False gurus

Kovalam (भारत)

1979-02-09 False gurus, Kovalam HD, 16' Transcribe/Translate oTranscribe

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धन्यवाद, झूठेगुरु – भारत भ्रमण , ९फरवरी, 1979

…. इन चक्रों में जो देवी-देवता हैं, वो देवत बस सो जाते हैं और भीतर में हानिकारकता बनने लगती है, कैंसर हो जाता है। कैंसर को तब तक ठीक नहीं किया जा सकता जब तक कि आपको अपना आत्म-साक्षात्कार प्राप्त न हो जाए, चाहे आप डॉक्टर हों या कुछ भी। मैं आपको यह बताऊँगी, वह भी इंग्लैंड के एक डॉक्टर हैं। हमने हाल ही में एक कैंसर को ठीक किया है। मेरा तात्पर्य है कि मैं कई कैंसर रोगियों का इलाज कर सकती हूँ परंतु मेरा रुझान ऐसा करने में नहीं है।

मात्र एक चीज़ जो सभी संतों के साथ होगी, यदि वो अब भी गलतियाँ करते हैं, तो वह स्वयं कैंसर हो जाऐंगे। क्योंकि अहंकार, अहंकार बहुत अधिक है, और अहंकार यहाँ अति-क्रियाशीलता से आता है, यह इस प्रकार से फूलता है। और इससे दूसरा भाग जहाँ भावनात्मक पक्ष है, वहाँ पर हमें प्रति-अहंकार होने लगता है। अतएव आप इस प्रकार से जकड़ जाते हैं।

अब पश्चिम में जो हुआ है हमें उसे समझना चाहिए कि आपमें बहुत अधिक क्रियाशीलता थी, आपका अहंकार वास्तव में गुब्बारे की तरह फूला हुआ था और उसने इसे (प्रति-अहंकार को) नीचे दबाया। इसलिए आप इससे परेशान हो गए। आपने मात्र यह कहा, ” यह सब भौतिकवादी विकास नरक में जाए” ! अब, हम भौतिक रूप से विकसित होने का प्रयास कर रहे हैं। आप देखें, भारतीयों को अपनी आँखें खोलनी होंगी, उन्हें इस परिपथ को तोड़ना होगा। वे संपन्न होने और फिर अपने स्वयं के मानदंडों पर वापस आने हेतु उसी परिपथ में जाना चाहते हैं।

इसलिए उन्हें स्वयं में संतुष्टि महसूस करनी चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि किसी भी चीज़ की अति न करें। अति करने से, आप समस्त गतिविधियों से थक जाते हैं, इसलिए आपने कहा, “उस जीवन को त्याग दो!” इस प्रकार आपने उस जीवन को त्याग दिया, ठीक है?  किन्तु उस के द्वारा आप कहाँ पहुंचे? लोलक के एक छोर से आप दूसरी ओर चले जाते हैं। इसलिए आपने दूसरा छोर अपना लिया जिसके द्वारा आप नशा और अन्य चीज़ें करते हैं – और आप स्वयं से दूर चले जाते हैं। यह पलायन है। जैसे यह पलायन है, वह भी पलायन है। किन्तु मध्य में स्वयं का सामना करें।

तो आप सभी बाईं ओर उसी कारण से पकड़ रहे हैं। जबकि भारतीय दाईं ओर अधिक पकड़ रहे होंगे क्योंकि वे अभी विकसित हो रहे हैं,  उन्नति कर रहे हैं ।

उन्नति मात्र आत्मा की होनी चाहिए। एक बार जब आप आत्मा की उन्नति प्राप्त कर लेते हैं,  कृष्ण ने कहा, “योग क्षेम वहाम्यम।” कि पहले आप अपने योग को प्राप्त करें और तब आपके क्षेम की देखभाल होगी ।

परंतु भारतीय, वे संभोग के विषय में संभवतः इन निरर्थक विचारों को स्वीकार नहीं करेंगे, परंतु भौतिक कल्याण के विषय में हमें सीखने के लिए उन्हें रूस से, जर्मनी से, अमेरिका से और इंग्लैंड से लोगों को लाना होगा। अब, आपको इन लोगों को बताना होगा कि इस भौतिक चीज़ ने आपको इस प्रकार का जीवन दिया है – आप इससे तंग आ चुके हैं उनकी जटिलताओं से और यह कि हमारे लोग आपका अनुसरण न करें और उसी गढ्ढे में जाएँ और पुनः कुछ नशे की दवाओं के साथ लौटें।

