Ego, The West, Love & Money

Caxton Hall, London (England)

1978-07-17 East, West, Love & Money London NITL HD, 60'
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परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी

‘अहंकार,पश्चिमी देश, प्रेम और धन’

कैक्स्टन हॉल,

लंदन, इंग्लैंड

17 जुलाई, 1978

श्री माताजी: आप कैसे हैं? बेहतर?

साधक: ज्यादा बुरा नहीं!

श्री माताजी: ज्यादा बुरा नहीं! सब लोग धीरे धीरे बेहतर हो रहे हैं, है ना? डोमिनिक तुम कैसे हो?

डोमिनिक: अच्छा हूं!

श्री माताजी: तुम हमेशा ही अच्छे होते हो! इस उत्तर पर गौर करें ‘अच्छा हूं ‘। ये जब से पैदा हुए तब से अच्छे हैं, परंतु सारी दुनिया भयानक है। है ना? (हंसते हुए)

एक आत्म साक्षात्कारी के लिए ये ऐसा है। वो बहुत आश्चर्यचकित होता है, बहुत ज्यादा सदमा ग्रस्त भी जिस तरह से दुनिया के तौर तरीके हैं।

कितने लोग आज पहली बार आए हैं? कृपया अपने हाथ ऊपर उठाइए। हां! और कौन? तुम? आप तीन चार लोग? मैं सोचती हूं अगर वो अंदर आ जाएं। आप भी पहली बार आए हैं?

साधक: नहीं!

श्री माताजी: नहीं? आप को प्राप्त हो गया है! आप को प्राप्त हो गया है। आप का क्या? आप पहली बार आईं हैं?

महिला साधक:  मैं पिछली बार आई थी।

श्री माताजी: पिछली बार? क्या हुआ था? क्या आप को अच्छा अनुभव हुआ था? बढ़िया! आप को कैसा लगा? बढ़िया! और आप भी वहां थीं?

महिला साधक: नहीं!

श्री माताजी: तुम भी वहां थे। नहीं? पहली बार? अच्छा! हम ऐसा कर सकते हैं, जो लोग आज पहली बार आए हैं, वे इस तरफ बैठ जाएं, जिस से आप को देखना बहुत आसान हो। और मैं उनकी कुंडलिनी देखना चाहूंगी। अगर आप उस तरह बैठें, ये कार्यान्वित होना चाहिए। या फिर सामने, बेहतर रहेगा, आगे की पंक्ति में बेहतर रहेगा, क्या हम? मेरे ख्याल से हां, वो बेहतर रहेगा, जिस से कि आप उन्हे पीछे से सहारा दे सकें, जो पहले से पार हैं (श्री माताजी हंस पड़ीं) गेविन आप यहां मेरे बगल में बैठिए! यह आप का स्थान हैं! ठीक है? बढ़िया!

कृपया आगे आ जाइए! कृपया आप सभी! आप पिछली बार यहां आए थे? क्या आप को चैतन्य अनुभव हुआ? क्या आप को ठंडी हवा महसूस हुई?

साधक:नहीं!

श्री माताजी: ठीक है! आप क्या करते हैं? हर साधु, हर चीज सत्य नहीं है। नकली भी होते हैं। लेकिन कुछ यथार्थ भी होना चाहिए। हर नकल किसी संपूर्ण से आती है आप समझे? किसी को संपूर्ण होना चाहिए वरना आप को उसकी नकल कहां से मिलेगी? कोई सत्य होना चाहिए वरना आप को झूठ नहीं मिल सकता। तो मैंने कहा यह कुछ ज्यादा ही है। इसका अर्थ है कि जब आप चीजों को नकारते जाते हैं, आप सत्य को भी नकार देते हैं। फिर खोजना किस लिए? और यही उसके साथ हुआ है।

परंतु फिर भी आप जानते हैं, कि आप इन बातों को मनवा नहीं सकते क्योंकि मस्तिष्क उसके साथ बहुत तेजी से कार्य करने लगता है,  कृष्णमूर्ति के अंदाज में। मैंने कृष्णमूर्ति के शिष्यों को देखा है (हंसते हुए) हर प्रकार के बुद्धिशाली आवेग प्रकट करते हुए, वस्ताव में बुद्धिमान लोग, बिचारे! आप जानते हैं क्या हुआ, उनमें से एक पोता था, इस लाहिडी बाबा का पोता था (श्यामा लाहिडी, क्रिया योग पंथ का संस्थापक)। क्या आपने लाहिडी बाबा के बारे में सुना है, जो योगानंद का गुरु था? यह योगानंद पार नहीं था, ना ही उसके गुरु लाहिरी बाबा। अब अगर मैं ये कहती हूं तो लोग कहते हैं, ‘मां, आप ये क्या कह रही हैं? पर यह सच्चाई है और मुझे आपको सत्य बताना है, है ना? मैं आपको असत्य कैसे बता सकती हूं? उन्हे कभी भी आत्म साक्षात्कार प्राप्त नहीं हुआ।

तो अब ये मेरे पास आया उनका पोता। उसने कहा, ‘मां मुझे नहीं लगता कि आप मुझे वास्तव में आत्म साक्षात्कार दे सकती हैं। मैं कभी प्राप्त नहीं कर सकता।’ मैंने कहा, ‘तुम्हारे साथ क्या हुआ है? परंतु वह बहुत बड़ा विश्लेषक है और उसकी दृष्टि स्वयं की ओर है। उसने पहले कहा, ‘मैं लाहिड़ी बाबा का पोता था। मुझे क्रिया योग करना पड़ा क्योंकि और सब चीजों के साथ ये भी मैंने विरासत में पाया। जो भी धन वो कमाते मुझे मिलता!’ तो उसने बताया, ‘क्योंकि मैं लाहिड़ी बाबा का पोता था मुझे क्रिया योग अपनाना पड़ा। क्रिया योग में आप अपनी जीभ काट देते हैं।’  हेलो रौनी, तुम कैसे हो?

रौनी: ठीक हूं!

श्री माताजी: अच्छा! बढ़िया! मुझे खुशी हुई कि तुम ने ये कहा। बैठ जाओ। बैठ जाओ। आ जाओ। अपने जूते निकाल दो। आराम से बैठो

और ये साहब जो मेरे पास आए थे बोले, ‘पहले मैंने क्रिया योग किया।’ अब क्रिया योग में कल्पना कीजिए, क्या होता है। आप को अपनी जीभ यहां नीचे से काटनी होती है। कल्पना कीजिए। उसे पीछे की तरफ ढकेलिए उसे यहां छूने के लिए, देखिए और उस स्तिथि में उसका अभ्यास करते हुए लगभग एक घंटा बैठना पड़ता है। तो इन लोगों की जीभ हमेशा बाहर की तरफ आती रहती है। फिर आप को दूसरी चीज करनी होती है प्रातक, जिस में अपना चित्त यहां स्तिथ करना होता है, और किसी चीज की तरफ देखते रहना है और हर प्रकार की चीज़ें, जिस से उनकी आखें हमेशा ऐसी रहती हैं। बात करते हुए अचानक आप पाएंगे कि वो भेंगे हो गए हैं। अपने को बर्बाद करने की हर विधि, हर विधि है ये क्रिया योग। 

भारत में एक डॉक्टर थे। अब उनका देहांत हो गया। मेरा मतलब हम ने बार बार प्रयत्न किया, पर वो बोल नहीं सके क्योंकि इन लोगों ने उनकी जीभ काट दी थी। वो सुन नहीं सकते थे क्योंकि इन्होंने उनके कानों में कुछ कर दिया था। वो मुझे बराबर नहीं देख सकते थे क्योंकि उनकी आंखें हमेशा इस तरफ, उस तरफ जाती थीं। मैने कहा, ‘इस प्रकार का महान व्यक्तित्व, अब मैं आप का क्या करूं? (हंसने के स्वर) आप उनकी आंखें ठीक नहीं कर सकते। आप उनकी नाक ठीक नहीं कर सकते। आप उनकी जीभ ठीक नहीं कर सकते और सब कुछ! उसने अपना खुद का संपूर्ण, पूरा विनाश किया है।’

‘अब मैं क्या कर सकती हूं? तो ये किस ने किया है?’ उसने कहा, ‘मैं लॉस एंजिलिस गया। मैंने इतना रुपया खर्च किया, वहां गया और रहा, और ये चीज करवाई।’ मैंने कहा, ‘लेकिन क्यों? ये तुमने क्यों किया? आखिरकार तुम्हे ये सोचना चाहिए था, हमारे देश में कोई भी, हमारे यहां बहुत सारे हुए हैं।’ वो एक भारतीय था। मैं समझ सकती हूं आप लोग ऐसा करें क्योंकि आप नहीं जानते, पर वो जानता है। ‘इस देश में किस संत की कटी जीभ थी और उसको पीछे की ओर रख दिया? कोई संत है आप बताइए!’ उसने कहा, ‘पर उन्होंने जरूर ऐसा किया होगा।’ मैंने कहा, ‘ ‘अगर उन्होंने किया होता तो कहीं लिखा जरूर होता।’ आप को कैसे पता? उस ने कहा, ‘मां ये बहुत कठिन चीज है।’ मैने कहा, ‘कितना भी कठिन रहा हो पर वो जीभ काटना कभी नहीं होता।’ ये श्रीमान क्रिया योग थे। ठीक है? 

तो क्रिया योगी पहले मेरे पास आते हैं फिर मेरे साथ वाद विवाद करते हैं कि, ‘ये इतना सरल कैसे हो सकता है?’ पर मैने कहा, ‘अगर ये सरल है तो यह सरल है।’ अब सोचिए मेरा घर से कैक्सटन हॉल मुश्किल से पांच मिनट पैदल रास्ता है। अब अगर कोई मुझ से बहस करे कि, ये पांच मिनट कैसे हो सकता है? परंतु ये पांच मिनट ही है। मैं इसमें क्या कर सकती हूं अगर ऐसा है? (हंसने के स्वर) क्या आप इसमें कुछ कर सकते है? ये सहज हैं। ये सब से अधिक आसान चीज है, सरलतम चीज है। लेकिन लोग बहस करते रहते हैं। ये इतना अधिक आसान कैसे हो सकता है? मुश्किल होना चाहिए! मेरा मतलब है इस कुंडलिनी जागरण में भी, दूसरा भाग जहां अभी भी श्री कृष्णामूर्ति नहीं आते, ये दूसरा भाग है ये कृष्णमूर्ति अंदाज। परंतु, हम कहेंगे कि पहला भाग है कुंडलिनी का जागरण।

