Atma Ki Anubhuti

(भारत)

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Atma Ki Anubhuti, 28th December 1977

[Hindi Transcription]

आपसे पिछली मर्तबा मैंने बताया था, कि आत्मा क्या चीज़ है, वो किस प्रकार सच्चिदानंद होती है, और किस प्रकार आत्मा की अनुभूति के बाद ही मनुष्य इन तीनों चीज़ों को प्राप्त होता है। आत्मसाक्षात्कार के बगैर आप सत्य को नहीं जान सकते। आप आनन्द को नहीं पा सकते। आत्मा की अनुभूति होना बहुत जरूरी है। अब आप आत्मा से बातचीत कर सकते हैं। आत्मा से पूछ सकते हैं। आप लोग अभी बैठे ह्ये हैं, आप पूछे, ऐसे हाथ कर के कि संसार में क्या परमात्मा है? क्या उन्ही की सत्ता चलती है? आप ऐसे प्रश्न अपने मन में पूछे। ऐसे हाथ कर के। देखिये हाथ में कितने जोर से प्रवाह शुरू हो गया। कोई सा भी सत्य आप जान नहीं सकते जब तक आपने अपनी आत्मा की अनुभूति नहीं ली। माने जब तक आपका उससे संबंध नहीं हुआ। आत्मा से संबंध होना सहजयोग से बहुत आसानी से होता है। किसी किसी को थोड़ी देर के लिये होता है। किसी किसी को हमेशा के लिये होता है। आत्मा से संबंध होने के बाद हम को उससे तादात्म्य पाना होता है। माने ये कि आपने मुझे जाना, ठीक है, आपने मुझे पहचाना ठीक है, लेकिन मैं आप नहीं हो गयी हूँ। आपको मैं देख रही हूंँ और मुझे आप देख रहे हैं। इस वक्त मैं आपकी दृष्टि से देख सकूँ, उसी वक्त तादात्म्य हो गया। आत्मा के अन्दर प्रवेश कर के वहाँ से आप जब संसार पे दृष्टि डालते हैं तब कहना चाहिये आत्मसाक्षात्कार पूर्णतया संपन्न हो गया। कुण्डलिनी का जागरण, उत्थापन तथा भेदन सब कुछ हो गया, जो लोग पार हैं। सहस्रार टूट गया। आप चक्रों के द्वारा अपनी स्थिति और दूसरों की भी स्थिति को बहुत अच्छी तरह पहचान लेते हैं। उसकी जानकारी होने लगी। लेकिन अभी आप आत्मा के साथ तदाकार नहीं हये। आत्मा से तदाकार होने के लिये, सब से पहले ‘मैं नहीं हूँ’ ऐसा मानना चाहिये। वही वो है, तू ही तू है। पहले आत्मा को मानना चाहिये कि ‘तू ही तू है। मैं नहीं हूँ।’ कबीर दास ने बहुत अच्छे से कहा है कि, जब धुनकने वाला धुनकता है, तब धुनकी की आवाज आती है, ‘तू ही तू ही’। लेकिन जब बकरी के पेट में आंतडियों के रूप में होती है तब कहती है ‘मँ, मँ, मँ (मैं, मैं,मैं)। फिर बकरी के आंतडियों से निकल के उसकी अच्छी पिटाई होती है, तानी जाती है, सुखायी जाती है, और जब उसे फिर धुनकनी पे लगाते हैं, वो हर समय कहती है, ‘तू ही तू ही। ऐसे ही | हमारे मन का है। मन को खूब अच्छे से देखना चाहिये। देखो तो भला। ये मन कैसा है? कहाँ भटकाते रहता है हमको? कहाँ भटकाते रहा व्यर्थ की चीज़़ों में? हमारा चित्त कहाँ जाता है? कभी इसको देखते हैं, कभी उसको देखते हैं। कभी इस चीज़ को देखते हैं, कभी उस चीज़ को देखते हैं। हर समय हमारा मन किसी न किसी भावना या वासना से भरा रहता है। अब उसमें प्रकाश हो गया, हम देखते हैं कि उसमें वासना है, उसमें भावना है, लेकिन तो भी हम इस गंदी चीज़ को हमारे साथ लिये जा रहे हैं। इसको धुनकना है। मारना-पीटना नहीं है। धुनकना है। उस की ओर देखें। उसके प्रकाश को प्रज्वलित करें। ‘हे मन, देखो , तुम तो परमेश्वर का मंदिर हो ना ! परमेश्वर के मंदिर में ऐसी गंदी भावना क्यों आयीं? इसको तुम बाहर ही रखो। बहुत हो चुका।’ पहले सभी लोग ऐसा लिखते थे कि, ‘मन समज, समज पग धरी।’ हे मन दुनियाभर की चीज़़ों के लिये दौड़ते हो। तुम परमात्मा के लिये कब तुम दौड़ोगे? परमात्मा को अपने अन्दर कब बसाओगे? तुम्हें ये चिंता रहती है कि मेरे बेटे का क्या होगा? मेरे माँ का क्या होगा? मेरे बाप का क्या होगा ? अरे मन, ये तेरे कौन रह चुके? ये कोई तेरे हुये हैं? ये कोई तेरे अपने हैं? उनके लिये क्यों तुम हर बार इस तरह से परेशान होते हैं। अपने मन से बात करें। धीरे धीरे इस तरह से मन की सफ़ाई होते हुये, आत्मा का प्रकाश प्लावित होने लगेगा। उस प्रकाश से आपमें आनन्द की लहरियाँ बहनी शुरू हो जायेगी। आप में जड़त्व लाने वाली जितनी भी चीज़ें हैं, धीरे धीरे घटती जायेंगी और आप अपने आत्मा में लीन होते जायेंगे। इस वक्त आप कहेंगे ‘मैं, मैं ही हूँ, और कुछ नहीं। यही भावना रह जाती है कि ‘में हूँ।’ आत्मा ही आप हो जाते हैं और आप कहते हैं कि ‘मैं ही हूँ।’ जब आत्मा के अन्दर से दृष्टि होने लग जाती है तो आप कहते कि ये ‘मैं हूँ।’ ये संसार मैं हूँ। ये सृष्टि मैं हूँ। ये समुंदर मैं हूँ। ये दुनिया की कोई चीज़ ऐसी नहीं कि मैं नहीं हूँ। हर एक चीज़ में मैं हूँ। मैं ही बसा हुआ। हर चीज़ में मेरा ही वास है। मेरे से ही सारी सृष्टि स्पंदित है। मेरे बगैर सृष्टि का निर्माण ही नहीं। मैं ही मैं सब कुछ। ये अहंकार नहीं, ये वास्तविक है । ये असलियत है। इसे अस्मिता कहते हैं । लेकिन इसे पाने के लिये सब से पहले हमारा जो झूठा ‘मैं’ है उसे तोड़ना होगा। झूठे ‘मैं’ में अनेक चीज़ें हैं। शुरू से आप देखें, ‘मैं हूँ हिन्दुस्तानी, मैं हूँ हिन्दू, मैं हूँ मुसलमान,मैं हूँ जैन, मैं हूँ फलाने नाम वाली, मैं हूँ फलाने नाम वाला। मेरी ये पोजीशन, मेरा ये पैसा, मेरा ये गरूर। मैं साड़ी हूँ, मैं कपड़े हूँ, मैं स्वेटर हूँ, सूट्स हूँ, सब कुछ हूँ।’ मैं, मैं नहीं हूँ। बाकी सब ‘मैं’ होगा। इस तरह से अनेक ‘मैं’ में लपटा हुआ सारी जिदंगी बिताते रहता हूँ। फिर एक क्षणभर बैठ के सोचना चाहिये कि ‘क्या इसलिये मेरा जन्म हुआ था ? सारी जिंदगी मैंने क्या किया? कहाँ गये ये दिन? कहाँ बिताया मैंने? अपना सारा समय कहाँ बर्बाद किया मैंने?’ सहजयोग के बाद भी बहुत से लोग अभी भी अपना समय बहुत बर्बाद करते हैं। फिर वो समय नहीं आने वाला इस बात को नहीं समझते हैं। बहुत लोग बर्बाद करते हैं। गलत जगह चले जाते हैं और फिर आ के कहते हैं कि, ‘माँ, मेरा सर पकड़ गया है।’ क्यों ऐसा समय बर्बाद करना है? इसमें रखा ही क्या है? ऐसे तो हजारों लोग अपना समय बर्बाद करते हैं। लेकिन पार होने वाले लोगों को आत्मा में लीन होना चाहिये। सब हो गया। भंडार खोल दिये। दरवाजे खोल दिये। अन्दर भी आ गये। अब हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं। अब इसे क्या किया जाये? भाई, हम आपके लिये खाना बना सकते हैं। आपके मुँह में डाल सकते हैं। अब आपका पचा तो नहीं सकते ना! ये तो आप ही को पचाना है। उस की कोई मेहनत नहीं है खास। सब चीज़ के लिये टाइम होता है। इस चीज़ के लिये टाइम नहीं होता है। अपनी और चित करें. आखिर हमने पाया क्या है आज तक? दो-चार साड़ियाँ पा ली। दो-चार जेवर पा लिये। आठ – दस पंगे पा लिये, फलाने के फलाने थे, ढिकाने के ढिकाने थे । ऐसे हज़ारों आये और गये। दुनिया में आये और खत्म हो गये। उनका क्या हुआ? मिट्टी हो गये सब लोग, मिट्टी से कोई नरक में गये। कोई कुछ हो गये। कुछ पत्थर हो गये। क्या हुआ? अब जो फूल खिले ह्ये हैं, उनको तो फल बनना पड़ेगा। परिपक्वता आनी पड़ेगी। अपने विचारों में, अपने संलग्नता में, अपने ध्यान में। जीवन अगर अत्यंत सुन्दर बनाना है, तो सुंदरता को अपनाना पड़ेगा। उसका जो कुछ असुंदर है, जो कुछ अग्ली (ugly) बदसूरत है उसको निकाल फेंकना पड़ता है । लेकिन अभी भी हम लोग उस चीज़ में थोड़ा थोड़ा लिपटे चले जा रहे हैं। आज एक साहब आये थे। मेरे सामने कहने लगे कि, ‘मैं सिगरेट पिऊँ माताजी तो कोई हर्ज तो नहीं?’

