God and Creation

Caxton Hall, London (England)

1977-11-28 God and Creation Caxton Hall London, UK Opt Version, 86'
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                                         परमात्मा और रचना 

 कैक्सटन हॉल, लंदन 1977-11-28

जैसा कि गेविन ने आपको पहले ही विस्तार से बताया है कि आज का विषय वास्तव में एक बहुत विस्तृत विषय है और इस विषय को समझने के लिए एकाग्र चित्त होना होगा। और जैसा कि उन्होंने आपको पहले ही बताया है कि यह मेरा व्यक्तिपरक ज्ञान है जो आपका भी हो सकता है। और आपको इसे अपनी चैतन्यमयी जागरूकता से ही सत्यापित करना होगा। क्योंकि यही एकमात्र ऐसी जागरूकता है जो आपको पूर्ण परिणाम दे सकती है। जैसा कि मैंने आपको बताया है, मानव जागरूकता अभी भी अधूरी है, जब तक आप आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से चैतन्यमयी जागरूकता प्राप्त नहीं करते, जिसमें आत्मा आपसे बात करना शुरू कर देती है, आप सत्य को सत्यापित नहीं कर सकते। तो यह व्यक्तिपरक ज्ञान के सबसे आवश्यक पहलुओं में से एक है। कोई भी कुछ भी कहता है, उस पर बिल्कुल भी विश्वास करने की जरूरत नहीं है। और जैसा कि मैंने आपको बताया है कि आपको मेरी बातों पर भी विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इसे नकारा भी नहीं जाना चाहिए क्योंकि जैसा कि मैंने आपको बताया कि यह एक बहुत ही सूक्ष्म विषय है और व्यक्ति को इसमें थोड़ा समझने वाला होना चाहिए ना की बस स्वीकार कर लेने वाला शायद कुछ लोगों के साथ। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता। भले ही आप इसे थोड़े समय के लिए स्वीकार कर लें, अगर आपको यह पसंद नहीं है तो आप इसे बाद में छोड़ सकते हैं। लेकिन इसके खिलाफ किसी तरह का व्यवहार न करें। मैंने अपने 8 व्याख्यानों में भारत में इस विषय पर बात की है और यहाँ मुझे एक व्याख्यान देना है। तो यह आपके लिए एक परख है। मेरे लिए यह खुशी की बात है। मुझे उम्मीद है कि आप इसे पसन्द करेंगें।

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि ईश्वर वही है जो वह है। हम उसे जान ही सकते हैं। हम उसे ढाल नहीं सकते। हम उसे अपनी धारणाओं, अपने विचारों, अपनी व्याख्याओं के अनुसार नहीं बना सकते। ईश्वर के पास तीन शक्तियां हैं जो और भी परे हैं। उसके पास जो पहली शक्ति है [अस्पष्ट] अभिव्यक्ति [अस्पष्ट], या जैसा कि मैं इसे कहती हूँ प्रभामंडल के रूप में। उनकी तीन आभाएँ हैं जो उनसे परे हैं, और तीन आभाएँ हैं जो उनके सामने हैं और वह बीच में है। आप देखिए, इस भाषा का प्रयोग करना पड़ता है क्योंकि अन्यथा आप नहीं समझते हैं। उसके पीछे या उसके ऊपर या उससे परे जो तीन शक्तियाँ या तीन आभाएँ प्रकट होती हैं, उनमें से पहली है शाश्वतता (नित्यता)। वह शाश्वत है। उसका शाश्वत होना रुक नहीं सकता। वह ऐसा बना है। यही उसका स्वभाव है। वह वही है। वह नित्यता के उस स्वभाव को त्यागना चाहे तो भी नहीं कर सकता। तो वह एक नित्य अस्तित्व है जो परे है। यहां तक ​​कि अगर वे ऐसा कह भी दें कि, “मैं छोड़ता हूँ, यह सब बकवास है।” वो नहीं कर सकते। उसने अपने आप को अपने आप में बांध लिया है। [अस्पष्ट] समझने के लिए। तो वह एक शाश्वत अस्तित्व है। दूसरे, वह अनंत है। वह अनंत है और उसकी अनंतता को चुनौती नहीं दी जा सकती। वह उनकी अपनी शैली है। वह चाहे तो परिमित के माध्यम से अपनी अनंत अनंतता का उत्सर्जन कर सकता है। उदाहरण के लिए, मैं आपको बताऊंगी कि यहां एक मोमबत्ती है। मोमबत्ती एक सीमित वस्तु है [अस्पष्ट]। लेकिन जब आप इसे जलाते हैं, तो यह प्रकाश उत्सर्जित करती है, यह अनंत तक जाता है। उसी तरह, वह अपनी अनंतता को एक सीमित चीज़ में रख सकता है यदि वह चाहता है या किसी एक व्यक्ति में भी, लेकिन वह अपनी अनंतता से बाहर नहीं निकल सकता है। हम देखते हैं कि ईसा-मसीह के प्रश्न पर लोग चर्चा कर रहे हैं कि वह एक अवतरण है या नहीं। सभी अवतार इसलिए बनाए गए हैं क्योंकि वे ईश्वर के पहलू हैं। और तुम उन्हें समझते चले जाते हो, और तुम उन्हें समझते चले जाते हो, और तुम उन्हें समझते चले जाते हो, इसका कोई अंत नहीं है। यह एक अनंत है। उन्हें परिमित द्वारा नहीं समझा जा सकता है, लेकिन उनका शरीर एक सीमित वस्तु थी जिसमें अनंत को व्यक्त किया गया था। इसे उस दृष्टिकोण से देखें क्योंकि यह आपकी धारणाओं से भी परे है और आपकी समझ से भी परे है। यह वास्तव में परे है। तो उस हिस्से को भूल जाओ। लेकिन हमें कभी न कभी ईश्वर के बारे में बात करनी होगी, है ना।

और तीसरी प्रकृति उनकी सर्वोच्चता है। वह सर्वोच्च है। वह हम सब से परे है। हर कोई जो परमात्मा से उच्च होने का दावा करता है उन्हें जानना चाहिए कि,[अस्पष्ट]। उन्होंने ही मनुष्य को सर्वोच्च बनाया है। उन्हें एक वर्चस्व देकर। जब उन्होंने सर्वोच्चता दी है। उनके पास वह होना ही चाहिए। जब उन्होंने आपको सर्वोच्चता दी है, तो उन्होंने आपको एक इंसान बनाया है। आपको सर्वोच्चता देने का मतलब है कि वह आपकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करते है। वह नहीं करते। उन्होने तुमसे आज़ादी का वादा किया है और वह तुम्हारी स्वतंत्रता को बनाए रखने वाले है।

ये ईश्वर की तीन आभाएं हैं, जो मौजूद हैं लेकिन प्रकट नहीं होती हैं। संस्कृत भाषा में इन्हें ‘अव्यक्त’ कहा जाता है। अब तीन अन्य पहलू हैं जो वे प्रकट करते हैं जिन्हें ‘व्यक्त’ कहा जाता है, अर्थात् प्रकट होता है। उसका पहला पहलू यह है कि वह है। वह मौजूद है। वह अस्तित्व में है। वह हर समय वहां है। इस पहलू को स्वयं अस्तित्व के रूप में ‘स्थित’ कहा जाता है। तो यह पहलू हमें भी अस्तित्व की शक्ति देता है। इस शक्ति से, यह ब्रह्मांड, यह सारी सृष्टि मौजूद है। चूँकि वह अस्तित्व है, वह वो सब कुछ हटा सकता है जिसे उसने अस्तित्व में बनाया है। अगर वह चाहता है कि उसके पास यह सब हो या उसके पास इसमें से कुछ भी नहीं हो या इसमें से कुछ थोड़ा भी हो। हम उसके अस्तित्व को चुनौती नहीं दे सकते। वह जैसा चाहता है वैसा ही बनाता है और अगर उसे कुछ पसंद नहीं है तो वह नष्ट भी कर देता है। ईश्वर का दूसरा पहलू यह है कि वह एक रचनात्मक शक्ति है। उसने बनाया। उसके पास बनाने की शक्ति है। जिससे उन्होंने इन ब्रह्मांडों की रचना की है। उसने जानवर बनाए हैं। उन्होंने इंसानों को बनाया है। उसने सभी भावनाओं को बनाया है और सब कुछ उसी के द्वारा बनाया गया है। वह विधाता है। ये एक ईश्वर के पहलू हैं जिनके बारे में मैं बात कर रही हूं। केवल एक, वह केवल एक है। और उसके पास तीसरा पहलू है गुण-धर्म। वह निर्वाह (धारण) करता है। वह अपने विवेक से पालन-पोषण करता है। वह इस ब्रह्मांड का पालन-पोषण करता है। आपको आपकी जीवन आधार की क्षमता प्रदान कर निर्वाह की उपलब्धि होती है। जैसा कि मैंने कहा कि कार्बन की चार संयोजकताएँ हैं। इसके चार हाथ हैं, चार संयोजन क्षमता [अस्पष्ट]। यह वह गुण है जो इसे परमेश्वर द्वारा दिया गया है। आप मनुष्य हैं और आपके पास गुण-धर्म है जो संख्या में दस है और उन्हें दस नियमों के माध्यम से बनाए रखा जाना है, जैसा कि हम उन्हें दस आज्ञाएं कहते हैं।

