Makar Sankranti Puja

मुंबई (भारत)

1979-01-14, Sankranti Puja 1979, Mumbai

श्री माताजी निर्मला देवी

आशा है आप लोग यहाँ सत्य के खोज मैं आये होंगे.

मैं आपसे हिंदी में बातचीत कर रही हूँ. कोई लोग ऐसे हों की हिंदी बिलकुल ही नहीं समझते हैं तो फिर अंग्रेजी में बातचीत करूंगी. ….ठीक है.

सत्य की खोज में मानव ही रह सकता है,… जानवर, प्राणी नहीं रह सकते. उनको इसकी ज़रुरत नहीं होती. मनुष्य को ही इसकी ज़रुरत होती है की वो सत्य को जाने.
मनुष्य इस दशा में होता है जहां वो जानता है की कोई न कोई चीज़ उससे छिपी हुई है. और वो पूरी तरह से ये भी नहीं समझ  पाता है की वो संसार में क्यों आया है. और वो इस उधेड़बुन में हर समय बना रहता है, कि “मेरे जीवन का यही लक्ष्य है कि मैं खाऊँ पियूं और जानवरों जैसे मर जाऊं ? कि इसके अलावा भी कोई चीज़ सत्य है ?”

सत्य का अन्वेषण मनुष्य के मस्तिष्क में ही जागृत होता है .

लेकिन सत्य के नाम पर जब हम खोजते हैं तो हम न जाने किस चीज़ को सत्य समझकर बैठते हैं .
जैसे कि, जब मानव कुछ सोचने – विचारने लग गया , तो उसने संसार की जितनी जड़ चीज़ें थीं , उधर अपना ध्यान लगाया . यानी यहाँ तक, आज वो चाँद पर पहुँच गया .
कौन सा सत्य मिला उसे चाँद पर ? साइंस की खोज की उसमें उसे कौन सा सत्य मिला? जिन लोगों ने science की खोज करके अपने को बहुत प्रगल्भ समझा है, advanced समझा है, जिन्होंने समझा है की हमने संसार को काबू में कर लिया है साइंस के बलबूते, …..आज उनके देशों में जाकर के आप देखिये , एक-एक घर टूट  रहा है, एक-एक बच्चा रो रहा है ,  इतनी दारुण दशा है वहां ….. क्योंकि अब तो मैं कई वर्षों से रह रही हूँ लन्दन में , आप जानते हैं लन्दन शहर के अन्दर कहा जाता है कि हर हफ्ते  दो बच्चे माँ-बाप मार डालते हैं, और ये बच्चे ऐसे कोई अनैतिक बच्चे नहीं होते. बच्चों को मारने तो वहां पर एक प्रघात सा ही पद गया है . कोई माँ-बाप को मार डालता है.  कोई बुड्ढों को मार डालते हैं . कोई पति  पत्नी को मार डालता है कोई पत्नी पति को मार डालती है .  और जब किसी को मारने को नहीं मिलता तो अपने को मारते बैठते है. स्वीडन में न जाने लोग….जहां पर कि सबसे ज्यादा, सबसे अधिक सुभात्ता है,  वहां सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं . इस तरफ हमारी दृष्टि नहीं जाती, हम अपने को बड़ा develop डेवेलोप कर रहे हैं, हम लोग ये नहीं सोचते की किस शक्ति को इन्होनें पाया है, ये  लोग आत्महत्या करने पर ही तुले हुए हैं. सब तरह की सुभात्ता होते हुए भी इनके यहाँ हिप्पी जैसे लोग अपने को हर दिन मिटा रहे हैं, ख़त्म किये जा रहे हैं.

और ये वो जान गए हैं कि हमें अभी सत्य तो मिला नहीं, पर सत्य की जगह बड़ा भारी कोई असत्य हमने पा लिया.  इस आधुनिक काल में हिंदुस्तान में मेरी बात ज़रूर अजीब सी लगती है लेकिन विदेश में नहीं. यहाँ मैंने सालों काम इस बम्बई शहर में किया है , लन्दन में एक साल में मैंने जो काम किया है वो बहुत ज्यादा है. आश्चर्य होता है !

हिन्दुस्तानी अभी सोच रहे हैं – भारतीय – कि हम उनके जैसे अगर आधुनिक हो जाएँ,  हमारे रोटी कपडे का अगर सवाल ठीक हो जाये तो हम बहुत ही ज्यादा, “विशेष” हो जायेंगे. रोटी कपडे का सवाल अपने देश में किन लोगों को है?

