Seminar

(भारत)

1979-03-04 Seminar Hindi, Dheradun, 60'
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Seminar (Hindi). Dheradun, UP, India. 4 March 1979.

परमात्मा सब से शक्तिशाली है देहरादून, ४ मार्च १९७९ आज मैंने आपसे सबेरे बताया था कि कुण्डलिनी के सबसे पहले चक्र पे श्री गणेश जी बैठते हैं, श्री गणेश का स्थान है और श्री गणेश ये पवित्रता के द्योतक हैं। पवित्रता स्वयं साक्षात ही है। वो तो पहला चक्र हुआ। और ये चक्र जो है कुण्डलिनी से नीचे है वो कुण्डलिनी की रक्षा ही नहीं करता है, लेकिन वो लोग जो कुण्डलिनी में जाते हैं उनसे पूरी तरह से सतर्क रहते हैं। इस रास्ते से कोई भी कुण्डलिनी को नहीं छू सकता है। आज सबेरे मैंने आपसे बताया था कि इस रास्ते से जो लोग कोशिश करते हैं वो बड़ा ही महान पाप करते हैं। हालांकि उससे थोड़ा बहुत रुपया-पैसा कमा सकते हैं। लेकिन अपने लिए जो पूँजी इकठ्ठी करते हैं, वो सारी ही एक दिन बहुत कलेशकारी हो जाती है। जो दूसरा चक्र है, जिसे मैंने स्वाधिष्ठान चक्र आपसे बताया था । इससे हम विचार करते हैं क्योंकि जब हम बुद्धि से विचार करते हैं, जब हम अपने दिमाग से विचार करते हैं, उस दिमाग की जो मेध है इसे फैट ग्लैड्यूस कहते हैं, जो चर्बी है, वो चर्बी पेट की चर्बी से बनती है। पेट की चर्बी को ये चक्र सर की च्बी बनाता है इसलिए विचार करते वक्त, इस चक्र पर बहुत जोर पड़ जाता है। और जब विचार करने की आपको आदत लग जाती है, जैसे की आजकल के आधुनिक लोगों को विचार करने की आदत एक बीमारी है। तब तो ये काम इतना ज्यादा इसे करना पड़ता है कि इसके कारण जो बचे हुए बाकी के काम हैं, वो सब बिगड़ने लग जाते हैं। जैसा मैंने कहा था कि डायबटीस इसी कारण हो जाता है क्योंकि पैंक्रियाज भी इसी से संचालित होता है। और क्योंकि ये चक्र दूसरी चीज़ में व्यस्त हो जाता है, जो दूसरी कार्य की उसकी जगह है, वो कमजोर हो जाती है। उसमें से एक पैंक्रियाज भी है, उसमें से स्प्लीन भी है, लीवर का उपरी हिस्सा भी है, किडनी भी है। इसलिए अति विचार करना और अति प्लानिंग करना कोई बड़ी अच्छी चीज़ नहीं शरीर के दृष्टि से और समाज की दृष्टि से भी कोई बहुत अच्छी चीज़ नहीं है। क्योंकि मनुष्य अधिक विचार तब करता है जब वो परमात्मा को नहीं मानता। एक हद पर जाने पर परमात्मा पर ही छोड़ देना ही चाहिए। देवी महात्म्य में लिखा है, ‘संकल्प विकल्प करें।’ जैसे भाईसाहब हैं, आप कहीं कार्य से जा रहे थे | आपने पूरा प्लानिंग कर दिया, रास्ते में एक्सिडेंट हो गया। आपके हाथ में चोट आ गयी तो आप जा नहीं पाए । काम होने का था वो हो गया। जो होना था बन गया। बहुत ज्यादा आपने प्लानिंग भी किया समझ लीजिए और आप टाइम पर नहीं पहुँच पाए तो काम नहीं होता है। इसलिए संकल्प नहीं करना चाहिए किसी चीज़ का कि हम ये करके ही दिखाएंगे या होना है, उसमें विकल्प आ जाता है। जब आप परमात्मा के साम्राज्य में आ जाते हैं, तो उसके तरीके चलते हैं, आपको पूरा पता हो जाता है कि कहाँ चलना है, कहाँ जाना है, कैसे करना है क्योंकि उसका प्लानिंग चलता है ना। अगर भाई साहब हमारे पार हो गए होते, समझ लीजिए, तो कभी भी उस रास्ते से नहीं जाते| उस वक्त वो जाते ही नहीं, ये होगा आप देखिएगा। आप अपने लिखते जाइएगा कि जबसे जो लोग पार हो गए हैं उनके ये अनुभव हैं कि एक्सिडेंट हो भी गये तो भी किसी को चोट नहीं लगी। पूरी तरह से बच गए और बहुत से लोग तो जाते ही नहीं हैं। कुछ देर हो जाती है, कहीं कुछ और हो जाता है और पहुँच नहीं पाते। ये पार होने का बड़ा भारी आशीर्वाद है कि अब आप परमात्मा के साम्राज्य में आ गए हैं जैसे कि आप की गवर्मेंट आपको देखती है, आपकी देखभाल करती है। जब आप परमात्मा के साम्राज्य में आ जाते हैं तो परमात्मा आपकी देखभाल करते हैं। उनकी गवरमेंट आपकी देखभाल करती है । इस तरह से जीवन की जो दुर्घटनाएँ हैं, जिसे हम दुर्घटना कहते हैं, वो avoid हो जाती हैं। असल में हर अच्छे आदमी के पीछे सटेनिक फोर्स लगे रहते हैं । जीवन में भी आप देखते हैं कि कोई शरीफ आदमी है उसके पीछे सटेनिक फोर्स लगे रहते हैं, उससे कोई बचाव करने का तरीका नहीं है। इसका एक ही तरीका है कि परमात्मा के आँचल में घूस जाओ। ये सब सटेनिक फोर्सेस हैं, जिसकी वजह से आप सब लोग तकलीफें उठा रहे हैं । ये आपके पीछे हाथ धो कर लगे हैं। आपको परेशान कर रहे हैं। इनसे बचने का तरीका आपके पास कोई भी नहीं क्योंकि वो बड़ी सूक्ष्म है। उसकी शक्तियाँ इतनी सूक्ष्म होती हैं कि आप देख नहीं पाते कि कब झपाटा मार दे, कब तंग कर दें, कब परेशान कर दे। उसको आप समझ भी नहीं सकते लेकिन वो असर कर जाती है। जब असर कर जाती है तब आप खड़े होते

हैं कि साहब हम को इसका पता ही नहीं था कि ऐसे हो जाएगा। तो उस से रक्षा करने के लिए परमात्मा का आँचल जब आप के उपर रहेगा तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि आपको कोई तकलीफ हो । जिस वक्त मृत्यू होनी है वो तो होती ही है। यह बात और है लेकिन आदमी जब पार हो जाता है तब उसकी मृत्यु नाक, मुँह से नहीं होती, सहस्त्रार से होती है। उसके मूँह से, नाक से खून नहीं आता । अभी तक हमारे सहजयोग में आपको आश्चर्य होगा सिर्फ एक या दो आदमी मरें हैं । हजारों लोगों को हम जानते हैं। वो भी सब सत्तर साल, पचहत्तर साल की उम्र में। एक तो अठानवे साल में मरे हैं और एक तिहत्तर साल को। दीर्घायु भी आप हो जाते हैं। अकस्मात मृत्यु जो होती है, ये सब सटैनिक फोर्स से होती है क्योंकि आपको उनका अन्दाज नहीं होता। वो कभी भी आ कर आप पर अपना हाथ मारती है और इसलिए आप दुःखी होते हैं और सारी चीज़ों को गड़बड़ कर देते हैं। क्योंकि उनका अपना प्लानिंग रहता है। आपने कोई अच्छा ही काम करने का प्लानिंग किया होगा लेकिन वो बीच में हाथ मार ड़रालते हैं। लेकिन अगर आपने पहले से प्लानिंग किया हुआ होगा तो वो आपके मन को पढ़ सकते हैं। जो सटैनिक फोर्सेस होती हैं वो आपके मन को खूब अच्छे से पढ़ लेती हैं। यहाँ तक उनका है कि अगर आप मुझसे कुछ बातचीत करें तो कोई आदमी आपको मिलेगा और बता देगा, मुझे पता है कि माताजी से आपकी क्या बातचीत हुई है। वो आपके मन को पढ़ सकते हैं। फौरन बता देंगे की हाँ आपकी आपस में यह बातचीत हुई है क्योंकि आपने सारा प्लानिंग किया हुआ है आपके मन में। वो आपके मन को पढ़ लेते हैं। उनको पता है कि आप इस रस्ते से ऐसे-ऐसे जा रहे हैं। उनको आपका सारा भेद पता है, वो आप कह सकते हैं। इसलिए उनसे भेद रखना पड़ता है आपको ये पता नहीं होगा कि सटैनिक फोर्सेस संसार में कितनी विद्यमान हैं। ये जितने भी राक्षस लोग अपने को गुरू कहलवाते हैं, यह सब सटैनिक ही तो हैं। इनकी शक्तियाँ, हिप्नोसिस वरगैरेह जो चलती है यह सब सटैनिक, शैतान की शक्तियाँ और इसलिए ये आप पर असर करते रहते हैं। इन शक्तियों को पहचानने के लिए ही आपको सहजयोग में आना ही पड़ेगा। इससे आप समझ सकते हैं कि आपके अन्दर कौनसी शक्ति कहाँ से घुस रही है। किस तरह से आप पे आघात किए जा रही है । किस तरह से आपको वो सताने वाली है। अब डॉक्टर लोग हैं जैसे साइकोलाजिस्ट हैं। वो जानते ही नहीं कि हर पागल आदमी के अन्दर कोई न कोई भूत घुसा हुआ रहता है। वो उसको समझते