Sahajyog, Kundalini aur Chakra

मुंबई (भारत)

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Sahajyog, Kundalini aur Chakra, Mumbai, India 30-01-1978

सहजयोग, कुण्डलिनी और चक्र मुंबई, ३० जनवरी ७८ ये सहज क्या होता है?आप में से बहुतों को मालूम भी है । नानक साहब ने बड़ी मेहनत की है और सहज पर बहुत कुछ लिखा है । यहाँ आप लोगों पर बड़ा वरदान है उनका। लेकिन उनको कोई जानता नहीं है, समझता नहीं। सहज’ का मतलब होता है स ह ज। ‘सह’ माने साथ, ‘ज’ माने पैदा होना। आप ही के साथ पैदा हुआ है। यह योग का अधिकार आपके साथ पैदा हुआ है। हर एक मनुष्य को इसका अधिकार है कि आप इस योग को प्राप्त करें। लेकिन आप मनुष्य हो तब! अगर आप जानवर हो गये तो इस अधिकार से वंचित हो जाते है या आप दानव हो गये तो भी इस अधिकार से वंचित हो जाते है। अगर आप मनुष्य है साधारण तरह से तो आप को अधिकार है कि इस योग को आप प्राप्त करें। यही एक योग है बाकी कोई योग नहीं। बाकी जितने भी योग है इसकी तैय्यारियाँ। सहजयोग के और दूसरे माने यह भी लगाते हैं हम लोग कि सहज माने सीधा, सरल, effortless, spontaneous, अकस्मात घटित होनेवाली चीज़ क्योंकि ये एक जिवन्त घटना है। जैसे आपका जन्म होना, जैसे आपका माँ के गर्भ में रहना, जैसे पेड़ों का फूलों से लद जाना, फलों में परिवर्तित होना । उसी प्रकार यह एक बड़ी भारी सहज घटना है, पिरपरशी, नॅचरल, नैसर्गिक घटना है। और यह घटना जो है ये मनुष्य के उत्क्रान्ति की चरम सीमा है। मनुष्य को जानवर से परमात्मा ने बनाया। आप जानते है अमिबा से मनुष्य क्यों बनाया? प्रश्न करना चाहिए सब scientist को बैठकर के कि आखिर क्या वजह है? समझ लीजिए मैं दो-चार कलपूर्जे इकठ्ठे करती हूँ और एक गोल चीज़ लाती हूँ और उसमें एक डंडा जोड़ती हूँ । तो कोई भी पुछेगा की भाई, ये क्या कर रहीं है ? किसके लिए कर रही हैं ? कोई भी इंजीनियर से पुछे कि वो अगर बैठकर चीज़ बनाता है तो किसी न किसी के काम के लिए, utility के लिए ही बनाता है। कोई पागल आदमी होगा बैठे हुए यूँ ही जोड़ता बैठे रहें। कोई भी समझदार आदमी किसी न किसी कारण के लिए बना है। तो परमात्मा ने मनुष्य को किसी न किसी कारणवश ही बनाया हुआ है। लेकिन यह सब बनाने के बात भी जब तक इसको मैं इस main से नहीं जोड़ूगी तब तक ये useless हो जाता है । इसका कोई काम नहीं रहता । ये बिलकुल व्यर्थ की चीज़ हैं । इसका इस्तमाल करने से कोई फायदा नहीं क्योंकि इसमें से connection ही नहीं हआ है। ये सारी समझदारी की बातें, बिलकुल commonsense की बाते । कोई इसको भला पढ़ने लिखने की जरूरत नहीं । कोई भी आदमी अगर देहात से आयें और वो कहें की ‘भाई, ये लाईट कैसे जलती हैं?’ तो आप कहेंगे की, ‘चलो भाई, वो जो बटण है उसको दबाओ तो लाइट जल जाएगी। तो शुरू में देखके अवाक रह जाएगा कि ये कैसे हुआ? बड़ी कमाल की चीज़ है। ऐसा तो हो ही नहीं सकता । पर देखता है फिर उसे लगता है हाँ भाई ऐसी बात है। इसी प्रकार कुण्डलिनी का भी है। वाकई बटण लगाने से ही खड़ी होती है । कोई शंका नहीं । लेकिन उसके पिछे बड़ी भारी इंजीनियरिंग लगी हुई है । इसके पिछे में कितनी बड़ी इंजीनियरिंग लगी है? सदियों की इसमें मेहनत लगी हुई है। पहले तो इलेक्ट्रिसिटी का किसीने पता लगाया, फिर उसको ये किया, फिर वो किया, फिर उसका वहन किया, फिर उसके बाद यहाँ लाया, फिर ट्युबलाईट्स बनीं, फिर ये सबकुछ हुआ। आप तो जानते है कितना लंबा चौड़ा इसके पिछे में काम किया गया है। इसी प्रकार आपके अन्दर जो कुण्डलिनी है वो सहज आपको मिल गई है लेकिन इसका मतलब ये नहीं उसपर काम नहीं किया। आपकी पेशानी पर बहोत काम किया गया है। पेशानी को भी बड़ी शान से बनाया गया है । मनुष्य ने जब गर्दन उपर उठायी तब उसकी पेशानी जरनी । इसलिए कहा जाता है कि सर को किसी के सामने पेशानी बहोत मेहनत से बनायी गयी। मनुष्य बहोत मेहनत से बनाया गया । झुकाना है। ये मनुष्य क्या है? असल में अन्दर क्या बनी हुई इंजीनियरिंग है? वो ये है। मेरा तो विचार अपना ये रहता है कि चलो,

पहले लाईट जला लो, फिर उसका इंजीनियरिंग समझाती हूँ क्योंकि इंजीनियरिंग जो है बड़ी सरदर्द की चीज़़ है । कोई लोग तो बोअर भी हो जाएंगे। इसलिए मैंने कहा पहले पार तो कर दूँ। मेरे बातचीत का मजा उठाते सुन भी लीजिएगा। नहीं तो बड़े बोअर हो जाते है। मैं खुद ही बोअर हो जाती हूँ समझाते, समझाते । कुण्डलिनी चक्र तो कुण्डलिनी जो है वो क्या चीज़ है उसको भी समझ लो । और जो कुण्डलिनी के बारे में दुनियाभर की बातें दुनिया में लोगों ने फैला रखी है, वह कैसे गलत है वो भी मैं धीरे धीरे इसी में समझा दूँगी । तो उसके साथ साथ ये भी समझ लो कि वो लोग अज्ञानी हैं और अज्ञान में ऐसे कार्य करते है। कुण्डलिनी के जागरण बाद क्या होता है वो मैं कल आपको बताऊँगी। और उसकी पहचानें क्या है? उसको कैसे पहचाना जाता है कि आदमी की कुण्डलिनी जागृत है या नहीं। याने यहाँ तक लोग कहते हैं कि कुण्डलिनी के जागरण के बाद कोई आदमी जीवित ही नहीं रह सकता यहाँ से लेकर दुनियाभर की चीज़ें माने ये की आप जागरण ही नहीं करवावो। उसकी जागृती ही न करवावो । ऐसे ही मर जाओ और इन राक्षसों के हाथ में रहो। लेकिन जैसी जागृती हो जाऐंगी, आप पहचानना शुरू कर देंगे कि कौन भूत है, कौन राक्षस है, कौन संत है। क्योंकि इनके पेट पर पैर आएगा इसलिए तुमको ऐसी उलटी सीधी बातें बताते हैं कि कुण्डलिनी जागरण में आप कुदते हैं, छलांगे मारते हैं। एक आदमी तो मुझे कहने लगा कि मेंढ़क जैसे उड़ते है। तो मैंने उनसे कहा ‘भाई, ये कैसे जाना ?’ तो कहने लगे हमारे गुरु किताब में लिखा है। इतनी बड़ी किताब है। उसका जो गुरू है उसने लिखी हुई । उसने लिखा है कि मेंढ़क जैसे उड़ते है। सोचिऐ, मराठी है । इन लोगों को क्या कहा जाए? आप अभी यहाँ देख रहें है किसीकी जागृती हो रही है और हजारों की हुई है। कोई भी मेंढ़क जैसे कुदा? ये बच्चे हँस रहें है क्योंकि ये पार भी हैं और इनके हाथ में व्हायब्रेशन्स भी है और ये जानते है क्या चीज़ है। बिलकुल हँसने की बात हैं । इस तरह की जो उटपटाँग बातें चल चुकी हैं । रही बात ये कुण्डलिनी अत्यन्त सूक्ष्म चीज़ है और वो आपको अपनी सूक्ष्मता में उतारती है । इसलिए जो चीज़ अति सूक्ष्म हैं उसके लिए आपको भी सूक्ष्मता में उतरना चाहिए। क्योंकि हम लोग बहोत जड़ता में रहते हैं सुबह से शाम , materialism के बीच में पनपते रहते है और आज कल आप जानते है कि हम developing कर रहे हैं मतलब रजोगुण पर चल पड़े हैं। इन सब कारणों की वजह से हमें बहोत सतर्क रहना चाहिए । हम इस चीज़ में उलझें ना, ना देखते रहे नाटक मात्र और वो हो सकता है। सहजयोग में दिल्ली में बहोत लोग आते है और पार भी हो जाते हैं। उनमें से पच्चीस फिसदी लोग सहजयोग में असली उतरते हैं। बाकी जो है वो फिर हो जाते हैं । और इसी तरह से चलता रहता है क्योंकि मैंने आपसे कहा है कि सहजयोग में पार होने की क्रिया तो घटित हो सकती है। छू भी सकते है आप | लेकिन उसको बिठाना पड़ता है । जैसे कि मोटर तो स्टार्ट कर देते है हम लेकिन मोटर को चलाना पड़ता है। स्टार्ट करने के बाद थोड़ी देर खड़खड़ करेगी उसके बाद वहीं रुक जाएगी। लेकिन अगर आप मोटर को जब तक चलाना नहीं जानेंगे, उसके कलपूर्जे नहीं जानियेगा, उसको चलाईयेगा नहीं तब तक आप जानियेगा ही नहीं कि आपके अन्दर कोई गति भी हुई है । मोटर खड़ी है तो खड़ी है। उसके अन्दर गति होनी पड़ती है । | अब सब लोग मेरी ओर ऐसे हाथ कर के बैठिए। मैं आपको कुण्डलिनी क्या चीज़ है समझा देती हूँ। ये आपके आगे एक नक्षा है । यह भी बड़े भारी सहजयोगी ने बनाया है और दो ऊशरष । औील, मूक लड़कों से बोलता किया हुआ है। बहोत साधारण जीव है। म्युनिसिपाल्टि में टीचर हैं वो। और उन्होंने बनाया हुआ है बड़े प्रेम से। और देखिए कितना सुन्दर बनाया हुआ है चित्र। और उन्ही की आयडिया है कि इस तरह उसके बनाने से, उसके reflection से ही लोगों को जागृती होनी चाहिए। और काफी उन्होंने इसमें कमाल किये है । इसमें जितने भी कलर लगाए हुए है सब मेरे पैरों को छू कर के, व्हायब्रेट कर के, मेहनत से उसको बनाया हुआ है । ये भी बहोत जरूरी है। अब जो है इसमें त्रिकोणाकार है यही कुण्डलिनी है । मनुष्य जब माँ के गर्भ में रहता है । यह व्यवस्था जो पुर्नजन्म की

