Spirit, Attention, Mind

Finchley Ashram, London (England)

1978-02-20 Spirit, Attention Mind, Finchley Ashram, 64'
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                                                                “आत्मा, चित्त, मन”

 फिंचली आश्रम, लंदन (यूके), 20 फरवरी 1978

… और वह हमें एक साधन के रूप में उपयोग कर रहा है। साथ चलो!

जैसा की मैंने कहा।

अब क्रिस्टीन ने मुझसे पूछा था, “हमारा समर्पण क्या है?” और उसने मुझसे पूछा है कि क्या हमारे पास एक स्वतंत्र इच्छा है या नहीं। ठीक है?

आपके पास अपनी एक स्वतंत्र इच्छा है। खासतौर पर इंसानों के पास है, जानवरों के पास नहीं। हम कह सकते हैं, आपके पास चुनने की स्वतंत्र इच्छा है, अच्छा और बुरा, सत्यवादिता और असत्यवादिता। अब, आप उसकी मर्जी के सामने समर्पण करने या ना करने के बीच चुन सकते हैं,;अथवा अपनी ही इच्छाओं के दबाव में आने के लिए।

अब, उसने मुझसे पूछा, “समर्पण क्या है?”

समर्पण, जैसा कि मैं कह रही हूं, यह तीन चरणों में किया जाना है। विशेष रूप से यहाँ इस देश में जहाँ लोग सोचते हैं, युक्तिसंगत बनाते हैं, विश्लेषण करते हैं; चूँकि यह आसान नहीं है। अन्यथा यदि आप इसे कर पाते, तो आप इसे स्वचालित रूप से कर सकते हैं 

ईश्वर को मानना, स्वयं, एक प्रकार से आपकी निश्चित धारणाओं पर आधारित है। मुझे नहीं पता कि भगवान के बारे में आपके पास किस तरह की धारणाएं हैं, लेकिन माना कि कुछ निश्चित अवधारणाएं हैं, व्यक्तिगत। सभी के पास ईश्वर के लिए अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। और हो सकता है कि आप देखें कि वह इतना सर्वशक्तिमान है और वह इतना महान है और आप बिना सोचे समझे उस के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। 

इसलिए सबसे पहला है तर्कसंगत रूप से समझकर आत्मसमर्पण करना।

कोई भी अचेतन नहीं है, कोई भी अवचेतन में नहीं है। आप सभी इस बारे में बहुत सचेत हैं कि आप क्या कर रहे हैं और आपके साथ क्या हो रहा है। इसलिए जब आप देखते हैं कि दैवीय शक्ति मेरे माध्यम से बह रही है, यह वायब्रेशन के रूप में प्रकट हो रहा है, यह काम कर रहा है, और यह की, आप इसे संचालित भी कर सकते हैं, फिर तर्कसंगत रूप से आपको उस प्रवाहित दिव्य शक्ति की इच्छा को जानना चाहिए। क्योंकि आपकी इच्छा अभी भी वायब्रेशन की इच्छा पर निर्भर नहीं है।

अब भी जब की आप चीजों को युक्तिसंगत बनाते हैं तो भी शुरूआत में संभवतः आप वही काम नहीं कर रहे होते हैं जैसा कि वायब्रेशन चाहते हैं। अब आप दाईं ओर जाना चाहते हैं, लेकिन मान लीजिए आपका बाईं ओर जाना आवश्यक है: किस लिए? लाभ के लिए, अपने विकास के लिए, दिव्यता के प्रति अपनी समझ बढ़ाने के लिए; अपने अहंकार के विघटन[समाप्ति] के लिए।

अब अहंकार और तुम्हारी इच्छा दो अलग-अलग चीजें हैं। मुझे लगता है यही वह मुद्दा है जो, शायद, जो आपको परेशान कर रहा है।

सहज योगी: हाँ

श्री माताजी: आप अब उस बिंदु पर पहुँच गए हैं।

अहंकार और अपनी इच्छा का पता लगाना है। कैसे? स्व का पता लगाकर।

अब, आपका स्व क्या है? जो कि आपके भीतर आत्मा है?

ठीक है?

आप स्वयं को किस तरह पहचानते हैं? चूँकि, आत्मसाक्षात्कार के बाद, यह वायब्रेट करता है और यह आप से संवाद करता है। तो तुम्हारी इच्छा तुम्हारी आत्मा की इच्छा बन जाएगी, ना की तुम्हारे अहंकार की; क्योंकि आपके पास प्रति-अहंकार भी है।

और अहंकार के साथ तुमने गलतियां की हैं, तुमने कोई विकास नहीं किया है। आपने अपने अहंकार के माध्यम से कुछ भी हासिल नहीं किया है। लेकिन आप अपने अहंकार पर भरोसा नहीं करें, इसे चुनौती नहीं दें, इसे दबाये नहीं, अपितु इसके बदले आप स्व की इच्छा स्थापित कीजिये : जो कि आपके ही भीतर का एक अंग है।

जितना अधिक आप वायब्रेशन के बारे में सीखना शुरू करते हैं, यह जानना कि वे आपसे क्या कह रहे हैं, जैसे वे आपको सिखाते हैं, आप अपने स्वयं के बारे में सीखते हैं।

उदाहरण के लिए, एक बच्चा सबसे पहले अपने हाथों का उपयोग करता है। वह एक गर्म प्लेट पर हाथ रखता है, यह गर्म महसूस होता है। फिर ठंडी प्लेट पर, वह इसे ठंडा देखता है: परीक्षण और गलतियाँ से वह सीखता है कि क्या सही है, क्या गलत है, कौनसी चीज़ क्या है; वास्तव में वास्तविकता क्या है। वास्तव में गर्म और ठंडे में  बुरा ’और गलत’ जैसा कुछ भी नहीं है, लेकिन वास्तविकता यह है: कि जो यह गर्म है, वो अपने हाथ को जलाता है; ठंड़ा है जो कि आपको जमा देता है।

उसी तरह, जब आप वायब्रेशन का उपयोग करना शुरू करते हैं, तो आप अपने स्वयं के बारे में सीखना शुरू करते हैं। यह पहली बार है कि आप अपने स्व का उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि यह स्व अब तक आपको ज्ञात नहीं है।

तो, अपने स्व को जानने की स्वतंत्र इच्छा है। यदि आप जानना नहीं चाहते हैं, तो कोई भी आपको मजबूर नहीं करेगा। यह स्वतंत्र इच्छा खुद को हासिल करना होगी|

 अपने अहंकार के माध्यम से: अपने भीतर यह स्वतंत्र इच्छा ही कार्य कर रही है पर अहंकार के रूप में नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से अग्र-चेतन मन के द्वारा । ओह, पूर्ण अग्र-चेतन मन और अहंकार के बीच अंतर है। आप को इस भेद को समझ में लाना होगा, तब आप जान पाएंगे कि एक स्वतंत्र इच्छा क्या है और अहंकार क्या है।

आपका अग्र-चेतन मन दाहिने हाथ की ओर है;  पूर्ण दाहिने बाजू की नाड़ी, अपने अहंकार से शुरू होकर मूलाधार होता है। पूरी नाड़ी अग्र-चेतन मन है; जिसे आप संस्कृत भाषा में मन कहते हैं। यह अग्र-चेतन मन घोड़ा है।

अब आप भी उस घोड़े का मार्गदर्शन करें। अब वह भाग जो उस घोड़े का मार्गदर्शन करता है वह कौन सा भाग है? क्या यह वो है जो उस घोड़े का भी मार्गदर्शन करता है। क्या यह अहंकार है या सम्पूर्ण अस्तित्व ? तो हमें कहना चाहिए कि, ईगो को अहंकार कहते हैं| जो पूरी अस्तित्व चीज़ है वह है अहम अर्थात ‘मैं ‘ यानी “मैं पन “है |अंग्रेजी में इसे आप क्या कहते है मुझे नहीं पता?  एक, वह ‘ मैं ’, जो सब कुछ करता है। वह देख सकता हैं कि, यह वही अहंकार है जो कि,आपके भीतर स्व की छाया है। कोई है जो हर समय आपको देख रहा है।

आप स्वयं के साथ नहीं जुड़े हैं लेकिन आप स्व के वर्णन को जानते हैं। कोई है जो हर समय देख रहा है। हम कह सकते हैं, उसकी छाया जो हमारे स्व के अस्तित्व में,  फैली हुई विद्यमान है। जो वह चाहता है हम जानते हैं: जब हम गलतियाँ कर रहे होते हैं, हम जानते हैं कि हम गलतियाँ कर रहे हैं; अगर हम चोरी कर रहे होते हैं, हम जानते हैं कि हम चोरी कर रहे हैं। वह प्रकाश हर समय वहां रहता है। वह खुद स्व है।

हम जानते हैं कि यह वहाँ है, लेकिन दूसरे पक्ष जिससे की संपर्क हुआ है से कोई सोहार्द स्थापन नहीं है: अर्थात्, आप अपने में उस के प्रक्षेपण को देखते हैं, लेकिन आप उस जगह तक नहीं पहुँच सकते जहाँ से प्रक्षेपण आ रहा है। अर्थात उस ‘ एक ‘ को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है: वह ‘एक ‘ है जो क्षेत्र को जानता है, क्षेत्र का ज्ञाता।

दरअसल यह खुद स्व है ।

लेकिन हम में उसकी दृष्टि, आप कह सकते हैं उस की दृष्टि, जिसे मैं कहती हूं, वह छाया – उस स्व की दृष्टि, जिस के प्रति हम हर समय सचेत हैं। यह हमें तब भी देख रहा है जब हम अकेले हैं, जब हम किसी संगती में हैं और हर जगह पर। यह हम देख रहे हैं। भगवद गीता में इस ‘एक ‘को , क्षेत्रज्ञ के रूप में कहा जाता है। ‘क्षेत्र’ अर्थात इलाका है, और ‘ एक ‘वह है जो ज्ञाता ।

वास्तव में स्व ही ज्ञाता है; लेकिन अपनी दृष्टि के माध्यम से, ज्ञान की अपनी शक्ति के माध्यम से यह सब कुछ जान रहा है, और ‘ हमें ‘ पता हैं कि यह हमें जान रहा  है। ‘हमें’, इसका मतलब है कि अहंकार वाला हिस्सा। अहंकार जानता है कि कोई उसे देख रहा है।

सहज योग के साथ, केवल एक चीज है, ऐसा होता है कि, वह दृष्टि जो हर समय आपके पास है, वायब्रेशन बन जाती है, प्रबुद्ध हो जाती है, इस अर्थ में कि आप उस स्त्रोत्र के साथ तालमेल रख सकते हैं जहां से यह प्रकट हुआ है।

क्या तुम समझ पाए ? यदि नहीं , तो आप मुझे बताएं।

जैसे यह (विद्युत) प्रकाश है, सब ठीक है? इस प्रकाश की एक आभा है, या इसकी रौशनी हर जगह फैल गयी है। उस प्रकाशपुंज के बाहर जो प्रकाश फैल रहा है, उसका आप किस तरह वर्णन करेंगे, उसे क्या कहेंगे? मैं इसे केवल छाया कहूंगी, सब ठीक है? ठीक है?

