The Normal Human Awareness

New Delhi (भारत)

1977-02-23 Public Program, The Normal Human Awareness, Delhi, India, transcribed, 67' Download subtitles: ENView subtitles:
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                    मानव चेतना से परे 

दिल्ली (भारत), 23 फरवरी 1977

और मैं कल ही कुंडलिनी पर दो घंटे बात कर चुकी हूं। जो लोग मेरा भाषण सुनना चाहते हैं वे श्री राय के साथ इसकी व्यवस्था कर सकते हैं और कभी आ सकते हैं और इसे सुन सकते हैं।

लेकिन आज आपको हमारे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करने वाली तीन शक्तियों और हमारे सभी स्वायत्त व्यवहार की देखभाल करने वाले सात केंद्रों के बारे में बताने के बाद, जो हमारे विकास के विभिन्न चरणों के मील के पत्थर हैं … केंद्र देवताओं के प्रतीक धारण किये हैं जो हमारे विकास के लिए जिम्मेदार हैं, जिन्होंने हमें मार्गदर्शन देकर, हमें नेतृत्व देकर विकसित होने में मदद की है। पूरी कार्रवाई सहज रही है।

जैसा कि मैंने कल आपको बताया, ‘सहज’: ‘सह’ का अर्थ है ‘साथ’, ‘ज’ का अर्थ है ‘जन्म’, आपके साथ पैदा हुआ। एक बीज में वृक्ष और भविष्य में आने वाले सभी वृक्षों का पूरा नक्शा सूक्ष्मतम रूप से रखा होता है। उसी तरह, हमारे अस्तित्व में, पूरा नक्शा रखा गया था। अमीबा या उससे भी पहले की अवस्था से हम इंसान होने के लिए काफी लंबी दूरी पार कर चुके हैं।

आज मैं आपको सामान्य मानव चेतना के आसपास क्या है इसके बारे में बताने जा रही हूँ।

हमें मनुष्य को उसकी संपूर्णता में समझना होगा। जो कुछ भी अज्ञात है उस सारे को जानना बहुत आवश्यक है, क्योंकि जो कुछ भी अज्ञात है वह सब परमात्मा नहीं है। हमें ऐसी गलतफहमी नहीं होना चाहिए की जो कुछ भी अज्ञात है वो एक दिव्य शक्ति स्वरुप है। और मनुष्य की संपूर्णता को समझने के लिए आपको अपना दिमाग खोलना होगा, मुझे ऐसे सुनना होगा जैसे कोई वैज्ञानिक किसी परिकल्पना को सुनेगा या समझेगा, और बाद में यदि आपको बोध प्राप्त होगा – अगर आप हैं; यह बहुत बड़ा “अगर” कुछ लोगों के साथ है, कुछ लोगों के साथ यह नहीं है – तब आप सभी गवाही दे सकते हैं, आप पता लगा सकते हैं, लेकिन एक वैज्ञानिक के रूप में आपके पास एक खुला दिमाग होना चाहिए। यदि आप कट्टर हैं, भले ही आप विज्ञान के दीवाने हैं, आप समझ नहीं सकते।

विज्ञान प्रेम के बारे में कुछ नहीं जानता; यह धर्म के बारे में कुछ भी नहीं जानता है। यह अवतारों के बारे में कुछ भी नहीं जानता है। लेकिन आज यह सिद्ध किया जा सकता है कि एक ऐसी शक्ति मौजूद है जो सभी कार्यरत शक्तियों का संश्लेषण है। और ईश्वरीय प्रेम की सर्वव्यापी शक्ति मौजूद है। लेकिन इसके लिए आपको एक सूक्ष्म व्यक्तित्व होना होगा। इस स्थूल मानव चित्त के साथ, आप इसे महसूस नहीं कर सकते। आपको एक कुशाग्र प्राणी बनना होगा और वैसे कुशाग्र प्राणी होने के लिए आपके पास पहले से ही एक तंत्र है जो इस घटना को स्वतःस्फूर्त रूप से करता है। यह सहज, अनायास, सहज है। किसी को इसे ट्रिगर (शुरू)करना होगा।

कल मैंने सभी चक्रों और उनके नाम और उनके देवताओं और तीनों शक्तियों को काफी विस्तार से बताया है, लेकिन आज मैं आपको बताने जा रही हूं कि इन रेखाओं से परे, मानव जागरूकता से परे क्या है। आप कह सकते हैं, मनोविज्ञान का विषय है, यद्यपि मनोविज्ञान एक ऐसा बच्चों जैसा विज्ञान है और ज्ञान इतना सीमित है क्योंकि वे बाहर से जांच कर रहे हैं। यह इस अर्थ में एक वस्तुनिष्ठ ज्ञान है कि आप बाहर से आते हैं और चीजों को देखते हैं। तुम किसी चीज को टटोलते हो और कहते हो, ” यह ऐसा है।” तब तुम दूसरी वस्तु को टटोलते हो और कहते हो, “यह वैसा है।” आपने छह अंधे आदमियों की कहानी सुनी होगी जो एक हाथी को समझने की कोशिश कर रहे थे। जैसा कि मैंने कल तुमसे कहा था कि एक ऐसी विधि हो सकती है जिसके द्वारा तुम प्रकाश डाल सकते हो और मनुष्य का संपूर्ण, संपूर्ण चित्र स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

इस तस्वीर में मैं उस हिस्से को नहीं दिखा पायी लेकिन मानव मन में, जैसा कि आप सभी जानते हैं, चेतना के विभिन्न स्तर हैं। अब तुम मुझे सुन रहे हो, मेरी ओर ध्यान दे रहे हो, तुम्हारा चित्त मेरी ओर है। यह ध्यान चेतन मन है। आप जानते हैं कि मैं जो बोल रही हूं उसके प्रति आप सचेत हैं। पल-पल तुम मुझे सुन रहे हो। यह वर्तमान क्षण अभी, इस क्षण, यह क्षण जैसा है, यह फिसल रहा है, अतीत बन रहा है और भविष्य आपके भीतर आ रहा है। हर क्षण मिट रहा है और एक नया क्षण आ रहा है। तुम वर्तमान को रोक नहीं सकते; आप अपने चित्त को वर्तमान में रोक नहीं सकते। अब, इसी वक्त में  होना, तुम नहीं हो पाते, यही कठिनाई है। तुम या तो अतीत के बारे में सोचते हो या भविष्य के बारे में, लेकिन तुम वर्तमान के बारे में नहीं सोच सकते, इस क्षण के बारे में नहीं सोच पाते। तो, एक साधारण काम में, हमारे पास हमारा अतीत और हमारा भविष्य है।

अतीत, वे इसे अवचेतन मन कहते हैं। अवचेतन मन, वे इसे कभी-कभी मानस कहते हैं। मुझे नहीं पता कि मानस से उनका क्या मतलब है, वे बहुत भ्रमित हैं, लेकिन हमारे पास एक अवचेतन की परत है, जिसमें हम जो कुछ भी इकट्ठा करते हैं, अनुभव, कंडीशनिंग, सब कुछ संग्रहीत करते हैं। यह कार्य बायीं ओर की नाड़ी द्वारा किया जाता है, जिसे इड़ा नाड़ी के नाम से  जाता है, जो महाकाली की शक्ति से संचालित होती है। अब इस शब्द से सभी अंग्रेजी जानने वाले वैज्ञानिकों को झटका नहीं लगना चाहिए। यह महाकाली शक्ति समस्त अनुभवों को संचित करके कार्य करती है, वर्तमान से भूतकाल में आपके पास जितने भी विचार आ रहे हैं, वह सब महाकाली शक्ति द्वारा किया जाता है।