है, जो उत्क्रांती की है, जो मैंने कहा मेन्स में लगने की बात है। या जो मैं कहती हूँ आप लोग एक कॉम्प्यूटर के जैसे है । और कॉम्प्यूटर को जब तक आप मेन को नहीं लगाईयेगा तब तक आपका कॉम्प्यूटर कुछ बोलेगा नहीं । उसी प्रकार मानव जाति का है । अब इसमें जो कुण्डलिनी दिखायी है । ये माँ के गर्भ में जब बच्चा होता है तभी अन्दर प्रवेश करती है। लेकिन यही नहीं प्रवेश करती। उपर से जहाँ बच्चे की तालू होती है, जिसे हम फॉन्टॅनिअल बोन कहते है वहाँ से ये देखा आपने ये त्रिकोणाकार जो बनाया है वो brain है आपका । मनुष्य ही का brain त्रिकोणाकार हो जाता है। जानवर का फ्लॅट होता है। तो उपर से कुण्डलिनी नीचे उतर के यहाँ बैठ जाती है। और इसके अलावा ये जो दोनो शक्तियाँ है इधर में । ये दोनों शक्तियाँ right साइड और left साइड। ये दो नाड़ियाँ होती है-ईड़ा और पिंगला। ये ईड़ा है left की और वो right की पिंगला है । इन दो नाड़ियों में दौड़ती है। अब इसको सायन्स में समझाऊँ तो ये समझ लीजिए कि अपने अन्दर स्वयंचलित संस्था है जो हमारे हृदय को चलाती है, जो हमारा पूरा अन्न है उसका पाचन करती है माने हमें digest कराती है । जो ऑटोमॅटिकली चीज़ें अपने अन्दर होती रहती है शरीर में, वो हमारी श्वसनक्रिया है। हमारी श्वास लेने की क्रिया है उसको जो कराती है उसको हम autonomous नव्व्हस सिस्टम कहते है । लेकिन अगर किसीसे पुछा जाए कि ये auto माने स्वयंचलित चीज़ है वो क्या हैं? ये स्वयं कौन है? तो कोई इसका जवाब नहीं दे सकता। कोई भी डॉक्टर । डॉक्टर तो ये कहेगा कि हम इसको स्वयंचलित कहते है। कह देने से नहीं । explanation नहीं है उनके पास । ये जो स्वयंचलित संस्था है इसमें दो तरह की संस्था होती है। उसमें एक को तो parasympathetic कहते है और एक को sympathetic कहते है। यही उपर से जो दिखाई हुई है, बीच की जो चीज़ है ये अपने रीढ़ की हड्डी में सूक्ष्म स्वरूप में रह के और parasympathetic को चलाती है। | और ये जो दो संस्थायें है ये left और right sympathetic nervous system को चलाती है। पर ये मैंने आपको सूक्ष्म में ये नाडियाँ होती है नाड़ियाँ बताई । ये बाहर में, gross । अब मुझे आश्चर्य है .. जैसे आदमी ने किताब लिखी है कुण्डलिनी पर । और वो क्या कहता है पेट में होती है कुण्डलिनी । जिन्होंने अपने आँख से देखी है वो बता सकते है की त्रिकोणाकार अस्थी में होती है । अब इस तरह से उसने बात लिख दी। इतनी बड़ी किताब लिख दी तो उससे अब कौन झगड़ा करने जाए? वो मर कर भी काफी दिन हो गये। अभी जिंदा भी ऐसे बैठे हुए है वो कुण्डलिनी के बारे में सतरासो साठ बातें बताते रहते है । लेकिन वैसी बात है ही नहीं । असल में जो है सो है। असत्य कोई किसीके लिख देने से क्या होता है। कोई चाहे हजारो किताबे लिख सकता है। असत्य बहोत कुछ | लिखा गया है। आप जान लीजिए। जो कुछ लिखा है वो कुरान नहीं है। सब कुरान भी नहीं है और व्हायब्रल गीता भी नहीं | है । जो कुछ लिखा गया है उसमें बहोत कुछ झूठ है । यहाँ तक हमारे शास्त्रों में भी लोगों ने झूठ घुसेड़ने की कोशिश की है क्योंकि झूठ जो होता है वो हमेशा आक्रमण करता है आप जानते हैं सत्य । और इस वजह से जो अपने आप से देखो, अपने आप घटित हो, जो घटना हो उसे जानो। … किसीसे पढ़ के आए । ऐसे तो कुण्डलिनी नहीं है । जब है ही नहीं तो हम कैसे करें भाई । आप अगर कहीं से पढ़ के आये कि गुलाब के फूल का रंग निला होता है। और कहा कि साहब ये तो गुलाब का फूल है ही नहीं क्योंकि इसका रंग निला नहीं । तो ऐसे लोगों से क्या कहा जाए? ऐसे लोगों को कौनसी बात समझायी जाए, ये बताईये आप| ‘उन्होंने कहा हैं।’ आप उनको जानते हैं ? नहीं । फिर आपने किताब खरिदी | कितने ? दो रुपये में । फिर ? वो मैंने पढ़ी । उसमें ये लिखा है माताजी। फिर आप ऐसे क्यों करें? अब मैं क्या आप से कहूँ कि वो झूठा आदमी है। कहूँ तो आप मुझे डूंडा ले के मारने दौड़ोगे । क्योंकि आप फौरन उनके वकिल बन जाते है । आपने किताब क्या पढ़ ली। आप के पास किताब क्या आ गयी आप उस किताबवाले के वकिल बन जाते है और मेरी जान को लग जाते है कि माँ, ऐसा तो हैं ही नहीं। आप यूँ ही बोल रहे है । याने मैं झूठी हो जाती हूँ । वो सच्चा हो जाता है क्योंकि आपने दो रुपये देकर उसको खरिद लिया। क्या किसी गुरु को आपने बनाया? अब वो गुरु महाराज ने जो भी कहा वो आपके लिए सत्य हो गया। भाई, उसने आपको कुछ किया? उसने आपको पार किया ? उसने आपके साथ क्या किया ? कुछ नहीं वो तो सात मंजिल पर बैठते है

मुझे नाम दे दिये। अरे मैने कहा, ‘भाई, जिसे नाम दे दिया उसने तुम्हारा कुछ देखा नहीं । ‘नहीं । मुझे तो हार्ट अॅटॅक आ रहा है माताजी, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ।’ मैंने कहा, ‘उसीको क्यूँ नहीं कह देते तुम। अब मेरे पास क्यूँ आयें।’ वो तुम को देखता भी नहीं कि तुमको हार्ट अॅटॅक आ रहा है कि तुमको कोई बिमारी है या कोई तकलीफ है । ऐसे गुरू को लेकर क्या उसका आचार ड्रालना है ? ऐसे अनेक गुरू है जिनके शिष्यों को हार्ट अॅटॅक आ रहे है । अरे, अगर गुरू रख के उसे हार्ट अॅटॅक आते है, आपकी तंदुरुस्ती चौपटाती है, आपका दिमाग खराब होता है, आपकी बीबी पगलाती है, घर में सब चौपट है, यहाँ कोई लक्ष्मीजी का स्थान ठिक नहीं है । ऐसे गुरू का क्या आचार ड्रालने का? आप उसके पिछे में क्यूँ लगे हुए हो ? उसे क्या दिया? हजारो आदमी दौड़ रहे हैं इसलिए हम भी दौड़ रहे हैं । सब ग़धे है तो आप भी ग़धे हैं। यह भी एक सोचने की बात होती है। हर एक को सोचना चाहिए कि हम क्यों इसे गुरु मान रहें हैं? दूसरा मानता हैं, माने, हम क्यों इसे मानें । हमें भगवान ने स्वतन्त्रता दी है। और हमने अपने स्वतन्त्रता में ही जाना है। बहोत से ऐसे गुरू है, जैसे वह ट्रान्स वाले महाराज है । वे आपके एक नाम दे देते हैं आप भूत में चले जाते है। आपको लगता है कि बहोत बड़े भारी आदमी हो गये। किसी भूत का नाम दे दिया आपको। आप भूत का नाम ले लेते हों। वो जाते | है वो तो ठीक है बहोत बड़े आदमी हो गये। शराब आप पिओ, औरतें आप रखों, खाना जो खाओ, जैसे भी सताओ, दूसरों को पीड़ित करों। aggretion करों, कुछ नहीं । बस, आप तो साधु बाबा हो गये। क्यों? फलाने गुरू ने चार औरतें रखीं, मैंने दस रखी तो क्या हो गया? उसका धर्म से, मनुष्य से, उसके human clement से कोई भी सम्बन्ध गुरू का नहीं रहता। ये अजीब तमाशा । और आदमी उसको मानता हैं । उसको ऐसे गुरू बड़े अच्छे लगते हैं । अरे, हमारे यहाँ एक आदमी है। तुम तो सुने हो उसका नाम। वो अग्रेंज लोग उसके चरणों में लोट रहें हैं। मैंने कहा, तुम लोगों को किसलिए चाहिए? तुमने तो कर लिया सब तमाशा । तुम तो उसके गुरू घंटाल हो। तुम उससे क्या सिखोगे? लोग होशियार हो। तुम क्या ये सेक्स की बात है। तुम उससे क्या सिखनेवाले हो ? तुम्हारे से वो सिखें ऐसे तुम उसे गुरू बना रहे हों । लेकिन इसलिए कि conscious keeper है । क्योंकि ये तो अभी तक राक्षस नहीं हुए ना । वे सोचते हैं कि हम इतने गन्दे काम कर रहें है। क्राइस्ट ने तो ये काम नहीं किया और हम ये गन्दे कर रहें है liberation के नाम पर । तो कोई न कोई गुरू बना लों उसका सर्टिफिकट ले के जाऐँगे। वो गुरू बैठा रहेगा नर्क में और ये भी उसके पिछे जाऐँंगे। गुरू ऐसे अच्छे लगते हैं ऐसे लोगों को कि जो कहें हाँ भाई, तुम बड़े अच्छे आदमी हो। आहा..हा..हा! तुम्हारे से बड़ा कोई नहीं। पर्स तुम्हारी इधर रख दो। तुम्हारी बीबी तुमसे सँभलती नहीं तो उसको भी घर भेज दो। में सब तुम्हारा काम कर दूँ। ऐसे भी गुरू लोग हैं दुनिया में। वो कहें कि जो भी कुछ अपना पैसा, धनसम्पत्ती सब आश्रम को दे दों। और आप बिलकुल पहुँच जाओ ऐसे। दूसरों के पैसे पे नजर रखनेवाले गुरू कैसे हो सकते । पहली चीज़़ पैसे से । और आपको भी अच्छे लगते है ऐसे गुरू क्योंकि आप सोचते हैं आप पैसेवाले हैं, दिल्लीवाले हैं, काफी दोनो हाथ से पैसा कमाते हैं। कुछ लोग तो निगेटीव्ह भी पैसा कमा लेतें हैं अपने under the table| तो उसका भी इन्तजाम होता है। गुरू भी पाल लिया है। उसका भी इन्तजाम है । चलो भाई, गुरू भी अपने हैं। तो अपना अगला जनम भी ठीक कर लिया। और ये जनम भी अपना ठीक हैं। गुरू तो कुछ कहते नहीं । बड़े शरीफ आदमी हैं । जकार्ता में एक और गुरू मिलें। जकात्ता के पास सिंगापूर में वो सिंधी लोग आयें । माताजी, हमको बचाओ मैंने कहा, ‘क्या हो गया भाई ।’ कहने लगे, ‘हमारे गुरू ने हमारी लूटिया डूबो दी।’ मैंने कहा, ‘क्यूँ?’ कहने लगे, ‘वो तो जा के बैठे हैं स्वित्झर्लन्ड।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ कहने लगे, ‘पहले हम स्मरगलिंग करते थे । हमारा सब माल जकात्ता में पकड़ा गया । मैंने कहा, ‘बड़ा अच्छा हुआ। मत करो ऐसे।’ कहने लगे, ‘नहीं हमारे गुरू ने तो ऐसा कहा कि करो और हमको कुछ तरिके बतायें ।’ मैंने कहा, ‘अच्छा!’ और वो स्वित्झर्लन्ड बैठे हुए है।