तो वहां से जो प्रकाश बाहर फैल रहा है, वह इस बारे में जान रहा है कि आप क्या कर रहे हैं और आप जानते हैं कि वहाँ वह छाया बल है। यह आपके साथ एक छाया की तरह है आप अपने आप में जानते हैं कि आप क्या कर रहे हैं। और यही वह छाया है जो आपके सभी कार्यों को, आपकी कुंडलिनी को भी वहन करती है और डालती है, इसे नीचे रखती है। जिसे कभी-कभी आप मानवीय जागरूकता भी कहते हैं। जैसा आप कहते हैं, वह प्रकाश मानवीय जागरूकता है ।

लेकिन अहंकार वैसा नहीं है। चूँकि यह अहंकार को देख सकता है, यह प्रति-अहंकार को देख सकता है। लेकिन, जिसे आप ’मैं’ कहते हैं वह : इस मोमबत्ती से, या इस (इलेक्ट्रिक) बल्ब से उत्पन्न प्रकाश है जो इस कमरे में बंद है, उसे आप ‘मैं’ कहते हैं, जो घिरा हुआ है। और यह सब कुछ जानता है और आप जानते हैं कि यह प्रकाश जानता है कि आप क्या कर रहे हैं।

यह [विद्युत] प्रकाश नहीं जानता है। यह ठीक इसके विपरीत है: यह प्रकाश जो इस कमरे के अंदर है वह नहीं जानता कि आप क्या कर रहे हैं, लेकिन इस प्रकाश के माध्यम से आप जानते हैं कि इस कमरे में क्या है। क्या आप इस मुद्दे को समझे हैं? स्पष्ट हुआ? कमरे में जो रोशनी फैली है, उस रोशनी को कोई जागरूकता नहीं है। लेकिन इस प्रकाश के कारण हम जान सकते हैं कि इस कमरे में क्या है।

ठीक इसके विपरीत स्व का प्रकाश है। स्व का प्रकाश जानता है कि हम क्या कर रहे हैं और उस प्रकाश के कारण हम भी यह जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। अगर हम बेहोश होते तो हमें नहीं पता होता कि हम कर रहे हैं।

तो वह प्रकाश, या उस प्रकाश की आभा, सचेत क्षण पर कोंधती है।  आप कह सकते हैं,इस तरह से :माना की यह अतीत है और यह भविष्य है, मध्य में चेतन मन है। इस चेतन मन में आप उस ज्ञान का प्रकाश देखते हैं जो आप जानते हैं।

सहज योगी: तब चेतन मन स्व है?

श्री माताजी: नहीं, नहीं, नहीं! सचेत मन वह क्षेत्र है जिसमें स्व की प्रकाश किरण आपको इस बात से अवगत कराती है कि आप क्या हैं। जैसे आप कह सकते हैं, प्रकाश किरण के गुज़रने से। स्व से प्रकाश आ रहा है, और यह चेतन मन को प्रबुद्ध करता है। और चेतन मन चेतन क्षेत्र में जानता है। जागरूक क्षेत्र में प्रकाश जानता है कि आप क्या कर रहे हैं। और आप उस प्रकाश के बारे में भी जानते हैं।

ग्रीगोइरे: स्थान में अग्रचेतन मन और चेतन मन के बीच क्या अंतर है?

श्री माताजी: स्थान है: मध्य में सचेत, अग्र चेतन दाईं बाजू । ठीक है? अग्र चेतन दाईं ओर है और चेतन केंद्र में है।

अब अग्र चेतन मन, जो भी अग्र चेतन मन कर रहा है, हम चेतन मन के क्षेत्र में जानते हैं: यही प्रकाश हमें इसके बारे में जागरूकता प्रदान करता है।

सहज योगी: प्रकाश की?

श्री माताजी: स्व की आभा ही यह प्रकाश है।

सहज योगी: यह एक दर्पण की तरह है, माँ। चेतन मन अग्र चेतन मन के लिए एक दर्पण है।

श्री माताजी: आप देखिए, जब आप कहते हैं, ‘दर्पण’ यह एक तरफा हो जाता है, तो यह बात है। इसलिए मैं कह रही हूं: यह एक तरफा नहीं है। यह सर्व-पक्षीय है। यदि आप सिर्फ एक ‘दर्पण’ का उपयोग करते हैं, तो यह एक तरफ होना चाहिए, लेकिन यह ऐसा नहीं है। यह सब तरफ है। सब तरफ आभा है। या आप कह सकते हैं कि यह चेतन मन के किनारों पर पड़ता है, अग्र चेतन मन और अचेतन मन, मध्य में चेतन  क्षेत्र में। लेकिन वह इसका हल्का हिस्सा है। यदि हम जागरूक नहीं हैं तो चेतन मन का कोई अर्थ नहीं है। यदि आप प्रकाश के बारे में जागरूक नहीं हैं तो चेतन मन सो सकता है। तो वह प्रकाश जो आप में आ रहा है स्व से है, आत्मा से।

अब जानवरों की तुलना में  इंसानों के पास प्रकाश बहुत ज्यादा है। मैं इसे इसलिए प्रकाश कहती हूं ना की, केवल चेतन मन, क्योंकि जानवरों के पास भी चेतन मन होता है। लेकिन आपका प्रकाश उनके प्रकाश से अलग है। आपकी जागरूकता बहुत अधिक है और विकसित है। कैसे? आपके चक्रों का विकास करके।

उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं, या यदि आप कह सकते हैं: हां, यहां तक कि प्रतिबिंब भी आप कह सकते हैं कि, मध्य में प्रकाश स्त्रोत्र है और सभी बाजू में प्रतिबिंबित हो रहा हैं: तो आप उसी तरह का उपयोग कर सकते हैं। यह मान कर की यह कमरा चेतन मन है सभी दीवारें चेतन मन की हैं। तो प्रकाश मध्य में है, और प्रकाश इन दीवारों पर परिलक्षित होता है। अब माना की,मनुष्य का चेतन मन, ये दीवारें हैं और उनका इस तरह उत्थान और विकास हुआ हैं कि, वे देखते हैं कि वे क्या गलत कर रहे हैं; और वे खुद देख सकते हैं।

यदि वे इन दीवारों को साफ और स्वच्छ रखते हैं – चेतन मन – इसका मतलब है कि आप चेतन मन से जो कर रहे हैं उसके बारे में सतर्क हैं| फिर आप इन दीवारों को बिल्कुल साफ रखते हैं, तो प्रतिबिंब बहुत स्पष्ट होता है।

लेकिन फिर भी दीवारों और प्रकाश के बीच कोई तालमेल स्थापित नहीं हुआ है – इसके विपरीत मेरा मतलब है। यह इस तरह है कि, रोशनी दीवारों को जानती है। दीवारों को भी पता है कि एक प्रकाश है जो दीवार के बारे में जानता है, सब कुछ लेकिन इस अर्थ में तालमेल कि, प्रकाश स्व के बारे में कुछ नहीं कर सकता है और स्व प्रकाश दीवार के बारे में नहीं कर सकता है। क्या आप समझे ?

सहज योगी: दीवार के बारे में नहीं?

श्री माताजी: दीवार की।

लेकिन वह प्रकाश मौजूद है। वह मौजूद है। यह आपको वास्तविकता बताता है। यह आपको बताता है, “आप यही हैं। आप यहाँ हैं। यह आपकी स्थिति है। ” यह प्रकाश तुम्हें बता रहा है। यह क्षेत्रज्ञ है: वही जो क्षेत्र को जानता है। वह सिर्फ आपको बताता है। यह आपको एक स्पष्ट विचार देता है कि, “आप यहाँ हैं।” “आपकी खुद की दीवार पर धब्बे हैं।” “आपने अपनी दीवारें खराब कर ली हैं।” “कोई प्रतिबिंब ठीक से नहीं आ रहा है,” या, अगर आप ठीक हैं,”वहाँ प्रतिबिंब आ रहा है,” ।

अब जितने आप बेहतर हैं, उतना बेहतर प्रकाश है, और कोई संघर्ष नहीं है; आप अच्छी तरह से चल रहे हैं। इसलिए मैं मध्य में रहने के लिए कहती हूं।

अब, आप कह सकते हैं कि चित्त दीवारों में है। आपका चित्त दीवारों पर फैला है। ठीक है? वहीं से यह कार्य करता है। यह अंदर और बाहर कार्य करता है। चित्त बाहर काम करता है, जैसा कि आप जानते हैं, बाहर काम करना बहुत आसान है। लेकिन अंदर यह केवल वहीँ तक काम करता है जहाँ यह जानना हो कि, “जो मैं करता हूँ उसके बारे में मैं सब कुछ जानता हूँ।” क्या आप समझे?

चित्त दीवारों पर है। मानव का चित्त दीवार पर है।

चित्त यह जानता है कि अंदर एक प्रकाश है, और यह उस प्रकाश को डालता है … मेरा मतलब है, जहां तक ​​संभव हो, बाहर भी; यह अपने प्रकाश का विस्तार बाहर कर सकता है। इस अर्थ में कि, माना की किसी व्यक्ति को आत्मसाक्षात्कार नहीं है लेकिन वह एक धार्मिक व्यक्ति है, इसलिए उसका प्रकाश बिल्कुल ठीक है, कोई समस्या नहीं है। उसका कोई संघर्ष नहीं है। वह धार्मिक है वह एक अच्छा धार्मिक व्यक्ति है और वह जानता है कि प्रकाश है, वह जानता है, और प्रकाश और स्वयं के बीच कोई संघर्ष नहीं है। तो आभा बिल्कुल अच्छी तरह से रखा गया है।

अब, यह मानते हुए कि यदि इन दोनों के बीच कोई टकराव है, तो आभा गड़बड़ा जाएगी। लेकिन वास्तव में स्वयं प्रकाश में कोई गड़बड़ी नहीं है। लेकिन, इन दीवारों के कारण, यह विचलित दिख सकता है। क्योंकि जब प्रकाश किसी चीज पर गिर रहा होता है: जैसे कि आप पानी को देखते हैं, और यदि पानी स्थिर नहीं है तो आप इसे उसी तरह से हिलता हुआ देखते हैं। ठीक है?