मैंने कहा, ‘मुझे क्या हर्ज है, तुम को हर्ज है या नहीं?’ अरे, मेरा क्या हर्ज है। मैं क्या करती हूँ? मैं तो चुपचाप देख रही हूँ कि कौन कहाँ हैं? कैसे चल रहा है? मुझे हँसी आती है लोगों पे, कि अमूल्य को छोड़ कर के, अनमोल को छोड़ कर के, ये क्या? सहज भावना से परमात्मा से कहना चाहिये कि ‘तेरा खेल होने दे अब. मेरा बहुत हो चुका. मैं बैठा हूँ. अब तू खेल. देखना मुझे. मेरा क्या.’ इसके अलावा माँगने का क्या है संसार में? नहीं तो व्यर्थ, junk जिसे कहते हैं वो हो जाएगा । समझ लीजिये, कल, ये माइक बनाया गया है और इतना खराब हो जाये कि फिर चल न सके। तो ये कहाँ जायेगा, मालूम हैं न आपको! उसका लोहा पीट-पाट कर के और फिर से मशीन में ड्राल दिया जायेगा। बाकी इसकी आत्मा तो खत्म हो गयी। आपका जो इन्स्ट्रमेंट बनाया गया है, वो अगर इस्तेमाल न करे आप तो उसकी इफिशिअन्सी पूरी खत्म हो जायेगी की नहीं ? और उसका एन्जॉयमेंट कहाँ रहा ? मैं तो आपको एन्जॉयमेंट की बात कर रही हूँ। किसी को कुछ हो रहा है, किसी को कुछ हो रहा है। ध्यान में कितनी प्रगति की? आप क्या बने ? यही सहजयोग में सवाल पूछा जाता है। आप पूछते हैं, भगवान हैं या नहीं? ठीक है, इसका जवाब दे देंगे । वाइब्रेशन्स से आपको दे देंगे । आपके सवाल ठीक हो जायेंगे, आपकी तंदुरुस्ती ठीक हो जायेगी, आपकी मानसिक दशा ठीक हो जायेगी, आपके बच्चे ठीक हो जायेंगे, आपकी फाइनॅन्शिअल कंडिशन ठीक हो जायेगी, सब ठीक हो जायेगा। आप भगवान के लिये क्या दे रहे हैं? अरे कुछ देने का नहीं है। लेने का है। आप कहाँ तक ले रहे हैं उस से। ये सवाल आप से पूछे कि, ‘हमने सब ले लिया? जितना माँ दे रही हैं, उसमें से कितना हम ने ले लिया है? क्या पूरा के पूरा ले लिया।’ सब कुछ क्या पालिया ? अपना रास्ता भटक भटक के हम कहाँ चले जाते हैं। क्यों न हम इसे पा लें! संसार की चीज़ें तो चलती ही रहती हैं। उसमें रखा क्या है? कोई मिलने आया, कोई चला गया, कोई कुछ हुआ। इसमें रखा क्या है? हमने कितना पाया है? एक- एक इन्सान एक- एक इन्स्टिट्यूशन है, मैंने कहा था। एक- एक इन्सान एक- एक संस्था है। हमारे यहाँ पाटील आते हैं। आप जानते हैं। एक छोटे से गाँव से आते हैं। कालवा नाम का गाँव है। छोटीसी झोपड़ी में रहते हैं। उनकी जमीन है थोड़ी बहुत। हर प्रोग्रॅम में आते हैं कालवा से। उनको भी खेती करनी है। उनके बच्चे हैं, उनको पालना-पोसना सब कुछ करना है। हर प्रोग्रॅम में आते हैं। अपने घर में उन्होंने ये लगा के रखा है, कि सहजयोग, माताजी निर्मलादेवी का सहजयोग। वहाँ से कितनी ट्रेन्स(trains) जाती हैं। सब देखते हैं। मैंने भी एक बार जा के देखा। कहा कि, ‘ये कहाँ, मैं यहाँ कहाँ आ गयी? यहाँ कहाँ मैं विराजमान हूँ?’ कुछ लोगों ने कहा, ‘यहाँ कैसे माताजी निर्मलादेवी का सहजयोग निकाला? ये पाटील का मकान है?’ मैंने कहा, ‘हाँ।’ और थडाथड वाइब्रेशन्स वहाँ से आ रहे थे। उनके पास आज हजारों में रुपया होता तो भी उनकी इतनी इज्जत नहीं होती कि जितनी आज उनकी इज्जत है उस गाँव में। मैं गयी थी वहाँ। सब लोगों ने पैसा इकठ्ठा कर के वहाँ सारा इंतजाम किया| बहुत बढ़िया प्रोग्रॅम किया। आज उनकी इतनी इज्जत है, कहीं खड़े होते तो सब लोग जानते हैं कि कोई खड़ा है, है कोई चीज़। आखिर पाने का क्या है? चार जेवर पहनने से कौन सी बड़ी आपकी शोभा होने वाली है! लोग तो पीठ पीछे हँसते ही हैं आपके ऊपर! कैसे महामूर्ख हैं लोग! आपने मानवता में कितना पा लिया। आपने अपनी किमत पा ली है। यही असली बात है। वहाँ से लोग जाते वक्त उनके घर को भी नमस्कार करते हैं । मनुष्य की पहचान उसकी बाहर ही में कुछ नहीं होती, उसके अन्दर ही होती है ।