नहीं है, हम उस पर विश्वास करते हैं बेचारे। और उसका असर उन पर आ जाता है। अब हमारे यहाँ आज ही वो चले गए, जो साइकिएट्रिस्ट आए हुए थे मिलने के लिए । उनको ये नहीं मालूम कि उनसे अपना बचाव कैसे करना है । जैसे समझ लीजिए किसी को टी. बी. की बीमारी हो गयी तो हम लोग उससे बचाव करते हैं कि भाई, वो बीमारी अपने को लग जाएगी। लेकिन ये शैतानी शक्तियों से बचाव करने के लिए हमको कुछ मालूम ही नहीं है । हम तो देख भी नहीं पाते हैं कि कौन-सी शैतानी शक्ति है। हमारे जो बुजुर्ग थे वो इसको जानते थे लेकिन हम लेोग हो गए अंग्रेज जैसा कि मैंने कहा । तो हम लोग इस चीज़ को नहीं जानते कि शैतानी शक्तियाँ संसार में किस तरह से कार्यान्वित होती हैं और किस तरह से हमें परेशान करती हैं। लेकिन इसके बाद परमात्मा के आगे कोई भी चीज़ शक्तिशाली नहीं । सबसे शक्तिशाली चीज़ परमात्मा हैं । जब आप परमात्मा के बन्दे हो जाते हैं तो वो आपको देखता है और आपको सम्भालता है। वैसे भी वो आपको सम्भालते ही रहते हैं । इसलिए छोटी- मोटी चोट लग भी जाएगी। किसी शरीफ आदमी को छोटी-मोटी चोट लग जाएगी -जैसे आपको हो गया। छोटे बच्चों को आप जानते हैं-उपर से बच्चे गिर जाते हैं। कहते हैं उनको देवदूत उठा लेते हैं । खास कर, विशेष कर जो बच्चे प्रबुद्ध होते है, जैसे ये बच्ची है पैदाइशी realised soul है ऐसे बहुत से बच्चे हैं। ये बचपन से बीमार रहेंगे क्योंकि इनके उपर हमेशा शैतानी हमला होता है। | हमारे अन्दर जो लेफ्ट साइड व राईट साइड की जो दो नाड़ियाँ हैं। मैंने आपको बताई थी सबेरे । उससे एक साइड में जैसे लेफ्ट साइड को जब आप जाते हैं, तो आप कलेक्टिव कान्शसनेस माने सामूहिक सुप्त चेतना और अगर आप राइट साइड में आ जाते हैं जो कलेक्टिव सुप्राकान्शस । लेफ्ट साइड में ऐसे लोग रहते हैं-मरे हुए, कलेक्टिव सबकान्शस में कि जो अभी तक तृप्त नहीं है। जो अभी तक तृप्त नहीं हुए और जिनकी आत्माऐं अभी भटक रही हैं लेकिन जो बहुत ही गन्दे किस्म के, छोटे किस्म के चोर-उचक्के हैं ऐसे लोग हैं । दूसरे किस्म के जो लोग होते हैं जो बहुत महत्त्वकांक्षी होते हैं, एम्बिशस लोग होते हैं। जैसे हिटलर स्टाईल के, ये भी दूसरे साइड में अपने होते हैं, कलेक्टिव सामूहिकता में। आज एक साहब ने मुझसे कहा कि ‘आप मुझे मंत्र दीजिए

माताजी।’ जो लोग मंत्र देते हैं बड़े धोखे में आपको रखते हैं, आपको पता होना चाहिए । जैसे आपको किसी ने राम का मन्त्र दे दिया। आप तो कभी पूछेंगे नहीं कि ‘भाई , हमें राम का मंत्र तुमने क्यों दिया ?’ अब आप रटने लग गए राम, राम, राम, राम। अब राम जो हैं वो कोई आपके नौकर तो हैंनहीं। उनको आप बुला रहें, आप पुकार रहे हैं। आपका क्या अधिकार है? सोचने की बात है जब आपको अधिकार ही नहीं है तो आप बुला कैसे रहे हैं? एक छोटी सी चीज़ है-हमारे प्राईम मिनिस्टर साहब जो अभी हैं । उनसे अगर आपको मिलना है, तो क्या आप सीधे उन से जा कर कह सकते हैं कि मोरारजी, हम से बात करिए। उनको मिलने के लिए प्रोटोकॉल होता है। सत्रह जगह आप जाईए-दौड़िए, इनसे मीलिए-उनसे मीलिए; तब मिल सकते हैं। और जो प्राइम मिनिस्टर के प्राइम मिनिस्टर के प्राइम मिनिस्टर हैं-वो इतने झट से मिल जाएंगे आपको कि आप बस पुकारने लग जाएं और वो आ कर हाजिर हो जाएं । हो सकता है राम नाम का कोई नौकर ही हो इधर या उधर फॅसा हुआ जो आपके अन्दर घुस जाता है और आपको एकदम ऐसा लगता है कि वाह भाई मुझे तो बड़ी शांति मिल गयी क्योंकि उसने आपका काम ले लिया। आपके अन्दर आ गया। आपको लगा वाह भाई! मेरा तो काम बड़े मजे से हो गया। ये क्या आपने जाना नहीं कि आपने अपने आप को नहीं खोजा है या कोई दूसरा ही अपने उपर लाद लिया है और ये जो दूसरा लादा हुआ आदमी है उसको आप अपने एक ही शरीर पर लादे चले जा रहे हैं। पाँच-छ: साल बाद आप देखिए आपका शरीर यूँ थर-थर, लट-लटाऐगा और आदमी कमजोर हो जाएगा । इस शक्ति से भी परिचित होने की बड़ी जरूरत है। सहजयोग में आने के बाद जब आप में वाइब्रेशन्स आते हैं तब आप देख सकते हैं कि आसपास में शैतानी शक्तियाँ चलती हैं। और परमात्मा की शक्ति किस तरह से आपको हर चीज़ में कामयाब कराती हुई किस तरह आगे बढ़ती है। किस तरह से वो रास्ता ढूँढ करके और आपको सही रास्ते पर पहुँचाती है ये देखने लायक है। इसके अनेक अनुभव लोगों को आए हैं और आपको भी आएंगे इसलिए आप पार हो लीजिए और इस चीज़ को प्राप्त कीजिए । मैंने आपको नाभि चक्र के बारे में भी बताया था । इस चक्र में हमारी जो खोज है उसके बीज हैं। जब जानवर खाना खोजता है वो भी इसी वजह से। और इन्सान जब परमात्मा खोजता है, वो भी इसी वजह से। परमात्मा को खोजना भी मनुष्य के अन्दर में ही बना हुआ है। इसकी खोज उसके अन्दर है। वो चाहे माने या चाहे ना माने । जब तक वो इसको पूरा खोज नहीं लेगा उसको तृप्ति नहीं आने वाली। वो अपने को भूखा रख लेगा थोड़ी देर, पर उसको चैन नहीं आने वाला। उसको परमात्मा को खोज ही निकालना है । जब वो परमात्मा को खोजने निकलता है तब चारो तरफ से supply भी शुरू हो जाती है। आप जानते हैं किस तरह से लोग संसार में आकर परमात्मा के नाम पर कोई भी चीज़ बेचने के लिए तैयार हैं। और किस तरह से गलत-सलत झूठी चीज़ आपको बेचते हैं और उन के बारे में कुछ भी कहिए, उन लोगों के बारे में कितना कुछ अखबारों में छपता है, लिखा होता है। फिर भी लोग उन्ही के चरणों में चले जाते हैं। क्यों जाते हैं? क्योंकि ये एक तरह की मंत्रमुग्धता है, हिप्नोसिस, एक झूठ है। उस झूठ को मानने लगते हैं और उस झूठ से छूट ही नहीं सकते । बहुत मुश्किल हो जाता है उनको एक झूठ से मुक्ति पाना। इसके चारो ओर आप देख रहे हैं जो हरा रंग आदि बनाया हुआ है-यही भवसागर है। मनुष्य के अन्दर भी ये भवसागर है । इस भवसागर को पार करने के लिए कुण्डलिनी को कोई न कोई सोपान, कोई न कोई ब्रिज बनना चाहिए और उस ब्रिज का बनना सिर्फ सहजयेाग में ही घटित होता है। अगर आप मेरी ओर हाथ किए हुए हैं या आप किसी भी रियलाइज्ड सोल की ओर आप ऐसे हाथ करेंगे तो जो आपके अन्दर में चैतन्य लहरी हैं जो जाती हैं। वो आपके हाथ से गुजर कर के नीचे में वहाँ पर एक सोपान बना देती है। और उस सोपान से ही कुण्डलिनी उपर में चढ़ के आ जाती है। लेकिन अगर इस में कुछ खराबी हो इस सोपान में या आपके नाभि चक्र पे या इसके चारों तरफ फैले हुए इस | भवसागर में जहाँ पर गुरू का स्थान है। अपने यहाँ दस गुरू माने गए हैं, असल में। उसे Primordial Master कह सकते हैं। जिसके बारे में मैंने आज बताया था आपसे, लेकिन झूठे गुरू भी बहत ज्यादा हैं और जिस आदमी ने किसी भी झूठ का पल्ला पकड़ा है उसकी कुण्डलिनी यहाँ से चढ़ती नहीं है, अटक जाती है। उस के दो चक्र पकड़ते हैं, एक नाभि और एक ये । उस पर यदि किसी से पूछा जाए कि आपके गुरू कौन हैं? तो उन्होंने बताया फलाने ठिकाने कोई ढोंगानद। जो भी नाम हो वो ऐसे नाम रखते हैं कि भगवान ही बचाए उनको । फलाने हमारे गुरू हैं। अच्छा, तो कहते हैं आपके गुरू तो ठीक नहीं है जिससे आपकी कुण्डलिनी रुकती है नाभि पर । अब आप हमारे पास पार होने के लिए आए हैं। आए हैं ना? आप अपना इलाज करवाने आए हैं, समझ लीजिए। तो कोई बदपरहेजी अगर आपने की होगी, आपने हमें बताना होगा या नहीं?