कल भारतीय बच्चे परमात्मा को त्याग देंगे, जिस प्रकार से आप लोगों ने वहाँ उपेक्षा की है, सभी गिरजा यह कह रहे हैं। क्योंकि मंदिरों में आप देखेंगे कि हर प्रकार की निरर्थक बातें होती हैं!

इसलिए हम एक अति पर हैं कि एक बार  हम हार मान लेते हैं, तो हम पूर्णतया ऐसे मनुष्य बन जाते हैं जो परमात्मा को नहीं मानते। तो इन सबसे बचने के लिए आपको अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। कुंडलिनी के ऊपर उठने से, आत्मा यहाँ सदाशिव, सर्वशक्तिमान ईश्वर के माध्यम से व्यक्त होती है। वहाँ जब यह स्पर्श करती है, गुजरती है, इसके माध्यम से यह आपको पूर्णतया एकीकृत करती है, आपको प्रबुद्ध करती है, और वहाँ सदाशिव का तत्व आपमें, आपके हाथों से चैतन्य के रूप में बहने लगता है। शीतल लहरियाँ आपमें आ जाती हैं। तब, जैसे ही यह घटित होता है सम्पूर्ण यंत्र कार्य करना आरम्भ कर देता है – कि आपकी उंगलियाँ आपको बताने लगती हैं कि दूसरे व्यक्ति के साथ क्या गलत है। आप अपनी उंगलियों पर महसूस करना आरंभ कर देते हैं कि कौन सा चक्र पकड़ रहा है। यहाँ तक ​​कि एक बच्चा भी आपको बता सकता है। यह वही है जो आपके साथ होना चाहिए ।

तब आपको सच्चिदानंद की अवस्था प्राप्त होती है।  ‘सत’  ज्ञान है: आपको अपने बारे में और दूसरों के बारे में ज्ञान मिलता है।  ‘चित्त’ आपका ध्यान है – इतना शक्तिशाली हो जाता है कि आप किसी पर ध्यान दे सकते हैं और व्यक्ति को ठीक कर सकते हैं। आप पता लगा सकते हैं कि उस व्यक्ति के साथ क्या गलत है मात्र उस पर ध्यान देने से। मात्र किसी व्यक्ति पर ध्यान देने से ! यह एक गतिशील संचार की तरह है जो सामूहिक चेतना में स्थापित है। आप बनते हैं, आप बन जाते हैं!  यह वास्तविकता है, व्याख्यान नहीं है। आप वास्तव में सामूहिक रूप से सचेत हो जाते हैं, इस अर्थ में कि आप दूसरों को महसूस करना आरम्भ कर देते हैं। आप जागरूकता की एक ऐसी स्थिति प्राप्त करते हैं जिसमें आप दूसरों के बारे में जागरूक हो जाते हैं, स्वतः ही, तत्क्षण। कोई भी, यहाँ तक ​​कि एक बच्चा भी कह सकता है, ”  हाँ, यह इस व्यक्ति के साथ गलत है। यह पकड़ रहा है, वह पकड़ रहा है। “आप बस बन जाते हैं। यह कोई व्याख्यान या ज़बरदस्ती का मत परिवर्तन नहीं है। यह वही घटना है जो घटित होनी चाहिए। यह वही है जो आपको माँगना चाहिए, न कि किसी प्रकार का मज़ा और कोई मतिभ्रम या किसी प्रकार का कोई वशीकरण, जो चल रहा है।