मैंने आप को उस आदमी के बारे में बताया था जो कोल्हापुर में मेरे पास आया, और वो बिल्कुल सामने बैठा था, और उसने अपने पैर इस तरह रखे। भारतीय जानते हैं कि आप अपने पैर किसी पावन व्यक्ति की तरफ नहीं रख सकते। तो उन्होंने कहा, ‘तुम क्या कर रहे हो? आप को इस तरह नहीं करना चाहिए।’ उसने कहा, ‘कृपया मुझे ऐसे करने दें।’ उन्होंने कहा, क्यों? उसने कहा, ‘अगर मैं इस तरह बैठूं तो मैं मेंढक की तरह कूदने लगता हूं।’ उन्होंने कहा, क्यों? उसने कहा, ‘क्योंकि मेरी कुंडलिनी जागृत हो चुकी है। लोगों ने कहा, ‘तुम्हारी कुंडलिनी जागृत हो चुकी है इसलिए तुम्हें मेंढक की तरह कूदना पड़ता है?’ ‘हां मेरे गुरु ने मुझे बताया था।’ तो उन्होंने उसे मेरे पास भेज दिया और मैंने कहा, ‘तुम अपनी उत्क्रांति में मेंडक कैसे बन सकते हो? तुम को कुछ ऊंचा होना होगा, तुम को मेंढक की तरह कूदने के बजाय बहुत ऊंचे स्तर का व्यवहार करना होगा।’ उस ने कहा, ‘नहीं! नहीं! ये लिखा हुआ है। मेरे गुरु ने पुस्तक लिखी है और मैं आप को दिखाऊंगा।’

तो वो अपने गुरु के गुरु की पुस्तक लाता है। कल्पना कीजिए! उस व्यक्ति का बहुत नाम है। मुझे पता नहीं था कि वो इतना भयानक है। और पुस्तक में लिखा था कि, कुछ लोग कुंडलिनी जागरण के साथ, मेंडक की तरह कूदने लगते हैं। मैने कहा, ‘अब मैं क्या करूं? अगर आप नहीं कूद पाते, मै इस बारे में क्या कर सकती हूं।’ आप मेंडक या किसी और की तरह नहीं कूदते। ये सब बकवास है!

मुझे लगता है, एक प्रकार के विचारों में सक्रियता लाने वाले तत्व आ कर जम गए हैं या कुछ उसके जैसा, और स्वाभाविक क्रिया उसके जैसे चलती जाती है, या किसी प्रकार की आत्मा या अन्य कुछ, क्योंकि मेरे खयाल से ये सब बेतुका है। ये इस तरह कभी नहीं होता। परंतु एक पुस्तक लिखी गई है और उनके हजारों शिष्य हैं! मैंने कहा, अब क्या किया जाए? और इस महान भारत देश में जहां आप ऐसे लोगों को एकत्रित करते हैं, जो जानते हैं कि धर्म क्या है और परमात्मा क्या है। मुझे उन लोगों पर आश्चर्य होता है। तो इस प्रकार की बातें होती हैं, एक के बाद एक। 

अब दूसरा भाग बिचारे हमारे, अब देखिए कि वो एक महान, बाला एक महान साधक है, वह वास्तव में एक महान साधक है। तो वो खोज के दूसरे पक्ष की ओर गया। फिर वो सारे गुरुओं से, सारी बकवास से, जो पैसा उन्होंने उस से निकलवाया, जो धन उसे उन्हें देना पड़ा और उस सब से वो तंग आ गया। तो उसने कहा,’ये नहीं है! ये नहीं है! ये नहीं है! ये नहीं!’ और वो एक अन्य व्यक्ति के पास गया जो कृष्णामूर्ति था, जिसकी आवाज ऐसी है, और ऐसे बात करता है (श्री माताजी उस की आवाज की नकल का के बता रही हैं) मैं उसके कार्यक्रम में भी गई। मैं देखना चाहती थी। असल में मैं सारे कार्यक्रमों में ही गई। बहुत गंभीर लोग आते थे वहां, जैसे कि ‘ओरेकल ऑफ डेल्फी ‘ बोलने जा रहा हो। और मैंने कहा, यह व्यक्ति तो पार भी नहीं है। यह इन लोगों को क्या बताएगा। लेकिन फिर भी मैं यह सोच रही थी कि, वो शायद कुछ समझदारी की बात कहेगा।

तो जो कुछ उसने कहा वह यह था, ‘आप अपने गुरु हैं और अन्य कोई नहीं है। आप अपने गुरु हैं, स्वयं को देखें! यही है जो आप को खोजना है।’ अब आप ये कैसे करेंगे? अब उसके सारे लोग ऐसे ही हैं। जब आप उनसे बातें करते हैं तो पाते हैं कि श्री कृष्णामूर्ति उन के अंदर आ गया है। 

तो इस आदमी ने मुझे बताया कि, ‘मां आप मेरा उपचार नहीं कर सकतीं।’ मैं कृष्णमूर्ति के पास गया और उस ने मुझे ये सिखाया। उस ने मुझे कहा कि किसी भी गुरु पर विश्वास मत करो। तो मैं किसी गुरु पर विश्वास नहीं करता। पर बाद में मुझे पता चला कि एक तरफ मैं लाहिड़ी बाबा हूं और दूसरी तरफ मैं कृष्णमूर्ति हूं। मैं लाहिड़ी बाबा की तरह भाषण दे सकता हूं और कृष्णमूर्ति की तरह भी। जो भी आप चाहें, आप वो टैप लगा सकती हैं और मैं शुरू कर सकता हूं, और मैं कृष्णमूर्ति से भी बेहतर बोल सकता हूं। आप मुझे सुनना चाहेंगी?’ फिर वो बैठ गया और उसने मेरी साड़ियां ले लीं। वो बोला,’ मैं खुद को ढक लेता हूं।’ और वास्तव में उसने उसकी बहुत अच्छी नकल की। वो बोला, ‘क्या अब मैं कृष्णमूर्ति जैसा लगता हूं?’ मैंने कहा, ‘सच में तुम तो उसी की तरह बोलते हो।’ और वो बोला, ‘मां मैंने ये प्राप्त नहीं किया है। क्या अब आप मेरी सहायता कर सकती हैं?’

मुझे आप को बताना है, मुझे अफसोस है कि अभी तक मैं उस के लिए कुछ नहीं कर पाई हूं। जब भी मैं भारत जाती हूं, वो मेरे पास आता है। पर अब उसे बहुत शर्म आती है, तो वो निजी तौर पर मेरे पास आता है। पर उसकी कुंडलिनी उठती है गिर जाती है, थोड़ा मुश्किल है, थोड़ा मुश्किल है। क्योंकि उसकी खोज बहुत अत्यधिक थी, और वो बहुत अधिक खाइयों में गिर गया है। परंतु एक दिन वो ऊपर आएगी, मुझे यकीन है यह कार्यान्वित होगा, क्योंकि वो अच्छा आदमी है और उसने बेवजह कष्ट झेला है अपनी खोज के कारण। और ऐसे सारे लोग निस्संदेह आशिर्वादित् होंगे, क्योंकि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। वो सिर्फ गए ऐसा गुरुओं पे क्योंकि वो खोज रहे थे। और खोजने में, अगर आप किसी के पास जाते हैं, और अगर आप को कोई क्षति होती है, तो आप आश्वस्त रहें कि आप की देखभाल होगी, आप की पूर्णत: देखभाल होगी। और ये सहज योगियों, सहज योग और मेरा उत्तरदायित्व है, ये देखना कि सभी साधक जो सच्चे हैं, अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त करें जो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। उन सब को प्राप्त होना चाहिए। ये उनका अपना है, यह उनका बहुत अपना है और उन्हें प्राप्त होना चाहिए। और ये कार्यान्वित होता है।

पर जैसा मैंने कहा था कि बहुत सारी अड़चनें हैं, और हमारे जीने के है हर अंदाज से संबंधित हमारी बाधाएं है। ये आश्चर्यजनक है। जिस प्रकार हम जीते है, जिन हालात में हम जीते हैं, जिस माहौल में हम जीते हैं, वो हम संचय करते हैं। और जैसे कि हम यहां हैं अधिकतर पश्चिमी लोग, मुश्किल से कोई भारतीय, हमें अपनी समस्याओं का पश्चिमी लोगों की तरह ही सामना करना है। और पश्चिमी लोगों की समस्याएं बहुत जटिल होती हैं, उसी प्रकार जैसे मैं कहूंगी, प्रारंभ में उन्हें अपने देश के विकास के लिए अहंकार उन्मुख होने की तरफ जाना पड़ा। उदहारण के लिए कैक्सटन हॉल कुछ वर्ष पहले नहीं था। यहां कुछ भी नहीं था। ये स्थान (Londes) लौन्देज़ कहलाता था और लंदन लौन्देज़ था और लौन्देज़ का अर्थ है वो स्थान जो कि, ‘लोन’ माने कीचड़, यहां पर कुछ नहीं था सिर्फ कीचड़ थी। और कीचड़ का ऐसा समूह यहां था कि लोगों को नीचे तक खोदना पड़ता था गहरे नीचे घर बनाने के लिए। इसी लिए हमारे यहां इतने सारे तहखाने हैं।

शायद आप ये नहीं जानते होंगे पर इसी प्रकार लंदन का निर्माण हुआ था। ये सारे पुल और ये सारे भूमिगत इसी वजह से निर्मित हुए। ये छुपा हुआ आशीर्वाद, दुख के भेष में सुख है की हम को सर्वोत्तम ट्यूब्स और अन्य चीजें मिल सकीं क्योंकि यहां बहुत अधिक कीचड़ थी। और उस कीचड़ में से, उस कीचड़ से, आप जानते हैं, हम ने एक शहर का निर्माण किया। सिर्फ एक शहर का नहीं बल्कि एक राष्ट्र का। और स्वाभाविक रूप से लोगों को उस के लिए बहुत श्रम करना पड़ा और जीवन बहुत कठिन था और उन्हें सब निर्मित करना पड़ा।

तब धीरे धीरे जब विज्ञान ने खुद की मनुष्यों को विशेष सुविधा की शक्ति को प्रकट किया, पश्चिमी देशों का पूर्ण चित्त, पूर्ण चित्त विज्ञान पर गया और वो करने लगे कि वो पदार्थ पर स्वामित्त कैसे पा सकते हैं, वो कैसे ऊपर आ सकते हैं, वो कैसे कुछ बेहतर कर सकते हैं। फिर जब उन्होंने पदार्थ पर स्वामित्व प्राप्त पर लिया, उस के कारण वो फिर से खोजने लगे। ‘क्या हम जीवन को ज्यादा आसान, ज्यादा प्रसन्न और आनंदमय बनाएंगे?’ बेशक जिंदगी एक प्रकार से ज्यादा आसान हो गई, पर एक तरह से कठिन।

आसान इस तरह से हुई कि जिस प्रकार आप के पास कुकिंग रेंज हैं और आप के पास है वो, आप क्या कहते हैं वैक्यूम क्लीनर और सब कुछ अधिक आसान हो गया उन लोगों से जिन्हे सब कुछ अपने हाथों से करना पड़ता है और कई बार वो उतना अच्छा नहीं कर पाते, कुछ सफाई की प्रक्रियाएं शायद, जितना आप मशीन से कर सकते हैं, पर कला वाला हिस्सा वो ज्यादा अच्छा करते हैं शायद। किंतु कठिनाई तब आई जब हम ने बहुत अधिक अहंकार उन्मुख हो गए। हम अपने दाहिने सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम पर काम करने लगे, जिसे हम पिंगला नाड़ी का प्रदुर्भाव कहते हैं, अहंकार उन्मुख होना।