भविष्य के बारे में सोचना, भविष्य की योजना बनाना, भविष्य को व्यवस्थित करना महासरस्वती की दायीं ओर की शक्ति द्वारा किया जाता है जो पिंगला नाड़ी के माध्यम से कार्य करता है। स्थूल रूप में उन्हें बाएँ और दाएँ अनुकंपी तंत्रिका तंत्र व्यक्त में किया जाता है। लेकिन एक डॉक्टर के लिए, दोनों प्रणालियाँ एक साथ काम करती हैं। वे इतने परस्पर जुड़े हुए हैं कि उनके लिए उन्हें आवंटित दो अलग-अलग कार्यों को सत्यापित करना बहुत मुश्किल है क्योंकि उनके तरीके और विधियाँ इतने ही स्थूल हैं।

बाईं नाड़ी हमारे भावनात्मक अस्तित्व की देखभाल करती है, निचला बायां हिस्सा हमारे भौतिक अस्तित्व के लिए है। इसे हम मनोदैहिक पक्ष कह सकते हैं। दाहिनी नाड़ी तरफ  -निचला भाग हमारे भौतिक अस्तित्व के लिए और हमारी सोच के लिए ऊपरी दाहिना भाग । मध्य नाड़ी सुषुम्ना पूर्णत: स्वतंत्र प्रणाली है जो हमारे भरण-पोषण का काम करती है।

प्रारंभ में, जब कोई व्यक्ति शराब पीना चाहता है, वह चाहता है, इस सुषुम्ना नामक नाड़ी की सूक्ष्म क्रिया के माध्यम से सभी परानुकम्पी गतिविधियां की जाती हैं और कार्य करने वाली शक्ति को महालक्ष्मी के रूप में जाना जाता है। यह शक्ति हमें विकसित करती है, यह हमें धर्म देती है, एक अवलंबन है। यदि आपने रसायन शास्त्र का अध्ययन किया है तो संपूर्ण आवर्त सारणी periodic table आश्चर्यजनक रूप से व्यवस्थित है। कार्बन को एक चतुर्संयोजक  tetravalent  तत्व के रूप में रखा गया है, जिसमें गणेश की तरह चार हाथ हैं। मैं आवर्त सारणी के विवरण में नहीं जाना चाहती लेकिन यह इतनी अच्छी तरह से व्यवस्थित है कि प्रत्येक तत्व के प्रत्येक परमाणु में अंतिम चक्र आठ प्रोटॉन के साथ होना चाहिए। यदि कम हैं या चार से अधिक हैं, तो वे या तो ऋणात्मक या धनात्मक तत्व बन जाते हैं। कितनी जबरदस्त प्लानिंग है।

और जब हम कहते हैं कि कोई ईश्वर नहीं है, तो हमें समझना चाहिए कि इतनी जबरदस्त योजना सिर्फ संयोग से हासिल नहीं की जा सकती थी। यह संयोग के उस नियम से काम नहीं करता। ठीक है ईश्वर को भूल जाओ, क्योंकि अचानक अगर तुम ईश्वर की बात करते हो तो वैज्ञानिकों को झटका लगता है। लेकिन वह मौजूद है और ये उसकी तीन शक्तियां हैं जो हमारे अस्तित्व में इन तीन कार्यों को करती हैं। पहले से हम अपने अतीत का निर्माण करते हैं, दूसरे से हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं और मध्य स्थित सुषुम्ना नाड़ी से हम चेतन मन में रहते हैं।

भविष्य और अतीत की समस्या की रचना मनुष्य के लिए एक विशेष विधि द्वारा की गई है, जैसा कि मैंने कल आपको बताया था, कि यह मस्तिष्क एक प्रिज्म का आकार लेता है और जब ये शक्तियां मस्तिष्क में दोनों तरफ प्रवेश करती हैं तो वे इसका कुछ हिस्सा खो देती हैं। जो दायीं ओर से प्रवेश करती है वह बायीं तरफ जाती है, बायीं ओर कुछ खोते हुए। यह एक महाकाली शक्ति है जो बाहर खो जाती है, यह अतीत की प्रतिक्रिया है। आप किसी को देखते हैं, मैं इस सज्जन को देखती हूं, अचानक मुझे उसके साथ अपने पिछले अनुभव याद आते हैं। उसका सारा अतीत उस भाग से मुझ तक आता है। और एक प्रतिक्रिया के रूप में मैं अपने मस्तिष्क में एक प्रति-अहंकार, एक कंडीशनिंग विकसित करती हूं, जिसे मैंने दूसरी तरफ एक गुब्बारे की तरह दिखाया है।

मैं आपको प्रति-अहंकार और अहंकार को समझने के लिए एक सरल उदाहरण देती हूं कि कैसे यह एक छोटे बच्चे में विकसित होता है। एक बच्चे को माँ स्तनपान कराती है और वह पूरी खुशी में, मां के साथ एकाकार हो, पूरी तरह से आनंद ले रहा है। अचानक मां बच्चे को एक तरफ से दूसरी तरफ ले जाती है, बच्चे को यह अच्छा नहीं लगता। बच्चे को यह पसंद नहीं आता और वह अपना पैर वहीं रख देता है। यही अहंकार का विकास है। वह खुद अप्रसन्नता अभिव्यक्त करता है। अहंकार मस्तिष्क में बाईं ओर धीरे-धीरे विकसित होता है लेकिन आगे आता है।

जब बच्चे को माँ द्वारा सुधार किया जाता है, तो वह कहती है, “ऐसा मत करो, ऐसा मत करो”, वह प्रतिबंधित किया जाना है। इसके द्वारा, वह इसे स्वीकार करता है, और प्रतिक्रिया के रूप में प्रति-अहंकार इस तरफ से मस्तिष्क के दायीं ओर विकसित होता है और लगभग बारह वर्ष की आयु तक धीरे-धीरे ढँक देता है क्योंकि भाषा एक और तरीका है जिसके द्वारा उन्हें मजबूत किया जाता है। और यहां, जब वे पूरी तरह से मिलते हैं, तो व्यक्ति एक अंडा बन जाता है, स्पष्ट रूप से भिन्न अभिव्यक्ति होती है, हर कोई एक अलग व्यक्तित्व विकसित करता है। वह मिस्टर सो एंड सो है, वह श्रीमान अमुक-अमुक है, वह मिस्टर सो एंड सो है और गलत पहचान शुरू हो जाती है। ऐसी कई गलत पहचान हैं जिनसे हम पीड़ित हैं; हम उन्हें ‘मिथ्या’ कहते हैं। हम जानते हैं कि वे असत्य धारणा हैं, हमारा नाम। मैं लोगों को जानती हूं, किसी का नाम धर्मधर था और वह अब तक का सबसे बड़ा अधर्मी था।

बहुत सारी गलत पहचान हैं। हम अपने नाम से जुड़े हुए हैं। अगर कोई कहता है कि, “अरे फलां, आप बहुत बुरे आदमी हैं”, तो आपको बहुत दुख होता है और बुरा लगता है, आपका गुस्सा आता है, “आप क्या कहते हैं? यह ‘मेरा’ नाम था।” हम अपने पूरे जीवन में बहुत सी गलत पहचानों से जुड़े हुए हैं। मिथ्या इकट्ठा होने लगता हैं और हम उस गलत पहचान से बहुत अधिक आच्छादित हो जाते हैं। हमारा अहंकार और प्रति-अहंकार हमारे सभी ज्ञान को पूरी तरह से ढँक लेता हैं।

तो अहंकार एक उप-उत्पाद के रूप में बनाया गया है ऐसा मैं कह सकती हूं, या आप इसे दायीं नाड़ी की अति गतिविधि से कह सकते हैं। उस गतिविधि का धुएं, जैसे आप किसी कारखाने में देखते हैं, अहंकार को इकट्ठा कर रहे हैं। और बायीं नाड़ी की गतिविधि प्रति-अहंकार को इकट्ठा करती है। और इस तरह आपके मस्तिष्क में अहंकार और प्रति-अहंकार विकसित होते हैं। तो इंसान ऐसा ही होता है।

