Seminar Day 2

New Delhi (भारत)

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Seminar in Delhi (India), 10 March 1979.

भारतवर्ष योगभूमि , सेमिनार दिल्ली, १०/३/१९७९ आज सबेरे मैंने आपसे बताया था अंग्रेजी में कि परमात्मा ने हमें जो बनाया है, आप इसे माने या न माने, उसका अस्तित्व आप समझे या न समझे वो है। और उसने हमें जिस प्रकार बनाया, जिस तरह से बनाया है वो भी | एक बड़ी खूबी की चीज़ है। मैंने सबेरे बताया था कि कैसे बहुत थोड़े से समय में एक अमीबा जैसे प्राणी से मनुष्य बनाया गया। और आप को मनुष्य बनाया गया सो क्यों? और आगे इसका क्या होने वाला है या ऐसे ही भटकता रहेगा? मैंने बताया कि आपको भगवान ने स्वतंत्रता दे दी है। चाहे तो आप परमात्मा को पायें और चाहे तो आप शैतान के राज्य में जायें। ये आपकी स्वतंत्रता है। इसके लिए कोई भी आप पर, कोई भी आप पर परमात्मा का बंधन नहीं । अगर आप गलत रास्ते जाएंगे तो आप पर वहाँ के जो कुछ भी कृपायें हैं वो होंगी। और जो आप सही रास्ते जाएंगे तो सही रास्ते का जो भी आशीर्वाद है वो आपको मिलेगा । गलत और सही जानने के लिए भी बहुत बड़ी-बड़ी हस्तियाँ संसार में आयीं, उनको हम ‘अवतार ‘ कहते हैं, अवतरित हैं। बड़े-बड़े गुरु इस संसार में आयें जो असली गुरु थे। वो जब भी आये उन्होंने सही रास्ता, धर्म का रास्ता बताया कि आप कायदे से रहिये, बीचो-बीच रहिये, अति न करिये। धर्म के नाम पर जब -जब कोई-कोई संकट आये और जब ये देखा गया कि संसार से मनुष्य नष्ट होने को आया है तब-तब संसार में ये अवतार हये हैं। अब इन अवतारों को संसार में आ कर के जो कार्य करना था वो उन्होंने किया। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो अवतार हये और खत्म हो गये। उनका भी अपने अन्दर निशान बना हुआ है। उनके भी अपने अन्दर माइलस्टोन्स बने ह्ये हैं, उनका भी चित्र हमारे अन्दर बना हुआ है। वो भी हमारे अनेक, जो- जो हमारी प्रगति होती गयी उसके रास्ते पर अलग -अलग जगह अपने-अपने मन्दिर बना कर बैठ गये। हम सोचते हैं कि गुरुनानक आये, आज ही मैं गलती से उस रास्ते से चली गयी थी। उनका प्याऊ देखा तो एकदम इतनी वहाँ चैतन्य की लहरियाँ बह रही थी, इतना आन्द आया उस जगह को देखकर। तो क्या गुरुनानक संसार में आये और बस वहाँ प्याऊ मात्र किया और चले गये! बिल्कुल भी नहीं। वह इतनी बड़ी हस्ती थी कि वह हमारे अन्दर अपना घर कर गये। हमारे अन्दर उनका एक स्थान है। गुरुओं का हमारे अन्दर जो स्थान है, उसी तरह उन्होंने ये सब कुछ बनाया है। कल मैं आपको सब बारीकी में बताऊंगी कि ये सारे लोग जो अवतरित हये हैं उनका हमारे अन्दर कहाँ-कहाँ स्थान है और किस तरह से वो हमारी चालना करते हैं। अगर परमात्मा ने हमें इतने सुघटिती से बनाया है, जैसे मैंने बताया कि एक आँख को देख लीजिए। क्या कमाल की चीज़ बनायी! अगर उसके अन्दर वाकई में हमारे ऐसी चीजें बना दी हैं कि जिनकी वजह से हम चलते, बोलते, खाते-पीते और संसार की सारी क्रियायें करते हुए भी परमात्मा का चिन्तन करते हैं। तो ये जरूर है कि उसने कोई न कोई ऐसी चीज़ हमारे अन्दर रख दी होगी जिसकी वजह से हम उसको जान सके। उसी तरह की चीज़ हमारे अन्दर है, पूरी तरह से हमारे अन्दर है। लेकिन उसके मामले में जो भी लिखा गया है, जो कुछ भी कहा गया है, लोग उसे या तो