तो ये वे तीन पहलू हैं जिन्हें वह व्यक्त और प्रकट करता है। लेकिन चूँकि पूरा प्रदर्शन वह स्वयं ही हैं इस कारण, वह स्वयं प्रकट नहीं होते है। तो वह क्या करते है? परमेश्वर ये सब कार्य अपनी शक्तियों के माध्यम से करते है। ये तीनों शक्तियाँ। तो वह ऐसा करते है कि, वह स्वयं को उनकी शक्ति से अलग कर लेते है। जैसे जब बीज उगने लगता है या अंकुर फूटने लगता है तब बीज अपने ही बेर (फल) से अलग हो जाता है । उसी तरह, वह अपनी शक्ति को खुद से अलग कर लेते है और शक्ति को स्थिति से बाहर निकलने देते है और वह खुद नाटक को देखते है। वह साक्षी है। वह सिर्फ एक गवाह है। वह अपनी शक्ति का खेल देख रहे हैं। यह अलगाव उसके द्वारा किया जाता है। हम समझ नहीं सकते, मनुष्य यह नहीं समझ सकते कि यह कैसे किया जा सकता है। वह ईश्वर है। वह अपना सारा सार [अस्पष्ट] उस स्थान पर रख सकता है और वह यहाँ बैठ सकता है या वह वहाँ बैठ सकता है। वह ईश्वर है। हमें इसे समझना होगा। और वह अपनी शक्ति को कैसे अलग कर सकते है, क्योंकि हम नहीं कर सकते। जैसे सूर्य में सूर्य की किरण है, चन्द्रमा में चांदनी है, उसी प्रकार ईश्वर के पास ईश्वर की शक्ति है। जिसे हम दिव्य शक्ति कहते हैं। आइए अब देखें कि यह कैसे होता है। अब आप इन सभी चीजों को ध्यान के दौरान घटित होते हुए देख सकते हैं यदि आप जानते हैं कि यह कैसे करना है। लेकिन अभी तक आपको ऐसा नहीं करना है। आपको ऐसा नहीं करना है। आपको पहले स्वयं को सम्पूर्ण बनना है। लेकिन लोगों ने देखा है। वैज्ञानिकों के लिए कुछ चीजों को समझना एक बड़ी समस्या है जैसे कि उस दिन मैं टीवी पर देख रही थी कि सीरियस का एक साथी सितारा है और वे हैरान थे कि अफ्रीका में रहने वाले ये आदिवासी यह कैसे जान पाए थे। यह बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। आखिर वही तो सम्पूर्ण ज्ञान है। सारी किताबें उसी में हैं। यदि आप अपने पुस्तकालय तक पहुंचना जानते हैं तो आप सब कुछ जान सकते हैं। मेरे विचार से छह साल पहले ही मैंने कहा था कि पूरा ब्रह्मांड एक सर्पिल तरह से घूम रहा है। और दूसरे दिन गेविन ने मुझे इशारा किया कि, माँ यहाँ तक कि यही लिखा हुआ है। मैंने हमेशा सूर्य के साथ साथी तारे के बारे में कहा। और आज मैंने आपसे इसके बारे में बात की।

लेकिन मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जो इस धरती पर सिर्फ आपको मोक्ष देने और आपको आत्मसाक्षात्कार देने के लिए आया है, मुझे इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं है कि कितने तारे हैं और कितने साथी तारे हैं। आखिर वे इस खेल [अस्पष्ट] के ठीक बाहर हैं। वे सिर्फ आपके लिए मंच की व्यवस्था कर रहे हैं। आप मंच पर हैं। यह ठीक है कि वे नियत हो गए हैं। हमें उनकी परवाह करने की जरूरत नहीं है। हमें जिसकी परवाह करना है वह है हमारी अपना बोध, हमारा आत्म-साक्षात्कार। ये बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं। जन्मकुंडली क्या है, तारे क्या हैं और यह और वह। बेशक, संक्षेप में मैं आपको बताऊंगी कि वे कैसे बनाए गए थे। यह पूरी तरह से अलग मुद्दा है। लेकिन यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है। हमारा मुख्य उद्देश्य हमारी गुण-धर्म क्षमता और हमारी उत्क्रांति की शक्ति को जानना है जिसके द्वारा हम विकसित होते हैं क्योंकि केवल गुण-धर्म क्षमता के माध्यम से ही ईश्वर हमें विकसित करते हैं।

सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि कोई भी सादृश्य (उदाहरण) पूर्ण नहीं हो सकता क्योंकि हम किसी परिपूर्ण चीज के बारे में उपमा अपूर्ण के माध्यम से दे रहे हैं। ईश्वर के समान कुछ भी पूर्ण नहीं है। तो किसी को सिर्फ समझने की जरूरत है, सिर्फ समझें कि, मैं आपको कुछ उपमाएं दे रही हूं। जैसे मैं बीज या पेड़ कह रही हूँ। लेकिन यह केवल समझाने के लिए सिर्फ एक सादृश्य है। बस इतना ही।

जैसा कि मैंने तुमसे कहा था, वह एक शाश्वत अस्तित्व है। तो ऐसा कुछ भी नहीं है जैसे पहले उन्होने यह शुरू किया और फिर ऐसी बात हुई। ऐसा कुछ नहीं है। अगर कोई चीज हर समय शाश्वत तरीके से आगे बढ़ रही है, तो आप कहां से शुरू करते हैं? आप क्या करते हैं? आप एक बिंदु उठाते हैं और वहां से आप उसका वर्णन करना शुरू करते हैं जब तक कि आप दूसरे बिंदु पर नहीं पहुंच जाते। यही एकमात्र तरीका है जिससे वर्णन किया जा सकता है। तो शुरुआत में जैसा कि मैं अपने व्याख्यान के बारे में कहती हूं, या आप शुरुआत में कह सकते हैं कि हम जहां से उस बिंदु पर आए हैं, इस दुनिया में जो कुछ भी है, सब कुछ, या इस तरह की रचनाएं और पहले की कई रचनाएं और सब कुछ, परब्रह्म नामक अवस्था में है। वह अवस्था जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है। कोई मनुष्य नहीं है, कोई रचना नहीं है, कुछ भी नहीं है। हम भी कुछ नहीं समझ सकते। मैं उस की, जो कि कुछ भी नहीं है, एक बहुत ही सरल प्रकार की समझ देती हूं। उदाहरण के लिए, अगर इस कमरे में यहाँ सब अंधेरा है, और केवल मैं बैठी हुई हूँ। बाहर से देखेंगे तो कहेंगे भीतर कुछ नहीं है। कुछ तो है लेकिन कुछ भी नहीं है। आप इसे नहीं देख पाते हैं। जहां तक ​​आपका संबंध है वहां कुछ भी नहीं है। और इसलिए जब आप इस शब्द का प्रयोग करते हैं तो कुछ भी आपसे संबंधित नहीं है और न ही ईश्वर से। मान लीजिए वह अंधेरे में, पूर्ण अंधकार में बैठे है। वह नहीं जानते कि वह किससे संवाद करे। वह खुद को बिल्कुल भी प्रतिबिंबित नहीं करते है। वह बिना किसी छवि के बस बैठे है।

यदि आप आकाश में देखते हैं, तो आप नहीं पाते हैं कि सूर्य की किरणें इस तरह अलग हो रही हैं। आप इसे कभी नहीं देखते हैं। लेकिन मान लीजिए कोई जेट विमान वहां से गुजर रहा है। आप तुरंत उसी सूर्य की किरणों से परावर्तित reflect होने वाले धुएं की एक लकीर देखते हैं और आप कहेंगे कि हाँ ये सूर्य की किरणें हैं जिन्हें हम देख सकते हैं। इसलिए जब तक कोई परावर्तक  reflector न हो तब तक आप नहीं देख सकते। उसे एक परावर्तक  reflector बनाना है और परावर्तक  reflector बनाने के लिए वह अपनी ऊर्जा को अलग करता है। उसकी अभिव्यक्ति होनी चाहिए। तो वह अपने भीतर प्रकाश पैदा करता है और वह प्रकाश एक परावर्तक पर परिलक्षित होता है। और यह ब्रह्मांड परावर्तक है। आप अब तक उनके द्वारा निर्मित सबसे अच्छे परावर्तक reflector हैं। इस पृथ्वी पर मनुष्य। आप किसी अन्य ग्रह या किसी भी चीज़ की बात कर सकते हैं, किसी को भी उत्पन्न नहीं किया गया है और साथ ही साथ आपको उत्पन्न भी किया गया है। और आपने वह अवस्था भी प्राप्त कर ली है कि अब आप वास्तव में उनके शाश्वत अस्तित्व को महसूस कर सकते हैं। आप उन्हें देख सकते हैं। आप उस अवस्था में हैं। आप सबसे अच्छे परावर्तक हैं जिसे उन्होंने बनाया, बस खुद को प्रतिबिंबित करने के लिए, खुद को संवाद करने के लिए, एक तालमेल रखने के लिए। तो शुरुआत में,  जब वह (ईश्वर) कुछ नहीं था तो वह प्रतिबिंबित नहीं कर रहा था। हम कह सकते हैं कि एंट्रोपी (ऐसी उर्जा का परिमाण जो यांत्रिक उर्जा में परिवर्तित नहीं हो सकता) थी, वैज्ञानिक भाषा में ऐसा हम कह सकते हैं, जहां कोई हलचल नहीं थी। वह अभी सो रहा था। जब कोई व्यक्ति सो रहा होता है तो वह गतिविधि में नहीं होता है। लेकिन जब वह जागता है तो वह गतिविधि में चला जाता है, फिर से सो जाता है। वह एक शाश्वत चीज है जो हो रही है। कि वह सोता है, फिर उठता है, काम करता है और फिर सो जाता है। उसी तरह यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोच सकते हैं जो परब्रह्म अवस्था में सो रहा है और जब वह उठता है तो वह सक्रिय होता है।

