Sab Chijo me Mahamantra ho

(भारत)

Sab Chijo me Mahamantra ho, India, 16-03-1977

सब चीज़ों में महामन्त्र हो भारत, १६ मार्च १९७७ कल आपसे मैंने बताया था ध्यान के वक्त कि आप इस तरह से हाथ कर के मेरी ओर बैठें और आपके अन्दर चैतन्य धीरे-धीरे बहता हुआ आपकी कुण्डलिनी को जागृत कर देगा। ये सारी प्रक्रिया ऐसी लगती है जैसे कोई बच्चों का खेल है। और आप लोगों ने इन लोगों को देखा भी होगा जो यहाँ पर सहजयोगी लोग थे कि वो अपने हाथ को घूमा-घूमा कर के और आपको कुछ चैतन्य दे रहे थे और कुछ कार्य कर रहे थे। मामूली तौर से ये चीज़ अगर देखी जाये तो एक बच्चों का खेल लगता है। जिस वक्त मोहम्मद साहब ने लोगों को नमाज पढ़ने के लिए बताया था तो लोग उनका मज़ाक करते थे और जिस वक्त अनादिकाल में ही होम-हवन आदि हमारे देश में शुरू किये गये थे तब भी ऐसे लोग थे जो सोचते थे कि ये क्या महामूर्खता है? ये क्यों करें? और जब वो बातें रूढ़ीगत हो जाती हैं तब मनुष्य इसको इस तरह से मान लेता है मानो ऐसे कि ये आपके जीवन का एक अंग है। जैसे नमस्कार करना। हम लोग, हिंदुस्तानी आदमी किसी को देखते ही नमस्कार कर लेते हैं। उसके बारे में ये पूछा नहीं करते कि इस तरह से दो हाथ जोड़ के हमने क्यों नमस्कार किया? और पूजा के समय हम इस तरह से आरती क्यों करते हैं और अपना हाथ इस तरह से क्यों घुमाते हैं? साथ में हम दीप ले कर के क्यों आरती करते हैं? ये प्रश्न हम नहीं पूछते। जैसा भी जो बताता है वैसे-वैसे हम आरती करने लग जाते हैं। क्योंकि ये चीज़ सब रूढ़ीगत हो जाने की वजह से हमारे लिये बहुत ही सरल और सहज हमारे अन्दर, हमारे व्यक्तित्व में बहुत ही आसानी से आ जाती है। लेकिन हर पूजा के, हर प्रकार में, उसके हर एक भाव- भंगी में या हर प्रकार की क्रिया में बहुत बड़ा अर्थ है। बहुत उसका गहन मतलब होता है। हर पूजा में, हर मन्त्र में और हर तरह की प्रेयर में भी एक महामन्त्र होता है। जैसे कि ईसामसीह की जो प्रार्थना है, जिसे कि हम ‘लॉर्डस् प्रेयर’ कहते हैं, इसमें बड़ा महामन्त्र है। ‘अल्लाह हो अकबर’ में बड़ा महामन्त्र है। ‘सोहम्’ में बड़ा महामन्त्र है। सभी चीज़ों में महामन्त्र है लेकिन उस मन्त्र को कहाँ, किस जगह, कौनसी बात पर, किस इन्सान को इस्तमाल करना चाहिए उसका कोई भी नियम नहीं। क्योंकि धर्म के मामले में संसार में कोई नियम नहीं। हर एक आदमी कुण्डलिनी जगा सकता है। हर एक आदमी चाहे धर्म के बारे में बोल सकता है। जिसको देखो वही ‘गीता’ पर बोल सकता है। जिसको देखो वही कृष्ण बन सकता है। इसमें किसी पे कोई नियम नहीं है। लेकिन एक संगीत में भी जब इतनी शास्त्रीयता है, तो आप सोचिये धर्म ने परमात्मा में कितनी शास्त्रीयता बनायी। लेकिन इस मामले में एक तो आप अधिकारी भी होना चाहिये, तो अधिकार मानने के लिए अपने यहाँ कहते हैं कि आदमी को ब्राह्मण होना चाहिए। ब्राह्मण होने का मतलब है जिसने ब्रह्म को जाना माने जो पार आदमी होता है, जो द्विज होता है, जिसका दूसरी बार जन्म हो जाता है। पक्षी को भी द्विज कहते हैं, जिसका कि दूसरे बार जन्म होता है। अब जिस तरह एक पक्षी का जन्म होता है कि पहले तो वह एक अंडाकृत होता है, एक अंडे जैसा बन जाता है और उसके बाद जब उसका ब्रह्मरन्ध्र फूटता है या कहिये कि जब वो माँ पक्षी जब उसे चोंच से तोड़ती है तब वह फिर से जन्मीत होता है। इसी प्रकार जब मनुष्य का भी द्विज हो जाता है जब वो दूसरे बार पैदा होता है, तभी उसको ब्राह्मण कहा जाता है। लेकिन अपने यहाँ तो आजकल ब्राह्मण का मतलब ये होता है कि आप किसी को भाडे पे ले लीजिए। भाड़े पे आपको ब्राह्मण मिल जाएंगे, भाड़े पे आपको पुजारी मिल जाएंगे । इनको आप ब्राह्मण नहीं कह सकते। निशंक का भी मतलब वही होता है। निशंक का मतलब होता है जो बॅप्टाइज हो जाए, जो बॅप्टाइज हो जाए माने जिसका ब्रह्मरन्ध्र फूट जाए वही क्रिश्चन माना जाता है। लेकिन ऐसे कितने क्रिश्चन हैं? या आप मुसलमानों का मुसलमानियत का अर्थ भी वही होता है। आप कोई भी जाति में, पारसी लोग जो हैं उनका भी यही ।

जोरास्टर को अगर आप पढ़े तो उसमें भी द्विज बनने की ही बात है कि आपको परमात्मा को जानना चाहिए? और आपका फिर से जन्म होना चाहिए। लेकिन जब तक वो नहीं होता है तब तक आपके अन्दर ये शक्ति नहीं आयी या आप वो नहीं हये हैं, आप अधिकारी नहीं है कि आप धर्म के मामले में चलें। आप अपने आप से धर्म के मामले नहीं चल सकते । बहुत से लोगों ने मुझे कल बताया कि, ‘माताजी, हमने किताब पढ़ के और योग साधना की।’ सो बात ठीक नहीं । आप किताब पढ़ कर के साधा एक पंखा नहीं ठीक कर सकते तो आप क्या मनुष्य की जीवंत चीज़ कैसे कर सकते हैं । आपके अन्दर उसका अधिकार होना निन्तात आवश्यक है। अगर आपके अन्दर उसका जागना नहीं हुआ है, तो आप कह नहीं सकते कि, ‘हम दूसरों को जगा सकते हैं ।’ जो खुद ही सुप्तावस्था में है वो दूसरों को क्या जगायेंगे? जो खुद ही अंधे हैं वो दूसरों को क्या लीड करेंगे। इसलिय इसका जो मेकैनिज्म है कहिए या इसकी जो शा्त्रीय पद्धति है उसे समझ लेना चाहिए । अब एक बात है समझ लीजिए कि मुझे ये फॅन चलाना है तो मैंने इनसे कह दिया कि आप स्विच जरा ऑन कर दीजिए मुझे फॅन चलाना है। ये तो बहुत ही सीधी सी चीज़ हो गयी | कोई अगर विलेज से आदमी आयेगा तो वो कहेगा कि, ‘अरे भाई, ये तो एक खेल ही है इनके यहाँ कि वो दबा दिया और पंखा चलने लग गया। ऐसे कैसे हो सकता है!’ लेकिन ये जो छोटीसी चीज़ है जिसको हम खेल कह सकते हैं, इसके पीछे में कोई न कोई बड़ी भारी मेकॅनिज्म, कोई न कोई इंजिनिअरिंग तो जरूर है ही, उसके अलावा इसके पीछे में बड़ी भारी शक्ति है, पूरा पावर हाऊस चल रहा है। उस पावर हाऊस को बनाने में युग लग गये और उसकी तैयारी करने में युग लग गये। उसको पहले कन्सेप्ट में लाने के लिए कि बिजली क्या चीज़ है उसमें युग लग गये। तब कहीं जा कर के छोटासा ये पंखा तैयार हो गया। उसी प्रकार मनुष्य के लिए, मनुष्य को ये सोचना है कि अगर वो इससे भी उँची दशा में पहुँच रहा है तो इसके पीछे में कोई न कोई बड़ी भारी इंजिनिअरिंग है। और वो इंजिनिअरिंग लिविंग है । वो सोचती है, समझती है और आपको प्यार भी करती है। हम ऐसी कोई शक्ति की कल्पना नहीं कर सकते कि जो शक्ति सोचती है, समझती है और प्यार करती है। ये हम प्यार करते हैं। आखिर हम प्यार कहाँ से करते हैं? अगर इस समुद्र में पानी नहीं होगा तो बादलों में कहाँ से आयेगा और बरसात में कैसे आयेगा ! अगर इसका स्रोत नहीं होता तो हम कहाँ से प्यार करते ! इसकी कहीं ना कहीं शक्ति तो होनी ही चाहिए जो प्यार करे। वो जो शक्ति है, वो हमारे अन्दर अत्यंत सूक्ष्म रूप से स्थित है और हमारे अन्दर बसी हुई है। वो किस तरह से बसी हुई है, उसका मेकैनिज़्म क्या है ये मैं आपसे आज बताने वाली हूँ। हांलाकि ये विषय जो है आज तक लोग बड़ा गौप्य-गोपनीय कहते थे। और कहते थे ये सबको बताने का नहीं । ये थोड़े ही लोगों को बताने का होता है । और बहुत ही थोड़े लोगों को लोग पार करते हैं। अभी एक यहाँ पर बहुत बड़े सन्त है, महाराष्ट्र में, वो हमारे बारे में जानते हैं। और उन्होंने कुछ लोगों से बताया कि, ‘माताजी ऐसे-ऐसे हैं और ऐसे अवतार हैं।’ तो उनसे मिलने हमारे शिष्य लोग कुछ गये थे। तो उन्होंने कहा कि, ‘ये तो हम सब माताजी को मानते हैं, लेकिन ये हमारी समझ में नहीं आता कि आप जैसे सर्वसाधारण लोगों को माताजी एक- दो मिनट में क्यों पार कराती हैं? हम लोगों ने तो हजारों वर्ष की तपस्या करी। जब आप मेंढ़क थे तब से हमने तपस्या की, तब कहीं जा कर हमारे अन्दर वाइब्रेशन्स शुरू हुए। और आप लोगों को माताजी ने क्यों दिया। जब मैं उनसे मिली थी, तो मुझ से भी उन्होंने यही प्रश्न पूछा कि, ‘हम लोग तो वहाँ से जंगलो में भाग आयें हैं और आपने इन लोगों को दे दिया और इतना ही नहीं आप इनको संरक्षित रखती हैं। ये सर्वसाधारण समाज में रहें और आनन्द में रहें। तो ऐसी क्या बात है इन लोगों की कि इनको आपने क्यों दे दिया?’ इसका कारण ये है कि आज कलयुग का अन्त समय आ गया। कलयुग खतम हो रहा है अब सत्ययुग की शुरूआत हो चुकी। और सत्ययुग की शुरूआत हो चुकी है तो ऐसे मनुष्यों की जरूरत है जो सत्ययुग को समझें, जाने और उसपे पनपे और उसका आनन्द उठायें । उस नये आयाम शुरू होने का समय आ गया है । इसलिए कार्य हो रहा है। रही बात ये कि जिन्होंने वर्षों की तपस्या की है, क्या पता वही आज यहाँ पर सर्वसाधारण मनुष्य के रूप में बैठे हैं। नल और दमयंती के आख्यान के बाद, एक बार नल को कहीं कल्कि मिल गये थे। तो उन्होंने कली को पकड़ के कहा