तो ऐसे गुरू जो पालना चाहते हैं उनका यह स्थान नहीं है । सीधा हिसाब हैं मैं हाथ जोड़़ती हैँ। चाहें मेरे पास दो ही शिष्य रहें मुझे कोई हर्ज नहीं। जिसको सत्य चाहिए वो यहाँ आए। पहली चीज़ जीसको सत्य नहीं चाहिए और असत्य के पिछे भागना चाहते हैं वो मेहरबानी से तशरीफ लें जाएं । लेकिन आप सत्य खोज रहें हैं । मैं मेहनत करने के लिए तैय्यार हूँ। और सब कुछ करने के लिए तैय्यार हूँ। उसीकी प्रतिष्ठा होती है जो सत्य पे खड़ा होता है । परमात्मा ऐसे आदमी से कभी नहीं खुश रह सकते । अपने उपर एक और पिछे एक । ढोंगीपना और यह सब चीज़ें यहाँ चलनेवाली नहीं । जो वास्तविक में अपना उद्धार चाहता है, अपना कल्याण चाहता है उसकी हर एक सेवा करने के लिए हम हाज़ीर हैं क्योंकि हम आपकी माँ है और हम आपसे झूठ नहीं बोलेंगे। और आपकी किसी भी झूठ बात का हम सपोर्ट नहीं करेंगे । तुम लोग बुरा नहीं मानना। अत्यन्त प्रेम से तुमको कहेंगे, दुःख नहीं देंगे, अपमान नहीं करेंगे। लेकिन हम जो बात कहेंगे उसको सुनना पड़ेगा । इस शर्त पे हम पार करायेंगे और आगे चलायेंगे। और तुमको पार हो कर के और दुनिया को देना पड़ेगा । जैसे कि कोई दिप जलता है उसको कोई पलंग के नीचे नहीं रखता । वो बुझ जाएगा । उसको ऑक्सीजन में ज़लना चाहिए । इसी प्रकार जो पार हो जाता है उसको दूसरों को देना पड़ेगा । | अभी जैसे एक किस्सा सुना रहें थे। एक औरत आयी थी | तो लेकर आयें मेरे पास में। उसके पाँच मिनट में उसकी आँखे ठीक हो गयी । वो अँधी हो गयी थी । उसको हॉस्पीटल में ड्राला था । और पाँच मिनट में वो देखने लग गयी। वास्तविकता है। और ये सुब्रमण्यम ने कहा था कि मैं सिर्फ ड्राइव कर के तुम्हें पहुँचा देता हूँ । वो ड्रायव्हर बन के आयें थे । वो तो पार हो गये और ये लड़की भी ठीक हो गयी। उसके बाद डीआयजी साहब को भी काफी मेहनत करी। उसके बाद उनको चक्कर पड़ गया। मैंने कहा, ‘भाई, तुमको हिरा ढूँढना हैं, मोती ढूँढना है? क्या चाहिए तुमको ?’ हिरे-मोती के लिए अगर तुमको करना है, तो नौकरी छोड़ो और तुमको मिल जाएगा हिरा-मोती । दूसरा कोई धंदा करो । ड़कैती करो । चोरी छिपे कर लो वह भी अच्छा हैं। पर तुम इस जादूवाले के पास क्यों जा रहें हो ? उसके शकल से नहीं नज़र आ रहा है तुमको कैसा आदमी हैं ? सुना नहीं मेरा। अभी वो बता रहें थे मर रही है वो। जवान लड़की है। Thirty five year से ज़ादा उसकी | नहीं होगी । अभी वो मर रही है। उसका गला घूट रहा है। अभी चलो माँ उसको बचायें । अब बताओ मैं क्या करू? age तुम सबको छोड़कर उसे बचाने जाऊँ? हार्ट अॅटॅक आ जाते है लोगों को । सोचना चाहिए कि तुम्हारे गुरू क्या कर रहें हैं? और किसीका हो असल गुरू पहले से ही पहचान लेते हैं । जो तुम्हारी कुण्डलिनी खराब कर दें। जो तुम्हारे इस मार्ग को अवरूद्ध कर लें वो गुरू कैसा? जिसकी वजह से तुम पार ही नहीं हो सकते तो भी उसे छोड़ेंगे नहीं, पकड़े ही रहेंगे, पकड़े ही रहेंगे । अभी १३२ लड़के-लड़कियाँ मेरे पास लन्दन में आयें। और सब बोलते है हमारे सर में लश्रेलज्ञ हशरव हो | गया माताजी। समझ में नहीं आता क्या लश्रेलज्ञ हशरव हो गया ? उनके भी इलाज है। महम्मद साहब ने बहोत इलाज बतायें हैं ऐसे दुष्टों के। नानक साहब ने भी बतायें । और वही इलाज से ठीक हुए है। तो तुम लोग भी समझ लो, कि सत्य चाहना है, असलियत चाहना है, पार होना है । हमको अपनी हस्ती को जानना है । हमारे अन्दर जो छिपी हुई संपदा है उसको हमको release करना है। इनके शिष्यों को देखो । तुम लोगों को शिष्यों को देखना चाहिए । इनके शिष्य है क्या वे धर्माचरण कर रहे हैं ? क्या बड़े शरीफ़ आदमी हैं ? एक कहते है हमारी तो बड़ी, हमारा तो ध्यान लगा रहता है उस समय। मैंने कहा अच्छा क्या। तीन तीन घंटे बैठे रहते है। मैंने कहा बिलकुल आलसीपना के धंदे। किसी औरत को बड़ा अच्छा है अगर धंदा नहीं करना है तो मेरे गुरू ने मुझे दिक्षा दे दी है। मैं बैठी हूँ तीन घंटे। बच्चे रो रहे हैं। पति मेरे बगैर खाना खायें ऑफीस चलें गयें। बड़ा अच्छा धंदा निकाला है आपने । मेरे गुरू ने मुझे दीक्षा दे दी, नाम दे दिया मैं बैठा हूँ । | | निष्क्रीयता ही अगर धर्म का लक्षण होता तो श्रीकृष्णजी हाथ में सुदर्शन चक्र ले कर यहाँ क्यूँ आये। बैठते अपने कहीं निष्क्रिय हो कर किसी जंगल में जाकर । शादी भी करेंगे और बीबी, बच्चे उनको नहीं सँभालेंगे । ये कोई धर्म का लक्षण होता है। और ये कहने लगे कि हमारे गुरू ने हमें दीक्षा दी है । ये नहीं खाओ, वो नहीं खाओ, ऐसा नहीं करों, वैसा नहीं करो । हाँ

शराब जरूर चीज़ है | शराब के लिए मना किया हुआ है । शराब, सिगरेट के लिए इसलिए मना किया हुआ है कि आप जानते है कि सिगरेट से कॅन्सर हो जाता है। वो सब क्या पागल थे जिन्होंने मना किया है। शराब जरूर मना किया है। शराब इसलिए मना किया है कि शराब आपकी चेतना के विरूद्ध है। consciousness के विरूद्ध में पड़ता है। शराब के पिने से आपकी consciousness विचलीत हो जाती है। आपका liver खराब हो जाता है। लिवर में आपका चित्त है। चित्त खराब होते ही आपकी रियलायजेशन ही खत्म हो जाऐगी । ये मनुष्य के विरोध में है । बिलकुल राक्षसी है, विश्वास करों । आन्ध्र प्रदेश के लिए अभी कल ही किसी ने सवाल पूछा। आन्ध्र प्रदेश में गयी थी एक साल पहले । मेरे चार टेप्स है, उसमें आप सुन लीजिए । और यहाँ पे वो आए जो ले गये थे । आये थे कल । और अभी आएंगे थोडी देर में । उनसे पुछ लीजिए। मैने उनसे कहा कि, ‘यहाँ तम्बाखू मत चलाओ।’ गुरू गोविंदजी एक बार तम्बाखू के खेत में गये थे तो उनका घोड़ा उलटा दौड़ा । पुछ हुए थे जैसे कोई ट्यूलिप्स लगे हुए होते हैं ना हॉलंड में । और सब बड़ी बड़ी मोटरें लेकर मुझे लेने आ गये। मुझे आयी हँसी | मैंने कहाँ इससे अच्छा बैलगाड़ी में आते लेकिन धर्म लेकर आते। सारी दुनियाभर के लिए वहाँ से वो लोग तम्बाखू भेजते है । कितना पाप पुश्तो न पुश्तो पड़ा होगा, अरे बापरे! मैने कहाँ इसको उखाड़कर फेंक दो । तो कहने लगे ‘क्या करें ?’ मैंने कहाँ ‘यहाँ कपास लो किसीसे, किसी ने पढ़ा हो तो बता दो। तम्बाखू के वहाँ पे खेत के खेत लगे | लगाओ। यहाँ का कपास बहोत बढ़िया होगा । तुम लगाओ।’ एक दो ने सुना। बाकी सब तो इतने नाराज हो गये कि मुझे चिठ्ठी भी नहीं भेजी कि माताजी बहोत खराब है, ऐसा कह रही, वैसा कह रही । ठीक है। अब हालत देखिए । सारे खेत भर गये पानी से। मैने यही कहा था कि समुद्र आप पर खौलेगा एक दिन । समुद्र क्या है? साक्षात पिता स्वरूप है। गुरू है। | साक्षात गुरू है, सिखाता है वह। और गुरू के विरोध में बैठती है शराब और सिगरेट । इसलिए मना किया है । और तिसरी जो चीज़ है, बहोत बुरी है वो है जुगार । अभी हमारे एक सहजयोगिनी है । उनके अड़ोसपड़ोस में सब लोग ताश खेलते है। औरतों को तो चक्कर हो गया। सबेरे से उठे, कॉफी बाँटी और शुरू हो गयी। ताश चलने लग गये। अब उसके हाथ में फ़ोड़ आ गया । मेरे पास आयी माताजी, इसको ठिक करो । एक – दोन दिन तो मैंने सोचा कि इसे नहीं बोलेंगे बिचारी से। बहोत दर्द होता है । ये करूँ, वो करूँ । मैंने कहा कि ‘भाई, देखो, तुम ताश खेलती हो।’ कहने लगी, ‘हाँ’। और पैसे भी लगाती हो । कहने लगी, ‘ हाँ।’ मैने कहा, ‘अभी प्रॉमिस करो कभी नहीं छूओगी। और ताश खेलने मी हर्ज नहीं। ताश खेलो लेकिन पैसे पर उतरें तो गए। क्योंकि ये मनोरंजन का व्यवधान है। अगर किसी चीज़ का मनोरंजन करते है, तो आप उसमें अगर पैसे की competition से मनोरंजन करते है, तो आपने अपने चित्त को विक्षुब्ध करना है । सीधा हिसाब है समझने का। अब समझ लीजिए हम बैठे है आपके साथ मजे से बात कर रहें है। आप हमारे मित्र हैं। जैसे ही मित्रता पैसे के दम पे आयी मित्रता खतम हो जाती है, है की नहीं । होती है कि नहीं होती है, बताओ । कोई भी कैसा भी हो सच बात है कि नहीं। कौनसा भी अच्छा relationship तोड़ना हो पैसे का झगड़ा खड़ा करो। फौरन हो जाएगा। जब तक | आप पैसे का झगड़ा खड़ा नहीं करोगे तब तक मित्रता बनी रहती है, है ना । सूक्ष्म में यहीं बात होती है। इसलिए ताश भी खेलना है तो अगर दोस्ती के लिए खेल रहे हो तो ठीक । बड़े दुश्मन हो सकते है यहाँ पर | इससे बढ़के दुश्मनी और कोई भी नहीं हो सकती कितनों की आहें, कितनों का क्या? छोटे-छोटे बच्चे, उनको घर में छोड़कर औरते यहाँ ताश खेल रही है । काहे को माँ बनी ? तशेडी बन जाती। बैठती जंगलों में बैठकर के सब तशेडीयाँ खेलती। अपना आपस में झोडती । इन बच्चों के उपर के माँ बनकर आने को किसने कहा था ? फिर उनके बच्चे भी तशेडे बनें । आदमी लोग भी तशेडे, शराबी, गधेडू ये सब बन गये। मैं क्या करने यहाँ आयी हूँ? दिल्ली में इसका बहोत जादा जोर चला हुआ है। पंजाबी लोग तो सोचते है कि जब तक वे ताश नहीं खेलेंगे वे पंजाब के ही नहीं । बड़ा दुःख लगता है। जिस नानक ने इस बड़ी धरती पर जनम लिया, दत्तात्रेय का साक्षात अवतरण जो हुआ। उनके जीते जी इतना सताया उनको कि बस रे बस! और अब जब वे