तो सबसे पहले जब वह परब्रह्म अवस्था है, तो अब वह क्या करता है? परब्रह्म अवस्था में वह जो करता है कि, वह स्वयं को एक बिंदु पर केंद्रित करता है। वह अपने मन में एक इच्छा रखता है कि उसे करना ही है। तो वह एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करता है। और इसे आदि-बिंदु के रूप में जाना जाता है। आदि का अर्थ है आदिम। वह पहला है, बिंदु का अर्थ है बिंदु। वह स्वयं को प्रथम बिन्दु बनाता है, जिसे आदि बिन्दु कहते हैं। [अस्पष्ट]

अब, परब्रह्म का यह केंद्रित रूप, ‘पर’ का अर्थ है परे, परे है। अंतिम चरण आप [अस्पष्ट] कह सकते हैं। एक छोटा सा स्थान, एक छोटा सा संकेंद्रित बिंदु बन जाता है। जब वह जागता है, जब वह जागता है और वह धड़कने लगता है। उसके शरीर से उसकी तरंगें चलने लगती हैं, उसके अस्तित्व से वे बाहर निकलने लगती हैं, और ये तरंगें घूमती रहती हैं। वे एक गोल घेरा बनाते हैं। परिधि पर ये सभी तरंगें और,  ये तरंगें और कुछ नहीं बल्कि उनकी दिव्य शक्ति हैं। उसकी दिव्य शक्ति रिसने लगती है और वृत्त की परिधि पर बस जाती है| इस वृत्त को आदि वलय आदि वृत्त कहा जाता है। आदि वृत्त। तो पहली गति है ईश्वर की दिव्य शक्ति की यह लहर और दूसरी है गोल। यह एक गोलाकर तरीके से स्थापित होता है। जब पूरी चीज बाहर निकल जाती है तो जो बचता है वह एक बिंदु और एक वृत्त होता है। अब उनकी शक्ति को प्रकट करना है। ऐसा नहीं होता। वह नहीं करते। इसलिए वह साक्षी बने रहते हैं,  सर्वशक्तिमान परमेश्वर, और उनकी शक्ति, जिसमें उसकी शक्ति बह रही है, के रूप में। यदि आप वृक्ष में बीज के बारे में सोचते हैं, तो बीज की शक्ति सुप्त [अस्पष्ट] है। उसकी शक्ति अब उसकी इच्छा के कारण सृजन करने का निर्णय लेती है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। हम दो व्यक्तियों की ऐसी एकाकारिता के बारे में नहीं समझ सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा हम धूप और सूरज कह सकते हैं। लेकिन वे जीवित प्राणी नहीं हैं, लेकिन हम एक जीवित प्राणी के बारे में नहीं सोच पाते हैं, जिनमें इतनी एकाकारिता हो। [अस्पष्ट] वे इसे कल्प-निर्वाण कहते हैं क्योंकि उन्हें पूर्ण माना जाता है लेकिन जब आप उन्हें देखेंगे तो आप कहेंगे कि यह बिल्कुल विपरीत है। आपको इसका इस्तेमाल कभी नहीं करना चाहिए था। लेकिन यह है। इस शक्ति को शक्ति कहा जाता है। शक्ति के रूप में। जैसे आदि-शक्ति आदिशक्ति है, आदि- माता है और वे आदि-पिता हैं। मैं जिस अमूर्त पक्ष के बारे में बात कर रही हूं वह है।

तो आदि- माता ने निर्णय लिया कि अभी इतना निर्णय नहीं हुआ है। आप यह भी जानते हैं कि आप उनकी छवि में बने हैं, इसी कारण उन्हें यह तय करने में समय लगता है कि,  मुझे यह करना चाहिए या नहीं। मुझे प्रकट होना चाहिए या नहीं। लेकिन वह खुद को इकट्ठा करती है, अपना साहस जुटाती है और वह एक और बिंदु में बनती है जिसे बस ‘बिंदु’ के रूप में जाना जाता है। पहले आदि बिंदु में ईश्वर और उनकी शक्ति एक साथ है और दूसरा एक अन्य बिंदु बन जाता है इसलिए अब हमारे पास दो बिंदु हैं। तो हमारे पास दो बिंदु हैं जो इस तरह से जुड़ते हैं जैसे कि वे एक दूसरे से एक वस्तु और उसके प्रतिबिंब की तरह संबंधित हैं। लेकिन यह उससे कहीं अधिक है क्योंकि इसमें वही शक्ति है जो पहले के पास थी। तो यह ईश्वर की शक्ति है जो और एक बिंदु बन जाती है। अब यह बिंदु अपनी शक्तियों का उत्सर्जन करने लगता है। उसकी शक्तियाँ पहले वाले से भिन्न हैं। उदाहरण के लिए, बीज में सुगंध नहीं होती, लेकिन फूल में सुगंध होती है। उसकी शक्तियाँ भिन्न हैं क्योंकि वह प्रकट करने के लिए है और वह साक्षी के लिए है। तो घर की औरत ही सारा काम करती है और मर्द सिर्फ नाटक देख रहा है। लेकिन वह वही व्यक्ति है जो खेल को देख रहा है। वह दर्शक है इसलिए वह इस पूरे शो के लिए अंतिम शब्द है। अगर उन्हें वह शो पसंद नहीं है जो आदि- माँ द्वारा बनाया गया है, तो वे इसे बंद कर सकते हैं। तो वह मालिक है। और अगर वह कहता है, “मुझे यह पसंद नहीं है।” यह बंद हो जाता है। अगर वह कहता है, “ठीक है चलते रहो।” इसे चलाया जाता है। तो आदि- माता अपनी शक्ति के साथ स्वयं को प्रकट करने का कार्य करती है जिसे हम आदि- माता की शक्ति के रूप में, दिव्य शक्ति के रूप में कह सकते हैं। लेकिन फिर भी यह खत्म नहीं हुआ है। इसके बारे में थोड़ा प्रोटोकॉल है। उसके पास अपने पति के गुण होने चाहिए जो वह उसे प्रदान करता है। और उसकी स्वीकृति के रूप में वह उसे माला पहनाती है। आप देखिए, संस्कृत भाषा बहुत प्रतीकात्मक है। तो वह उसे माला पहनाती है जैसा वे कहते हैं या हम कह सकते हैं कि वह उसके चारों ओर परिक्रमा करती है।

जब आपको एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर चक्कर लगाना होता है, तो क्या होता है, सबसे छोटी दूरी इस तरह से होनी चाहिए जिसे आप दीर्घवृत्त कहते हैं। संस्कृत भाषा में इसे प्रदक्षिणा कहते हैं। [अस्पष्ट] प्रदक्षिणा। अब गति की यह शैली इसे आदि-माँ की प्रकृति को पूरी तरह से बदल देती है। यदि आप एक वृत में हैं, तो आप आगे और आगे चले जा रहे हैं और यह एक शाश्वत गति है। लेकिन एक बार जब आप इस तरह से शुरू करते हैं, तो आप देखते हैं कि अनंत प्रदान किया गया है। तो वह खुद को परिमितता प्राप्त करती है। वह स्वयं की परिमितता में आ जाती है। यह गति आदि- मां आदि शक्ति की पहली गति है। और सहज योग के हर दृष्टिकोण के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण गति है। जिसे बाद में आप जानेंगे कि हम अपने हाथ इस तरह से क्यों घुमाते हैं और उस तरह क्यों। मनुष्य का आभामंडल ऐसा क्यों होता है। लौ की आभा ऐसी क्यों है क्योंकि यह अभिव्यक्ति की गति है। पहली गति इस तरह से होती है जो एक दीर्घवृत्त की तरह दिखती है या हम इसे प्रदक्षिणा कह सकते हैं। इस गति के साथ वह एक तरह से उनके सामने समर्पण करती है।

अब समर्पण करने के बाद क्या होता है। एक और चरण आता है। फिर भी वह अपने स्वामी के सानिध्य के बिना अभिव्यक्त होने के लिए बहुत उत्सुक नहीं है। वह कहती है, “अकेले मैं यह कैसे कर सकती हूँ?” इस अवस्था को लस्या कहते हैं। बहुत सुन्दर वर्णन है। देखिए उन्होंने यहां-वहां पति-पत्नी के रूपक में इस्तेमाल किया है क्योंकि उनके अनुसार वह दोनों के बीच सबसे करीबी रिश्ता है। पूर्ण एकता और एकाकारिता। तो लस्य अवस्था में क्या होता है । [अस्पष्ट]। और परवलय या दीर्घवृत्त की इस गति को यथावत बनाए रखा जा रहा है। अब वह परमेश्वर की ओर या जो साक्षी है, उस परमेश्वर की ओर बढ़ती है जिसे वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं। जिस तरह मैंने यहां दिखाया है, वह सर्वशक्तिमान ईश्वर की ओर बढ़ती है और उस गति से दोनों पक्ष गोल होते हैं क्योंकि वह एक परिमित अस्तित्व है। जिसमें से शिव महा, सदाशिव जो साक्षित्व पहलू हैं, जिसे आप सर्वशक्तिमान ईश्वर कहते हैं। वह उठता है। वह उठता है और वह [अस्पष्ट]। और जब वह और भी करीब जाता है [अस्पष्ट]।