आपको में शास्त्री जी का उदाहरण देती हूँ। शास्त्री जी बहुत थोड़ी ही समय के लिये जीवित रहे । जब उनकी मृत्यु हुई, उनके अस्थि को ले कर के हम सभी लोग गये थे। मैं भी थी उसी में। तो जो कलश थे, अस्थि तो कोई दिखायी नहीं देती थी। शास्त्री जी तो बिल्कुल ही नहीं देते थे । सिर्फ थोड़ी सी अस्थियाँ थी उस में, अॅशेस, वही कलश में रखी थी। उस कलश को देखने के लिये जहाँ से ट्रेन जा रही थी, रास्ते भर लोग खड़े थे , लालटेन ले कर। ट्रेन धीरे-धीरे जाती थी। सब उस कलश के दर्शन के लिये बस नमस्कार करते थे। और जब वो अस्थियाँ समर्पित हो गयी गंगा जी में, उसके बाद सब कहने लगे, ‘वो कलश गये कहाँ?’ पता नहीं कहाँ पड़े थे ? वो खोजने से भी नहीं मिले । लोगों ने कहाँ, जाने दो, हटाओ। कहीं चले गये होंगे । किसी ने चुराये भी नहीं। एक बैलगाड़ी के नीचे में पड़े थे। वहाँ से उठा के लाये। मैंने कहा, ‘देखो, इन कलशों को ही अभी तक नमस्कार करते आये। वहाँ से ट्रेन धीरे धीरे चलती आयी। हज़ारों मील से लोग आ कर उस कलश के दर्शन कर रहे हैं। और उस कलश में दूसरे भी वो अॅशेस ही थे न! वो जैसे ही विसर्जित हो गये उस कलश को किसी ने पूछा भी नहीं! किसी काम का भी नहीं । कोई अर्थ ही नहीं रहा उसमें । एकदम यूसलेस चीज़। उसकी कोई किमत ही नहीं रही । किसी ने उसको सजाया भी नहीं, सँवारा भी नहीं, देखा भी नहीं । वहाँ नीचे में फेंक दिया, बैलगाड़ी के नीचे में | वो कहीं जा के खत्म हो जाते। और जब उसको उठा के लाये, लोगों ने कहा, ‘कहाँ रखें बेकार की चीज़़ ? इसको क्यों उठा के ले जा रहे हैं? फेंक दो इसको गंगा जी में। क्या रह गया?’ ऐसे ही आपके शरीर का, आपके व्यक्तित्व का है । मृत्यु से पहचान होती है मनुष्य की। इसे जानना चाहिये हर एक आदमी को मृत्यु आती ही है। उसकी परख कैसी होगी? उसकी परख के लिये मृत्यु आती है। किसी के लिये दो आदमी रोते हैं, किसी के लिये दस आदमी रोते हैं, किसी के लिये पच्चीस आदमी रोते हैं। कोई कहता है मेरा पति मर गया, कोई कहता है मेरी माँ मर गयी, कोई कहता है मेरा बाप मर गया। लेकिन कुछ कुछ लोग ऐसे होते हैं जब मर जाते हैं, जहाँ उनकी अर्थियाँ गड़ जाती है, वहाँ से सुगन्ध की लहरें बहती हैं। उसके पास से आप गुज़र जायें तो कहते हैं कि,”किस के पास आ गये?” मैं काश्मिर में गयी थीं | आश्चर्य की बात है, हमारी मोटर चली जा रही थी। मैंने कहा, ‘रोको, रोको, रोको । यहाँ किस की समाधि है?’ कहने लगे, ‘समाधि नहीं है, मोहम्मद साहब का एक बाल रखा हुआ है यहाँ पे। उसे इक्बाल कहते हैं।’ उसी को मैंने नमस्कार किया। एक बाल उनका वहाँ रखा हुआ है, उस से ऐसे वाइब्रेशन्स चारों तरफ़! नहीं तो हम है किस चीज़ के? हमारी कीमत ही क्या है? और जब ये दीप जल गया है, हमारे अन्दर प्रकाश आ गया है, तो उसकी तो इज्जत करो । उसको तो सम्भाल लो। उसको तो अपनाओ। ये सोचने, समझने की बात यही है। बाकी सब व्यर्थ का करते बैठते हो। बाकी में सोचने की कोई जरूरत नहीं । करने वाला सब परमेश्वर है | सब कुछ वो करता है। अगर आपको सोचना ही है तो ये सोचना है कि ‘क्या मेरा दीपक इस योग्य है! मैंने कहाँ रखा है मेरा दीपक।’ दीपक जला कर के, आप क्या टेबल के नीचे रखियेगा ? ये कौनसा तरीका है? इसका मापदण्ड अपनी ओर ले लेना चाहिये। इसको सोच लेना चाहिये, कि हमने अपनी मानवता कहाँ तक जगायी? उसको कितना हमने मैनिफेस्ट किया है? कितना हमारे मानवता का प्रकाश फैला है? दुनिया क्या कहती है हमारे लिये?