उन्हें अपनी महाकाली शक्ति प्राप्त हुई है जो उनकी अवचेतन subconscious गतिविधि की देखभाल कर रही है, उनकी महासरस्वती शक्ति जो अग्र-चेतन supra-conscious गतिविधि की देखभाल कर रही है, और उनकी महालक्ष्मी शक्ति जो सचेत गतिविधि की देखभाल कर रही है। अब, ऐसे क्षेत्र हैं जो इससे परे हैं, जिनके बारे में हमें जानकारी नहीं है। बाईं ओर, महाकाली क्षेत्र से परे, सामूहिक अवचेतन मन स्थित है। सामूहिक अवचेतन मन जहां वह सब कुछ एकत्र किया जाता है जो मृत है, वह सामूहिक अवचेतन है। महासरस्वती नाड़ी से परे, इस क्षेत्र से परे, सामूहिक अग्रचेतन मन है। हम उस में भी शामिल हैं, हालांकि हम इसके प्रति सचेत नहीं हैं। चूँकि हम इसके प्रति सचेत नहीं हैं इसलिए हम इसे अभी भी अपने लिए अचेतन कह सकते हैं।

अब, मध्य मार्ग सुषुम्ना से परे, चेतन मन से परे, सामूहिक चेतना निहित है। वह सर्वव्यापी चेतना है जिसे हम सत-चित-आनंद के नाम से जानते हैं। यह सर्वव्यापी है। मूलाधार चक्र के नीचे, जो आपको मैंने नीचे प्रदर्शित किया है, नरक का सबसे भयानक क्षेत्र है। यह मौजूद है। ये वहां है। हम शायद इस पर विश्वास न करें लेकिन यह है और इसे साबित किया जा सकता है। जैसा कि मैंने आपको बताया है,  जब हम मरते हैं तो हम सामूहिक अवचेतन में,सामान्य रूप से,  इसमें प्रवेश करते हैं,  असामान्य रूप से नहीं बल्कि सामान्य रूप से।

वे लोग जो जीवन में अत्यंत दु:खी रहे हैं, जिन्हें प्रताड़ित और दबा दिया गया है, जिन्हें बहुत दुखी किया जा रहा है और उनके दिल में द्वेष की आग जल रही है, जब वे मरते हैं तब भी उनमें प्रतिशोध की भावना होती है और वे अन्य सभी को एक दुखी व्यक्तित्व बनाना चाहते हैं। . वे चारों ओर खुशी नहीं देख सकते। ऐसे लोग, मरने के बाद भी इस क्षेत्र में अटके रहते हैं, जो सामूहिक अवचेतन में नहीं गया है। सामूहिक अवचेतन में एक सामान्य व्यक्ति जाता है जिसने अभी-अभी मृत्यु को एक परिवर्तन के रूप में स्वीकार किया है। दरअसल, जब हम मरते हैं तो वास्तव में मरते नहीं हैं। हम में से केवल एक हिस्सा, पृथ्वी तत्व नीचे गिरता है, और थोड़ा जल तत्व का भी हिस्सा। लेकिन बाकी तत्व जो इस शरीर का निर्माण करते हैं, विभिन्न कोष और कुंडलिनी जो बाहर निकल जाती है और आत्मा जो उत्थान पाती है, जिसे आप कह सकते हैं, वह सब जो एक साथ जीवात्मा के रूप में आती है, वह सब सामूहिक अवचेतन में जाता है और छोटा और छोटा होने लगता है , उस सामूहिक अवचेतन के क्षेत्र में, जहां इसे छोटा और छोटा होने के लिए रखा जाना है।

लेकिन जो लोग मरते हैं, जैसा कि मैंने तुमसे कहा था, महान इच्छाओं और वासना के महान पीड़ितों के रूप में, बहुत ही भ्रष्ट और बदनाम लोग, जो शराब और ड्रग्स और सेक्स में लिप्त हैं, जो अपने जीवन को दुखी करते हैं, जो खुद के लिए हिंसक हैं अन्य लोगों पर नहीं, जो आक्रामक नहीं हैं, लेकिन आक्रान्त (पीड़ित)हैं, जो आत्महत्या करते हैं, वे नियत स्थान पर नहीं जाते हैं, वे इधर-उधर चिपके रहते हैं और उनमें से कुछ वास्तव में व्यस्त हैं। वे अन्य आत्माओं को यातना देने की कोशिश करते हैं। इस संसार में आपको जितने भी मानसिक मामले मिलते हैं, वे ऐसे अस्तित्वों के जुनून या कब्जे से पीड़ित होते हैं। हम उन्हें भूत और पिशाच कहते हैं। आप शायद इस पर विश्वास न करें क्योंकि लोग भूतों पर विश्वास नहीं करते हैं। आप मानें या न मानें लेकिन वे मौजूद हैं। ये लोग महत्वाकांक्षी नहीं होते बल्कि धूर्त होते हैं, रहस्यमय होते हैं लेकिन डरते हैं। इसलिए वे इस प्रकार के लोगों का पता लगाने की कोशिश करते हैं, वे ऐसे लोगों के मानस में प्रवेश करते हैं और उन्हें और भी बदतर बना देते हैं। वे उनके जीवन को दयनीय बना देते हैं और ऐसे व्यक्ति को बिल्कुल असामान्य बना देते हैं।

जब मनोविज्ञान ऐसे असामान्य लोगों का इलाज करना शुरू करता है तो शायद वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। मनोवैज्ञानिक, जब वे ऐसे असामान्य लोगों के संपर्क में आते हैं, तो वे स्वयं प्रभावित या दूषित हो जाते हैं। वे इन भ्रष्ट और बदनाम, वासना से भरे, कामुक लोगों से ग्रसित हो जाते हैं, और वे स्वयं इतने असामान्य हो जाते हैं। चूँकि उनका शायद ही कभी सामान्य लोगों के साथ कोई संबंध होता है इसलिए वे बिल्कुल असामान्य सिद्धांत प्रस्तुत करने लगते हैं। एक असामान्य व्यक्तित्व को व्यक्तित्व की सामान्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और ऐसा सभी की स्वीकृती पाने  के लिए बनाया जाता है। तो वे इस सिद्धांत से शुरू करते हैं कि आपको अपनी इच्छाओं को दबाना नहीं चाहिए, जहां तक ​​इन इच्छाओं का संबंध है, आपको बहुत उदात्त और पूरी तरह से मुक्त होना चाहिए। ठीक है, आगे बढ़ो। लेकिन वे मनुष्य के दूसरे पक्ष से अवगत नहीं हैं कि ऐसा करने वाले दूसरे जाल में फंस सकते हैं और अहंकारी हो सकते हैं। यह उनके अहंकार की यात्रा के रूप में शुरू होता है, फिर वे इतने अहंकारी हो जाते हैं कि वे भूल जाते हैं कि संत क्या है, ईश्वर क्या है, पवित्रता क्या है। पश्चिमी देशों में यही हुआ है।

शायद युद्ध, युद्ध में इस प्रकार इतने लोग जो मारे गए थे, उन्होंने उन लोगों को ग्रसित कर लिया होगा। और ऐसे रोगी इन मनोवैज्ञानिकों के पास गए होंगे और तब ये मनोवैज्ञानिक इन अनूठे विचारों के साथ सामने आए होंगे कि, यदि आप उन्हें धर्म के बारे में बताते हैं तो ये लोग जड़ मानसिकता के बन जायेंगे। बेशक, मानस संस्कारित हो जाएगा। यदि आप हर समय बच्चे से कहते हैं, “ऐसा मत करो, वह मत करो”, तो बच्चा संस्कारित हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। यदि आप किसी व्यक्ति को बहुत अधिक अनुशासित करते हैं, तो वह आदी हो सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन यदि आप स्वयं एक आदर्श हैं, यदि पिता और माता दोनों ही सद्गुणों के आदर्श हैं, तो बच्चा बिना किसी जड़ता के इसे स्वीकार कर लेता है। यह उत्थान का मध्य मार्ग है।