अब दाई तरफ पूर्णत: महासरस्वती की शक्तियों से प्रबंधित होता है, वो शक्ति हैं। ये संस्कृत का शब्द है, क्योंकि मैं इस में कुछ नहीं कर सकती। पर हम कह सकते हैं की ये कुछ करने की शक्ति है, क्रियाशक्तिय, कुछ करना है। स्वाभाविक रूप से जब किसी को करना होता है, आप हर समय भविष्य के बारे में सोचते हैं, ‘मैं ये करूंगा। मुझे ये संगठित करना ही है। ये मुझे ये ठीक करना ही है। ये मुझे ये करना ही है।’ इस संगठन के बावजूद हम पाते हैं के अंदर हम खुद अव्यवस्थित हैं।

तो इसके साथ क्या हुआ है, हम ने अपने धर्म को भी संगठित कर लिया है, जो कि मैं सोचती हूं सब से बड़ा प्रहार था जो आप पर हुआ, क्योंकि धर्म एक ऐसी चीज हैं जो खुद पर छोड़ देनी चाहिए। वो आप की अपनी चीज है, जो आप को खुद के लिए खोजनी है। आप धर्म को व्यवस्थित नहीं कर सकते क्योंकि यह परमात्मा की खुद की देन है। आप को उसको कार्यान्वित होने के लिए जगह देनी होगी। इस के विपरीत अगर आप उस मशीन जैसी चीज बना देते हैं, और अगर आप किसी पादरी से पूंछे, जिस ने कोई धर्मशास्त्रीय कालेज उत्तीर्ण किया हो, और स्नातकों से जो उसके प्रभारी हैं, आप कभी उस के (धर्म के) नजदीक नहीं जा सकते, क्योंकि वे लोग बिलकुल हमारे जैसे नहीं हैं। और हम उन पर विश्वास नहीं कर सकते। उन में कुछ भी विशेष नहीं है। इसलिए धर्म पूर्णत: कड़े बन जाते हैं। असल में आप ने अपनी सारी स्वतंत्रता खो दी जो आध्यात्मिक थी। आप को आश्चर्य होगा, आप के पास राजनीतिक स्वतंत्रता है, आप के पास आर्थिक स्वतंत्रता है, परंतु इस के कारण आप ने अपनी आध्यात्मिक स्वतंत्रता खो दी है।

मैं ये नहीं कहती की गिरजाघर होने में, या मंदिर होने में कोई खराबी है, परंतु जिस तरह के वो हमने बना रखें है, वो अवश्य गलत है। ये बहुत सघन बात है। आप वहां जाते हैं, आप वहां अपना नाम लिखते हैं, वो आप के सिर पर पानी डालते हैं, आप ईसाई बन जाते हैं। आप नहीं बन सकते! ईसाई बनना सबसे कठिन बात है। आप हिंदू हो सकते हैं, परंतु आप ईसाई नहीं हो सकते। ईसाई मानें वो व्यक्ति जिसको बपतिस्मा मिल चुका है, अर्थात जो आत्म साक्षात्करी हैं, जिनका ब्रह्मरंध खुला है, जिनके ब्रम्हरंद्र का ऊपरी हिस्सा स्वच्छ हो चुका है, जो पूर्णत: बपतिस्मा प्राप्त किए हुए है वही ईसाई है, ना की वो जो जो बीयर और स्कॉच के साथ मेल रखता है। ऐसा व्यक्ति आत्म साक्षात्कारी नहीं हो सकता। एक आत्म साक्षात्कारी वो होता है, जिसका सहस्त्रार खुला है, जो ईश्वर से एकरूप हो चुका है, जो सामूहिक चेतना से एकरूप हो चुका है। ये कुछ ऐसा है जो अंतर में घटित हो रहा है, व्यक्ति जिसका पुनर्जन्म हुआ हो, जो द्विज: हो, जैसा ईसा मसीह ने कहा है। 

तरीका ये नहीं है कि लोग कहते हैं, आइए, अब बपतिस्मा करवाने! दस महीने के करीब, जब आप कुछ भी नहीं समझते, आप उनके पास जाते हैं, और वो लोग अपने हाथ आप के सिर पर रख देते हैं। असल में ये बहुत खतरनाक है। मेरी बात मानिए! क्यों? क्योंकि बच्चों का ब्रह्मरंध या फॉन्टनेल बोन एरिया बहुत मुलायम होता है, और उस समय ये अनधिकृत लोग जो ईसा मसीह के विरोध में हैं, ये सब एंटी क्राइस्ट हैं क्योंकि इनको कोई अधिकार नहीं परमात्मा के बारे में उपदेश करने की, ये अपने हाथ वहां रखते हैं, आप की कुंडलिनी को खराब करने के लिए। सब से पहली बात, कुंडलिनी खराब हो जाती है।

भारत में कोई पादरी इसको छुएगा नहीं, वो नहीं करेगा। कोई पादरी यहां नहीं छुएगा। अगर आप उसे यहां छूने के लिए कहेंगे, वो कहेगा, ‘ नहीं, नहीं! मैं नहीं कर सकता।’ आप कोशिश करके देखिए, कोई भी। एक मौलवी भी यहां नहीं छुएगा। सिर्फ एक ईसाई में ही इतना आत्मविश्वास है, क्योंकि किसी की कुंडलिनी को छूना पाप है, तो कोई हिंदू यहां नहीं छुएगा। ज्यादा से ज्यादा वो यहां छुएंगे, पर वो इस हिस्से को नहीं छुएंगे। आप उनसे जा कर पता कर सकते हैं, सबसे बड़े राक्षसों से भी, जो मैं उन्हे कहती हूं, जो दानव, नकली गुरु बन कर आए हैं, वो भी यहां नहीं छुएंगे, क्योंकि इसका अर्थ है, आप उस बिंदु पर हाथ रख रहे हैं, जहां वो वास्तव में जल जायेगा। तो आप कल्पना कर सकते हैं है कि इस प्रकार के स्नातक, जो अंदर के बारे में कुछ नहीं जानते, अचानक आप के पादरी बन रहे हैं। आप में कैसे ऐसे किसी के लिए सम्मान हो सकता है जो आध्यात्मिकता के आस पास भी न हो। वो सिर्फ एक पादरी है। 

तो ऐसा महान धर्म जिस में सिर्फ बपतिस्मा प्राप्त लोगों की आवश्यकता है। कल्पना कीजिए, ऐसे धर्म को आक्रमण और निंदा का शिकार होने के लिए छोड़ दिया है उन लोगों को, जो नहीं जानते बपतिस्मा क्या है, जो नहीं जानते कुंडलिनी क्या है, जो नहीं जानते कि आत्म साक्षात्कार कैसे प्राप्त करना है, जो नहीं जानते कि स्व क्या है! वो किसी भी चीज का प्रदुर्भाव नहीं जानते। वहीं पर वो आप से पैसे लेते हैं, कुछ हीरे बनाते हैं, आप की देह पर पहनाते हैं और गम्भीरता से चलते हैं। कहने के लिए कि वो पादरी है! मुझे नहीं पता वो पादरी कैसे बन जाता है?

ये आप की समझ है जो आप को वहां ले जाएगी, ना की कोई प्रतिक्रियात्मक तरीके बल्कि वास्तविकता की समझ। और वास्तविकता की समझ ये है कि, अगर आप को ईसाई होना है, आप को एक आत्म साक्षात्कारी होना होगा, अन्यथा आप ईसाई नहीं हैं। तो सारे सहज योगी असली ईसाई हैं। भारतीय धर्म के अंदाज में इसे द्विज: कहते हैं, द्विज: माने ट्वाइस बोर्न, जिसका पुनर्जन्म हुआ हो, जब दूसरी बार वो जन्मा हो। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि चिड़िया भी द्विज: हैं। पहले वो अंडे के रूप में जन्म लेती हैं। हम भी अंडे के रूप में जन्म लेते हैं। हमारे अहंकार और मन हमें अंडा बना देते हैं। हम एक खोल की तरह हैं। उसे वहां होना ही चाहिए हमारी अहम भाव होने के लिए, सही और गलत के बीच चुनने की हमारी स्वतंत्रता के लिए। और जब हम परिपक्व हो जाते हैं, मां खोल को तोड़ सकती है और आप दूसरे व्यक्ति बन जाते हैं, व्यक्ति जिसका पुनर्जन्म हुआ हो। यही वास्तव में बपतिस्मा है। ये एक घटना है। आप किसी को इस बारे में मत आरोपण (ब्रेन वॉश) नहीं कर सकते। आप ये नहीं कह सकते कि तुम ईसाई हो, आप किसी को ब्रांड नहीं कर सकते। ये आप के अंदर घटित होना चाहिए और ये है जो ये है। और अगर आप वाकई सत्य को खोज रहे हैं तब आप को उसे मांगना चाहिए!

अब समस्या ये है, जब मैं इन चीजों के बारे में बात करती हूं, मुझे कुछ अभद्र पत्र भेजे गए हैं, भेजे, कुछ भेजे गए हैं। बेशक आप का है अधिकार हैं मुझ से अभद्र होने का। मेरा मतलब है, कि कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि ये अधिकारों का सवाल है। यहां लोगों को हर चीज के लिए अधिकार प्राप्त हैं। अगर वो उसके लिए भुगतान नहीं करते, तो भी वो अभद्र हो सकते हैं। इस देश या इस प्रकार के अन्य देशों में लोगों के लिए अभद्र होना कठिन नहीं है, क्योंकि हम सोचते हैं कि हम लोगों से अभद्र हो सकते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि वे एक शब्द भी नहीं जानते कि मैं किस बारे में बात कर रही हूं और वे नहीं जानते कि मैं क्या कर रही हूं। उन्होंने मेरा कार्य नहीं देखा है और कुंडलिनी का कार्य नहीं देखा है। उसको जाने बिना वो अभद्र हैं। किंतु, जो सवाल वो पूछते हैं! उनमें से एक ने मुझ से प्रश्न पूछा कि, ‘हम ने सुना है कि कुंडलिनी का जागरण प्राप्त करना बहुत कठिन है। ये इतना सहज कैसे हो सकता है? ये इतनी जल्दी कैसे हो सकता है?’ ऐसा है! आप अपनी आंखों से देख सकते हैं। ये सब के पास हैं। मैं आपको कुंडलिनी का उठना दिखा सकती हूं। आप यह खुद देख सकते हैं। इतनी चुनौती मैं आप को देती हूं। अगर आप मुझ पर विश्वास नहीं करते, तो जाने दीजिए।