यह गोल वस्तु जो यहाँ है, यह गोल वाली है, वह खुलती है और दो हिस्सों में चली जाती है और यही [अस्पष्ट] है। अब जब शिव उस परवलय या उस दीर्घवृत्त से बाहर निकलते हैं, उस समय ध्वनि बनती है। ध्वनि ‘अ’ है। दूसरी ध्वनि ‘उ’ है और तीसरी जब ऊपर जाती है और वे ‘म’ से शुरू होती हैं। तो हमें तीन ध्वनियाँ मिलती हैं ‘अ’, ‘उ’, ‘म’। ये सब मिलकर ‘ओम्’ बनाते हैं। देवनागरी में आप जो कुछ भी कहते हैं [अस्पष्ट]। इसी तरह जब आप ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ कहते हैं, तो ये तीन शब्द एक साथ होते हैं और इस तरह [अस्पष्ट]। लेकिन इस तरह आप इसे यहाँ देखते हैं, यदि आप अपने माथे पर देख सकते हैं तो आप यहाँ लिखा हुआ देखते हैं कि यह किसी धर्म या दर्शन या किसी चीज़ से संबंधित नहीं है। इसे पहले शब्द के रूप में कहा गया है जैसा कि वे कहते हैं या [अस्पष्ट] जैसा कि वे कुरान में कहते हैं, या पहला मौलिक शब्द ‘ओम्’ है। इसका किसी भारतीय दार्शनिक या किसी भी चीज़ से कोई लेना-देना नहीं है, केवल इतना है कि भारत में लोगों के पास इतना समय था कि उन्होंने इसकी गहराई में जाकर इसका पता लगाया। और वह [अस्पष्ट] ये सब बातें लेकिन यह उस समय [अस्पष्ट] लोग नहीं हैं [अस्पष्ट] जो आप देख सकते हैं कि यह पहली, पहली ध्वनि है और यह पहली ध्वनि,  उस माँ की शक्ति की घोषणा है जो आदि है, जो आदिम माता का स्पंदन है। वे वायब्रेशन जिन्हें हम प्रणव के रूप में महसूस करते हैं, जिनके तीन हैं: एक, दो, तीन। आप तीन आधे वृत्त ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ देख सकते हैं और शीर्ष पर उसका [अस्पष्ट] है। यह अमूर्त तरीका है कि जिस तरह सर्वप्रथम इसे बनाया गया था। इसने अमूर्त से इस आकार में रूप धारण किया।

तो पूरे ब्रह्मांड को तीन चरणों में बनाया गया था। यह पहला चरण था, इसे [अस्पष्ट] कहा जाता था। जब [अस्पष्ट] में देवताओं की रचना की गई जिसमें ‘अ’, ‘उ’, ‘म’, और बाद में जैसा यहां वर्णित है उस रूप में, जैसा कि आप जानते हैं, ऐम, ह्रीं और क्लीम। ये तीन हैं, जिन्होंने ईश्वर के तीन पहलुओं का वर्णन किया है। ‘एम्’ अस्तित्व है, ‘ह्रीं’ जीवनाधार है और ‘क्लिं’ रचनात्मक शक्ति है। इन तीनों शक्तियों की उत्पत्ति पहले हुई और तीन शक्तियों से पूरे ब्रह्मांड की रचना हुई। तो सबसे पहले पहली शक्ति के माध्यम से इच्छा व्यक्त की जाती है जो हमारे अंदर तमो गुण या अवचेतन और सामूहिक अवचेतन की चित्तवृत्ति बनाती है। दूसरा वह है जो रचनात्मक है, जो हमारे अंदर पूर्वचेतन मन और अतिचेतना और सामूहिक अतिचेतन बनाता है। और ‘ह्रीं’ ‘म’ की तीसरी शक्ति है जीवनाधार शक्ति वर्तमान क्षण है, यही पल, [अस्पष्ट]। और आप क्या होने जा रहे हैं, आत्म-साक्षात्कारी या सिर्फ  जीवनाधार, सूक्ष्म तरीके से पोषण रखने से आपको ईश्वर की कृपा से वह आत्म-साक्षात्कार  मिलता है न कि आपके प्रयास [अस्पष्ट] से।

अब देखते हैं कि ब्रह्मांड कैसे बनते हैं। जैसा कि आप पहले ही देख चुके हैं कि पहले इच्छा होती है। इच्छा एक अमूर्त वस्तु है, और कुछ करने की इच्छा एक अमूर्त वस्तु है। भौतिक नहीं है, भौतिकीकरण नहीं है, लेकिन भौतिककरण से पहले की विचार प्रक्रिया इच्छा है, उस हिस्से का आप वर्णन नहीं कर सकते लेकिन आप समझ सकते हैं कि यह ईश्वर का प्रेम है। यह प्यार है। वह उनका प्रेम है जो उन्हें पसंद है और उन्होने अपनी पत्नी या आप कह सकते हैं कि उनकी शक्ति, जो रचना करेगी को यह शक्ति दी है,  और उस शक्ति ने अपने बच्चे के लिए उस प्रेम को महसूस किया, वह [अस्पष्ट] इच्छा प्रेमवश आती है। प्रेरक शक्ति प्रेम है। यह उसका पहला लक्ष्य है लेकिन क्या आप प्रेम का वर्णन कर सकते हैं, क्या आप इसे दिखा सकते हैं। यह मौजूद है और आप इसे जान सकते हैं कि जिस तरह इसका वर्णन किया गया है यह प्रेम के बारे में है। तो पहली, सबसे महत्वपूर्ण शक्ति, [अस्पष्ट] प्रेम की और प्रेम के बारे में है। प्रेम जो निर्वाज्य [अस्पष्ट] है। वह प्रेम बनाया गया और अबोधिता के देवता की भी रचना की गई। दूसरे चरण में, मैंने आपको बताया की अबोधिता के देवता श्री गणेश है और उन्होंने इस धरती पर ईसा मसीह के रूप में अवतार लिया है। वह उस अबोधिता के अवतार थे जिनकी रचना की गई थी।यह महान ब्रह्मांड  मासूमियत से भरा गया और उसने इसे अबोधिता से भर दिया था। जब मैंने यहां तंत्र की बात की तो मैंने चेतावनी दी थी कि आप अपनी अबोधिता को नष्ट कर रहे हैं और दूसरों की मासूमियत को नष्ट कर रहे हैं, यह सबसे बड़ा पाप है। और उसके मरने के बाद, यदि तुम उस प्रकाश को पाना चाहते हो तो तुम उसे सहन नहीं कर सकते, तुम ऐसा नहीं कर सकते।

अब, हमें यह जानना चाहिए कि यह शक्ति, आदि- माता, वह एक निषेचन (युग्मनज) की अवस्था में कैसे जाती है। जाइगोट शायद डॉक्टर जानते हैं, [अस्पष्ट] जहां शुक्राणु और डिंब मिलते हैं। लेकिन जब हम स्थूल अवस्था में समझते हैं कुछ बदसूरत लगता है, लेकिन अगर आप इसे सूक्ष्म तरीके से समझते हैं, [अस्पष्ट] और हम समझ सकते हैं। मान लीजिए, आज हम [अस्पष्ट] अपने माता-पिता की यौन गतिविधियाँ जाने, कौन ऐसा करना चाहेंगे। क्यों- इसके बारे में बात करना ठीक नहीं है। क्योंकि यह असली यौन क्रिया होना है। इसलिए मैंने कहा, कि यौनक्रिया एक पवित्र चीज है जिसे पवित्र तरीके से किया जाना चाहिए। कुछ सस्ता या नाटक या मौज-मस्ती नहीं है। और यह रिश्ता उन दोनों के बीच, हमारे आदि- पिता और आदि- माता के बीच मौजूद है। और वह पवित्र एकांत है। हमें इसके बारे में किसी भी चर्चा और बात के तरीके पर नहीं जाना है। वह पूरी तरह से श्रद्धा से बाहर है, [अस्पष्ट] नवाचार से, [अस्पष्ट] से बाहर है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि चूँकि मैं आपको बता रही हूं यौनक्रिया यह सूक्ष्म चीज है, सूक्ष्मता है अर्थात ऐसा होता है। ईश्वर की एक शक्ति किस तरह कार्य करती है, या हम कहें कि ईश्वर की पूर्ण शक्ति स्वयं ईश्वर के संबंध में कार्य करती है। बाद में इंसानों या जानवरों में यह यौनक्रिया के रूप में आता है लेकिन फिर आप परिष्कृत  हो जाते हैं। सेक्स उदात्त हो जाता है। केवल मनुष्यों में ही हमारे विवाह होते हैं। और फिर हमने समझदार [अस्पष्ट] पवित्र किया है जो विवाहित हैं।

अभी। तो यह क्रिया तब होती है जब ॐ किया जाता है। पहली ध्वनि को ॐ कहा जाता है, ॐ यही है। और क्राइस्ट उस ध्वनि के अवतार हैं, क्योंकि माता की उस आदिम [अस्पष्ट] शक्ति का उनका अवतार भी तथाकथित मानव शरीर लेता है। शरीर भी उन्हीं स्पंदनों से बना है और इसलिए वे पुनरूत्थित शरीर थे। कोई भी अन्य अवतार को पुनर्जीवित नहीं किया गया था। वह भूमि माँ के हर तत्व [अस्पष्ट] से बनाया गया था और एक सीमित अस्तित्व का गठन किया था। और परिमित [अस्पष्ट]। आपने इसे कभी-कभी मेरे साथ महसूस किया होगा, यहाँ आप वायब्रेशन महसूस करते रहे हैं। इसका कोई अंत नहीं है [अस्पष्ट]। अवतार मानव स्तर से परे है। अब तक केवल दो मनुष्य, वे सच्चे मनुष्य नहीं थे क्योंकि वे अवतार लेने के लिए पैदा हुए थे, और फिर उन्होंने उस अवस्था को प्राप्त किया और उन्होंने मार्ग दिखाया। वे महावीर और बुद्ध थे। लेकिन मसीह परे है। वह अन्य देवताओं से भी परे है क्योंकि वह पवित्रता पूर्ण निर्दोष थे| पवित्रता सबसे बड़ी चीज है सबसे शक्तिशाली चीज।