तो, इस तरह, चित्त यहां (दीवारों पर) है। चित्त, अगर यह अस्थिर है, तो आपको प्रकाश की जो छवि मिलती है वह धुंधली होती है। और जिस प्रकाश को आप बाहर, बाहर फेंकते हैं, उस प्रकाश की धुंधली छवि बन जाती है। ठीक है?

इसलिए, अब हम चेतन मन में आ रहे हैं।

चेतन मन वह है, उस क्षेत्र में जो बहुत छोटा अंतराल है, बहुत कम समय। भविष्य और अतीत के बीच बस थोड़ा सा अंतराल है, बहुत कम समय है। इसे संस्कृत भाषा में विलम्ब कहा जाता है। बहुत, बहुत, बहुत छोटा, बहुत कम समय है, और हम वहाँ नहीं रुक पाते। तो उस क्षेत्र में अचानक आप आभा या,कह सकते हैं प्रकाश को स्पर्श करते हैं, और वहां आप इसे देखते हैं। तो फिर आप जानते हैं कि यह क्या है।

फिर आप अतीत के बारे में सोच रहे हैं, या आप भविष्य के बारे में सोचते हैं। उस समय, आप जानते हैं कि आप क्या सोच रहे हैं, लेकिन फिर आप सचेत क्षेत्र में आते हैं और आप जानते हैं, “ओह मैं ऐसा सोच रहा हूं कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए!” क्योंकि आप हर समय लहरों पर घूम रहे हैं। इन दो तरंगों के बीच में चेतन मन है: थोड़ा सा, शुरुआत में,बहुत कम क्षेत्र है| ठीक है?

अब नीचे वह अचेतन मन है, आप कह सकते हैं। वास्तव में यह ऊपर है, लेकिन हम इसे समझने के लिए अभी नीचे, अभी कह सकते हैं। जैसे, लहरें इस या उस तरह बढ़ रही हैं, बीच में थोड़ा गैप है। और जहां, चेतन मन में, तुम अचेतन मन के उस प्रकाश को छू रहे हो। तो वह अचेतन मन, जिसे हम अचेतन मन कहते हैं, वह है स्व का आभा, या प्रकाश, ।

इसलिए हर क्षण तुम सचेत हो, तुम अपने अचेतन मन के प्रति सचेत हो।सचेत इस अर्थ में कि तुम जानते हो कि अचेतन मन जानता है, इसलिए वह क्यों। जिस तरह यह बना है यह वास्तव में उल्लेखनीय है!

उदाहरण के लिए आप ऐसा कह सकते हैं: आप एक लहर पर आते हैं, “ओह,” आप पाते हैं, “यह यहाँ है।” “ओह हाँ, जो भी मैं सोच रहा हूँ, मुझे वह सब पता है, ।” फिर आप सोच, विचार, सोच पर चलते हैं और फिर से आप चेतन मन में आते हैं, “ओह हाँ, मुझे पता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ।”  चेतन मन इस प्रकार का है। यह अचेतन मन का प्रकाश है। आप एक लहर की तरह इसके बारे में सोच सकते हैं। ठीक है? बोगदान क्या आप समझे ?

डॉ. बोगदान शेहोविक: हाँ।

श्री माताजी: देखिये, इसे समझने की कोशिश करें, फिर अच्छा होगा।

अब और सवाल पूछना नहीं है। बस अब आप मुद्दे को समझने का प्रयास करें, क्योंकि यह एक सूक्ष्म विषय है। और, यदि आपको सूक्ष्म को समझाना है, तो मुझे उन उपमाओं का उपयोग करना होगा जो सूक्ष्म नहीं हैं। इसलिए, उपमाओं में नहीं खोना है। मैं आपको केवल यह बताने की कोशिश कर रही हूं कि हमारे अंदर अचेतन मन क्या है, यह कैसे समझें और जहां तक ​​चेतन मन का संबंध है, हम कहां खड़े हैं।

अचेतन मन का किनारा अचेतन है; इसका किनारा। और चित्त भी है। अब मैं आपको दिखाऊंगा

अब क्या होता है: आप घूम रहे हैं, जैसे, आपका चित्त। अब, चित्त, बस इसे देखें:चित्त घूम रहा है; आप इसे भविष्य या अतीत में ले जा सकते हैं। अब इस तरह चित्त जाता है| और चेतन मन में, अचानक आप सोचेंगे, “ओह!” तुम इसके प्रति सजग हो जाओ। आपका चित्त जागरूक हो जाता है, “ओह!”। नहीं तो आप उसी तरह सिर्फ सोच रहे हैं, सोच रहे हैं, सोच रहे हैं। लेकिन जब तुम फिर से चेतन मन में छूते हो , तब तुम सजग हो जाते हो। फिर तुम इस तरह आगे बढ़ते हो तो तुम खो जाते हो; फिर तुम इसके प्रति सचेत हो जाते हो। अब यह रोशनी कहां से आ रही है? यह स्व से है।

इसमें अहंकार कहां है और प्रति-अहंकार कहां है?

अब यह लहर अतीत है, और यह भविष्य है। तो, हर समय आप अतीत से भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, भविष्य से अतीत की ओर, उसी तरह। लेकिन इस कूदने में, उसके बीच में थोड़ा समय है,जहां आप सचेत हैं। और जब भी तुम एक से दूसरे में जा रहे हो मैं कह रही हूं- बोध के पहले । यह सब मैं आपको आत्मसाक्षात्कार से पहले के बारे में बता रही हूं – आप सचेत हैं कि कोई अंतर-प्रवाह है, जो यह जान रहा है कि हम कहां और कैसे कूद रहे हैं, चाहे इस या उस तरफ। आप हर समय,इस या उस तरह से जा रहे हैं, इस तरह से, उस तरह से। आगे, पीछे, जैसे भी हो। लेकिन आप इस तरह से आगे बढ़ रहे हैं।

अब, बोध से पहले,चेतन मन की हलचल आप देख सकते हैं, लेकिन यह एक क्षणांश है, बस एक सेकंड का भी एक छोटा विभाजन। सबसे पहले,आप इस मुद्दे को समझे क्या? यह बहुत स्पष्ट हुआ या नहीं?

इसलिए अब हम दूसरे बिंदु पर जाते हैं।

चित्त जो किनारे पर है हलचल कर रहा है। आप कह सकते हैं कि चित्त एक अन्य प्रकाश है या आप इसका किसी अन्य प्रकार से, इसके मानवीय पक्ष से, जहाँ से यह संचालित है वर्णन कर सकते हैं – ऊर्जा। आप कह सकते हैं कि चित्त एक अन्य ऊर्जा है जो इस तरह से किनारे पर बढ़ रही है।

यह आपके लीवर से उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा आपके जिगर से उत्पन्न होती है। और यह बहुत पतली धार की तरह बाहर आता है, आप कह सकते हैं: चित्त।

तो चित्त रिकॉर्डिंग कर रहा है कि – हम कहाँ हैं। लेकिन जब यह चेतन मन को छूता है तो यह जैसे आप हो उसके प्रति सचेत हो जाता हैं: “यह मैं हूँ!” हो सकता है कि जब आप चोरी कर रहे हों तो आप सचेत न हों लेकिन जब आप चोरी कर चुके हों तब  अचानक आप लौट आएं, “हे भगवान, मैंने ऐसा किया!” तुम इसके प्रति सचेत हो जाते हो। तो चित्त इस तरह से गति कर रहा है, जो आपको उसके प्रति जागरूक करता है।

अब, मानव का चित्त अग्रचेतन और अचेतन मन के किनारे के रूप में विकसित किया गया है। आप इस बात को समझे या नहीं? किनारों पर। मानव चित्त…

(श्री माताजी किसी के स्वास्थ्य के बारे में हिंदी में पूछताछ करने के लिए बात करना बंद कर देती हैं जो अभी-अभी आई है। संभवतः रवि और श्रीमती देवी।)

श्री माताजी: आये, बैठो ! आ जाओ!

बस आपको समझाने के लिए… यह यहाँ अचेतन मन है। ठीक है? और यह दाहिना बाजू है, जिसे आप अग्रचेतन मन कहते हैं, और यह अवचेतन मन है। चित्त बीच में है, आप इसे कह सकते हैं,अचेतन मन से भी जुड़ा है, । लेकिन जानवर में इस अचेतन मन को मैंने इस तरह ही दिखाया है। बस आपको यह दिखाने के लिए कि यह अचेतन मन है मैंने इसे यहाँ दिखाया है।

लेकिन वास्तव में, आप जानते हैं, अचेतन मन का एक भाग कुंडलिनी में है और, एक हिस्सा वहाँ है। तो यह है, बस आपको दिखाने के लिए, मैंने यह दिखाया है। कहने के लिए, आप इसे कुंडलिनी की आभा कह सकते हैं। लेकिन अब, यहाँ, यह समझना आसान है (माँ एक चित्र दिखा रही है)। मनुष्यों में, जो आदतें बनाते हैं, यह इस तरह है। ठीक है?

यह इस तरह है, चित्त पूरी तरह से इस पर फैल गया है। और यह क्षेत्र में मैंने इसे बढ़ाया है। यह इतना बड़ा क्षेत्र नहीं है। मैंने इसे चित्र पर बड़ा किया है। यह चेतन मन का क्षेत्र है, जो एक बहुत छोटा क्षेत्र है। और यह हिस्सा अहंकार है, और प्रति-अहंकार यहाँ है। और यह परत चेतन मन है।

सहज योगी: यह सिर में है?