आप लोग मुझे मानते हैं न माँ और गुरु भी मानते हैं। ठीक है। मेरे जीवन की ओर भी तो दृष्टि करनी चाहिये। सोचो, हजारों वर्षों की तपस्या के बाद हम मनुष्य हये हैं। हजारों वर्षों के बाद। और मनुष्यता के नाते आने पर समझा की मनुष्य क्या होता है? लेकिन तो भी मैं अभी नहीं समझ पाती हूँ, कि अमूल्य रत्न हीरा मिलने पर भी मनुष्य उस की कीमत क्यों नहीं करता है? मुझे बहुत ही कठिनाई होती हैं। बिल्कुल कैज्यूअली आदमी रहता हैं इस मामले में। सोचता है, कि क्या चले जायेंगे, होता है, कर लेंगे। कारण ये है कि हीरे का मूल्य बाज़ार में जा के पूछ सकते हैं। इस के लिये कोई बाज़ार नहीं । इसका बाज़ार आप ही का मन, आप ही का हृदय, आप ही का संतोष, आप ही का विचार। सब कुछ आप ही के अन्दर, आप ही के संतोष की बात है। अपने में ही आप खेलते हैं, अपने में ही आप जागते हैं, अपने में ही आप रहते हैं, अपने में ही आप मज़ा लेते हैं और इतने सारे जो अपने हैं उनके साथ आप रचते हैं। उन्हीं के अन्दर बिराजते हैं। एक आदमी कहता है कि देखो, ये सहजयोगी है हमारे यहाँ। है एक आदमी। और एक वो है कि ऐसा। क्या आप सहजयोग को बदनाम कर रहे हैं या उस को सुनाम दे रहे हैं? लोग क्या कहेंगे? ध्यान में गहरा उतरना आना चाहिये। गहरा उतरने से नहीं होता। उसे फैलाना पड़ेगा। अगर आपने फैला नहीं तो परमात्मा आप से पूछेंगे, ‘क्या आपका दीप किस लिए जलाया था? कि आप अपने सांसारिक भवसागर में घुस कर के फिर से बुझ जाओ। इसलिये दीप आपका जलाया था माँ ने ? आप किसलिये माँ के पास गये थे ? जागृति क्यों करने के लिये गये थे? किस वजह से? लगन होनी चाहिये। विचार, सारा प्लॅनिंग यही होना चाहिये कि, ‘मैं अपने क्षण-क्षण कैसे रहूँ? कैसे चलेंगे?’ यही प्लॅनिंग होनी चाहिये। दुनियाभर के प्लॅनिंग बंद करिये। वो सब परमात्मा करता है आपके लिये। उल्टा ही प्लॅनिंग हमेशा दिमाग चलाते रहता है। जिससे हमारा धर्म टूटता जाये। ये की सबेरे उठेंगे। हाँ थोड़ी देर बात बैठेंगे। थोड़ा सो ही लें। बहुत कैज्यूअल हो जाता है। सहज चीज़ बहुत सहज मिलती है, इसमें कोई शंका नहीं। लेकिन जो सहज हुई है, माने जो आपके साथ जन्मी है, इस की बहुत बड़ी, पुरानी परंपरा चली आयी है और वो बनायी गयी है। उसकी आप कीमत नहीं समझते हैं। उसको आप ना ही नाप सकते हैं कि ये कैसे हुआ? कैसे कुण्डलिनी बनायी गयी? कैसे चढ़ायी गयी? कैसे आपको आत्मसाक्षात्कार हुआ? आप तो सोचते हैं कि हाँ मिल गया, जैसे बाज़ार में जा के आपने एक साड़ी खरीदी ली हो। चाहे कपड़ा खरीद लिया हो। नहीं, नहीं ये अनन्त की तपस्या है। इसे आपने पाया है। इसका मूल्य जानिये। इसमें गहरे उतरें। गहरे उतरना पड़ेगा, गहरे जाना पड़ेगा, तब आनन्द और सुख संसार में आयेगा। संसार की समता, एकता, ये संसार का उत्थान, सभी कुछ आप सहजयोगियों पे हैं, ये तो कम से कम समझ लेना चाहिये। इसकी जिम्मेदारी समझ कर के, आगे बढ़ना चाहिये । अब आपने देखा ना, जिनको बाधा होती है वो आँख भी नहीं बंद कर पाते। सामने दिखायी देता है। पागल कोई आये, वो आँख नहीं बंद कर सकता मेरे सामने । उसको फौरन मैं पहचान जाती हूँ कि इसको बाधा है। फिर बोले चाहे न बोले। अगर आपकी आँख इधर -उधर ज़यादा चले तो समझ लेना चाहिये कि बाधा है। स्टेडी क्यों नहीं हो पाती आँख? आपका चित्त इधर – उधर जा रहा है तो समझ लेना चाहिये कि कोई न कोई हमारे अन्दर बाधा है। क्यों नहीं हो पाती? हमारा मन अगर छोटी-छोटी चीज़ों में उलझता है और छोटी-छोटी चीज़ों में हम अगर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं, और कुछ भी नहीं कर रहे हैं जो कि करना चाहिये सहजयोग के लिये, तो सोचना चाहिये कि हमारे अन्दर कोई न कोई बाधा आयेगी। नहीं तो होना चाहिये।