सोचते हैं बकवास है, या झूठ है और या उसे इस्तमाल करके उसका दुरूपयोग करते हैं। उससे लोग पैसा बनाते हैं, रुपया बनाते हैं, कहते हैं, ‘हम आपको भगवान से मिलायेंगे। ये तरीका भगवान को मिलाने का है, वो तरीका भगवान को मिलाने का है। आपकी जितनी श्रद्धा हो उतना हमें दे दीजिये। और इस श्रद्धा के नाम पर आपको नोचते-खसोटते रहते हैं। जो धर्म हमारे अन्दर बसा हुआ है, उसको इन्होंने लाकर बाहर बसा दिया। और उस पर रुपया, पैसा बनाने लग गये। तो आज के जो बच्चे हैं, जो पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी बच्चे हैं उनको शंका होने लगती है कि ये धर्म -धर्म होता क्या है? धर्म के नाम पे तो नोच-खसोट, मारा-मारी, और हर तरह की जैसे लूटमार, बड़े से बड़े चोर-डाकू भी जो काम नहीं करेंगे ऐसे काम ये धर्म के नाम पर करते हैं। तो ऐसे धर्म पे विश्वास करना चाहिए या नहीं करना चाहिए? और यही समा सबसे अच्छा है जब कि सहजयोग आपके सामने आ गया है। मैंने कल कहा था कि धर्मान्धता एक तरफ और दूसरी तरफ अविश्वास बीचो -बीच सहजयोग का दर्शन होना जरूरी था। और इसलिए यह समय ऐसा आ गया है कि आप इसे पा लें, जिसे हम परमात्मा कहते हैं। अपना भारतवर्ष, एक योगभूमि है ऐसे बहत से लोग लेक्चर देते हैं। खास कर के जो राजकारण में हिन्दू धर्म को संस्थापन कहते हैं। मुझे तो हँसी आती है। इनमें से कितने लोगों को हिन्दू धर्म क्या है ये भी मालूम नहीं है। वो ये भी नहीं जानते कि हमारे ऋषि- मुनियों ने मनन कर के कौन सी चीज़ की खोज लगायी थी, कौनसी चीज़ का पता लगाया था, वो भी नहीं मालूम। हमारा देश एक विशेष तरह का देश है। देखिये यहीं पर एक छत मात्र है, चारों तरफ खुला हुआ है। इस वातावरण में बैठ कर के आप हमारा लेक्चर सुन रहे हैं। परदेश में जहाँ हम रहते हैं, लंडन में, ऐसे अगर आप दस मिनट भी कहीं बैठ लें तो शर्त हो जाए। हर समय बरसात, हर समय आफत, हर समय कड़ी सी कड़ी ठण्ड, जिसमें आदमी चल भी नहीं सकता। एक तरह के निसर्ग के कोप में रहने वाले देश हैं। वहाँ चलना-फिरना भी मुश्किल है। अगर आप घर से निकलिये तो आपको आधा घण्टा तो तैयार होने में लगेगा। जूते पहनिये, मोजे पहनिये, उपर से लबादे डालिये, सर ढकिये, अगर आप वैसे ही बाहर चले जायें तो हो गया आपका खात्मा। ऐसे देशों में जो लोग पैदा हये थे उनको पूरी समय नेचर से आवाहन लेना पड़ता था। निसर्ग का उनके उपर चैलेंज है। और उस चैलेंज की वजह से, उस आवाहन की वजह से उनकी दृष्टि बाहर की ओर गयी। उन्होंने सोचा कि ‘भाई, घर कैसे बनायें कि जिस में बिल्कुल भी सर्दी न लगे? वाहन कैसे बनायें जिससे इधर-उधर जाते हो जिसमें बारिश की तकलीफ न हो।’ नहीं तो उसकी नुकीली चोट खा जाती है इन्सानों को। हम लोग बड़े भाग्यशाली हैं, आपको पता नहीं कि हमारी जो आबो-हवा है, इन्सान अगर संन्तोषी हो तो एक पेड़ के नीचे भी आराम से रह सकता है, जंगलों में भी रह सकता है। खाने-पीने को शस्य – श्यामला भूमि है। हम ये नहीं जानते कि हमें खाने-पीने का इस देश में कितना आराम है। उन देशों में एक भी चीज़ आपको पेड़ की लगी हुई खाने को नहीं मिलेगी। सब टीनों में ड्राली हुई, पता नहीं कहाँ से, कितने वर्ष पहले चली हुई मिलती है। याने यहाँ तक कि मछलियाँ भी आस्ट्रेलिया जैसे देशों से, न्यूजीलैण्ड जैसे देशों से आती है। आप सोच लीजिए कहाँ वो कहाँ ये। और यहाँ पर आपको इतनी चीजें उपलब्ध हैं, उन देशों में नहीं है। जैसे कि एक सिल्क का कपड़ा अगर वहाँ पे आप दिखायें तो लोग सोचते हैं कि आपसे रईस और कोई नहीं होगा। अगर कॉटन आप पहनते हैं तो लोग सोचते हैं कि आप इतने रईस हैं कि कॉटन आप कैसे पहन लेते हैं। वहाँ तो हर समय आप नाइलॉन ही पहनिये, उसके सिवा आप कुछ पहन ही नहीं सकते। और कॉटन भी

पहनते तो उसमें भी नाइलॉन मिला रहता है। क्योंकि वहाँ इतना महंगा है, कॉटन पहनना कि लोग तरसते रह जाते हैं । | वहाँ की वायल अगर आपको बताऊं, अभी भी वायल वहाँ पर मैंने देखी थी, जो करीबन दो सौ रुपये गज थी । इसमें की हम दो सौ रुपये में अच्छी साड़ी यहाँ की वोयल ही लें, दो सौ तो बहुत हो गये। ऐसे देश में यहाँ की इस तरह की उपलब्धियाँ नहीं है, यहाँ आदमी आसानी से नहीं रह सकता। ऐसे देश में लोगों का बाहर जाना, और बाहर की निसर्ग की व्यवस्था करना बिल्कुल ही जरुरी है। उसके बगैर वो रह नहीं सकता। वहाँ कोई रह नहीं सकता इस तरह से कि जैसे आप रहे हो। | लेकिन आपका देश ऐसा नहीं है। आपका देश परमात्मा ने विशेष रूप से बनाया होगा। यहाँ आप रात को चाँद-सितारे देख लेते हैं। सबेरे सूरज देख लेते हैं । वो लोग तो सूरज देखने को तरसते हैं। ऐसे-ऐसे अजीब देश हैं वहाँ छ:-छः महिने सूरज ही नहीं आता । तो इस बढ़िया देश में, यहाँ के मनुष्य को रोजमर्रा के जीवन के लिए कोई बड़ी तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं है। ऐसे देश में लोगों ने परमात्मा की ओर ध्यान दिया और सोचा कि ये जो सृषटि बनायी गयी है और जो हम भी बनाये गये हैं इसका बनाने वाला कौन है? किसने बनायी होगी? और वो कौनसी शक्तियाँ हैं जो अंतर्हित है, जो इसके अन्दर, करंट से जो उसको चलाता है। और उन्होंने मनन शक्ति से इसकी खोज की। और उन्होंने पता लगाया कि हमारे अन्दर परमात्मा की प्रचंड शक्तियाँ हैं। हमारे अन्दर परमात्मा का प्रतिबिंब है, जिसे हम ‘आत्मा’ कहते हैं। और ये जो आत्मा है, इसको जब मनुष्य पा लेता है, जब आत्मा से संबंधित हो जाता है तो उसकी प्रचंड शक्तियों के