और आपको पता होना चाहिए कि एक व्यक्ति जो एक धार्मिक व्यक्ति है, वह व्यक्ति जो ईश्वर की बात करता है, उसे बहुत ही नैतिक जीवन जीना होता है, एक उत्कृष्ट व्यक्ति बनना होता है, उसे करुणा और प्रेम से परिपूर्ण होना चाहिए और इन सांसारिक बातों से ऊपर होना चाहिए, उसे आपसे पैसे नहीं लेने चाहिए। मुफ्तखोर एक दिव्य व्यक्ति कैसे हो सकता है?  ये सभी मुफ्तखोर हैं!  उनके लिए पैसा बहुत महत्वपूर्ण है। वे आपका चित्त पैसे की ओर मोड़ते हैं। हर समय वे पैसे की ओर आपका चित्त आकर्षित कर रहे हैं!  आप ऐसे व्यक्ति को नहीं खरीद सकते। ऐसा व्यक्ति राजा होता है! आप ऐसे व्यक्ति को नहीं खरीद सकते। आप ऐसे व्यक्ति को अधिकृत नहीं कर सकते। आप ऐसे व्यक्ति को नहीं सँभाल सकते। वह परे रहता है!

परंतु यह बहुत बड़ी बात चल रही है। लोग एक बड़ी बेसिरपैर की बात बना रहे हैं और आप कह सकते हैं कि एक बहुत बड़ा कारोबार। वे बैठते हैं और पता लगाते हैं कि कैसे प्रचार करना है, एक बड़ा विज्ञापन कैसे करना है, यह कैसे करना है, वह कैसे करना है। और वे इसे कार्यान्वित करते हैं, उन्हें पता है। वे मनोवैज्ञानिक हैं, वे जानते हैं कि आपकी मानसिकता को कैसे सँभालना है। आपके लिए बिना कुछ किए भी वे करोड़पति बन गए हैं!

लोगों का मोह भंग हो जाता है, इसमें कोई शक नहीं। परंतु मान लीजिए, आज के समय में उनके साथ 1000 लोग हैं। उनमें से पाँच, छह, पहले उन का मोह भंग हो जाता है, इसलिए वे बाहर निकल जाते हैं। फिर पाँच, छह भ्रांति मुक्त हो जाते हैं, वे बाहर निकल जाते हैं। पिनांग की तरह, मैं कहूँगी। इस ‘महर्षियोगी’ ने पेनांग में अपना कार्य आरम्भ किया। पेनांग में अब उसने वहाँ जाने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि लोग वास्तव में उसे मार देंगे! क्योंकि वे सभी एक कबाड़ कार की तरह हैं। वह करीब पंद्रह साल पहले वहाँ गया था। वे कबाड़ की कारों की तरह हैं, ऐसे ही बजते रहते हैं। वे ईश्वर का नाम नहीं ले सकते। एक आदमी ने मुझे बताया, वह चर्च के पास भी नहीं जा सकता है क्योंकि वह फड़फड़ाने लग जाता है – एक कबाड़ कार की तरह। यह इस देश में श्मशान विद्या (काला जादू) के रूप में जाना जाता है। आपको अंदाज़ा भी नहीं है कि आप इन लोगों के साथ क्या सामना कर रहें हैं। आपको मात्र इस सनातन को, पूर्ण शाश्वत को माँगना चाहिए। किन्तु आप तो किसी तुच्छ वस्तु की कामना करते हैं – तो जाइए खरीद लीजिए। आपके लिए बाज़ार हैं। लोग गुरु-खरीदारी कर रहे हैं, जाइए कीजिए! यदि वह आपके अहंकार को संतुष्ट करता है, तो आगे बढ़ें! आप बार-बार जन्म लेंगे एक ही जैसे कार्य करते हुए। इससे क्या लाभ है?

यदि आप संत हैं, तो सही बातों को अपनाएँ । मात्र इसलिए कि मैं आपसे धन नहीं लेती और मैं आपके अहंकार को संतुष्ट नहीं करती, आपको सत्य नहीं छोड़ना चाहिए। जो वास्तविक है, वही मैं आपको दूँगी; जिसके लिए आप भुगतान नहीं कर सकते हैं, युक्ति नहीं लगा सकते हैं, जिसे आप अपने प्रयास से प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परंतु अपनी सहजता के माध्यम से आप इसे प्राप्त करने जा रहे हैं। मात्र इसे माँगे !