अब ये पलायन है, ये एक ठेठ पलायन है अहंकार उन्मुख समाज का, ये पलायन है। ये कैसे संभव हो सकता है? ये संभव नहीं हैं। लेकिन मान लीजिए वो है, यद्यपि बहुत प्राचीन  ये बहुत प्राचीन अंदाज है। ये ऐसा कहना हुआ जैसे, ‘आप चांद पर कैसे जा सकते हैं?’ ‘पर आप तो वहां जा चुके हैं।’ ‘नहीं वो शायद एक फोटो है जो आप ने खींचा है!’ हर समय संदेह करना। पर मान लीजिए वो है। तो अगला प्रश्न है, क्यों? कैसे? शायद मैं कुछ हूं। शायद मुझ में अवश्य कुछ बात है, कुछ विशेष, इसलिए ये हो रहा है। आप अच्छे से पता करिए या आप मुझे सिर्फ इसलिए अस्वीकार कर देंगे क्योंकि आप सोचते हैं कि ये संभव नहीं? ये आप का अपना विचार है। आप अभी तक अंदर नहीं आए हैं। आप ने उसे नहीं देखा। आप ने उसका अनुभव नहीं किया। आप अस्वीकार कर रहे है, ये कैसे संभव हो सकता है? क्या ये सहीं नहीं है? (हंसने का स्वर) ये इसी प्रकार होता है। ये एक ठेठ अहंकार उन्मुख दिमाग है।

जब मैं लंदन आई थी, मेरे कुछ शिष्य यहां थे जो अभी भी यहां भारत में रह रहे थे, जिन्होंने मुझे बताया, ‘मां हम को पश्चिमी लोगों के लिए कार्य करना चाहिए। मैंने कहा, आगे बढ़ो! मुझे बहुत खुशी होगी क्योंकि मैं जानती हूं आप सब संत हैं, निसंदेह आप साधक हैं।’ परंतु इस अहंकार उन्मुखता ने आप को अलग तरह की सख्त बना दिया है, जिस को समझाना बहुत कठिन है। तो मैंने कहा, ‘आगे बढ़ो! इस में अवश्य आगे बढ़ो। मुझे बुरा नहीं लगेगा।’

तो पहली बार जब मेरा कार्यक्रम यहां हुआ, लगभग तीन सौ लोग थे, दूसरी बात जब कार्यक्रम हुआ तो लगभग दो सौ पचास लोग थे, फिर दो सौ लोग आए, फिर सौ लोग आए और अब पचास लोग आ रहे हैं। तो आप समझे हम और छोटे, और छोटे होते जा रहे हैं। दूसरे स्थान पर, जिस में मैं कभी नहीं गई, मान लोजिये वहां भारतीय समुदाय या एशियन समुदाय या अन्य हैं। मैंने कहा, ‘मुझे कुछ करना नहीं होगा। आरंभ में मैं सिर्फ परदेसी लोगों पर कार्य करूंगी।’ यहां बहुत कम भारतीय हैं। मेरा मतलब है कि मैं उन्हे परदेसी कह सकती हूं, भारत की तुलना में। तो आप को आश्चर्य होगा कि एक झटके में मुझे तीन सौ लोग मिल जाते हैं, भारतीय। उन्होने मुझे बुलाया था। कल मैं क्रोली गई थी वहां लगभग तीन सौ पचास लोग होंगे। उन में से 80% को आत्म साक्षात्कार प्राप्त हो गया, 80% को।

अब मेरे शिष्यों ने ये कहना बंद कर दिया है कि आप को सिर्फ यहां के पश्चिमी लोगों की ही देखभाल करें, क्योंकि आप भारतीयों पर भारत में हमेशा कार्य कर ही सकते हैं। उन्होंने ये कहना बंद कर दिया है। मुझे कुछ भी करने, आप के लिए कार्यान्वित करने में खुशी होगी पर श्रीमान ई. जी. ओ. (EGO) के बारे में आप क्या कर सकते हैं? ये पेट्रीशिया आप को बताएगी इस बारे में, वो जानती हैं। आप जानते है कि ये एक प्रबल, अति प्रचंड वस्तु है, जो है समय आप को विचार देती रहती है जो आप को खुद को वास्तविकता की और खुलने नहीं देते।

अखिकार, मैं आप से क्या मांग रही हूं? आप मुझे क्या दे रहे हैं? मैं आप को क्या समर्पित करने के लिए कह रही हूं? किसी ने मुझ से पूछा, ‘मां! आखिरकार हमें अपना अहंकार समर्पित करना पड़ता है।’ मैने कहा, नहीं नहीं! मैं ये नहीं कह रही। कुछ भी समर्पित मत करिए। परंतु अपने सुबुद्धि को जाग्रत कीजिए। क्या आप ये कर सकते हैं? यह बेहतर है!’ अगर मैने आप से कहा कि आप को अपना अहंकार समर्पित करना है तो मेरी शामत आ जाएगी! सब से पहले तो इतना ही कहना कि आप घमंडी हैं, अपने आप में एक भयावह बात है और फिर कहना कि अपना अहंकार समर्पित करें उस से भी बुरा है। परंतु आत्म साक्षात्कार के पश्चात आप इसकी प्रचंडता को देखने लगते हैं और आप कहने लगते हैं, ‘हे भगवान! ये मेरे दिमाग में घुसा था? आप आओ श्री ईगो, नीचे उतरो! और आप इस प्रकार इसे ठीक करते हैं।’ 

पर इसको को ले लो, क्योंकि यही वो है जो आप को पाना है। आप को ये खोना नहीं है, ये आप के लिए ही है। ईश्वर का धन्यवाद मैंने कभी कोई पैसा नहीं लिया, कुछ भी नहीं, ये सब आप के लिए निशुल्क है, इसलिए क्योंकि आप इसे खरीद नहीं सकते। ये अमूल्य है। ये आप की मां का प्रेम है। समझने का प्रयत्न करिए। समझने का प्रयत्न करिए ये प्रेम है, परमात्मा का प्रेम जो बेचा नहीं जा सकता।

आप को अपने हृदय से सोचना होगा। क्या आप कर सकते हैं? क्या आप अपने हृदय से सोच सकते हैं? आप को अपने हृदय से महसूस करना होगा सहज योग को प्राप्त करने के लिए। ये एक बहुत बड़ी समस्या है, परंतु एक बार आप को आप का आत्म साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है, वो बढ़ने लगता है। धीरे धीरे वो ऊपर आने लगता है। वो लोग भी जो मुझ से बहुत अभद्र व्यवहार करते हैं, वापस आते हैं कहते हुए, ‘मां ये मेरे अंदर कार्यान्वित होने लगा है। ये ऊपर आ गया है। मैंने ठंडक का अनुभव कर लिया है। अब मुझे ज्ञात हो गया है कि वो क्या है।’

दूसरा तरीका जो लगाया जा सकता है, वो ये है। सरल तरीका है कि आप कह सकते हैं कि, मैं लोगों को रोगमुक्त कर सकता हूं। हां ये मैं करता हूं, कर सकता हूं।’ और आप लोगों का इलाज कर सकते हैं। अब देखिए बाला ने उस को आत्म साक्षात्कार दिया है। मैं जानना चाह रही थी, उस ने कहा कि वो पहली बार आया है, पर आप देख सकते हैं कि वो एक आत्म साक्षात्कारी है। सब देख सकते हैं कि वो एक आत्म साक्षात्कारी है। कि बाला ने उसे आत्म साक्षात्कार दिया! कल्पना कीजिए! वहां क्या है? ये टोनी जो यहां खड़ा है अल्जीरिया में उस ने तीन सौ नौजवानों को आत्म साक्षात्कार दिया है, अल्जीरिया में।

सब से आश्चर्यजनक है कि जिस प्रकार हम अहंकार उन्मुख है, उसी प्रकार हम एक दूसरे से बहुत भयभीत भी हैं, हर एक व्यक्ति से बहुत डरे हुए, कुछ भी करने से बहुत डरे हुए। उस को देखिए, वो अभी बाहर गया और बोला, ‘हां मैने सत्य को पा लिया है। आप आइए। अब आप आ जाइए।’ पांच सौ लोग, इंजीनियर, डॉक्टर, सारे शिक्षित जवान लोग। उस ने उन से बात की और उन्हें कहा, ‘ये है जो मैने पाया है। अब आप खुद देखिए। ले लीजिए।’ परंतु लोगो के लिए बोलना ही कठिन होता है। बेशक राजनीति के लिए वो शायद वहां डब्बे पर खड़े हो जाएं, वो जिसे आप हाइड पार्क कहते हैं और कुछ कहते हैं, परंतु सत्य के लिए वो बहुत धीमे पड़ जाते हैं, दूसरो से डरे हुए।

ये दूसरी निशानी है। हम एक दूसरे से बहुत डरे हुए हैं, जबकि हम सब प्रेम के एक धागे से बंधे हुए हैं। आप सब बंधे हैं। आप सब परमात्मा के हार के छोटे मनके जैसे हैं। आप सब बहु सुंदर हैं। आप को कोई अंदाजा नहीं हैं। बात सिर्फ इतनी है कि अभी आप ने वो धागा नहीं पाया है, जिस से आप सब बंधे हैं। आप सब वास्तव में बहुत सुंदर हैं, परंतु ये अहंकार का मामला बहुत भयावह है, जिस ने सब को बहुत बदसूरत बना दिया है। वो बिना किसी कारण के यूं ही आप पर चिल्लाने लगते हैं। चिल्लाने की क्या आवश्यकता है?

कल मैं क्रौली गई थी। अब उधारण के लिए, वहां मेरे कोई शिष्य नहीं थे, परंतु उन्होंने मेरे बारे में सुना था। मैंने एक व्यक्ति को उसकी मधुमेह से रोगमुक्त किया, सिर्फ एक आदमी। पर वो एक झटके में रोगमुक्त हो गया। तो उस ने जा कर बताया कि,’शक्ति आ गई हैं। यह शक्ति हैं।’ इस तरह और सब ने उस पर विश्वास कर लिया। जब मैं वहां गई, आप को आश्चर्य होगा कि स्टेशन मास्टर, जो की भारतीय था, ने भी मेरे पैर छुए। वो मेरा टिकट नहीं ले सका, उस ने मेरे पैर छुए, बात खत्म! मैं वहां गई, उन्होंने आरती वगैरह की। उन सब को आत्म साक्षात्कार प्राप्त हो गया वहां।