कि, ‘तूने बहुत ही मेरे साथ अन्याय किया हुआ है और मैं तुम्हारा कुछ न कुछ बदला लूंगा।’ तो उन्होंने कहा, ‘अच्छा, आप मेरा बदला लेना चाहते हैं तो जरूर लीजिए लेकिन पहले मेरा महात्म्य सुन लीजिए। मैं क्यों संसार में आया, मेरा कली का महात्म्य क्या है?’ उसने कहा कि, ‘जब कलयुग आयेगा, जब मेरी कलुषता बिल्कुल, अतिशय घोर हो जायेगी, संसार में त्राही-त्राही हो जाएगी और जब पृथ्वी रोयेगी, उस वक्त में ऐसा चमत्कार होगा कि जो गिरीकंदरों में बहुत सारे लोग परमात्मा को खोज रहे हैं, वो सर्वसाधारण रूप में संसार में आयेंगे और उनको, उनकी जो खोज है उसका उत्तर मिलेगा। उसकी उपलब्धी होगी।’ ये आप लोगों को दिया हुआ प्रॉमिस है। और इस वजह से जब ये चीज़ घटित होती है, तो इसमें इतनी शंका करने की कोई बात नहीं। क्योंकि ये पहले ही से सब प्लॅन है अगर ये आपका हो रहा है तो ये आपके अधिकार में ही हो रहा है। इसके प्रति आपको कोई भी सशंक होने की बात नहीं है। उल्टे इसमें पूरी तरह से, अपने अधिकार से विराजमान होने की मैं बात कर रही हूँ। कुण्डलिनी के बारे में चाहे कोई कुछ बताने से डरता हो चाहे कुछ हो मैं बिल्कुल नहीं डरती। क्योंकि जो आपकी माँ है उसके बारे में मुझे पूरी तरह से बताने में डरने की कौनसी बात है! मेरी यही समझ में नहीं आता है कि इसमें डरने की कौनसी बात है। और आप भी स्वयं देख लेंगे कि इसमें डरने की कौनसी बात है मेरे तो कुछ भी समझ में नहीं आती है कि मनुष्य का दिमाग खराब है कि उसके माँ के बारे में बताने में उसे इतना उसे गोपनीय क्यों बनाके रखा है? कुण्डलिनी का सूक्ष्म जो हमारे अन्दर स्थान है वो त्रिकोणाकार अस्थि जिसे मैंने दिखाया है वो है । वहाँ पर साढ़ेतीन चक्रों में , साढ़े तीन जिसको कहते हैं कुण्डलों में, जिसको कि अंग्रेजी में कॉईल्स कहते हैं, कुण्डलिनी स्थित होती है। कुण्डलिनी अनेक तारों से बनी | हुई है और वो अनेक तार एक साथ निगडित है। जब कुण्डलिनी उठती है तो सारी की सारी नहीं उठती है। उसके कुछ तार उठते हैं, फिर कुछ तार उठते हैं, फिर कुछ तार उठते हैं। जब इतने तार उसमें से उठाते हैं कि जो अपने ब्रह्मरंध्र को छेद दे उस वक्त ही आपकी, जिसको कहते हैं कि हम पार हो गये, वो स्थिति आ जाती है। हर एक आदमी के पास उसकी कुण्डलिनी है, इसलिए इसको मैं ‘सहज’ कहती हैं, ‘सहज’। ‘सह’ माने आपके साथ, ‘ज’ माने पैदा हुआ। आपके साथ पैदा हुआ। ये अधिकाल योग आपके साथ है और वो आप पाओ । लेकिन ये नहीं कि कोई भी देखो तो, ‘सहज सहज, सब कहत है’ और कबीरदासजी ने कहा वैसे ही। कहे, ‘साहब सहजयोग है, इसमें क्या करते हैं! सर के बल आप खड़े हो जाईये ।’ तो कहते हैं सहजयोग हुआ। अगर जो चीज़ अपने साथ जन्मी हुई चीज़ है वो आपकी अपनी है। उस पर आपका पूर्णतया अधिकार है। वो आपकी पूरी अपनी चीज़ है। और वो अपने आप घटित होती है। आप समझ लीजिए अगर आपका श्वास लेना मुश्किल हो जाए और इतना असहज हो जाए तो आप श्वास भी नहीं ले सकते । और इसलिए जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है कि आपकी उत्क्रान्ति होना, आपका इव्होल्युशन होना, तो उसकी घटना भी अत्यन्त सहज होनी चाहिए। अत्यन्त वो सहज घटना होनी चाहिए। ये बिल्कुल सामने दिखाई देता है। अगर वो सहज ना हो और असहज हो तो कभी ये कार्य घटित हो ही नहीं सकता। पेड़ों के आप देखिए जब फूल से फल होते हैं कितने सहज आपको दिखाई देते हैं। अब ये कुण्डलिनी आपके त्रिकोणाकार अस्थि में स्थित है या नहीं या माताजी यूं ही बोल रही हैं। सो मैं आपको दिखा सकती हैँ। जिस वक्त कुछ लोगों के उपर का नाभि चक्र पकड़ा रहता है, उस वक्त खास कर ये कुण्डलिनी जोरो में उठती है। जब कि कोई मेरे पैर पे आये कुण्डलिनी जब जान जाती है कि कोई अधिकारी हैं सामने तो आप अपनी आँख से देख सकते हैं कि कुण्डलिनी का स्पंदन होता है। क्योंकि मनुष्य को पहले कन्व्हिंस करना पड़ता है। तो कुण्डलिनी खुद ही जोर से मारती है और आप अपनी आँख से देख सकते हैं, कुण्डलिनी उठती है। अगर कोई डॉक्टर हो तो वह स्टैथोस्कोप से सुन सकती है, सुन सकते हैं कि वहाँ पर कुण्डलिनी का आवाज आ रहा है। माने अनहद् जैसे, जैसे हृदय में आता है। तो अपने हृदय में जैसे धक -धक आवाज आती है, उसी तरह की आवाज हमारे रीढ़ के, पीठ के त्रिकोणाकार अस्थि में आवाज़ बड़ी जोरो में आती है। फिर जब आप धीरे-धीरे कुण्डलिनी उठती है तो उसको भी जरा आप स्थिर भाव से देखे तो आपको दिखाई देगा कि ऐसी चीज़ लगेगी कि जैसे कोई चीज़ उपर में चली जा रही है। इतना ही नहीं, लेकिन उस कुण्डलिनी के अलग-अलग जो सेंटर्स हैं यहाँ

बनाये ह्ये उन सेंटर्स पे अगर आप स्टैथोस्कोप रखें तो वहाँ भी आप देख सकते हैं कि आपको जब कुण्डलिनी वहाँ पहुँचती है तो आवाज आती है। लेकिन एक सहजयोगी को तो ऐसे ही पता होता है कि इसकी कुण्डलिनी कहाँ आ गयी है? कहाँ तक पहुँच गयी है? वो दूसरी बात। आप जब पार नहीं हुये हैं तब भी आप इस त्रिकोणाकार अस्थि में बैठी हुई इस कुण्डलिनी को देख सकते हैं। लेकिन तो भी ‘बकरी की तीन टाँग’ अभी कोई डॉक्टर को बताईये तो वो कहेंगे कि, ‘ऐसा नहीं, वैसा हो सकता है। ये तो ब्रीदिंग हो सकता है।’ यहाँ आपने कहीं देखा है कि इतनी सी जगह ब्रीद करते हुये| लेकिन ‘बकरी की तीन टाँग’ । वो अपने कहते हैं कि नहीं साहब, हमारी तो बकरी की तीन ही टाँग। अब ये जब अमेरिका मैं जाऊंगी, इसी साल अमेरिका के डॉक्टरों ने एक कॉन्फरन्स मेरे लिए अरेंज की थी, पर मैंने अव्हॉईड कर दिया। क्योंकि मैं उनसे क्या गणपति की बात कहँगी। मैंने सोचा उनसे मैं क्या धर्म की बात कहँगी। ये तो अपने ही देश के डॉक्टरों को समझना चाहिए कि ये हमारा हेरिटेज है, ये हमारी लोगों को उन लोगों को समझाना होगा। मेरा तो वहाँ सर पहले फुटेगा। जिसको मराठी में कहते हैं वारसा है। इसको क्या हम उनको तो पहले मैं गणपति समझाऊं। उसके बाद उनको सब चीज़ें समझ में आयेगी और यहाँ के डॉक्टर लोग घर में गणपति की पूजा करेंगे और गणपति के सामने झुकेंगे, लेकिन अगर मैं कहूँ कि गणपति आपके पेल्व्हिक प्लेक्सस को कंट्रोल करता है तो वो कहेंगे, ‘ये क्या बात है माताजी आप कह रहे हैं!’ हमारा जो साइन्स है वो अंग्रेजी साइन्स है। इसको आप कुछ गणपति-वणपति मत लगाईये। अंग्रेजी साइन्स भी कोई क्या इंग्लैण्ड में ही पैदा हुआ था! डॉक्टरों की भी जो अॅटिट्यूड हिन्दुस्तान में है वो कभी-कभी मेरी समझ में नहीं आती। हालांकि मेडिकल इन्स्टिट्यूट में जब मेरी बातचीत हुई तो वहाँ लोग जरूर इस नतीजे पर पहुँचे क्योंकि काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और वो लोग इस नतीजे पर पहुँचे कि माताजी जो कुछ बात कह रही है उसको सुनना चाहिए। और हो सके तो कुछ न कुछ इस मामले में आगे हो सकता है, उनके वहाँ से स्टुडंट भी आ रहे हैं स्टडी करने के लिए । बहरहाल वो जो भी हो आप खुद देख सकते हैं कि कुण्डलिनी त्रिकोणाकार अस्थि में स्पंदन करती है। ये आपके अन्दर मेकॅनिज्म में बैठी हुई सबसे इंपॉर्टंट चीज़ है ये त्रिकोणाकार अस्थि में बैठी हुई कुण्डलिनी। ये कुण्डलिनी, इसे हम गौरी के नाम से जानते हैं| अब हमारे शास्त्र , दोनो चीज़ साथ-साथ चलनी चाहिए। इसके लिए आप मुझे क्षमा करें। आप अगर साइंटिस्ट हो तो आपको जानना चाहिए कि आप अगर साइंटिस्ट हैं तो साइन्स ये गौरीजी भी परमात्मा से आया हुआ है। ये सृष्टि का कण-कण भी उसीका बनाया हुआ है। गौरी जी जिसे हम मानते हैं, वही हैं जो कि शक्ति स्वरुपा है और इस वक्त में वो कुंवारी हैं। और अभी उनकी शादी शिवजी से हुई है और वो नहाने गयी हुई हैं। उस समय का जो समय माना हुआ है, सिम्बॉलिकली हमारे यहाँ, वही समय अभी भी कुण्डलिनी का है कि वो वहाँ चुपचाप बैठी है। ये बड़ा काव्यमय है। समझने के लिए क्योंकि सारा ही व्यवहार मनुष्य जैसा है। ये कोई ऐसा नहीं कि आपने बटन दबाया और बिजली चली क्योंकि बिजली कोई सोचती नहीं है, बिजली समझती नहीं है और ये आपको प्यार भी नहीं करती। अगर आप इसको गलत हाथ लगा दे तो ये आपको जला भी देगी। लेकिन कुण्डलिनी जो है ये आपका सारा टेपरिकार्डर है। जन्मजन्मांतर का जो भी कुछ है इस कुण्डलिनी में टेप होता है। और आपके हृदय में परमात्मा जो कि साक्षीस्वरूप हैं उसका प्रतिबिंब आत्मा से है। परमात्मा और उनकी शक्ति ऐसी दो चीज़ें आप समझ लें। जब परमात्मा और शक्ति एक हो जाते हैं तब ब्रह्मस्वरूप होता है और जब शक्ति परमात्मा से हट जाती है तो परमात्मा और शक्ति दो चीज़ हो जाती हैं। शक्ति जो है वही सारा कार्य करती है और परमात्मा उसके साक्षी होते हैं। वो उसे देखते हैं। ये सारा जो कुछ भी लीला कार्य है ये उसे परमात्मा के लिए देखने के लिए है। वही एक स्पेक्टेटर हैं, वही एक साक्षी है । उन्ही के शौक के लिए समझ लीजिए ये कार्य है। जिस दिन उनको पसन्द ये नहीं आयेगा वो उसे बंद कर देंगे। और वो अपने हृदय में शिव के रूप में और आत्मस्वरूप अपने हृदय में बैठे ह्ये हैं। और वो एक छोटीसी चिंगारी या ज्योत समझ लें अपने हृदय में। कुण्डलिनी जो है वो ये शक्ति है, शक्ति के तीन

भाग हो जाते हैं । क्योंकि शक्ति को जब कोई कार्य करना हो तो वो तीन भागों में विभिन्न हो जाती है। अब यही देखिये कि हम बिजली को तीन तरह से इस्तमाल कर रहे हैं। इससे हम बोल रहे हैं तो ये साऊंड वेव्ज ले जा रही है। पंखा है वो हवा दे रहा है। लाइट है वो लाईट दे रहा है। शक्ति के भी तीन भाग हो जाते हैं । और इन तीन भागों से ही सारा ही संसार बन पड़ता है। अब कोई कहेगा इसका क्या प्रूफ़ है। इसका भी प्रूफ़ आपको हम कुण्डलिनी जागृति में दिखा देंगे। हमारे अन्दर तीन तरह की शक्तियाँ हैं। अब इसको अगर अंग्रेजी नाम दीजिए तो लोगों को लगता है कि माताजी ठीक बोलीं। पर अगर मैंने अपना पूराना नाम दिया तो लोग कहते हैं कि ये क्या माताजी गाँव की बात कर रहे हैं। क्योंकि हम लोग अब भी उसी स्लेव्हिशपना में चल रहे हैं कि सब चीज़ अंग्रेजी में होनी चाहिए। तो पहले अंग्रेजी में बताओ । हमारे अन्दर जो कल मैंने स्वयंचालित संस्था की बात की थी जिसको कि हम लेफ्ट और राइट सिम्पथेटिक नव्व्हस सिस्टम कहते हैं। और बीच में जो हमारी पॅरासिम्पथेटिक नव्व्हस सिस्टम है, जो कि हमें बाहर दिखायी देती है, उसका अन्दर सूक्ष्म स्वरूप जो है वो उसके अन्दर जो शक्ति चल रही है उस शक्तियों का नाम सिर्फ हमारे शास्त्रों में है उसे हम क्या कर सकते हैं। वो अगर संस्कृत भाषा में सूक्ष्म होने से क्या झूठे हो जाएंगे और अंग्रेजी भाषा में हो जाने से क्या सही हो जाएंगे! क्योंकि आप लोग अंग्रेजी पहले पढे हो और संस्कृत कभी पढ़े ही नहीं और कभी पढ़ेंगे भी नहीं। इसलिए क्या संस्कृत भाषा में जो कुछ भी सत्य लिखा है वो झुठलाया जाएगा! हमारे यहाँ उसे महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती इन तीन पवित्र नामों से जाना जाता है। हमारे यहाँ इन शक्तियों को पॅरासिम्पथेटिक नव्व्हस् सिस्टम वगैरे नहीं कहा जाता। उसकी वजह ये है कि ये शक्ति स्वयं सोचती है और कार्यान्वित होती है और प्यार करती है। जब आप कोई सिम्पथेटिक सिस्टम कह दे इसका मतलब तो ये होता है कि कोई शक्ति सोचती ही नहीं। ये प्यार ही नहीं करती। इन तीन शक्तियों को आप यहाँ देखिये क्योंकि मैंने देखा है कि ये सूक्ष्म स्वरूप है। अब वो वॉर्डरॉब साहब ने इतनी बड़ी किताब लिखी है कुण्डलिनी पे उनको यही मालूम नहीं है कि हमारी रीढ़ की जो हड्डियाँ हैं, उसमें सूक्ष्म ये नाडियाँ हैं, ये चैनल्स उसके अन्दर सटल फॉर्म में है और बाहर की तरफ में जो ग्रोस, जो हमें आँखों से दिखाई देते हैं, प्लेक्सस वर्गैरा ये बाह्य में दिखाई देती हैं। उसकी चालना करने वाली ये शक्तियाँ हैं यही उनको मालूम नहीं। इतने कन्फ्यूज़ हैं वो इन्होंने इतनी बड़ी किताब लिख दी । मेरे समझ में नहीं आया। ये सूक्ष्म शक्तियाँ पिछे में हैं, ये दिखाई नहीं देती, लेकिन जो दिखाई देती है वो बाहर ये सिम्परथैटिक नव्व्हस् सिस्टम और पॅरासिम्परथैटिक नव्व्हस् सिस्टम है। उनको चलाने वाली जो शक्तियाँ हैं वो हमारे अन्दर हैं। और ये तीन शक्तियाँ हैं-महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। महाकाली शक्ति को मनुष्य पे हम लोग पाते हैं जिस चैनल पे या जिस नाड़ी पर महाकाली के उसे हम इड़ा नाड़ी कहते हैं। सबके नाम के भी अर्थ हैं। और जिसको हम महासरस्वती कहते हैं, वो पिंगला नाड़ी पर चलती है। और जो बीचोबीच नाड़ी होती है जिसको कि हम, पैरासिम्परथैटिक नव्व्हस् से जो संबंधित है या पैरासिम्परथैटिक को जो चलाती है उस नाड़ी को हम लोग सुषुम्ना नाड़ी कहते हैं। अब ये संस्कृत में ही नाम हैं, अंग्रेजी में है नहीं । अगर होते तो मैं बताती। क्योंकि उन्होंने ये देखा नहीं। उन्होंने ये मनन किया नहीं। वो इसकी जड़ में नहीं घुसे हैं। ये जो इड़ा नाड़ी है और पिंगला नाड़ी है और सुषुम्ना नाड़ी है ये आपके अन्दर हैं और इसे आप जान भी सकते हैं अगर आप सहजयोगी हो जाए, तो आपको आश्चर्य होगा कि आपके अन्दर इन्हीं तीन नाड़ियों से बैलन्स होता है। पहली जो नाड़ी है, जिसे कि आप इड़ा नाड़ी कहते हैं, उस नाड़ी से या महाकाली के पावर से आप संसार का जितना इमोशनल कार्य है वो कर सकते हैं। आपकी स्थिति होती है। आप जो भी कुछ चीज़ संसार की सब चीज़ों से इकट्ठे करते हैं, इतने अनुभव हैं जिसको कि कंडिशनिंग कहते हैं आजकल। मतलब जैसे कि साइकॉलोजी में इसको कंडिशनिंग शब्द इन्होंने लगाया हुआ है कि जो कुछ भी हमारे अन्दर बाहर से आता है, जो कुछ भी पास्ट का है, पूर्वजन्म का है क्योंकि आजकल के साइन्सेस में तो पूर्वजन्म की बात ही नहीं होती, लेकिन जो भी अनेक जन्मों का है वो सब कुछ हमारे अन्दर इसी नाड़ी से आता है और इसी नाड़ी से हमारे अन्दर जो इसी का हिस्सा है कुण्डलिनी, उसमें ये ज्ञात होता है। ये नाड़ी हृदय के उपर से गुजरती है। वहाँ पर आपके आत्मास्वरूप परमेश्वर विराजमान