श्री माताजी: नहीं, नहीं, नहीं! यह मनुष्य में है, मेरु दंड, पूरा मेरु दंड ,पूरी चीज़, मैं बता रही हूं: इडा और पिंगला नाडी। यह पिंगला है और यह इड़ा है। उस के किनारे पर, आप देखते हैं, यहाँ है; और भीतर चेतन मन है, यह एक है। यह बहुत छोटा क्षेत्र है।

अब क्या होता है  कि, यहाँ कुंडलिनी है। ठीक है? वह भी अचेतन मन, अचेतन मन का हिस्सा है। और यहाँ अचेतन मन है जिसे आप कह सकते हैं, जिसके बारे में हम सचेत नहीं हैं। और मैंने तुम्हें दिखाया है कि, यहाँ स्व है। और स्व, सदाशिव की सीट, यहाँ है। यह देखता है। यहीं से सब तरफ देखते हैं। यह बाहर आती है; आपकी आत्मा बाहर आती है, घूम कर आपको देखती है। यह आपके सिर पर होता है, कभी-कभी आपके सिर पर, ज्यादातर आपके हृदय  में होता है। और यह आपको चारों ओर से देख रहा है। यह जानता है, हर समय इसके बारे में जानना।

और यह प्रकाश जो यहाँ है, हम यह भी जानते हैं कि यह वहाँ है। हम जानते हैं कि यह प्रकाश इसे रिकॉर्ड कर रहा है; हम इसके बारे में सचेत हैं।

हर समय हम जानते हैं कि यह प्रकाश नीचे झर रहा है और आप कह सकते हैं कि, सचेत क्षेत्र में,उस प्रकाश की थोड़ी सी झलक में उस प्रकाश की छोटी सी किरण आ रही है।

इसलिए हम जागरूक हैं कि यह प्रकाश हमारे बारे में जान रहा है। कुंडलिनी को चढ़ाकर हम क्या कर रहे हैं, कुंडलिनी जब वह उठती है, तो वह क्या करती है, वह उठती है, उसके चढने के कारण चित्त को वह लेती है, चित्त को खुद में समा कर, चित्त कुंडलिनी के दोनों तरफ जुड़ जाता है ; या आप यह कह सकते हैं की: क्षेत्र पर एक मुकुट की तरह हो जाता है। चूँकि क्षेत्र में वृद्धि हुई है: आप देख सकते हैं, अगर कुंडलिनी इतनी बड़ी है कि। तो आप देख सकते हैं कि यह अब चित्त का ताज पहनी है| तो कुंडलिनी इस तरह चढ़ जाती है, इसे बाहर धकेलती है, और चित्त को इस में ले जाती है | तो आत्मा और स्वयं के बीच एक तालमेल स्थापित होता है। अगर आप सोच सकते हैं, अगर आप इसे छोटा बना सकते हैं, तो देखिये; कुंडलिनी एक छोटी है, लेकिन माना कि मैंने एक बड़ा (चार्ट पर) बनाया है; तो कुंडलिनी चढ़ जाती है, इस तरह चित्त को छूते हुए, सब तरफ, यहाँ ऊपर जाती है, इसे खोलती है, एकाकार हो जाती है।

योगी: क्योंकि मूलाधार से लेकर नीचे तक पूरी नाडी पर चित्त है? यह मन में नहीं है।

श्री माताजी: क्या?

योगी: चित्त |

श्री माताजी: नहीं, नहीं!

योगी: ओह!

श्री माताजी: चित्त केवल मन में नहीं है। चित्त सभी के साथ है, और आपके लीवर के  … माध्यम से उत्पन्न होता है … मेरा मतलब है कि, हमें कहना चाहिए यह उत्पन्न नहीं होता है, लेकिन हम कह सकते हैं कि इसकी आपके लीवर के माध्यम से देखरेख की जाती है, या रख-रखाव किया जाता है या सिद्ध किया जाता है।

लेकिन मन का विकास, जैसे-जैसे मन बढ़ता है, यह चित्त बेहतर होता जाता है। एक जानवर में, चित्त इस तरह नहीं है: वह सिर्फ एक सीधी रेखा जैसा है, यहां से यहां तक।

इसमें ध्यान व्यापक, बड़ा और बुद्धिमान हो जाता है।

इसमें दोनों चीजें पूरी तरह से विकसित हैं। जानवर में यह सिर्फ कुछ परतें विकसित होती हैं और वे एक सीधी रेखा में होती हैं।  एक जानवर में यह नहीं आता है: यह अहंकार और प्रति-अहंकार है, जब वे मिलते हैं, तो यह बात काम करती है। इस बंध की वजह से, यह अपनी जागरूकता विकसित करता है। इस बंध करने से यह स्वयं विकसित होता है। जैसा कि ग्रीगोइरे ने कहा है, जैसा कि एक अंडा विकसित होता है। तो यह वह पपड़ी है जो बनती है और यह खुद के ही अंदर विकसित होती है। तो यह विकसित है।

अब इसे विकसित करने के लिए आप अपने अहंकार या प्रति-अहंकार का उपयोग करते हैं। लेकिन अगर आप ऐसा मध्य में रहते हुए समान रूप से करते हैं, तो कोई भी वृद्धि इस तरफ या उस तरफ नहीं होती है। अब, अहंकार क्या है? यहाँ एक उभार है। और प्रति-अहंकार क्या है? यहाँ एक उभार है। यह यहाँ एक उभार जैसा एक सींग की तरह ऊपर जाता है! यह उभार की तरह आता है (हंसते हुए)। क्या आप समझे?

अब, इसको दबाने और इसके बारे में कुछ भी करने से कोई फायदा नहीं है। आपको जो करना चाहिए वह यहां मध्य में चित्त देना है: केंद्र।

इसलिए धर्म के कारण, धर्म वह है जो वहां उभार रखता है, इससे जुड़ा है; इसलिए उचित, उचित वृद्धि अंदर आती है। नाभि तक उभार है। तब विवेक और वे सब चीजें तुम्हारे भीतर काम करती हैं, और तुम ऐसे ही रहते हो। यह एक उचित, समझदार व्यक्ति है। लेकिन आम तौर पर ऐसा नहीं है। आम तौर पर सवाल इस तरह का होगा, और यह सिर्फ इस तरफ लटका हुआ है। आम तौर पर व्यक्ति ऐसा नहीं होता है। यह इस तरह से आता है। मेरा मतलब है, पश्चिम में मैं कह रही हूं, और उस तरह एक खूंटी से जुड़ा हुआ है! यह एक अल्पविकसित वस्तु है। अब इसे कहाँ निकालें? यहाँ? इस तरफ?

योगी: नहीं, नहीं।

श्री माताजी: यह ऐसा है। तो अब आप समझ गए हैं कि मेरा क्या मतलब है। अब यह स्पष्ट है? चित्त, अवचेतन ? यह एक कठिन विषय है। मानसिक रूप से समझना एक कठिन विषय है।

फिर ऊपर, परमात्मा का चित्त आपकी तरह नहीं है। आपका चित्त किसी जानवर के चित्त की तुलना में बहुत अधिक है: जिसे आप महसूस करते हैं। लेकिन परमात्मा का चित्त आपकी तुलना में कई गुना गतिशील है। इसलिए जब आप इसके साथ एकाकार हो जाते हैं, तो यह चित्त आपका चित्त बन जाता है: यह आपके माध्यम से बहने लगता है। तो यह एक और परत बनाता है – जो कि परमात्मा का चित्त है – और आप हाथ में वायब्रेशन प्राप्त करना शुरू करते हैं। पहली बार चेतन मन में, आप शुरू करते हैं,  वह वास्तविक अर्थों में बहना शुरू कर देता है, और आप कह सकते हैं, आप यहां एक आवरण विकसित करते हैं, और आप वायब्रेशन महसूस करना शुरू करते हैं।

लेकिन फिर, जब आप इस तरफ थोड़ा और अधिक जाते हैं, तो यह वहां रुक जाता है; या इस तरह से और अधिक, यह बंद हो जाता है। फिर से आप इसे मध्य में लाते हैं और धीरे-धीरे अधिक स्थान को होने देते हैं। अब यही वह है जो समर्पण है:  वहां जगह अधिक है।

चूँकि आप इस अहंकार या प्रति-अहंकार को कार्य करने की अनुमति नहीं देते हैं, लेकिन केवल एक रास्ता की अनुमति देते हैं | तो यह खुलने लगता है और प्रकाश काम करना शुरू कर देता है।

योगी: श्री माताजी, यह भारतीय संगीत की तरह है, जब वे इस तरह से जाते हैं और वे वापस नोट पर आते हैं। जैसा कि आपने अभी-अभी ऐसा किया है।

श्री माताजी: जिसे यह कहा जाता है – सम। सम का अर्थ वास्तव में ‘बराबर’ है।  लेकिन  भारतीय संगीत में जब वे पहली बार उस बिंदु पर आते हैं, तो, वे बजाते जाते हैं 16 बीट तक । वे 16 में गुणित 10 तक जाएंगे, लेकिन फिर से वे उसी बिंदु पर वापस आ जाएंगे। यह सम उस सम के साथ मिलना चाहिए, और यह बात है तो ‘सम’ अर्थात बराबर है।उस बिंदु पर सब कुछ मिलना चाहिए।

और जब यह सब खोला जाता है … वास्तव में, यहाँ मैंने इसे इस तरह दिखाया है, लेकिन आपको इससे जुड़े चक्रों को बीच में रखना चाहिए। यह चित्त जाता है और वास्तव में यहाँ के चक्रों से जुड़ा है। तो कुंडलिनी चक्रों से गुजरती है। आप देख सकते हैं कि यहाँ एक चक्र है और यहाँ एक चक्र और यहाँ एक चक्र और यहाँ एक चक्र है।

जब आप इस स्थान को और अधिक बढ़ने देते हैं, तो क्या होता है, ये चक्र भी खुल जाते हैं। इन चक्रों में आपके अपने देवता हैं। उनका अपना कार्य है और वे इसके साथ एक हैं। तो यह एकाकारिता में काम करता है। और इसीलिए पहचान होती है।

लेकिन, सामान्य समझ में अपने आप में इस जगह को छोड़ना अर्थात समर्पण है।

क्योंकि गतिविज्ञान तो है ही।  सर्वव्यापी गतिशील है, यह काम कर रहा है। ठीक है? यह सर्वज्ञ है। यह अपना काम कर रहा है। यह सही है। लेकिन समस्या यह है कि आपका चित्त अभी उतना सूक्ष्म रूप में विकसित नहीं हुआ है, जितना कि उसमें प्रवेश करने के लिए आवश्यक है। जब वह इतना सूक्ष्म हो जाता है – केवल मनुष्य ही उतना बन सकता है -यह इस चीज़ को खोल देता है।