मर गये है तो अब पंजाबी बनकर और उनको जान लो सब लोग । उनको जिन चीज़ज़ से अत्यन्त ग्लानी होगी वही चीज़ करते जाओगे आप लोग तो क्या कहा जाए? जो अपने पिता स्वरूप, जिन्होंने अपने लिए संसार में जनम ले कर के, मनुष्य का जन्म लेना कोई आसान थोड़ा ही है, इतनी मेहनत की उनके साथ, कितनी ज़ादती हम लोग कर रहे है । अब आप लोगों को मैने बताया है कि किस चीज़ों को मैं मना कर रही हूँ क्योंकि मैं माँ हूँ मैं मना करूँगी। अगर बिजली में अपना हाथ दोगे तो मैं कहँगी कि बेटे इसमें अपना हाथ मत दो। और आपको समझना चाहिए कि माँ का दिल जितना टूटता है, आपका अपने लिए नहीं टूट सकता। इसलिए मेरी बात का बूरा नहीं मानना। तुम्हारे हित के लिए, कल्याण के लिए एक माँ ही मेहनत कर सकती है। इतने लोग रियलाइज्ड सोर्स है दुनिया में तुम्हे नहीं मालूम। इतने गुरू लोग है सब जंगल में बैठे है, हिमालय में बैठे। | मुझसे मिलने आते है, मैं कहती क्या कर रहे हैं वहाँ बैठकर के। तुम लोगों का मैं क्या करूँ ? वहाँ तुम्हे मैं क्या मरतबान भर कर रख दूँ? क्या करूँ? तुम वहाँ किसलिए बैठे हो ? कहने लगे, ‘माँ, बारा साल तो मेहनत करेंगे । फिर आऐंगे । बड़े खराब लेग होते है । हम तो नहीं आऐंगे।’ किसी को उनके पास भेजो तो उनकी टांगे तोड़ देते है । कहते है, ‘बड़े जालीम लोग है, बिलकुल बेकार लोग है, इनका कुछ नहीं हो सकता। उनको मरने दो सालों को।’ ऐसे ही कहते है । तुम ही हो, तुम्हारे अन्दर इतनी हिम्मत है, तुम्हारे अन्दर इतना प्यार है जो इनके लिए तुम इतनी मेहनत कर रहे हो । जो आया उसी को मारने लग गये। डंडा लेकर उसके पीछे पड़ गये। अभी यही पंडितों ने जो आज मंदिरों में बैठकर के तुम्हारे पैसे खा रहे है । इन्होंने मरवाया कितनों को । और ये जो पोप | बनें घुमते है इन्होंने कृसीफाय किया क्राइस्ट को और अब भी कर रहे हैं । और तुम उन्ही के पैरों में जा रहे हो। ये क्या दम करेंग? सव्वा रूपये की श्रद्धा पर चलने वाले लोगों के पास जाने की क्या जरूरत है? बहोत सी अनधिकार बातें होती है क्या बताऊँ जो की देखती हूँ। लगता है कब लोगों की आँखे खुले? कबीर इतना कह गए। अखण्ड पाठ रखा है। सब लोग वहाँ बैठे हो। अखण्ड पाठ है। अरे अखण्ड पाठ का मतलब यह होता है कि अखण्ड उसकी तरफ चित्त देकर सुनो तो सुननेवाला नहीं। इस तरह की चीज़े करने से कैसे तुम लोग समझोगे भाई । और जो कुछ कहा गया है वो करो ना । उसको रखने से नहीं होता है। सब कुछ कह गये है। सब कुछ बता गये है। और जो सहज है अनेक वर्षों से, जब से creation हुआ है तब से सहज ही होता है। सिर्फ यही है कि आज सहजयोग उस हद पर पहुँच गया जहाँ आपका connection उस अनादि से हो सकता है। सहज अनेक तरीके से चलता आया । जब पहले पृथ्वी बनायी गयी, उस पर जब उसे ठण्डा- गरम किया गया, जब उसके अन्दर निर्मिती हुई, उसके बाद जब उसमें जीवजंतू आ गये। जब मनुष्य आए। हर एक चीज़ सहज ही होती गयी। कृष्ण का भी सहजयोग है । रास, उसका मटके का फोड़ना सभी कुछ सहजयोग है। महम्मद साहब का सारा काम सहजयोग ही रहा । सबने सहज ही करते आयें । आज सहजयोग उस जगह पर पहुँच गया है कि यहाँ पर आपका आम mass, सामूहिक तरह से रियलाइजेशन होना है। इसकी जरूरत तो थी ही। लेकिन आज ऐतिहासिक भी समय आ गया। ऐतिहासिक समय | आना पड़ता है। historical time इसको कहते है। वो आ गया है। जब टाइम आ जाता है तभी फुल भी फलते है। जब टाइम आता है तभी बहार आती है। इसी प्रकार समझ लीजिए कि पहले तो एक ही फुल खिलते थे, आज अनेक फुल खिलने का समय आ गया है। उसकी जरूरत थी, historical थी। आपको वचन दिये थे। और जब एक आदमी पार होता तो उसको पकड़ के मारते थे क्योंकि उसकी बात समझ में नहीं आती थी। लेकिन जब आज हजार आदमी पार हो जाएँगे तो सबको उनकी बात समझ में आ जाएगी। अब ये कुण्डलिनी क्या है? इसके बारे में अभी तक इतना खोलकर किसीने बताया नहीं। क्राइस्ट ने कहा है I will appear before like tongues oflimb अभी ईसाई लोगों से जाकर पुछो इसका क्या मतलब है? किसी को नहीं मालुम। कबीरदास ने, नानक साहब ने , सबने ये ईड़ा- पिंगला नाड़ी, शून्य शिखर आदि वगैरा सब बाते अपने कविताओं में कह

डाली। लेकिन वो गोपनीय रही उसकी वजह ये थी कि उस वख्त जो कहा था उसी के लिए जान ले ड़ाले। और खुलकर कहने के लिए और समझने के लिए भी मनुष्य में उतना जादा समझदारी का माद्दा नहीं था । हालांकि आपको आश्चर्य होगा कि आज वो माद्दा जादा है। मनुष्य कितना भी लगता है गिरा हुआ लेकिन उसका माद्दा बढ़ा हुआ है। ऐसे सभा में बैठकर कृष्ण के जमाने में कोई लेक्चर देता तो कोई सुननेवाला था? इसलिए गोपी की लिला करनी पड़ी । उनकी गगरियाँ तोड़नी पड़ी और उसमें से ळिलीरींशव जमुना का पानी उनके कुण्डलिनी पे गिराना पड़ा । ये सब नाटक इसलिए किया गया कि उस वख्त आपके जैसे बैठकर बातचीत नहीं करनी पड़ी । है । लेकिन आज आप लोग ऐसे बैठे है आपमें खोज बहोत जोरो में है । और इस वजह से सहजयोग फलित हुआ हुए अनेक देशों में हुआ है। खास कर लन्दन में बहोत जोरो में सहजयोगने अपना पैर जमा लिया है । इसकी वजह ये है कि अंग्रेज थे बड़े दुष्ट इसमें कोई शक नहीं। वो रहे होंगे । लेकिन उनके बच्चे बहोत अच्छे है । उनके बच्चे वाकई में साधु है । और उन्होंने बड़ी गहरी खोज की है। उसके फलस्वरूप बहोत बड़ी गहरी खोज की है । यहाँ तक की वो गाँजा तक पिने लग गये है। यहाँ से आपने भेजे थे ना बहोत सारे गाँजा पिलानेवाले । उन्होंने उनको गाँजा पिला दिया। ये कर दिया। खोज के लिए सब करने के लिए तैय्यार थे। और इतने पढ़े हुये है कि वो सब जानते है कुण्डलिनी के बारे में सब कुछ वो जानते हैं । और वो भी जानते थे ये सही है, गलत है। जैसे उन्होंने सत्य पाया एकदम उसे पकड़ लिया। आपको आश्चर्य होगा मेरे | लन्दन में सिर्फ चार लेक्चर्स हये। सिर्फ चार, कुल मिलाकर। अभी तीन सौ बढ़िया वहाँपर सहजयोगी तैय्यार है, बढ़िया। क्योंकि तैय्यार चीज़ थी । सुखी लकड़ी होती है, आग जल्दी से लपेट लेती है। अभी एअरपोर्ट पर कोई कह रहे थे कि माँ बच्चों में एकदम प्रज्ज्वलित कर दो। मैंने कहा, ‘बेटा ये गिली लकड़ी है। इसको पहले सुखाना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी । जब धूप आयेगी तब सुखाऊँगी।’ प्यार की धूप में जब ये सुखेंगे तब कहीं जाकर के ये पनपेंगे। कोई आसान चीज़ नहीं । इसलिए अपने को माँ के प्यार में रखें । अपने से प्यार करें। और सारी बात को एक खुले दिमाग से सोचे । यह कुण्डलिनी जो हमारे अन्दर है, ये साढ़ेतीन कुण्डलों में रहती है इसलिए उसको कुण्डल कहते है। कुण्डल माने की जो घुमायी हुई चीज़ है। जिसको हमारे यहाँ सर्पाकार कहते है। सर्प जब बैठता है तो सर्पाकार होकर यह कुण्डलिनी बैठी रहती है। मराठी में उसे ‘वेटोळे’ कहते है। ‘वेटोळे’ बहोत अच्छा शब्द है। जो घुमकर एक के उपर एक चढ़ जाता है इस तरह की चीज़ है, ये कुण्डलिनी है। इसको quail आप कह सकते है। एक के अन्दर एक साढ़े तीन quails। अब साढ़े तीन क्यों है? तो इसका भी कारण है कि आप कautomatic watch अगर देखें । जो रींरींळल चलती रहती है। उसमें भी साढे तीन quails लगाने पड़ते है। इसमें गणित है । अनन्त की बात है इसकी वजह से होता है । अब उसके डिटेल्स में जाऊँगी तो ये एक चीज़ बन जाएगी। लेकिन जो भी सोचा है वो इंजीनियरींग फस्स्ट क्लास । उसमें कोई शंका नहीं । अब साढ़े तीन quails की कुण्डलिनी यहाँ बिठा दी है ये बीच का अंकूर है । ये बीच का प्रिम्यून अंग्रेजी में उसे कहते है । इसके नीचे में ये चक्र पहले से बना हुआ है। चार इसकी पंखूडियाँ है। ये चक्र इसको मूलाधार चक्र कहते है। मूलाधार नहीं कहते, मूलाधार चक्र कहते है। और ये जो त्रिकोणाकार जगह है, माँ की बैठी हुई, ये आपकी अपनी माँ। सबकी अपनी माँ है । समझ लीजिए आपकी टेप है। आपकी माँ आपके बारे में सबकुछ जानती है इसलिए आपकी टेप है समझ लीजिए । | हर एक की अलग अलग माँ है। और ये बार बार आपके साथ ही जन्म लेती है। जहाँ जहाँ आप जन्म लेते है, वहीं ये जन्म लेती है। ये जो कुण्डलिनी है इसको आप किसी भी तरह से छू नहीं सकते । किसी भी तरह से आप जागृत नहीं कर सकते । सर के बल खड़े हो जाईये, पढ़िये, लीखिए, कुछ भी करिये किसी से नहीं हो सकता । ‘न योगे न सांख्ये न’ । सब से अच्छे तो हमारे आदि शंकराचार्य है। उन्होंने कह दिया कि योग और सांख्य माँ के कृपा से जागेगी । क्योंकि इसकी जो माँ है, जब तक वो नहीं आएगी संसार में तब तक ये जागती नहीं । कभी कभी निराकार में अर्थात माँ की प्रेम की वजह से कोई कोई लोग पा लेते है। और इसलिए वो निराकार ही होते है । जादातर निराकार की बात करते है । जैसे की आप कह सकते है बुद्ध के बारे में हुआ। बुद्ध एक बार थककर बैठे हुए थे, तब स्वयं साक्षात आदिशक्ति ने ही उन्हे जागृति दी और वे पार हो गये। तो