द्वार खुल जाते हैं। और फिर उसके हाथ से परमात्मा की दैवी शक्ति बहने लग जाती है और वो पुरुष भी दैवी हो जाता है। इस पे जितना काम इस देश में हुआ है और हजारों वर्ष पहले उतना कहीं भी नहीं हुआ है। इसलिए अपने देश को योगभूमि कहते हैं। आपको धन्यवाद देना चाहिए परमात्मा को और सोचना चाहिए कि आपकी भी कोई पूर्व जन्म की सम्पदा होगी जो आप इस भारतवर्ष में पैदा हो गये। अब यहाँ की, जरूर आप कह सकते हैं कि यहाँ की बिजली ठीक तरह से नहीं चल सकती या कह सकते हैं कि यहाँ की बसे ठीक तरह से नहीं चल सकती, यहाँ की ट्रैम ठीक तरह से नहीं चलती। वो मनुष्य की बनायी हुई व्यवस्था है, वो अजीब सी है। हो सकता है कि वहाँ की कुछ अच्छी हो गयी हो। लेकिन जो अन्दर की व्यवस्था, सर्वव्यापी व्यवस्था है, सर्वव्यापी शक्तियाँ हैं तो वो इतनी ज्यादा एफिशियन्ट है कि जब उसको आप पा लेते हैं, यहाँ बैठे-बैठे आप काम कर लीजिए सारे, आपको कहीं जाने की जरूरत ही नहीं , किसी से बातचीत करने की जरूरत ही नहीं । यहीं बैठे – बैठे सबको टेलिफोन कर लीजिए। अब आपको सुनकर आश्चर्य होगा लेकिन जैसे समझ लीजिए कि इस जगह आपको कोई चित्र तो दिखायी नहीं दे रहें हैं। इंग्लैण्ड में क्या हो रहा है वो दिखायी तो नहीं दे रहा है, जपान में क्या हो रहा है कुछ दिखायी नहीं दे रहा है लेकिन यहाँ जो हो रहा है वो सब दिखायी दे रहा है। अगर आप एक टेलीविजन लगा दीजिए तो आप उसमें सब देख सकते हैं। उसी प्रकार जब आप भी एक यन्त्र हो जायें टेलिविजन के जैसे और उस सर्वव्यापी शक्ति से एकाकार हो जायें तो आप भी यहीं बैठे -बैठे कार्यान्वित हो सकते हैं। और बहुत इफिशियन्ट कार्य में पड़ सकते हैं। आपसे ऐसे-ऐसे कार्य हो जाएंगे कि आपके समझ में नहीं आयेगा कि आपने ये काम कैसे कर लिया। आप हर एक चीज़ में अपना प्रभुत्व जमा सकते हैं। एक तरीका है कि मशीन से आप सब चीज़ें चला लीजिए। मशीन से, आप सोचते हैं कि आपने पंचमहाभूत तत्वों को जीत लिया है। नहीं जीता है आपने, इतना कि एक मननशील व्यक्ति जीत सकता है। अगर मननशील व्यक्ति चाहे तो आकाश में बादल खड़े कर दे। अगर चाहे तो हवा चला दे। अगर चाहे तो

ठण्डक कर दे, चाहे गर्मी कर दे, चाहे सूर्य को बुला दे सब चीज़ कर सकता है। पाँचों तत्वों को वो अपने हाथ में ले सकता है। इन शक्तियों को जब वो जान लेता है और इन शक्तियों को जब जागृत करने की शक्ति उनमें आ जाती है, जब वो अपने सूत्र पर जा कर के और उनके भी सूत्र पर चला जाता है, जब अपने प्रिन्सीपल को भी जान कर के उनके भी प्रिन्सीपल पर चला जाता है तो हर चीज़ को कंट्रोल कर सकता है। वो हर चीज़ को बना सकता है। अब यही जगह है, आप नहीं जानते हम जब पहली मर्तबा आये थे तो एकदम बंजर बस्ती थी, एकदम उजाड, यहाँ आफत मची हुई थी। जब मैं यहाँ आयी तो लोग कहने लगे, ‘ये तो भयानक जगह है माँ। मैंने कहा ‘क्यों?’ कहने लगे कि, ‘यहाँ तो भूत घूमते हैं रात में। कुछ लोग मर गये। यहाँ रात में कोई किसी पे डाका डाल देता है। कुछ समझ में नहीं आता है ये ऐसी बंजर बस्ती है, इसको क्या करें। इसके लिए कोई इलाज आप कर दो। यहाँ इतने गंदे-गंदे लोग अन्दर आते हैं। सब रात में यहाँ आ कर के परेशान करते हैं मानो जैसे कि यहाँ कोई भूतों का राज हो।’ ये बहुत आपको मैं बता देँ-पाँच-छ: साल पहले की बात होगी ज्यादा से ज्यादा, या सात साल पहले की बात। तो मैंने कहा, ‘अच्छा, ठीक है, आप ऐसा करो कि तीन नारियल लेकर आओ ।’ अब देखिये कितनी सीधी सी चीज़ है । तीन नारियल मँगवायें और कुछ खास काम नहीं किया और उस नारियल को मैंने जागृत किया, बस, कर सकते हैं आप उसके अन्दर वाइब्रेशन्स दे दीजिये। उसके अन्दर वाइब्रेशन्स आ गये तो हो गये जागृत। अब ये वाइब्रेशन्स जो हैं, ये सोचते हैं और ये चलते हैं, ये आक्रमण करते हैं, ये अंकुश-पाश आदि सब रखते हैं। सारी देवी की शक्तियाँ इनके पास होती है। और इससे जो भी कार्य करना है करते रहे। वाइब्रेट करके हमने कहा, ‘अच्छा तीन आप यहाँ पर नारियल लगवा दीजिए।’ उस दिन से धीरे-धीरे यहाँ से भूत लोग भागना शुरु हो गये। आज बता रहे थे भटजी ‘यहाँ पर भी एक-दो ऐसे आते हैं, फिर पता नहीं क्यों उल्टे पाँव भागते हैं। अन्दर नहीं घुसते।’ उनको पता रहता है क्योंकि जो उनके अन्दर भूत होते हैं उनको पता होता है कि ये क्या चीज़ है। जो अब इसका मैं बहुत ही साइंटिफिक आपको मैं बताऊंगी। जो वाइब्रेशन्स के बारे में आपको मैं कह रही थी, आज हाथ से बह रहे थे आपके, इनकी महत्ता बतायें ! राहुरी करके एक बड़ा भारी कृषि अनुसंधान संस्थान है यहाँ। जहाँ पर एक बड़ा भारी विद्यापीठ है, बहुत बड़ा, इससे कम से कम दस गुना बड़ा होगा, बहुत बड़ा। पच्चीस मील के घेरे में बना हुआ , बहुत सुन्दर है वहाँ पर विद्यापीठ। और उस विद्यापीठ में बड़े चुने हुए लोग काम करते हैं। इस राहरी के विद्यापीठ में बड़े-बड़े शोधक, जिनको कहना चाहिए कि सहजयोगी, वहाँ के प्रोफेसर्स थे। वो हमारे पास आयें और हमसे कहने लगे कि, ‘माँ, राहरी में इस कदर दंगा-फसाद होता है, इस कदर मारा-मारी होती है, कुछ समझ में नहीं आता क्या करें। बड़ी आफत है यहाँ पर, पता नहीं कैसी इतनी बड़ी गंदी – गंदी शैतान की जैसी गंदी भूमि हो गयी है और हर तरह का प्रश्न बना हुआ है। कैसे इसको ठीक करें।’ मैंने कहा, ‘कुछ नहीं, फिर से तुम तीन नारियल ले आओ। उसको हम वाइब्रेट कर देते हैं।’ वाइब्रेट करने का मतलब है कि उसके अन्दर प्यार के वाइब्रेशन्स डाल दें। प्यार की शक्ति को आज तक किसीने आजमाया ही नहीं है। सब जो है हेट्रेड़ की शक्ति का इस्तेमाल करते हैं। प्यार की शक्ति जो कि यह चैतन्य की लहरियाँ हैं इसे आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी के नाम से बताया हुआ है, जो कि सारे संसार का चालन करती है। मैंने बताया हुआ है कि सबसे पहले परमात्मा ने पावित्र्य को बनाया है। इस पवित्र प्रेम, जिससे कि सारी सृष्टि का संचालन होता है, उसकी शक्ति को किसीने जाना ही नहीं, ना उसका इस्तमाल किया। हमारी जितनी भी राजकीय संस्थायें हैं, सब जो है नफरत पे बसी हुई है। अगर वो जाने कि हमारे अन्दर कितनी प्रेम की शक्ति है तो सारे युद्ध वगैरा खत्म हो कर के संसार में सुबत्ता आ जाये। अब आपसे मैं बता रही