वास्तव में कुंडलिनी सूक्ष्म तंत्र की सूक्ष्मता को इसमें जोड़ती है, और वह उसे नीचे लाती है। और वह सूक्ष्मता तुम्हें सूक्ष्मता की परत देती है। और यह एकाकार हो, इस के साथ सूक्ष्म हो जाता है, और यह उन सूक्ष्म क्षेत्रों से गुजरने लगता है और वायब्रेशन प्रवाहित होने लगते हैं

जितना अधिक आप इस भाग को खोलते हैं, आप इसके साथ एकाकार हो जाते हैं। तो क्या? आप स्व बन जाते हैं।

अब, यह स्व यहाँ (माँ को कागज का एक टुकड़ा दिखाते हुए सुना जा सकता है),  शरीर में यह स्व नाभिक है और, बड़े शरीर में,यह शरीर एक कोशिका है। ठीक है? तो, आप उस सर्वव्यापी शक्ति के साथ एकाकार हो जाते हैं: जो कि परमात्मा की इच्छा है; जो ज्ञात है इस स्व को, उस कोशिका के नाभिक को |

प्रत्येक स्व पूरी तरह जानता है कि परमात्मा क्या चाहता है।

तो जैसे ही आप अपने तथाकथित ज्ञान, को थोड़ा बाहर छोड़ने की अनुमति देते हैं, वास्तविक ज्ञान प्राप्त होना शुरू हो जाता है और फिर? ओह, आप संबंधित आदेश कर सकते हैं ! तब आप जैसा महसूस करें कह सकते हैं और यह बस कार्यान्वित होता है।

लेकिन, आपके साथ एक प्राचीन गठरी होने की वजह से, परत भले नई है,  उस परत की पूरी तरह इस के साथ पहचान मुश्किल है। यदि आप कर सकते हैं, तो आप बस वहां होंगे – कुछ भी स्वच्छ करने की कोई समस्या नहीं है और यह सब निरंजित हो जाता है।

यह प्रकाश, जब यह बहता है, तो यह सभी चक्रों से गुजरता है और बाहर आता है। सबसे पहले कुंडलिनी ऊपर आती है। वह चक्रों को खोलती है, जगह बनाती है; इसे खोल देती है। इसके अलावा, उसके उपर आने से, थोड़ी सी परत जो ऊपर आती है। लेकिन जब यह अंदर भरना शुरू होता है, तो यह इसे और अधिक ढंक लेता है। लेकिन यह सीधे उस तरह से आच्छादित नहीं करता है लेकिन चक्रों के माध्यम से यह गुजरता है। इसीलिए आपके चक्रों को शुद्ध किया जाना है।

चूँकि मार्ग चक्रों से होकर गुजरता है। यहाँ चक्र हैं। वे सभी चक्र यहां हैं। ठीक है? क्या आप समझ सके ?

माइकल, कैसा लग रहा है? हाथ सीधे रखें। इसे सीधे रखें। यह बहुत ठंडा है, यह हाथ बहुत ठंडा है? आप इसे उठा सकते हैं! आप इसे ले लो! सब ठीक है। दरवाजा बंद करो, हाँ। अब, अपने हाथों को एक साथ रखें। माफ़ करना।

तो, आज, जैसा कि हम जानते हैं कि, मोहम्मद साहब के जन्मदिन का दिन है। और हमें यह समझना होगा कि ये सभी अवतार अलग-अलग समय पर आए थे। वे सभी अलग-अलग समय पर आए थे। और वे मनुष्य के विकास की एक सतत प्रक्रिया के रूप में आए। इसमें किसी संघर्ष वगैरह का कोई सवाल ही नहीं: कोई सवाल नहीं। आप देखें, इंसान की समझ में नहीं आ सकता है, क्योंकि बात ऐसी है की, वे खोपड़ी (लिम्बिक क्षेत्र)जो की यहाँ बंद हो रही है संघर्ष पैदा करते हैं, वे संघर्ष के साथ रहे हैं| इसलिए वे बस इस धरती पर आए, किसी की संपत्ति नहीं हैं। वे इस पृथ्वी पर अवतार के रूप में आए, उन में से सभी। वह (मोहम्मद साहब) ईसा-मसीह के बाद आए। उनकी स्थिति देखें!

क्योंकि ईसा-मसीह एक अवतार के रूप में आये थे जो परमेश्वर का पुत्र, परमेश्वर का पुत्र वाला पहलू थे, और उन्होंने क्षमा की शिक्षा दी। और ईसाई सिद्धांत ने इसे दुख कहा है, और ईसाइयों को पीड़ित होना चाहिए! तो, उन सभी ईसाइयों को भुगतना होगा, आप देखें। इस तरह की चीज़ आप पर मढ़ दी गई है| फिर, कोई भी वध करता है, आपको हत्या को स्वीकार करना चाहिए। कोई भी आपको चोट पहुंचाना चाहता है, आपको स्वीकार करना चाहिए। “आपको भुगतना होगा!” यहां तक ​​कि अगर आप पीड़ित नहीं हैं, तो आपको खुद को पीड़ित होना ओढ़ना चाहिए।

यह मजेदार सिद्धांत: हर कोई आश्चर्यचकित था, “उन्हें यह कहाँ से मिला?” ईसा-मसीह को कष्ट नहीं हुआ। वह पीड़ित नहीं हो सकते। वे कैसे पीड़ित हो सकते हैं?  यदि वह पीड़ित हो सकते है तो फिर कैसे वह भगवान के पुत्र थे?  वह नहीं हो सकते। यह सिर्फ एक ड्रामा था।

वास्तव में उनका संदेश ‘ पुनरुत्थान ‘ था, लेकिन ईसाइयों ने इस का उपयोग एक पीड़ा के रूप में करना शुरू कर दिया: इसलिए उन्होंने (देवताओं) ने कहा, “हे भगवान, अब क्या करना है?” इसलिए हमें किसी और को भेजना होगा! अब हम किसे भेजें? कोई ऐसा जो उन्हें सिखा सके की पीड़ा बिलकुल  महत्वपूर्ण नहीं है । आपको बचाव करना होगा। आपको इससे लड़ कर जीतना होगा! उनकी तुम्हे पीड़ित बनाने की हिम्मत कैसे हुई !

जैसे, मैं आपको बताती हूं: कोई व्यक्ति  मुक्तानंद के पास से मेरे कार्यक्रम में आया था। व्यक्ति भीषण बीमार था। वह आया और उसने वहां सभी तरह की बातें कहना शुरू कर दिया। तो सहज योगियों को गुस्सा आ गया, आप जानते हैं, मोदी और वह सब। उन्होंने कहा, “यदि आप चुप नहीं रहते तो हम आपको पीटेंगे !” वह कहने लगा, “ओह, तुम ऐसे हो, तुम वैसे हो!” उन्होंने (मोदी) कहा, “आप हमारी मां के लिए कुछ नहीं कहें अन्यथा हम तुम्हे पीटेंगे|

तो उन्होंने कहा, “आप सहज योगी हैं और आपको इसे सहन करना चाहिए!” 

उन्होंने कहा, ” वे तुम्हें अब बाहर अच्छी तरह से सहन करेंगे!” “उसे बाहर फेंक दो,” 

मैंने कहा, “अभी! और उसे दो किक दे दो! बस अब तुम उसे तुरंत बाहर फेंक दो!

यदि आपने क्राइस्ट की माँ से कुछ भी कहा होता, तो वह उसी क्रॉस से सभी को अच्छी तरह से मारते। इसीलिए यह व्यवस्था की गई थी कि ईसा-मसीह की माता के बारे में कुछ नहीं कहा जाना चाहिए। क्योंकि वह नाज़ुक बिंदु होगा। उस बिंदु पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया होता।

तो यह मूर्खतापूर्ण विचार है कि इन सभी धार्मिक लोगों को पीड़ित होना चाहिए। और फिर धर्म क्यों? आपके पास धर्म क्यों होना चाहिए? मेरा मतलब है, अगर आपको धर्म के आधार पर दुखों का सामना करना पड़ता है, तो बेहतर है कि ऐसा भयानक धर्म ना हो!

आप देखिए, यह कष्टों को मोल लेने जैसा है! नहीं, यह कहां कहा गया? मुझे नहीं पता कि,बाइबल में उन्होंने कहाँ कहा है कि, सभी ईसाईयों को कष्ट उठाना चाहिए? मुझे नहीं पता कि, आपको कहाँ से क्या बिंदु मिलता है!

ग्रीगोइरे: बाइबल में बताया गया है कि यीशु ने एक युवक से कहा, “यदि तुम मेरा अनुसरण करना चाहते हो तो तुम तुम्हारा क्रॉस ले आओ ” या ऐसा ही कुछ।

श्री माताजी: बिलकुल ठीक। इसका मतलब यह नहीं है कि आप पीड़ित बने! “यदि आप मेरा अनुसरण करना चाहते हैं तो अपना क्रॉस ले लें।” अब, क्रॉस क्या है? आप जानते हैं! यह अबोधिता का प्रतीक है।

मैं कहता हूं कि अपना क्रॉस ले लो, चूँकि  यदि आप यहां आ रहे हैं तो, जैसे आप हैं, आपको ढाला जाना है, आपको उचित संतुलन में लाया जाना है, इसलिए आप थोड़ी पीड़ा झेलें। जब आप दूसरे के वायब्रेशन का परीक्षण करने का प्रयास करते हैं तो आपको उस जलन और उस सब का थोड़ा सा अंश मिलता है। लेकिन उस तरह से अपना क्रॉस नहीं ढोना, जिस तरह हमने समझा है| अब आपका क्रॉस क्या है? मैं आपको बताती हूं: मेरा मतलब है ईसा-मसीह के बारे में पूरी समझ ही बेतुकी है! आप इस तरह के एक महान व्यक्तित्व को बिलकुल शून्य बना देते हैं! क्या वह तुम्हें कष्ट पाना सिखाने के लिए आये थे? मेरा मतलब है, क्या आप ऐसा सोच भी सकते हैं? मैं नहीं जानती कि आपके ये ‘महान’ पुजारी कौन सा दिमाग और कौन सा विवेक और क्या बुद्धिमत्ता, यह कहने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं कि वह आपको पीड़ित बनना सिखाने के लिए यहां आए थे!

मैरी: वे शायद अपने जिगर से परेशान हैं और वे दुखी महसूस करते हैं, इसलिए वे इससे पीड़ित हो जाते हैं!

श्री माताजी: (हँसते हुए) नहीं, नहीं, लेकिन उपदेश यह है कि आपको दुःख उठाना होगा!