इन्होंने ईश्वर है ही नहीं ऐसा कहा क्योंकि आप भी जब पार होते है तो आपको ठण्डा ठण्डा आता है और आप पार हो जाते है। आप थोड़ी देखते है कि ईश्वर है या नहीं। वो तो मैं बता रही हूँ ना ईश्वर हैं या नहीं । उसकी वजह यह है कि सूक्ष्म, अति सूक्ष्मता से कुण्डलिनी उपर में चढ़ती है तो अन्दर से गुजरती हुई जाती है। बाहर का मामला उसे कुछ दिखायी नहीं देता । जब चित्त आपका अति सूक्ष्म से अन्दर से घूसता है तो बाहर का मामला दिखायी नहीं देता । जैसे अभी आप बैठे हुए है तो आपको क्या मालूम बाहर का? दिल्ली आपको थोड़े ही दिखायी देगी। आप ऐरोप्लेन से आएंगे तो आपको सारी दिल्ली | दिखायी देगी। लेकिन आप घर के अन्दर घूसे हुए हो तो आपको घर ही दिखायी देगा। उसका भी बाहरी हिस्सा दिखायी नहीं देता । इसी तरह से जब कुण्डलिनी अति सूक्ष्म से उठती है तो आपको बाहर का कोई तरीका दिखायी नहीं देता । आप ये भी नहीं जानते कि ईश्वर हैं या नहीं है । सिर्फ आपके अन्दर से ठण्डक ठण्डक सी आने लगती है। चैतन्य की लहरियाँ आने | ग जाती है । इसका इफेक्ट आप देखते है । अब तो आपकी माँ है यहाँ और हर एक चीज़ मैं आपको बता सकती हैँ, इसका प्रुफ भी दे सकती हूँ। । अब ये जो मूलाधार चक्र है इसमें श्री गणेश, ये बसते है। श्री गणेश का मतलब यह होता है, ये प्रतिक है हमारे अन्दर, symbol है । किस चीज़ का symbol हैं? innosense का । अबोधिता का, पवित्रता का । जब माँ ने ये सृष्टी बनायी पूरी सृष्टी बनाने से पहले उन्होंने संसार में पवित्रता बनायी । कोई भी माँ होगी, जब उसका बच्चा पैदा होने वाला होगा तो हर एक चीज़ में हजार तरह की सफाई करेगी कि मेरे बच्चे को कहीं गंदगी न लग जाए । कैसी भी माँ हो। चाहे वो अनपढ़ हो , चाहें वो एक कुत्ती क्यों न हों। चाहे वो कोई भी माँ हो पहले अपने बच्चे के लिए साफसूधरी जगह बना लेगी कि मेरे बच्चे पे किसीका अॅटॅक नहीं आ जाए । ये उसकी ममता की निशानी है । तो उसने श्री गणेश को बनाकर यहाँ बिठा दिया। पवित्रता | को उसने बिठा दिया दरवाजे पर । और जो लोग कहते है सेक्स से कुण्डलिनी जागृत होती है वो अपने माँ के साथ सेक्स करने को कह रहे है । कम से कम हिंदूस्तानी हो कर उसे समझो। अंग्रेज तो समझ नहीं सकते । उनको कोई माँ, बहने नहीं गधों को । तुम लोग तो समझो कि कोई ऐसी बात आपको समझाऐं तो क्या आपको इसको मानना चाहिए । ये रजनीश ऐसे समझाता है। उसको कहो अपने माँ के साथ रहें । हम लोगों को ऐसी गंदी बाते करने की जरूरत नहीं । कितना बड़ा राक्षस है अब समझ लो तुम । कुण्डलिनी की जागृती जो आदमी कहता है सेक्स से होती है। कुछ भी नहीं होता है। जब आदमी इस तरह के गलत काम करता है। कोई भी आदमी जो बहोत विषैय्यी होता है और जो जीवन को …. अपनी इज्जत दुनिया में नहीं की। जिसने बड़े गन्दे कर्म किये है और वो कुण्डलिनी की बातें करने लग जाता है तब गणेशजी उसपर बिगड़ते है और तब वो नाचना शुरू करता है, तब चीखना शुरू करता है, बीच में उठेगा एकदम से, आफत मचायेगा। ये कुण्डलिनी में गड़बड़ करने से होता है। जो सच्चरित्र है उसपर कभी कुण्डलिनी ऐसा काम नहीं करेगी। कुण्डलिनी स्वयं कुछ भी नहीं करती। वह तो माँ ही है तुम्हारी। तुम्हारे वरदान के लिए, तुम्हारे पुर्नजन्म के लिए है । वो ऐसा कार्य नहीं करती । पर गणेश गुस्सा हो जाते है। तान्त्रिक लोगों ने इसका बड़ा फायदा उठाया है। हालाकि ये मैं कहूँगी कि कभी भी माँ बच्चे की पूरी गलती कभी नहीं कहने वाली। इसी वजह से हो शायद माँ कभी ये नहीं कहती कम्प्लीटली कन्डेंम्प्ट । माँ का स्वभाव होता है। मैं यह कहूँगी कि मनुष्य ने अपने मूलाधार चक्र पर गणेशजी को देखा होगा । सिर्फ उसकी सुँड ही देखी होगी । तो सोचा होगा कि यही कुण्डलिनी है। और इसलिए उन्होंने गड़बड़ कर ली। हो सकता है। इसलिए बेसिकली, पहले ही, शुरू से ही, बुनियादी तौर शुरू में जो गलति हुई होगी हो सकता है। मैं अपने स्वभाव के अनुसार कहती हूँ, हो सकता है कि पर मनुष्य को कन्डेम्प्ट नहीं किया जाता । लेकिन जब उन्होंने देखा कि इस तरह से काम करने से हमारे अन्दर अजीब अजीब तरह की सीद्धि आ जाती है। तो उन्होंने सोचा कि यही शक्ति हो सकती है अब सीद्धियाँ कैसे आती हैं? आप जब किस भी चक्र पर विशेषकर इस चक्र पर गलत काम करते हैं। जैसे कि समझ लीजिए गणेश जी का मंदिर है, है तान्त्रिकों ने ऐसा किया। दक्षिण में एक मन्दिर में ऐसा दिखाया है कि श्री गणेशजी का अपने माँ के साथ गन्दा सम्बन्ध है । बताईये । यह भी किया। तान्त्रिक लोगों ने कुछ छोड़ा नहीं। अगर गणेशजी के मन्दिर के

सामने बैठकर या मन्दिर के अन्दर बैठकर आपने व्यभिचार किया, तो पहले तो आपके अन्दर गरमी आ जाएगी बहोत । आपके अन्दर बहोत जादा ब्लिस्टर्स आ जाऐंगे। कोई न कोई बड़ी तकलीफ हो जाएगी आपको । कुछ लोग नाचने लग जाएंगे, कुछ लोग उड़ने लग जाऐंगे, तकलीफ हो जाएगी। फिर भी आपने नहीं सुना । समझ लीजिए आप करते रहें | जबरदस्ती तो जिसको निगेटिव्ह तान्त्रिजम कहते हैं वो शुरू हो जाएगा। माने उस जगह से गणेशजी हट जाएँगे। उस मन्दिर से गणेशजी का चित्त हट जाएगा । वे निकल जाऐंगे। गणेशजी वहाँ से हटते ही अपवित्रता अन्दर आ जाएगी और ये दोनो साइड से, देखिए ये दोनो साइड इनकी और इनकी जुड़ी हुई है। लेफ्ट और राईट सिम्परथॅटिक नव्व्हस सिस्टम ऐसे। लेफ्ट साईड की तरफ से क्योंकि आप देख रहें है लेफ्ट साईड । लेफ्ट साईड की तरफ पूरा collective subconscious है और | राईट साईड की तरफ पूरा collective superconscious है । वहाँ से जितने मरे हुए भूत है उसमें से जिसको मन चाहें वो आ सकता है और दुनियाभर की सीद्धियाँ आपको आ सकती है। याने की आप घोड़े का नंबर भी बता सकते हैं । आपके हाथ में से मूर्तियाँ निकल सकती है। आपके हाथ में से कुंकू निकल सकता है। आदि वगैरा सब । अब मनुष्य को ऐसा सोचना चाहिए कि अपने पास बुद्धि है । मनुष्य को यह सोचना चाहिए कि परमात्मा को इसमें क्या interest हो सकता हैं कि हमें हिरे की अँगूठी दें | पहली चीज़ क्या आपको हिरे की अँगूठी चाहिए ? फिर नहीं चाहिए आपको | तो फिर ली क्यूँ? और फिर यह भी सोचना चाहिए कि ऐसे हिरे की अँगूठी जो देनेवाले लोग होते है, ये अपने देश का सारा कल्याण क्यूँ नहीं करते ? अमीर लोगों को, जिनके पास बड़ी बड़ी गाड़ियाँ हैं, उनको हिरा देने में क्या मतलब ? इसके बारे में भी कबीर साहब ने बहोत लिखा हैं। नानक साहब ने तो पूरा एक चॅप्टर लिखा हैं। ये खेचरियाँ आदि इस तरह की चीज़े है, शकल ऐसे बनाना, मूँह ऐसे खिंच लेना, आँतड़ियाँ अन्दर ले लेना आदि जो फालतू की चिजें है उस पर भी उन लोगों ने अनेक लिखा है कि इससे थोड़ी भगवान मिलता है । लेकिन उनको कौन पढ़ता हैं? आजकल तो लोग रजनीश को ही पढ़ते हैं क्योंकि भगवान का नाम ले कर कॅब्रे डान्स देखने को मिले तो क्यूँ न जाए । वो भी मुफ्त । मनुष्य की वृत्ती ही ऐसी हो गयी। इसलिए ऐसा हो रहा हैं । तो जब हम ये सोचते है कि ये सीद्धि आ गयी इस आदमी में तो हम उसके चरण में जाने | लगते है। जब उसमें जाने लगते हैं तो गणेशजी आपके अन्दर लुप्त हो जाते हैं। जादातर गणेशजी के लुप्त हो जाने से प्रॉस्टेट ग्लँड की बीमारियाँ तैय्यार हो जाती है। दूसरी साईड आप देख लीजिए । ये तो हम इंडलजन्स की बात कर रहें है। दूसरी साईड में क्या होता है। अभी एक साहब आयें थे आज ही । बड़े अच्छे आदमी हैं । शुद्ध आदमी है। उन्होंने अपने यहाँ गणेशजी कि पूजा की। गणेशजी को रखा । उसको पूजते हैं सुबह-शाम तक और उनका मूलाधार चक्र पकड़ा हुआ है। एक साहब और है। हमारे बड़े भारी सहजयोगी है । वो आयें मेरे पास । बड़े भारी गणेशभक्त । उनका प्रोस्टेट ग्लॅँड का ऑपरेशन होने वाला है। संकष्टी का दिन था । मैंने तो कुछ पुछा नहीं उनसे। मैंने कहा ‘लो बेटे, चना खाओ ।’ हमारा तो चना ही प्रसाद है आप जानते हैं। तो दूसरे साहब साथ में थे कहने लगे इनका तो आज उपवास है। मैंने कहा, उपवास? संकष्टी के दिन? किसने बताया तुमसे?’ कहने लगा, ‘सभी बोलते हैं।’ मैंने कहा, ‘सभी बोलते हैं। सोचो दिमाग से कि जिस दिन श्री गणेश का जन्म हुआ, जिस दिन इस संसार में पवित्रता माँ लेकर आयी, उस दिन क्या तुम उपवास करोगे? ये उसका तुम लोग क्या आदर कर रहें हो क्या? जिस दिन कोई अपने घर बड़ा आदमी आता है तो हम लोग कितना जश्न मनाते है। ये खिलाओ, वो पिलाओ। और जिस दिन श्री गणेश आपके घर में आये उस दिन तुम उपवास कर रहे हों। कुछ विचार करों। वह दिन उपवास करने का हैं कि जश्न मनाने का?’ तो उनके दिमाग में आया। वह बड़े समझदार आदमी थे । ब्राह्मण है | बहोत बड़े अग्निहोत्री ब्राह्मण । उनके यहाँ बहोत पहले यज्ञ वगैरे होते थे । लेकिन समझदारी इतनी है कि कहा, ‘माँ लाओ,’ और सब चना खा लिये । उस दिन से छोड़ा और आपको आश्चर्य होगा पूछ लीजिए उनसे चिट्ठी लिखकर के, पूना में रहते हैं। उनके प्रोस्टेट ग्लॅन्ड एकदम ठीक हो गये और उनका ऑपरेशन नहीं किया। | आदमी अगर बीचोबीच रहें, जादा एक्स्ट्रिमपन ना करें तो सब ठीक हो । कौन कहता है अपना सरदर्द लो दुनियाभर