इसलिए मैं कहती हूं कि परिवार हर राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। विवाह संस्था की पवित्रता, सम्मान और महानता को बनाए रखने के लिए सभी प्रयास किए जाने चाहिए। इसलिए सभी अवतार विवाहित लोग रहे हैं। और यहां तक ​​कि गुरु लोग जैसे की गुरु नानक वगैरह भी विवाह हो चुका है और वे एक सामान्य विवाहित जीवन जिए हैं। तुम पश्चिम में जाते हो और तुम उस मूर्खता और बेवकूफी पर चकित होते हो जिसे वे अपना रहे हैं। आप विश्वास नहीं कर सकते कि वे कितने मूर्ख हो गए हैं। इस संबंध में हमें उनसे कुछ सीखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अपने परिवारों को तोड़ दिया है; उन्होंने अपनी पत्नियों को तलाक दे दिया है। ठीक है, अब महिलाओं ने अपने पतियों को तलाक दे दिया है। दस पुरुषों ने दस महिलाओं को तलाक दिया, हर समय एक दूसरे से शादी करना, एक अंधकार -अंतहीनता में समाप्त होना और बच्चों ने ड्रग्स अपना लिया है। कितना अच्छा समाज है।

पति घर आता है पत्नी गायब हो गई है, तलाक लेते हुए कह रही है, “मैं अपने पति को पसंद नहीं करती थी, कोई अनुकूलता नहीं थी।” और मनोवैज्ञानिक,  बहुत अच्छी तरह से उन्हें अराजकता के समाज का निर्माण करने में मदद कर रहे हैं और धर्म को कूड़े में फैंक दिया गया है क्योंकि उन्हें लगता है कि यह लोगों को जड़ बनाता है। बनाएगा अगर यह एक झूठा धर्म है, अगर यह एक दमन है तो ऐसा होगा। उदाहरण के लिए ईसाईयत ने कभी ऐसी बातों का प्रचार नहीं किया जिनका ये लोग अनुसरण कर रहे हैं। क्राइस्ट ने कभी भी संन्यास के बारे में किसी प्रकार की बात नहीं की। वे स्वयं एक कुंवारी माँ से उत्पन्न व्यक्ति थे। वह एक अवतार थे। लेकिन उनकी मां की शादी हुई थी और वे स्वयं शादियों में शामिल हुए थे। लेकिन रोमन कैथोलिकों ने एक दमित प्रकार की संस्था शुरू की जहां उन्होंने पूर्ण ब्रह्मचर्य का प्रचार किया।

मार्टिन लूथर दृश्य में आए, उन्होंने कहा, “नहीं, यह गलत है, यह स्वतःस्फूर्त होना चाहिए।” वह सही था। उस समय वह सही था लेकिन वह गलत हो गया कि उसने मसीह की माँ को नहीं पहचाना। वह सबसे बड़ी भूल थी, क्योंकि ब्रह्मचर्य का बोध कहां से मिलता है, पवित्रता का भाव कहां से मिलता है, किस संबंध में – माता और पुत्र में। इस तरह उस देश में ईसाई धर्म गर्त में चला गया है। जैसा कि मैंने आपको कल बताया था, वे ईसा मसीह के यौन संबंध की तस्वीर बना रहे हैं। क्या आप ऐसी तस्वीर की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप इस देश में बर्दाश्त कर सकते हैं?

तो हमारे पास ऐसे लोग हैं जो हमें सिखा रहे हैं जो वास्तव में खुद ग्रसित हैं। अधिकांश मनोवैज्ञानिक ग्रसित हैं और वे केवल असामान्य लोगों के साथ व्यवहार करते हैं और उन्ही विचारों को वे सामान्य लोगों के लिए सामान्य स्वीकृत नहीं करवा सकते हैं। लेकिन ऐसा करके उन्होंने असामान्य व्यक्तित्व का निर्माण किया है और आप उस देश में हर तरह की बेतुकी बातें पा सकते हैं। कि एक नब्बे साल की महिला का उन्नीस साल के लड़के से प्रेम प्रसंग चल रहा है। क्या आप इस देश में ऐसा सोच सकते हैं? वहां एक आम बात है। कल्पना कीजिये,  इंग्लैंड एक ऐसी पारंपरिक जगह है और इंग्लैंड में एक कानून है कि एक पिता के बेटी के साथ खराब संबंध नहीं हो सकते हैं और मां के बेटे के साथ नहीं हो सकता है। एक ‘कानून’, हमें उस तरह के कानून की जरूरत ही नहीं है। मेरा मतलब है कि हमारे पास ऐसा कानून ही नहीं हो सकता कि आप गंदगी नहीं खा सकते। आप ऐसा कानून नहीं बनाते। मेरा मतलब है, मनुष्य यह जानते ही हैं। लेकिन उनके पास एक कानून है।

अब, परेशानी यह है कि वे मांग कर रहे हैं, कल्पना कीजिए, मनोवैज्ञानिकों के लिए धन्यवाद, वे मांग कर रहे हैं कि इस कानून को हटा दिया जाना चाहिए ताकि उन्हें इस संबंध में जो पसंद है उसे करने के लिए स्वतंत्र किया जाए। आप इसे क्या कहते हैं? आप विश्वास नहीं कर सकते लेकिन ऐसा है। यहां एक मंत्री थे, श्री विद्या राव, वे अमेरिका गए और उन्होंने मुझे एक भयानक अनुभव दिया जब मैं अमेरिका जा रही थी। उसने कहा, “वहाँ मत जाओ; वे आपको कभी नहीं समझेंगे, माँ। कृपया मत जाओ।” मैंने कहा, “क्या हुआ?” उन्होंने कहा, ‘मैं अपनी बेटी को देखने वहां गया था। वह दूर थी, मुख्य शहर से दूर रह रही थी, इसलिए मैंने कहा, ‘मैं यहाँ उसके साथ रहूँगा।’ तो मकान मालकिन ने कहा, ‘नहीं, तुम अपने पिता के साथ ऐसे नहीं रह  सकती।’ उसने कहा, ‘क्या’ ?’ ‘नहीं, नहीं, वह नहीं रह सकते। कोई दूसरा आदमी रह सकता है लेकिन तुम्हारे पिता नहीं।’ उसने कहा, ‘तुम उसके साथ नहीं सो सकती।’ उसने उसे एक बड़ा थप्पड़ मारा। लेकिन इस आदमी ने ऐसी गंदी बात कही। जहां वे ऐसा करने के बारे में सोचते भी हैं।” वह अभी इन बातों को नहीं समझ सकता। उन्होंने यह भी कभी नहीं समझा, इन मनोवैज्ञानिकों के लिए धन्यवाद जिन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया …

भगवान का शुक्र है कि हम उनके उस मनोविज्ञान को पढ़ने लायक अंग्रेजी भी नहीं जानते। जिस तरह से वे अपने उपदेशों से इन निर्दोष लोगों को बर्बाद कर रहे हैं! वे अब तक ज्ञात सभी भयानक प्रचारकों से भी बदतर हैं। इस कुंडलिनी के बाए बाजु के बारे में बहुत कम ज्ञान के साथ, उन्होंने इतने महान स्थान, ऐसे महान लोगों को बर्बाद कर दिया है। उस अमेरिका और इंग्लैंड में कितने संत पैदा होते हैं। ओह, मैं यह सब देखकर रोती हूं। इन लोगों द्वारा वे सब बर्बाद कर दिए गए हैं, उन्हें ये कहानियां सुनाकर जिन्हें वे स्वतंत्रता कहते हैं और उनके विचारों को अनुशासित करना जड़ता कहलाया था। लेकिन एक आदर्श के माध्यम से अनुशासित करना वे समझ नहीं पाए।