मैं आपकी माँ हूँ,  मैं आपको सत्य बताने जा रही हूँ। मैं आपको यह नहीं बताने जा रही हूँ, “जाओ और धूम्रपान करो और जो तुम्हें पसंद है वह करो।” इन गुरुओं में से कोई भी कभी नहीं कहता है कि , “आप धूम्रपान मत करो !”  ना ही वे कभी कहते हैं कि, “आप मदिरा मत पिओ !”  अधिक से अधिक वे आपको कहेंगे कि , “आप शाकाहारी बन जाएँ ।” आप लोगों को कमज़ोर बनाने का सबसे अच्छा तरीका है! इस प्रकार का यह अति शाकाहार भी आवश्यक नहीं है। ठीक है, जिन्हें (माँस की) आवश्यकता नहीं है, उन्हें नहीं खाना चाहिए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि एक व्यक्ति आध्यात्मिकता को पा नहीं सकता है यदि वह अन्य चीजों का सेवन करता है; जैसे मोहम्मद साहब एक महान् व्यक्ति थे, क्राइस्ट एक महान् व्यक्ति थे; राम भी क्षत्रिय थे, कृष्ण क्षत्रिय थे ! तो मात्र एक चीज़ जो आप कर सकते हैं वह है अपने भोजन को नियंत्रित करना। भोजन और इन सभी चीजों को नियंत्रित करके आप ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते।आपको अपने सम्पूर्ण धर्म को अपने भीतर नियंत्रित करना होगा। और वह बाद में आ सकता है, एक बार जब आपको साक्षात्कार हो जाता है। तो मेरी शैली सर्वप्रथम आपको साक्षात्कार देने की है, तत्क्षण। आपका उपकरण शुरू करने के लिए, चाहे वह दो लोगों द्वारा, तीन लोगों द्वारा, पांच लोगो द्वारा प्रयोग की गई हो, कैसी भी कार हो, हम इसे शुरू कर देंगे। तत्पश्चात् यह स्वयं ही कार्य करेगी, आप इसे सही करेंगे क्योंकि आपको पता चल जाएगा कि परेशानी कहाँ है। इस प्रकार मेरा कार्य आपको प्रभावित करने वाला है और आपको स्वास्थ्य प्रदान करेगा। इसके द्वारा  सर्वप्रथम आपके भौतिक अस्तित्व को ठीक किया जाता है, स्वाभाविक रूप से, क्योंकि यदि परमात्मा को आपके अस्तित्व में प्रवेश करना है, यदि उसे आलोकित और प्रतिष्ठापित होना है, तो आपके मंदिर को सही करना होगा। आपको अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए। आपको अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए!  तत्पश्चात् आपका मानसिक स्वरूप ठीक होने वाला है। यदि आपकी कोई मानसिक समस्याएँ हैं, मनोदैहिक समस्याएँ हैं, तो उन्हें ठीक किया जाएगा; स्वाभाविक रूप से, क्योंकि मन जो परम का ज्ञान प्राप्त करने वाला है उसे ठीक होना चाहिए और आप भावनात्मक रूप से पूर्णतया प्रेम में स्थित् होने जा रहे हैं, शुद्ध प्रेम में। ना कि इस वासना में कि हर बार जब आप किसी महिला को देखते हैं, तो आपमें उसे पाने की भावना जागृत होती है, हर बार जब आप एक पुरुष को देखते हैं तो आपमें उसे पाने की भावना जागृत होती है। परंतु इस दासता को छोड़कर आप अपने वास्तविक आलीशान जीवन में प्रवेश करें, यही सहजयोग है। जिसके लिए आपको यह समझना होगा कि यह कोई साधारण घटना नहीं है। यह बहुत सूक्ष्म घटना है और यदि यह आपके साथ होता है, तो आपको इसे बनाए रखना होगा और इसे कैसे बनाए रखा जाए और वह सब, हमने इसे कार्यान्वित कर लिया है।