अब, दूसरे चरण में, जो की उत्पत्ती का चरण है, उत्पत्ति का ढंग [अस्पष्ट] है। लेकिन दूसरे चरण को वैकुंठ कहा जाता है। इस चरण में सभी देवताओं की रचना हुई। उदाहरण के लिए, आदि माता ने देवताओं की रचना की और फिर उन्होंने उनके देवताओं की रचना की और फिर उन्होंने अपने बच्चों को बनाया, अपना बच्चा बनाया। उसने केवल एक बच्चा पैदा किया। लेकिन बच्चे के चार पहलू थे और ये चारों पहलू जो पहले ही बता दिए गए थे। वे सभी उसके देवता में एक साथ शामिल हो जाते हैं। यह गणेश नाम के देवता हैं। और यह देवता, कौन से देवता की रचना की गई, और कैसे रचित हुए और उन्होंने कैसे [अस्पष्ट] यह मैं आपको बाद में बताऊंगी क्योंकि यह इसका पोषण वाला हिस्सा है। लेकिन सबसे पहले मैं आपको बताऊंगी कि इस ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई। उसके बाद, उन सभी देवताओं और उन सभी चीजों की रचना करके, उन्होंने विराट के पेट में शून्य बनाया। तो एक और चरण को क्षीरसागर कहा जाता है जहां शून्य बनाया गया था और चौथे को भवसागर कहा जाता है जो संसार ब्रह्मांड है। तो उस तरह कुल मिलाकर चार चरण होते हैं। मैं आपको वह [अस्पष्ट] इसी तरह क्यों बता रही हूं। अभी।

शुरुआत में वैकुंठ चरण में देवताओं की रचना की गई थी। श्री गणेश द्वारा निर्मित सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण अबोधिता थी। अबोधिता पहली चीज थी जो रचित थी। उसने यह सारी चीज़ अबोधिता में रची है। बिल्कुल मासूमियत। अबोधिता की रचना करने के बाद, श्री गणेश को बनाने के बाद, दूसरी बात अब वहाँ मान लीजिए कि ब्रह्मांड की कल्पना की गई, विचार किया गया और अभिव्यक्त किया गया। दूसरा देवता जो इस खेल में आया वह था ईश्वर का साक्षी अंश या आप ईश्वर का अस्तित्व अंश कह सकते हैं। वह उस हिस्से को लेकर आई, यह बहुत ही काव्यात्मक तरीके से शुरू हुआ ताकि आप समझ सकें। इस तरह की आदि माँ को अपने पति से शादी करनी थी। उसे उनसे शादी करनी है। और वह एक कुंवारी है जो अभी भी अपने पति के आने की प्रतीक्षा कर रही है। वह शादी से पहले नहाने जा रही है। और उनसे मिलने से पहले। तो वह अपने शरीर से श्री गणेश को बनाती है। वह अपने शरीर से वह सब निकालती है, सभी वायब्रेशन को वह एकत्रित करती है और एक पुत्र बनाती है और स्नान करते समय उसे बाहर बैठा देती है। और फिर शिव अंदर आते हैं। अस्तित्व का पहलू आता है। और वह [अस्पष्ट] समझ नहीं पाते है और सारी कहानी है। लेकिन इस तरह वे [अस्पष्ट] समझाते हैं। कि,  सबसे पहले शिव पहलू, या आप कह सकते हैं, अस्तित्व का पहलू आता है क्योंकि अस्तित्व के बिना इच्छा कैसे हो सकती है। यह आदि- माता के इच्छा भाग की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और वह है बाईं बाजू तरफ। [अस्पष्ट] चाहत।

फिर वह [अस्पष्ट] में वापस चली जाती है। पहले वह इच्छा है। इच्छा के लिए आपके पास एक देव होना चाहिए और उसने उसके लिए देव की रचना की। इस देवत्व की रचना पहले से ही इस तरह से की गई है कि उन्होंने सबसे पहले खुद को तीन देवियों में विभाजित किया। उन्हें इच्छा [अस्पष्ट] का प्रतिनिधित्व करने वाली महाकाली कहा जाता है, महासरस्वती रचनात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व और महालक्ष्मी को पोषण शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली के रूप में व्यक्त किया जाता है। ये तीनों शक्तियां एक रूप लेती हैं, अलग-अलग रूप लेती हैं। और इन तीनों शक्तियों से उन्होंने सन्तान उत्पन्न की [अस्पष्ट]। और ये बच्चे कुल मिलाकर छह भाई-बहन हैं। फिर उन्होंने आपस में आदान-प्रदान किया और तीन शक्तियों वाले तीन देवताओं का निर्माण किया, इस अर्थ में कि पत्नियां शक्तियां हैं और जिन्हें काम करना है वे देवता हैं। जिसका अर्थ है संभाव्य और गतिज। तो संभाव्य एक देव है और गतिज शक्ति है। तो हमें छह देवता मिलते हैं जिनमें से आप कह सकते हैं कि तीन शक्तियाँ हैं और तीन देवता हैं। और एक हैं श्री गणेश जो कि एक बालक हैं। तो अस्तित्व के लिए सबसे पहले वे शिव के रूप में जाने जाने वाले देवता को बनाते हैं जो श्री सदाशिव का प्रतिनिधित्व करते हैं। सृजनात्मक शक्ति के लिए सृष्टिकर्ता देवता को ब्रह्मा कहा जाता है और पोषण शक्ति के लिए वह विष्णु नामक देवता की रचना करती हैं। इन तीनों को अपनी शक्ति से,  पहले वाले मिलते हैं महाकाली या दुर्गा के रूप से। वही शिव है। तब ब्रह्मा को सरस्वती के रूप में अपनी शक्ति और पोषण की केंद्रीय शक्ति या उत्क्रांति की शक्ति प्राप्त होती है जहाँ विष्णु देवता हैं, उनकी शक्ति को लक्ष्मी कहा जाता है। तो इन छह देवताओं की रचना तीन आदि- माताओं के माध्यम से की गई है जैसा कि मैंने आपको तीन शक्तियों के बारे में बताया है जो आश्चर्यजनक रूप से [अस्पष्ट] यदि आप पढ़ें, उन्होंने तीन देवी [अस्पष्ट] का वर्णन किया है। और बाद में जब मैं अति-चेतन [अस्पष्ट] पर आती हूं तो उन्होंने जो कुछ भी वर्णित किया है। उस एक आदि- माता के तीन पहलू हैं और उन्हें तीन देवियों के रूप में वर्णित किया गया है। और इन तीनों देवियों के छह बच्चे हुए जिनका विवाह हो गया और फिर वे वैकुंठ [अस्पष्ट] में इन तीनों शक्तियों [अस्पष्ट] को प्राप्त करते हैं। और आपने श्री गणेशजी की भी स्थापना की है।

जब इनकी रचना वैकुण्ठ चरण में की गई थी, तो उन्होंने पूरी तरह से इस बात की तस्वीर पेश की कि वे इससे क्या हासिल करने जा रहे हैं। तो यह सृष्टि जिस उच्चतम स्तर तक पहुंची है, उस विराट व्यक्तित्व की वह अवस्था जो मैं कह सकती हूं अंडे से या इस अंडे जैसी संरचना से अवतरित हुई है, जो ऐसा एक व्यक्तित्व विकसित हुआ था जो कि विष्णु देवता का पूर्ण रूप से विकसित रूप है, विराट कहलाता है . जब पोषण शक्ति अपने चरम पर पहुँचती है तो वह विराट है,  स्थूल जगत है, जैसा कि हम इसे कहते हैं, चूँकि हम सूक्ष्म जगत हैं। अब हमें जहाँ पहुंचना है, विराट तक। उस विराट पुरुष को आप यहाँ देख सकते हैं और मनुष्य को परमेश्वर [अस्पष्ट] की छवि में ही बनाया गया था। और इस विराट [अस्पष्ट] पुरुष में, हम कोशिकाओं की तरह हैं, कुछ मस्तिष्क में, कुछ हृदय में, कुछ यकृत में। जो जाग्रत होते हैं, वे आत्मसाक्षात्कारी होते हैं, वे एकाकारिता को बना हुआ देख सकते हैं। उनके हृदय में ईश्वर की साक्षी शक्ति का प्रतिबिम्ब वास करता है, और उनके लिवर में?। हम लिवर के महत्व को नहीं जानते हैं। उनकी जागरूकता का प्रतिबिंब। आप को आश्चर्य होगा कि, चित्त वाला भाग लिवर से आता है। मैं जो बता रही हूँ उसका हमें अहसास नहीं है। यदि आप पीते हैं [अस्पष्ट] आप अपने जिगर के खिलाफ अपनी जागरूकता के खिलाफ जा रहे हैं। वही मरा हुआ है। और जिन लोगों का कलेजा खराब था, उन्होंने मेरे सामने स्वीकार किया है। यह हमेशा एक भयानक बीमारी है। और एक अच्छा लीवर होने से बेहतर  कुछ नहीं है। लिवर चित्त का ही हिस्सा है, हालांकि व्यक्त यह मस्तिष्क में किया जाता है, लेकिन मस्तिष्क के माध्यम से [अस्पष्ट]। उसी तरह मस्तिष्क, उसके मस्तिष्क के माध्यम से ईश्वर ही रचना करते है। उसके मस्तिष्क की परमात्मा रचना करते हैं और उसी के माध्यम से सोचते है। और उसके लिवर के द्वारा वह हमें पोषित करते है। वह हमें हमारा भरण-पोषण, हमारा गुण-धर्म, हमारा धर्म देते है। हर चीज में एक गुण-धर्म होता है, यहां तक ​​कि फूलों में भी एक गुण-धर्म होता है। उदाहरण के लिए, यदि आप एक आम लगाते हैं, तो वहां केवल एक आम ही उगेगा। अगर आपके पास आम का पेड़ है, तो आप उस में से सेब नहीं पा सकते। उसी प्रकार मनुष्य मनुष्य को ही जन्म देगा। वह और कुछ नहीं हो सकता। और कुत्ता कुत्ते को जन्म देगा। यह गुण-धर्म पोषण शक्ति के द्वारा किया जाता है जो की भीतर पेट में होता है जिसके द्वारा वह नियंत्रित करता है। और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि केवल उस शक्ति के माध्यम से ही आप अमीबा से इस अवस्था तक और इस अवस्था से चक्रों की उच्चतम अवस्था तक विकसित होते हैं। तो हमारे लिए वर्तमान चर्चा में, सबसे महत्वपूर्ण चीज है गुण-धर्म पोषण शक्ति और वे देवता जो गुण-धर्म पोषण शक्ति के साथ मदद करते हैं।