हर तीसरे घर में भूत विद्या वहां होती है. हर दसवें घरबार वहां pub होता है , जहां शराब पी जाती है. यदि इनके पास पैसा आया भी है, वो शराब और दुनिया भर के गंदे-गंदे व्यसनों में जा रहा है. इतनी भयंकर वहां की चीज़ें हैं की मैं अगर आपको बताऊँ तो आप विश्वास ही  नहीं करेंगे . वहां के कायदे क़ानून पढ़ते ही साथ आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे, जोकि हम यहाँ सोच भी नहीं सकते , और जो हमारे वहां जाते हैं साहब-लोग , वहां से सूट-बूट पहनकर के आकर ये तक भी नहीं बताते  की वहां किस तरह की गंदगी लोगों में फैल गयी है और वहां किस तरह का एक दारुण चित्र बन रहा है.

किस क़दर अश्लील है सबकुछ कि आपको मैं  बता नहीं सकती . माँ के रिश्ते में …मेरे जिव्हा पर ये शब्द आ नहीं सकते, इतनी घृणित है वहां की ज़िन्दगी, जो टूट गयी , बिखर गयी है. उनको देखने के बाद हमें सोचना चाहिए की हम किस चीज़ों की मांगें कर रहे हैं. जिन लोगों ने ये पाया है ..जो घर बैठे पैसा कमाते हैं आज उनके बच्चे आपके देशों में आकर सत्य को खोज रहे हैं, और यहाँ पर भी बड़े से ठग airport से ही उनको पकड़ ले रहे हैं.

काफी ठग लोग भी तैयार हो गए है अपने देश में,   ….ठगों की तो यहाँ अपने देश में,…जैसे मच्छर , खटमल आदि बहुत सारे parasites होते है, उसी तरह धार्मिक-ठग भी बहुत ही निकल आये हैं .

ये सब इसी वजह से होता है की मनुष्य सोचता है जब, कि हमें गर पैसा मिल जाये,  हमारी अगर आर्थिक समृद्धि हो जाये,  तो हम बहुत बढ़िया हो जायेंगे.

इस से बढ़ के असत्य मनुष्य ने कोई नहीं खोजा.

आप इस बात को शायद सोच रहे हों कि माँ हमें इसलिए हमें कह रही है क्योंकि आजकल हम बहुत  हड़ताल यहाँ कर रहे हैं.  इसलिए मैं नहीं कह रही हूँ.  मैं इसलिए कह रही हूँ कि आप इस बात का निदान लगायें कि “आप क्या खोज रहे हैं”. आप शान्ति खोज रहे हैं या अशांति खोज रहे हैं ? उसके तत्व पर आना होगा .  आप के देश में जितनी शान्ति है, मन में आपके अन्दर. ……कि घर में जाइए, वो तो नहीं कि आपकी बीवी भाग गयी,    आपके बच्चे हैं वो ड्रग्स खा के पड़े हुए हैं….उसके अगर “एक हज़ार हिस्सा” भी वहां अगर शान्ति हो, तो ठीक है, आप उनके जैसे बनिए.

लेकिन हमारे ही यहाँ हमारे नेता ही लोग नहीं जानते हैं कि हमारे अन्दर कौन सी विशेषता है .  क्या हमारे देश का विशेष स्वरुप है जिसकी वजह से ये देश आज भी टिका हुआ है.  हमारा देश हमेशा ही माँ का पुजारी रहा, और शक्ति का पुजारी रहा. माँ की पूजा पवित्रता से ही होती है. यानि पवित्रता का पुजारी रहा है . और संसार में सबसे पहले परमात्मा ने पवित्रता स्वरुप श्री गणेश को ही बनाया. हम लोग पवित्रता के पुजारु हैं, न तो हम लोग पैसे इत्यादि के.  ये हमारे देश की धुरी है जिस पर हम चल रहे थे, चलना चाहिए और वो धुरी मिटने नहीं वाली, वो अविनाशी धुरी हमारी बनी हुयी है. कितने ही बेवकूफ आकर इस देश से चले जाएँ, और कितने ही महामूर्ख, हमें कितने भी भूले-भटकावे में दाल दें, तो भी इस देश की धुरी नहीं बदल सकती.  ये सारे संसार की धुरी है..
अब बड़े दुखी जीव यहाँ मैं देखती हूँ, एक से एक . बड़ा आश्चर्य होता है मुझे ! इसका कारण : हमारे पास जो सत्य का पता लगाया गया था, उसके बारे में जो बातें हमारे सामने थीं, वो सब हमने बंद करके रख दीं.