आपको अगर डॉक्टर ने कहा कि आपने खट्टा खाया तो इसलिए आपका नुकसान हो गया है। तो क्या आप डॉक्टर से लड़ेंगे खट्टा खाना ही ठीक है ! यह तो पागलपन की निशानी है। लेकिन उस गुरू को लेकर के झगड़ा खड़ा कर देंगे। चलो, एक मिनट के लिए इस बात को मान लें कि हाँ भाई अगर हमारे गुरू ठीक होते, तो हम पार होते । माँ ने कहा है कि जो असल गुरू होगा तो हम तो उसके शिष्यों से पहचानते हैं। उसकी कुण्डलिनी से पहचानते हैं। कि हम तो किसी भी गुरू को नहीं जानते थे जैसे ही कोई हमारे सामने आता था तो हम समझ जाते थे कि ये कौनसे गुरू के चेले आए हुए हैं। जैसे महाराष्ट्र में एक गुरू थे वो बहुत ही अपने को समझते थे। सन्यासी थे। सन्यासी लोगों से हम वैसे ही बड़े अभिभूत रहते हैं। वाह ! वाह! सन्यासी आदमी आ गए तो बस ! संन्यासियों से तो मैं इतना घबराती हूँ कि मैंने आपसे बताया कि सन्यांसियों से तो मैं बहुत बिगड़ती हूँ। कोई सन्यासी अपने सामने आ गया तो लोग सोचते हैं ‘वाह भाई ! इससे बढ़कर कोई नहीं।’ वो सन्यासी का जीवन कैसा है? उसका खान- पान कैसा है ? वह किस तरह से लोगों को खसोटता है, नोचता है यह कोई नहीं देखता है। उसने सन्यासी के वस्त्र पहन लिये बहुत बड़ा आदमी हो गया। उनकी कुण्डलिनी में एक विशेषता होती है कि कुण्डलिनी एकदम उपर चढ़ कर धड़ से नीचे गिर जाती है। उसको बाँधना पड़ता है। सब के एक एक तरीके हैं । इससे आप पहचान सकते हैं कि इनके गुरू कौन हैं। इतने झूठे गुरू संसार में आए हुए हैं कि आपको अंदाज नहीं हैं कि कितने गुरू आए हैं। असल गुरू भी बहुत सारे हैं। में आज एक साहब ने पूछा कि ‘कोई असल गुरू भी है?’ तो मैने कहा ‘हाँ, है।’ अब अमरनाथ एक नागनाथ बाबा है, वो कभी-कभी आते हैं। मेरे लिए आते हैं हमेशा, मुझे मिलने। महाराष्ट्र में हैं गगनगढ़ महाराज। दक्षिण में एक ब्रह्मचारी करके है । वे रहते हैं कालिकोट। वे ब्रह्मचारी हैं। रंगून में एक हैं। ऐसे हैं, काफी सारे लोग हैं। लेकिन वे लोग समाज में नहीं, शहर से बाहर, दूर, जंगलों में। गगनगढ़ महाराज सब से बताते है जब माँ ही आ गयी तो तुम क्यों मेरे पास आते हो। जब हम कोल्हापुर गए तो कहें कि हम जाएं, उपर देख आएं इनको। हमारे शिष्य कहने लगे कि ‘माँ, आप तो सब गुरूओं से, इन सब से बहुत परेशान हैं। उनसे क्यों मिलना चाहती हैं?’ हमने कहा ‘बेटे, जरा वाइब्रेशन्स देखो तो ।’ वो सात मील उपर चढ़ना था । हमने कहा कि ‘हम तो चढ़ के जाएंगे, उन से मिलने।’ तब उन्होंने ऐसे हाथ किया तो उनके सब के हाथों से ठण्डा-ठण्डा आने लगा तो कहने लगे ‘चलिए ।’ जब उपर गए तो देखा कि वे बैठे हुए थे मस्ती में अपने और बहुत नाराज । कहने लगे बरसात हो रही थी और सब भीग गये आप। अब देखिए इन लोगों ने कैसा बरसात पर, सूर्य पर यह सब काम इन्होंने किया है। लेकिन ये रियलायजेशन बहुत कम देते हैं । उन्होंने एक आदमी को रियलायजेशन दिया। मैंने कहा कि ‘ भाई , आपने रियलायजेशन क्यों नहीं दिया और लोगों को?’ तो कहने लगे ‘एक को दिया और कान पकड़े। पच्चीस साल इस पर मेहनत की, हर एक चक्रों पर ।’ बात ये है कि उनको टाइम बहुत लगता है। लेकिन मेरे को तो लगता नहीं न टाइम, मैं तो इसमें माहिर हूँ। लेकिन इनको बहुत टाइम लगता है बिचारों को। कहने लगे, ‘मुझको ही हजारों वर्ष लगे वाइब्रेशन्स पाने में।’ कहने लगे ‘इतनी मेहनत करी। इनका नाम अण्णा महाराज। आप माताजी, कभी देखना आपको पता होगा कि मुझे उनका मुँह भी नहीं देखना।’ कहने लगे कि ‘वो कामिनी और कांचन के पीछे पड़ा हुआ है। रियलायझेशन के बाद सारी शुद्धी के बाद।’ चीज़ों पर कर लिया है। प्रभुत्व उसके बाद एक दिन ऐसा इत्तफाक हुआ कि उनसे (अण्णा महाराज) फोन से कुछ मुलाकात हो गयी हमारी। किसी के यहाँ आए हुए थे। हमें कहने लगे कि ‘ हमारे महाराज जो हैं वो बम्बई आते हैं आपसे मिलने के लिए । उनकी १०८ वर्ष की उम्र है । इनकी जिनकी बता रहे हैं वो कभी छोड़ते नहीं थे अपना तकिया। इनको क्या जरूरत थी आने की?’ मतलब उनके पेट पर पैर आता होगा उनके आने से। वो बहुत नाराज थे अपने गुरू से। तो मैंने कहा कि ‘अच्छा! अब तो हम जा रहे हैं ।’ ऐसा करिए आप कि हम आपको कुमकुम लगाते हैं। हमने उनकी आज्ञा से कुमकुम लगाया । अब आप हमें लगा दीजिए। जैसे ही उन्होंने लगाया तो उँगली उनकी यहाँ चिपक गयी। धक-धक शुरू हुआ और लगे चिल्लाने । कहने लगे ‘माँ माफ कर दो। माँ माफ कर दो ।’ मैंने कहा कि ‘फिर से अपने गुरू के लिए ऐसा कहा तो देख लेना। मुझसे बुरा नहीं कोई। अपना आज्ञा बकवास । शर्म नहीं आती यहाँ औरतों के साथ बैठे हुए हो । इतनी तुम्हारे ऊपर उन्होंने पच्चीस साल मेहनत करी हुई है । चले थे । बत्तमिजी शुरू की उन्होंने। औरतें-वौरतें भी लेकर बैठे हुए तो पूरा पकड़ा हुआ था और क्या बाते करते हो जाओ यहाँ से ।’ बाद में उन औरतों ने बताया उन लोगों से सब से सवा तोला सोना और सवा सौ रुपया सब ले लिया।

उसके बाद मैंने कहा जब वो आए तब उनको सवा जूता मारना, कहना कि हमारी श्रद्धा इससे सवा सौ की है। लेकिन हमारे हाथ दुखेंगे तो सवा जूता तुमको मारेंगे। माने वो तो रियलाईजेशन के बाद भी इतने बत्तमीजी कर गए तब वो रियलाइज्ड ही नहीं हैं जिन्होंने शुरू से यही प्लान कर लिया कि किसको कैसा लूटें? किसको घसीटे? ये तो पक्के चोर बिलंदर हैं । बहुत से लोग जेल से छूटने के बाद भी गुरू बन जाते हैं। आप लोग हैं कहाँ। उससे नाराज होने की कोई बात नहीं। जो असलियत है उसे समझ बैठा है। अगर आप उनका पता लगाए । वाकई में पुलिस लगा दें इनके पीछे में तब तो पता हो जायेगा कि आधे, ५०% लोग जेल से निकले हुए घूम रहें हैं। बम्बई वाले यहाँ आएंगे, यहाँ वाले बम्बई जाते हैं। उस से अच्छा और कौनसा तरीका होता है लोगों को ठगने का । जैसे रावण ने सीताजी तक को ठग लिया। जितनी भी बदसूरत चीज़ हो उसको ढ़कने के लिए बहुत खुबसूरत चीज़ उस पर लगा दीजिए वो ढ़क जाएगी। लें। मैं आपकी माँ, मुझे आपको आगाह करना है। हरेक गली-कुचे में एक-एक गुरू आप से भी बढ़कर विदेश के लोग हैं। बेचारे बड़े सीधे हैं कहते हैं कि वो भगवान हैं। मैंने कहा, “कहने को लगता क्या ? ये जबान है कह दिया।”उन्होंने कहा कि ‘उन्होंने तो पेपर में छपवा भी दिया है।’ मैंने कहा, लगता क्या है उसके लिए! पेपर में पैसा दे दिया, और छपवा दिया।’ मैंने कहा ‘वो कह रहे हैं इसका मतलब हो गया वो सत्य ही है क्योंकि ये लोग इस तरह के हैं कि वो सोचते हैं कि हम लोग भी जो कुछ कहते हैं उसके भी कुछ मायने होते हैं।’ यहाँ तो किसी को कुछ कहने से कुछ लगता ही नहीं। ये जो गुरू का बना हुआ है, अपने अन्दर जिसे मैंने भवसागर बताया है, यह बहुत जरूरी चीज़ है। इसको समझ लेना चाहिए। अब इसलिए हम तो सब को खुले आम कहते हैं, हर एक के बारे में १९७० से हम खुले आम सब के बारे में कह रहे हैं नाम ले-ले कर सबके बारे में और बता रहे हैं कि ये क्या-क्या गड़बड़ करते हैं खुले आम। लेकिन किसी की आज तक हिम्मत नहीं हुई कि न हमारे उपर किसी ने केस की, न किसी ने पुलिस में दर्ज किया न कुछ। खुले आम सबके नाम ले करके हम बता रहें हैं कि वे किस कदर के बदमाश हैं। किसी की हिम्मत नहीं हुई । हालांकि सब लोग हमें आ आकर कहते हैं कि ‘माँ तुम्हे नहीं मालूम ये तुम्हारा मर्डर कर देंगे।’ मैं कहती हूँ ‘करें तो। में देखेँ तो कौन करता है मेरा मर्डर?’ ना किसी ने शिकायत की ना किसी ने एक अक्षर हमारे विरोध में कोई नहीं बोला क्योंकि इनको मालूम है कि इनकी सारी पोल-पट्टियाँ मुझे मालूम है। लेकिन इनके शिष्य जरूर ऐसे होते हैं जो मेरे से खिलाफ कर लेते है लेकिन वो लोग नहीं। वो लोग चुप्पी साधे बैठे हैं। सब एक से एक बिलन्दर है और सब आपको लूट रहे हैं, बेवकूफ बना रहे हैं । इसलिए सजग हो जाएं, सतर्क हो जाए इनके चक्कर में ना आएं और इसमे बुरा बात सही-सही बताएगी और आप से पूरी बात बताएगी, चाहे आप भला माने या बुरा। मेरे लिए तो बड़ा अच्छा है, सब को अच्छा कहते फिरो, बस आप लोग नाराज ही नहीं होंगे । वो लोग तो किसी को बुरा-भला नहीं कहते। वो क्यों कहें उनको आप के जेब से मतलब है। आपको नचाने से मतलब है उनको । वो आपको किस को बुरा-भला कहेंगे। ईसामसीह ने कहा था शैतान के घर में रहने वाले लोग आपसी बुराई करके कहाँ जाएंगे ? लेकिन कबीर ने आवाज उठाई थी, नानक ने आवाज उठाई थी, ईसा ने आवाज उठाई थी । इसलिए क्योंकि यह सब झूठ है। और मुझे इसमें भी हर्ज नहीं है स्मगलिंग करें, करे, पैसा कमाए कोई हर्ज नहीं। चलो भाई पैसा ही कमाया। लेकिन ये आपकी कुण्डलिनी खराब कर देते हैं। जो आपका अधिकार है, सहजयोग का, जो परमात्मा को पाने का आपका अधिकार है,उस पर हाथ मारते हैं इसलिए मैं उनके विरोध में हूँ। मानने की कोई बात नहीं, माँ है। माँ सब | कुछ इस के उपर का चक्र है, उसके बारे में, अभी तक तो मैंने बाकी सब चक्रों के बारे में बताया था, जिसे कि हम अब जो लोग हृदय चक्र कहते हैं। चक्र, हृदय पहले रहता है। हृदय में तो आत्मा का स्थान है। आत्मा जो है वो हमारे अन्दर स्थित है और सारे हमारे क्षेत्र को जानता है। उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं। वही साक्षी है वो हर एक चीज़ जानता है। हम क्या कर रहे हैं और क्या नहीं कर रहे हैं। कुण्डलिनी जागरण से सिर्फ आपकी जो चेतना है, इस वक्त जो चेतना है वो आत्मा में लीन हो जाती है। अभी तक आत्मा आप से परे है। आत्मा से आप सम्बन्धित नहीं हैं। वो आपके अवेयरनेस में, चेतना में नहीं है । जब कुण्डलिनी जागृत हो जाती है तब आपकी चेतना में आत्मा आ जाती है और आत्मा क्योंकि सर्वव्यापी शक्ति है- आप भी सर्वव्यापी हो जाते हैं। इस के आगे और आप समझेंगे और धीरे-धीरे। अब ये जो हृदय चक्र है ये बीचोबीच में है, ये | आपकी माँ का, देवी का, जगदम्बा का, जो कि पहाड़ों में बहुत प्रसिद्ध है-उनका यह स्थान है। इन देवी ने अनेक बार

संसार में अवतरण लिए और ये भवसागर में जो लोग परमात्मा को खोज रहे थे और जिनको बहुत राक्षसों ने सताया था जिसे उनसे इन्होंने रक्षा का कार्य किया, ये रक्षा करती हैं। अगर किसी के रक्षा का स्थान खराब हो जाए sense of insecurity कहते है तो ये चक्र धक-धक करने लग जाता है। औरतों को जब इस तरह की चीज़ हो जाती है तो उन्हें ब्रेस्ट कैन्सर हो जाता है। अगर वो insecure feel करे तो उन्हें ब्रेस्ट का कैन्सर हो जाता है। अस्थमा की बीमारी भी इसी चक्र के खराब होने से हो सकती है। ये सब इस चक्र के combinations में होती है जिसे हम विशुद्धि चक्र कहते हैं। अस्थमा की बीमारी भी ठीक हो सकती है दो मिनट में । हमने कश्मीर के जो गवर्नर सहाय साहब थे, उनकी पच्चीस साल की अस्थमा | | की बीमारी एक क्षण में ठीक कर दी। एक क्षण में । जब ये चक्र जागृत हो जाता है, जब आपके अन्दर जगदम्बा जागृत हो जाती है तो आप ही सुरक्षा बन जाती है। आप अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं इसलिए यह चक्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । और इस चक्र को किस तरह से ठीक किया जाता है ये भी अगर आप हमारा पैम्फलेट्स पढ़ें, इंग्लिश की किताब में बहुत अच्छे से लिखा हुआ है। इस मंत्र जागरण से ये चक्र ठीक होगा। इसके उपर यह जो चक्र है ये मनुष्य के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। ये पीछे में इस जगह जिसे हम विशुद्धि चक्र कहते हैं। इस विशुद्धि चक्र से सोलह हजार नाड़ियाँ चलती हैं। यह श्री कृष्ण का चक्र है। इसमें श्री राधाकृष्ण बसते हैं। इसकी लेफ्ट साइड में श्री विष्णुमाया, आदिमाया जो कि उनकी बहन है, वो रहती है और इस राइट साइड में रुक्मिणी और कृष्ण से का स्थान है। रामचन्द्र जी का स्थान सुषुम्ना पर से हट कर के इस साइड में, राइट साइड में है। हृदय चक्र राइट साइड में है क्योंकि आपको मालूम है कि उन्होंने अपने को पूर्णत : मनुष्य बनाने के लिए अपने अवतार की दशा से हटा लिया था । वो अपने को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते थे, हालांकि थे तो अवतार ही। नाभि चक्र में सारे ही उथान हुए हैं। जो दशावतार हुए हैं वो नाभि चक्र से शुरू है। | फिर छठा अवतार रामचन्द्र जी का था वो यहाँ पर है। उसके बाद कृष्ण का अवतार है। कृष्ण से पहले परशुराम का अवतार हुआ। उनका भी होना जरूरी था। परशुराम का अवतार इसलिए हुआ था कि वो संसार में आ कर के अपने बल से लोगों का आने वाला कल ठीक करे, क्योंकि ढेड़ी खीर आदमी की बुद्धि सीधे उँगली बात ठीक नहीं होती। तो उन्होंने अपने जोर से और अपनी शक्ति से लोगों को पहले तैय्यार किया। और फिर जब वो आ गए तब उन्होंने श्री राम के बारे में बताया कि यही श्री राम