दाहिने बाजु की और, बाएँ बाजु की अन्य शक्तियाँ। बेशक, मैं पहले ही चर्चा कर चुकी हूं कि बाएं हाथ की तरफ सर्वशक्तिमान ईश्वर की शक्ति है, और उनका प्रतिबिंब जो हर किसी के दिल में परिलक्षित होता है। और वह वहां है जो हमारे भीतर की ताकत है। दायीं तरफ की शक्ति से तुम उसी प्रकार सृष्टि की रचना करते हो जिस प्रकार ईश्वर ने अपनी महासरस्वती शक्ति से इस पूरे ब्रह्मांड की, हर चीज की रचना की। बेशक इसका मतलब यह नहीं है कि जब महासरस्वती शक्ति की रचना होती है और दूसरी शक्ति को[अस्पष्ट] सौंपती है और अन्य शक्तियां महत्वपूर्ण नहीं होती हैं। ऐसा नहीं है। जब वह बनाता है, तो हर शक्ति शामिल [अस्पष्ट] होती है। मान लीजिए आप कुछ बनाना चाहते हैं तो हमारा अवचेतन मन हमारी मदद करता है। हमारा चेतन मन हमारी मदद करता है। हमारा अचेतन मन हमारी मदद करता है। लेकिन उस चीज पर वर्चस्व होना, वह उसी का है जो कार्यान्वित है, वह रचनात्मकता की वही शक्ति है जो दाहिने बाजु है जिससे हम सोचते हैं। अब एक व्यक्ति विशेष में [अस्पष्ट] रचनात्मकता की शक्ति। लेकिन सबसे पहले हम इस शून्य को समझ लें। अब चौथे चरण में, यह शून्य तुम्हारे भीतर निर्मित हो गया है। या पाँचवाँ चरण कहूँ जहाँ मनुष्य [अस्पष्ट]। लेकिन हम सभी को इस शून्य में केवल वहीं रखा गया है जहां सूर्य, चंद्रमा और पूरे ब्रह्मांड की रचना दायीं ओर की रचनात्मक शक्तियों द्वारा की गई है। जैसा कि आप लोगों के पास [अस्पष्ट] है। यह रचनात्मक शक्ति है जो ऐसे ही चलने लगी। यह इस तरह से चलता है और कभी-कभी इस तरह एक सर्कल में गति करता है क्योंकि इसमें एक और भी काम होता है, यह एक अन्य गतिविधि है। एक और गतिविधि भी है। तो गोल-गोल घूमने की यह दूसरी गतिविधि है। जब यह गोल-गोल होता है, तो सारी शक्ति घनीभूत हो जाती है। आप इस प्रकार का हमारी भाषा में [अस्पष्ट] देखते हैं। सब कुछ इतना अधिक घनीभूत हो जाता है कि यह सीमित स्थान हिल ही नहीं पाता। तो एक महा-विस्फोट होता है, एक बिग बैंग होता है। अब आप चकित होंगे यह मैंने दस साल पहले लोगों को बताया था और मुझे नहीं पता कि लोग हाल ही में एक बिग बैंग के बारे में बात कर रहे हैं। अब एक महा- धमाका होता है और उस विस्फोट से ये सब चीजें टुकड़ों में बंट जाती हैं।

इस प्रकार गति के संवेग के साथ ऐसा होता है कि ये सभी टुकड़े आपस में रगड़ते चले जाते हैं। वे गोलाकार आकार में बन जाते हैं। [अस्पष्ट] अलग होते हुए। अब जैसा कि मैंने तुमसे कहा है, अन्य शक्तियां भी हैं। वे इससे दूर नहीं हैं। वे भी इसका समर्थन कर रहे हैं। तो हालांकि रचनात्मक शक्ति इन चीजों को बनाती है, अन्य शक्तियां इसे किसी अन्य तरीके से नियंत्रित करती हैं। ऐसा है कि, इनमें से हर एक प्रत्येक कण के केंद्र में, पृथ्वी के प्रत्येक कण, प्रत्येक परमाणु और सूक्ष्मतम, का नियंत्रण अस्तित्व शक्ति द्वारा होता है। यह क्या है? हमने देखा है कि हर अणु से निकलने वाले वायब्रेशन हैं। सल्फर डाइऑक्साइड आप कह सकते हैं। सल्फर शीर्ष पर है और सल्फर के दो पूंछ सिरों पर ऑक्साइड, दो ऑक्साइड हैं। और वे हर समय स्पंदित हैं। वे परमाणुवादी हो सकते हैं, वे किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। लेकिन वे स्पंदित हैं। अब इलेक्ट्रोमैग्नेटिक में ये कंपन कहां से आ रहे हैं। वे उस अणु के केंद्र से आ रहे हैं। उसी तरह कहते हैं कि धरती माता में एक धुरी है। वे नहीं जानते कि यह कैसे मौजूद है। अक्ष के समान ही है। यह भी हर अन्य व्यवस्था के समान है। और अस्तित्व शक्ति उन सब में एक धुरी [अस्पष्ट] देकर बाँट दी जाती है। यदि ऐसी कोई संस्था न होती जो अस्तित्व शक्ति का क्रियान्वयन करती, तो हमारे पास आवर्त सारणी नहीं होती। मैं नहीं जानती कि आप में से कितने रसायन शास्त्र के छात्र हैं लेकिन हमारे पास एक आवर्त सारणी है। यह देखना सबसे आश्चर्यजनक है कि हम इसे हल्के में लेते हैं लेकिन हम उसका काम देखते हैं। यह जबरदस्त और जटिल है, खूबसूरती से किया गया है।

आप देख सकते हैं कि कैसे एक तालिका के अनुसार परमाणुओं को विभाजित किया जाता है। और उन्हें कुछ समय बाद दोहराया जाता है। ब्योरेवार सूक्ष्मता से पंक्तियाँ वगैरह कैसे कार्य करती हैं। और कभी-कभी वे मनमाने ढंग से कार्य करते हैं जिसे लोग समझा नहीं सकते। वे व्याख्या नहीं कर सकते क्योंकि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करना चाहते हैं। इन सभी तत्वों को एक सुंदर चार्ट में विभाजित किया गया है, कोई कह रहा है कि संयोग वश किया जाता है लेकिन ऐसा नहीं है। क्योंकि आप इस पृथ्वी के सूर्य से दूर हटने के समय से ही यदि समय के नियम को संयोग वश चलने देते, तो आप एक भी अमीबा, यहाँ तक की एक बार भी, नहीं बना सकते। एक बार भी। एक तथ्य है। वैज्ञानिक तथ्य है। आप इसके बारे में एक किताब और बाइबिल में पढ़ सकते हैं। तुम नहीं कर सकते। और मनुष्य इन सभी जटिल चीजों से बनाया गया है, कैसे बनाया गया है। आप इसके बारे में क्यों नहीं सोचते। समय के साथ यह कैसे हुआ है क्योंकि यह निश्चित रूप से योजनाबद्ध [अस्पष्ट] है। यह अपने स्वयं के कानून के माध्यम से संचालित किया गया था, न कि संयोग का नियम जैसा कि [अस्पष्ट] में वर्णित है। पांच अरब वर्षों का यह छोटा समय एक अमीबा पैदा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं हो सकता था। एक सेल। मनुष्य के लिए ईश्वर को चुनौती देना बहुत आसान है क्योंकि वह सीमित है। लेकिन क्या फायदा। इससे उसे क्या हासिल होता है। इसके बारे में विनम्र होना और अपने मौजूदा आतंरिक अस्तित्व के माध्यम से उसे जानना ही बेहतर है। बाहर तुम बुद्धि जो एक सीमित साधन है उस के साथ बहुत दूर नहीं जा सकते। इस सीमित साधन से तुम बहुत दूर नहीं जा सकते। आपको किसी ऐसी चीज में जाना है जो असीमित है। आपको उस के अंदर सक्रिय होना है और वहां आपको यह असीमित तस्वीर देखनी है।