है। परमेश्वर का जो स्वरूप हमारे अन्दर साक्षीरूप से विराजमान है, वो जो कुछ भी देखते हैं, जो कुछ भी आप कर रहे हैं, अभी आप जो भी कर रहे हैं, जो सोच रहे हैं, जो आपने किया है, जो कुछ आपने पाया है वर्तमान से उसे वो इससे झंकृत करके और कुण्डलिनी में नोट करते हैं। और जो इस जीवन का भी है वो भी इसीसे झंकृत होता है और आपके लेफ्ट हैण्ड साइड पे इकट्ठा होते जाता है। आपका जितना पास्ट है आपके लेफ्ट हैण्ड साइड पे है। अब इसीके साथ निगडीत आप सोचें कि आपका सबकॉन्शस माइंड है और सबकॉन्शस माइंड के बाद में आपका जो है कलेक्टिव सबकॉन्शस माइंड है। जो कुछ आपका मरा है, सारे संसार का मरा है आपके लेफ्ट हैण्ड साइड में चलता है। अब ये है या नहीं ये आपको हम कुण्डलिनी पे बाद में दिखायेंगे। इसका आप एक्सपरिमेंटस से आप सिद्ध कर सकते हैं। सहजयोग सब से प्रैक्टिकल चीज़ है। आप स्वयं इस चीज़ को देख सकते हैं कि आपकी लेफ्ट साइड अगर खराब हो तो आप इमोशनली डिस्टर्ब आदमी हैं। आपकी अगर राइट साइड खराब हो तो आप फिजकली डिस्टर्ब हैं और राइट साइड का अगर उपर का हिस्सा आपका खराब है तो आप मेंटली डिस्टर्ब हैं। ये हमारा रोज का अनुभव है। आज हजारो लोगों का, कल आप देखें कि कितने ही लोगों को मैने ऐसे ही बताया था कि आपका गला खराब है क्या, आपका पेट खराब है क्या? आपका लिवर खराब है क्या? आपको ये तकलीफ है क्या? आपकी वाइफ मर गयी है क्या? ये सब बाते कैसे मैं बता रही हूँ! क्योंकि इनकी ये नाड़ी पकड़ी हुई है और ये नाड़ी पकड़ी हुई इसलिए है क्योंकि इनका ये-ये कारण जीवन में है। अब ये तीन नाड़ियों के अलावा हमारे अन्दर सात चक्र हैं, उसमें से नीचे में जो चक्र है जो कि कुण्डलिनी के नीचे है। ये मनुष्य में विशेष ये चीज़ है कि ये जो विशेष चक्र है, जिसको कि हम मूलाधार चक्र कहते हैं क्योंकि जहाँ कुण्डलिनी है, उसे तो मूलाधार कहते हैं। ये माँ का घर है। लेकिन मूलाधार के नीचे में मूलाधार चक्र नीचे में बैठा है, वहाँ गणेशजी बैठे हैं । अब गणेशजी बैठे हैं, लोग कहेंगे, ‘माताजी आप कह रहे हैं गणेशजी कैसे बैठे हैं?’ गणेशजी हैं या नहीं। उसमें गणेशजी हैं | या नहीं। उसका ये है कि समझ लीजिए कि किसी आदमी को प्रॉस्टेट ग्लैण्ड की बीमारी है। प्रॉस्टेट ग्लैण्ड का चालन गणेशजी के थ्रु होता है क्योंकि ये जो चक्र है ये पेल्विक प्लेक्सस को चलाता है। और पेल्विक प्लेक्सस जो है प्रॉस्टेट ग्लैण्ड को कंट्रोल करती है। अगर आपका प्रॉस्टेट ग्लैण्ड गड़बड़ हो तो कोई अगर सहजयोगी हो तो, हर एक आदमी से नहीं होगा, लेकिन अगर कोई सहजयोगी हो, वो अगर गणेश का नाम ले उसके सामने, तो वहाँ गणेश जागृत हो जाएंगे और श्ू उसका प्रॉस्टेट ग्लैण्ड ठीक हो जाता है। लेकिन प्रॉस्टेट ग्लैण्ड खराब होने का भी अर्थ ये है कि कुछ न कुछ गणेश जी के खिलाफ आपने कार्य किया है। अब एक उदाहरण के लिए मैं आपको बताती हैँ। पूना में हमारे एक बहत बड़े सहजयोगी अब है श्री.राजवाडे । आपने अग्निहोत्री राजवाडे का नाम सुना होगा, वही है। माने उनके लड़के हैं। और वो मंगल कार्य वगैरा है उनका बहुत बड़ा और जब मैं वहाँ गई तो पूना में पहले उन लोगों ने मेरा प्रोग्राम तो तय कर लिया मंगल कार्य में । और उसके बाद कहा कि, ‘माताजी तो ब्राह्मण नहीं है। तो हम यहाँ नहीं करेंगे । ‘ तो फिर लोगों ने कहा कि, ‘अरे भाई, ऐसा नहीं करो, नहीं तो तुम्हारी बदनामी हो जाएगी कि तुम ब्राह्मणों को ही जगह देते हो। और ये तो अब पेपर में अनाऊन्स हो | गया है।’ तो मान गये। मुझे तो किसी ने कुछ बताया नहीं। ये लोग सब बात बताते नहीं कि क्या हो रहा है। तो ऐसे ही बात | करते-करते मैंने कहा कि, ‘आप में से जो भी ब्राह्मण हो मेरे सामने आयें।’ तो चार-पाँच आ गये उनके कमिटी के मेंबर्स और आ के ऐसे मेरे सामने बैठ गये। तो मुझे आयी हँसी । मैंने कहा कि, ‘देखो भाई इन ब्राह्मणों को।’ और जैसे ही उनकी कुण्डलिनी उठाना शुरू की तो वो ऐसे-ऐसे थर-थर काँपने लग गये। तो मैंने कहा कि, ‘आप मेरे सामने थर-थर क्यों काँप रहे हैं?’ कहने लगे कि, ‘क्योंकि आप शक्ति हैं इसलिए काँप रहे हैं। मैंने कहा, ‘औरों को तो ठण्डी – ठण्डी हवा आ रही है और आप क्यों काँप रहे हैं। अगर मैं शक्ति भी हूँ तो आपको तो ठण्डी हवा आनी चाहिए। और जो काँप रहे हैं, ये तो अभी ठाणा से दो-तीन पागल आयें हैं ये भी ऐसे-ऐसे काँप रहें हैं और आप भी काँप रहे हैं। इनकी और आपकी कैटेगरी एक ही बनती है। रिलेटिवली आप देख लीजिए। और आप अपने को ब्राह्मण कहते हैं।’ पर जैसे ही मैंने ऐसे कहा राजवाडे साहब का सारा बदन, आथ्राइटिस एकदम जकड़ गया था और वो उपर गैलरी में बैठे थे, ऐसे सामने, तो एकदम बदन टूट गया।

एकदम फूल गया और ऊपर से नीचे आकर के वो मेरे पैर पे आये और तब से आज तक वो मेरे शिष्य हैं। लेकिन उसका प्रॉस्टैट ग्लैण्ड खराब है। अब ये गणेशजी के बड़े पुजारी हैं। जब ये मुझ से मिलने आये, तो कहने लगे, ‘माताजी, मेरे सब चीज़े, मेरा प्रॉस्टैट खराब है। ये कैसे? मैं तो गणेशजी का बड़ा पुजारी हूँ पुराना।’ मेैंने कहा, ‘अच्छा!’ तो मैंने कहा, ‘चलो चना खाओ।’ तो दूसरा कहने लगा, ‘आज तो खायेंगे नहीं ।’ मैंने कहा, ‘क्यों?’ कहने लगे, ‘आज संकष्टी है इनकी। पूजा होती है।’ मैंने कहा, ‘इसलिए तुम्हारा प्रॉस्टैट खराब है।’ कहने लगे, ‘इसलिए खराब है? मैं तो उनकी पूजा में भी नहीं खाता हूँ। मैंने कहा, ‘संकष्टी के दिन उनका जन्म हुआ। तुम्हारे घर अगर किसी बालक का जन्म हो तो उस दिन क्या उपवास करना चाहिए? सोचो तो। ये तो उनका महान अपमान हो गया। दिमाग लगाओ। और तुमने ये अपमान कर दिया। और इसी वजह से। आज तुम मेरे सामने प्रॉमिस करो कि संकष्टी के दिन तुम खूब आराम से खाओगे, पिओगे, मौज करोगे। क्योंकि तुम्हारे घर में श्री गणेश का जन्म हुआ है।’ फौरन उनका प्रॉस्टैट ठीक हो गया और उनका ऑपरेशन होने वाला था वो टल गया। अब देखिए कितनी सूक्ष्म संवेदना है। कितनी सटल बात है, लेकिन वो ग्रोस इन्सान की खोपड़ी में नहीं घुसती है। बहुत मुश्किल हो जाता है उसको ये समझना। पर ये सही बात है। संकष्टी के दिन आप अगर उपवास करते हैं तो बड़ी गलत करते हैं। आप ही सोचिए, अपना दिमाग लगाईये। आपके पास ब्रेन है। संकष्टि के दिन क्यों उपवास करना चाहिए। ये किसने प्रथा डाल दी! कोई पूछता भी नहीं। इसलिए मैं कहती हूँ कि जब कोई चीज़ चल पड़ती है, रूढीगत हो जाती है तो उसको हम आँख मूँद के लेते हैं। एकही दिन उपवास अगर मैं कहूँ तो करना चाहिए, नरक चतुर्दशी के दिन सबेरे क्योंकि नर्क के द्वार उस दिन खुलते हैं। उस दिन सबेरे चार बजे उठ कर के और फराळ होता है हमारे महाराष्ट्र में। व्यवस्थित। जिस दिन का उपवास करना चाहिए उस दिन उपवास नहीं करना और जिस दिन उपवास नहीं करना चाहिए, उस दिन उपवास करना इस तरह की अनेक जो गड़बड़ियाँ हम लोगों ने अपने धर्म में कर रखी है। अनेक बिल्कुल विरुद्ध धारणा ले रखी इसके वजह से भी श्री गणेश हमसे नाराज हैं । इससे और आगे जायें श्री गणेश स्वयं एक चिर के बालक हैं। सेक्स के प्रति वो निर्बोध हैं, बिल्कुल उनको बोध ही नहीं जैसे कि यहाँ एक महाशय थे, वो सब औरतों के कपड़े ही उतार लेते थे। तो मैंने उनसे पूछा कि, ‘आप किस सिलसिले में सब के कपड़े उतार रहे हैं।’ तो कहने लगे कि,’मैं श्रीकृष्ण हूँ और ये सब गोपियाँ हैं। इनके मैं कपड़े उतार रहा हूँ। मैंने कहा, ‘वाह भाई! वो श्रीकृष्ण की उमर सिर्फ चार साल की है और आप पचास साल के दडीयल हैं। आप भी वही श्रीकृष्ण हैं क्या चार साल के, जो इनके कपड़े उतार दें।’ और जिस वक्त में द्रौपदी का वस्त्रहरण हुआ था अगर कृष्ण को स्त्री-लज्जा का विचार नहीं था, तो क्यों फिर ‘द्वारिका में शोर भयो शोर भयो भारे। शंख, चक्र, गदा, पद्म, गरुड लै सिधारे।’ अपने इन चारों शक्तियों को लेकर क्यों पहुँचे थे वहाँ पर। स्त्री लज्जा का विचार श्रीकृष्ण को नहीं था? और आजकल ऐसे बहुत निकल गये हैं कि ‘हम श्रीकृष्ण हैं और बाकी सब गोप-गोपियाँ हैं और कोई जरूरत नहीं शादी- ब्याह करने की । जैसा चाहे वैसा रहें।’ याने इस तरह से पूरे अपने धर्म के मूलाघातिक है। उसको बिल्कुल मूल से ही उखाडने के पीछे में लोग लगे हये हैं। इस तरह से श्रीकृष्ण का अपमान तो करते ही हैं लेकिन श्री गणेश जैसे सबसे पवित्रतम व्यक्ति का, जो कि सबसे पवित्रतम सिंबल हमारे अन्दर में हैं, परमात्मा ने बनाया हुआ है। वो इसलिए कि जिस वक्त आप परमात्मा की आराधना में बैठे तब सेक्स के मामले में आप एक चिरबालक को सामने रखें एक बालक के प्रति। और जो लोग कहते हैं कि सेक्स को सॅब्लिमेट करो और सेक्स की बातें करो और लोगों को नंगा घुमाओ ये लोग सब अधर्म कर रहे हैं और आपसे भी अधर्म कर रहे हैं और जो लोग इन लोगों के पास गये हैं उनकी कुण्डलिनी मैं नहीं जागृत करने वाली। क्योंकि आपने ऐसी चीज़ों को मान्यता क्यों दी| ये आपकी माँ है गौरी। उसका आप अपमान कर रहे हैं। आप अगर सेक्स उस पर डाल रहे हैं तो आपको पता होना चाहिए कि आप माँ के प्रति किस भावना से हैं। उस पवित्रता की भावना को फिर से इस देश में पूरी तरह से जगाना पड़ेगा। तभी सत्ययुग यहाँ जमेगा। नहीं तो जम नहीं पायेगा|