हैं। इस प्रकार दोनो के दोनो साथ आए थे इसलिए बताने के लिए क्योंकि ये पुरुषोत्तम थे, क्योंकि ये | | के जैसे रहते थे। इसके बारे में बताने के लिए ही परशुराम का अत्यन्त जाज्वल जैसा अवतरण उनके साथ ही मनुष्य हुआ था। इसके बाद श्री कृष्ण का अवतार हमारे विशुद्धि चक्र पर हुआ है। यह विशुद्धि चक्र एक बड़ी महान चीज़ है। मनुष्य ने जब अपनी गर्दन जानवर से उपर उठा ली तब वो मानव हो गया तभी यह चक्र घटित हुआ है। श्री कृष्ण जो है ये विराट स्वरूप है। समझ लीजिए ये विराट है और इस विराट के अन्दर आप छोटी-छोटी पेशियाँ है। आप भी विराट के स्वरूप है। आप जब जाग्रत हो जाते हैं, तो आप विराट से सम्बन्धित हो जाते हैं। वही परमात्मा की शक्ति है जिसे मैं कह रही हूँ। वही जो परमात्मा का साम्राज्य है उसमें आप जाग्रत हो जाते हैं। सारी पेशियाँ इस तरह से जब जागृत हो जाती हैं तो पूरा विराट जागृत हो सकता है। ये विराट की शक्ति है । अब मोहम्मद साहब ने जो ‘अल्लाह हो अकबर’ का नारा लगाया था, वो इसका मंत्र है । आप को आश्चर्य होगा ये ऊँगलियाँ कान में ड्राल कर ये इसकी अंगुलियाँ है । देखिए कितने फायदे की बातें वे कर गए थे । ये उसकी ऊँगलियाँ है, यही विशुद्धि की ऊँगलियाँ है अगर ये ऊँगली पकड़ जाए समझ जाऐँ कि विशुद्धि चक्र पकड़ा है। अगर आप पूछेंगे भी तो पता चलेगा कि हाँ मेरा गला खराब है। इस ऊँगली को कान में ड्राल कर के जब आप सर उपर करते है और ‘अल्लाह हो अकबर’ कहते हैं। अकबर का मतलब विराट से होता है, तो एकदम विशुद्धि चक्र खुल जाता है। आपके देहरादून में विशुद्धि चक्र ज्यादा पकड़ा हुआ है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। उसको आप समझ लें जो भी आपके अन्दर हों । इसका एक कारण यह हो सकता है कि आप जरूरत से ज्यादा सिगरेट पीते हों या तम्बाकू खाते हों। उससे विशुद्धि चक्र पकड़ता है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि आप गलत ध्यान-धारणा कर के और कोई गलत मंत्र कहते हैं। इस से भी विशुद्धि चक्र पकड़ता है। तीसरी चीज़ है सर्दी-जुकाम। कभी आपको ठीक से ख्याल न रहें, कभी परहेज न रहे। जो चीज़े आप खाते हो, जिससे आपका गला खराब हो, उससे भी आपका गला खराब होता है और विशुद्धि चक्र पकड़ता है।

विशुद्धि चक्र इस से भी पकड़ा जाता है जब आदमी अपने को बहुत छोटा समझता है। जब वो यह सोचता है कि वो विराट का कोई हिस्सा नहीं है । जब वो यह नहीं समझ पाता कि अगर वो बूँद भी है तो वह सागर का अंग है तब भी विशुद्धि पकड़ती है, तब इसे न्यूनगण्ड कहते हैं, inferiority complex । पाँचवी चीज़ है जब इसको माँ बहन का खयाल नहीं रहता तब उसकी लेफ्ट विशुद्धि पकड़ती है। या जो आदमी बहुत क्रोध से बातें करता है या दुष्टता से व्यवहार करता है उस से भी विशुद्धि पकड़ जाती है, ऐसे अनेक कारण है उसमें से जो भी कारण हो उस से हमें मतलब नहीं । गले में ऐसे कण्ठमालाएं पहन लें। कल एक ऐसे साहब आए थे। पता नहीं वो आज आये हैं या नहीं, जिन्होंने कोई माला पहनी हुई थी। उनके साथ ही एक साहब बैठे हुए थे। तो हमने कहा कि ‘आप माला निकालिए ।’ तो वो नाराज वाराज हो गए फिर बाद में उन्होंने निकाल भी दी। फिर आपसे हमने पूछा ये आप चूपचाप पहने बैठे हुए थे अन्दर में, तो हमने उससे हैं?’ तो कहने लगे कि वो तो ‘स्वर्गवास हो गए हैं।’ तो मैंने कहा कि ‘आप ने कुछ पहना है?’ तो कहा ‘हाँ ।’ ‘उनकी दी हुई कोई चीज़ है।’ तो कहने लगे ‘मान गये माताजी आप को हम।’ उनके गुरू ने दी हुई चीज़ पहन कर अन्दर बैठे हुए थे और वो ऊँगली पर आ गये। वो कैसे? बहुत सरल चीज़ है। राइट हैण्ड पे ये जो है ये हृदय चक्र राइट हैण्ड का है जो रामचन्द्रजी का है वो पिता का लक्षण है। इस में चमक मार रही थी। इस ऊँगली में चमक मार रही थी कि मैंने आपके पिता के बारे में पूछा। वो इतनी जोर की चमक थी कि उससे मैं समझ गयी थी कि कोई न कोई उनकी दी हुई चीज़ आपने पहनी है । ये आप भी समझ लेंगे। ये तो उन लड़कियों ने भी बता दिया था, मैंने तो बताया नहीं पर लड़कियों ने आप को बता दिया था। तो इस तरह से इस चक्र की पकड़ हो गयी और जैसे ही इन्होंने माला निकाल दी थी पार हो गए। इनके पास ये चीज़ आयी । छोटी- छोटी चीज़ों में लोग अटक जाते हैं। मैंने कहा भाई काशी का धंधा है छोड़ दो। नही छोड़े । हम आपको परम देने बैठे हैं, आप छोटी-छोटी चीज़ों को नहीं छोड़ रहे हैं। अरे, काशी के पंडित कैसे होते हैं? क्या आपको पता नहीं ? आपको मुझे पूछा कि ‘आपके पिताजी कहाँ बताना होगा और उनका वो जो है धन्धा वो भी किस काम का है, वो भी बताना होगा आपको। एक पैसे की चीज़ एक रुपये में बेचते हैं। और इतने दुष्ट और इतने गर्दे लोग हैं । सारे इस मंदिरों की वाइब्रेशन्स भी खराब कर दिए हैं। इस में बुरा मानने | की कौन सी बात है। किसी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए। सब आपके मंगल और कल्याण की ही बात कर रही हूँ। सब आपके मंगल व कल्याण के लिए कर रही हूं। ऐसी छोटी-छोटी बात ले कर के अपने आपको फँसा ड़ाला। इस कुछ विशुद्धि चक्र की बात मैं कह रही थी कि जो विराट है। उसके बाद यह उपर का चक्र है। ये चक्र, इसे बड़ा महत्त्वपूर्ण माना जाता है, आज्ञा चक्र है। आज्ञा चक्र बड़ा संकडा होता है। उसके अन्दर से कुण्डलिनी का निकलना बड़ा कठिन हो जाता है। दोनो तरफ से जब इगो और सुपर इगो दोनो दबाते हैं तब यह चक्र और भी दब जाता है । जब आदमी किसी को क्षमा नहीं करता और रात-दिन इसी के बारे में सोचता रहता है कि उसने मुझे ये सताया, वो सताया, मुझे ये तकलीफ दी, वो तकलीफ दी, ऐसे आदमी का आज्ञा चक्र एकदम पकड़ जाता है। और जो लोग चष्मा लगाते है उनका भी आज्ञा चक्र कुछ कमजोर होता है। शारीरिक रूप से। इस आज्ञा चक्र के भी अनेक रूप हैं। वो पढ़ेंगे तो, मेरे पास जो किताब है उसे आप पढ़े तो आप देख सकते हैं कि काफी इन लोगों ने इस पर लिख दिया है, आज्ञा चक्र के बारे में । इस आज्ञा चक्र पर महाविष्णु का स्थान है। अब आप लोग महाविष्णु के बारे में जानते ही नहीं । लेकिन देवी भागवत जिसने भी पढ़ा होगा उस में पता चलेगा कि महाविष्णु बहुत बड़ा अवतार माना जाता है। जो राधा जी का पुत्र था और वो संसार में आने वाला है ऐसा चौदह हजार वर्ष पहले कहा गया था। वही अपने ईसामसीह हैं। ईसामसीह साक्षात महाविष्णु के अवतरण हैं। अब मैं जो बात कह रही हूँ वो सच है या झूठ है-कैसे जानना इसे? इसका एक बड़ा आसान तरीका है। आपकी जब वाइब्रेशन्स आ जाए तो आप पूछिए कि क्या इसामसीह महाविष्णु के अवतरण हैं? वही आज्ञा चक्र पर है? फौरन वाइब्रेशन्स आने शुरू हो जाएंगे। आज्ञा चक्र पर जो “Lord’s Prayer” है वो इसका मंत्र है। लेकिन वो साक्षात ‘ॐ’ व ‘प्रणव’ से बने हैं। माने गणेश जी का अवतरण हैं वो। ॐ प्रणव हैं उन्होंने साकार अपना स्वरूप लिया। और इस संसार का तारण के लिए वो आए क्योंकि वो ॐ व प्रणव हैं। उनकी मृत्यु भी जब हुई उसके बाद उनका पूर्णात्थान हुआ। | | और कृष्ण उनके पिता हैं क्योंकि उन्होंने कहा था ‘नैनं छिदन्ति श्त्राणि, नैनं दहति

