Christmas Message: Thankfulness

London (England)

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                         कृतज्ञता

 लंदन 1978-12-24 लंदन

… केवल यह कार्य करना कि, एक इंसान के रूप में आना, एक इंसान की तरह जीना, और एक इंसान की तरह कष्ट उठाना। और वह इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, अभी जानने के लिए, उस संसार को जानने के लिए जिसे उन्होने बनाया, भीतर-बाहर से। इस तरह वह हमें बचाने के लिए वे आये थे।

लेकिन मेरा मतलब है, वह व्यक्ति बात कर रहा था और उसकी आज्ञा पर इतनी बड़ी पकड़ थी कि मैं बस यही कह रही थी कि, वह जिस बारे में बात कह रहा है वह खुद उसी में लक्षित हो रही है- कि उसमें नम्रता का कोई भाव नहीं बचा है! वह जिस तरह से उसके लिए ईसा-मसीह का उपयोग कर रहा था! साथ ही एक बहुत ही भयानक आज्ञा! और मैंने इसे साफ कर दिया। और सब कुछ इस प्रकार हुआ…मैं सोच रही थी कि वह कोई नाटक कर रहा है। और फिर सबसे दयनीय बात बाद में हुई जब उन्होंने कहा कि, “यहां स्थित अन्य समुदायों के लोगों के लिए आपका क्या संदेश है और आप क्या कहते हैं?” उन्होंने कहा, “हमें अपने पड़ोसी से प्यार करना चाहिए और इसी तरह हमें आपसे प्यार करना चाहिए। और यह भलाई के लिए है, और इसलिए हमने एक ऐसा काम शुरू किया है जिसके द्वारा हम लोगों को नौकरी देते हैं और उनकी देखभाल करते हैं।”

और सब कुछ एक परोपकारी कार्य के साथ शुरू हुआ, और फिर यह एक संघ, एक श्रमिक संघ बन गया, और फिर वह एक सामाजिक कार्यकर्ता बन गया, और अंत में वह एक रोज़गार कार्यालय के अंजाम पर पहुँच समाप्त हुआ !! (हंसते हुए) और मुझे नहीं पता था कि वह किस तरह का बिशप है और वह कब आत्मा की मुक्ति के बारे में बात करेगा? कब वह उत्क्रांति के बारे में बात करने जा रहे हैं? और कब वह बात करेगा कि हमें अपने बारे में जागरूक होना है? और-कुछ नहीं! एक शब्द भी नहीं! उसने जो कहा वह इस प्रकार था, और इतना निराशाजनक, मैं आपको बताती हूं।

मेरा मतलब है, हर तरह से क्राइस्ट क्या सिर्फ आपको नौकरी देने के लिए आए थे? (हंसते हुए) और फिर उनके पास एक आदमी था जो इस बारे में बात करता था कि वे उन लोगों को कैसे नौकरी देते हैं जिनके पास नौकरी नहीं है और वे कैसे रोजगार पैदा करते हैं। तो पूरी बात एक आर्थिक गतिविधि बन गई!

तो, परमात्मा और उनकी विनम्रता को -ऐसा कहकर समझना कि उन्हें इस धरती पर इस तरह से आना चाहिए ताकि हमें रोजगार प्रदान हो सके! मेरा मतलब यह है कि अगर आप भगवान के अवतरण का आकलन करने जा रहे हैं, तो मुझे नहीं पता कि इससे आप क्या हासिल करने जा रहे हैं। क्योंकि, आपके पास परमेश्वर और उसके तरीकों के बारे में यह एक गलत धारणा है। बिल्कुल। और लोग उसे सुनते हैं, मेरा मतलब बिना किसी सवाल या किसी भी चीज के है क्योंकि वह एक बिशप था जिसे आप सभी ने चुना था, और वह कहता जा रहा था।

तो यह है, किसी व्यक्ति को यह समझना होगा कि ईसा-मसीह इस धरती पर क्यों आए? आखिर वे क्यों आए, सम्पूर्ण विनम्रता को धारण किये? वह इस धरती पर एक गरीब आदमी के रूप में क्यों आए? और आखिर उन्होंने क्यों स्वीकारा कि उसे सूली पर चढ़ा दिया जाए और उन लोगों के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया जाए जिन्हें पापी माना जाता था? यही हमें पता लगाना चाहिए। बेरोजगारी के लिए या आपको भौतिक लाभ के लिए नहीं, क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है कि, “एक धनी व्यक्ति कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता है।”

तो लोगों को नौकरी दिलवाने के लिए या उन्हें कुछ दिलवाने हेतु  … एक विकलांग व्यक्ति था, और “एक विकलांग व्यक्ति की मदद की जानी चाहिए, और यह चर्च का काम है।” और यही वे वर्णन कर रहे थे, कि कैसे वे इस देश में विकलांग लोगों की मदद कर रहे थे !!