जब हम लौट रहे थे, हम एक नॉन-स्मोकिंग डिब्बे में बैठे। वहां एक लंबा, हट्टा कट्टा, सुंदर दिखने वाला व्यक्ति एक बहुत अच्छा सूट पहने बैठा था और वो सिगरेट पीने लगा। तो एक बोला कि ये नॉन-स्मोकिंग है। तो उस ने एक गाली दी, एक अच्छी सी, कोई विशेष जो उसने कहीं से सीखी होगी। मुझे नहीं पता उस ने कहां से ये सीखी। वो बोला,’ ये दरवाजा ये नहीं कहता, तो मैं सिगरेट पियूंगा, जो चाहे कर लो’, क्योंकि इस ने इस के लिए भुगतान किए है। पर उस ने ये नहीं सोचा कि शायद, चाहे वो नॉन -स्मोकिंग हो या स्मोकिंग, उस ने नहीं सोचा कि,’ मैं किसी को डिस्टर्ब कर रहा हूं। मुझे खुद कैंसर हो जाएगा और मैं दूसरों को भी ये दे रहा हूं।’ मेरा मतलब है कि ये सिर्फ हृदय के द्वारा समझने का सवाल हैं। पर मैं कहूंगी, कोई भी अन्य व्यक्ति किसी प्रगतिशील देश से अगर यहां होगा और आप उसे कहेंगे, कि ‘कृपया धूम्रपान मत कीजिए।’ वो कहेगा, ‘ओह! मैं क्षमा चाहता हूं। क्या मैने आप को कष्ट दिया? मुझे पता नहीं था आप धूम्रपान नहीं करते।’ और वो अगले स्टेशन पर उतर जाएगा और दूसरे डिब्बे में चढ़ जाएगा। परंतु ये नहीं। इसे बेशर्मी समझा जाता है। इसे अश्लीलता समझा जाता है। सिर्फ ये ही नहीं ये मानी जाती है…

(रिकॉर्डिंग में व्यवधान)

कल्पना नहीं कर सकते कि कोई उनके बच्चों को मार सकता है। मेरा मतलब है कि वे सोच भी नहीं सकते। वो कल्पना नहीं कर सकते। वो अपने बच्चों से प्रेम करते हैं। वो अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकते हैं, वो किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस हद तक कि वो, उदहारण के लिए की रानी का एक बेटा है और वो पैसा पाना चाहता है, तो वो उसे के लिए खजाने से चीज़ें चुरा सकती है जिन्हे वो बेच सके। ये एक भारतीय स्त्री के लिए संभव है, वो ये कर सकती है। उनके लिए बच्चे और परिवार सब से महत्वपूर्ण है। वो किसी भी हद तक जा सकती हैं। ये बाई नाडी का संचलन है। परिवार से संलिप्तता बहुत अधिक है, बहुत अधिक संलिप्तता। ‘ये मेरा बच्चा है। ये किसी और का बच्चा है।’ ये सब बाते होती हैं यहां। 

इस से भी आप बाधित हो सकते हैं। जैसे आप अपने अहंकार से बाधित हो रहे हैं। और जब आप ऐसे विचार से बाधित हो जाते हैं, कुछ ऐसी प्रकार की आत्माएं भी होती हैं जो आप के अंदर आ सकती हैं, और आप आत्माओं के बहुत बुरे कब्जे से पीड़ित हो सकते हैं। लेकिन एक ही फायदा इस परिस्थिति में हो सकता है कि, हम सोचते हैं कि सिर्फ बोलने का ढंग आप को परेशान कर सकता है। उदहारण के लिए कोई व्यक्ति ऐसा करता है, पुलिस ऐसे व्यक्ति को पकड़ लेगी और जेल में डाल देगी। वो चाहे राजा हो पर वो ऐसा करेगा। लेकिन अहंकार के लिए कोई उपचार नहीं है। 

जब तक आप हिंसात्मक नहीं हो जाते, कोई भी आप के अहंकार को नहीं पकड़ेगा। आप अपनी जुबान से जो चाहे कह सकते हैं, कोई कुछ नहीं कहेगा। आप किसी से भी अभद्र व्यवहार करें, आप का अधिकार है। यही अहंकार है। और मैं सोचती हूं कि अहंकार इतनी भयावह चीज है कि ये आप को पाप में डालता है, और आप इसको महसूस भी नहीं करते। वो आप को पाप में जीवन गुजरवाएगा पर आप कहेंगे,’ इस में क्या खराबी है?’ अपने साथी को दूसरों से बांटना। ‘इस में क्या खराबी है?’ दूसरे आदमी के साथ भाग जाना या अपनी जिम्मेदारियों को त्याग देना, आप के बच्चे पीछे छूट गए, ‘क्या खराबी है? क्योंकि मैं आनंद ले रही हूं।’ ये बहुत स्वेच्छाचार है। ये घातक है। जैसे शरीर की एक सैल कहे, अब मेरा ये अंगूठा कहता है, ‘क्या गलत है? मैं तो बढ़ने जा रहा हूं।’ तो वो उस तरह बढ़ता है और बाकी हाथ इस तरह जाता है। ‘क्या गलत है?’ क्योंकि जब हथेली की रचना के लिए कोई सहयोग नहीं है तो फिर शरीर का क्या?  

ये बहुत स्वेच्छाचार है। क्या आप ये समझते हैं? ये बहुत गंभीर बात है कि कोई व्यक्ति निर्णय ले सकता है, ‘ क्या गलत है? मैं ये कर रहा हूं। हां मुझे ये पसंद है, तो मैं ये कर रहा हूं।’ मुझे पसंद है। तुम्हे शायद पसंद है। पर विराट का क्या? आप विराट के अंग प्रत्यंग है और आप सिर्फ एक सैल हैं। सिर्फ एक तरीका जिस से आप संपूर्ण बन सकते हैं, वो है विराट की इच्छा को समझना। विराट की इच्छा बन कर आप पूरे समुद्र बन जाते हैं। बूंद सागर बन जाती है। 

पर जब हम सोचना आरंभ करते हैं, हम तुच्छ बन जाते है, ‘ओह! मैं जो चाहे कर सकता हूं।’ और फिर हम कब खुद के अहंकार में कहां पहुंचते हैं? अनाथ आश्रम में! एक अनाथ आश्रम में दस बुजुर्ग पुरुष, दस बुजुर्ग स्त्रियां अन्य अनाथ आश्रम में, और दस छोटे बच्चे अन्य अनाथ आश्रम में। कल्पना कीजिए कि परमात्मा की छत के नीचे ये लोग बिल्कुल अकेले हो जाते हैं। कहीं भी हृदय नहीं है पिता का जो आप से प्रेम करता हो और (होली घोस्ट) पवित्र आत्मा का जो आप की माता हैं। ये पूर्णत: आत्मघाती है, ये अहंकार और प्रेम विहीन। मेरा मतलब है कि ये दूसरों के लिए नफरत है। मतलब मुझे नहीं पता कि हम दूसरों से घृणा क्यों करें? हम इतने सुंदर हैं। परमात्मा ने आप को इतने ध्यान से बनाया है, आप को इसका अंदाजा नहीं है। 

जब आप अपने चक्रों को खुलते देखेंगे, कि कैसे उन्होंने आप को इतना सुंदर बनाया है, विभिन्न रंगों से, विभिन्न देवता जो उन्होंने स्थापित किए है। कैसे उन्होंने आप को सुंदर मंदिर बनाया है अगर आप ये देख सकते हैं यहां, आप सब। जरा देखिए ये वो मंदिर है, जिस से आप का निर्माण हुआ है। उन चक्रों को देखिए जो उन्होंने आप को बनाया है। कितनी सावधानी से उन्होंने आप को रखा है। अपनी उत्क्रांति से आप एक के बाद एक ऊपर आए हैं। हम दूसरों से क्यों घृणा करें? और उस से आप दूसरों से घृणा करते हैं।

आप को क्यों खुद पर क्रोधित होना चाहिए? आप को क्यों खुद पर दया करनी चाहिए? आप को ज्ञात नहीं है आप कितने सुंदर हैं। और ये आप ही हैं, पूरे ब्रह्मांड में, पूरे सृजन में, प्रभु की पूरी लीला में, ये आप मनुष्य ही जो वहां रहेंगे, ना की मेंडक, जानवर और मुर्गे। 

सौंदर्य और गरिमा के राजमहल में आप मुख्य अतिथि होने वाले हैं। आप को परमात्मा के राज्य में प्रवेश करना है। तो खुद से क्यों घृणा करें? मैं ये सहन नहीं कर सकती। मैं सहन नहीं कर सकती, मेरे बच्चे इस प्रकार खुद से घृणा करें! क्यों? क्योंकि आप सीमित हैं, क्योंकि ये बेतुका अहंकार जरूरत से ज्यादा विकसित है। इसे ऊपर ढकेलिये!

आप अपना अहंकार नहीं हैं। आप आत्मा हैं। आप अपने प्रेम हैं। खोलिए! पूरी तरह खुल जाइए! अपने आप को बचाने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस के बारे में डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

क्या आप के हाथों में ठंडक आ रही है? थोड़ी सी? हां, मैं ये देख सकती हूं।

कृपया अपने हाथ रखिए और बहुत अच्छा अनुभव कीजिए! आप ने देखा! ये सभी सहज योगियों को आराम दे रही है। (श्री माताजी के हंसने का स्वर) वो यहां है। ये होता है। ये स्वत: घटित होगा।

अब तीसरी बात ये है कि प्रत्येक को समझना है कि सहज योग में आने के पश्चात निस्संदेह ये आप को घटित होता है, परंतु हमें समस्याएं होती हैं। और हम ने खुद ही समस्याएं निर्मित की हैं। अपने जीवन के हर पड़ाव पर, हम ने खुद को घायल किया है, हर पड़ाव पर। मेरा मतलब आप पहले से हो घायल थे। मैं नहीं कहूंगी कि आप ने किया है। आप ने शायद खुद न किया हो। शायद आप के माता पिता, शायद समाज ने। बहुत सारे घाव रहे हैं, बहुत सारी अप्रसन्नता रही है आप के जीवन में।

फिर जैसे आप बड़े हुए, किशोरावस्था में भी आप घायल हुए। और आप को बदलना था, आप को विद्वंसकारी होना था, वो करना ही था। फिर शायद अपनी खोज में आप ज्यादा घायल हुए हैं, किसी भी और जगह के मुकाबले संभवत:। शायद समाज के कारण आप ने अपने जीवन का उद्देश्य खो दिया है। ये बहुत बहुत संभव है। ये शायद हुआ हो, कुछ भी आप को, इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप मेरे पास आए हैं, और ये मेरा कर्तव्य है की सब कुछ बदल जाए।

उसी प्रकार आप की कुंडलिनी के साथ भी है। जब वो जागृत होती है पहले ही प्रयास में, अधिकतर लोगों को वो सिर्फ पहले ही प्रयास में मिल जायेगी और वो कहते हैं, ‘मां हमें बहुत जोश का अनुभव हुआ, पूर्णत: खत्म हो गए, हम खो गए!’ वो बोले। परंतु फिर वो नीचे आ गई और फिर ये आप अपने लिए करने लगे। परंतु आप को भिन्न होना है, आप का उपचार होना है।

और उन में से कुछ मुझे लिखते हैं कि, ‘मां हमें नहीं लगता हम इस योग्य हैं।’ आप को ये कैसे पता? ये एक अन्य पलायन है। कौन आप को बचाएगा? कौन आप से प्रेम करेगा? कौन आप की देखभाल करेगा? कौन वो सब करेगा जो कुंडलिनी को वहां ऊपर रखने के लिए आवश्यक हैं? तो आप क्यों उस से पलायन करना चाहते हैं? फिर से आप वापस लौटेंगे उसी के पास और जैसे आप ने मुझे बातें करते सुना है, कुछ लोगों ने विशेषकर कैंसर दोबारा हो गया है।