का । मार आफत कर लेंगे । हटयोग में मार आँतडियाँ निकाल कर रख देंगे। अरे भाई, क्यों करते हैं? यहाँ एक बैठे है इनसे पुछो। अभी इनको तीन साल बाद ठीक किया मैने । इनकी तो पूरी आँतडियाँ ही मेरे सामने निकल आती थी। मैं उनसे | घबड़ाहट में कहा भैय्या दो साल तुम मेरे सामने मत आओ। जब तेरा ये बन्द होगा तमाशा । वो ऐसे ऐसे कलांटियाँ मारते थे मेरे सामने की कुछ पुछो ही नहीं। यह सब करने को किसने कहा हैं? अरे क्या पहेलवानी करनी हैं या सिनेमा अॅक्ट्रेस बनना हैं? आराम से रहो। हाँ, बहोत अति भी नहीं करें। बहोत खाना भी नहीं खाना चाहिए । भूखे भी नहीं मरना चाहिए । साधारण तरह से, घर गृहस्थी की तरह रहो। अभी बैठे हैं उनसे पुछिऐ बतायेंगे उनकी क्या हालत है ? तीन साल तक उनका ट्रिटमेन्ट किया, उनके हड्डियों का, तब जाकर ये ठीक ह्ये। इनकी तो हालत खराब है। तो बहोत जादा हठयोग में जाने की जरूरत नहीं । हठयोग जो हैं संसारी आदमीयोंके लिए नहीं । हटयोग , तो जंगलों में जाओ, जहाँ कोई गुरू होते है, पहुँचे हुये । पहुँचे हुये गुरु होना चाहिए। गुरु घंटाल नहीं । लाये हो आपके, उनका पेट इतना बड़ा था । वो हठयोग लेकर यहाँ पहुँचे । क्योंकि ये लोग किसी गुरू के पास जाते है हाथ कुछ नहीं लगता तो आसन लेकर आरयें पैसा बनाया। आसन तो १/१० भी नहीं है। हठयोग के । यम नियम, प्रत्याहा, ईश्वर प्रणिधान, मनन कितनी चीजें उसमें हैं । उसमें से एक छोटी सी चीज़ है इस चक्रों की सफाई करनी। वो भी पता होना चाहिए कौनसा चक्र कहाँ पकड़ा हैं, कौनसा चक्र कहाँ पकड़ा है? वही चीज़़ मन्त्रों की भी हैं। मन्त्र का बोलना जो है वो भी। अब आप से कह दिया कि आज से तुम ये मन्त्र जपो । | आज एक ओंकार वाली आयी थी । अरे भाई, ओंकार तो यहाँ की चीज़ हैं। अब आपका पेट का चक्र पकड़ा तो आप | ओंकार, ओंकार क्या कर रहे हों? यही पकड़ जाएगा आपका । किसी ने बताया कृष्ण का नाम लो। यहाँ सबको कैन्सर ऑफ द थ्रोट हो रहा है। सबको हो रहा है। सब मेरे पास आते है वहाँ से मार खाये हुए। माँ हमारा कैन्सर ठीक करो। अब आप सोचे यहाँ श्रीकृष्ण का वास है कण्ठ में । सव्हायकल प्लेसेस में आपको मैं कितने ही नाम बता दूँ। अब मैं उनको क्या ठीक करुँ? मैंने कहा, आश्रम बनाने की जगह एक कॅन्सर हॉस्पीटल खोलो आप ।” नंबरी भिकारी उस राजा के नाम पर भीख माँगते दुनियाभर में घुमते। कुछ शर्म नहीं आती। ये सब भिकारी की जात है। सारा अपना विशुद्धि चक्र पकड़ लिया है इनका। कैन्सर क्या हो रहा है। इनका कॅन्सर तो सिगरेट वालोंसे भी बत्तर हो गया है। अभी इनको कौन समझायें? सबकी हालत खराब हो जाएगी। एक चार-पाँच साल में बहोत सारे कॅन्सर थ्रोट के पेशंट हो जाएंगे, तब छोड़े । उसके उपर का जो चक्र है, जिसे हम नाभी चक्र यहाँ कहना चाहिए । हालाकि उसके बीच में एक चक्र और पड़ता है। ये जो नीचे का चक्र दिखाया गया है जिसको मूलाधार चक्र कहते है । इससे हमारे शरीर में जिसे पेलविक प्लेक्सस कहते है वो कंट्रोल होता है। अब पेलविक प्लेक्सस जो है ये ग्रोस चीज़़ हैं । इसीसे हमारी जननेंद्रिय वगैरे अन्त्रेय है उसमें भी चार सबप्लेक्सस है देखिए । डॉक्टर भी इस चीज़ को जानते है उसके भी चार सबप्लेक्सेस है । पर ये ग्रोस में बाहर है और सेटल में अन्दर में ये चक्र है। जैसे है कि सेटल में प्राइम मिनिस्टर बैठे है और उनकी सेक्रेटरीएट बाहर काम कर रही है। इसी तरह की चीज़ है कि सेंट्रल में जो है गणेश बैठे है। उनके भी चार हाथ है उसके भी अर्थ है । और उनसे जो कार्यान्वित है वो हुए पेलविक प्लेक्सस है जो उसके भी चार सबप्लेक्सस है। सब जितने भी चक्र है उनसे चालित जो भी प्लेक्सेस है उतनी ही | उनकी भी पंखुड़ियाँ है। उसके आगे आप देख रहे कि मैंने बताया कि मूलाधार चक्र है। मूलाधार चक्र, ये जो भवसागर है अपने पेट में यही विराट की शकल बनायी हुई है । इसके पेट में जो भवसागर है उसमें भी एक चक्र है जिसे नाभी चक्र कहते है । ये भी सेटल में पीछे की तरफ रीढ़ की हड्डी में है। लेकिन वो चालित करता है सोलर प्लेक्सेस को । और ये जो भवसागर है वो सागर स्वरूप है । जो संसार के सारे सागर है इसीसे बनाये गये है। और यही गुरु का तत्त्व है। गुरु तत्त्व जो है ये जल तत्त्व है। गुरु का तत्त्व है और इसमें ही दत्तात्रेय जो गुरु है आदि गुरु है वो बनाये गये है। उनके दस मुख्य अवतार हुए है। उसमें से राजा जनक, नानक, मोहम्मद सब एक ही तत्त्व के अवतार है। इसलिए | | मुलसमान और सीखों की लड़ाई बिलकुल बेवकुफी की बात है। नानक साहब तो संसार में दोनों को एका करने आये थे | बाद में मुसलमान गधे हो गये और उन्होंने आफत मचा दी। और अभी भी जिस चीज़ को उन्होंने मना किया था वो दोनो ने

ही एक की थी। बिलकुल एक ही चीज़ थी । दो चीज़ नहीं । बिलकुल एक चीज़ है। इसका भी आपको प्रत्यक्ष है कि एक बार नानक साहब मक्के की तरफ में पैर कर के लेटे थे। तो किसी ने कहा कि इधर मक्का है । इधर क्यों पैर किये? तो उन्होंने थे कहा चलो इधर में पैर करता हूँ उधर भी मक्का आ गया। जहाँ उनके चरण वही मक्का आ गया। तो अगर वो महम्मद साहब नहीं थे तो कैसे आ गया? सोचने की बात है उनकी पहचानें। तो ये जो भवसागर है इसमें जो आदमी बहोत ज्यादा कट्टर होता है जाती का, जिसमें कट्टरता होती है बहुत ज्यादा वो आदमी पार नहीं हो सकता । मैं मुसलमान, मैं हिंदू, मैं फलाना, मैं ब्राह्मण वो पार नहीं हो सकता। ये भवसागर का प्रॉब्लेम है। और इसके बीच में जो नाभी चक्र है, ये नाभि चक्र जो है ये हमारे धर्म की रक्षा करता है। ‘यदा यदा ही धर्मस्य ग्ला्नि भवति भारत’ इसमें श्री विष्णू और लक्ष्मी का स्थान है । लक्ष्मी-नारायणजी का स्थान है। और जब जब धर्म की ग्लानी हो जाती है तब स्वयं साक्षात परमात्मा ही अवतरण लेते है। क्योंकि ये जो कृष्ण आपने देखे है, या जो विष्णुजी है यही हमारे सृजन त्त्व के है याने इव्होल्यूशनरी है इसलिए जन्म लेते है। शिवजी ने कभी भी जन्म नहीं लिया । ब्रह्मदेव ने एक ही बार जन्म लिया है । जो कि इस चक्र में बसते है । और इसीसे | चारों तरफ घूमकर और उनका सम्बन्ध नाभी से है। इसमें ब्रह्मदेव और सरस्वती का स्थान है। वो चारों तरफ घूमकर इस भवसागर को बचाते है और मनुष्य में धर्म की स्थापना करते है। मनुष्य के धर्म दस है मुख्यतः । इसलिए दस बहोत बड़े गुरू हो गये। जैसे की सोने का धर्म होता है। आप कहते है कि सोना कभी खराब नहीं होता, अनटार्निशेबल है। इसी तरह मनुष्य में दस धर्म होते है। जब इस धर्म से वो च्यूत हो जाता है तब वो दानव हो जाता है। गुरूओं ने बताया की शराब नहीं पिने की क्योंकि मनुष्य आदमी धर्म से च्यूत हो जाता है। इसलिए उन्होंने मना किया है और शराब आपके धर्म के विरोध में बैठती है। मनुष्य अगर दानव बन आया तो शराब पीजिए। मेरे तो समझ में नहीं आता एक दानव बना घूम रहा है तो ऐसे जगह जाने की जरूरत क्या है? और उपर से उस पर कविता लिखते है । और ये मुसलमान अपने को बहोत बड़ा मुसलमान कहलाते है। इनसे बढ़ के शराब पिनेवाला तो कोई है ही नहीं । और सीख्खों का क्या हाल है लण्डन में हो रहा, शरम | आती है। वो एक हेल्मेट लगाने के पिछे में मार आफत मचा दी और शराब पीने पर आएंगे तो क्या अंग्रेज और क्या रशियन पियेंगे। पहले तो चोरी छिपे पिते थे, अब तो खुले आम। सबसे बड़ी चीज़ है जो हमे बता गये है उसके थोड़े से तो रास्ते पर चलो तो पार हो सकते हो। लेकिन अब कोई शराबी-कबाबी वहाँ से आयें, मेरे उपर हक लगाये कि माँ, हमें पार करा दो। तो उसका क्या अधिकार हैं बताईये आप। उसका कोई अधिकार होता है पार होने का? जब उसने छोटी सी भी बात अपने पिता की नहीं सुनी तो उसको कैसे हम पार करा सकते है । और जब वो पार नहीं हुआ तो जाकर मेरी बदनामी करेगा। क्या वो तो ऐसी ही है। वो तो हाथ घूमाती है । वो तो जादू करती है। मंतर करती है। और आप क्या है? उसे पूछना चाहिए कि आपने क्या किया आज तक? आपने किसे पार किया ? आपने किसका भला किया ? आपने किसी की तन्दुरुस्ती बढ़ाई है? किसकी तबियत ठीक करी है? कुछ किया है? माँ को तुम बुरा बोलते हो। तुम्हारी क्या हस्ती ? लेकिन यहाँ तो जो उठा वही बोल पड़ता है। किसी को तो भय है ही नहीं किसी के खिलाफ बोलने का। अब इससे उपर में मैं अभी आपको संक्षिप्त में बता रही हूँ क्योंकि विषय बहोत बड़ा है। लेकिन कल मैं आपको इसके कॉन्शस और सब कॉन्शस माईंड के बारे में बताऊँगी । जो चक्र है उसे हृदय चक्र कहते है और हृदय चक्र में श्री जगदंबा का स्थान है, शक्ति का स्थान है। जो सब जगत् की जननी है उसका स्थान है। क्योंकि जब जब भवसागर में बड़े बड़े राक्षसों का जन्म हुआ और उन्होंने सारे जितने साक्त्विक लोग है उनको सताना शुरु कर दिया तब वो स्वयं साक्षात आकर उनका हुनन कर देती है, उनको खत्म कर देती है। इसके लिए आपको देवी भागवत पढ़ना पड़ेगा, देवी पुराण पढ़ना पड़ेगा। इसमें मार्कडेय जैसा कोई बड़ा गुरु नहीं हो गया । मार्केंडेय भी बहोत बड़ी शक्ति है । बड़ी महान शक्ति थी मार्केडेय भी और वैसे आदि शंकराचार्य थे । वो अभी भूत थे । उन्होंने कुछ लिख ही नहीं। वो तो बस माँ की प्रेज ही गाते रहते सुबह-शाम तक। अगर कोई शंकराचार्य को पढ़े तो उन्होंने कोई भी विवरण खास दिया ही नहीं, बस, वो तो सौंदर्य लहरी और ये चैतन्य लहरी जिसे हम वाइब्रेशन करे यही गाते रहे । बहुत बड़े