तो चूँकि,  उन्होंने कुछ लोगों को निरोगी किया, इसका मतलब यह नहीं है कि ईसा-मसीह विकलांग अस्पतालों और इस तरह की चीजों की देखभाल करने आये थे! लेकिन वह इस धरती पर हमारे अस्तित्व में एक नई जागरूकता की शुरुआत करने के लिए आए थे। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब मनुष्य को यह पता नहीं था कि शाश्वत जीवन क्या है, आत्मा क्या है, जिसे हम ‘आत्मा’ कहते हैं। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कुछ होता है। उनका जन्म ऐसे स्थान पर हुआ था, जहां वे उस तर्ज पर नहीं सोचते थे।

और यद्यपि भारत में, हम कह सकते हैं कि लोग बहुत पहले से आत्मा और परमात्मा के बारे में सोच रहे हैं; लेकिन उन्होंने भी कुछ हासिल नहीं किया क्योंकि भारत के ये सभी तथाकथित धर्मगुरु धन इकट्ठा करने में व्यस्त थे। तब ईसा-मसीह दृश्य में आये, तुम देखो। और वे थे – मुझे नहीं पता कि उनके पास किस तरह के मंदिर थे या वे किस तरह की पूजा करते थे, या ईश्वर के बारे में उनके क्या विचार थे क्योंकि वह दो हजार साल पहले प्रकट हुए थे। और उसी समय बौद्ध धर्म भी भारत में फैल रहा था। और ये सब बातें, यदि आप सामूहिक रूप से देखें, तो लोगों द्वारा बुद्ध का इस प्रकार उपयोग करते हुए देखना बहुत परेशान करने वाला है। और यह आवश्यक था कि, मसीह इस पृथ्वी पर आएं और उन्हें बताएं कि यह ‘ आत्मा ‘ है जिसे आपको खोजना है। आपको अन्य चीजों के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन यह आत्मा है जिसका पुनर्जन्म होना है। आपको पुनर्जन्म लेना है। आपको ईसाई होना है। और इसी तरह हम इस धरती पर आए। परन्तु वह बेथलेहेम की सीमा को पार नहीं कर सके। मेरा मतलब है, वह बिलकुल पूरी तरह से, हम कह सकते हैं – लोगों की अज्ञानता के कारण उस स्थान पर पूरी तरह से दरवाज़े में बंद हो गये थे। जब तक वे जीवित रहे तब उनका संदेश कभी नहीं फैला।

तो उनका उद्देश्य इस पृथ्वी पर, आज्ञा चक्र पर आना था, जैसा कि आप जानते हैं, इसे खोलना, और हमारी जागरूकता को एक नया आयाम देना जिससे हम वो समझने की कोशिश करते हैं जो कि कृष्ण ने कहा था, “नैनं छिदंति शस्त्राणि, नैनम दहति पावाका:।” कृष्ण ने कहा था कि, “आत्मा को नष्ट नहीं किया जा सकता, इसे मारा नहीं जा सकता, इसे मिटाया नहीं जा सकता, इसे उड़ाया नहीं जा सकता।” “न चैनं क्लेदयंत्यपो, न शोस्यति मारुतः।” “इसे किसी भी हवा से शोषित नहीं किया जा सकता है।” और जब कृष्ण ने ऐसा कहा तो लोगों ने पूछा, “यह कैसी आत्मा है? वह आत्मा कहाँ है? आप किस बारे में बोल रहे हैं? यह कौन सा है?” तो ईसा-मसीह इस धरती पर आये, चूँकि वह सार तत्व हैं और उन्होने अपने पुनर्जीवित हो उठने के द्वारा प्रदर्शित कर दिखाया कि आत्मा मरता नहीं है। और जो कृष्ण ने कहा था वो उन्होंने स्पष्ट रूप से कर दिखाया, क्योंकि, आप जानते हैं, वह कृष्ण के पुत्र थे, और इस तरह उन्होंने ऐसा किया। लेकिन इससे पहले कि वह पूरी बात इंसानों को दे पाते, उन लोगों ने उसे सूली पर चढ़ा दिया। और इसी तरह से उन लोगों ने उनका आदर किया और इसी तरह से वे उनसे पेश आए।