ये एक गणेश के प्रति अत्यन्त विरोध में हम लोग चलते हैं। गणेश के प्रति विरोध हमारे वर्षों में, हमारे संसार में अनेक वर्षों से है, विशेषतः हिन्दुस्तान में। उसकी वजह ये हुई, हो सकता है क्योंकि मानव गलती करता है। मैं अपना ये सोचती हूँ क्योंकि मैंने, जब से जन्म हुआ है तब से यही पता लगाया कि मनुष्य कहाँ-कहाँ फिसल पड़ा। गणेश पे कैसे फिसला होगा। | तो मैने उसका ये पता लगाया, मनन में, कि हो सकता है कि वो जब मनन में गये और वो पैरासिम्पथैटिक से जब देखने लगे और इस चक्र को जब उन्होंने देखा, तो वहाँ हो सकता है कि गणेश जी की सूँड को उन्होंने, हो सकता है कि उन्होंने उसी को गौरीजी समझा होगा, कुण्डलिनी समझा होगा। ऐसा मैं एक माँ के रूप में कहती हूँ क्योंकि मुझसे ये नहीं बर्दाश्त होता कि शुरू से ही मनुष्य इतना घृणित हो सकता है कि ऐसी गन्दी बात सोचे। इसलिए मैं सोचती हूँ कि हो सकता है। पर उसका पतन जो है छठवी शताब्दि में इस कंट्री में इस हद तक पहुँच गया। आपको आश्चर्य होगा कि तांत्रिकों ने इसका बड़े ही बुरी तरह से इस्तमाल किया। अब इसका क्या एक छोटासा तरिका है कि अगर समझ लीजिए यहाँ परमात्मा के रुप में कोई प्रतीक बिठाया तो वहाँ परमात्मा का चित्त आ जाता है। अगर वो रुप ठीक से हो तो, अब अगर परमात्मा का चित्त वहाँ है, और वहाँ आप जाकर उस मूर्ति के सामने अगर व्यभिचार करें तो वहाँ से परमात्मा का चित्त हट जाता है। ये सही बात है। यहाँ तक मैं आपसे बताती हैँ कि मेरे फोटो को कोई ला के बता दे तो मैं फौरन बता सकती हूँ कि आपने इसके सामने क्या गन्दगी करी है। उसका चित्त मेरा चित्त वहाँ से हटा हुआ मुझे नज़र आता है। उसी तरह वहाँ से परमात्मा का चित्त वहाँ से हट जाता है। गणेश या हनुमानजी के मामले में तो ये बात है कि वो पहले तारणा देते हैं, भैरवनाथ वो तारणा देते हैं, परेशान करते हैं, उनको गर्मी देते हैं, बिल्सुटर्स आते हैं, सब करते हैं। तब भी अगर मनुष्य नहीं मानता है और ऐसे पवित्रतम चीज़ का अपमान करता है, उस वक्त, उस समय में जब ऐसा हो जाता है तो वो जगह परमात्मा से खाली हो जाती है। और जब कभी पूछता है कोई कवि कि कोई ऐसी जगह बता दें कि जहाँ परमेश्वर नहीं हैं तो वो ऐसी जगह बन जाती है जहाँ परमेश्वर का चित्त नहीं रह जाता और वहाँ हर तरह का व्यभिचार मनुष्य करना शुरू कर देता है। ऐसे बहुत सारे मन्दिर और बहुत सी ऐसी गन्दी जगहें हमारे यहाँ हैं। हर एक मन्दिर पर इन्सान ने अपना जोर बिठा दिया है। जैसे महालक्ष्मी के मन्दिर में, आपसे बता दूँ, महालक्ष्मी के मन्दिर में जाकर अगर कोई भूतों का काम करें, माने ये घागरी फंकना जिसे कहते हैं वहाँ से महालक्ष्मी का चित्त बिल्कुल हट जाएगा। क्योंकि लक्ष्मी ऐसे घर में एक मिनट भी नहीं ठहरेगी जहाँ भूतों का वास हो। तो ये बराबर उन्होंने बना दिया और मैंने यहाँ ट्रस्टी वालों से कहा कि, ‘ऐसे लोगों को वहाँ से हटाईये।’ तो कहने लगे कि, ‘यही एक पब्लिक एंटरटेनमेंट है माताजी। इसको हम हटा देंगे तो महालक्ष्मी को कौन पुछेगा ?’ मैं कहती हूँ कि अब क्या बात भी ५ 6. करें! उस जगह इस तरह का भूतों का व्यवहार करना और भूतों को वहाँ लाना और उनसे सवाल पूछना कि ‘घोडे का कौन सा नंबर आयेगा?’ इस तरह की गन्दी बातें जब आप साक्षात महालक्ष्मी के मन्दिर में, जो कि साक्षात हैं। यहाँ की महालक्ष्मी की जो मूर्ति है, वो साक्षात हैं। हजार बार जा कर के उसे मैंने जागृत किया। और बार-बार आप लोग इसे गिरा दे रहे हैं। तो इस तरह का हर साल वहाँ पर होता है। हर नवरात्र में ये धन्दे यहाँ लोग करते हैं। और वहाँ पर जो लोग जाते हैं, किसी का सर पकड़ जाता है, कोई पागल हो जाता है। अभी आप पढ़ियेगा कि किसी मन्दिर में कोई गया था, वहाँ वो पागल हो गया था। मन्दिर में कोई पागल कैसे होगा? लेकिन वहाँ इस तरह के गलत व्यवहार आप लोग करते हैं तो यही होगा। सब मन्दिरों को खत्म करने की पूर्ण व्यवस्था हम लोगों ने कर दी है। फिर बाहर द्कानें लगा दी अच्छे से। शिर्डी के सांईबाबा बहुत बड़े थे । दत्तात्रेय के अवतार हैं, इसमें कोई शंका नहीं। गुरु हैं, पूजनीय हैं लेकिन इस वक्त जब मैं शिर्डी में गई, तो मैं हार गई छ: घण्टे तक , लेकिन उनको मैं जागृत नहीं कर पाई। वो वहाँ से चले गये। सब तरह के गलत काम कर के हम इन जो इस पर देवता बैठे हैं इनको नाराज कर रहे हैं। अभी ये श्रीगणेश के बारे में मैंने आपको बताया| परमात्मा की कृपा से आप हिन्दुस्तानी हैं और आप में माँ-बहन का बहुत ख्याल है। परमात्मा की कृपा है समझ लो, इस पृथ्वी की शक्ति है, जिसकी वजह से ये हिन्दुस्तान जैसे पृथ्वी में एक आलिशान चीज़ आज जीवित है, जहाँ पर कि इस तरह के वाइब्रेशन्स हैं, जिसकी वजह से मनुष्य अब भी माँ-बहन को पहचानता है। इसके लिए आप बहुत-बहुत धन्यवाद

परमात्मा को करें और कहें, कि ‘प्रभू, हमारी दृष्टि हमेशा ऐसे ही रखो।’ अपनी दृष्टि आप जमीन पर रख के चलें। आप देखिए आपके गणेशजी जो हैं वो सांत्वन रहें | हमेशा दृष्टि को अपनी जमीन पे रखें क्योंकि ये जो गणेश जी बनाये गये हैं ये पृथ्वी तत्व से बनाये गये हैं। उसके उपर में जो चक्र आपको दिखायी दे रहा है, इसे नाभि चक्र कहते हैं। जो अपनी नाभि के पीछे रीढ़ की हड्डी में, अब ये कहीं भी होती है, मनुष्य की नाभि कहीं उपर होती है, कहीं नीचे होती है। इसका कोई स्थान फिक्स नहीं। वहाँ पर नाभि चक्र है। और इस चक्र से हम लोग आप जानते हैं कि नाभि चक्र के कारण जिसे सोलर प्लेक्सस कहते हैं वो चलता है और सोलर प्लेक्सस से हमारा सारा, जितने भी खाने के, जितने भी प्रक्रियायें होती हैं वो सारी इसी प्लेक्सस से होती है, सोलर प्लेक्सस से। और ये उसको कंट्रोल करता है। पर अति सूक्ष्म इसमें , ये आपके माँ से पाया हुआ, आपकी माँ से जुड़ा हुआ प्लेक्सस है। समझ लीजिए अगर किसी की माँ बीमार है, नाभि चक्र पकड़ लेगा । लेफ्ट साइड में उसका नाभि चक्र पकड़ लेगा। अगर किसी ने कहीं जा कर के गलत तरह का खाना खा लिया, खाने से संबंधित है क्योंकि खाना, याने अपने को माँ पहले दूध देती है और माँ से ही पहले खाना सीखते हैं इसलिए इसका संबंध खाने से है। अगर आप किसी के घर गये और आपने खाना खाया और आपको उल्टी हो गयी तो समझ लीजिए कि इस आदमी के घर में बुरे संस्कार थे, कोई बुरी चीज़ थी, जो निकाल फेंकी। पेट के अन्दर जो नाभि चक्र है ये आपके धर्म की | स्थापना करता है। आपके धर्म की स्थापना करता है। तो माने जैसे समझ लीजिए एक छोटीसी बात है कि मनुष्य कहता है कि ‘अब उसमें क्या है कोई कैबरे देखने जाएगा उसमें क्या है?’ आपको आश्चर्य होगा कि मैं अगर कोई कभी कैबरे को देखती नहीं हूँ, लेकिन मेरे पति की ऐसी नौकरी है। कभी-कभी ये लोग शुरू कर देते हैं तो उसी वक्त मेरी उल्टिओं के मारे इतना हाल खराब हो जाता है कि सब वो कैबरे-वैबरे ठण्डा हो जाता है। अपने यहाँ पेट में ही धर्म है, कई चीज़े बताती नहीं हूँ कि ‘बाबा, तू शराब मत पी कि ये खराब है।’ मैं कोई रॅश्नलाइज नहीं करती हूँ। शराब तो मैं पी ही नहीं सकती। एक बार किसी ने इतनी सी ब्राण्डी मुझे गलती से दे दी मुझे बगैर बताये हुये। तो इतना सारा खून गिर गया। तब से मेरे हँज्बंड तो कहीं जाते हैं तो कहते हैं कि ‘बाबा, कुछ इनको गलती से एक बूंद भी मत देना।’ मेरा तो जी घबराता है। ये पेट जो है इसमें धर्म होता है। वही सब बैलन्स करते रहता है। आप देख लीजिए कि पेट की सारी बीमारियाँ आपको शराब और सारे मद्य से होती है। हमें नानक ने कहा है कि शराब पीना मना है। मोहम्मद ने कहा है कि शराब पीना मना है। आखिर वो लोग कोई पागल थे जो बिल्कुल मना कर के गये कि भाई, शराब नहीं पीनी है। लेकिन अब देखिए हम लोग धर्म के मामले में कैसे विचलित हो जाते हैं। अभी ये दो आदमी हम देख सकते हैं जिन्होंने साफ – साफ कह दिया । सबने हर एक बात नहीं कही। लेकिन सबका मिला कर के धर्म बनता है। लेकिन उन्होंने शराब को और मद्य को बिल्कुल मना किया है कि कोई सा भी नशा नहीं करना चाहिए। बिल्कुल मना है, पूरा नशा। लेकिन आप देख लीजिए कि मुसलमान लोग सबसे ज्यादा शराब पीते हैं। और इनके देशों में जायें तो वहाँ एक से एक कवि हो गये । उनमें कवितायें बनाई उन्होंने शराब की। शराब कोई पीने के लिए नहीं भगवान ने बनाई। वो तो पॉलिश के लिए बनायी थी, पॉलिश करने के लिए कोई भी चीज़ पॉलिश करनी है, डायमंड को पॉलिश करना है, फर्निचर को पॉलिश करना है उसमें स्पिरिट लगता है। सारी शराब उसके लिए बनायी थी। मनुष्य इतना मूर्ख है कि उसको पीने लग गया। अब उससे उसको मादकता आती है और इसके बाद मनुष्य जो उठेगा, अब वो जानवर नहीं हो सकता। और अब वो अगर भगवान भी नहीं हो सकता है , तो अब वो राक्षस ही बनेगा कि नहीं बनेगा? इसलिए कहते हैं कि राक्षस गण में लोग जाते हैं। शराब पीने से मनुष्य अपनी चेतना खो देता है। और जब अपने ही चेतना में परमात्मा को जानने का है तो ऐसे शराब पीने से क्या फायदा जिससे आप अपनी चेतना खो दे। कोई भी चीज़ करने से नहीं होता है वो अन्दर ही से आपको सोच लेना चाहिए कि ऐसी गन्दी चीज़ क्यों पी । अब ड्रास देखिए । ड्रग्स लोग पीने लग गये हैं। विलायत में जिसमें हमारे सब शिष्य ड्रग्स पीते थे अब इनका सब छुडाया मैंने। सहजयोग के