मैंने अपना कार्य एक व्यक्ति के साथ आरम्भ किया है और अब जैसा कि आप जानते हैं, लंदन में, हमारे पास हजारों हैं और वह तीन सौ बहुत अच्छे सहजयोगी हैं जो आपके जैसे ही थे। वे नशीली दवाएं और सब कुछ ले रहे थे। उन्होंने छोड़ दिया है – मैंने उनसे कभी नहीं कहा छोड़ने को –क्योंकि आप स्वयं का ही इतना आनंद लेना आरम्भ  कर देते हैं कि आप बस छोड़ देते हैं। क्योंकि जब चैतन्य अच्छी प्रकार से बह रहा है, तो आप अच्छा महसूस करते हैं और फिर आप अपने हाथ से सभी चमत्कार करना आरम्भ कर देते हैं, कुंडलिनी को ऊपर उठाना, आप स्वयं कर सकते हैं। आप उन्हें आत्मसाक्षात्कार दे सकते हैं। आप कर सकते हो। अब आपको लगा कि आपने यह महसूस किया है? आपने दूसरों के स्पंदन को महसूस किया है। क्या आपको यह महसूस नहीं हुआ?  आपको यह महसूस हुआ, क्या जल रहा था, क्या हो रहा था, है न?  जैसे ही आप इसे देना आरम्भ करते हैं यह सारी संवेदनशीलता आपमें आ जाती है।

अब, अंतर मात्र इतना है कि आप वो मनुष्य हैं जो वास्तव में प्रबलता से इसे माँग रहे हैं और इस का त्याग कर रहे हैं – परंतु आपने हर तरह की निरर्थक बातों में डुब कर अपनी कुंडलिनियों को खराब कर दिया है। इसलिए मुझे उन्हें ठीक करना होगा। जब कि भारतीयों की कुंडलिनी बहुत सुंदर है, वो इसे कुछ ही क्षण में प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु वे इसे पाना नहीं चाहते!

जहाँ दाँत हैं, वहाँ चना नहीं है, और जहाँ चना है, वहाँ दाँत नहीं हैं। भारतीय मात्र तभी आते हैं, जब मैं वहाँ जाती हूँ, वे कहेंगे, “ठीक है,  हमें माँ के दर्शन हुए हैं, अब हम ठीक हैं!”  बस। उनकी दिलचस्पी मेरे दर्शन में है – बस हो गया!  या ज़्यादा से ज़्यादा कोई बीमार है, कोई तकलीफ में है बस इलाज़ करने के लिए! उन्हें आत्मा प्राप्ति में कोई रुझन नहीं है, क्योंकि अब वो स्वयं को विकसित करना चाहते हैं। आप देखिए, आपको स्वयं का सम्मान करना होगा! सांसारिक उन्नति ने आपको कोई शांति नहीं दी, आपको कोई आनंद नहीं दिया, जिसे आप जानते हैं। परंतु वो इसका विश्वास नहीं करते हैं। इस देश में यह इतना महान है कि हम बहुत कम के साथ रह सकते हैं। लंदन में, मैंने देखा है, कि आप कोट पहने बिना बाहर नहीं जा सकते और आपको अपने घर को केंद्रीय रूप से गर्म करना होगा, अन्यथा आप मर जाएंगे। आपको हर समय संघर्ष करना पड़ता है। यही कारण है कि लोगों ने प्राकृतिक समस्याओं को दूर करने के लिए बाहर ध्यान दिया। जबकि इस देश में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसीलिए हमारे देश में ही इन महान् लोगों ने जैसे आदिशंकराचार्य, जैसे नानक, जैसे कबीर, जैसे हाल ही में हमारे शिरडी साईंनाथ और इन सभी लोगों ने जन्म लिया क्योंकि वहाँ आप जंगल में भी रह सकते हैं। आपको अपनी देखभाल पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ आप सब कुछ सरलता से प्राप्त कर सकते हैं।

यही कारण है कि भारतीय इतने धार्मिक हैं। उनका चित्त धार्मिक है, उनकी परंपराएँ धार्मिक हैं, हमने धर्म का आरंभ किया है। परंतु हमें इतनी बड़ी धरोहर मिली है, किन्तु हम किसकी ओर देख रहे हैं? अमेरिका और रूस की?  जाओ और स्वयं देखो कि वो कैसे हैं, तत्पश्चात आप कभी भी उनके लिए तत्पर नहीं होंगे। हमें आदिशंकराचार्य की ओर देखना होगा, हमें अपने नानक और हमारे महान संतों की ओर देखना होगा, जो पूर्ण आनंद, शांति और प्रसन्नता में रहते थे। वह हमारी धरोहर हैं। हम इन भयानक चीज़ों जैसे कैसीनो और अन्य चीज़ों में जाने और खेलने के लिए नहीं हैं। इससे कोई आनंद नहीं मिलता, अन्यथा वो(विदेशी साधक) यहाँ क्यों हैं ?