अब सहज योग में भी, हमें यह जान लेना चाहिए कि यदि आप सहज योग में जाते हैं, तो ऐसा नहीं है कि आप सहज योग पर अहसान कर रहे हैं। आप देखिए, जब ईसा-मसीह नहीं रहे हैं तब कोई एक व्यक्ति आज इस तरह की बातें करता है। वह, “ईसा-मसीह इस धरती पर आए, यह उनकी विनम्रता थी,” क्योंकि आप समझते हैं कि वह कितने महान थे। मेरा मतलब है, कम से कम, आप ऐसा प्रदर्शित करने की कोशिश तो करें कि आप समझते हैं, फिर आप ऐसा कह सकते हैं। लेकिन जब आप सहज योग पर आते हैं, तो आपको लगता है कि सहज योग ने आपको उपकृत करना चाहिए न कि आप सहज योग के प्रति उपकृत हैं।

[भाग 2]

…अपनी आध्यात्मिकता के बारे में स्वयं को पूरी तरह से नम्र करने की संस्कारबद्धता क्योंकि, यह परमात्मा की कृपा है जिसकी चाहत होनी चाहिए। और किसी की कृपा पाने के लिए आप ज़बरदस्ती नहीं कर सकते। आप इसका आदेश नहीं दे सकते। आप इसके लिए मांग नहीं कर सकते। आप यह नहीं कह सकते कि, “मैं इतना बड़ा राजा हूं”, और ऐसा कुछ, “तो कृपा मुझ पर आनी चाहिए।” नहीं, यह आपके पास बिल्कुल नहीं भी आ सकती है। आप इंग्लैंड के चर्च के सर्वोच्च पुजारी भी हो सकते हैं, फिर भी आप परमात्मा की कृपा नहीं भी पा सको। ईश्वर की कृपा पाने के लिए प्रार्थना करनी पड़ती है, विनम्र होना पड़ता है।

यह ऐसा है जैसे हम राजा के महल में जाने की उम्मीद करते हैं और फिर हम चाहते हैं कि राजा आगे आए, वह घुटने टेकें, और वह आपको हाथ से पकड़कर सिंहासन पर बैठाए! मेरा मतलब है, यह कुछ बेतुका है! हम इसे समझ सकते हैं। लेकिन उससे भी बढ़कर एक अवतार है। एक अवतार पूरी विनम्रता के साथ प्रकट होता है, अपमानित होने के लिए नहीं, बल्कि आपको यह समझाने के लिए कि आखिरकार एक अवतार आपकी मुक्ति और आपके आध्यात्मिक विकास के लिए आया है। तब आपको बड़े समर्पण और बड़ी विनम्रता के साथ इसे स्वीकार करना चाहिए।

लेकिन सामान्य मनोभाव, आपने देखा है कि सहजयोगी आने से पहले और आने के बाद, वे कैसा महसूस करते हैं कि सहज योग के प्रति अन्य लोग कैसा व्यवहार कर रहे हैं। उनमे इसके प्रति कोई विनम्रता नहीं है। वे सोच रहे हैं, “ओह, हम आएंगे और माताजी का आंकलन करेंगे। हम देखेंगे कि वह कैसी है। हम उनकी निगरानी करेंगे और हम यह करेंगे, या हम आकर देखेंगे कि सहजयोगी इस तरह हैं।” वे कभी इस विचार के साथ नहीं आते कि उन्हें इसे खुद अपनी विनम्रता से प्राप्त करना है, चूँकि उन्होंने इसके लिए कहा है, इसलिए वे इसे प्राप्त करने जा रहे हैं। इसके विपरीत, वे बहुत अजीब व्यवहार करते हैं। इसके बावजूद उन्हें मिलता है। इसके बावजूद, उन्हें उनका बोध मिलता है। इसके बावजूद उन्हें बाकी सब कुछ मिलता है।