अब भले ही आप इस तरह की परिस्थिति लेते हैं: आप कह सकते हैं कि यह ऐसा था कि अगर कोई भी आपसे कुछ बुरा कहता है, तो आप इसके बारे में परेशान नहीं हों, आप परेशान नहीं होते। लेकिन कष्ट सहना क्यों?  दुख का मतलब है कि आप इसके बारे में परवाह करते हैं! अन्यथा आप बस इसकी परवाह नहीं करेंगे।

योगी: मुझे लगता है कि यह नपुंसकता का सिर्फ एक युक्तिकरण है। मुझे लगता है कि यह ऐसा है क्योंकि वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे। पुजारी असमर्थ थे, वे आसपास के लोगों को पीड़ित देख रहे थे और वे उनकी मदद करने में सक्षम नहीं थे, फिर उन्होंने कहा, “अपने दुख को स्वीकार करो और इसका आनंद लो।”

श्री माताजी: दुख भोगो? नहीं, यह दुख का एक बेतुका सिद्धांत है।

मैरी: लेकिन मूल सिद्धांत यह था कि जो भी कष्ट है उन्हें आप परमात्मा को समर्पित कर दो उस को तोड़-मरोड़ कर यह बन गया की आप को कष्ट महसूस करना होंगे|

योगी: दुख तप या वैसा ही कुछ था।

श्री माताजी: तप! तप!

मैरी: जब दुख आपके पास आता है, तो आपको इसे स्वीकार करना होगा और इसे भगवान को अर्पित करना होगा। मेरा मतलब है कि कुछ लोग अभी भी सही बात सिखाते हैं लेकिन ज्यादातर लोग बस सोचते हैं कि उन्हें दुखी महसूस करना है।

श्री माताजी: आप देखिए, मेरी इच्छा है, आप कुछ भी नहीं कहें, यहाँ तक कि, अर्पण ’या कुछ अन्य । आप देखते हैं,  ईश्वर का नाम या परमात्मा स्वयं एक मल्हम है। मान लेते है कि, आपको पेट में दर्द है: जब आप मेरी ओर हाथ रखते हैं, तो, आपका सब ठीक हो गया  – समाप्त! अब तुम मुझे क्या अर्पण कर रहे हो? मुझे कुछ नहीं मिल रहा है! यह पूरी तरह से एक अलग बात है। तुम देखो, कष्ट और परमात्मा दो अलग चीजें हैं! ईश्वर वह है जो आपके दुख को दूर करता है।

23 वाँ भजन क्या है? क्या यह कहता है कि आप कष्ट उठायें?

गेविन ब्राउन: प्रभु मेरा रखवाला है।

श्री माताजी: फिर? कहां, कौन सी ऐसी महान चीज है जो इतना बड़ा सिद्धांत सामने आया है –  मुझे पता नहीं है,कहां से – कि हमें पीड़ित होना चाहिए? यह हर समय वादा किया गया है कि जो पीड़ित हैं उनकी भी मदद की जाएगी: “धन्य हैं वे …”

गेविन ब्राउन: लेकिन अब तक वादे पर कोई वास्तविक अमल नहीं हुआ।

ग्रीगोइरे: माताजी, अगर आप नहीं आए होते , ठीक है …

श्री माताजी: क्या मैं नहीं आयी हूँ?

ग्रीगोइरे: ठीक है, एक जीवन पहले कहो …

गेविन ब्राउन: मान लें कि आप नहीं आए होते  …

ग्रीगोयर: नहीं! चलो, एक जीवन पहले …

गेविन ब्राउन: … हम समझ नहीं पाते ईसा-मसीह क्यों आये होंगे।

ग्रीगोएयर: … और हम पीड़ित हैं क्योंकि चारों ओर गड़बड़ है। इसे सहन करने का एकमात्र तरीका यह विचार है कि हमारे दुख का एक अर्थ है। और एक ही रास्ता है कि हम सोच सकते हैं कि हमारे दुख का एक अर्थ है …

श्री माताजी: तब तो सरल अर्थ है: अपनी गलतियों के कारण आप पीड़ित हैं!

ग्रीगोयर: और वह मदद नहीं करता है!

श्री माताजी: बहुत ही साधारण बात है, आप जानते हैं। यह बहुत ही सरल है। तुम, मनुष्य: उन्हें एक तरफ रख दो, दूसरी तरफ ईश्वर,  ठीक है? आप एक-दूसरे का गला काटते हो :ईश्वर ने आपको एक-दूसरे का गला काटने को कहा है? अगर युद्ध होता है, तो किसने? भगवान ने युद्ध बनाया है? शारीरिक रूप से भी: यदि आप खुद की उपेक्षा करते हैं, आप सभी प्रकार की चीजें करते हैं, तो आप कष्ट उठाते हैं!

किसने तुम्हें इतनी किताबें पढ़ने के लिए कहा है? पहले तो इतनी सारी किताबों की रचना करने के लिए आपसे किसने कहा?  आप क्या जानते हैं,जो इतनी सारी किताबें बनाने के लायक ? यह बात है बस! चूँकि यह आप कर रहे हैं, इसलिए आप इसका सामना भी यहाँ करते हैं! क्या भगवान ने आपको इतनी सारी किताबें लिखने और उन्हें पढ़ने और खुद को जड़ करने के लिए कहा था? आपको फ्रायड की बात मानने को किसने कहा है?

लेकिन आपके अंदर बात करने और आपको बताने के लिए ‘वह’ हर समय है। ऐसा नहीं है कि उसने आपको छोड़ दिया है। वह हर समय आपका मार्गदर्शन करता है। केवल एक चीज जो आपको करनी चाहिए थी वह है उनकी सलाह को स्वीकार करना। हर समय वह आपको बता रहा है, “यह गलत है, जो आप कर रहे हैं, यह बहुत ज्यादा है।” आप अपने अहंकार को भी देख सकते हैं, इससे ज्यादा आप और क्या देखना चाहते हैं? जब आप जानते हैं कि आपका घोड़ा तेजी से गति कर रहा है: तो क्यों न इसकी गति धीमी की जाए ? आप जानते हैं कि आप अपने लक्ष्य भूल रहे हैं:  क्यों न इसे धीमा करें?

 जिस तरह से आप पीड़ित हैं, क्या भगवान ने आपको ये सभी चीजें बताई हैं कि  पीड़ित होते जाओ और चलते जाओ? अब यह लड़की जो जिसके पति वह एक दुर्घटना में मृत्यु को प्राप्त हो चुके है: क्या ईश्वर ने उनसे कहा था कि तुम जाओ और दुर्घटना करो? वह जल्दी बाज़ी में कहीं जा रहा होगा कि: उसे पहुंचना ही चाहिए! इसलिए वह एक दुर्घटना करता है और यह उसके साथ हुआ।

इंसान ने ही सब कुछ बनाया है। यहाँ तक कि भूत और वे सभी मनुष्य द्वारा बनाए गए हैं, भगवान ने उन्हें नहीं बनाया है। यह सब मानव की रचना है।

ईश्वर ने आनंद और प्रसन्नता पैदा की है। दुनिया की सारी खूबसूरती आपके चरणों में है, ऐसी खूबसूरत चीजें।

एक छोटे से छोटे वृक्ष की भी कल्पना करो, अगर तुम एक छोटे से बीज को देखते हो; आप स्वयं कुछ भी अपनी खुली आँखों से देखते हैं, यदि आप सूक्ष्मदर्शी के तहत देखते हैं, सुंदर ,कितना प्यारा ! हर चीज़ कितनी सुंदर उसने तुम्हारे लिए बनायी आनंद को देखने के लिए और यहां आप एक चाकू ले कर और अंदर डाल रहे हैं और फिर आप कहते हैं, “मैं कष्ट उठा रहा हूँ ।” तुम्हें ऐसा करने के लिए किसने कहा है? यह ऐसा है, चाहे सामूहिक रूप से या व्यक्तिगत रूप से।

उसके लिए भगवान जिम्मेदार नहीं है।

आप देखिये, यह उस एक माँ की तरह है, जिसने आपके लिए यह सोच कर सब कुछ अच्छी तरह से पकाया है कि, “भोजन के लिए अब साथ आओ!” यहाँ वह अपने सभी बच्चों को घायल, बेज़ार देखती है ! समाप्त !

उसने तुम्हारे लिए सुंदर चीजें बनाई हैं, परम सौंदर्य। और वह चाहता है कि आप वहां बैठें और उस प्रसन्नता का आनंद लें, बस कल्पना करें! यही कारण है कि उसने आपको बनाया है! यह एक ऐसी हताशा है। ऐसी हताशा! (हँसी)

(रेजिस केमिली के टेप का क्षतिग्रस्त हिस्सा: 20 सेकंड के लिए अश्रव्य ]

… आप किसी एक ऐसे व्यक्ति को पहचान सकते हैं जो क्रूर है, लेकिन आप ऐसे व्यक्ति के पास जाना चाहते हैं, अपना खराबा कर सकते हैं और फिर आप कहते हैं कि आप दुखी हैं।

आप इंसानो को इतना महत्व देते हैं।  केवल आप ही ऐसा कर रहे हैं|

यदि हिटलर है, तो यदि मदद करने के लिए जर्मन नहीं होते तो हिटलर भी वहां नहीं हो सकता था । जर्मन के बिना आपको लगता है कि हिटलर का अस्तित्व हो सकता था?

वैसा ही यहाँ भी, आप अपने लोगों का चुनाव करते हैं जो बहुत हावी हैं, जो कभी-कभी बाधा ग्रस्त भी होते हैं; वे आपके प्रधान मंत्री बनते हैं, दमन करते हैं। तो तुम क्या करते हो?

यह आप पर छोड़ दिया गया है! यदि आप ऐसा नहीं चाहते हैं तो,  आपके पास अच्छे लोग भी हो सकते हैं। क्या आप किसी संत को वहां रखेंगे? नहीं, आप कहेंगे कि वह व्यावहारिक नहीं है? कोई भी संत को स्वीकार नहीं करेगा!

आप कहीं भी देखें, जैसे कि मकारिया का भयानक व्यक्ति ! आप उसे वहां के चर्च का मुखिया कहते हैं! मेरा मतलब है, वह वहाँ कैसे हो सकता है?