अब, मैं आपको बताऊंगी कि कैसे हमारे देश में भी लोगों ने ऐसे अस्तित्वों का इस्तेमाल किया है। इस देश में हमारे पास सबसे महान संत और सबसे महान अवतार थे, इसमें कोई संदेह नहीं है, मैं सहमत हूं, लेकिन हमारे पास सबसे बड़े ठग भी हैं, दो अति। दूसरी तरफ भी हमारे पास अग्र-चेतन लोग मर जाते हैं। मैं उन्हें एक साथ रखूंगी और आपको उनके द्वारा किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यों के बारे में बताऊंगी। जो लोग हमेशा महान योजनाकार और महान प्रकार की सोच रखते रहे हैं कि, “मैं जो यह करने जा रहा हूं, मैं जो वह करने जा रहा हूं” और वे अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं और वे पूरी तरह अपनी इच्छाओं के साथ पहचाने जाते हैं और बहुत अहंकारी वे महिलाओं के बारे में भी सत्ता के नशे में हैं। वे चाहते हैं कि उनके आसपास कई महिलाएं हों; महिलाएं चाहती हैं कि उनके आसपास कई पुरुष हों। आप सभी प्रकार की चीजें देखते हैं, ये सभी जटिल प्रकार। इस तरह के लोग, वे एक पत्नी या एक पति से संतुष्ट नहीं हैं , सभी असामान्य हैं। और वे भी जो सोचते हैं कि, आप देखिये नेपोलियन की तरह ऐसे अहंकारी लोग  हैं, जो खुद का कोई अंत नहीं सोचते और हिटलर की तरह अपनी झूठी महत्वाकांक्षाओं के साथ खुद को पहचानने की कोशिश करते हैं।

जब वे मर जाते हैं, वे दूसरी ओर जाते हैं, दायीं ओर, अग्र-चेतन । वे बहुत गतिशील लोग हैं और वे बहुत आक्रामक लोग हैं। वे आप को भी ग्रसित कर सकते हैं। और तुम नहीं जान पाते कि तुम कैसे उनके द्वारा वशीभुत हो जाते हो। तो, दो प्रकार के लोग होते हैं: एक भ्रष्ट और दूसरा, आक्रामक। तो ठग, जो हमेशा सीखने के अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ऐसे अस्तित्वों का उपयोग अपने उद्देश्य के लिए करते हैं। आप चाहते हैं कि मैं बता दूं कि वे इसे कैसे करते हैं, यह बहुत अधिक होगा। उनके पास एक रास्ता है, वे भूत विद्या के नाम से जाने जाने वाले श्मशान [कब्रिस्तान] में काम करते हैं, श्मशान विद्या, प्रेत विद्या, मैं सब कुछ जानती हूं, लेकिन आपको जानने की जरूरत नहीं है। वे उन संस्थाओं पर कब्जा कर लेते हैं और उनके शरीर के कुछ अवयवों, विशेष रूप से खोपड़ी वगैरह को कब्ज़ा करके उन्हें नियंत्रित करते हैं।

हमारे पास एक आनंद मार्गी थी जिसे आप जानते हैं और भी आगे आने वाले हैं। आप उन्हें एक के बाद एक देखेंगे, वे धीरे-धीरे सामने आ जाएंगे।

तो ये लोग संस्थाओं को अपनी शक्ति में पकड़ लेते हैं, कुछ अग्र-चेतन और कुछ अवचेतन, और वे इसके माध्यम से लोगों को कब्जाने की कोशिश करते हैं। हमारे पास रावण है, कहते हैं। रावण में सम्मोहित करने की क्षमता थी। सारा सम्मोहन, वह सब जिसे आप इस ईएसपी कहते हैं, ये सभी अतिरिक्त चीजें इन संस्थाओं द्वारा की जाती हैं जो भूत हो सकते हैं, भ्रष्ट हो सकते हैं, बहुत बुरे हो सकते हैं।

लंदन में एक संस्था है जिसे स्व. डॉक्टर लैंग्स इंटरनेशनल क्यूरेटिव सेंटर के नाम से जाना जाता है। ‘स्व.’,अर्थात वह मर चुका है। तो क्यूरेटिव सेंटर काम कर रहा है। यह डॉ लैंग, जब उनकी मृत्यु हुई, तो उन्होंने कुछ ऐसा खोजा था जिसे वे चाहते थे कि वे तुरंत लागू करें। मेरा मतलब है, यह उनके पैम्फलेट में लिखा है, कल्पना कीजिए। यह एकदम खुलेआम है; वे किसी तरह की  ‘ठगी’ नहीं बना रहे हैं। वे इसे ‘ईश्वरीय’ वगैरह नहीं कहते हैं, भगवान का शुक्र है। दूसरे लोग इसे ‘ईश्वर’ कहते हैं, लेकिन वे खुलेआम कहते हैं, “नहीं, यह नहीं है, यह एक आत्मा है।”

तो डॉ लैंग की आत्मा वियतनाम में लड़ रहे एक सैनिक के शरीर में प्रवेश कर गई। यह वे अपने पैम्फलेट पर पहले ही लिख चुके हैं, यह मेरा अपना नहीं है। और उस आत्मा ने इस आदमी से कहा कि, “तुम जाओ और मेरे बेटे से कहो कि मैं फलाना हूं और तुम क्लिनिक खोलो, सर्जरी।” तो इस आत्मा वाले व्यक्ति ने जाकर बेटे को बताया और वह चकित रह गया लेकिन उसने उसे ऐसी गुप्त जानकारी दी कि बेटे को इस जानकारी को स्वीकार करना पड़ा और उन्होंने स्वर्गीय डॉ लैंग का क्यूरेटिव इंटरनेशनल सेंटर खोला। तो यह संस्था काम करने लगी।

इस तरह के व्यवहार से मरने वाले कई डॉक्टर भी उस संस्था के माध्यम से काम करने लगे। तो अब वे कहेंगे कि, “यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो आप हमें बताएं, हम आपको समय देंगे; उस समय इसे कार्यान्वित किया जायेगा। ” ठीक उसी तारीख को, उस समय वह आदमी कांपने लगता, “हो, हो, हो, वह भूत है मैं।” उनके शरीर में कुछ प्रवेश कर जाता है और व्यक्ति को अपने कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। लेकिन पांच-छह साल बाद वह आदमी खटारा कार की तरह खड़खड़ाने लगेगा। और अब वह पूरी तरह से बर्बाद हो गया है। मेरे पास तथाकथित डॉ लैंग की भयानक संस्था के कई मरीज आये हैं और उनका इलाज करना बहुत मुश्किल है क्योंकि वे इतनी भयानक भ्रष्ट आत्माएं हैं कि वे इन लोगों के शरीर को छोड़ना नहीं चाहते हैं। आप इन स्पिरिट्स का इस्तेमाल कई ट्रिक्स के लिए कर सकते हैं। यह बहुत ही सामान्य बात है।

