं। आपको पता होना चाहिए कि यह बहुत ही सतही है और आपको इससे कोई आनंद नहीं हो सकता। जैसे आप प्याले से पानी पीते हैं, अब प्याला भी सतही है, पानी भी सतही है; सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी जीभ पानी को महसूस कर सकती है। यदि जीभ पानी को महसूस नहीं कर सकती है और यदि पानी पत्थरों की तरह महसूस होता है, तो पानी लेने का क्या फायदा है? तो सबसे महत्वपूर्ण बात जीभ में स्वाद, सार में है। उसी तरह हमारी प्रसन्नता का सार है आनंद और, आनंद वायब्रेशन को महसूस करने में है। तो जहां भी आपको आनंद मिले, आपको लेना चाहिए। लेकिन आपके भीतर यह नई जागरूकता अभी इतनी अधिक पहुंची नहीं है, यही कारण है कि यह एक समस्या है। अन्यथा मनुष्य को यह कहना मुश्किल नहीं है कि, “यह अच्छा है, आप पीजिए।” वह इसे लेता है और वह जानता है कि यह अच्छा है। वह ऐसा कुछ नहीं खायेगा जो कड़वा हो। यदि आपको उसे कुछ भयानक चखाना है, तो आपको उसे पहले चॉकलेट और बाद में चॉकलेट देनी होगी। लेकिन मनुष्य, जब वे विकसित होते हैं, तो मैंने देखा है कि वे अपने पिछली लालसाओं के कारण भयानक चीजों के प्रति अधिक इच्छुक हैं। तो, अपना चित्त पूरी तरह से परमात्मा की तरफ लगाएं, उसे बाहर निकालें, पूरी तरह से उसकी तरफ। ताकि सतही बातों की ओर चित्त न रहे।

मैं पाती हूँ की अब भी लोग आते हैं और मुझसे पूछते हैं, “माताजी, मुझे एक समस्या है, मुझे नौकरी चाहिए, मुझे क्या करना चाहिए?” माँ, यह किया जाना है, कि वह किया जाना है? ” बेशक, साधारणतया बिलकुल ठीक है। लेकिन अगर यह आपके चित्त को आकर्षित करता है, तो इसका मतलब है कि आपने अपनी यह समझ खो दी है कि आप सहज योगी हैं और आपका आनंद सूक्ष्म रूप में है, और आप इसका आनंद ले सकते हैं। तो ये स्थूल चीजें आपको कभी आनंद देने वाली नहीं हैं, तो क्यों न आप उनसे कुछ ऐसा मांगें जो आपको वह सूक्ष्म आनंद देने वाला हो जिसका आप आनंद ले सकते हैं; केवल आप ही आनंद ले सकते हैं।

तो हमारे चित्त को यही होता है। हम अपने पिछले विचारों और हमारे भावनात्मक बंधनों के कारण खो जाते हैं। और हम यह भी कह सकते हैं कि हमारे तथाकथित, आध्यात्मिक बंधन कि, “हम हिंदू, मुस्लिम, ईसाई हैं; हम शाकाहारी हैं, मांसाहारी हैं; हम हैं – “मुझे नहीं पता,” हम ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण, और ऐसी ही सभी तरह की चीजें हैं “, लेकिन हम वह नहीं हैं जो लगता है की हम हैं।

और, ये सभी चीजें फिर से आपके पास भी आती हैं कि, “हम जैन हैं, चूँकि हम जैन हैं, इसलिए हम बहुत अच्छे लोग हैं।” तुम मुझे कहीं से भी या किसी भी जैन या किसी भी अन्य से मिलवा दो, क्या उसे स्पंदन [वायब्रेशन] की समझ है? फिर ऐसा कैसे हो जाता है कि वह व्यक्ति आपका गुरु बन जाता है या वह व्यक्ति आपको इन चीजों के बारे में सिखा सकता है। अब आप एक मास्टर हैं। क्या कोई हेडमास्टर आ कर और उन लड़कों से सीखते हैं जो स्कूलों में भर्ती हैं?