भारत में वे इन शंकराचार्यों को नियुक्त करते हैं: भयानक, बेकार चीजें, किसी काम के लिए अच्छे नहीं है! मैं आपको बताती हूं, उनका फुटबॉल के रूप में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है |जो वे इतने बेकार हैं! और लोग उनके लिए स्वर्ण छत्र बना रहे हैं! मुकुट पर वे हीरे और जवाहरात रखना चाहते हैं। और अगर वे बाजार में जाते हैं तो लोग सोचेंगे कि कुली जा रहा है। मेरा मतलब है कि सामान ढोने वाले को भारत में कुली भी कहा जाता है।

योगी: एक कुली।

श्री माताजी: हाँ, एक कुली। वहाँ एक कुली चल रहा है! और वे एक मुकुट रखना चाहते हैं। क्योंकि वे ऐसे दिखते हैं, जैसे दुखी जीव। इसलिए वे सोने का मुकुट रखना चाहते हैं और वे चाहते हैं कि सोने से बना एक बड़ा छाता हो, और छाता उनके उपर गिर सकता है , इसलिए उनके पास खुद को बचाने के लिए एक ढाल भी होनी चाहिए। इस तरह के दुखी लोग, वे चर्चों के प्रमुख और संगठनों के प्रमुख बन जाते हैं। यह तुम हो जो कि ऐसा करते हो| और इसे अच्छा कहते हो, “हमें कष्ट भुगतना होगा।” वे लोग कहते हैं, “यह ठीक है, ऐसा होने दो!” परिणामस्वरूप जो बुरा है, जो बुराई है वह फलता-फूलता है|

 संतों के लिए अब और कोई दुख नहीं! बहुत हो चुका।

योगी: अच्छा लगता है!

श्री माताजी: बिलकुल! अब कोई भी किसी संत को छूने की हिम्मत नहीं करे बस! बहुत हो चुका। लेकिन ईसा-मसीह ठीक थे, उन्होंने कोई कष्ट नहीं सहा, बल्कि उसने सभी के दुखों को दूर किया। वह पीड़ित नहीं थे, मैं बिल्कुल भी पीड़ित नहीं हूं। न ही अब आपको कोई नुकसान होने वाला है। ईश्वर के नाम पर अब तुम्हें कष्ट नहीं होने वाला है।

अब देखते हैं। जहाँ तक और जब तक आप इसके आदी होते हैं तब तक मैं आपकी मदद नहीं कर सकती : आप पीड़ित होना चाहते हैं तो इसे चलने दें ! लेकिन अगर आप आनंद चाहते हैं तो यह आपके पास होगा और कोई भी इसे आपसे दूर नहीं कर सकता है। कोशिश करने वालों को नुकसान होगा। आपके खिलाफ जाने वालों को नुकसान होगा।

यह कृष्ण की शैली है, या हम मोहम्मद साहब की कह सकते हैं, क्योंकि आज उनका जन्मदिन है। इसलिए उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए, आप देखिए। ईसा-मसीह के बाद यह एक ऐसा उपद्रव था, जिसमें उन्हें यह कहना पड़ा कि तुम को पीड़ित नहीं होना है। यहां तक ​​कि उनके पोते, जो आप जानते हैं, महावीर और बुद्ध से पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं, वे यह सिखाने आये कि, अहिंसा की जो बकवास चल रही है: इसे रोकने के लिए, जानो कि एक अहिंसा ईश्वर की है जो हिंसा है; जो सिर्फ वध करना है! उन्हें थोड़ी वध की जरूरत है, अच्छी तरह से! और कभी कभी एक बड़ा संहार भी! वे करेंगे।

तो यह विचार कि हमें सैन्य बल नहीं होना चाहिए – क्यों नहीं? हम सबसे बड़े सैन्य बल हैं! यहाँ आप गायेंगे  “आगे बढ़ो ईसाई सैनिकों!” अब सैनिक कैसे पीड़ित हो सकते हैं? आप सिपाही हैं, आप सर्वशक्तिमान की शक्तियों से संपन्न हैं, और आपकी हिम्मत कैसे हुई पीड़ित होने की! यह एक गलत विचार है।

आपको किसी का भी निशाना नहीं बनना है। ठीक है, एक सज्जन की तरह, एक हाथी की तरह जब वह चलता है और कुत्ते भौंक रहे हैं, तो वह परवाह नहीं करता है – लेकिन अपनी महानता में ना की, दुख में। वह बस ऐसे ही चलता है और चलता जाता है। उसके जैसा! आप इन कहा-सुनी और सभी निरर्थक चीजों के बारे में परवाह नहीं करना हैं। आपको अपने अहंकार पर चढ़ कर नीचे नहीं गिरना है। लेकिन पीड़ित नहीं बनना ! किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं उठाना। यह मोहम्मद साहब का संदेश है।

लेकिन मुसलमान? हे भगवान! उनके दुश्मन मुसलमान बन गए, मैं आपको इतना बता सकती हूँ कि,किस तरह से वे हैं। जिस तरह से वे उनके साथ व्यवहार कर रहे हैं, आप देख सकते हैं कि वे उसके दुश्मन थे।

सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह कही है कि वे सभी पैगम्बर हैं। वे अलग-अलग समय पर आए हैं। उन्होंने कहा, “पीना मत”, क्योंकि उन्होंने देखा कि कि ईसा-मसीह शराब पीने की प्रथा पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं डाल पाए है, इसलिए उन लोगों ने उसे लेना शुरू कर दिया हैं! लोग हर जगह एक खामी एक रास्ता ढूंढ लेते हैं। आप देखिए, अब मैं बहुत सारी बातें कह रही हूं, लेकिन हो सकता है कि मैं एक-दो बाते इधर-उधर छोड़ दूं। आप देखिये, मैं उन सभी बिंदुओं को कवर करने की कोशिश कर रही हूं,  इसलिए मैं बात करती हूं, बात करती हूं, बात करती हूं, बात करती हूं – कुछ भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए! क्योंकि आप उस बात को पकड़ लेंगे, कोई सी भी, और उस पर पहुंच जाएंगे।

वह नीचे आये और उन्होंने कहा, “शराब मत पियो !” मुसलमान सबसे ज्यादा शराब पी रहे हैं। ईसा-मसीह ने कहा, “मृत आत्माओं के पास मत जाओ।” तो आपके चर्च में  कब्रिस्तान होंगे। केवल चर्च में आपके पास कब्रिस्तान होंगे! बस इसका अद्भुत हिस्सा देखें! उन्होंने कहा, “मृत के पास मत जाओ। आपका मृतकों से कोई काम  नहीं है। ” यही कारण है कि सभी ईसाई इस के साथ व्यस्त हैं …

(रिकॉर्डिंग में विराम)

ईश्वर है, और हम यह भी जानते हैं कि वह हमारे भीतर, हमारे हृदय में आत्मा के रूप में, आत्मा के रूप में प्रतिबिंबित होता है।

अब, जब हम अपने भीतर काम कर रहे तीन चैनलों के बारे में जानते हैं, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की तीन शक्तियाँ, जो अवचेतन, अग्रचेतन और चेतन मन का निर्माण करती हैं, हमारी चेतना में काम कर रही हैं। इसका मतलब है कि हम उनके प्रति सचेत हैं।

हम अपने बाएं और दाएं के प्रति सचेत हैं, वह है इड़ा और पिंगला, अनुकम्पी सहानुभूति तंत्रिका तंत्र sympathetic nervous system। हम परानुकम्पी parasympathetic के प्रति सचेत नहीं हैं। इसका मतलब है कि हम अपने दिल के धडकन की दर बढ़ा सकते हैं, हम अपनी सांस लेने की दर बढ़ा सकते हैं, लेकिन हम इसे कम नहीं कर सकते। कमी, या जिसे आप दर को घटाना कहते हैं, वह परानुकम्पी द्वारा किया जाता है। इसलिए परानुकम्पी सक्रिय है, लेकिन हम इसके प्रति सचेत नहीं हैं: इस अर्थ में कि हमारा इस पर कोई नियंत्रण नहीं है।

आत्मा, जो की, हमारे अंदर परिलक्षित ईश्वर है, हृदय में रहता है।

हमारे हृदय में आत्मा की अभिव्यक्ति परानुकम्पी को नियंत्रित करती है। लेकिन यह आत्मा हमारे हृदय में सर्वशक्तिमान ईश्वर का प्रतिबिंब है, जैसे कि एक दर्पण में। और दिव्य प्रेम, जो ईश्वर का प्रकाश है, आत्मा के प्रतिबिंब के माध्यम से हमें अचेतन मन के रूप में परिलक्षित होता है।

इसलिए हमारे भीतर एक ऐसा क्षेत्र है जिसके बारे में हम सचेत नहीं हैं। इसलिए इसे अचेतन कहा जाता है। वह क्षेत्र हमारे चेतन मन से इतना दूर है कि हम इसे नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। हम इसके प्रति सचेत नहीं हैं, लेकिन यह परानुकम्पी   parasympathetic गतिविधि के माध्यम से कार्य करता है। यह कैसे कार्य करता है, मैं आपको एक उपमा दूंगी: मान लीजिए कि एक बिजलीघर (एक पावर प्लांट) कहीं है, और यह यहां विधुत प्रकाश के माध्यम से प्रकट कर रहा है। आप बिजलीघर, या कारखाना, या जहाँ भी बिजली बनती है, उसे नहीं देख पा रहे हैं, लेकिन जो कुछ आप देख रहे हैं वह यहाँ उसकी अभिव्यक्ति है, और आप प्रकाश को देखते हैं। लेकिन मान लें कि, आपको न प्रकाश दिखता है, न दीपक, न ही कारखाना, लेकिन आप इससे प्रभावित होते हैं: यही मनुष्य की स्थिति है।

एक सामान्य मनुष्य जो आत्मसाक्षात्कारी आत्मा नहीं है, उस कारखाने के बारे में नहीं जानता है, जो कि ईश्वर है, या उसे जो प्रकाश उसे अपने दिल में मिला है जहाँ से प्रकाश मिला है, वह उस दीपक के बारे में नहीं जानता है , और दीपक जो प्रकाश उत्सर्जित कर रहा है,उसका भी पता नहीं है। लेकिन यह कार्यरत है।

तो अचेतन मन और कुछ नहीं बल्कि ईश्वरीय प्रेम के प्रकाश के माध्यम से भगवान की इच्छा का प्रक्षेपण है।

मैंने बार-बार यह उपमा दी है, जो बहुत अच्छी और उपयुक्त है: कि, ये दो शक्तियाँ जो हमारे भीतर हैं, एक बायीं बाजु, दूसरी दायीं ओर, मौजूद हैं और हम उनके प्रति सचेत हैं और हम उनका उपयोग करते हैं । उनमें से, दायी वाली को हम पूर्ण जागरूकता में उपयोग करते हैं। बाईं बाजू वाली को, हम जानते हैं कि अवचेतन मन के रूप में उपयोग किया जाता है, और कभी-कभी, यदि आप ड्रग्स लेते हैं या यदि आप ऐसा कुछ करते हैं, तो आप अपने अवचेतन में भी जाते हैं। तो आप अवचेतन क्षेत्र से भी अवगत हो सकते हैं। तो आप पहले से ही, दाहिने हाथ की ओर से अवगत हैं, और आप अवचेतन से कभी-कभी अवगत होते हैं, जब आप इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं।

तो ये दो शक्तियां जो हमारे भीतर हैं, वे हर समय एक तरंग में कम्पित होती रहती हैं, और जिन बिंदुओं पर वे मिलती हैं, वे धड़कन पैदा करती हैं, या आप केंद्र [चक्र] कह सकते हैं। एक केंद्र [चक्र] बनाया जाता है, वहाँ एक देवता को रखा जाता है, लेकिन हमारे देखने, या महसूस करने, या देवताओं के प्रति सचेत होने के लिए कोई प्रकाश नहीं है; देवता गहरी नींद में सो रहे हैं!