बाद बहुत आसानी से शराब वराब सब छूट जाता है। लेकिन अब ड्रग्स शुरू हो गया। अब आपके बच्चे कल ड्रग्स पियेंगे। अब आप शराब पियो और आपके बच्चे ड्रग्स पियेंगे उनके बच्चे पता नहीं और क्या पीने वाले हैं ? और उसमें फिर कहेंगे कि देवता लोग सोमरस पीते थे। देवता लोग अगर पीते भी थे, सोमरस अगर गन्दा था तो आप क्यों पीते हो? उनका भी तो पतन इसी से हुआ और आपका भी पतन इसीसे होगा। वो देवताओं के रस्ते पर अगर आपको चलना है तो पतन के रस्ते पर जाना ही क्यों है? उनमें से जो उठ गये, जिन्होंने शराब को छुआ भी नहीं उधर जाने का। आपको अपने आदर्श खुद बनाने चाहिए। और इस पवित्र, सुन्दर मनुष्य के इतने मुल्यवान जीवन को उसकी कुछ महत्ता रखनी चाहिए। अपने पे विश्वास नहीं लेकिन अपनी महत्ता, अपनी पहचान, हम कितने ऊँचे हैं और हम इस तरह की मूर्खता की बातें करेंगे जो पॉलिश की चीज़ है उसको हम खा रहे हैं। बिल्कुल ये पॉलिश के लिए बनाया हुआ है। उसी तरह से तम्बाकू चीज़ जो है, उसको तम्बाकू आप कहते हैं। ये भी एक राक्षस ही है। एक राक्षस ही है जो कि वनस्पती में पैदा हुई। वनस्पती राक्षसी है । और तम्बाकू इसलिए बनायी गयी थी, ये है इन्सेक्टिसाइड। इन्सेक्टिसाइड बनाया गया था कि ये सब दुनियाभर के कीड़े और ये वो जो होते हैं इसके लिए। अब वो हम खाने लग गये और उसको हम पीने लग गये। अब उससे कैन्सर होने लग गया। लंडन में तो साफ-साफ हर एक के इसपे लिखा जाता है कि ‘इससे कैन्सर होता है। इसको मत पिओ।’ तो भी लोग पीते हैं। अब मेरी समझ में नहीं आता है कि जब सामने दिखायी दे रहा है कि इसको नहीं पीना है तो क्यों पिते हैं? ये एक फैशन है, ये चीज़ फैशन हो गयी। माने मनुष्य अपने जहाँ भी कहीं खड़ा होता है या नहीं। कहीं अपने को देखता है या नहीं कि मैं कौन हूँ ? आपको राजा बनने का है। आपको अपने पे आधिपत्य लाने का है। आप चीज़ क्या हैं उसको आप समझ जाईये। याने अपने को एक कचराकारी बनाने का है। कल रास्ते में कहीं पड़ा हुआ मनुष्य मिलेगा। मैंने हमारे जीवन में, यहाँ बॉम्बे में करीबन २४- २५ साल से रह रही हूँ । हमारे साथ के लोगों को देखा। रास्ते पे पड़ा मिला, वहाँ मरता हुआ मिला ऐसी-ऐसी बाते सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। विद्वान, घर के अच्छे, बाल- बच्चेदार सब बोलते हैं, रास्ते पर वो कोई साहब थे, वो मिले, उठाकर ले गये और कचरागाडी में फेंका। बहुत बड़े-बड़े ये क्या अपने जीवन का आप लोग कर रहे हैं। इसलिए नाभि चक्र पे जो चीज़ों की मनाई है ये सब गुरुओं ने की है। और ये जो गुरु हैं इसे हम वॉइड कहते हैं, भवसागर, हमारे अन्दर भी पेट में है, वहाँ पैदा होते हैं। आपके अन्दर भी यह गुरु हैं। इनके मुख्य दस अवतार हुये हैं। हम इनको ऐसा लें कि आदिनाथ, जो जैनों के माने हुये हैं, वो इसके पहले अवतरण थे। दत्तात्रेय जी इसका एसेन्स हैं, इसका तत्व है, दत्तात्रेय इसका तत्व है। दत्तात्रेय जो हैं ये तिनों शक्तियों के जो बाल्यस्वरूप है, पवित्र स्वरूप है और उसके बाद उनके अनन्त अवतरण हये जिनमें से राजा जनक एक है। उनकी लड़की सीताजी आदिशक्ति थी आप जानते हैं। लेकिन उनका फिर और कहीं अवतरण हआ वो आप नहीं जानते हैं। राजा जनक का अवतरण मोहमद साहब के रुप में भी हुआ है। और मोहम्मद साहब की जो लड़की थी, जिन्हें हम जानते हैं फातीमा बी नाम से, वो स्वयं साक्षात सीताजी थीं । और उनके जे दो लड़के थे वो भी और कोई नहीं थे बस, हसन, हुसैन थे। और हसन, हुसैन पहले महावीर और बुद्ध के रुप में जन्म हुए थे। अब ये तो आप नहीं जानते हैं, लेकिन मैं तो माँ हूँ, मैं तो जानती हूँ। और आप भी जानेंगे जब आप कुण्डलिनी पे उतरेंगे। मोहम्मद साहब के जो दामाद थे, जिनको आप हजरत अली के नाम से पहचानते हैं और जिनके बारे में आपने सुना था, वो एक ही बार, एक ही बार संसार में ब्रह्मदेव ने जब अवतरण लिया था तो वो हजरत अली के रूप से एक ही बार हुआ था। अभी आपको आश्चर्य होगा। एक मुस्लिम साहब हमारे पास आये और उनके पेट में शिकायत थी जिसको हम कहते हैं कि स्वाधिष्ठान चक्र पे ब्रह्मदेव का स्थान और लेफ्ट साइड में पकड़ थी तो लेफ्ट साइड में अवतरण का नाम लेना पड़ता है। तो हमारे साथ एक सहजयोगी बैठे थे। तो मैंने कहा, ‘इनका लेफ्ट साइड पकड़ा हुआ है। अब इसका क्या इलाज हो सकता है?’ तो कहा, ‘माताजी, आपने एक दिन कहा था कि ब्रह्मदेव ने हजरत अली के रूप में अवतरण लिया था।’ मैंने कहा, ‘हाँ,’ मैंने कहा, ‘अच्छा, जरा हजरत अली का नाम तो लो। और जैसे ही उनका नाम लिया, एकदम, वो अगर यहाँ

हाज़िर भी हो, तो वो आपको बता सकते हैं। एकदम से उनकी कुण्डलिनी जागृत हो कर के और वो पार हो गये और उनकी शिकायत मिट गयी। अब कोई वहाँ, पूना में लोग कहते हैं कि ‘माताजी तो मुसलमान धर्म का प्रचार कर रही है।’ अरे , क्या मुसलमान, क्या हिन्दू, और क्या ये एक ही तो भगवान ने बनाये हैं ना! और ये जितने भी बड़े-बड़े अवतरण हये ये सब आपस में रिश्तेदार हैं। ये तो हम ही झगड़ रहे हैं आपस में। क्राइस्ट ने भी कहा है कि ‘दोज आर नॉट अगेंस्ट मी आर विथ मी’ वो कौन हैं? वो भी बेचारे तीन साल, चार साल मूर्खों के बीच रहें। उनको पकड़ कर के फाँसी दे दिया। अब यहाँ साईबाबा का फोटो आप मानते हैं, जो कि साईबाबा स्वयं मुसलमान ही तो थे। और वही अवतरण है, साईबाबा भी दूसरे- तिसरे कोई नहीं है। फिर उनको क्यों मानते हैं आप? जो मुसलमान हो, चाहे कोई भी हो, जब वो परमात्मा के चरण में हैं और जब वो पार हो जाये तो वो सबको वंदनीय होते ही हैं और इस देश में विशेष कर के जैसे ख्वाजा निजामुद्दीन साहब थे । ये पार आदमी थे और उनको ये खिलजी नाम के गधे राजा ने इतना परेशान कर दिया, अन्त में उसी का मृत्यु हो गया। लेकिन वो थे ही, जो उँचे हैं, वो चाहे मुसलमान हो, चाहे हिन्दु हो, चाहे कोई हो इस भारत वर्ष में हमेशा पूजा जाता है। और आप अगर इस भारत वर्ष की जनता हैं और आप इस भारतवर्ष के रहने वाले हैं तो आपको पता होना चाहिए कि इस देश में इन छोटी-छोटी बातों को लेकर के और बड़ी बात नहीं मिलायी जाती। फिर ये कोई यहाँ पर कोई जा के गोबर में नहीं मिला देता है। ये हीरे की बात है। जो हीरा है वो हीरा ही है। वो चाहे किसी भी जाति में पैदा हो और कौनसी ऐसी जात है जो अपने को सबसे बड़ा, अच्छा समझे बैठी हई है। ये जाति बना-बना के ही तो आपने परमात्मा का भी ठिकाना कर दिया है। मराठीत म्हणायचं म्हणजे खोबरं केलंय देवाचं! अब तो ये हालत आ गयी है कि पहले तो हम बम्बई वाले थे, फिर बम्बई में हम मुसलमान थे, कोई हिन्दु थे, कोई ख्रश्चन थे और अब तो हम ये बिल्डिंग वाले हो गये। अब बिल्डिंग वाले में भी ये माला के हो गये। क्या मनुष्य इसलिए बना है कि संकीर्ण से संकीर्ण और छोटा से छोटा हो। इस चक्र पे सिम्बल के लिए हमको मानना चाहिए समुद्र। समुद्र इसका सिम्बल है। जब आपका ये चक्र खराब हो जाता है तो समझ लेना कि आपके अन्दर की जो समुद्र की जो विशालता है वो बिल्कुल संकुचित हो गयी। कहीं दब गयी अगर पेट का कैन्सर किसी आदमी को होता है तो उसको ये पता होना चाहिए कि पेट का कैन्सर उसके इसी गलत धारणाओं से हो जाता है। समझ लीजिए कि कोई अगर मुसलमान हैं। अभी एक किस हुआ था। एक मुसलमान डॉक्टर है। वो हमारे पास आयें। उनको पेट का कैन्सर था। वो इरान के रहने वाले हैं। तो मैंने उनसे बताया कि, ‘देखिये आप मेरे पास ट्रिटमेंट के लिए तो आये हैं। लेकिन आप क्या बड़े पक्के मुसलमान हैं?’ हालांकि इरान के इतने पक्के मुसलमान नहीं होते। तो कहा, ‘हाँ, मैं तो हूँ। और मैं तो कोई चीज़ को नहीं मानता।’ तो मैंने कहा कि, ‘क्या आप दत्तात्रेय को मानेंगे?’ कहने लगे कि, ‘नहीं, नहीं मैं तो उनको नहीं मान सकता।’ तो मैंने कहा कि ‘अगर आप दत्तात्रेय को नहीं मान सकते तो मैं आपको ठीक नहीं कर सकती। अगर ये दत्तात्रेय के सारे अवतरण हैं तो आप एक हाथ को माने और दूसरे हाथ को नहीं मानें। तो क्या वो मान सकते हैं। मैंने कहा, ‘आपको दत्तात्रेय को मानना पड़ेगा।’ उन्होंने कहा कि , ‘नहीं, नहीं, हम तो इसको नहीं मान सकते। ये तो बहुत गलत बात है माताजी आप कह रही हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा ठीक है, आप जाईये ।’ उसके बाद वो | फिर लंडन में पहुँचे, कि ‘भाई इन्हें किसी तरह से ठीक कर दो।’ कैन्सर की बीमारी हो गयी तो जरा से, फिर कान पकड़े जाते हैं। कहने लगे, ‘जो भी कहियेगा ।’ मैंने कहा, चलो। टीका लगाया मैंने उनको। मैंने कहा , ‘चलो।’ हाथ जोड़ कर के और दत्तात्रेय का उनसे मैंने मंत्र कहलवाया। और उसके बाद आज वो भगवान की कृपा से ठीक है। ऐसे अनेक लोगों का होता है। जब हम दत्तात्रेय की तो बहुत पूजा करते हैं और मोहम्मद साहब को अगर हम गालियाँ देते हैं तो आप समझ लीजिए कि आप मोहम्मद साहब के जो एसेन्स को तो मानते हैं लेकिन उसके अवतरण को अगर गालियाँ देते हैं तो मोहम्मद साहब स्वयं आपसे नाराज हैं और दत्तात्रेय तो आपसे एकदम रुठे ही हये हैं कि ‘इतने मूर्ख हैं। क्यों नहीं समझते हैं कि जो मैं कहता रहा वही ये भी कह रहे हैं और वही नानक भी कह रहे हैं।’ नानक संसार में हिन्दू-मुसलमानों को उन्नति करने के लिए आये थे। लेकिन आज हालत क्या है उनके शिष्यों की देख लीजिए। हर तरह का विष ले कर के हम कह रहे हैं नहीं, इनको मार

डालो, उनको खत्म करो, इनकी ये करो । कौन होते हो किसी को मारने वाले । क्या एक चींटी भी तुमने पैदा की इस संसार में जो इस तरह का द्वेष फैला कर के और तुम इसको मारो, उसको पीटो शुरु कर दिया और वो भी धर्म के नाम पे। तुम ये मनुष्य है। इस मनुष्य को क्षमा करने के लिए एक माँ का ही रूप चाहिए । मेरी समझ में नहीं आता है कि आप किस अहंकार में ये सारा कार्य कर रहे हैं और कितनी अंधकार से आप बहे चले जा रहे हैं। ये विशालता का जो स्वरूप है ये आपके नाभि चक्र पर है। जिस मनुष्य में ये विशालता आ जाती है उसका नाभि चक्र पकड़ता नहीं। और भी इसके दोष हैं, अनेक दोष हैं। इसमें दस उनकी पंखुडियाँ होती हैं। और उसीसे आप देखिये कि सोलर प्लेक्सस में दस ही सब प्लेक्सस हैं। हालांकि वो फिजिकल साइड में सोलर प्लेक्सस ये लोग देखते हैं। उसका इमोशनल साइड नहीं देखते लेकिन नाभि चक्र बहुत ही महत्वपूर्ण है। आप किसी के घर खाना खाने जाते हैं, फिर भावना सिखाते हैं कि क्या खाते हैं? अब राक्षस को आपको पहचानना हो तो वो जरूरत से ज्यादा खाता है। बहुत ज्यादा खाता है। और या तो वो बिल्कुल ही नहीं खाता है। भूखा ही रहता है। क्योंकि वो भूख ही खाते रहता है। मेरे ख्याल से पता नहीं क्या करता है। अती खाने वाला और बहुत बिल्कुल ही कम खाने वाला दोनों ही आदमी ठीक नहीं। बीच में है। जो मिल गया सो खाया। खाने के मामले में हमारे देश में बहुत ही ज्यादा लोगों को इंटरेस्ट है। घर जाते साथ बीवी से पुछेंगे, ‘हाँ भाई, क्या बनाया बताओ।’ औरतें सबेरे से शाम तक यही सोचती रहेंगी कि शाम को क्या बनाये जिससे आदमी का अपना पेट पूरा बिगड़ जाए। वो घर में बैठा रहे, दफ्तर ही न जाए। खाने-पीने का विचार अपने यहाँ जो बताया गया है कि खान-पान, स्वच्छता से और ज्यादा नहीं खाना चाहिए, कम भी नहीं खाना चाहिए। ठीक से खाना चाहिए। इसलिय बताया है कि आपका नाभि चक्र ठीक रहे । लेकिन जो वेजिटेरिनिज्म के पीछे में लोग हर तरह का प्रकार करते हैं इसके लिए नहीं बताया गया। या उपवास के लिए नहीं बताया गया कि रात-दिन आप खाने ही की बात सोचते रहें कि आज में क्या खाऊंगा? शाम को मैं क्या खाऊंगा? आज मेरा उपवास है, आज मैं क्या खाऊंगा? इसके लिए नहीं बनाया। वास्तविक में मैं तो सारे सहजयोगियों से कहती हैँ कि बाबा, उपवास न करो। मेरे मन के विरोध में पड़ता है। मैं तो इससे प्रसन्न नहीं होती हूँ। हाँ, नहीं खाना हो तो और चीज़ खा कुछ लो। उसकी क्वालिटी बदल डालो। लेकिन जो उपवास, सबेरे से शाम तक आप, आज साहब उपवास पे बैठे हैं। वो लोग पार नहीं होते हैं, मैं आपसे बताती हूँ। अगर आप उपासडे लोग होंगे तो आप पार नहीं हो सकते। ये जानना चाहिए कि उपवास करने से अगर परमात्मा मिलता है तो अपने देश में एटलीस्ट ३०-४०% लोग तो ऐसे ही पार हो जाने चाहिए। इस तरह की बेवकूफी की बातें किसने बतायी| उल्टा परमेश्वर ने जो दिया है उसको प्रसन्नचित्त, हृदय से लगाकर के आप खाईये और सुख से रहिये । इस तरह से जब आप रहियेगा, इस तरह से आप अगर कार्य करेंगे तो आप देखियेगा कि परमात्मा भी आपसे प्रसन्न रहेंगे और सारा संसार भी आपसे प्रसन्न रहेगा। लेकिन आप उस वक्त भी उपवास करते हैं जब कि परमात्मा का गौरव करने का समय होता है। जब परमात्मा का गौरव करने का समय आता है, उस वक्त आप क्यों उपवास करते हैं? खाने-पीने के मामले में और भी बहुत सारी हमारे यहाँ बातें हैं कि हम लहसुन नहीं खाते हैं। लहसुन नहीं खाना चाहिए अगर आपका ब्लड प्रेशर लो हो तो। अगर आपका ब्लड प्रेशर हाय है तो लहसुन जरुर खाना चाहिये। सब चीज़ों का एक-एक नियम होता है। हमारे यहाँ तो एक जनरल चीज़ है कि ‘वो उनके यहाँ मैं गयी थी। वो सारा दिन एक हरी पत्ती नहीं खाती तो मैं भी नहीं खाती।’ अरे भाई, क्यों नहीं खाती ? उन्होंने छोड़ दिया, तो मैंने भी छोड़ दिया। माने जैसे कि हमने पहले बुद्धि को ही त्याग दिया। खाने-पीने से परमात्मा नहीं मिलता है। उल्टे खाने-पीने में इतना चित्त लगाने से जरूर परमात्मा छूट जाएगा। रात- दिन खाने-पीने में व्यस्त रहने से भी नाभि चक्र पकड़ता है । अब बहत से लोग ये कहते हैं कि, ‘माताजी, जिनको खाने को भी पूरा नहीं मिला वो परमात्मा की ओर कैसे जायें ?’ ये प्रश्न सब लोग अपने देश में मुझसे पूछते हैं। और मैं जब बहुत लोगों से बोलती हूँ तो ऐसा, शहरों में मैंने देखा। पर जब गांव में मैं जाती हूँ तो कोई भी ऐसा प्रश्न नहीं पूछता। ये तो शहर वाले हैं जो खा-पी के मस्त हैं। वो पूछते हैं। गांव वाले नहीं पूछते। गांव वालों की तो कमाल ये है कि उनको अगर पता है