अगर आप देखें तो नॉर्मली ऐसा ही होता है, अगर मनुष्य को कोई धन मिल गया, तो फौरन उसके व्यय में उलझ जाता है। बहुत से लोग पूछते हैं कि माताजी, वाइब्रेशन्स आ गया अब आगे क्या ? अरे भाई, आपकी संस्था बना दी। अब संस्था चलाओ। संस्था बनाने की बात हमने कर दी। संस्था बनाने का तो बना दिया, अब आगे चलाओ| अब संस्था खोलो अपनी और उसको चलाओ| कोई कहेगा की लो, भारतीय विद्या भवन बना दिया, अब आगे क्या? अब इसको चलाना है कि नहीं चलाना है? जिस चीज़ के लिये बनाया है वो तो करो। इसलिये बनाया कि दूसरों को प्रकाश दें। दूसरों में प्रकाश भरें, इसलिये आपकी संस्था बनायी। अब आप कर रहे हैं क्या यह काम। धन बाँटो तो सही, बाटने से कितना बढ़ता है। इसमें कोई शक नहीं। पर बाँटते फिरो | पागल के जैसे बाँटो। देखो तो सही कितना बढ़ता है। जितना बाटोगे उतना बढ़ेगा| इसको बाँटे बगैर मज़ा नहीं आने वाला। कृपणता करने वाला आदमी कभी सुखी नहीं हो सकता। उसको कोई न कोई बीमारी होगी। या तो उसको शारीरिक तकलीफ़, मानसिक तकलीफ़, उसको ये तकलीफ़, उसको वो तकलीफ़। क्योंकि अन्दर से सन्तुलन ही नहीं है तो सब बीमारियाँ । बीमारी माने विकृति। और सुकृति यही है। उसको बाँटो, उसको दो| मुफ्त मे यह नही कहने का कि मेरी पॉवर है। नहीं, नहीं, कुछ नहीं कहने का। सिर्फ कहने का कि ‘ मेरे अन्दर से बह रहा है भाई । ले लो तुम भी। तुम भी ले लो, में । ये तुम भी ले लो। अपने यहाँ फड़के देखें। मैं इनके बार-बार उदाहरण देती हूँ। क्या है? एक टीचर है बेचारे। जब उनको मौका मिलता है, जहाँ मौका मिलता है, जिस परिस्थिति में, अपने बहन से कहो, भाई से कहो , सब से कहो । भाई देखो, तुम अगर बीमार हो तो हम कुछ नहीं कर सकते। तुम सहजयोग में आओ तो हम बात करें। कोई आप के दोस्त हैं। मिलने को आते हैं। खाने-पीने पे हजारों रुपया खर्चा करते हैं। लोगों को शराब पिलाने में हजारों रुपया आप खर्चा करते हैं। भाई , थोड़ासा वाइब्रेशन्स पे भी खर्चा करो। ये कहने में क्या जाता है, कि हमारी माताजी कहती हैं कि |

शराब पीना बुरी बात है। शराब मत पीना। यहाँ तो सहजयोग में आते हैं और घर में शराब पीला ते हैं। भाई, ये बुरी चीज़ है तो बुरी चीज़ है! समझ लेना चाहिये। मोहम्मद साहब कोई पागल थे, कि नानक साहब कोई पागल थे, दुनिया भर के लोगों ने शराब को मना किया, वो लोग पागल थे क्या? जिन्होंने जिस चीज़ को मना किया वो सब कोई पागल लोग तो नहीं थे ना! किसी ने किसी चीज़ को कहा, किसी ने किसी चीज़ को कहा। वजह ये थी कि एक कह गये, तो दूसरे ने कहा, अच्छा ये छोड़ो, दुसरा कहेंगे। लेकिन लोगों का तो ऐसा है कि इसने ये नहीं कहा तो ये न करो। उसने ये नहीं कहा तो ये भी न करो । मतलब ये, कि कुछ भी न करो। पर ये किस के लिये खोज रहे हो ? किस के लिये बना रहे हैं आप? अपने ही लिये। और कोई भी नहीं इसमें नुकसान पाने वाला। आप खुद ही अपना नुकसान अच्छे से कर रहे हैं। एक हाथ इधर मार रहे हैं, एक हाथ इधर मार रहे हैं। दोनों हाथ से अपना नुकसान आप कर रहे हैं। जो चीज़ बुरी है उसको छोड़ना है। उसमें उलझना ही क्यों? उसमें पड़ना ही क्यों? फॅनेटिज्म है, कि कोई | एक मैं फलाना ठिकाना हूँ, मैं हूँ हिन्दू कि मैं कौन हूँ। पता नहीं कौन कौन बन के बैठे हये हैं। है कोई भी नहीं। इस तरह के पागलपन को कब छोड़ने वाले हैं आप लोग? ये थोड़ी थोड़ी सी चीजें अगर छुट जाये, तो आत्मा में प्रवेश हो सकता है।

आत्मा में बहुत सरल तरीके से आप घुलते जायेंगे| और आपको आश्चर्य होगा कि आप ही की अवेअरनेस आत्मा की अवेअरनेस हो गयी। और आप जो बोलते हैं अधिकारवाणी से, आप कुछ बोलें एक-एक शब्द आपका पकड़ा जायेगा। एक अक्षर आपने कहा, उसी की एकदम से उसी वक्त झेल हो जायेगी। सारे के सारे चिरंजीव हाथ ले के खड़े हैं। बोलिये। इस बड़ी दशा में आने पर भी आप अपने को स्थानापन्न न करे तो आपकी कौन इज्जत करेगा। राजा अपनी इज्जत न करेगा तो लोग क्यों करेंगे? अरे, जो अपनी इज्जत नहीं करता है, अपनी पायी हुई चीज़ की इज्जत नहीं करता है, तो उसकी कौन इज्जत करेगा। एक सीधा हिसाब है। ध्यान में जमना पड़ेगा। ध्यान में चार बजे से, मैंने कहा बैठिये। उठ के बैठना पड़ेगा। कोई ऐसी मुश्किल चीज़ नहीं। चार बजे उठना कौन सी मुश्किल चीज़ है। सबेरे उठिये, बैठिये ध्यान में। दिन में एक न एक आदमी से सहजयोग की बात करो। कम से कम एक से। घर-गृहस्थी के चक्कर में औरतें