जब कुंडलिनी चढ़ जाती है … अब कुंडलिनी अवचेतन है। आपको आश्चर्य होगा कि कुंडलिनी एक महाकाली शक्ति है।

वह सबसे शुद्ध है, शुद्धतम रूप में, क्योंकि उसका उपयोग नहीं किया गया है। हम कह सकते हैं, इसका हिस्सा हम में, हमारे अवचेतन में उपयोग किया जाता है। एक प्रकार से,, हमने अलग से कुछ पानी उपयोग के लिए रखा है, जिसे हमने अब तक इस्तेमाल नहीं किया है। इसलिए सबसे पहले हम अवचेतन पानी और अग्रचेतन पानी का उपयोग करते हैं और हम इसे गंदा करते हैं, हमने इसे समाप्त कर दिया। तब यह संग्रहित शक्ति बढ़ती है और अंतिम सफाई करती है। लेकिन जब वह उठती है तो वह एक तीसरा प्रवाह पैदा करती है। फिर भी जब वह तीसरी बार चढ़ रही होती है, तब प्रकाश नहीं होता है। लेकिन जब यह सहस्रार तक पहुंचती है और इसे छेदती है तो यह सार्वभौमिक चेतना के साथ एकाकार हो जाता है। क्योंकि ईश्वर क्या है? वह जो सार्वभौमिक चेतना को नियंत्रित करता है। वह सार्वभौमिक चेतना के नियंत्रक हैं। वह प्रकाश का उत्सर्जन करता है। और जब यह कुंडलिनी ऊपर उठती है तो उस पर ज्वाला आ जाती है। तो अब सभी देवता जागृत हो जाते हैं।

अब, आप कह सकते हैं कि,माताजी, आप कह रहे हैं “यह दिल में है, । आप कह रहे हैं कि यह यहाँ है, “यह एक भ्रम है, लोग सोचते हैं। लेकिन वास्तव में यह सर्वव्यापी है। समझो कि, भगवान एक नाभिक है, ऐसा आप कह सकते हैं, या एक कारखाना, जिसमें सब तरफ प्रकाश है और हृदय में परिलक्षित होता है। इसलिए जब आपकी कुंडलिनी, एक विशेष, व्यक्तिगत कुंडलिनी उसे छूती है, तो यह प्रकाश होता है, तब हृदय में आत्मा प्रज्वलित होती है; या इसका उत्सर्जन होता है, यह प्रकट होता है, यह अभिव्यक्त करता है। और इसकी अभिव्यक्ति ये चैतन्य वायब्रेशन हैं।

तो, इसके माध्यम से, आप ईश्वर की इच्छा को जानते हैं। इसके माध्यम से आपका ईश्वर से संवाद होता है और आप उसे समझते हैं कि वह क्या चाहता है। और जो वह चाहता है की आप क्या जानो ?

भगवान के तीन गुण हैं जो आप इसके माध्यम से महसूस कर सकते हैं। एक: जो सत्य है। आप कोई भी प्रश्न पूछते हैं: यदि आप कुछ पूछ या मांग रहे हैं, और यदि यह “हाँ” में है, तो आपको बहुत अधिक वायब्रेशन मिलेंगे। यदि यह “नहीं” में है, तो वायब्रेशन कम हो जाएगा। इस प्रकार आप सत्यापित कर सकते हैं कि क्या सही है, क्या गलत है। सत्य क्या है, सत्य क्या नहीं है, अब आप जान सकते हैं। किसी को आपको बताने की ज़रूरत नहीं है, आपको इसे प्रमाणित करने के लिए किसी भी पादरी या किसी की ज़रूरत नहीं है। यह वहाँ है। अपने स्पंदनों के माध्यम से आप इसे महसूस कर सकते हैं कि: यह सच्चाई है या नहीं? क्या यह सही जगह है जहाँ आप आये हैं अथवा आप गलत व्यक्ति के पास आए हैं।

फिर इनमें से विभिन्न संयोजन और क्रमपरिवर्तन भी, यह सच है, लेकिन फिर भी थोड़ा सा बिंदु है जो आप में गलत है। उदाहरण के लिए, यदि आप कहते हैं कि, “ईसा-मसीह व्यक्ति में पुनर्जीवित हो गया था?” “हाँ, यह सच है,” और आपको अधिक वायब्रेशन मिलेंगे। लेकिन अगर अब आप देखिये , अगर आप कहते हैं, “क्या यह माताजी, मसीह की माँ है?” यदि आप इसे स्वीकार नहीं करते हैं, तो आपको सहस्रार पर वायब्रेशन नहीं मिलेगा। आप खुद ही देख लीजिए।

(रेजिस केमिली के कैसेट से 2)

… और वह वास्तव में उस क्षेत्र में सहज योग के लिए काम करने आया था। महाराष्ट्र एक कारण से एक बहुत अच्छा क्षेत्र है: यह भारत का ऐसा एक हिस्सा है, जहां लंबे समय से, आदि गुरु के इन रास्तों पर लोगों का एक समूह काम कर रहा है। उन्हें अवधूत कहा जाता था। और उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से शुरूआत की  – एक आदि गुरु मच्छिंद्रनाथ के रूप में पैदा हुए थे – और उन्होंने गांवों में बहुत कम लोगों पर काम करना शुरू कर दिया, या आप पहाड़ियों में कह सकते हैं और हम उन्हें कह सकते हैं कि वे तपस्वियों की तरह थे, बस सत्य का पता लगाने के लिए समर्पित | और ये लोग, उनमें से बहुत कम थे, उन्होंने इस पर काम करना शुरू कर दिया। जैसे कि ज़ेन प्रणाली के कश्यप। और वे विभिन्न देशों में चले गए – यहां तक ​​कि मच्छिंद्रनाथ, उनके शिष्य गोरखनाथ भी थे – वे सभी विभिन्न देशों में गए ताकि यह पता लगाया जा सके कि समस्या क्या है और इसे कैसे कार्यान्वित किया जाना है।

तो एक शिष्य परंपरा भी लायी गई,  इन शिष्यों में से उनमें से दो अवतार बन गए हैं। उनमें से एक जैसा कि आप जानते हैं कि बुद्ध हैं और दूसरा महावीर है: वे अवतार बन गए हैं।

तो आपके लिए सब कुछ करने की कोशिश की गई है और काम किया है। आपको इसके बारे में परेशान नहीं होना पड़ेगा। बात केवल इतनी है कि सहज होना यानि कि, बीच में जगह छोड़ना है। कोशिश करो। वह समर्पण है: खाली जगह छोड़ना। बस जगह छोड़ दो! और जो कुछ भी आप चाहते हैं, उसे कह सकते हैं: आप कह सकते हैं: यदि आप ‘नहीं’ कहते हैं, तो नहीं। यदि आप ‘हां’ कहते हैं, तो हां उदाहरण के लिए आप एक आश्रम रखना चाहते हैं, ठीक है आपके पास यह हो सकता है। लेकिन अगर तुम जाओ और कहो, “हम ‘ कैसे ‘ रख सकते हैं? यह बहुत मुश्किल है।” वह कहेंगे, “ठीक है, आगे बढ़ो!” “हम इसे ‘ कैसे ‘ करेंगे ?” फिर कुछ भी कार्यान्वित नहीं होगा। आप बस कहें , “हाँ, हम यह करने जा रहे हैं!” “ठीक है, इसे कार्यान्वित करो!” ये सही है। यह कार्यान्वित इस तरह होता है

मेरी अपेक्षा आपके लिए यह बहुत आसान है, क्योंकि, अगर आप मुझसे पूछें तो, मैं वास्तव में कुछ भी नहीं चाहती,। मुझे कोई आश्रम या कुछ भी नहीं चाहिए। मैं जहां भी हूं, ठीक हूं। लेकिन आपको आश्रम की आवश्यकता है इसलिए आपको इसके लिए इच्छा करनी होगी।

आपको इच्छा करनी होगी। बाएं हाथ की ओर आपका दिल है: इच्छा के लिए मांगे और इसे एक बंधन डाल दें, यह काम करेगा। लेकिन संकोच न करें: “ऐसा कैसे हो सकता है?” आप बारिश चाहते हैं? ठीक है, कहें , “बारिश आओ!” इसे पाओ ! आपको सूरज चाहिए? आप सूर्य को बाहर निकल आने के लिए कह सकते हैं। आपको गर्मी चाहिए? आपको गर्मी प्राप्त हो सकती है। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि अब आप परमेश्वर के राज्य में स्थापित हैं; उसके बाद ही यह काम करेगा! ऐसे हिचकिचाने वाले लोग!

यह एक मज़ेदार चीज़ है: जैसे कि कार में बैठा ड्राइवर, आप कार को कैसे दोष दे सकते हैं? आप गाड़ी चलाना नहीं जानते कि कैसे ?, आपने अभी तक इसमें महारत हासिल नहीं की है, आप बहुत घबराए हुए हैं, आप आश्वस्त नहीं हैं। इसे काम करने दें।

अब आप कैसे माइकल हैं? क्या तुम पहले से ठीक हो? हम्म, यह काम कर रहा है।

क्या हमें ध्यान में जाना चाहिए? हाँ? ठीक है।

(रिकॉर्डिंग का अंत)