तो ये बहुत ही सूक्ष्म चीज है जिस में आप स्थिर हो जाएं। आप को अपनी स्थानों पर इस प्रकार स्थिर होना है कि फिर आप कभी वहां से हटाए न जाएं। उस के लिए आप को थोड़ा सतर्क और धैर्यवान होना होगा।

धैर्य सहज योग का कुंजी शब्द है, विशेषकर आप लोगों के साथ। आप को जानना चाहिए, क्योंकि आप में मिश्रित धैर्य है। आप को खुद के साथ धैर्य नहीं है, और आप इतने नाराज हो गए हैं। और उन में से ज्यादातर ऐसे हैं, मैं बहुत आश्चर्यचकित हूं। वो लिखते हैं, ‘मां हमें खुद पर इतनी शर्मिंदगी होती है, हम कैसे हो सकते हैं?’ अब ये क्या है? आप किस का सामना करेंगे, जब आप स्वयं अपनी मां का ही सामना नहीं कर सकते? आप किस को बचाएंगे? जरा सोचिए इस बारे में। आप इस तरह क्यों अनुभव करें? ये बहुत गलत है।

क्या आप मुझ से भयभीत हैं? क्या मैं आप को किसी प्रकार से आप को कोई हानि पहुंचाऊंगी? कभी नहीं! मैं आप की समस्याएं जानती हूं। मैं जानती हूं कि गलतियां की गई हैं, जिसे आप पाप कहते हैं। पर जैसे मैंने आप को सौ बार बताया है, कोई पाप मेरे प्रेम से बड़ा नहीं है। ठीक है? मुझे एक अवसर दीजिए। मुझे एक अवसर दीजिए कार्यान्वित करने का। अपने आप को अस्वीकार मत कीजिए। क्योंकि आप वो लोग हैं, आप वो रोशनी हैं, जो समाप्त हो गए हैं। आप को प्रकाशित किया जाना है, और आप को सारी दुनिया को प्रकाशित करना है। अब हम एक खड़ी चट्टान पर खड़े हैं, जहां से संभव है कि हम नष्ट हो जाएंगे।

यहां का आनंद देखिए! वो खुद के भीतर समाहित नहीं कर पा रहा है। ये है जो होता है। ये होता है। जब ये होता है, ये हर जगह कार्य करता है। ये वाकई अदभुत है।

आप को हाथों में ठंडी हवा आ रही है? विश्वास करिए ये है। आप सोचिए, हम जानना चाहते हैं,’ये कैसे संभव है? ये कैसे हो सकता है? ये संभव नहीं है। ये मुझे नहीं हो सकता!’ हां ये हो सकता है। क्यों नहीं? आप में क्या खराबी है? आप विश्वास नहीं कर पाते क्योंकि ये बहुत महान है, शानदार है। परंतु जब हम उसकी मांग करते हैं, उदहारण के लिए अगर आप चांद की मांग करें और आप को चांद मिल जाए, तब आप क्या कहेंगे? आप पर्वत घाटियों में खोजते रहे हैं, पाते रहे हैं। आप खुद को नहीं जानते। आप अपना भूतकाल नहीं जानते। क्या आप जानते हैं, कि आप आज क्यों पैदा हुए हैं?

कल एक भारतीय आया और मेरे कान में मुझ से पूछा। उस ने कहा,’ मां क्या आप के कहने का अर्थ है कि ये हमारे पिछली जन्म हैं जो हमें यहां ला रहे हैं? अन्यथा हम को आत्म साक्षात्कार प्राप्त नहीं हो सकता।’ मैंने कहा, आप हर चीज को क्यों तोलना चाहते हैं? ये आप को क्यों जानना है? ये इसलिए ऐसा है क्योंकि मुझे ऐसा पसंद है। बात खत्म! इसे (विचार को) बाहर निकालो! आप को खुद का आनंद लेना चाहिए! आखिरकार हर मां चाहती है उसके बच्चे अवश्य आनंद लें! वो पता नहीं करती कि दुकान में उसे कितनी तकलीफ हो रही है। वो सब कुछ पता नहीं करती। वो इतना कहती है,’ ठीक है! मैंने उन के लिए भोजन बनाया है। उन्हे आ कर भोजन का आनंद लेने दो।’ बस इतना ही!

आप मेरे आनंद में सब का आनंद लेंगे। और आप को पता होना चाहिए कि आप का आनंद परमात्मा का आनंद है। परमात्मा चाहते हैं कि आप स्वयं का आनंद लें। वो नहीं चाहते कि आप सुबह से शाम तक खुद को मारते रहें। अपनी  खुद की ऊर्जा का उपयोग करना सुबह से शाम तक, स्वयं पर प्रहार करते हुए। आप कैसे कर सकते हैं? आप के माता- पिता हैं। आप के एक पिता हैं, मां हैं। क्या आप सोचते हैं कि माता – पिता होने के नाते आप पसंद करेंगे कि आप का बच्चा खुद पर प्रहार करता रहे सुबह से शाम?

यहां उन्होंने ये सुंदर संसार बनाया है, और वो चाहते है कि आप उसका आनंद लें। वो चाहते हैं कि आप देखें कि उन्होंने आप के लिए कितना सुंदर बनाया हैं। कितना आरामदायक, कितना परमानंद से पूर्ण, वो वास्तविकता है जो परमात्मा ने आप के लिए फैलाई है। और वह अपने बच्चों को समृद्ध होते और आनंद लेते हुए और परमात्मा के आनंद की महान लीला के साक्षी होते हुए देखना चाहते हैं। यह वही है! उन्होंने वास्तव में कड़ा परिश्रम किया है और परिणीति बिंदु पर अब आप को उन्हे निराश नहीं करना चाहिए, कहीं से आए आप के कुछ मूर्खतापूर्ण विचारों के कारण। ये बहुत बचकाना है। मेरे खयाल से ये बहुत बचकाना है। आप को बाल – सुलभ होना चाहिए बचकाना नहीं। यह ठीक है!

मैं कभी किसी पर क्रोधित नहीं होती, जो मुझ पर चिल्लाते भी हैं। मैं जानती हूं वह बच्चे हैं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। परंतु अपना समय  मत गंवाइए। आप को विकसित होना है। आप को परिपक्व होना है। आप को अपनी खोज के फल का आनंद लेना है।

हमारे को देखिए (अस्पष्ट) वो सिर्फ एक छोटा लड़का है। वो बहुत सच्चा सहज है। जिस तरह ज्ञानवान है वो आप का परदादा हो सकता है, पूर्णत: मुकम्मल। तो यही बात है। एक छोटा बच्चा असीम हो सकता है। आप सब उस लड़के की तरह हो सकते हैं, पूरी तरह उस जैसे, कोई प्रश्न नहीं, कोई शंका नहीं, कुछ नहीं! सिर्फ वहां, स्वयं का आनंद लीजिए। आप उससे पूछिए और वह आपको बता देगा कि, क्या बात है, कहां समस्या है, क्या हो रहा है। बात खत्म!

कोई सवाल? क्या मैं थोड़ा सा पानी पी सकती हूं? कोई सवाल? एक प्रकार से आज थोड़ा सा ही समूह है। यह अच्छी बात है। आप बैठ क्यों नहीं जाते? उन्हें बैठने का मौका दीजिए। यहां आइए।

साधक: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: हां मैं आप से सहमत हूं। आप ऊपर नहीं जा सकते, बहुत सही है। आप ऊपर नहीं जा सकते। परंतु कुछ है, मैं कहूंगी कि हमारे अंदर, अचेत अवस्था है जो कार्य करती है। और अगर आप कहें तो मध्य मार्ग में आ जाइए, फिर कोई समस्या नहीं होगी। आपको सिर्फ खुद को वैसा रखना होगा जैसे आप हैं। अब उदाहरण के तौर पर जैसे यह मोमबत्ती यहां है। इसको जलाना है। ठीक है? यह खुद प्रज्वलित नहीं हो सकती। ठीक है? यह मुख्य बात है। और हम यह नहीं जान सकते कि किस प्रकार यह करना है। ठीक है?

पर कोई रोशनी जो प्रज्वलित है, उसे प्रज्वलित कर सकती है। पर अगर यह चैनल टूटा हुआ है, उसने अपने को समाप्त कर लिया है, वो चरमपंथी है, वो इस तरफ गया है, वह उस तरफ गया है, तब यह मुश्किल है। हैं न? फिर भी हम उसे ठीक कर सकते हैं। यह मुश्किल नहीं है। उसको करना मुश्किल नहीं है। मैं आपसे सहमत हूं। आप नहीं जानते कि यह किस तरह करना है। यह परम सत्य है। और यह कहना सबसे महान बात है कि आप नहीं जानते इसे किस प्रकार करना है। तो ऐसे ही छोड़ दो! कोई हर्ज नहीं। वो कार्यान्वित होगा। परंतु सुबुद्धि के साथ समझ के साथ, आप जान जाएंगे कि किसी को यह करना है। किसी को, जो असली है, यह करना है। जो नकली है, वह यह कर नहीं सकता। 

अब आप एक असली और नकली आदमी को कैसे पहचानेंगे? क्योंकि हम इतने असंवेदनशील हैं, कि हम असली के बजाए नकली से ज्यादा प्रभावित होते हैं, वास्तव में। अगर हमने वह नहीं किया होता, हमने ईसा मसीह को सूली पर नहीं चढ़ाया होता। आपने मोहम्मद साहब को जहर नहीं दिया होता।

असली और नकली को कैसे पहचाने ये एक समस्या है, तो हमको शास्त्रों को ध्यान में रखना होगा। सब शास्त्रों ने यह कहा है, उन्होंने भविष्यवाणी की है। सब शास्त्रों ने भविष्यवाणी की है, कि आप परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश करेंगे। हर शास्त्र में कहा गया है, कि यह भविष्यवाणी सत्य होना है। ठीक है? फिर असली व्यक्ति को पहचानने का क्या तरीका है? पहली महत्वपूर्ण बात, जो कोई सतही व्यक्तित्व को समझनी चाहिए, कि ऐसे व्यक्ति (असली) की आप के बटुए में कोई रुचि नहीं होती। ना आप की पदवी में, और ना आप की प्रजाति में, ना आप के पंथ में, ना इसमें कि आप किस तरह के वस्त्र धारण किए हुए हैं, या आप किस का क्या दृष्टिकोण है। शायद कुछ लोग मैने देखे हैं, उन्हे नहीं ज्ञात कि एक पावन व्यक्ति के पास किस तरह आना चाहिए। वे अपने पैर इस प्रकार मेरी तरफ कर के बैठते हैं। कभी कभी वो इस तरह बैठते हैं, वो ऐसे बैठते हैं। वो जैसा अच्छा लगे वैसे बैठते हैं। वो आप को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे पर वो बच्चों जैसे नहीं दिखते। कोई फर्क नहीं पड़ता। ये एक बात है जो हर एक को पता होनी चाहिए कि ऐसा इंसान इन बातों की परवाह नहीं करता। वो सिर्फ आप के कल्याण के चिंता करता है।

जैसे अभी हाल में एक महिला ने कहा, ‘मैं उस भयानक आदमी का नाम नहीं लूंगी, पर वो योगी बहुत ही मनमोहक आदमी है।’ सच में? वो आप के लिए क्या मोहक काम करता है? आप की तंदुरुस्ती बिलकुल खराब है, आप का लीवर खराब है, आप बिल्कुल जर्द लग रही हैं, आप इतनी वीभत्स हैं, और वो आप के स्वास्थ को ले कर बिल्कुल बेपरवाह है, वो ऐसा कुछ नहीं है। और आप ऐसे कैसे कह रही हैं कि वो मनमोहक है? और उसके आकर्षण से आप को क्या लाभ होता है?