थी किस्सा ‘प्रेम की शक्ति का । तो वो ये तीन नारियल हमारे पास ले आये और कहने लगे कि, ‘माँ, इसको कुछ कर दीजिये। यही हम वहाँ गाड़ देंगे हमारे गार्डन में।’ मैंने कहा, ‘अच्छा, ठीक है।’ उनको वही तीन हमने वाइब्रेट कर के दे दिये। अब देखिये यही चैतन्य की शक्ति उसमें भर दी गयी है और उन्होंने जा कर के ये नारियल वहाँ गाड़ दिये। उसके बाद वहाँ कुछ गलती से उसके उपर एक सीढ़ी भी बन गयी । किसी ने सीमेंट डाल दिया। कुछ दिनों बाद हमने देखा कि वो सीमेंट सब टूट गया और उसके अन्दर से तीन पेड़ निकल आयें। अब वो जगह ऐसी है कि वहाँ पर नारियल का पेड़ उगता ही नहीं। दूसरा ये कि सूखे वाले नारियल थे, बिल्कुल सूखे हुये। वो सूखे नारियल मुझे ला के दिये उन्होंने, जो कि कहीं भी नहीं उगते। वो भी वहाँ उग आये और उसके अन्दर से तीन पेड़ निकल आयें। और जब इन तीन पेड़ों की ओर हाथ कर के देखा गया तो उसमें से वाइब्रेशन्स आ रहे थे | उसके बाद आज वही यूनिवर्सिटी, जिसमें इतने दंगा-फसाद और इतनी आफत मची थी, आज बहुत सुन्दर तरिके से चलने लगी। उन तीन नारियल की वजह से। उन लोगों से आप जा कर पूछ सकते हैं कि ये बात सही है या नहीं। पहली मर्तबा जब आदमी परमात्मा को पाता है, जब उसके अन्दर से आत्मा का स्पन्दन बहुता है तो पहली मर्तबा वो निसर्ग को कुछ देता है। हर समय हम निसर्ग से लेते रहते हैं । हम उसको कुछ दे नहीं पाते। पहली मर्तबा बतायें मनुष्य चैतन्य उसे दे कर के और जागृत कर सकता है। इसका एक और उदाहरण हम कि एक साहब थे, उन्होंने बहुत सा गेहूँ मुझ से वाइब्रेट करवा लिया और उसको बोया एक खेती में। वो भी उन्हीं, ये भी एक अनुसंधान संस्था है और गवर्नमेंट की रेकगनाइज्ड मतलब गवर्नमेंट की संस्था है। और जिसमें बड़े-बड़े संशोधक और शास्त्रज्ञ हैं। उन्होंने वो गेहूँ बोये और बो कर के उसका जो गेहूँओं का दाना आया, तो एकदम मोती के दाने जैसा और इतना सुन्दर और इतना चमकता हुआ, एक अजीब तरह की उसकी रौनक थी। उस गेहूँ को उन्होंने बोरो में भर कर क्योंकि वो भी दस गुना आया। पहले आता था उससे दस गुना आया। उसके बाद उस गेहूँ को बो कर के उन्होंने जब उसको देखा कि कितना ज्यादा बच गया है। उन्होंने उसमें से सोचा कि कुछ इसमें से गेहूँ बीज के लिए रख दिया जाए। उसके बोरे बना कर के उसको गोडाऊन में रख दिया। और उसमें किसी तरह से चूहों का बड़ा प्रकोप हो गया| बता रहे थे मुझे कि, ‘वहाँ पर ये जो खल्ली जिसे कहते हैं वो भी रखी हुई थी वो सब इन चूहों ने खायी, पर ये जो बोरे रखे हुए थे उनको एक छेद भी नहीं किया। वो चूहें