लेकिन किसी व्यक्ति को यह जानना चाहिए, किसी न किसी तरह आपको आने वालों को बताने की कोशिश करनी चाहिए|  अब आप यहाँ आते रहने वाले हैं, आप देखिए मैं यहाँ नहीं रहूँगी, और वे आपसे मिलने आएंगे, आपका पता बहुत से लोग जानते हैं, तो आप उन्हें बताएं कि, “हमें इस बात का अहसास करना होगा कि,  अगर हमें कुछ पाना है तो अपनी विनम्रता से अपने ही भीतर एक क्षेत्र (स्थान)बनाया जाना चाहिए।” जैसे गंगा में पत्थर डालो तो पानी नहीं मिलता। लेकिन अगर आप घड़े हैं, अगर कोई ऐसा स्थान है जो उस पानी को अपने अंदर समा सकता है तो ही आप गंगा से पानी भर सकते हैं। अब, यदि आप गंगा में जाकर उससे कहें, उसे गाली दें और कहें, “ओह, तुम गंगा, मेरे घर चलो!” क्या वह आपके घर आएगी? उसी तरह किसी भी व्यक्ति को अवतार या ईश्वर का आशीर्वाद, या ईश्वर की कृपा को समझना होगा। हमें इसके लिए प्रार्थना करनी होगी और इसके लिए विनम्र होना होगा।

उनके पास सभी अनुष्ठान हैं। उदाहरण के लिए – यदि आप चर्च जाते हैं, तो वे कहेंगे, “घुटने टेको” और यहां तक ​​कि पुजारी भी कहेगा, उसके सामने घुटने टेक दो। हालांकि वह एक आत्मसाक्षात्कारी या कुछ नहीं भी होगा, कैंटरबरी का यह बिशप या आज बोलने वाला कोई व्यक्ति, वह एक आत्मसाक्षात्कारी नहीं है, उसकी कुंडलिनी बस जमी हुई है। लेकिन जिस तरह से हर कोई उनके सामने बेहद विनम्र था। वह कभी इसके लायक नहीं था, मेरे अनुसार, वह कभी भी इसके लायक नहीं है, लेकिन हम ऐसा करेंगे। लेकिन एक अवतार के प्रति न केवल आप उसके प्रति विनम्र नहीं हैं, बल्कि हम बेहद अपमानजनक, असम्मानजनक हैं और हम क्रूस पर चढ़ाते हैं। हमें उस मानव स्वभाव को देखना होगा। यह कितना भयानक काम है और अगर ऐसा अक्सर किया जाता है तो भगवान का कोप आना ही है, हम इसे रोक नहीं सकते क्योंकि हम जिस तरह से व्यवहार कर रहे हैं और जिस तरह का हमारा इस के प्रति दृष्टिकोण हैं।

अब, क्राइस्ट के बारे में सोचें, वह कैसे बनाया गया था, जैसा कि आपने देवी महात्म्यम, महाविष्णु चरण में देखा है, कैसे उन्हें विशेष रूप से स्वर्ग में उत्पन्न किया गया था, और फिर उन्हें कैसे लाया गया। आपने इसे देवी महात्म्यम में उनकी उत्पत्ति के बारे में पढ़ा है। उन सभी बातों के साथ जो उनके साथ की गई, वे सभी शक्तियां जो उन्हें दी गई थीं, और विशेष रूप से इस धरती पर अवतरित होने के लिए, एक सामान्य इंसान की तरह जीने के लिए कहा गया था। जैसे, यदि आप किसी राजा को झोंपड़ी में या किसी ऐसी जगह जो मानव अस्तित्व के योग्य भी नहीं हो जाकर रहने के लिए कहो, यदि तुम किसी राजा को जाने और रहने के लिए कहो, तो यह बहुत कठिन होगा| लेकिन वे करते हैं, उन्होंने किया है। और जब वे यहां आते हैं, तो लोगों का रवैया पूरी तरह से समर्पण करने वाला होना चाहिए; परमेश्वर का धन्यवाद करने के लिए कि आपने हमारे लिए यह किया है। कृतज्ञता। और कृतज्ञता आनंद का मार्ग है, और कोई उपाय नहीं है। हमें सब कुछ मिलता है लेकिन हम कभी धन्यवाद नहीं देते। हम शिकायती स्वभाव के हैं।