कि हमारी मोटर इधर से जा रही है तो पहले ही रास्ते पे वो लेटे रहेंगे। और मोटर रोक लेंगे और बस खटाखट पार होते हैं वो। क्योंकि उनके लिए, उनको मालूम है कि खाना -पीना ही सब कुछ नहीं है। खाने-पीने में ही संतोष नहीं है । खाने के आगे भी कोई चीज़ है क्योंकि उन्होंने भूख सही हुई है। और वो जानते हैं कि अगर भूख ही सब कुछ चीज़ होती तो हम आज तक जीते नहीं। हालांकि उनकी दशा ठीक करनी चाहिए । वो आप लोगों को ठीक करनी चाहिए, जो आज शहर में बैठे हुए | हैं। लेकिन वो जब तक आप पार नहीं होंगे, जब तक आपकी शक्तियाँ जागृत नहीं होंगी, आप वो चीज़ ठीक नहीं कर सकते। लेकिन ये एक बहाना ढूँढा जाता है। उसके पीछे में छिप कर कहा जाता है कि, ‘माताजी जब तक लोगों की दशा ठीक नहीं होती….’ आपकी दशा क्या है? आप तो मोटरों में घूम रहे हैं। खूब आराम से खा रहे हैं और आप कह रहे हैं कि गरीबों की दशा अच्छी करें। अगर कोई भूखा आदमी मुझसे आकर ऐसा कहें तो मैं उस बात को मान्य कर सकती हूँ। लेकिन मैंने आज तक देखा नहीं कि कोई गरीब आदमी ऐसी बात उठाये। यहाँ पे कलवा से बहुत ही गरीब खानदान के लोग हमारे यहाँ आते हैं और जब भी आयेंगे कोई न कोई फूल ले के आएंगे । मैंने कहा, ‘क्यों बेटे इतना खर्चा करते हो?’ इतने प्रेम से आते रहते हैं और इतने प्रेमी लोग हैं। अभी मैं उनके यहाँ प्रोग्राम में गयी तो जहाँ से मेरी मोटर से मैं गयी हैँ उसमें सारा रस्ता इन लोगों ने बत्तियाँ जलाई थी और वहाँ पहुँची तो सारी बत्तियाँ और इतने गांव के लोग, हजार आदमी इतने प्रेम से वहाँ पहुँचे। एकदम से मेरा तो जी भर आया। मैंने कहा, ‘बेटे इतना तुमने क्यों खर्चा किया ?’ हमारे व्यवस्थापकों से मैंने कहा, ‘बाबा, इनका जो पैसा होता है वो दो। इतना इन्होंने खर्चा किया, इनको पैसा दो।’ कहने लगे, ‘माताजी, हमने तो एक पैसा नहीं खर्चा किया। लोगों को पता हुआ कि आप आ रहे हैं तो ये साहब ने हमको ये भिजवा दिया, उसने वो दिया, जिसका मंडप था उसने अपने आप लगा दिया। चलो माताजी, हमारे आशीर्वाद करो ।’ कभी मैंने देखा नहीं कि उन्होंने हमसे कहा है कि ‘हमें खाने को दो, कि पीने को दो। माँ हमें परमात्मा दो।’ वो लोग माँग रहे हैं और आप लोग उस आड में भाग रहे हैं। आप जिस दिन पार हो जाएंगे आप स्वयं इस चीज़ को पा लेंगे। यही स्थान है जहाँ पर श्री विष्णु और लक्ष्मीजी का स्थान है। और जिस वक्त ये जागृत हो जाता है तब आपको आश्चर्य होगा इन्हीं की बात मैं बताती हूँ, जो कलवा के हैं कि मैंने उनसे कहा कि, भाई तुम रोज मेरे लिए हार लाते हो क्यों इतना खर्चा करते हो। मुझे बहुत दुःख लगता है।’ और हमेशा मैंने देखा है कि एक हार ले के वो आते हैं। मैंने कहा, ‘बेटे, इसका पैसा तो बहुत लगता है। तुम मत लाया करो।’ कहने लगे, ‘नहीं माँ, हम आपसे बता नहीं सकते हमारे साथ एक बड़ा चमत्कार हुआ है।’ मैंने कहा, ‘क्या ?’ कहने लगे, ‘हम पार हो गये उसके बाद, दूसरे दिन सबेरे हमारे पास एक आदमी आया। एक सिंधी आदमी आया और कहने लगा कि आपकी जो जमीन है ये बहुत ही बढ़िया है और ये जमीन की जो मिट्टी है इससे हम इंटे बनायेंगे । क्या तुम हमें ये बेचोगे ?’ और हर रोज वो मिट्टी उठाके ले जाते हैं और हमें बहत सा रुपया देते हैं।’ उनके अन्दर की लक्ष्मी जो जागृत हो गयी, तो पैसों का क्या ? पैसा माने संपत्ति आपके अन्दर आ गयी। अगर आप पार हो जाये तो आपके अन्दर स्वयं साक्षात लक्ष्मी जागृत होती है। आपके यहाँ से सहजयोगी बता सकते हैं जो कि जिनकी नौकरियां नहीं थी उनके पास भी पैसे की भरमार हो बहुत गयी। उसकी वजह ये है कि आपके अन्दर की लक्ष्मी जागृत होनी चाहिए। अब लक्ष्मी का मतलब पैसा नहीं होता। लक्ष्मी का मतलब सन्तोष होता है। मनुष्य के अन्दर वो एक तरह से सन्तोष आता है। मैं देखती हूँ करोडोपती लोग मेरे पास आते हैं, करोडोपती लोग, लेकिन कहते हैं, ‘माताजी, आप आईयेगा हमारे घर में। हमारे यहाँ वो बिजनेस खोल रहे हैं। आपके आशीर्वाद से अच्छा चलेगा।’ अभी भी उनको ये लगता है कि और रुपया आये। और मैंने कहा कि, ‘इन्कमटैक्स तो ऐसे ही पड़ रहा है काहे को बिजनेस और खोल रहे हो? उससे और परेशानी होगी। ‘कोई बात नहीं माताजी, वो तो हम इन्तजाम कर लेंगे।’ ये पैसा नहीं होता। पैसा का मतलब है सन्तोष। पैसे का मतलब है लक्ष्मी का सुख। लक्ष्मीजी स्वयं माँ है, लक्ष्मी के एक हाथ में दान है, एक हाथ में आश्रय है। दो हाथ में कमल है। दो हाथ में कमल हैं माने जिस आदमी के पास लक्ष्मी है वो कमल जैसा, प्रेम और गुलाबी कमल है। वो प्रेम का हो सकता है। उसके घर में आप जाईय तो एक तरह की उसके अन्दर कोजिनेस होनी चाहिए। उसके घर में बैठें तो उसके अन्दर से प्रेम उमड़ना चाहिए। उसको मैं रईस मानती हूँ जिसका

घर हमेशा खुला हो। मैं अपने पिता की बात बताती हूँ जो कि ‘लिजेंड्री’ लोग सोचेंगे। मेरे पिता का घर सुबह-शाम चौबीस घंटे खुला रहेगा। वो भी रिइलाइज्ड आदमी थे। वो कहते पता नहीं कभी, कौन भूला – भटका आ जाएगा उसको पानी की जरूरत पड़ जाए, कुछ पड जाए तो उसको अन्दर आने दो। और हमारे फादर के यहाँ कभी चोरी नहीं, कभी नहीं। और हमारे घर का जितना भी सामान था वो सारा कॅम्युनल था। माने जितनी कार्पेट थी वो आपकी बाहर जाती थी, जरूरतमंद लोगों के लिए और उसी में उनको आनन्द आता था। फिर यही नहीं याद रहता था कि किसको दी थी कार्पेट पिछले शादी में। उनका सारा ही सामान बाहर घूमता रहता था। और वो कभी-कभी घर पे आ जाता था। ज्यादा तर वो घूमते रहता था। उनके घर गया, वहाँ से उठा लाओ, उनके घर गया, उनके यहाँ से उठा लाओ। उनको ये कभी मालूम नहीं था कि अपनी जो भी चीज़ है वो संपत्ति को जिसको कहना चाहिए अपनी संपदा उसको खुद ही अपने बाल-बच्चों के साथ और बैठ कर के एन्जॉय करें। कभी नहीं। और वही बात मैं आज देखती हूँ कि आज हमारे कैपिटलिस्ट लोगों में ये बात दिमाग में आ जाए कि ये हमारे अकेले एन्जॉय करने की चीज़ नहीं है। लेकिन सारे समाज को बाट कर के खायें तो सारे प्रश्न समाज के एकदम छूट जायेंगे। उनको लक्ष्मीपती होना चाहिए। पैसा वाला नहीं होना चाहिए। पैसे वाले को कोई नहीं पूछता है। उसको कोई भी नहीं जानता है। उसके बच्चों को तक कोई नहीं मानता है। जब तक आप हमारे विपरीत अपने होते नहीं और सहजयोग ये पूरी तरह से कैपिटल्जिम है क्योंकि आपकी पूरी शक्ति जागृत होती है और पूरी तरह से कम्युनिज्म है । क्योंकि इसका वितरण करना पड़ता है। यही है कि जिसमें कि दोनो चीजें मिल जाती है। और ये आपके नाभि चक्र के जागृती से होता है कि मनुष्य पुरी तरह इस शक्ति को एकत्रित कर लें और पुरी तरह से शक्ति को जब तक वितरित नहीं करता। जैसे कल में यहाँ पौने ग्यारह बजे तक थी और एक साहब दस बजे आ कर कहने लगे कि, ‘माँ, अब आप घर जाओ आपको बहुत देर हो गयी है।’ लेकिन मेरे अन्दर इतना ज्यादा कल वाब्रेशन्स का जोर था कि मैंने कहा कि नहीं ये बाँट ही के जाऊंगी।’ नहीं तो मैं यहीं खड़ी-खड़ी देती रहँगी। मेरे घर में बच्चे भी कहते हैं कभी-कभी दो-दो बज जाते हैं, तीन-तीन बज जाते हैं । मुझे कभी थकान ही नहीं आती। रात-दिन मुझे इतना मजा आता है कि मैं देती ही रहूँ। क्योंकि खुद मैंने बहुत पाया है। और इसलिए मैं देती हूँ। अगर मैंने पाया नहीं होता तो मैं नहीं देती। लेकिन मैंने ये अनेक चीज़ों में पाया। और इतना पाया, इतना भरपूर पाया कि पूरे तरह से मैं देना ही चाहती हूँ। ऐसा आदमी जब उसकी जागृत हो जाती है लक्ष्मीजी, लक्ष्मीजी शब्द को आप समझें | मैं पैसे की बात नहीं कर रही हूँ क्योंकि पैसा बड़ी घिनौनी चीज़ है। लेकिन लक्ष्मी साक्षात देवीजी हैं। जब ये लक्ष्मीजी आपके अन्दर जाग जाती है, ऐसा आदमी चमकता है। एक भी आदमी ऐसा कहीं हो जिसे कि जन्मजन्मांतर तक लोग याद करते हैं। उसको बार-बार लोग याद करते हैं। अरे, वो वो हैं, वो आदमी हैं। जैसे कि हम अपने पिता का आपसे बता रहे हैं, जब उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे भाई की शादी थी। हम देखते हैं कहीं से घी चला आ रहा है, कहीं से कुछ चला से कुछ चला आ रहा है। हम लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब लोग कौन ला रहे हैं। हमने कहा कि ‘ भाई ये क्या है ?’ कहने लगे, ‘अरे आपके पिताजी, वो तो भगवान थे । उन्होंने तो हमारे ये बच्चे को बचा लिया। उन्होंने तो हमारा ये कर दिया।’ रात-दिन वो रत रह चुके दुनिया में। उसी तरह के आप भी हो सकते हैं अगर आपके नाभि आ रहा है। कहीं चक्र जागृत हो जाए, आपमें ये कॉन्फिडन्स आ जायेगा | उसके उपर में , शायद ये जो है नीचे में ये स्वाधिष्ठान चक्र है। इस चक्र में श्री ब्रह्मदेव का स्थान है। और इससे आप सृजन करते हैं। विचार करते हैं। आगे की सोचते हैं। ये भी चक्र हमारे यहाँ, कल तो बहुत ही आप लोगों का वो चल रहा था और सबका पकड़ा हुआ था स्वाधिष्ठान चक्र क्योंकि आप लोग बहुत जरूरत से ज्यादा कल सोच रहे थे। आज जरा ठण्डी हवा है। ये स्वाधिष्ठान चक्र जब पकड़ जाता है याने स्वाधिष्ठान पे ज्यादा प्रेशर पड़ जाता है। तभी आपको वो बीमारी होती है जिसे डायबिटिज कहते हैं। उसके बाद आते हैं। मतलब अब थोड़े- थोड़े में सब चक्र बता रही हूँ मैं। उपर में इसके जो है ये हृदय चक्र होता है