हमारे समूह में एक महिला थी जो इस तरह के किसी पुरुष की शिष्या थी, जो अपने चारों तरफ एक सांप वगैरह ले जाती थी। वह मेरे पास आई, मैंने उसे यह बोध दिया बिल्कुल ठीक दिया, लेकिन वह ऐसी ही थी, ठीक नहीं। तो मैंने उससे कहा, “आपको अपने इस भयानक गुरु और  तथाकथित शक्तिशाली लोगों में से एक बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़ना होगा। यदि आप इसे स्वीकार कर लेती हैं, तो ही यह अनुभूति बनी रहेगी, अन्यथा यह मिट जाएगी। वह मेरी बात नहीं मानती थी। अमेरिका जाकर मैंने उससे कहा, “मैडम, सावधान रहना। आपको वे शक्तियाँ प्राप्त होंगी लेकिन आपको उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए।” उसने कहा, “नहीं, मैं कभी स्वीकार नहीं करूंगी, मुझे ये मृत शक्तियां नहीं चाहिए, मुझे यह नहीं चाहिए, मुझे परम चाहिए, मुझे परम चाहिए।” मैंने कहा, “ठीक है, हम देखेंगे।” लेकिन उसके हाथ से कुछ कुमकुम और उसके हाथ से कुछ चावल निकलने लगे जिससे उसे लगा कि यह एक अच्छा विचार है। उसने अब अपना केंद्र शुरू कर दिया है, चीजें दे रही है। वह हर तरह की जादुई चीजें दिखाने लगी। यह जितने वाले घोड़े का नम्बर देकर बर्बाद हुआ| उसके हाथ में एक बड़ी लाठी होती थी; जब वे उसके पास आते तो वह लोगों को पीटती थी। वह एक शैतानी व्यक्तित्व, भयानक चेहरा बन गई। उसका इतना भयानक चेहरा था, मेरा मतलब है, जब मैं वापस आयी तो मैं उसे पहचान नहीं पायी।

जब उन्होंने मुझे बताया, जब उन्होंने मुझसे कहा कि यह महिला ये सब चमत्कार कर रही है तो मैं सबसे ज्यादा शर्मिंदा हुई, मुझे नहीं पता था कि क्या करूँ। और उसने मेरी तस्वीर वहीं लगा रखी थी और मैं बहुत पहले ही उस तस्वीर से गायब हो गयी थी। जब मैं वापस आयी तो तुम्हें पता है, उसने मुझे अपने घर में बुलाया, वह हजारों लोगों को ले आई। ऐसे लोगों के अनुयायी हजारों हैं, स्वाभाविक रूप से चूँकि आप घोड़ों का नम्बर बता सकते हैं, आप देखिए। यहां मेरे पास कम है लेकिन उस महिला के पास हजारों थे। और उसने मेरे पांव धोए और वह सब किया। मैं इतनी शर्मिंदा थी; मैं उसके घर में उन सभी संस्थाओं को बहुत अच्छी तरह से घूमते हुए देख सकती थी, मेरी खिल्ली उड़ाते हुए कि कैसे उन्होंने उस महिला को पकड़ रखा है।

सो जब वह मेरे पास आई, तब मैं ने उस से कहा, कि ये तुम्हारी शक्तियां  नहीं हैं। और उसे अपने जीवन का झटका लगा। मैंने कहा, “अब मेरे सामने तुम वही कहो जो तुम जानती हो, मेरी उपस्थिति में।” तो वह दूसरे व्यक्ति से कहने लगी, “आपके पास ऐसा घर है, आपके पास ऐसा है।” उन्होंने कहा, “नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, यह सब गलत है।” तो उसने वहां बैठे किसी और को बताया कि, “आपके कार्यालय में इस नाम का एक आदमी है।” उन्होंने कहा, “ऐसा कुछ नहीं है, यह सब गलत है।” तो वह मेरे चरणों में गिर पड़ी, बोली, “माँ, क्या तुमने मेरी सारी शक्तियाँ छीन ली हैं?” मैंने उससे कहा, “ओह, मेरे बच्चे, ये कभी भी तुम्हारी अपनी शक्तियाँ नहीं थीं। मैंने तुम्हे अपने सर आँखों पर लिया होता, मैंने तुम्हे प्यार किया होता, तुम्हे चूमा होता, लेकिन ये तुम्हारी अपनी शक्तियों नहीं किसी और की शक्तियों हैं और वे इस तरह गायब हो गई हैं काम नहीं कर रही हैं। “

उसकी हालत और भी ख़राब हो गई और उसने कहा, “माँ, कृपया इनसे छुटकारा दिला दीजिये ।” लेकिन फिर, जब वह घर वापस गई, तो उसके सभी हजारों शिष्य इन सब बातों को जानने के लिए वहां इंतजार कर रहे थे, अब कैसा प्रलोभन है। वह वैसे ही चलती रही और अब वह पागलखाने में है। और उसके सब चेले उस ठाणे पागलखाने को भरेंगे जो मैं देख रही हूं। ठाणे  अस्पताल की हालत बहुत खराब है। उनमें से कुछ जो उससे प्रभावित थे, मेरे पास आए, मुझे नहीं पता था कि उनके साथ क्या करना है। मेरे लिए ऐसा सिरदर्द। आप उन पर कई तरह से काम कर सकते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि ऐसे कई तरीके हैं जिनसे आप इन संस्थाओं का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन एक सामान्य व्यक्ति के लिए जो वहाँ बैठा है, अचानक मेरे हाथ में एक साँप रेंग आता है, “ओह, माताजी यहाँ सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हैं।” मैंने अपनी आँखों से देखा है।

मैं कहीं बाहर एक राजदूत से मिली, उसने गले में एक निकल की चीज पहनी हुई थी और वह उस आदमी की प्रशंसा गा रहा था जिसने उन्हें यह चीज़ दी थी। 

मैंने कहा, “निकल में क्या रखा है? कम से कम आपके पास हीरा तो होना चाहिए था। आखिर आप एक राजदूत हैं।” उसे थोड़ा बुरा लगा, तुम्हें पता है। मैंने कहा, “तुम देश के विशिष्ट व्यक्ति हो, मूर्ख की तरह तुम इन निकल की चीजों के पीछे भाग रहे हो? क्या तुम ये चीज़ें माँगने गए थे?” 

उन्होंने कहा, “नहीं, मैं तो उच्चतम पाने के लिए गया था।”

 फिर मैंने कहा, “तो फिर तुम उसके मुँह पर क्यों नहीं फेंक देते?” 

एक और है जो मेरे पास आया है। उनके पास हीरे की अंगूठी थी। अमीर आदमी, बहुत, बहुत अमीर और मैंने कहा, “तुम्हारे पास कितने हीरे के छल्ले हैं? वे केवल अमीर को देते हैं; “हुह।” “अन्यथा वे हमारी आर्थिक समस्याओं का समाधान क्यों नहीं करते? आसान बात है हीरा लाओ, समस्याओं का समाधान करो।”

अब वैज्ञानिक, अगर वे जानना चाहते हैं कि मैं उन्हें कैसे बता सकती हूं कि भूत होते हैं, तो वे मुझ पर विश्वास नहीं करने वाले। इसलिए बाहर लाते हैं। यह सज्जन मेरे पास हीरे की अंगूठी लेकर आए, “ओह यह हीरे की अंगूठी है जो मुझे मिली है”। मैंने कहा, “बहुत अच्छा, अब तुम मुझसे क्या चाहते हो? मेरे पास हीरे नहीं हैं।” उन्होंने कहा, “नहीं माँ, मैं आपसे केवल सर्वोच्च मांगता हूँ।” “लेकिन तुमने अंगूठी क्यों ली? आप बाजार में अंगूठी खरीद सकते हैं। आपके पास कितनी हैं?”

 वह कहता है, “मेरे पास बहुत हैं।”

 “क्या आप बाजार में भगवान को खरीद सकते हैं?”