हमें अपना स्वयं का प्रकटीकरण करना होगा, स्वयं को व्यक्त करना होगा, हमारी अपनी छवि जो वास्तव में मात्र आत्म साक्षात्कार पर आधारित है और कुछ भी नहीं है। हमें इस बात पर गर्व करना चाहिए कि हमें यह धरोहर मिली है और जब तक आप स्वयं ऐसे नहीं होंगे तब तक वो आपका सम्मान नहीं करेंगे।

इसलिए भारतीयों के लिए भी, एक भारतीय होने के लिए बहुत कुछ सीखना होगा, जो कि उन्हें पहले से ही मिल गया है। ये सभी संत हैं, वास्तव में वो संत हैं, मेरा विश्वास करो, वो संत हैं, परमात्मा की खोज़ करने के लिए पुनर्जन्म लिया है। परंतु उन्हें भटकाया जाता है और ठगों के साथ जो मात्र आपके देश से ही वहाँ गए हैं, इसलिए आप यह देखने के लिए उत्तरदायी हैं कि आप उन्हें प्रेम दें और उन्हें पुनः सामान्य स्थिति में लायें ।

मैं चाहूँगी कि आप कुछ समय के लिए उन गाँवों का भ्रमण करें, जहाँ मैंने बहुत कार्य किया है। मुझे प्रचार नहीं चाहिए, इसीलिए मेरा इतना प्रचार भी नहीं है। शहर मेरे लिए व्यर्थ है। शहर रजनीश जैसे लोगों और ऐसे सभी के लिए है जो वहाँ जाकर अपना बैग भर सकते हैं, शहर के लोगों के पास जितने भी पैसे है उससे!

मैं गाँवों में जाती हूँ और गाँवों में, आप चकित होंगे, कि वे आपको कैसे आत्मसात करेंगे। क्योंकि आप स्वयं में विलीन हो जाते हैं और वे स्वयं में विलीन हो जाते हैं, इसलिए आप पूर्णःतया एक हो जाते हो!  आप पूछ सकते हैं – ये लड़के गये थे– कि वे किस प्रकार उनके साथ नाच रहे थे ,कूद रहे थे ,उन्हें प्रेम कर रहे थे ,उन्हें चुंबन दे रहे थे।

ये सभी झूठे विचार, निरर्थक विचार, यह फ्रायड, जिसने आदमी को आदमी से, औरत को औरत से, आदमी से औरत को, पति से पत्नी को, बच्चों से माँ को अलग किया। यह सब निरर्थक व्यक्ति, ये फ्रायड अबोधिता पर एक और हमला था और आपने उसे इतनी तत्परता से स्वीकार कर लिया। यही कारण है कि ऐसे लोग, जैसे कि ये यौन क्रिया विशेषज्ञ जैसे भयानक लोग आपके पैसों पर पनप रहे हैं। किसी भी भारतीय से पूछें कि क्या उन्होंने  ’कामसूत्र ’ का कुछ पढ़ा है या वे चाहते हैं? इनमें से कोई भी नहीं!  देखा, आबोधिता यहाँ अभी खोई नहीं है। वो, जो मैं कह रही हूँ, उसका आधा भी नहीं समझ पाएंगे। वो बहुत सरल हैं। यदि आप उनसे बात करेंगे तो आप आश्चर्यचकित ही जाएँगे। आपने स्वयं को बिना किसी कारण जटिल कर दिया है। तांत्रिक विद्या इस देश के गंदे नाले हैं। उस गंदे नाले के माध्यम से हमारे पास मत आना! मुख्य दरवाजे से हमारे पास आओ तब आपको पता चल जाएगा कि गंदे नाले का क्या अभिप्राय है, ठीक है!

 बहुत-बहुत धन्यवाद! परमात्मा आपको आशीर्वादित करे, चलिए इसे प्राप्त करें। अब आप अपना आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करें और इसमें स्थापित हो जाएँ।