तो इस प्रकार मैं आपको बता रही हूं कि ब्रह्मांड कैसे बनते हैं। कैसे ये तीनों शक्तियाँ उनमें विद्यमान हैं। अब ये तीन शक्तियाँ तीन भाव हैं, इन्हें तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण कहा जाता है। लेकिन सत्वगुण सत्य का  रहस्योद्घाटन है। सत्य का रहस्योद्घाटन अस्तित्व शक्ति है जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है। और वह हम में इसलिए आया है क्योंकि हमारी मनुष्य के रूप में रचना की गयी थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह धरती इतनी बड़ी नहीं बल्कि छोटी सी धरती थी। और उसमें पानी कैसे बना। दरअसल आपको जानकर हैरानी होगी कि पृथ्वी को सूरज से इतनी दूर, चांद से भी दूर हटा दिया गया था। इतनी दूर कि वह पूरी जम जाए। और फिर इसे वास्तव में सूर्य के बहुत करीब लाया गया। तो सब कुछ पिघलने लगा। जब यह पिघल गया, तब इसे समायोजित और समायोजित किया गया और केंद्र बिंदु पर लाया गया, जहां केंद्र बिंदु इस अर्थ में है कि जहाँ जीवन शुरू हो सकता है। यह जागरूकता के साथ, स्वयं परमात्मा द्वारा जानबूझकर समझ के साथ किया गया था। मनुष्य ने नहीं किया है। और फिर पृथ्वी का विस्तार हुआ। इसलिए कुछ लोगों को यह समझ में नहीं आता कि कैसे आप कोई चीज़ भारत में पाते हैं और कुछ अन्य जगहों पर। या यहाँ कुछ। बहुत सारे युग ऐसे हुए हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाए हैं। उदाहरण के लिए, हिमालय बहुत बाद में उपर उठे, वे बहुत नीचे थे और उस समय यह एक ही भूमि थी। लेकिन इसे समझने के लिए हमारी जागरूकता को बढ़ाना होगा। आप देखिए, जैसे सूक्ष्मदर्शी से हमें कुछ सूक्ष्म देखने को मिल गया है, किसी सूक्ष्म चीज या पहले जो कुछ हो चुका है को देखने के लिए, उसे देखने के लिए हमारे पास वह गहराई होनी चाहिए लेकिन यहाँ तो हमें खुद का सम्मान भी नहीं है कि हम इसे कैसे संभालें। हम कैसे ऐसे मुद्दे संभालें, उदाहरण के लिए हम खुद को संतुलित भी नहीं कर पाते हैं। हम संगठित नहीं हैं।

इसलिए इस कलियुग में, इन आधुनिक समय में, सहज योग पूर्ति कर रहा है, कि कम से कम ज्ञान पाने की एक विधि है जिसके द्वारा आप अपने आप को संतुलित कर सकते हैं और जिससे आप उस स्पंदनात्मक सर्वव्यापी शक्ति को महसूस कर सकते हैं, जो आप के चारों तरफ है, आपको विभिन्न ऋषियों द्वारा जिसका वर्णन किया और बताया गया है। [अस्पष्ट] आप इसे आत्म-साक्षात्कार में देख सकते हैं, यह केवल एक व्यासपीठ से या किसी का व्याख्यान नहीं है। यह घटित होता है। यह एक घटना है। यह एक बोध है जो घटित होता है। लेकिन यह इतनी जबरदस्त चीज है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे लिए कौन से दरवाजे खुल रहे हैं। जहां हम सूक्ष्म रूप में प्रवेश कर रहे हैं। ये वायब्रेशन सब कुछ बनाने, नियंत्रित करने, समन्वय करने, काम करने के लिए जिम्मेदार हैं। केवल एक बात जो की हम चुनते हैं,  उसे हर जगह काम करने का मौका नहीं देते हैं। दीजिये , [अस्पष्ट] और वहाँ परमात्मा का राज्य घटित होता है।

दूसरी शक्ति जिसका मैंने आपको वर्णन किया है वह है सृजनात्मक शक्ति। मेरा मतलब है कि आप इस पर बात करते रह सकते हैं कि सभी तत्व कैसे बनाए जाते हैं लेकिन वे [अस्पष्ट] बनाए गए थे, जिन्होंने पांच तत्वों और पांच तत्वों के क्रमपरिवर्तन और संयोजन बनाए, यह पृथ्वी और ये चीज़ें कैसे बनी, और यह एक बहुत विस्तृत विषय है जिस पर मुझे लगता है कि कोई एक साथ घंटों बात करता रह सकता है। चलो इसे भूल जाते हैं। क्योंकि तुम वहां नहीं हो। आप यहाँ [अस्पष्ट] हैं। आपको तैयारी करनी है।

अब तुम्हारे भीतर पोषण शक्ति क्रियान्वयन [अस्पष्ट] में है। ऊपर से यह एक बिंदु तक आती है। यह इतनी भी कम नहीं है। जहाँ तक [अस्पष्ट]। तो यह इतना भी कम नहीं है। और तुम शून्य में हो। आपका चित्त आपके सिर पर है। इस लीवर को पहले प्रबुद्ध होना है। हम इसे कैसे प्रबुद्ध करते हैं? मुद्दा क्या है? चाहत। इच्छा शक्ति जो की एक बहुत ही पोर्टेबल (आसानी से कहीं भी ले जाने लायक) शक्ति है को कहीं न कहीं लगाना होगा, जो आपकी सभी सामान्य, भौतिक या भावनात्मक और अन्य सभी इच्छाओं का स्थान ले लेगी। इस सजीव वस्तु को क्रियान्वित करने के लिए अवश्य ही वहाँ कुछ  रखा हुआ होना चाहिए। और वह चीज नीचे है, वह शक्ति है वास्तव में इच्छा शक्ति है, महाकाली शक्ति है, वहां एक अस्थि [अस्पष्ट] में रखी जाती है और इसे कुंवारी के रूप में कहते हैं। वह कुंवारी है। और वह हमेशा तुम्हारी माँ है। बिल्कुल ईसा-मसीह की कुंवारी माँ की तरह। कुंवारी माँ की तरह, काली या दुर्गा या पार्वती। उनके पुत्र गणेश हैं। उसी तरह वह आपकी निजी मां है। सबके पास है वो माँ। वहाँ बैठी हुई, वहाँ सोती हुई, उठने और आपको वह आनंद देने के अवसर की प्रतीक्षा में। वह अंदर एक कुंडल की तरह है। यह एक जीवित माँ है। यह कई युगों में आपके साथ रही है, कई जन्मों में, वह वहां इंतजार कर रही है। शास्त्रों में वर्णित है कि मैं आपके सामने ज्वालाओं [अस्पष्ट] के रूप में प्रकट होऊंगा। जब वह ऊपर आती है और जिस तरह से उठती है, वह उन सभी को प्रबुद्ध करती है। जो अतिशेष है जो वहां रखा हुआ है, वह हर एक इंसान में संरक्षित होता है और वहां होता है और [अस्पष्ट] होता है।

यह पेट में, भवसागर में ऊपर आता है। पहली बात यह है कि यह रचनात्मक शक्ति है जो उस चक्र के माध्यम से कार्य करती है जिसे स्वाधिष्ठान कहा जाता है। तो यह [अस्पष्ट] है। स्वाधिष्ठान चक्र देखा जा सकता है [अस्पष्ट]। सूक्ष्म अर्थ में। फिर यह ऊपर जाती है। यह [अस्पष्ट] है, इच्छा शक्ति रचनात्मक शक्ति के साथ एकीकृत होती है और ऊपर और ऊपर जाती है और फिर यह हृदय शक्ति के साथ एकीकृत होती है, जिसे यहां तीसरे चक्र पर रखा गया है। आंशिक एकीकरण अब होता है। क्योंकि अभी तक मनुष्य एक बिंदु तक ही विकसित हुआ है।

उससे भी ऊँचे बिंदु पर, यहाँ मनुष्य वास्तव में विकसित हुए हैं क्योंकि उन्होंने अपना सिर इस तरह से ऊपर उठाया है। सिर झुकाना मनुष्य के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि आप समझते हैं कि कुत्ते के लिए ऐसा नहीं है। इंसानों के लिए आप समझते हैं। अगर आपने हर ऐरे गैरे नत्थू खैरे, जो एक ऐसी पोशाक में आता है जो आपको आकर्षित करती है, जो आपको लुभाती है, के सामने अपना सिर झुका लिया है तो आप आपके अपने अनुभव में, बहुत नीचे चले गए हैं।  मनुष्य की यह गर्दन सभी पशु साम्राज्य, सारी दुनिया, सभी ब्रह्मांड, सभी सृष्टि जो बनाई गई थी से ऊपर है। क्योंकि यहीं तुम्हारे भीतर महान विराट होने की शक्ति है, जिससे तुम उसके साथ एकाकार हो जाते हो और इसलिए मैंने आपसे कहा था कि अपने हाथ मेरी ओर रखो क्योंकि इनके माध्यम से तुम विराट को महसूस कर सकते हो। आप उस एकमात्र व्यक्तित्व को महसूस कर सकते हैं जिसके माध्यम से ये दस गुरु लोग हैं या आप कह सकते हैं कि वह शक्ति [अस्पष्ट] जिससे आप इसे महसूस करते हैं क्योंकि आपका चक्र [अस्पष्ट] है। यह बहुत सी चीजों से खराब हो गया है। जो लोग झूठ बोलते हैं, जो लोग कठोर बातें कहते हैं, जिनके भीतर प्रेम नहीं है, जो लोग धूम्रपान करते हैं, वे अपने और दूसरों के प्रति पूरी तरह से अनादर करते हैं। इसे खराब करने से आपका और दूसरों का सारा रिश्ता खराब हो जाता है।