वह तस्कर है, वह सब कुछ है और गुरुजी को कोई आपत्ति नहीं है, गुरुजी स्वयं व्हिस्की पीते हैं। और सज्जन, वह गुरुजी के बहुत बड़े उपासक हैं, वे व्हिस्की भी पीते हैं। गुरूजी को कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक वह उन्हें दो या तीन बोतल विदेशी व्हिस्की देते हैं। और फिर वह माताजी के पास आता है। तो माताजी पूछती हैं, “सर, अब मेरे पास क्यों ? मैं आप के लिए क्या कर सकती हूँ ?” 

उन्होंने कहा, “माताजी मुझे एक समस्या है।”

 मैंने कहा, “क्या दिक्कत है?”

 “मैं बहुत सारे हीरे खो रहा हूँ।”

 “ओह। और आपकी पत्नी के बारे में?”

 “ओह, वह पूरी तरह से उसके लिए समर्पित है, और वह जाती है और महीनों तक उनके साथ रहती है। उसे पति की, बच्चों की, किसी बात की परवाह नहीं है। ओह, उसने खुद को गुरुजी को समर्पित कर दिया है!”

तो, पत्नी को मेरे पास लाया गया। महिला पूरी तरह से उनके कब्जे में है। “हे भगवान,” मैंने सोचा, “अब मुझे इस महिला के साथ क्या करना है? मैं उससे क्या सवाल करूँ?” फिर मैंने उसका भूत निकाला, बहुत कुछ किया-बाहर निकाला। वह एक महिला डॉक्टर है। मैंने उससे पूछा, “यदि आप एक महिला डॉक्टर हैं, तो आप कर क्या रही हैं?”

 उसने कहा, “मुझे नहीं पता। मेरे अंदर कोई मुझसे कहता है कि ये सब पत्थर हैं, गुरुजी को दे दो।” “ये तुम्हारे लिए पत्थर हैं!” 

मैंने कहा, “पागल औरत, अगर ये चीजें तुम्हारे लिए पत्थर हैं, एक विवाहित महिला के लिए हीरे पत्थर हैं, तो वे तुम्हारे उस गुरुजी के लिए तो ये धूल होनी चाहिए जो दावा करता है कि वह एक संन्यासी है! तुम उसे ये पत्थर क्यों दे रही हो? और क्या तुमने अपने पति को बताया?” 

उसने कहा, “नहीं, मैंने उसे कभी नहीं बताया। वह पुलिस को इसकी सूचना देने ही वाला था और गुरुजी मुश्किल में पड़ जाते।”

लेकिन इन सबके बावजूद और पति को तीन बार दिल का दौरा पड़ने के बावजूद, वे फिर से पति के इलाज के लिए मेरे पास आए। हीरे गायब हो रहे हैं लेकिन पत्नी इन सज्जन से बिल्कुल भी छुटकारा नहीं पा सकती है। वे इतने कब्जे में हैं – बहुत कठिन। और उनमें से हजारों ऐसे आदमी के पीछे भागेंगे क्योंकि सम्मोहित करना बहुत आसान है। यहां तक ​​कि वे आपकी तरफ देख कर भी आपको सम्मोहित कर सकते हैं। सम्मोहन एक साधारण सामूहिक सम्मोहन है जिसमें उन्हें महारत हासिल है, जिसका उपयोग वे लोगों पर कर रहे हैं और इस तरह से काम कर रहे हैं और लोग उनके पीछे दौड़ रहे हैं। और जब भी तुम उनमें से किसी से पूछोगे तो वे कहेंगे, “नहीं, हमने हीरे नहीं मांगे।” आप उससे प्रभावित क्यों हैं? क्या उसने किसी को आत्मसाक्षात्कार  दिया? किसी के पास चैतन्य है?

क्या वह कुंडलिनी की बात करता है; क्या वह parasympathetic nervous system परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र  के बारे में कुछ जानता है? नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं। वह सिर्फ इतना कहता है कि, “मैं भगवान हूँ”, बहुत अच्छा काफी है। और हम सभी को इसे स्वीकार करना चाहिए, कोई भी यह कह रहा है कि, “मैं भगवान हूँ”? कुछ प्रमाण होने चाहिए। यह एक शैली है। ऐसे कई हैं।

हैरानी की बात यह है कि क्राइस्ट एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने… बेशक नानक ने लिखा है, मुझे कहना होगा कि नानक ने उनके खिलाफ इतना कुछ लिखा है, भगवान का शुक्र है। मुझे उम्मीद है कि सिख लोग ऐसे लोगों के पीछे नहीं भाग रहे हैं, मुझे उम्मीद है। लेकिन कबीर ने लिखा है तुकाराम ने लिखा है। कबीर ने इन लोगों को धमकाया और यह-वह, पूरी तरह से कोड़े मारे हैं। लेकिन कबीर को कौन पढ़ता है? इन पिशाचों, इन राक्षसों को इस देश के कई कवियों ने बुरी तरह धोया है। उन्होंने कहा है कि ऐसे लोगों के पास न जाएं जो आपका चित्त सूक्ष्म से स्थूल चीजों की ओर मोड़ते हैं। लेकिन उन्हें कोई नहीं पढ़ता। इसलिए वे दुसरे ही तरह के लोगों के पास जाते हैं।

अब ईसा-मसीह एक ऐसा अवतार था जिसने स्पष्ट रूप से कहा है कि तुम्हारा भूतों से, मरे हुओं से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सभी ईसाई राष्ट्र ‘धार्मिक रूप से’ प्रेतात्माओं के उपासक हैं – धार्मिक रूप से। लंदन में आप चार कदम चलते हैं और वहां आपको एक अध्यात्मवादी बैठा मिलता है। मैं आपको झूठ नहीं कह रही हूं, हमारे साथ कुछ अंग्रेज हैं – वे आपको बताएंगे। आप उनसे पूछ सकते हैं, सभी प्रकार के अध्यात्मवादियों के बारे में । ईसाइयों में भी पेंटेकोस्टल हैं जो ग्रसित हो जाते हैं, और वे कहते हैं कि पवित्र आत्मा उन पर उतरी है।

तांत्रिकों ने भारत में लगभग छठी शताब्दी में इसकी शुरुआत की थी। यह ऐसी मूर्खतापूर्ण बकवास पर पहुँच गयी है कि बंबई में महालक्ष्मी के मंदिरों में इस तरह की बकवास चल रही है। और जब मैंने ट्रस्टियों से कहा कि, “आप यह सब बंद कर दें अन्यथा मैं आपके मंदिर में संबोधित करने नहीं आऊंगी”, वे नहीं माने। उन्होंने कहा, “हम कैसे कर सकते हैं? इस तरह हम भीड़ इकट्ठा करते हैं। लोग, ये मानसिक विकलांग औरतें, ये कामकाजी महिलाएं, वे भुत ग्रसित हो जाती हैं, वे “हो, हो, हो, हो” करने लगती हैं, लोग आते हैं और उनसे कुछ सवाल पूछते हैं। सोचे कि, महालक्ष्मी को कुछ होश है या नहीं, क्या वह इन मानसिक विकलांग महिलाओं के अंदर आने वाली है जो वहां हर तरह की चीजें कर रही हैं? उनमें से कुछ वेश्याएं हैं। क्या वह इन लोगों के शरीर में प्रवेश करने जा रही है ताकि आपको यह प्रश्नों के उत्तर दे कि, “आपके पिता को कल क्या मिलने वाला है?” क्या ईश्वर का आशीर्वाद यही है? अपने दिमाग का प्रयोग करें। ईश्वर को ऐसी बेकार, बेकार, क्षणिक रूप से विद्यमान चीजों में क्यों दिलचस्पी होगी ? आप इसे ईश्वर से कैसे जोड़ सकते हैं? आप किस बुद्धि से इसे जोड़ते हैं, यह मैं नहीं समझ सकती। और बहुत महान वैज्ञानिक, आप देख रहे हैं, खोज और खोजबीन करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका ऐसा रवैया है।