पुत्र थे वो। अब उन्ही के कहिए? अपने सीर पे, अब वो है इतने से बटू वामन और अपने सर पे सोने का छत्र बना रहें है। किसी दिन गिर-वीर गया तो … अब वो बैठे हुए है। मैंने सुना कि वो अपना बड़ा भारी छत्रस सोने का बनवा रहे है। अब क्या चोट ही लग जाएगी उनको। मतलब गिरेगा तो मेरा नाम मत रखना, बता रही हूं आपको| कम से कम इतना बना लें की उनके सर को चोट न लगे। गिरे तो चारो तरफ फैला बीच में बैठे रहे आराम से। और उसी में बैठ के, विमान में वो शायद स्वर्ग जाने वाले है। और सब लोग उनकी पूजा में जाते है खास कर जितने भी बिचारे साऊथ इंडियन्स है उनका तो कचुम्बर मैंने कहा बना रखा है । मैंने एक लेडी से पूछा की तुम्हारे हिरे का कहाँ गया ? मैंने दान में दिया। मैंने कहा किसको ? अच्छा! कहने लगी उनका बंदरा है ना उसमें हिरे लगने चाहिए । मैंने कहा उसमें हिरे लगाओ और चार पाँच हाथी भी खड़े . कर दो । एक एक तमाशे दुनिया में हो रहे हैं। जरा देखो तो क्या ये भगवान के नमुने है? ऐसे होते है भगवान के लोग? अरे, भगवान के लोग तो बादशाह होते है। बादशाहत होती है उनकी। उनको क्या देनेवाले हो तुम? बादशाहत ये होती है कि | जमीन पर सो जाओ तो भी बादशाह है। महले में रहें तो भी बादशाह है । चाहें कहीं भी रहें तो भी बादशाह है । उसको कहना चाहिए भगवान के आदमी कि ये वो उसका.. कुट लगाकर घूमेंगे यहाँ पर हिरे जड़ा के, गधों में हिरे लगाने से कोई राजा नहीं होता । उनको ऐसा लगता है गधों को । कि अपने दूम में थोड़े से हिरे जड़वा लो तो दूम कट जाऐगी । अच्छा, तो ये देवीजी का स्थान है । देवीजी जो है, हृदय चक्र में शिवजी का स्थान है। हृदय में आत्मा स्वरूप शिवजी बसते है हर समय । मैं इसके लिए हमेशा उदाहरण देती हूँ। आजकल मॉडर्न बड़ा अच्छा उदाहरण है। जिस तरह की एक | लाइट में एक छोटासा दीप जलते रहता है गैस के, ये आपने घर में गैस होगी तो देखा होगा छोटीसी फ्लीकर जलती रहती है । और जैसे ही लाइट आ जाती है, लाइट कहने से भी , जैसे ही गैस की धारा आ जाती है माने की कुण्डलिनी उपर आती है, इसकी लाइट उसको पकड़ लेती है । और आपकी जो चेतना है उसमें लाइट आ जाती है। आपकी चेतना अभी ऐनलाइटन नहीं है। उसको किसी तरह से हृदय के पास पहुँचाना चाहिए। और हृदय, जहाँ पर शिवजी का स्थान है असल में सदाशिव का पीठ ही है, जगह है। स्थान वो है लेकिन पीठ ये है । तो कुण्डलिनी जैसे ही यहाँ छू जाती है ऐसे ही हृदय आलोकित हो जाता है। ये है सदाशिव का स्थान । इसे हम कहते है ब्रह्मरंध्र से ऊँचा सदाशिव का स्थान है। जैसे ही वहाँ कुण्डलिनी छू लेती है आपकी चेतना आलोकित हो जाती है । तभी फिर ब्रह्मा आपके अन्दर से बहने लगता है। ये जो बह रहा है ये साक्षात ब्रह्म है। आप … कर के देख लीजिए। जो भी बात करें सच है या छूठ आपको फौरन व्हायब्रेशन आएँगे। ये साक्षात ब्रह्मा | आपके अन्दर से बह रहा है। और ब्रह्म जो है आत्मा का प्रकाश है। और आत्मा ही परमात्मा की परछाया है। परमात्मा की परछाया अपने अन्दर जो है या प्रतिम्बिब जो है वो आत्मा स्वरूप है। परमात्मा सदाशिव स्वरूप मानना चाहिए। क्योंकि उन्हीकी मॅन्यूफस्टन से बाद में आपके ब्रह्मदेव और विष्णु ये तीन अॅसपेक्ट निकलते है । माने पहले तो एक सदाशिव स्वरूप होता है और उसके तीन अॅसपेक्ट बन जाते है । जिसको की हम कह सकते है सदाशिव स्वरूप या शिव स्वरूप जो कि हमेशा अेक्झीस्टंट मात्र है। उनकी वजह से हम एक्झीस्टेड है। आज अगर हमारा हृदय बन्द हो जाए तो खत्म हो जाएँगे। अस्तित्व जिसे कहते है, एक्झीस्टंट जो है वो शिव स्वरूप है । उसके बाद में जो ब्रह्म स्वरूप है वो क्रियेटर है मतलब वो सृजन करते है। वो सारे संसार की निर्मिती करते है कहना चाहिए। और उसके बाद में जो तिसरा स्वरूप उनका है विष्णु जी का वो हमारा सृजन माने उत्क्रांती करते है। हमारा इव्होल्यूशन करते है। उनकी वजह से हमारे अन्दर धर्म बैठता है। हर एक एलिमेन्ट से धर्म बैठते है। हर एक सृष्टी का, हर एक चीज़ का धर्म बैठता है। आम का पेड़ लगाओ तो आम निकलेगा। ये सब काम जो है इनकी सृजन शक्ति करती है। माने उसकी जो उत्क्रांति होती है । शिवजी का स्थान यहाँपर है। अब शिवजी नाराज हो जाते है बहुत जल्दी। भोले आदमी है ना । बहुत जल्दी नाराज हो जाते है। खास कर के कोई जरासी भी गलती कर दो तो बहोत जल्दी गुस्सा हो जाते है । उनको मनाने के लिए तो साक्षात आदि शक्ति को उनके चरण पकड़ने पड़ते है, जब गुस्सा हो जाते है । तो उनको भाई गुस्सा नहीं करना चाहिए। और वो | गुस्सा किसलिए होते है। वो गुस्सा इसलिए होते है जब मनुष्य का चित्त आत्मा में नहीं होता। मनुष्य जो है, समझ लीजिए

हट योगी है । आसन वासन करते है जिनको हटयोगी कहना चाहिए, तो रात-दिन अपना शरीर कमाते रहते है । शरीर की तरफ जिस आदमी का ज्यादा चित्त गया उससे हो जाएगा। जो आदमी बहोत ज्यादा मेहनत करता है और सोचता है मुझे ये भी करना चाहिए, वो भी करना चाहिए, धन कमाना चाहिए, घर बनाना चाहिए, घर बनाने के बाद ऐरोप्लेन करना चाहिए, ১১ एरोप्लेन के बाद पता नहीं और क्या करना चाहिए? इस तरह के जो आदमी होते है उनसे बड़े रु्ट हो जाते है शिवजी इसलिए लोगों को हार्ट अॅटॅक आ जाते है। क्योंकि चित्त आत्मा की ओर नहीं है । चित्त को आत्मा की ओर रखो । खास कर आपके दिल्ली शहर में । ये बहोत कॉमन चीज़ है । इसको मैं बहोत माइल्ड शब्दों में कहती हूँ कि इम्बॅलन्स है। उससे लोग खुश होते है, नाराज नहीं होते है। राईट साईड की अॅक्टिव्हीटी ज्यादा है। आप मेहनत कर रहे है । आराम हराम है। चलो मेहनत | करो। मेहनत करो। पैसा कमाओ। देश का डेव्हलपमेंट करो । डेव्हलप माने क्या? वो इंग्लैण्ड जैसा कर रहे है क्या? यहाँपर १०% लोग सुसाईड करते है। १०% लोग पागलखाने में जाते है। १०% लोग अनाथालय में बैठे है। १०% बच्चे जो | | है भाँग खाते है। इसी तरह अगर १०% करते करते अगर १% कोई बैठ जाये तो वो सहजयोग करते है। ये हालत है। वैसा आपको बनाना है यहाँ। जहाँ की एक ग्रॅण्ड मदर है एक ग्रॅण्ड सन से शादी करती है। ये अंग्रेज अपने उपर रुल करते थे पहले। गधे कहीं के। तो गधा कहँ कि क्या कहूँ बताओ । ऐसे तो गधा भी नहीं करता होगा । और कॉमन चीज़ है । ग्रॅण्ड फादर ग्रॅण्ड डॉटर से शादी करता है और ग्रॅण्ड मदर ग्रॅण्ड सन से शादी करती है। कॉमन है । उनको कोई शरम नहीं आती । लण्डन में । व्हेरी कॉमन। रोज न्यूज पेपर में उनके लव लेटर आते रहते है । सबेरे न्यूज पेपर खोलो तो ऐसा लगता है क्या गीता लिखी हुई है। ये अधर्मी लोगों ने अपने यहाँ इतने दिन राज किया। उस वख्त इतने गधे नहीं थे । अब बहोत हो गये । अब तो लिबरेटेड हो गये है ना । वहाँ के बुढ़े इतने गधे हो गये, इतने गधे हो गये उनको सब सिली ओल्ड ब्लोक्स कहते है वहाँपर । वहाँ की लड़कियाँ बड़ी होशियार है। उन्होंने नाम बनाऐं हुए है। कुछ उनको शुगर डैडी कहते है । एक बुढ़े को | बिठाये रखा। उसका पैसे खाती रहती है। घूमती रहती है आराम से। पन्द्रह साल की लड़कियाँ बड़ी होशियार है । तेरह साल से ही होशियार हो जाती है। पन्द्रह साल से नोचना शुरू करती है। बस, पैसा कमाने से मतलब । बुढ़ा है तो क्या हो गया? चार शादीयाँ हो गयी तो क्या हुआ? और आदमी लोग भी उनकी व्हॅनिटी सॅटिसफाई होती है तो ऐसा ही करते है । बुद्धू कहीं के। बुढ़ों को व्हॅनिटी हो जाती है। उनको इनफिरिऑरिटी कॉम्प्लेक्स वहाँ पे हो जाता है । क्योंकि कोई विजडम ही नहीं | उनके अन्दर में। अपने यहाँ अगर कोई बुढ़ा होगा तो कितनी बड़ी चीज़ है बाबा, बुजूर्ग हो गये। आईये । बैठिये । चरण छूते है। उनको पूछे बगैर कोई काम नहीं करते है। वहाँ के बुढ़े इतने गधे है कौन उनके चरण छूअे। अमेरिका, उनका तो नाम ही न लो। वो तो उनके नाना है। गधे कहीं के है। अब इन गधों से क्या सिखने का? किसलिए डेव्हलपमेंट कर रहे हो बाबा । जैसे ही पैसे जादा हो गये उसके पैर निकलते है । पहले तो शराब । जो आदमी शराब पिता है उनको तो प्रमोशन देना ही नहीं चाहिए। ना उसको एक पैसा जादा देना चाहिए । पैसा जादा हो गया तभी तो शराब पी रहा है। अगर भूखा मर जाता तो क्यों पिता? वहाँ के पॉलिटिशन्स ने उनको चौपटाया। उनको बस क्या है? उनको तो ये है किसी तरह से उनको पैसा मिल जाए, वोट मिल जाए बस। फिर तुमको जो करना है वो करो। ये तुमको कायदा पास करना है। हम कर देंगे हमको वोट दो। क्योंकि पॉलिटिशन्स है वे भी, धर्म तो है नहीं । तो ये भी कायदा वहाँ पास होनेवाला है। बहोत कोशिश हो रही है कि ये जो कायदा बना हुआ है अॅबसर्ड, इसको हटा देना चाहिए । बहन भाईओं पे भी नहीं । वहाँ आपको आश्चर्य होगा आप अपने बहन के साथ जाईये लण्डन में, कोई हॉटल में आपको जगह नहीं मिलेगी । बहन-भाई को अलाऊड नहीं है वो कहते है । आप चाहें तो आप और औरत को ले आ सकते है । आपको आश्चर्य हो रहा है और वहाँ लोग सोचते ये कैसे हिन्दुस्तान में हो सकता है। ये हो ही नहीं सकता। हमने कहा भाई, हमारे यहाँ अपने भाई तो छोड़ दो पर किसी को एक बार भाई मान | लिया तो सारा घर उसे भाई मानता है। तुम हो कहाँ ! ये तो अपने पाँव के धूल के बराबर नहीं है । उनको तो बहोत दिन तक | अपने से सिखने का है । तुम्हारे अन्दर जो सहज बातें है वो उन गधों के अन्दर घूसती नहीं है। मेरे शिष्यों की बात छोड़ो। वो बहोत ही सभ्य है । कहने लगे, ‘माँ, इसका मतलब हमारे अन्दर कोई संस्कृती नहीं । ‘ मैंने कहा, ‘ये तो इसका मतलब यही