हैं उनको कह रही हूँ। बाकी औरतों को तो जो मिले उससे करो। आपने जिंदगी भर बात ही क्या करी सिवाय फालतू के बातों को। लोगों को देखिये । कहेंगे इस दकान में ये अच्छा मिलता है। क्या आपको सेल्समन किसने बनाया ? कभी किसी के लिये कहेंगे, वो बड़ा अच्छा आदमी है, बड़ा बुरा आदमी है। कोई आप कोई पलीडर (pleader) है। आपने जो पाया, इतना बहुमूल्य, उसको कितना बढ़ाया आपने। अब बढ़ा के उसको जमाईये लोगों के अन्दर में। उसको बिठाईये। जब आप करना शुरू कर देते हैं तो परमात्मा साक्षात् उस पर उतर आता है। गंगा बहने लगती है आपकी चरणों से। और ऐसे आदमी की जब मृत्यु होती है, तब देखिये, जिस मिट्टी में वो दफनाया जाता है, उसकी एक-एक मिट्टी फूल बन जाती है। कितना सुगन्ध! सारे संसार के लिये इतनी बड़ी चीज़ हो जाती है। वर्षों तक उस पे दीप जलते हैं। लोग याद करते हैं कि हो गयी। इन्होंने कौन से बड़े भारी तोफ़खाने लगाये थे। फकीरों जैसे रहे वो, चाहे जैसे भी रहे। काहे को, फिर काहे को भटक रहे हैं। अब सब धर्म आपको समझाना पड़ेगा। रियलाइजेशन के पहले मैं कोई धर्म की बात नहीं करती हूँ। रियलाइजेशन के बाद सारे ही धर्म अपने अन्दर बिठाने पड़ंगे,दसों।

कट्टरता बड़ी बुरी चीज़ है। मैंने यहाँ तक देखा मोहम्मद साहब को लोग बुरा-भला कहते थे। सहजयोगी कहते हैं, आश्चर्य भी होता है मुझे! आपको किसने दिया रियलाइजेशन? आपके पेट में कौन बैठा हुआ है? कितने वर्षों की तपस्या कर के आपके पेट में प्रवेश किया हुआ है, किसने आपको जागृति दी? आज्ञा पे कौन बैठा हुआ है ? आपने बनायी थी ये सब ? जिन्होंने तपस्विता से अपने को लोहे जैसे, जीवन में इस तरह से अपने को बनाया, स्वर्ण जैसे तप कर के निकले और जिन्होंने आपके लिये सारा ये कार्य किया उनको आप मना करने वाले कौन होते हैं भाई! कौन हो ? वो तो मेरे अंग-प्रत्यंग होते। मेरे सर आँखों पर। मुझे बड़ा आश्चर्य होता कि उनको क्रिटीसाइज करने वाले आप कौन होते हैं? आप क्या हैं? किसी भी ऐसी महान शक्ति जो इन देवताओं में विराजती है उसका एक शब्द भी उसके खिलाफ कहना, एक बार भी उसके बारे में कहना, या उसके विरोध में मन में विचार आना भी, महान पाप के बराबर है। आप मान लीजिये मेरी बात। और उससे आपका हृदय चक्र, विशेषत: हृदय पकड़ा जायेगा। शिवजी को मनाना बहुत मुश्किल है, लेकिन इस बात पर वो बहुत ही तुले हये हैं। किसी भी देवता के ऊपर में आपको, कोई भी शब्द उठाना मना है। आप होंगे, आप के घर में बैठिये। इसको अगर मनुष्य समझ लें तो कभी नहीं इसकी निंदा करें। किसी भी महान धर्म की कभी न निंदा करें। और अपने धर्म में जागें, अपने को समझें, अपनी सत्ता को समझें, अपने परमात्मा को। यही एकता इसी से होने वाली है। बाह्य बातों से नहीं कि हिन्दू-मुसलमान एक है और ईसाई सब एक है, और पारसी सब एक हैं। इस बात से होने वाली है कि इस सब के जो आदिगुरु हैं, वो एक ही तत्त्व है। एक ही तत्त्व अनेक बार इस संसार में आया है और हम महामूर्खों जैसे लड़ रहे हैं। जैसे कि वो खंडों में से निकली हुई आत्मा थी, उसी तरह से हम बच गये हैं और आपस में लड़खड़ा रहे हैं। जो महान तत्त्व है, जो हर एक धर्म में जैन, बुद्ध कोई भी धर्म हो, हर एक धर्म में एक जीत उस महान तत्त्व की अनेक बार उपासना हुई हैं। उसी महान तत्त्व में हम आज पार ह्ये हैं। उसी महान तत्त्व ने आज हमें पार किया है। और जब तक उसमें आप आ जाते हैं, ऐसा ही समझते हैं कि सारे के अन्दर वही तत्त्व फैला हुआ है। सब के अन्दर वही तत्त्व स्पंदित है। तब हम में अलग-अलग होने की बात ही कैसे आती हैं? हम तो सब एक ही पेड़ की शाखायें हैं। एक ही पेड़ पे पले ह्ये सब हैं। उसके जड़ों को बुरा कहने से हम अपने ही अन्नदाता को कह रहे हैं, वो बुरा है। इतना अज्ञान संसार में रहा है। उसकी हद हो गयी। अब मनुष्य ने उसको और भी अंध:कार में डाला। और अंध:कार में डालता ही चला गया। उसमें वो बड़ा पुरुषार्थ समझता है। बड़े बड़े धर्म बनाये। कर्मकाण्ड बनाये और धर्मसंस्था बनायी। दुनिया भर के तमाशे बना बना कर के परमात्मा को