तो, हमारे पास भिन्न-भिन्न प्रकार हैं। लंदन में, मैंने आपको बताया है कि,  हमारे पास कई प्रकार हैं। साइंटोलॉजी, एक और चीज जो उन्होंने अमेरिका में शुरू की। परमेश्वर! लेकिन इसका निहित मकसद क्या है? एक है सत्ता , एक पैसा है। यह सब पैसे कमाने के तरीके है। जब मैं कहती हूं कि आप अपने उद्धार के लिए कुछ भी भुगतान नहीं कर सकते हैं, तो लोगों को उनके जीवन का बड़ा झटका लगता है। वे एक माँ के प्यार को नहीं समझ सकते हैं; वे नहीं समझ सकते, कि एक माँ इस तरह काम कर सकती है, सुबह से शाम तक, बस हमें मोक्ष देने के लिए। वे ऐसे व्यक्तित्व के बारे में सोच भी नहीं सकते, असंभव, कि वह कुछ भी नहीं मांगती। उनके लिए विश्वास करना असंभव है।

अमेरिका में,  मैं वहां गयी थी, लोगों ने कहा कि, “ऐसा और ऐसा व्यक्ति एक भूत को लोगों में प्रविष्ट करने के लिए 275 डॉलर चार्ज कर रहा है। आप का क्या शुल्क? जब आप लोगों को वास्तविकता दे रहे हैं तो आप शुल्क क्यों नहीं लेती?” मैंने कहा “तुम मुझे कितना दे सकते हो? आपके पास कितना  है? मूल्य क्या है? तुमने मुझे तराज़ू के पलड़े में रख दिया, क्या तुम अपनी माँ को बेच सकते हो?” मैंने कहा, “आपने मुझसे एक बार पूछा है, मेरा अपमान करने के लिए ऐसा सवाल कभी मत करो। ठीक है, आपको एक जगह बनानी है। मान लीजिए कि हमें मिलने के लिए जगह चाहिए, ठीक है, आपको इस पंडाल के लिए भुगतान करना होगा। ठीक है पैसे इकट्ठा करो, एक पंडाल बनाओ। लेकिन पैसे से आपको बोध नहीं हो सकता।”

हमें एक छोटी सी बात समझनी होगी, कि मान लीजिए कि मैं कहती हूं, “ठीक है मेरे बेटे, बिना पैसे दिए मेरे घर में रहो, कुछ भी नहीं, तुम सिर्फ एक पर जीवी की तरह रहो”, क्या आप स्वीकार करेंगे? आप में से कोई भी, क्या आप स्वीकार करेंगे? और ये परजीवी आपके पैसे पर, दूसरे लोगों के पैसे पर जी रहे हैं। उनके पास जो भी कपड़ा है, जो कुछ वे खाते हैं, हर घर जो उनका है, हर मर्सिडीज जिसकी वे सवारी करते हैं, दूसरों का है। जो समाज ऐसे परजीवियों को अनुमति देगा उन्हें ही ऐसे परजीवी मिलेंगे। यह वही है जिसके हम हकदार हैं।

हमें ईश्वर के लिए भुगतान क्यों करना चाहिए? मैं समझ नहीं सकी। पहले से ही हमारे पास ऐसे कई पंडित और ये ठग पंडितों के रूप में बैठे हैं। और फिर ठगों के आर्कबिशप भगवान और देवताओं के रूप में आए हैं, जो मूर्ख बनाने के सभी विशेष ज्ञान में निपुण हैं, और हम साधारण गृहस्थ, और ये परजीवी जो खुद को साधु और संन्यासी कहते हैं, हमारी कमाई पर रहते हैं, हम क्यों उन्हें भुगतान करते हैं? आप इन साधुओं और संन्यासियों को भुगतान क्यों करते हैं?

सीताजी ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि, “कषाय वस्त्र धारी से कोई सम्बन्ध नहीं रखें -इन तथाकथित भगवानों से कोई लेना-देना नहीं है, और कोई साधु दो दिन और एक रात से अधिक गाँव में नहीं रहना चाहिए।” उसने कहा है, “किसी भी महिला को किसी पुरुष को गुरु स्वरुप मान्य नहीं करना चाहिए”, क्योंकि आदि शक्ति, खुद सीता को इस भयानक रावण द्वारा धोखा दिया गया था, जो आज पैदा हुआ है, जो आज एक भगवान है, आप उसे नहीं जानते। आप उन्हें उनकी चाल से, तौर-तरीकों से, जिस तरह से उसने सीताजी को धमकी दी थी कि, “यदि तुमने मेरे प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया तो मैं आपकी भारतीय महिलाओं को नग्न करने जा रहा हूं” और वह ऐसा कर रहा हैं। और हम अपनी खुली आँखों से देख रहे हैं कि अमेरिका में तस्वीरें उड़ाई जाती हैं और बिकती हैं और यह व्यक्ति करोड़पति है। और मुझे नहीं पता कि यहाँ का आयकर विभाग क्या कर रहा है। यह एक तथ्य है।

हम बहुत निष्क्रिय लोग हैं, मुझे इस संबंध में कहना होगा। हम इसका पता क्यों नहीं लगा सकते? क्या यही हमारी संस्कृति है? यह भी किया जा सकता है, अच्छा कैबरे शो मुफ्त में आयोजित किया जाता है और लोग आनंद लेते हैं, आप देखिए। वे बहुत बात करते हैं, क्योंकि आप देखिए, धर्म और परमात्मा के नाम पर तुम वेश्यावृत्ति लाना चाहते हैं? तुम धर्म को मारना चाहते हैं? तुम सबको शैतान बनाना चाहते हो? इन भयानक लोगों का वध करने का कोई फायदा नहीं है, वे कई बार मारे गए हैं और फिर से यहां आ गए हैं। मैं केवल आप से समझदारी और आपके आत्मसम्मान का आव्हान कर सकती हूँ की समझें और जागृत होने का प्रयास करें।

फिर, हम दूसरी तरफ देखते हैं। आप देखते हैं कि कई शैलियाँ हैं जिनके विस्तार में मैं नहीं जा सकती और यह कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नहीं है। इन भयानक लोगों के बारे में बात करने से बेहतर है कि ईश्वर की बात करें। मनुष्य के दूसरी तरफ अतिचेतन है, जिसे वे ‘अति मानसिक’ कहते हैं और ये सभी नाम दिए गए हैं। दायीं तरफ वहां पर अतिरिक्त गतिशील लोग मौजूद हैं। कुछ लोग इनका इस्तेमाल भी करते हैं। उदाहरण के लिए, उन्हें, इन भूतों को – भगवान के कुछ नाम देना अधिक सुविधाजनक होता है । उदाहरण के लिए, वे एक नाम देंगे, मान लीजिए, राम का। हम कहते हैं, “ओह, हमें राम का नाम लेना चाहिए।” वे नाम ले रहे हैं, “राम, राम, राम, राम, राम।” अब हमें समझना चाहिए। राम को पुकारने का हमारा अधिकार क्या है? क्या वह हमारा सेवक है? कि हम चलें, “ए राम, इधर आओ! मेरे पिता के स्वास्थ्य का ध्यान रखना, मुझे खाना देना, ये देना, यह करना।” क्या वह हमारा सेवक है? वह ईश्वर के अवतार ‘श्री राम ‘ हैं। आप उन्हें ऐसे ही बुलाना चाहते हैं? उन्हें “राम, राम, राम” कहने का आपको क्या अधिकार है? चूँकि महान संतों ने “सुमिरन करो” कहा है, इसलिए हम सुमिरन कर रहे हैं। क्या यही सुमिरन  है? क्या आपके पास सुमिरन करने की भावना (हृदय) है?