तो वो पहले है, उसका बाहरी रूप, उसका बाहरी व्यवहार महत्वपूर्ण नहीं है, परंतु किसी व्यक्ति की आंतरिक व्यग्रता आप को देखनी चाहिए। वो किस बारे में व्यग्र है? वो किस बारे में बात कर रहा है? दूसरा क्या वो बात कर रहा है जो आप को शास्त्रों ने बताया है? पहली बात है पवित्रता, धार्मिकता, उदारता किसी व्यक्ति की, धर्म ग्रंथों में सारे दस धर्मादेश (कमांडमेंट्स)  क्या वो स्वयं इनका पालन करता है या नहीं? क्योंकि कुछ की तो पांच छह रखैल हैं वहां बहुत आराम से! आप के पैसों से उनके पास हवाई पट्टी हैं, उनके पास हर प्रकार की चीजें हैं। ऐसे लोग अगर खुद को गुरु कहते हैं, आप को पता चला जायेगा की वो नहीं हैं। ये तो कम से कम है।

परंतु असली गुरु का असली परीक्षण ये है, काश मैं ‘सौंदर्य लहरी’, आदि शंकराचार्य द्वारा लिखी एक पुस्तक लाई होती, कि अगर वो असली गुरु है वो आप के अंदर शक्ति जाग्रत करता है। उसे आप की स्वयं की शक्ति प्रदान करनी चाहिए। उस से क्या, अगर मेरे पास हजारों शक्तियां हों? आप के लिए क्या लाभ है? मान लीजिए अगर ये रोशनी बहुत अच्छे से जल रही है, बढ़िया, लेकिन उस से इस लाइट का क्या लाभ, जो नहीं जल रही? अगर वो इस लाइट को थोड़ा भी जला सकती है, तब हम कह सकते हैं कि उसमें भी कुछ रोशनी है। तो वो अगर आप को आप की शक्तियां नही देता वो आप का गुरु नहीं हो सकता।

उसकी दिलचस्पी इस बात में होगी कि आपको आपकी शक्तियां मिल जाए। और अगर आपको आपकी शक्ति मिल जाए, सभी पुस्तकों में जिसका वर्णन किया गया है, जो दिव्य चैतन्य की शक्ति है। ईसा मसीह ने भी कहा है, ‘कुछ मेरे शरीर से गुजरा, जब किसी ने मुझे छुआ।’ ये ऐसा ही होना चाहिए। और अगर आप को कुंडलिनी की समझ की शक्ति मिल जाए और दूसरों की समझ की, तब आप को कहना चाहिए कि वो एक गुरु है। ये न्यूनतम है कि वो आप की कुंडलिनी का जागरण करे।

अब हमारे यहां एक गुरु हैं गगनगिरि महाराज। वो बहुत अच्छे इंसान हैं और वो मेरे बारे में जानते हैं। वो जानते हैं! तो वो वैसे ही हैं, जैसे मैं हूं। और उन्होंने मुझे कभी नहीं देखा था पर मेरे बारे में बात करते थे। और उस व्यक्ति ने सिर्फ एक व्यक्ति को आत्म साक्षात्कार दिया है। और अब वो पहाड़ियों में चले गए हैं, और अब वो वहां बस गए हैं। वो वापस नहीं आना चाहते। उन्होंने मुझे बताया है कि उन्हें सब तरह का दुर्व्यवहार सह है। तो अब वो कहते हैं, ‘बस बहुत हो गया मेरे लिए! मुझे ऐसे लोग नहीं चाहिए। उन्हे वहां जाने दो। मैं उन पर प्रहार करूंगा।’ मैंने कहा, आप उनसे इतने क्रोधित क्यों हैं? वो बोले, ‘क्योंकि वो आत्म साक्षात्कार देने में समय लगाते हैं।’ वो माताजी नहीं हैं, इसलिए समय लेते हैं। बेचारे! आप जानते हैं उसने (गगनगिरी महाराज) एक व्यक्ति की पच्चीस साल देखभाल की, सिर्फ एक व्यक्ति, और अब उसके बाद? उन्होंने निसंदेह उसे आत्म साक्षात्कार दिया, और उन्होंने उसे बेहतर स्तिथि दी। उन्हे लगा उन्होंने उसे स्वच्छ कर दिया है। उस के बाद उन्होंने उस से कहा कि तुम दुनिया में जाओ और उपदेश दो। तो उपदेशक उस में आ गया। पर अभी भी वो तैयार नहीं था पच्चीस सालों में! उसने धूम्रपान करना शुरू कर दिया। फिर वह औरतों के चक्कर में पड़ गया, और फिर धन के चक्कर में पड़ गया।

संस्कृत भाषा में एक कहावत है,’ कंचन कांता’। कंचन माने सोना, कांता माने स्त्री। तो जब मैंने उस से बात की, ‘अन्ना महाराज का क्या हुआ?’ वो उस के लिए अपशब्द कहने लगे, ‘उसे नर्क में जाने दो! निकम्मा आदमी! माताजी मेरे आगे उस का नाम मत लीजिएगा। ये आप की जिव्हा को शोभा नहीं देता कि आप ऐसा शुद्र नाम लें।’ मैने कहा, ‘क्या हुआ?’ वो बोले,’वो कंचन और कांता के साथ चला गया है। वो बिल्कुल बेकार आदमी है।’ उन्होंने सार्वजनिक रूप से उस की तीव्र निंदा की और कहा कि, आप उस का चेहरा, काला चेहरा कभी न देखें तो बेहतर है। ‘ आप उसका काला चेहरा मत देखना।’ इस प्रकार वे बहुत क्रोधित थे।

परंतु एक दिन ये अन्ना महाराज बंबई में मेरी एक शिष्य से मिलने आया। उस ने मुझे लिखा, ‘मां वो मुझ से मिलने आ रहा है। क्या आप आ कर उस से मिलना चाहेंगी?’ मैंने कहा,’मुझे मिलना चाहिए क्योंकि वो (गंगानगढ़ महाराज) बहुत क्रोधित थे।’ तो मैं उस से मिलने गई जो एकल मानव है पच्चीस सालों से, जिस के बिचारे गुरु ने उसे आत्म साक्षात्कार दिया है और जो यहां बस गया है। मैं जा कर अन्ना महाराज से मिली जो बड़े आराम से धूम्रपान कर रहा था, करता जा रहा था। मैं वहां बैठी थी यह जानते हुए, कि वह मुझे जानता है कि मैं कौन हूं। तो उस ने मेरे पैर छुए, ठीक है और बैठ गया। वो बोला,’आप मेरे गुरु से मिलने गई थीं। मैं अपने गुरु से बहुत क्रोधित हूं।’ मैने कहा, ‘तुम्हारे गुरु में क्या बुराई है? ऐसे नहीं कहा जाता है। एक गुरु के लिए ऐसा कभी नहीं कहा जाता है। ऐसा कहना बहुत अक्खड़पन होगा।’ उस ने कहा, ‘वो अब बंबई क्यों आ रहे हैं? उन्होंने मुझे बताया था कि मैं माताजी से मिलने बंबई आऊंगा। क्यों आना है उन्हे? वो वहां से क्यों आएंगी? मैंने कहा, क्यों? क्या आप खतरा महसूस कर रहे है? आप इस बारे में खतरे में हैं?

ऐसा हुआ था कि जब गुरु मुंबई आए तो उन्हें इसके बारे में पता चला, कि वो यहां क्या कर रहा है, इसलिए वो अपने गुरु पर बहुत अधिक क्रोधित था, कि उसके गुरु सब पता कर रहे थे। वो बोला, ‘नहीं! मेरा खयाल है कि वे वही रहें।’ और फिर मैंने देखा कि उसका आज्ञा चक्र पूरी तरह पकड़ा हुआ है, पूर्णत:। उसका आत्म साक्षात्कार भी पूरी तरह नीचे जा रहा है। ‘तो क्या हुआ?’ मैंने उस से कहा। ‘मैं अभी जा रही हूं पर मैं तुमको तिलक करूंगी। अभी ये तुम पर है, परंतु मैं तुम्हारे आज्ञा पर तिलक करूंगी और फिर मैं चली जाऊंगी।’ तो मैंने थोड़ा सा कुमकुम लिया और उसके माथे पर लगा दिया। फिर मैंने कहा,’ थोड़ा सा कुमकुम मेरे माथे पर भी लगा दो।’ जैसे ही उस ने अपनी उंगली मेरे माथे पर लगाई, मैने उसे अंदर खींच लिया, उसकी उंगली को। और वो जैग जैग जैग जैग जैग इस प्रकार हिलने लगा। आप समझे वो जोर से हिलने लगा। वो बोला,’ आप क्या कर रही हैं? आप मेरी उंगली तोड़ देंगी क्या? आप क्या कर रही हैं?’ तब मैने उस से कहा,’ ये हुआ है तुम्हारे आज्ञा चक्र को। मैं तब तक नहीं छोडूंगी जब तक तुम मुझसे यह वादा नहीं करते कि तुम अपने गुरु के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहोगे और ये सब बेकार के काम छोड़ दोगे।’ तो यह बात है। 

तो सहज योग में कुछ ऐसी बात है कि वह सहजता से काम करता है। तो आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आप अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त करें, फिर मैं आपको गुप्त संदेश के अर्थ (डिकोडिंग) बताऊंगी, सब कुछ सौ प्रतिशत पूरा ज्ञान। ठीक है? और वह भी पूर्णत: निशुल्क, प्रेम से परिपूर्ण! आप कैसे हैं?

लड़की: अच्छी हूं। धन्यवाद!

श्री माताजी: बढ़िया!

महिला: कभी-कभी हम सामानों के बदले धन देते हैं।

श्री माताजी: हां! अब देखिए इसीलिए!

योगी: पर इसका यहां और अभी से क्या लेना देना है? आप धन का विषय क्यों उठा रही हैं?

महिला: क्या?