हुआ बेटे।’ अब तुम समझ लो। कहने लगे हमारी आँख बहोत इधर उधर दौड़ती है कम से कम इसको रोको । गणेश सब अपने साथ रखते है कि हे गणेश , हमें पवित्र बनाओ। तो मैंने कहा इसके लिए पृथ्वी पर अपना आँख लगा के चलो। पर तुमने अपने पृथ्वी पर आँख लगाई तो ठीक होगा । तो आपको आश्चर्य होगा कि सीधे वही देखते चलते है। उपर आँख ही नहीं उठाते। वो भी एक बात है। वहाँ के जो सीकर्स है वो बहोत भारी पहुँचे हुए सीकर्स है । वो एक बार जो कहते है, वो कान पकड़े हुए है उनका भाई, हो गया बहोत हो गया। कहने लगे सब अँधेर है । अब आप सोचिए वहाँपर क्राइस्ट का फोटो निकाल रहे हैं। पिक्चर निकाल रहे हैं कि क्राइस्ट का और उसकी मदर का बूरा सम्बन्ध था। मैने कहा हिन्दूस्तान में ये पिक्चर नहीं चल सकती। ये तुम इधर ही चला लो। तो वो क्विन को इसपे रुल लाना पड़ेगा कि ये पिक्चर नहीं बनेगी जब | तक मैं जिंदा हूँ। वो बेचारी । वहाँ शरीफों को कोई मार्ग ही नहीं रहा । तो ये रजोगुण में जब आप आते है। राईट साइड में रजोगुण है। तमोगुण से उठकर आप रजोगुण में आते है तो आप देख रहे है बीच में सप्तगुण है तो बीचोबीच रहना चाहिए । इसलिए बुद्ध ने कहा है कि बीचोबीच रहना चाहिए। जो मनुष्य बहोत रजोगुण में उतरता है वो अति में जाता है। और अति में जाने के कारण ही उसमें अतिक्रमण हो जाता है। अब आप समझ रहें हैं कि किस तरह से मैंने चक्रों के बारे में बताया । पहले मूलाधार चक्र और मूलाधार इसमें बहुत अन्तर है । मूलाधार जिसमें कुण्डलिनी स्थित है और मूलाधार चक्र के अन्दर कोई भी नहीं जा सकता। अत्यन्त पवित्र चीज़ है। उसको इन्फर्मेशन सिर्फ माँ से आती है । जिस वख्त में आप किसी ऐसे व्यक्ति या अवतरण के सामने जाते है, जिसको | ऑर्थॉरिटी है तभी ये कुण्डलिनी हिलती है और वो मूलाधार चक्र से कहती है, हाँ, ठीक है । तब वो रिलीज करते हैं यहाँ से। दोनो इनमें शक्तियाँ, दोनो साईड कि जिससे जरासी टेन्शन कम हो जाए । और तब कुण्डलिनी फिर उठती है धीरे धीरे और नाभि चक्र से गुजर के, हृदय चक्र से गुजर कर उपर जाती है। जैसे मैंने कहा, हृदय चक्र के एक साईड में शिवजी का स्थान है। और उस साईड में जबकि यहाँ पर आपके लक्ष्मी-नारायण दस अवतरण लेकर इव्हॉल्व्ह करें तब आठवें अवतरण में जब श्री रामचन्द्रजी का अवतरण हुआ है, वो स्थान उनका है। लेकिन रामचन्द्रजी बराबर बीचोबीच नहीं है। वो राईट साईड में है। मानें रजोगुण पे उनको बिठाया गया। उनको ये भी भूला दिया गया था कि वे अवतरण है । क्योंकि उनको रजोगुण पर बिठाकर उनकी मर्यादा बना दी कि ये मर्यादा है मनुष्य की। क्योंकि आयडिअल किंग के रुप में वो आए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम । इसलिए पुरुष की जो मर्यादा हैं वो रामचन्द्रजी है। जिस मनुष्य में ये मर्यादा नहीं होती उसका ये चक्र पकड़ लेता है। बहोत से लोग सोचते है कि हमें फ्रिडम मिली तो मर्यादा छोड़ो। दूसरे जिस मनुष्य में अपने पिता के प्रति श्रद्धा नहीं होती | उसका ये चक्र पकड़ता है। लेफ्ट हृदय उसका पकड़ता है जिसकी अपने माँ के प्रति श्रद्धा नहीं होती। और जिसको अपने पितापर श्रद्धा नहीं होती यो जो अपने पिता से दुर्व्यवहार करता है उसका ये चक्र पकड़ता है । दूसरा, अगर किसी ने अपने बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किया तो उसका भी ये चक्र पकड़ता है। जो बीचवाला चक्र है वो जब औरतों का पकड़ता है तो उसे ब्रेस्ट कॅन्सर होता है । इससे सेन्स ऑफ इनसिक्युरिटी आ जाती है। जब ये चक्र पकड़ता है तब या वो चक्र पकड़ता है तब या ये चक्र पकड़ता है तब इन तीनो चक्रो में मनुष्य को पॅलपिटेशन और बिद्रींग ट्रबल इस तरह की बीमारियाँ होती है । ये तो बीमारी की बात हुई। लेकिन इस से भी बहोत सटी हुई बातें है । इससे उपर के चक्र को ये मैं कल समझाऊँगी आपको । इससे उपर जो चक्र है, कण्ठ के पिछे में यहाँ पर है उसे विशुद्धि चक्र कहते है। इसमें श्री राधा-कृष्ण का स्थान है। श्री राधाकृष्ण के स्थान पर जाकर के इनका अवतरण पूरा होता है । वहाँ पे सोलह पेटल्स है और वहीं सोलह सबप्लेक्सेस है। और इसीसे हमारे आँख, नाक, ये सब माथा, खास कर यहाँ का पोर्शन जिसे की लोगों को सायनस आदि की तकलीफें होती है। मूँह, जबड़ा, कान, इअर, नोज, थ्रोट आदि सब कुछ जो है इसी से होता है। अब ये बहोत जरुरी चीज़ है कि इस चक्रों को खूब अच्छे से समझें । इसलिए इसके बारे में कल आपको बताऊँगी । और इसके उपर में जो चक्र है वो आज्ञा चक्र। बहोत जरुरी चक्र है । इसके बारे में मैं कल बताऊँगी। उसके बाद

सहस्रार है। इस प्रकार आपने देखा कि कैसे सात चक्रों में से कुण्डलिनी अपने आप उठती है। कुण्डलिनी किस तरह से उठती है, किस तरह से चढ़ती है ये मैं परसो बताऊँगी आपको । आज लेक्चर सुना और उसके बाद चलें गए, ऐसा मत करों । अपनी इज्जत करों । अपनी सम्पदा को पाओ। सबको मैं इमोशनल , मेन्टल प्रॉब्लेम है सब कहती हैँ अपनी सम्पदा को पाओ। अपनी सम्पदा को पाते ही अपना जितना फिजीकल, खत्म हो जाएगा। और आप उस दशा में पहुँचाएंँगे जिसे साक्षी स्वरूप कहते है। और आपके हाथ से अविरत ये परमात्मा की डायनॅमिक शक्ति है, ये बहती रहेगी । राधाजी को एक बार मुरली से बहोत इर्षा हो गयी। तो उन्होंने जाकर कृष्ण से कहा कि तुम्हारे मूँह में मुरली क्यों लगी रहती हैं? तो कृष्ण ने कहा तुम मुरली से जाकर पुछ लें। तो उन्होंने मुरली से जाकर पुछा कि भाई, तुम्हारी क्या विशेषता है, तुम्हारी क्या स्पेशालिटी है? तो मुरली ने हँस के कहा, ‘तुमको नहीं मालूम। मेरी यहीं विशेषता है कि मेरी सब विशेषता खो चूकी। मैं खोखली हो गयी हूँ। मेरे अन्दर से वो बहता, बजाता और मैं सुनती रहती हूँ। | इसी प्रकार आप हो जाते हैं और इसलिए परमात्मा ने आपको बनाया है कि आप उसकी मुरली बन जाएँ। आपके अन्दर से वो कार्यान्वित होंगे। उसको आप जानिएगा अभी। उसके कार्य को भी जानिएगा। उसके अगम्य लिला को | जानिएगा। उसके सर्वव्यापी शक्ति को आप जानिएगा । और ये सब कुछ आपका अपना हो सकता है । लेकिन जरासी जो बुद्धी आपकी जो सीमित है, उसको जरासा कहना भैय्या ठंडी हो जाए । सीमा से परे जाने के लिए सीमित चीजें नहीं चलती । इसमें असीम में कुदना है। अत्यन्त सूक्ष्म है और सूक्ष्म चीज़ों के लिए बुद्धी भी सूक्ष्म होनी चाहिए। अपना मन भी थोड़ा सूक्ष्म होना चाहिए । हर समय अपना मन लगता है बाहर बाहर की चीजें आप सोचते रहें । तो काम नहीं बनेगा। थोड़े सूक्ष्म में आ जाओ। सूक्ष्म को पाते ही आप ये ग्रोस तो क्या सारे जड़, जीव, जंतू को ऐसे ही आप कंट्रोल कर सकते हैं। पर सूक्ष्म | को पहले पाना चाहिए । बहोत ही आसान चीज़ है। इसमें कोई मुश्किल चीज़ नहीं। मैं लण्डन में थी तो लण्डन के लोगों ने कहा माँ बड़ी ठंड देती है। जरा गर्मी करा दो । मैंने कहा अच्छा, तुमको समर चाहिए कल यहाँ आओ । आपने सुना होगा | लण्डन में दो तीन समर बड़े है। आप मेरे शिष्यों से पूछो। अभी यहीं दिल्ली में हमारा प्रोग्राम पिछले महिने होने वाला था । तो सुब्रमण्यम साहब ने कहा माँ, यहाँ बहोत ठंडी हो रही है। – ३ डिग्री टेंपरेचर हो रहा है । तो क्या करें? मैंने कहा अच्छा । अगले महिने रखो । हमें अभी टाइम नहीं है। अगले महिने आएेंगे । तो उन्होंने कहा नहीं नहीं फेब्रुवारी तक तो बहोत ठंडी हो जाएँगी। एकदम फ्रीजी हो जाएगा। मैंने कहा अच्छा, तुम रखो तो सही । हमारे आने से पहले एक ही दिन सूर्यदेवता शुरू हुऐ यहाँ मेहनत करने के लिए । और अभी आराम से बैठे हुऐ हो। तो ये कोई मुश्किल काम नहीं। पहले सूक्ष्म को पाओ सूक्ष्म | को पाते ही इस हाथ में क्या है? ये जड़ तो वैसे भी आपने इस जड़ को काबू में कर लिया है । पर जड़ आपके खोपड़ी पर बैठ गया। जैसे की ये जड़ है जैसे इलेक्ट्रिसिटी को आपने मॅनेज कर लिया लेकिन इलेक्ट्रसिटी के बगैर आपका काम नहीं चलता । क्योंकि इलेक्ट्रिसिटी ने आपको काबू में कर लिया। लेकिन जब आप पार हो जाते है, और उस दशा में आप पहुँच जाते है जहाँ के सारे जड़ के उपर आप बैठे है तो जड़ है आपके चरण छूती है जो कुछ करना चाहें करवा सकते हैं। उसका कोई महत्त्व भी नहीं रहता । फिर इंटेरेस्ट भी नहीं रहता । फिर तो मजे में आदमी अपने में रचता और सब से सुन्दर चमत्कृती परमात्मा की आप लोग है, मनुष्य है, मानव है और फिर उसका मजा आता है। जैसे अभी एक साहब है प्रेमपूरी साहब पैर पर आएं तो सबने कहा देखो देखो इनके व्हाएब्रेशन्स कैसे आयें । ऐसे ही है। तुम्हारे अन्दर से सुगन्ध बहते रहता सुबह से श्याम । उसी सुगन्ध को लेते रहों। उसको पाओ।