यहाँ तक की मैंने एक नवागंतुक को भी देखा है जो अंदर आता है, अगर उसके पास एक बाधा है, तो वह सहज योगियों में से कम से कम 5% को आसानी से फुसला कर दूर ले जा सकता है। वह बड़ी बात करेगा, वह दिखावा करेगा और वह किसी गुरु को अंदर ला सकता है और न्यूनतम पांच प्रतिशत उसके पीछे भागेंगे। आप इसे कैसे समझते हैं? केवल एक चीज यह है कि, आपको उनमें से एक नहीं होना चाहिए। हर किसी को अपने लिए सोचना चाहिए ना कि दूसरों के लिए। आपको सोचना चाहिए कि आप इस लायक हैं अथवा नहीं? तो आध्यात्मिक बन्धनों में भी आपका चित्त उसी तरह भटक जाता है जबकि ये सभी बाहरी आयाम होते हैं।

अब वृंदावन के गोकुल के एक वर्णन में, आपने पढ़ा होगा कि जब कृष्ण अपनी बांसुरी बजाते थे, तो वे सभी महिलाएँ जो काम कर रही थीं – घर की गोपियाँ – हर काम, सब कुछ छोड़ देती थीं। दूध उबलता होगा और वे – काम आधा या पूर्ण किया गया था; वे अपना खाना खा रहे थे या जो भी मुद्रा में बैठे थे, वे बस उठकर उस मुरली (बांसुरी) की तरफ दौड़ने लगे। और जब वे वहां जाएंगे; वे चित्र की तरह खड़े होते, [चित्रवत से थाडे ]- चित्र की तरह, शरीर में कोई हलचल नहीं, कुछ भी नहीं, बस खड़े होकर और पूरे ध्यान से सुनना। ऐसा क्या था…? वह बोल भी नहीं रहा था। बस एक मुरली बजाये जा रहा है और सभी सिर्फ एक तस्वीर की तरह सुन रहे हैं। यह क्या था? जो आनंद वे महसूस कर रहे थे; जो आनंद वे अपने भीतर ले रहे थे, वह आनंद जो उस मुरली के साथ उन में बरस रहा था – बस खड़े होकर सुनना, वह सब। वो क्या है? वह उस आनंद की सूक्ष्मता है। बिलकुल ध्यान मग्न वे खड़े होते। उसी तरह आपका चित्त और मन सहज,  ईश्वर के साथ एकाकार होने पर होना चाहिए।

आप भगवान के साथ एक हैं; अपने केन्द्रापसारक बल [centrifugal force]को पूरी तरह से परमात्मा की ओर लगाएं। अपने आप को, हर समय, ईश्वर के साथ योग में रखो और बाकी काम यंत्रवत, [उपकरणों की तरह] किया जाता है|  पूरी चीज काम करना शुरू कर देगी।

मानव मन चीज़ो को औपचारिक तरीके से करने का आदी है। उन्हें लगता है कि, अगर आपको यह घर बनाना है तो आपको पहले खुदाई करनी होगी … पहले नींव, फिर गड्डे, गड्डे खोदना और फिर वे खंभे खड़े होंगे और फिर आपके पास छत होनी चाहिए। और, इस प्रकार है कि, एक के बाद एक वे चीजों की योजना बनाते हैं। लेकिन भगवान के अपने राज्य में कोई योजना नहीं है, आप बस बैठते हैं और आप बस आनंद लेते हैं!

अगर आपका चित्त वहां है, तो सभी काम पूरे हो चुके हैं। पूरा चित्त और फिर ‘ वह ‘ काम निकालते हैं। और उसको पूरी प्राथमिकता देते हैं ! अपने तरीके पर समझौता न करें। आपको दूसरों को भी ऊपर आने में मदद करनी है, इसलिए आपको याद रखना चाहिए, उनके लिए भी, आपका चित्त आपकी आत्मा पर, आपकी आत्मा पर, ईश्वर पर होना चाहिए – उस आनंद में उनके साथ एकाकार पूरी तरह से। पूरा दिल वहाँ है और अपने दोनों हाथों से और अपने दोनों पैरों के साथ, अपने पूरे चित्त से आप लोगों का उद्धार कर सकते हैं, क्योंकि आपके चित्त की हर समय पोषण, शिक्षण और देखभाल की जाती है। फिर आप को लोगों के उत्थान में भी मज़ा आएगा।

कुछ भी ठीक नहीं हो सकता है, जहाँ तक और जब तक आप सूक्ष्मता विकसित नहीं करते हैं|