जिससे कि आपका कार्डिऐक प्लेक्सस कंट्रोल होता है। इस हृदय चक्र में जगदम्बा का स्थान है। जगदम्बा जो कि सारे जगत की अम्बा है। माता दुर्गाजी, उनका स्थान है। और माता दुर्गा वहाँ बैठी हुई हैं। जिस वक्त आपकी रक्षा का स्थान तुटता है, जब आप सुरक्षित महसूस नहीं करते, जब आपको घबराहट हो जाती है, जिस वक्त आप भूल जाते हैं कि आपकी माँ जगदम्बा है उस वक्त ये चक्र चलने लग जाता है। और ये चक्र चलने की वजह से ही आदमी में श्वास, बहतों को जो श्वास की बीमारियाँ हैं या हृदय की बीमारियाँ हैं वो इसी चक्र के कम हो जाने से या इस चक्र में गति अवरोध हो जाने से होता है। उसके ऊपर का चक्र है जिसे कि हम विशुद्धि चक्र कहते हैं। इस चक्र के पहले राइट साइड में जगह बनी हुई है वहाँ पर श्रीराम का स्थान है। क्योंकि श्रीराम अपने को अवतार नहीं मानते थे इसलिए उनका स्थान साइड में है। अब आप जानते हैं। वो कि विष्णुजी ने दस अवतार लिये। और दस अवतार लेते वक्त उनका जो एक अवतार राम का हुआ वो उस जगह पहुँचा, भी हमारे अन्दर हैं। जितने भी अवतार हये हैं ये हमारे लीडर्स हैं। और ये लीडर्स हमारे अन्दर आ कर के हमें मार्ग बताते हैं। और यही जो बीच का पथ है जिसे हम सुषुम्ना नाड़ी कहते हैं, यही वो महालक्ष्मी का पथ है और जिससे हमारी उत्क्रांति होती है, इव्होल्यूशन और जो हमारे दस अवतार विष्णु के हुये हैं वो बिल्कुल हमारे इव्होल्युशनरी हैं। अगर मेरी किताब छप जायेगी तो आप देखियेगा कि उसमें मैंने बड़ा भारी विवेचन दिया हुआ है। लेकिन उसका जो सबसे संपूर्ण अवतार माना जाता है, आठवा अवतार जिसको कि हम श्रीकृष्ण के नाम से जानते हैं | उनको हम संपूर्ण इसलिए कहते हैं क्योंकि वो सारे संसार के साक्षी हैं, और वो सारे संसार के लीलास्वरूप देखते हैं। उनका इस जगह कण्ठ में पीछे मिलता है। अब कल बहुत | लोगों का ये हिस्सा दु:ख रहा था, तकलीफ थी। अब ये हमारा बड़ा महत्वपूर्ण चक्र है। क्योंकि इसी चक्र के कारण हम मनुष्य हये। हमारी गर्दन पहले झुकी हुई थी, वो जब ऊपर खड़ी हो गयी इस वक्त ये चक्र चालू हुआ। तब हम इसे कह सकते हैं कि हमारा विशुद्धि चक्र जो है ये जागृत हुआ। ये कृष्ण के जमाने में, माने कृष्ण छ: हजार साल में हुये। छ: हजार वर्ष पहले हये थे। छ: हजार वर्ष पहले मनुष्य में ये धारणा आयी कि मैं मानव हूँ। पूरी तरह से हूँ। और जब ये श्रीकृष्ण की चेतना फैली तब पहली मर्तबा डिप्लोमसी का फैलाव आया। कृष्ण ये डिप्लोमसी का अवतरण है। डिवाइन डिप्लोमसी का अवतरण है। राजकारण के बिल्कुल पूरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतम सारे मार्ग जानने वाले श्रीकृष्ण। उनकी गीता कुछ नहीं पूरी | डिप्लोमसी है। गीता पे बड़े आख्यान लोग देते हैं। मुझे आती है हँसी। कल मैंने आपसे कहा था इसमें तत्व कितना है ये इन लोगों ने जाना नहीं। एक-दो शब्दों में मैं आपको गीता का सूत्र बता दें और आप इसे देख लीजिए। गीता में ने कृष्ण सहजयोग ही बताया। उसने कहा है कि ‘इसे अपने अन्दर खोज यही कृष्ण ने अर्जुन से कहा । पर अर्जुन था, आप उसे तु मिडियोकर समझ लीजिए और उसने कहा कि ‘भाई , तु कह रहा है कि परमात्मा को खोज और इधर कह रहा है कि युद्ध जा।’ उन्होंने कहा था कि ‘तु साक्षी स्वरूप हो पहले। और उसके बाद युद्ध में जा। तो युद्ध में साक्षी रूप से देखेगा कि जिससे कोई मरेगा नहीं और कोई जियेगा नहीं।’ लेकिन अर्जुन की समझ में नहीं आया। तो इन्होंने अपने बाप का नमुना है तु इसे कहते हैं। मैं तो इसको कहती हैँ कि बाप का तरीका है कि एक लड़का है बाहर बैठा हुआ, और गाड़ी में और खूब जोर से हंटर से मार रहा है और घोड़ा पीछे । बाप बाहर आता है और कहता है, ‘बेटे, घोड़े को आगे कर ले तभी चलेगी तेरी गाड़ी।’ तो लड़का कहता है ‘ये कैसे? मैं तो गाड़ी को मारुंगा।’ बाप कहता है, ‘अच्छा, मारते रह, मारते रह। लेकिन चित्त घोड़े पे रखना।’ इसी तरह इन्होंने २-३ ोॅबसर्ड कंडिशन कृष्ण ने डाल दी और सबको बेवकूफ बनाया हुआ है। लेकिन में माँ हूँ तो मैं असली बात बताऊंगी। असली बात नहीं बताऊंगी, लेकिन घोड़ा भी आगे करूंगी। क्योंकि कृष्ण है न वो जानता है अपने लड़कों को और इतने छः हजार वर्षों से उसने आप सब लोगों को ठीक किया ही है। पहले तो उसने कर्मयोग में आपको पकड़ लिया। उसने कहा कि जो भी कर्म करना है करते रहो, लेकिन परमेश्वर पे छोडो । ये अॅबसॅड कंडिशन है ये हो ही नहीं सकता। ये अॅबसॅड कंडिशन है। कहना कि तुम जो भी कर्म करना चाहते हो करते रहो। ये हो नहीं सकता है। क्योंकि आप आगे देखियेगा कि अपने मस्तिष्क में इगो, सुपर इगो नाम की दो संस्थायें हैं जिससे हम एक अण्डाकृत हो

गये। हम टूटे ह्ये नहीं हैं। और इस वजह से हम जो भी कार्य करते हैं उसमें हमारा ईगो जरूर इनवॉल्व हो जाता है। और जब कोई भी कार्य करते हैं हमारा इगो बढ़ता है। हर एक कार्य से हमारा ईगो निगडित हो जाता है। हम अन्दर से ही। हमारा ईगो बढ़ता है और वो है ही। मेरा मतलब अहंभाव से नहीं अहंकार जो हमारे अन्दर में बैठा हुआ है जो हमसे कार्य करवाता है। वो हमारे अन्दर है, लेकिन जब ये टूट जाता है। जब हमारे अन्दर से वाइब्रेशन्स बहते हैं तो लोग कहते हैं कि बह रहा है, आ रहा है, जा रहा है, जग रहा है, हो रहा है। कोई ऐसा नहीं कहता, कोई भी ऐसा नहीं कहता कि हम कर रहे हैं। मैं दे रहा हूँ। मैं कर रहा हूँ। ऐसे कोई भी नहीं कहता। जब आदमी टूट जाएगा तभी वो ऐसा अकर्म में उठ सकता है जो कृष्ण ने कहा है जो कि अॅबसर्ड कंडिशन है। वही कि घोड़ा तो पीछे रहा और आगे मारते रहे । तो बाद में छ: हजार साल बाद तो जानियेगा कि से तो गलत है। अब बहुत आदमी कहते हैं कि ‘हमने बहुत से कर्म सब परमात्मा पर छोड़े हैं। झूठ! हो ही नहीं सकता। जब तक आप छूटियेगा नहीं ये होता नहीं। इस सबको जब आपने मान लिया कि नहीं होता है तभी आप टूट भी सकते हैं । जब टूटने के बाद आप कहते हैं कि हो रहा है, जा रहा है, कर रहा है, बन रहा है। अपने आप घटित होता सब कुछ दिखायी देता है। ये जब हो जाता है तभी हो सकता है। दसरे भक्ति पर भी देखिये कि मैं आपको एक छोटीसी बात बता दें। भक्ति के बारे में उन्होंने कहा है कि पुष्पम, फलम, तोयम जो भी दोगे वो हम ले लेंगे। वो तो ठीक है, ले लीजिएगा, लेकिन देते वक्त क्या करियेगा! देते वक्त कृष्ण कहते हैं कि तु अनन्य भक्ति कर, अनन्य। अब देखिये अनन्य शब्द जो भी संस्कृत जानते हैं वो जानेंगे। दूसरा कोई नहीं जानेगा। माने जब आप पार हो गये, जब आप बूँद, आपकी बूँद सागर में मिल गयी तब भक्ति कर। अनन्य भक्ति ! अब देखिये अॅबसर्ड कंडिशन कैसे जोड़ दी उन्होंने। अब इसका सूत्रपात हमें नहीं लगता था। बड़े-बड़े लेक्चर्स देने से नहीं होता है। यही है क्योंकि कृष्ण जानता था कि बगैर डिप्लोमसी के ये मनुष्य की जो ये उल्टी बिठाई हुई खोपड़ी पता नहीं कब बैठी थी वो कब ठीक होगी। लेकिन मैं माँ हूँ। मैं आपसे बताऊंगी कि नहीं बेटे ये झूठ है। पार हये बगैर कोई काम नहीं होने वाला। पहले पार हो ले। तेरे साथ मैं भी मेहनत करने को तैयार हूँ। जब तक तू पार नहीं होगा मैं तेरे साथ नहीं रहूंगी। लेकिन तू पार हो जा। क्योंकि एक माँ है। कृष्ण का स्थान हमारे विशुद्धि चक्र पर है। और विशुद्धि चक्र से ही ईगो और सुपर ईगो दोनो ही संस्थायें यहाँ तक आती है और इसको बीचोबीच यहाँ पर, इसको कहना चाहिए कि ये आज्ञा चक्र है। महाविष्णु का स्थान है और महाविष्णु का वर्णन हमारे यहाँ देवी भागवत में बड़ा सुन्दर किया गया है। महाविष्णु का अवतरण इस संसार में हुआ है, जो कि जीजस क्राइस्ट के नाम से संसार में हैं। और उसका सबसे बड़ा मुख्य तत्व है क्षमा। जीज़स क्राइस्ट कोई मानव नहीं। उसपे कृष्ण की जो बात है, कृष्ण जिसे कहते हैं कृष्ण शब्द कृष से आया। कृष्ण का मतलब कृषी करने वाला। राम इस सारे संसार में चल के गये। उन्होंने जमीनों को पावन कर दिया। कृष्ण ने आ कर के यहाँ पर कृषी की। यहाँ पर उसने बीज डाला। उन्होंने अपने गोकुल के उसमें जो रास रचाया ये सब सहजयोग का उन्होंने बीज डाला। और कृष्ण का नाम ख्रिस्त की तरह से जिसने दिया, जो उसकी माँ थी ‘मेरी’, वो स्वयं राधाजी थी। इसका वर्णन आप चाहे तो आप लोग देवी महात्म्य में पढ़ सकते हैं। जो मार्कडेय स्वामी ने लिखा। मार्कडेय जैसा मार्मिक और मार्कडेय जैसा सूक्ष्म दृष्टि वाला तो दूसरा बेटा ही मिलना मुश्किल है। दूसरा उसके मुकाबले में हमारे शंकराचार्य हैं। वो भी क्या कमाल के थे। पर वो इतने अभिभूत हैं वहाँ पर, वो माँ के ही वर्णन में लेकिन कमाल का वो भी । मैं तो आश्चर्य करती हूँ कि एक-एक हाँ, हं, हीं सब चीज़ों पर उन्होंने ऐसा वर्णन कर के रखा है कि मैं स्वयं ही आश्चर्यचकित हँ कि ये सब इन्होंने कैसे जाना। इन दो महान लोगों को, बहुत ही बड़ी चीज़ है, मार्कडेय स्वामी और श्री शंकराचार्य । और ये भी अवतरण ही हैं। जो हसन और हसेन नाम से बाद में आयें। और जो बुद्ध और महावीर के नाम से रहे। वही, एक ही अवतरण इन तीनों चीज़ों में है। ये सारा इंटिग्रेशन आज मैं आपको समझा रही हूँ और बता रही हूँ। क्योंकि आज आप हॉल में बैठे हैं और मेरी बात सुन रहे हैं। ईसामसीह के जमाने में तो तीन