तक समझते हैं कि दिव्य क्या चीज़ है! लेकिन आज कल हम इस कदर कृत्रिम हो गये हैं, इतनी कृत्रिमता से हम रहते हैं, इतना आर्टिफिशियल हम लोग हो गये हैं कि आपको दिव्य और दुष्ट में कुछ फर्क नहीं समझता। राक्षस और दैवी प्रवृत्ति दोनों में कुछ समझ में नहीं आता है। आपने पूछा था कल, मैंने में हैं। किसीकी समझ में नहीं आता। सब भ्रम में बैठे हैं कि कौन राक्षस है और कौन कहा था, यहाँ। सब कन्फ्यूजन दिव्य! ये आज हमारी हालत हो गयी है। इस कदर हम अपनी मनुष्यता से भी गिर गये हैं कि जिसकी वजह से हमें ये संवेदन था कि हम पहचान पाते थे कि राम कौन है? सीता कौन है? कृष्ण कौन है? आज इस कलयुग में ये भी पहचानना असम्भव हो गया है कि ये राक्षस है, रावण है या ये राम है। उन चहों को है। इसी प्रकार अनेक आपको मैं बातें बता सकती हूँ, जिससे ये दिखा सकते हैं कि ये जो चैतन्य हमारे अन्दर से बहने लग जाता है इस चैतन्य से हम संसार की सब चीज़ पर प्रभुत्व करें, राज्य करें लेकिन ये प्यार का और प्रेम का राज्य है। अब बहुत से लोगों का ये हमेशा कहना रहता है कि, ‘माँ, अगर आप कहती हैं कि हमारा देश योगभूमि है और यहाँ पर मनन करके सारी चीज़ों का इतना पता लगाया था, तो हमारे देश की आज ये दर्दशा क्यों है? सभी लोग मुझ

से पुछते हैं, ‘तो हमें बड़ा शस्य श्यामला होना चाहिए।’ अगर हमारे यहाँ इतने बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हो गये और ऐसे-ऐसे बड़े-बड़े लोग हो गये जिन्होंने इतनी बड़ी-बड़ी चीज़ों का पता लगाया। तो आज हमारे देश की ये दर्दशा क्यों है?’ ये तो ऐसे ही है कि कीचड़ में अगर कमल खिल गये तो कमल दुःखी, कहे कि ‘भाई, कीचड़ तुम भी कमल हो जाओ।’ ये तो हम लोग कीचड़ हैं ही ऐसा लगता है मुझे। हम लोगों ने कुछ किया है इसके मामले में? ये सोचना चाहिए। आज भारत वर्ष में ऐसे कितने लोग होंगे जिन्होंने आदि शंकराचार्य ने क्या किताबें लिखीं, ये भी जानते हैं। शेली, कीट्स, ये वो, दुनिया भर के फालतू लोग, बायरन, वायरन वगैरे जिनका नाम सुबह-शाम लीजिए तो गंगाजी स्नान करना पड़ेगा इतने गरन्दे चरित्र के लोग हैं। ऐसे गन्दे लोगों के बारे में पढ़-पढ़ के, और हम लोग सोचते हैं कि हमने बड़़ी विद्वत्ता करी। ऐसे हिन्दुस्तानियों को और भारतीयों को क्या परमात्मा आशीर्वाद देगा । जो लोग अपने को बहुत भारतीय , भारतीय बना कर घूमते हैं, वो तक नहीं जानते कि हमारे अन्दर कुण्डलिनी नाम की एक बड़ी पवित्र शक्ति विराजित है। आश्चर्य की बात है कि मेकॅलो साहब अंग्रेजी दे गये, उन्होंने ये तक नहीं बताया कि आप अपनी चीज़ों का अध्ययन ना करें, अपने बारे में न जाने, हमारे अन्दर कौनसे-कौनसे शास्त्र और कौनसे- कौनसे गहन कार्य किये रखे हुए हैं उनका संशोधन न करें। यहाँ बैठे साइकोलॉजी पढ़ रहे हैं, यहाँ बैठे सारे विदेशी सब चीजें आप पढ़ रहे हैं, इनके पास है क्या? आज आप देख रहे हैं हमारे साथ में दो