पावक:’ यह जो प्रणव है, जो ओम है, यही किसी भी चीज़ से कटता नहीं और किसी भी चीज़ से वहन नहीं होता। उसकी सिद्धता करने के लिए, महाविष्णु का अवतरण इस संसार में हुआ। कृष्ण उनके पिता थे इसलिए उनको क्रिस्त कहते हैं और यशोदा जी का नाम रखने के लिए ही उनको राधाजी ने येशु कहा। इनकी माँ साक्षात राधाजी है। यह सब अपने ही हैं लेकिन उनको जान लेना चाहिए, लेकिन प्रणव निराकार है, ॐ निराकार है । साकार- निराकार लेकर के बड़ा झगड़ा लोगों ने खड़ा किया हुआ है। थी । महालक्ष्मी का अवतरण इस मामले में थोड़ी बात जरूर करूँगी नहीं तो ये भी एक झगड़ा बना ही रहेगा परमानैन्ट । और खासकर इस देहरादून में तो मैं काफी देखती हूँ सनातन धर्म और आर्य धर्म आदि वगैरे में मैं-मैं, तू-तू होती रहती है । हालांकि मिला किसी को भी नहीं। सदियों से चले आ रहे हैं दोनो झगड़े। मिला किसी को नहीं । किसी की भी तृप्ति मैंने देखी नहीं । अब निराकार- साकार की बात थोड़ी सी समझा दें, तो यह झगड़े भी खत्म हो जाएंगे। जिस वक्त हमारी पिंगला नाड़ी बनायी गयी जैसे हम देख रहे हैं, हमारे राइट साइड में। उस वक्त ये पाँच तत्त्व जो थे, उनकी जागृत करने की बात थी। आप पाँच तत्त्व जानते है जिससे सारी सृष्टि बनायी । इनको जागृत करना था इसलिए यज्ञ वरगैरेह हमारे वेदों में किये गये। स्मृतियाँ पढ़ी गयी हैं। यज्ञों में ये जो पाँच तत्त्व है इसको जागृत किया गया। जैसा मैंने सबेरे बताया था। ये पाँच तत्त्व जागृत करना जरूरी चीज़ है। अग्नि को जागृत करना था, पानी को जागृत करना था क्योंकि इनकी जागृति के कारण ही मनुष्य इनको इस्तेमाल कर सकता था। उसके बाद ही खेती बाड़ी शुरू हुई। आज का साइन्स भी इसी वजह से मनुष्य के समझ में आया। अगर हमारी पिंगला नाड़ी न जागृत होती तो हम कभी भी साइन्स न सोच पाते ना ही हम ये समझ पाते कि इन पाँच तत्त्वों को हम किस तरह से इस्तेमाल करें। बिजली कैसे बनाए और किस तरह से हम इस अग्नि का इस्तमाल करें । अग्नि तक का भी हमें पता न था, कि हम अग्नि भी न बना पाते। ये सब हम बना सके इसलिए राइट साइड की पूजा होती है। इसलिए यज्ञ होते रहे और निराकार में ही यह जो पाँच शक्तियाँ हैं तो निराकार की ही पूजा होती रही उस जमाने में । लेकिन उस में जब आगे लोगों ने सोचा कि | | | अब जागृत कर दिया, अब आगे क्या? तो फिर मनन की चीज़ शुरू हुई। तब फिर सेट्रल पाथ पर आ गए। जब सेंट्रल पाथ पर सुषुम्ना नाड़ी पर चढ़नी शुरू हुई तो उन्हें दिखाई देने लगा कि यह ये देवी देवता इस जगह बैठे हुए हैं और ये देवता हैं । ये जो पाँच तत्त्व बने हैं, इसी से इन चक्रों की बॉड़ीज भी बनी हैं । इनकी जो शरीर रचना है ये इन्हीं पाँच तत्त्वों से बनी है । तो जब इन्होंने इन त्त्वों को जानना शुरू किया तो देखा कि इनके देवता हैं, तब इन्होंने मनन विधि में उन देवताओं को जानना शुरू किया एक के बाद, एक के बाद एक। तब इन्होंने कहना शुरू कर दिया कि नहीं यह साकार भी दूसरी चीज़ आ गयी है। निराकार से साकार पर लोग उतरने लग गये। जैसे-जैसे चेतना बढ़ती गयी वैसे वैसे लोग आने लग गए। उसके बाद जो साकार पर आ गए उनका जो हाल हो गया वो आप जानते ही है। इसकी पूजा कर, उसकी पूजा कर। Ritualism आ गया। अंधश्रद्धा आ गयी। धर्मान्धता आ गयी, बड़ा बुरा हाल हो गया। तब से एक बड़ा भारी आन्दोलन हुआ, इतना ही नहीं मोहम्मद साहब जैसे लोग संसार में पैदा हुए। ख्रिस्त संसार में आए, इन्होंने सब ने कहा कि निराकार ही ठीक है, साकार को खत्म करो। हालांकि बड़ा गोपनीय है ये सब कुछ इतना, बाईबल में लिखा हुआ है जो कुछ पृथ्वी ने बनाया हुआ है और जो लें | कुछ आकाश ने बनाया है उसका प्रतिरूप तो बनाइए, ये बड़ी मार्मिक चीज़ है। इसको एक ईसाई लोग समझे तो कि मूर्ति पूजा क्या है? अब पृथ्वी ने कौन सी चीज़ बनाई है, बताइए आप? उसकी प्रतिरूप कर के उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए। पृथ्वी ने ये जितने भी स्वयंभू लिंग हैं ये बनाये हैं। अभी ईसाईयों से कहिए कि जितने स्वयंभू लिंग हैं ये पृथ्वी ने स्वयं बनाये हैं और इसके प्रतिरूप आप जो बनाए भी वो इसके पूजनीय होता ही नहीं क्योंकि ये imperfect है । इसका समझ भी co-efficience होता है, इस आकार का भी co-efficience होता है। उस आकार के कारण ही चैतन्य बहुता है। और हू-बहू वैसा आकार बनाना असम्भव है और जो बनाता है वो भी realized soul होना चाहिए और वो उसे बेचना नहीं चाहिए उसको । इसलिए जितने भी मूर्तियों की हम पूजा करते हैं अधिकतर इस हिसाब से जीरो हैं। अब आप जा कर के देखें, रांजनगाँव का एक गणेश जी है बिलकुल गणेश के रूप हैं, बिलकुल गणेशजी हैं। और ये पृथ्वी के अन्दर से निकले हुए हैं। किसी ने उनको हाथ भी खुद देखने गयी थी। इतने वाइब्रेशन्स उस गणपति में है जैसे कि कोई जाग्रत वहाँ समाधि लगाई हुई हो। इस तरह से उन में से जागृत व्हायब्रेशन्स आते हैं। इसलिए कहा गया था कि उसके प्रतिरूप मूर्ति न बनाएं। अब हमलोग हैं जिसको देखिए मूर्ति बनाने बैठ जाता है। हर एक चीज़ की मूर्ति बनाकर उसको पूजने लगते हैं। उसका co-efficience है या नहीं, उस में चैतन्य नहीं लगाया है। अभी अनादि काल से बात चली आ रही है। मैं