आज कृतज्ञता का दिन है कि उन्होने अपने इकलौते पुत्र को भेजा, जैसा कि हम कहते हैं, और वह स्वयं इस धरती पर कितनी बार आये, और उनके यहां अवतरित होने से, धरती पर उनके इस स्वरुप के अवतरित होने से हमें कैसे मदद मिली है। कृतज्ञता यदि आपके पास नहीं है, तो आप उस आनंद को कभी नहीं देख पाएंगे जो आपके पास है – जो कुछ भी आपको मिला है, जो कुछ भी भगवान ने आपको अपनी कृपा से, अपनी करुणा से, अपने प्रेम से दिया है। एक सेकंड भी गंवाए बिना हर समय उनका धन्यवाद करें। यह केवल कृतज्ञता है। और जब तुम उसे धन्यवाद दोगे, तो तुम्हारे भीतर आनंद की लहरें उठेंगी। चूंकि जो हमें मिला है उसके लिए हम उसका धन्यवाद करना नहीं जानते। हमारे भीतर कोई आनंद नहीं है और हम आनंदहीन लोग हैं, हम बहुत दुखी हैं। हमारे पास जो कुछ भी है, हम उससे खुश नहीं हैं।

तो, बात यह है कि, क्या हमने उसे धन्यवाद दिया है? जो कुछ भी उसने हमें दिया है उसके लिए क्या हमने उसे अपने जीवन के हर पल में धन्यवाद दिया है? बहुत बड़ी बात यह है कि, सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने हमें बोध दिया है, और उन्होंने हमें सहज का मार्ग दिया है जिसके द्वारा हम अब स्वयं को पूरी तरह से खोज सकते हैं।

और दूसरी बात यह है कि जब तक ऐसा नहीं किया जाता है, हम इस दुनिया में कुछ भी उत्तम नहीं कर सकते हैं, कुछ भी परिपूर्ण नहीं किया जा सकता है। आपके सभी संस्थान, आपके सभी प्रयास अपूर्ण होने जा रहे हैं। मनुष्य को पूर्ण होना है और उसे ठीक होना है और उसके लिए केवल सरल बात है विनम्र होना। नम्रता से झुकना ही एकमात्र तरीका है जिससे आप इसे प्राप्त कर सकते हैं। इसके बारे में बहस करना, इसके बारे में बात करना, या किसी पर थोपना  – ऐसा कुछ भी कोई तरीका नहीं है  – लेकिन आप अपने आप में कितने नम्र हैं, यह बात है।

हमेशा अपने हृदय में देखो, नम्र हो जाओ, नम्र हो जाओ, और नम्र हो जाओ। और धन्यवाद, हर पल, हर मिनट। और यही वह कुंजी है जो हर पल में से आनंद को जगाती है। हर पल में आनंद का सागर है लेकिन इसे जागृत करने  के लिए आपको जो कुछ भी मिला है उसके लिए आपको धन्यवाद देना चाहिए। लेकिन अगर आप एक कुढ़ने वाले टाइप के हैं, हर समय अगर आप सोचते हैं कि, “ओह, मुझे यह नहीं मिला, मुझे यह नहीं मिला, मुझे वह नहीं मिला,” तो आपके पास जो कुछ भी है उसका आप कभी भी आनंद नहीं ले सकते। और हर किसी के लिए क्रिसमस के लिए यही संदेश है: कि क्रिसमस कृतज्ञता का दिन है क्योंकि उन्होने आपको अपना इकलौता पुत्र दिया और वह एक अत्यंत विनम्र व्यक्ति के रूप में, एक बहुत ही विनम्र निवास में, एक बहुत ही विनम्र जन्म में आया। और यह एक ऐसी चीज है जिसे हमें जानना चाहिए, कि हमें जो कुछ मिला है, भौतिक, शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से, इसके अलावा जो कुछ भी हमने सीखा है,  उसके लिए हमें आभारी होना चाहिए। जबकि वह पूरी गरीबी में रहे, उनके भीतर पूर्ण कृतज्ञता के साथ।

तो, परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!

मैं इस घर के लिए बहुत आभारी हूं कि मेरे बच्चों को यह मिला है। मैं बहुत आभारी हूं कि मेरे बच्चे यहां हैं और वे आनंद ले रहे हैं।

मैं बहुत आभारी हूं कि मैं उनके साथ हूं और आपकी समस्याओं का समाधान हो गया है।

मुझे नहीं पता कि इस सब के लिए, आपने जो प्यार दिखाया है, और जो खूबसूरत चीजें आप सोच रहे हैं और गा रहे हैं, और जिस तरह से आपने  सहज योग को अपनाया हैं और इसके लिए काम कर रहे हैं, उसके लिए मैं कैसे धन्यवाद दूं। इसका कोई अंत नहीं है!

लेकिन आप भी हर समय धन्यवाद देकर इसका आनंद लीजिये।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!