श्री माताजी: ठीक है! सही! मैं कहूंगी कि ये समय की बरबादी है। अगर आप सोचते हैं कि पैसे का देना एक प्रतीकात्मक है तो ऐसा नहीं है। यह एक प्रकार से अहंकार का तुष्टीकरण है।

क्योंकि आप ने ये बात उठाई है तो में आए को बता दूं। 

हम सोचते हैं कि हम परमात्मा को भी खरीद सकते हैं और ये सोच कर अपना मन बहला रहे है। आप को संतोष मिलता है कि हमने इस के लिए भुगतान कर दिया है। ये एक प्रकार का अहंकार का तुष्टिकरण है कि हमने परमात्मा के लिए भी भुगतान किया है।

यह इतना आसान नहीं है मेरे बच्चे! प्रेम का प्रतीक इससे ज्यादा गहरा है। पैसे से आप इसे हल नहीं कर सकते। यही आप अपने बच्चों के साथ भी कर रहे हैं। आप अपने बच्चों को खेलने के लिए बहुत महंगे खिलौने देते हैं, पर अपना हृदय नहीं। आप का हृदय होना चाहिए। अगर आपके पास कोई प्रतीक है तो वह है आपका हृदय, आपकी भावनाएं, ना कि धन। पैसों से आप इसे बहुत सतही बना देते हैं।

तो वो जो कह रहा है वह यह है, अगर इस समय आप शुरू करेंगे तो लोगों का चित्त भटक जाएगा अभी सब का चित्त एकाग्र है। इसलिए वह नहीं चाहता कि आप उनकी शांति भंग करें। पर ये बहुत बिल्कुल सही है कि धन उन्मुखता खुद एक गलत चीज है। पैसे में यह सब बुराइयां हैं। यहां स्त्रियां पैसे के बारे में सोचती हैं। पुरुष पैसे के बारे में सोचते हैं इसीलिए यहां समस्याएं हैं। अगर आप थोड़े समय के लिए धन को भूल सकें, कम से कम मेरे साथ, तो यह बहुत अच्छा विचार होगा।

अगर आप यहां धन की बात करेंगे तो आप सारी बात को खराब कर देंगे, क्योंकि यह बहुत अपमानजनक है। बहुत अपमानजनक है! और आप अपनी मां के प्रेम को धन से नहीं खरीद सकते। ईसा मसीह को 30 दीनारों के लिए बेच दिया गया था! क्या आप यह जानते हैं? क्या आप मुझे भी खरीदेंगे और फिर मुझे बेच देंगे? यह बहुत सूक्ष्म हो सकता है। लोग पैसे के लिए ऐसे अपराध करते हैं। मुझ पर विश्वास करें कि ये एक मनुष्य के सुक्ष्म संपतियां हैं। एक बार मैं कह दूं, ‘ठीक है अगर आप मुझे पैसे देंगे तो मैं पैसे ले लूंगी।’ तुरंत आपका अहंकार संतुष्ट हो जाएगा! पर तब मैं आपको आत्म साक्षात्कार नहीं दे सकती। आपके अहंकार के तुष्टीकरण द्वारा नहीं बल्कि आप की सिबुद्धि के द्वारा ही मैं आपको आत्म साक्षात्कार दे सकती हूं। आप के हृदय को संतुष्ट करके ही मैं आत्म साक्षात्कार दे सकती हूं।

यहां आप लोगों के पास बहुत अधिक धन है, जितना भारतीयों के पास है उससे भी बहुत अधिक, परंतु उसमें कोई संतोष नहीं है। इसलिए धन कोई अच्छी वस्तु नहीं है।

कोई भी जो दूसरों का पैसा लेता है, मैं आपको एक बात बताऊंगी। आप सिर्फ एक तुलना करें  समझने के लिए। अगर मैं आपको कुछ पैसा देती हूं, मान दीजिए मैं कहूं कि मैं आपको 5 पाउंड दूंगी। क्या आप लेंगे? क्या आप में से कोई लेगा? लेंगे आप? मुफ्त में क्या आप लेंगे? आप में से कोई भी जो मुझसे मुफ्त में 5 पाउंड लेने के लिए तैयार हैं, मुफ्त जो सब की जानकारी में हो, अपने हाथ उठाएं। फिर मैं पैसा क्यों लूं? आप क्यों नहीं लेंगे? क्योंकि आपका आत्मसम्मान है, कि आपको पैसे नहीं लेनी चाहिए। सिर्फ मुफ्तखोर इसे स्वीकार करेंगे। सिर्फ भिखारी इसे स्वीकार करेंगे। एक व्यक्ति को भिखारी बना देते हैं, उस व्यक्ति को पैसे देकर और आप का अहंकार संतुष्ट हो जाता है। 

मैं भिखारी नहीं हूं, मैं एक रानी हूं। क्या आप जा कर अपनी रानी को कुछ धन देंगे? मैं देखना चाहूंगी कौन ये करेगा! क्या आप अपनी रानी को कुछ धन देते हैं? अगर आप को उन्हे धन देना भी हो, आप को बड़े हीरे देने होंगे। आपको अपना हृदय मुझे देना होगा, हृदय मुझे देना होगा।

ये बहुत गलत विचार है। यहां ऐसा ही है। आपने किसी को भेजा। यह बहुत ज्यादा, बहुत ज्यादा वह है, जो आप नहीं समझते। यह सूक्ष्मता से इस धन उन्मुख समाज में कार्यान्वित हो रहा है।

उदाहरण के लिए पिता माता। एक बार आप 18 वर्ष के हो गए आप डोल पर हैं। बात खत्म! स्वीकार्य मुफ्तखोर! यह मुफ्तखोरी की आदत है अपने आप में, कि नौजवान लोग बेरोजगार भत्ता (डोल) लें। ठीक है, तो आप अपने मां-बाप को छोड़ देते हैं और फिर बाद में उन्हें हैप्पी क्रिसमस लिख कर भेजते हैं। अगर महंगा कार्ड भेजें तो और भी अच्छा है। बात खत्म! जब पिता की मौत होती है तो उसके पास कोई भी नहीं होता उसकी देखभाल करने के लिए। इन व्यक्ति को देखिए जो यहां बैठे हुए हैं। इनके बुजुर्ग पिता हैं जो इन के साथ रहते हैं। इनके भाई उनकी देखभाल करते हैं। इनके भाई इनके साथ रह रहे हैं। इनके दादा इनके साथ रहेंगे। उनके परदादा इनके साथ रहेंगे। बुढ़ापे में ये उनकी जिम्मेदारियां हैं। यह बच्चे यहां आपके साथ रहेंगे। सस्ते लोग! आप का खयाल है ये सस्ते हैं? वो उन्हें खिलोने देते हैं, बहुत महंगे खिलौने। 

हम अपने बच्चों को नहीं देते। हम उन्हे नहीं बिगाड़ते। जो भी वो चाहते हैं, ये उन्हे देते हैं। हम ऐसा नहीं करते। बेशक हम उन्हे भरपूर देते हैं, पर उन्हें बिगाड़ते नहीं। जो हम जुटा सकते हैं, वो उन्हें देते हैं। लेकिन जो हम उन्हे देते हैं, वो पूरा प्रेम और पूरी निष्ठा, पूरी सेवा और पूरी एकाकारिता है। उनका आप पर हर अधिकार है। उदहारण के लिए मेरी चाभियां मेरे नाती पोते मेरे बच्चों द्वारा संभाला जा सकती हैं, कोई समस्या नहीं! वो जो चाहे ले जा सकते हैं, वो कर सकते हैं। जो भी साड़ी वो चाहे, वो पहन सकती हैं। मैंने कहा, वो जो चाहें ले जा सकते हैं। उनका अधिकार है, और वो करते हैं और ये कर के बहुत खुश होते हैं। परंतु ये समाज इतना धन उन्मुख है, बिल्कुल अहंकार की तरह कि आप पैसे के परे कुछ नहीं देख सकते। यही बात है।

जैसे जब मेरे नाती पोते आते हैं, तो मेरे पति ने कहा,’मैं बहुत परेशान हूं।’ मैंने कहा, ‘क्यों? मैं तो बहुत प्रसन्न हूं।’ वो बोले, क्योंकि उनका घर खराब हो जाएगा। वो बहुत अच्छे से सजा हैं। जरा देखिए उसको! हमारे लिए हमारे नाती पोते आ रहे हैं, तो हम सुबह शाम सपने देख रहे हैं, ‘वे आने वाले हैं, हे भगवान! हम खाने में क्या खायेंगे? और वो भी वही सोच रहे हैं, ‘हम अपने दादा दादी से मिलेंगे वो क्या करेंगे!’ कुछ नहीं, सिर्फ एक दूसरे से मिलेंगे!

यहां कोई नहीं मिलता आप जानते हैं! जब वह मिलते हैं, तो बात नहीं करते। मैंने बच्चों को भी देखा है। वह कॉमिक्स खरीद लेंगे और सब साथ में बैठकर पढ़ते रहेंगे और वो पूरा दिन साथ व्यतीत करेंगे या फिर वह जाकर कोई सिनेमा देखेंगे। जब हम किसी से मिलना चाहते हैं, हमारे पास दो से तीन घंटे खाली होने चाहिए! आओ बात करें अच्छे से, अब हम बातें करेंगे और हम में घनिष्ठता और साझेदारी होती है।

हम सोचते हैं कि पैसे देने से हम परस्पर आदान प्रदान करते हैं, आप ऐसा नहीं कर सकते। एक छोटी सी भी चीज जो आप सोचते हैं कुछ विशेष है, वो इतनी अनंदायक है और प्रेममय है।

श्री राम की एक कथा है। एक बार जब वो वनवास में थे, वो एक जंगल से गुजर रहे थे और वहां एक बुजुर्ग महिला थी और वो आदिवासी जाति से संबंध रखती थी, पूर्णत: वृद्ध और उस ने सुना की श्री राम आ रहे हैं। उस समय लोग कुछ ज्यादा संवेदनशील होते थे, आज जितने हैं उस से बहुत, बहुत, बहुत अधिक संवेदनशील, क्योंकि वो इतने भौतिकवादी नहीं थे। और वो इतनी प्रसन्न थी। वो सब जगह गई ये समाचार देने। और उसने सब पेड़ों को, सब लताओं को, और सब को, और सब फूलों को भी बताया, ‘ओह! श्री राम आ रहे हैं। खुश हो जाओ। राम आ रहे हैं।’ और फिर वो सोचनी लगी,’ ‘मैं अपने राम को क्या दूं? हल निकालने के लिए की कहां से वो सुंदर वस्तु लाई जाए जो मैं श्री राम को दे सकती हूं, उन्होंने श्री राम को कुछ खाने के लिए देने का निर्णय लिया।

तो उन दिनों वहां एक बैरी जैसी चीज थी जिसे हम भारत में बेर कहते हैं। पर वह अलग तरह की है, वह यहां नहीं मिलती। उस समय ये ही फल उपलब्ध थे। तो वो गई और उसने सारे फल तोड़ लिए और उसने बैठ कर वो सारे फल चखे बहुत धीरे से अपने दांत उनमें लगा कर। 

(प्रवचन की रिकॉर्डिंग यहीं पर खत्म हो जाती है)