है या नहीं, वो जागृत है या नहीं, इसको कौन देखता है? इसलिए मूर्ति पूजा का खण्डन है । इस तरह से उन दिनों में ईसामसीह के समय में हुआ क्योंकि मूर्ति का मतलब यह होता है कि पैरों पर पड़ना शुरू हो गया । अब काबा के अन्दर जो पत्थर है वो साक्षात शिवलिंग है। पृथ्वी से निकला हआ शिवलिंग है वो। उसे मोहम्मद साहब जानते थे । और जितने भी शिवलिंग हैं, वो साक्षात हैं लेकिन जिसको देखिए वही उसकी मूर्ति बना लें, मिट्टी का बना लें, पत्थर का बना लें -ये बनाने की इज़ाज़त नहीं है। इसकी मूर्ति पूजा वर्जित है इसलिए मूर्ति पूजा बाधक है। अब मूर्ति पूजा के विरोध में जो लोग बोलते हैं वो वहाँ तक कह गये हैं कि मूर्ति पूजा जो कि मूर्ति झूठ मूठ बनायी गयी है, उसकी पूजा नहीं होनी चाहिए, वहाँ तक सही है। लेकिन साकार परमात्मा नहीं होते हैं यह कहना बहुत गलत बात है। इसका मतलब है आपने वन साइडेड़नेस ले ली है। उसकी वजह तीसरी थी कि जब साकार की पूजा लोग करने लग गए तो लोगों ने देखा कि इस कदर वो गलत हो गए। समझ लीजिए कि हम आपसे कहें कि शहद को खोज लाएं तो हम आपसे पहले फूलों का वर्णन करे कि फूल ऐसा होना चाहिए, वैसा फूल मिलेगा, उन में से शहद ले आइये । आप गए और देख के चले आये कि हाँ भाई फूल मिल गया। अब फूलों की पूजा करने लग गए । शहद आपको नही मिलेगा । बातचीत से शहद नहीं मिल सकता । सिर्फ फूलों की बातचीत होती रही कि फूल ऐसे होते हैं, फूलों में ये करना चाहिए, फूलों में वो करना चाहिए। शहद नहीं मिलता बातचीत से, तो उन्होंने कहा कि फिर भी शहद नहीं मिला, चलो, शहद की बात करते हैं। तो दूसरी बातचीत शुरू कर दी निराकार की। वो भी बातचीत तो बातचीत ही रह गयी दिमागी जमा खर्च । आप चाहे शहद की बात करो , चाहे फूल की बात करो , आपको शहद नहीं | मिल सकता। जब तक आप स्वयं ही मधुकर न हो जाएं। जब तक आप स्वयं ही मधु को पाने के योग्य न हो जाएं तब तक आपको शहद नहीं मिल सकता। फूल भी जरूरी है और शहद भी जरूरी है और शहद को पाने के लिए भी आपका वो होना जरूरी है, जिसे मधुकर कहते हैं। अब ये झगड़ेबाजी की बात है जो हर चीज़ के लिए झगड़ा खड़ा कर देते हैं। सत्य एक है उस में कभी झगड़ा नहीं हो सकता। अब उस जमाने में या पिछले जमाने में जब हम अपने पाँच तत्त्वों को प्रबुद्ध कर रहे थे। उस चीज़ को ले कर के आज झगड़ा खड़ा करने की कोई जरूरत नहीं। जो बीच की बात है क्योंकि यह भी बिलकुल सही है कि परमेश्वर अवतार के रूप में थे और वो अवतार लेते हैं। संसार में आ कर के और मनुष्य का उद्धार करते हैं। यह भी बिलकुल सनातन बात है और यह करना भी सनातन बात है और यज्ञ करना भी सनातन बात है। जिसके कारण आप ये पाँच एलिमेंट्स हैं, अपने अन्दर में उनकी शुद्धि करे। क्योंकि जब आपके चक्र शुद्ध नहीं हुए हैं तो मेरा कहना भी व्यर्थ है। वो भी जरूरी चीज़ है और आत्मा का जानना भी जरूरी चीज़ है और अगर इसको समझ लें तो सारा झगड़ा खत्म हो जाए और व्यर्थ की बकवास कर करके और हजारो किताबें लिख-लिख करके, जिस तरह से आप लोगों ने झगड़ा खड़ा कर दिया है, वो सब बेकार है । कल ही एक साहब आए थे वो कह रहे थे कि मैं गायत्री मन्त्र कहता हूँ। तो मैंने कहा क्यों कहते हैं? वो पार नहीं हो पा रहे थे। मैंने कहा कि आप गायत्री देवी के बारे में पूछिए तो कहने लगे कि हम मानते ही नहीं साकार को । अरे भाई , मानते नहीं तो किस आधार पर नहीं मानते हो क्योंकि आप आर्य समाजी फैमली में पैदा हुए, आप आर्य समाजी बन गए । मनुष्य की स्वतन्त्रता कहाँ गयी ? क्योंकि आप हिन्दू परिवार में पैदा हुए आप हिन्दू बन गए। हो सकता था आप मुसलमान पैदा हो जाते । हो सकता था कि आप कोई अफ्रिका में पैदा हो सकते थे । जब आपका पुर्नजन्म है ही नहीं तब आप कहीं भी पैदा हुए होंगे। हो सकता है आप पूर्व जन्म में बड़े कट्टर मुसलमान होंगे और आज आप बड़े कट्टर ब्राह्मण बने बैठे हैं, हो सकता है और होता ही है । एक अति से आदमी दूसरे अति में हमेशा उतरता है। एक कट्टरता को लेके चलता है तो दूसरे कट्टरता में उतरता है। सत्य कट्टर नहीं है, सत्य साक्षात है। इसका साक्षात करना चाहिए, सूझबूझ इस में है। सूज्ञता इसी में है कि वो जो सत्य है उसे हमें पाने का है उसी को हमें ले लेना है और असत्य हमें त्याग देना है। आज यही हो रहा है। आपके जो जवान भी बेकार लगनी शुरू हो गयी है। सभी विश्व में ये बात है बच्चे हैं वो परमात्मा पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। उनको मेरी बात आप ही की बात नहीं, आप से कहीं अधिक और जगह ये हो रहा है। कहीं जगह ये हो गया है कि जहाँ लोगों ने परमात्मा पर विश्वास छोड़ दिया है। अल्जिरिया के एक हमारे शिष्य हैं। इंजिनियर हैं, हमारे पास आए थे, मुसलमान हैं वो लोग सब । वहाँ पर जितने भी पढ़े लिखे लड़के हैं, इंजिनियर, डॉक्टर, आर्किटेक्ट वगैरेह उनको परमात्मा में विश्वास नहीं । उनमें से ये महाशय भी थे । ये

किसी तरह से हमारे पास आ गये और पार हो गये। एक विश्वास को धर्मान्धता से निकलकर के और अविश्वास की ओर जब मनुष्य झुकता है तो बीचोबीच सहजयोग उसे पकड़ता है। जब उन्हें साक्षात हो गया आज उन्होंने ५०० सहजयोगी बना लिये जो कि मुसलमान हैं। जो कि विष्णु की भी पूजा करते हैं और मोहम्मद को भी जानते हैं इसलिए नहीं कि मैंने कहा है उसके बगैर काम ही नहीं बनता । अगर आपके पेट में कैन्सर है अगर आप धर्मान्ध हैं तो आपको मोहम्मद साहब का नाम लेना पड़ेगा। आप नही लीजिएगा तो मैं ठीक नहीं कर सकती । अगर आप मुसलमान हैं और आपको कैन्सर हैं पेट का तो आपको दत्तात्रेय जी का नाम लेना पड़ेगा और विष्णु जी का नाम लेना पड़ेगा चाहे आप मुसलमान हो कुछ भी हो। किसी का कुछ ठेका नहीं होता है। ये भगवान मेरे, वो भगवान मेरे हैं। उनको समझाने बुझाने और बना लिया। अब तो धर्म का राजकारण ही बन गया तब तो भगवान ही बचाएं। जो लोग धर्म में राजकारण ला कर के बात करते हैं, उनसे पूछा है कि वे लाग धर्म के बारे में कुछ जानते भी हैं । धर्म का राजकारण नहीं बन सकता । आपको मैंने विशुद्धि चक्र के बारे में बताया। अब आज्ञा चक्र के बारे में बताया । जब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र को छेदती है तब आप निर्विचार हो जाते हैं। निर्विचारिता आप में बह जाती है। ये भी चक्र यहाँ बहुत पकड़ता है, पता नहीं क्यों आप क्षमाशील कम हैं। क्षमा करनी चाहिए। क्षमाशील होना बहुत जरूरी है। जब हम क्षमाशील नहीं तो परमात्मा भी हमें क्षमा नहीं करेगा। हमें बहुत तकलीफें होती हैं। दुनिया में माना है, लेकिन हमको क्षमा करना चाहिए इससे परमात्मा भी हमें क्षमा करें। नहीं