तो कुंडलिनी को ऊपर उठकर इस स्थान पर आना है, जहां मेरे कपाल पर  लाल निशान है। मस्तिष्क के केंद्र में जहां दृष्टी स्नायु optic chiasma मिलते हैं, जहां श्लेष्मा और शकुंधर ग्रंथि  pituitary and pineal निकाय कार्य कर रहे हैं। इसका मध्य बिंदु एक सूक्ष्म चक्र है जिसे आप आज्ञा चक्र कहते हैं, जिसे आप तीसरा नेत्र कहते हैं। मुझे नहीं पता कि वे क्या समझते हैं। यहां एक खिड़की है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति उस क्रॉस को देख सकता है जिस पर ईसा-मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था, उनका शरीर सूली पर चढ़ाया गया था। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र है, क्योंकि यह आपके अहंकार और अति-अहंकार की गति को नियंत्रित करता है। जो दोनों के बीच संतुलन लाता है और जब कुंडलिनी उठती है, और जो चाहा और मांगा जाना है, वह वही है जो आप चाह और खोज रहे हैं और यह भौतिक, बेकार, सतही चीजों में नहीं है। यदि आप सतही रूप से खोज रहे हैं तो मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। आपको सब कुछ मिल गया है। लेकिन तुम सच्चे साधक हो। तब तो [अस्पष्ट]। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है, यह हासिल [अस्पष्ट] हो सकता है। वास्तव में जो मैंने पश्चिमी देशों में महसूस किया, उनमें रचनात्मक शक्ति और सोचने की शक्ति बहुत अधिक थी। जो अहंकार बायें हाथ की ओर होता है, वह दाहिने हाथ से बायीं ओर जाता है, [अस्पष्ट]। और इसके प्रति सचेत होकर, अचानक तुम [अस्पष्ट] प्रति-अहंकार [अस्पष्ट] ग्रसित हो जाते हो। अब दोनों इसी तरह दिमाग में काम कर रहे हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि सींग ऊग आएंगे। जिस तरह से आप सोच रहे हैं सोच सोच कर आप रुक नहीं सकते। जब विचारों के बीच में अंतराल हासिल करना हो। एक महान प्रेम, महान प्रेम और देखभाल [अस्पष्ट] है, बस प्रेम है। कभी-कभी मुझे लगता है कि आप में से कुछ मेरे पास इसीलिए नहीं आते क्योंकि यह बहुत अधिक अहंकार है। [अस्पष्ट]

साथ चलें। बस एक नजर डालें। आंखें खोलो। [अस्पष्ट] अब आप उस बिंदु को स्पर्श करें। लेकिन उनमें से कुछ मुझे पता चला कि प्रति-अहंकार से पीड़ित हैं। उन्होंने मुझे बताया है कि माँ हमें लगता है कि हमने पाप किया है और आप हमें कभी माफ नहीं कर सकते। लेकिन उदाहरण के लिए हम इन्हें कैसे ठीक करते हैं, तब मैं कहती हूं कि मेरे प्यार से बड़ा कोई अपराध नहीं है। मैं इसे चुनौती दे सकती हूं। केवल एक चीज यह है कि यदि आप इसे छोड़ना चाहते हैं तो आपने उन सभी चीजों को छोड़ दिया है और हर चीज की मदद की जा सकती है। और माँ कभी भी इस हद तक बोझ नहीं संभाल सकतीं कि वह इसके लिए आपको माफ नहीं करे। और इसीलिए केवल यदि आप हैं तो बस इतना ही, आपको कुछ भी ज़्यादा करने या कुछ कम करने की ज़रूरत नहीं है, बस वहीं बने रहें, स्वयं बनें और [अस्पष्ट]। यह आप में से कई लोगों में इस तरह कार्यान्वित हो चुका है। लेकिन आपको यह समझना होगा कि यह एक गंभीर मामला है। पश्चिमी चीज़ में हम इतने सालों से काम कर रहे हैं। आप सभी साक्षी [अस्पष्ट] रहे हैं। आपने जो पाया है वह यह है कि आप मेरे व्याख्यानों के साथ स्पर्श करते हैं, आप उस बिंदु को स्पर्श करते हैं और आपको एक जबरदस्त अनुभव मिलता है। हाँ ऐसा होता है। होता है, क्यों? क्योंकि आपको जानकारी होना चाहिए कि यह क्या है लेकिन फिर आपको इसे स्वयं प्राप्त भी करना होगा। स्वयं को समझ कर। कुछ चीजें जो आपको मिली हैं, उन पर कभी बात नहीं हुई, मुझे पता है। वे बनाई हुई हैं। आप इसे बिल्कुल भी न खोएं। आप भी निःसंदेह निर्लिप्त हो जाते हैं। तुम तुरंत बात करना शुरू कर देते हो कि कुछ यहां हुआ है, कुछ वहां हुआ है। लेकिन आप हर समय वायब्रेशन महसूस नहीं करते हैं। कुछ लोग नहीं करते हैं। [अस्पष्ट]।

वह सब जो किताबों और ग्रंथों [अस्पष्ट] में वर्णित है। लेकिन यदि आप इसे  प्राप्त नहीं करते हैं, तो अपने आप से संतुष्ट न हों। जानिए इसे कार्यान्वित होना है। अगर आज नहीं कल तो इसे साफ करना ही होगा। लेकिन यह सिर्फ मनोरंजन की तरह चलने वाला नाटक नहीं है। जैसे किसी ने मुझसे कहा कि हम एक बड़ा भोज करने जा रहे हैं और क्या आप आ सकती हैं और हमें भाषण दे सकते हैं और क्या आप हमें दस मिनट में सब कुछ समझा सकती हैं। बल्कि यह कठिन है। मैंने कहा तुम सफाई क्यों देते हो, मुझे क्यों बुलाना चाहते हो। आपको ऐसे बहुत से लोग मिल सकते हैं। आपको एक मनोरंजन करने वाला भी मिल सकता है जो समझा सकता है। [अस्पष्ट] किस तरह आपको अपनी अनुभूति होती है।

पूरी दुनिया को जो चाहिए उसका यही जवाब है। आपको सत्यापित करना होगा। इसे कार्यान्वित होने का मौका दें। इसलिए मैंने कहा कि बिना अनुभव के कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाहिए। लेकिन एक बार जब आपको यह अनुभव होने लगे तो इसे याद रखें। इसे अपने भीतर रखें। मुझे कहना होगा [अस्पष्ट] आप वास्तव में महान लोग हैं क्योंकि आप संघर्षरत हैं, आप चोटिल है और आपको समस्याएं हैं और जो चीजें आपके साथ हुई हैं। इतना सब होते हुए भी तुम्हें अपना आत्मसाक्षात्कार हो गया है। कुंडलिनी इतनी महान है, इच्छा इतनी महान है कि वह यह सब निकल फेंकती है और सब कुछ  [अस्पष्ट] का उपचार कर देती है। हमने इसे पाने [अस्पष्ट] में उम्र नहीं लगाई। आपको प्यार करना और समझना होगा कि आप इस उद्देश्य के लिए विशेष रूप से बनाए गए इंसान हैं। और आप ईश्वर के साधन हैं और इस धर्म को बनाए रखने की जिम्मेदारी आप लोगों पर है।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करें।

मुझे लगता है कि अगर हमारे पास थोड़ा समय है तो हम इसके अनुभव से गुजर सकते हैं। मैं इन बातों को कहने की कोशिश करूंगी और शायद मैं थोड़ी बात करूंगी लेकिन यह एक बहुत ही जटिल विषय है। और यह सब इतने कम समय में नहीं बताया जा सकता। लेकिन मैं इसे जारी रखूंगी और अब मैं आप सभी के लिए यहां चार दिन और रहने जा रही हूं। और हम बार-बार वार्तालाप [अस्पष्ट] करने जा रहे हैं। और हम कई लोगों को आत्मसाक्षात्कार देने जा रहे हैं। हम आपसे इन सभी बातों के बारे में बात करने जा रहे हैं, सूक्ष्म पक्ष, सब कुछ। लेकिन सिर्फ कुछ जानने और बाहर निकल जाने के लिए मेरे व्याख्यान में न आएं। आप को ऐसा नहीं करना चाहिए। कृपया कुछ लेने के लिए यहां आएं। उसमें से कुछ पाने के लिए। और फिर कुछ देने के लिए। [अस्पष्ट] मेरी पूरी भावना और मेरी पूरी इच्छा है कि आज आप में से अधिकांश बोध पायें[अस्पष्ट]।

अब अगर आपका मन बहुत ज्यादा सवाल कर रहा है। अगर आप मुझसे सवाल पूछते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं जवाब [अस्पष्ट] देने की कोशिश करूंगी। और मन के अनुभव सब मूढ़ और मूर्खतापूर्ण हैं। [अस्पष्ट] पिछले शनिवार को दो भारतीय आए थे। उन्होंने ऐसे बेतुके सवाल पूछे जिससे इन लोगों का पूरा माहौल खराब हो गया। यह सबसे बुरी बात थी। तर्क-वितर्क से या चर्चा करके आप यहां नहीं पहुंचे हैं। लेकिन सबसे अच्छी बात यह होगी कि इसे प्राप्त करें और फिर इसे जानें। यदि आपके कोई प्रश्न हैं तो हम उसका उत्तर दे सकते हैं। आप इसे बाद में लिख सकते हैं। लेकिन अभी प्रश्नों को एक तरफ रख दें क्योंकि आप के प्रयास करने के दौरान आपको वह नहीं मिला है। तो जैसे एक माँ ने तुमसे कहा है कि, अगर तुम्हें भूख लगी है, तो मैंने खाना बनाया है, तुम बैठ कर खाना खा सकते हो। अगर तुम्हें भूख नहीं है तो तुम प्रश्न पूछते रहते हो। लेकिन अगर आप भूखे हैं आप खाना खा सकते हैं| [अस्पष्ट]।

मैं १० या १२ ता.को भारत जा रही हूँ। और फिर फरवरी या मार्च के महीने में वापस आ जाउंगी। और फिर हम इन चीजों को फिर से शुरू करने जा रहे हैं। और हमें इसे इस तरह से और अधिक प्रचारित करना है जो उचित हो लेकिन मैं नहीं चाहती [अस्पष्ट]