साल के अन्दर के, पकड कर के आप ही जैसे इन्टिलेक्चुअल्स ने उसको फांसी दिया। आज मुझे कोई फांसी नहीं देगा । इतना मैं जानती हूँ। हालांकि काफी मुझे परेशान लोग करते हैं। उसका कोई हर्ज नहीं । अब फांसी भी दे दें, मैं देखती हूँ कि अब मुझे कौन फांसी देगा? ईसामसीह ने अपने क्रूस से, अपनी माँ से एक बात पूछी थी, ‘मदर, व्हेअर इज़ युअर सन ? और मुंह मोड़ के उसने भगवान से पूछा, ‘व्हेअर इज़ माय मदर?’ ये बड़ा भारी उनका सेंटेंस है। बहुत बार जब आप लोगों को आज्ञा चक्र की पकड़ होती है तब क्रिस्त से मुझे ये पूछना पड़ता है। वो बड़ी सूक्ष्म चीज़ है। बड़ी सूक्ष्म संवेदना है। उस वक्त में वो एक खेल खेल गये। एक नाटक खेल गये और उसी में उन्होंने कृष्ण की बात तय की और समझाया कि, ‘नैनं छिन्दति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक:’ सशरीर वो उठ कर के, रिझरेक्शन, जब उनका रिझरेक्शन नहीं हुआ था उनके शिष्यों ने मार जान आफत कर दी। पच्चीसो बीमारों को लेकर आये। इसको ठीक कर, उसको ठीक कर, कोई उनकी बात नहीं मानता था। जब उनका रिझरेक्शन होते देखा कि कैसे शरीर उठकर के चला गया। क्योंकि स्वयं उनका शरीर साक्षात गणों से बना है और वो गणेशजी का ही अवतरण हैं। किसी के बाप के ईसामसीह नहीं थे। जो कि हम कहें कि हम ही बड़े ईसाई बने हो। और किसी के बाप के गणेशजी भी नहीं हैं। जब तक आप गणेशजी के नहीं हैं आपका गणेशजी से कोई सम्बन्ध नहीं है। और अगर आप श्री गणेशजी के हैं तो श्रीकृष्ण भी आप ही के साथ हैं। और सभी आपके साथ हैं क्योंकि ‘दोज ह आर नॉट अगेन्स्ट मी आर विद मी।’ सब एक ही संस्था में, सातों की सातों संस्थायें आपके साथ खड़ी हुई है। इसके अलावा इन दो चक्रों पे खड़े हये हैं । दो नाड़ियों पे खड़े हये हुनुमानजी और भैरवनाथजी भी आपकी मदत करते हैं । उसके उपर आप देखिये कि आज्ञा चक्र पर मैंने आपको महाविष्णु का अवतरण बताया, ईसामसीह। ये एक विशेष रूप से बनाये गये थे। और इनको, ये जो पिता की बात हमेशा कहते हैं। ये कृष्ण ही की बात है, कृष्ण के लिए पिता कहते हैं। उनका नाम जीज़स भी यशोदा से हआ है। तो फिर राधा जी ने सोचा कि यशोदाजी के बारे में कहीं भी कुछ कहा नहीं गया इसलिए उनका नाम उन्होंने जीजस, यशोदा, येशु, जेसु जैसे हम लोग यशोदा को जेसु कहते हैं। कुछ देशों में युगोस्लाविया को जुगोस्लाविया कहते हैं। इस तरह से येशु और जेसु होता है। इस तरह उन्होंने उनका नाम जेसु ही रखा था । लेकिन गोकुल में यशोदा को जसोदा ही कहते हैं । इसलिए उनका नाम जेसु, जीजस है। जीजस हमारे ही अपने कृष्ण के एकलौते बेटे जो राधा जी उन्हें वैकुंठ में पैदा किया था। एक अंडा रूप से, एक विशेष रूप से और उनको विशेष रूप से श्रीकृष्ण ने एक बड़ा भारी वरदान दिया था कि मेरे अर्पित जो कुछ भी होगा उसका सोलहवा हिस्सा देखिए में तुम्हारे लिए न्यौच्छावर करता हूं। और तुम मेरे से ऊपर प्लेस्ड (स्थापित) होंगे और सारा संसार तुमको आश्चर्य मानेगा। और ये लोग ख्रिश्चन बनाने जो निकले हैं इनके बाप-दादे और पड़-दादे भी कभी नहीं समझ सकते कि ईसामसीह कौन है? ये तो पढ़ने को भी तैयार नहीं, देखने को भी तैयार नहीं हैं कि हमारी संपदा में और हमारी धर्म- पुस्तकों में और हमारे बड़े-बड़े महान लोगों में कितना ईसाह पे काम किया हुआ है और आज भी हमारे लिए पूजनीय हैं। आपको आश्चर्य होगा कि लंडन में ईशु-मसीह पे आज कल इतना गन्दा एक पिक्चर बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईशु-मसीह का उनके माँ से बुरा सम्बन्ध था। ऐसा अपने देश में कोई हिन्दुस्तानी बर्दाश्त नहीं कर सकता। चाहे वो ईसाई हो चाहे नहीं हो। वहाँ बर्दाश्त हो सकता है। अमेरिकन देख सकते हैं, इंग्लिश देख सकते हैं, जर्मन देख सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी एक भी आदमी ऐसे पिक्चर पे नहीं जाएगा और सारा देश खिलाफ खड़ा हो जाएगा। हालांकि हम लोग कोई इसाई नहीं। ये हमारे देश की पवित्रता की भावना है। और इन्हीं छोटी-छोटी बातों से हम लोग बंधे हुए हैं । अभी मेरे शिष्य आये ह्ये हैं लंडन से, वो कहते हैं कि आप लोग कितनी छोटी-छोटी चीज़ों पे चलते हैं। आपके यहाँ कितना प्रोटोकॉल चलता है । आपके यहाँ किस तरह से किसीको बहन मान लिया। अभी हमारे यहाँ कोई पड़ोसी थे तो मैंने कहा कि ये मेरे दामाद के बड़े भाई हैं। उन्होंने कहा ‘इनको बड़े भाई हैं क्या? आप तो कह रहे थे कि वो एक ही लड़का है।’ मैंने कहा, ‘हमारे यहाँ वैसे कहा जाता है?’ उनकी ये समझ में नहीं आता है कि हमारे छोटे भाई -बहन, किस तरह हमारी सोसायटी बनी हुई है। किस तरह से हमारा समाज सुन्दरता से बना हुआ है। इसको तोड़ो, इनको खत्म करो, इनसे सीखने का कुछ नहीं। ये मैं आपको बताती हूँ इनसे कुछ नहीं सीखने का ।

उन्होंने थोडा बहुत पैसा इकठ्ठा कर लिया लेकिन अपने को बिल्कुल नर्क के द्वार में डाल दिया है। आप लोग उनसे कुछ सीखो। आपकी संस्कृति को बचाईये, बहुत जरुरी है । ये सारे संसार को बचाने वाली संस्कृति है ये मैं आपसे बताती हूं। और इसके बड़ी पीछे में बहुत अनेक वर्षों की तपस्या और अनेक वर्षों की पवित्रता बड़े-बड़े महान लोगों की लगी हुई है। और इसको आप ऐसे ही मूर्खता से नष्ट न करें। इसके बारे में आप पढ़ना नहीं चाहते तो मत पढ़िये। लेकिन इसको समझने मत की कोशिश करें। इसके ऊपर में आप जो सबसे ऊंचा सहस्रार है, जिसको की तोड़ा जाता है । इसमें कल्कि का अवतरण है। जो कि कलेक्टिव कॉन्शसनेस को लाता है। जो कि सारी समग्रता को लाता है। और सारा के सारा पूरा संसार का जो भी नक्शा है उसको एक सूत्र में बॉँधता है। वो उपर में कल्कि का अवतरण है। सबसे ऊंचा स्थान मैंने आपसे कहा था सदाशिव का होता है। जब ये चक्र खुल जाता है तब सदाशिव का चक्र वो खुल जाने की वजह से वहाँ से एक छोटी सी नाड़ी जो कि हृदय पे उतरती है वहाँ पर सर्वव्यापी जो सूक्ष्म शक्ति है वो उसमें से गुजर कर के इसमें आ जाती है। आपको समझाना हो तो ऐसे समझ लें कि अगर आप यहाँ पर बैठे हये हैं तो यहाँ हर तरह का चित्र है और हर तरह का गाना चल रहा है लेकिन आपको सुनायी नहीं दे रहा। आप अगर यहाँ रेडिओ लगा दे तो आप गाना सुन सकते हैं। आप टेलीविजन लगा दीजिए तो आप देख सकते हैं। लेकिन सब चीज़ सूक्ष्म में फैली हुई आपको नहीं मिलता । उस सूक्ष्म को पकड़ने वाली शक्ति जब आपके पास हो जाएगी तभी आप उसे पकड़ सकते हैं। अब सिर्फ आपको करना इतना है कि इस चीज़ को आप पा लें। इसको क्रिटिसाइज करने से और अपनी अकल बढ़ाने से कुछ नहीं होने वाला। ऐसे बड़े अकलमंद और अति शहाणे जिसको कहते हैं दुनिया में बहुत हो गये। उनमें से आपको नहीं होना है। आज ही एक साहब से मैंने बताया कि ‘कोल्हापूर में एक साहब है। मेरे पीछे पड़ गये। मेरी जान को लगे हैं मैं क्या करूं?’ उन्होंने कहा, ‘माताजी, हर एक वहाँ की संतो का यही है। हर एक संत के पीछे में कुछ न कुछ एक हजार तो ऐसे ही दुष्ट पैदा हये हैं। और ढोंगी लोग पैदा हये हैं और उनके साथ में और हजारों लोग उसके पीछे पड़े हैं। उसके जान को लगे हैं । ‘ मैंने कहा, ‘चलो मेरे को तो आज के लिए मच्छरों जैसे लगते हैं। उससे ज्यादा उसका महत्व नहीं। लेकिन आप लोग कम से कम समझदारी रखें। क्योंकि मेरे लिए और कुछ नहीं। मेरे लिए सिर्फ ये है कि मेरे बच्चे, मेरे जो कुछ आज गिरीकंदरों में अनेक वर्षों से, हजारों वर्षों से खोज रहे थे वो आज यहाँ बैठे हये हैं। वो इसे प्राप्त करें। मेरे पति कभी कहते हैं कि ‘तुम ये सब क्या कर रही हो। इतनी क्यों मेहनत करती हो।’ तो मैं कहती हूँ कि, ‘मैं सन्तों की सेवा कर रही हूँ।’ तो कहते हैं कि ‘मुझे तो कोई सन्त नहीं दिखाई देता।’ तो मैंने कहा कि , ‘ये आज कल मॉडर्न टाइम्स है, सब सूट-बूट पहन के आते हैं। लेकिन है तो सन्त।’ अगर सन्त नहीं होते तो मेरे दरवाजे क्यों आते? ये सन्त ही हैं और इसलिए मैं अपने को बड़ी भाग्यशाली समझती हूं कि इतने सन्त हैं। और सच बताऊं मैं अपने से बहुत सन्तुष्ट हूं कि कभी भी, किसी भी जन्म में अनेक अवतरण में मैंने कभी भी इतना कार्य नहीं किया और कभी भी इतने लोग पार नहीं हुए मेरे हाथ से। क्राइस्ट के भी कोई भी एक भी ईसाई पार नहीं हुआ। और हर तरह कोशिश करने से भी बहुत कम लोग पार होते थे। आज ऐसा बड़ा सुन्दर समय है। जब इतने लोग हाथ से पार हो रहे हैं। सिर्फ जरासा आप उसमें जम के बैठिये। इसमें थोडी बैठक चाहिए। आप जानते हैं कि संगीत के लिए भी बैठक चाहिए। फिर परमात्मा का संगीत सुनने के लिए थोड़ीसी बैठक चाहिए। आप ही को आनन्द आयेगा, आप ही को सुख आयेगा। कल बहुत गड़बड़ हो गयी। किसी को मैं ठीक से पार नहीं कर पायी । इतने लोग आयें हैं । कुछ नये तरह का अनुभव है। मैं ये चाह रही थी कि आप लोग मेरी तरफ हाथ करके बैठें, आपमें से हो सकता है कोई अगर बैठे हो तो जिसने पा लिया होगा। अपना जूता उतार लें। देखते हैं थोडी देर बैठिये। और उसके बाद अगर बन पड़ा तो मैं स्वयं ही आती हूं। आप लोगों को सबको एक-एक देखती हूं मैं। आप अपनी जगह बैठे रहियेगा। मैं टाइम देने के लिए तैयार हूँ। आप भी थोडे टाइम से बैठिये। मैं चाहती हूं कि जो लोग यहाँ बैठे हैं सबको मैं पूरी तरह से आशीर्वादित करूं । आज नहीं पार हये तो कल फिर आना यहाँ पर। कल यहाँ संगीत है। शाम को शोभा गुर्टू और कुछ आर्टिस्ट को बुलाया है। आपको सबको यहाँ

आना होगा। कल आप लोग जरूर आये यहाँ पर। और यहाँ पर संगीत सुने। और संगीत के वक्त भी मैं कोशिश करूंगी कि संगीत के द्वारा आपको पार करने का प्रयत्न करूं। क्योंकि शोभा गुर्टू भी पार हो गयी है। और वो जो बाकी के जितने भी | संगीत वाले हैं वो भी पार हुये हैं। अनेक लोग इस तरह से पार हो गये हैं। बड़े-बड़े लोग यहाँ पर पार हये हैं। हमारे मा.जॅस्टिस वैद्य भी बड़े ही ऊंचे सहजयोगी हैं। और वो एक क्षण में पार हो गये। उनकी कमाल की अनुभूतियाँ हैं। शायद वो भी कल आ रहे हैं। वो भी इस मामले में बतायेंगे। बड़े ही सज्जन है। बड़े ही विद्वान और बड़े ही नम्र हैं। वो भी कल आ रहे हैं। ऐसे अनेक, कोलकाता हायकोर्ट के मित्रा; चीफ जॅस्टिस वो भी पार हो गये हैं। और बहुत से डॉक्टर्स भी हैं जो पार हैं। और डॉ.नागेंद्रसिंगजी का आपने अगर नाम सुना होगा तो वो भी पार हो गये हैं । ऐसे अनेक लोगों को इसके अनुभव आये हैं। लेकिन ये लोग बहुत शांत चित्त और नम्र लोग हैं। और अपने बारे में बताने में हिचकते हैं | क्योंकि वो सोचते हैं कि हम पार हो गये तो लोग सोचेंगे कि बड़े अहंकार से बातें कर रहे हैं। जितने भी आदमी पार होते हैं, मैं देखती हूँ कि बड़े नम्र हो जाते हैं। और नम्रता के कारण लोग अपने बारे में बताते नहीं। लेकिन आपने देखा होगा कि छोटासा लड़का है। खास पढ़ा लिखा भी नहीं है। एक बारह साल का लड़का है वो भी आपके बारे में बता सकता है कि आपके चक्र कहाँ हैं, कुण्डलिनी कहाँ है। इसके लिए कोई प्रतिष्ठित होना जरूरी नहीं । कोई रईस होना जरूरी नहीं । कोई गरीब होना जरूरी नहीं । जिसका अधिकार होगा वो हो जाएगा। आज भी और कल भी। और आप सबको मेरा निमंत्रण है पूरी तरह से आप आयें। और जो सहजयोग में पार हो गये हैं और जो सहजयोगी हो गये हैं उन लोगों से बिनती है कि आप सब नाम दे दें अपना यहाँ पर| इसके अलावा भारती विद्याभवन में हर मंगलवार को शाम को हमारे सहजयोगी लोग वहाँ पर लेक्चर करते हैं । और मेरे लेक्चर के टेप सुनाते हैं। इसके अलावा आपको कोई भी प्रश्न हो, किसीको पार करवाना हो, कोई बात हो तो आप जा सकते हैं। और ये लोग स्वयं समर्थ हैं। ये लोग सब मिल कर के आपकी पूरी मदत करेंगे। किसी को कोई अगर बीमारी हो तो वो भी जा सकते हैं। और सब काम फ्री हैं। आपको इसके लिए पैसा देने का नहीं है क्योंकि ये आपके माँ का प्यार है। और इसमें पैसे की कोई बात नहीं । आपको बहुत बहुत धन्यवाद !