घोट मारा। किसी भी महान धर्म के खिलाफ़ बोलते वक्त सोचना चाहिये कि तुम हो कौन कि किस खेत की मूली हो तुम ? तुम क्या बोलते हो? ये सोच लें। लेकिन अगर एक दूसरी बात सोचे, उस महान सागर जो अनेक किनारों पे जा कर के स्पंदित हुआ है, वही सागर हम हैं। तो क्या हम उसके अन्दर के बूँद हैं। उसी में मिले हये हैं । तो सोचिये कितनी विशालता अन्दर लगती है। वही सागर है। अनेक बार जिस सागर ने अनेक लहरों से और अनेक, अनन्त धर्म स्थापन किये, उसी सागर के हम एक अंश है, ये सोच लेने से देखिये कितनी विशालता हृदय में फैल जाती है। हृदय कितना महान हो जाता है और सारा संसार कैसे अपना ही लगे। उस विशालता का आनन्द उठाईये। तद्रपता का नहीं, लेकिन विशालता का । किस तरह से दोनों हाथ फैला कर के, ये प्रेम का सागर सारे संसार में अनेक वर्षों से महक रहा है, और उसी की सुगन्ध हम ही है। ये सोच कर के उसका आनन्द लें। अपनी क्षुद्रता को तोड़ें। अपने छोटेपन को तोड़ कर पार हो जाने से सब नहीं होता है। पार तो हो ही गये हैं। लेकिन अभी चक्र क्यों पकड़ गये है? क्यूंकी आप क्षुद्र हैं, कहीं कुछ हैं, कहीं कुछ हैं, कहीं कुछ हैं, कहीं कुछ।

अभी आप डरते हैं और किसी गुरु के पास जरूर जाते है तो पाईये वहाँ से! झूठ से हम दूर भागे, तभी सत्य हमारे ऊपर आयेगा। हम झूठ को माने हये हैं कभी सत्य नहीं आ सकता। सतर्क रहें और समन्वय हर चीज़ का करें। सब चीज़ की ओर समानत्व से देखें। समानत्व, ये शब्द देखना चाहिये कि तत्त्वत: चीज़ क्या है? तत्त्वत: जो कुछ हितकारी है, जो वाइब्रेटिंग है वो तत् । ऊपर का जो कुछ है वो व्यर्थ है । इन विचारों से चलें। अपने मन की सफ़ाई करें। धीरे-धीरे आप देखिये । रोज के व्यवहार में आप पीछे हट कर के सोचिये कि क्या मैं ये सहजयोग में कर रहा हूँ या असहज में? फौरन पता हो जायेगा। कोई मुश्किल काम नहीं। आप की तो एक एक उँगली सहज घूमनी चाहिये। आप की बाल की रेखायें भी जरा सी बदलती है वो भी सहज होनी चाहिये। हर एक चीज़ में सहज सा कंपन होना चाहिये। हर चीज़ में सहज ही का आवरण खुलता जाना चाहिये। ऐसा जीवन जब बनेगा, ऐसे ही विशेष तरह के मेरे बच्चे होंगे , तभी मैं कृतार्थ हूँ । क्या मेरे जीवन काल में ये हो सकेगा? आप चाहें तो क्षण में हो सकता है और नहीं चाहे तो नहीं। इसलिये माँ भी आपके सामने हार ही बैठती है।

भगवान भी आपके सामने झोली फैलाता है। क्योंकि इसकी स्वतंत्रता जो आपको दे चुके हैं। दी हुई चीज़ ली नहीं जाती। और ले कर के भी क्या करेंगे? आपको पुर्ण स्वतंत्रता है। आप जब चाहे आये और जब चाहे जाये। जो करे सो करे। इसका कोई बंधन नहीं। सहज योग किसी चीज़ का बंधन नहीं। किसी भी चीज़ का बंधन नहीं है । आपका, अपने विवेक का बंधन अपने ऊपर डालिये। तो आपका विवेक जागृत होगा। अपने समझदारी का बंधन अपने उपर डालिये। अपनी विशालता का बंधन अपने ऊपर डालिये। अपनी महानता का बंधन अपने ऊपर डालिये । जिसे की आप महान हो। और वही अलंकार आप को सँवारें, उसी से आप सौंदर्य में उतरें, उसी से सारा संसार देखें । कहे कि अहाहा, ये क्या एक ज्योति पता नहीं कहाँ से आयीं | इसको किसने दिया ? उस में आपके माँ का भी नाम होगा। नहीं तो कौन जानेगा? हमारे सहजयोग में सबसे बड़ी बात जो है, वो ये है, सारे धर्मों का अर्थ सहजयोग से एक्सप्लेन (explain) होता है। ये बहुत बड़ी चीज़ है। आप कोई भी धर्म की पुस्तक पढ़े, और उस को आप सहजयोग से समचर लोगों को बतायें तो लोग हैरान हो जायेंगे कि अरे इसका अर्थ ये था!

ईसाई लोगों को मैं जब बताती हूँ, तो कहने लगे , माँ, तो, ये तो बायबल में हैं। मुसलमान कहते हैं कि कुरान आप कह रही हैं। खलील जिब्रान आप कह रही हैं। बिल्कुल खलील जिब्रान ही बोल रहे हैं। ये नहीं समझ में आता है कि माँ बोल रही थी की खलील जिब्रान बोल रहे हैं? जैन कहते हैं कि अरे, यही तो हमारे शास्त्रों में लिखा है। बुद्ध कहते हैं कि यही सब हमारे शास्त्रों में लिखा है। लेकिन उसका प्रत्यक्ष हम यहाँ दे रहे हैं। उसे लीजिये। आप उसको अपनाईये और दूसरों को भी दिखाईये ।