तो परमात्मा क्यों हमारी गलतियाँ क्षमा करेगा ? इससे भी आज्ञा चक्र बहत पकड़ता है । क्षमाशीलता बहत जरूरी है । इसलिए मैं बार-बार आपसे कहती हूँ आप सबको क्षमा कर दें। पूरी तरह से क्षमा कर दें । अंत में आपका चक्र जो हैं जिसे सहस्रार कहते हैं। वो हजार पेटल्स से बना हुआ है । डॉक्टर का भी झगडा ९९२ नाड़ियाँ है उनके हिसाब में और उनको हजार कहते हैं और यही लेकर बैठे रहे उनके सामने झगड़ा करते हुए एक हजार पंखुडियाँ हैं। वो खुल जाती है, कमल के समान अनेक रंगों की पंखुडियाँ होती हैं और जब ये खुल जाती है तब वो इससे गुजर के ब्रह्मरंध्र को छेदती है। इसका नाम है ब्रह्मरंध्र । रंध्र माने छेद और ब्रह्म का, ब्रह्म माने सर्व्यापी शक्ति जो कार्यान्वित होती है। परमात्मा की जो शक्ति है जो सर्वव्यापी है, जो आपके अन्दर, आपके अन्दर विहित और जैसे ही वो छेद देती है वो आपके अन्दर वो शक्ति स्थापित हो जाती है। आप भी बता सकते हैं कि दूसरों के अन्दर क्या प्रॉब्लम है । ये सामूहिकता आपके अन्दर जागृत होती है। इस में कोई लेक्चर देने की बात नहीं है। ये घटना आज घटित होने वाली है। | आज मेरा यहाँ आखिरी दिन है, मैं चली जाऊँगी दिल्ली । मैंने कल भी कहा था कि यहाँ पर कुछ लोग मिलकर के एक स्थान निहित कर दें। किसी के भी घर, छोटी सी भी जगह हो एक सेंटर की तरह से हो जाए । जहाँ सब का सम्बन्ध जुट जाए । उसको बहुत बड़े जगह की जरूरत नहीं, एक एड्रेस ऐसा हो जहाँ सब लोग मिले तो देहरादून का सेंटर चल जाएगा और देहरादून में कार्य हो सकता है और हम दिल्ली से भी कुछ लोगों को भेज देंगे जो आकर के आप को काफी समझा कर के आपकी मदद करेंगे। अनेक तरह की बीमारियाँ इस में ठीक हो जाती हैं। कैन्सर बीमारी हर एक तरह की बीमारी इस में ठीक हो जाती है। वो आपको भी सिखा देंगे। आप भी जागृत हो जाइए। वो आपकी भी प्रगति कर देंगे । लेकिन ऐसा एक्सपरिमेन्ट आज तक हमने किया नहीं कि ऐसी जगह पहुँचे जहाँ कोई पहले से सहजयोगी नहीं रहता । ये पहला ही एक्सपरिमेन्ट है इसका कारण और हमारी नातीन जो है यहाँ एक स्कूल में एडमिटीड थी । पिछली मर्तबा जब हम आए तो हमने सोचा बड़ी तपोभूमि है यहाँ ऐसा करने से इसमें कोई हर्ज नहीं और कुछ लोग जुट भी गए इसलिए बात बन गयी लेकिन यहाँ कोई ऐसा एड्रेस हो जहाँ पर सब लोग मिल सकते हैं। साधारण घर हो तो भी चल जाएगा । ऐसा एक एड्रस आप लोग सब मिल कर के जो पार हो जाए सो कर दे । इस तरह की एक चीज़ चला देनी चाहिए जो शहर के अन्दर हो बहत दूर न हो । उसके बाद बाहर से लोग आते रहेंगे और पूरी तरह से आप उनसे गाईडन्स ले सकते हैं और आगे बढ़ा सकते हैं। | और ये साहब बैठे हैं। इनका अनुभव देखिए । सबेरे से इन्हें सबेरे वाइब्रेशन्स नहीं आ रहे है और किसी तरह से रुकावट हो रही थी। और किसी ने उनसे कहा कि आप पूछिए कि माताजी कौन है? और बस ये कहते ही साथ धड़-धड़ हाथ उनके वाइब्रेशन्स शुरू हो गये। उनको बड़ी हँसी आयी अपनी बात पर भी ऐसा ही चमत्कार होता है । एक चीज़ पर आदमी रूक जाता है। एक छोटी सी चिंगारी भी आँख में चली जाए, एक तिनका भी चला जाए, तो सारा आकाश आपके आँख से लुप्त हो जाता है। उसी तरह की छोटी-छोटी चीज़ों से हम उलझे रहते हैं जिन्हें हमें निकाल देना चाहिए। और निकाल दीजिए । | | |

आप लोग सभी हाथ ऐसे फैला कर बैठिए। इस तरह बैठे रहिए मैं सब को देखती हूँ। कोई प्रश्न हो तो पूछिए, एकाध कोई प्रश्न हो तो ठीक है बेकार के प्रश्न पूछने में समय नहीं बर्बाद करना चाहिए । जो चीज़ आपके अन्दर होने की आपके अन्दर घटित होनी चाहिए ये आपकी सम्पदा है उसे पा लेना चाहिए। अब छोटी-छोटी बातों पर लोग उलझ जाते हैं। अब वो बता रही थी कि हम हीरे पहने हुए थे। तो उन्होंने पूछा कि ‘माताजी ने हीरे की अंगूठी क्यों पहनी हुई है?’ तो भाई हमारे पास बहुत सारी अंगुठियाँ है और हमारे पति चाहते हैं कि हम सब अलंकार से लिप्त रहें । ..यहाँ हमारे पति को लोग जानते हैं वो बहुत ईमानदार आदमी हैं । उन्होंने बेईमानी का एक पैसा असल में हमारे पति…. भी नहीं कमाया लोकिन आश्चर्य की बात है कि वो हीरे की अंगूठी नहीं वो झूठी अंगूठी, वो किसी ने हमको प्रेज़ेंट में दे दी तो हमने पहन ली। ये माया का चक्कर देखिए, वो भी झूठी अंगूठी है। हमारे पास बहुत सारी अंगूठी है। हीरे की भी हैं लेकिन वो हम झूठी अंगूठी पहने हुए थे । प्रेम के पीछे में और हम किसी से एक पैसा लेते नहीं है न आप हमें देते हैं। अब इस जन्म में हमारे पति हैं, हमारे पिता बहुत रईस आदमी थे । सब कुछ है तो हम पहन लेते थोड़ा बहुत । वैसे हम थोड़ा ही पहनते हैं बहुत कम ही पहनते हैं। हमारे पति का शौक है हमारी पत्नी जो है सुहागिन है, पहने । इसलिए हम पहनते हैं, हम कोई सन्यासी आदमी थोड़े ही है। आप से ले कर हम कुछ नहीं पहनते। परम्परागत जो हमें पहनना है वो हम पहनते हैं। हम कोई सन्यासी नहीं हैं। हम कोई साधु बाबा नहीं हैं। अब हमने ये क्यों पहना वो क्यों पहना यह सब फालतू की बात करने का क्या फायदा था। यह सब बात की जो खबर रखते हैं वो लोग चोर होते हैं सब सर्कस चलाते हैं वो सब ढोंग बनकर, clown बनकर आपके सामने खड़े हो जाते हैं और आप उसी से अभिभूत हो जाते हैं । यहाँ ये समझना चाहिए कि आपको लेना है । हमें नहीं। हम देने बैठे हैं। आपको नहीं मिला तो आपको डिसक्रेडिट है । आपके लिए वो गलत रहेगा । आप के लिए वो नुकसानदेह रहेगा, हमारे लिए नहीं। आज सबेरे मैंने आपसे कहा कि मुझे आपसे कुछ नहीं लेना है । वोट भी नहीं लेना है , इलेक्शन भी नहीं लड़ना है। कुछ भी नहीं । मुझे शौहरत भी नहीं चाहिए आपसे । लेकिन आपके अन्दर जो आपका छिपा हुआ है वो पा लीजिए। ये माँ की तरह से मैं समझाती हूँ। अगर आप अपने माँ को समझ हैं । आपको impress करने के लिए हम यहाँ नहीं आए हैं। और उससे हमें क्या मिलने वाला है, आप हमें क्या देने वाले हैं पहले ये बताइए। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि सुविद्य महिला ने इस तरह की बात करी। बहुत आश्चर्य की बात है। इसलिए इस शायद जन्म में हमारे पति इतने उँचे पद पर पहुँचे कि जिससे दुनिया न कहे । क्योंकि लोग इतने बेवकूफ होते हैं, इस कदर बेवकूफ होते हैं कि सत्य को कभी पहचानना ही नहीं चाहते हैं । सकते हैं तो यह भी समझ सकते अनन्त आशीर्वाद!