बहुत बड़े डॉक्टर्स आये हुए हैं विलायत से, वो खुद कहते हैं कि, ‘आप लोगों को लगता है कि मेड्सीन इज इरेलेव्हंट’ । ये सब चीजें जो मैं बता रही हूँ, ये सब हमारे यहाँ लिखी हुई हैं। कोई पढ़ता ही नहीं। किसी को समय ही कहाँ है। हम लोग तो सब अंग्रेज हो गये हैं। हम अपने बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहते। अगर हम आज जानते होते कि हमारा देश कितना पवित्र है और इस देश की पवित्रता सबसे ऊँची चीज़ है जिस पर आज सारा संसार टिका हुआ है। अगर हम जानते होते कि इसी देश में बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने इतनी बड़ी साधना से इतनी बड़ी चीज़ का पता लगाया हआ है। और उसको अगर हम पाते, हमारे यहाँ का लक्ष्मी तत्त्व अगर हम जागृत कर लेते तो क्या मजाल है कि आज हमारी ये दशा हो जाती। हमारे जैसा भिखारी तो कोई है ही नहीं। और इतने अन्धेपन की हद है कि घर में सारी लक्ष्मी सम्पत्ति भरी होते हये भी हम लोग इन परदेसियों की ओर हाथ अपना बढ़ाते हैं। और वहाँ के कौन से ज्ञान को हमने संपादन किया है । इन लोगों ने अपने कौन से ज्ञान से, कौन सी विशेषता दिखायी हुई है कि जा के देखें कि इनके देशों में क्या-क्या हालात हुए हैं। सड़-गल गया है इनके देश में। इनकी व्यवस्थायें सारी टूट चुकी है। इनकी सामाजिक व्यवस्थायें सारी टूट चुकी है। आप रास्ते से शाम को छ: बजे नहीं निकल सकते। इस कदर अराजकता, चोर-उचक्के बच्चे पैदा हो रहे हैं वहाँ पर। एकदम राक्षसी प्रवृत्तियाँ वहाँ पर विहार कर रही है। हालाकि हम लोग भी उनका अनुकरण कर रहे हैं। हम कुछ कम थोड़ी ही है। इतनी गधापनकी वो कर रहे हैं कि उससे ज़्यादा हम करके अंग्रेज बनने वाले हैं । इसी में हमारी सारी विशेषता आ गयी है। संस्कृति के नाम पर भी जो कुछ भी हम बेच रहे हैं और जिसका हम ढिंढोरा पीट रहे हैं उसमें कोई तत्व नहीं है। हमारा जो तत्त्व है उसे हम लोग खोजते नहीं है। हमारा जो अन्वेषण हुआ है, जो हमारी मालूमात उस चीज़ को कोई जानना नहीं चाहता है और जो दो-चार आये भी जिन्होंने कहा भी कि हम जानते हैं उनसे बढ़ के तो चोर मैंने देखे नहीं है। कुण्डलिनी के नाम पे दुनियाभर की गन्दगी करना यही काम आज कल तांत्रिकों का हो गया है। कुण्डलिनी आपकी माँ है । आप समझते हैं माँ माने क्या चीज़ है। कितनी पवित्र चीज़़ है, कितना पवित्र रिश्ता है । आपकी माँ है, हर एक इन्सान की अलग-अलग एक-एक कुण्डलिनी माँ है। और उस कुण्डलिनी की जागृति करना है और उसमें

आप अवलम्बन करते हैं गन्दी चीज़ों का। अपने माँ के साथ आप गन्दा व्यवहार करें तो ये गाली होती है। कम से कम एक भारतीय को तो समझना चाहिए कि कुण्डलिनी इस तरह से जागृत कैसे होगी अगर वो हमारी माँ है। और जिस परमेश्वर ने हमें बनाया है इतनी खूबी से। आज एक अमीबा से इन्सान बनाया गया है और आज हमें एक इंच भी पता नहीं चला। ये पृथ्वी इतनी जोर से घूमती है हमें एक इंच भी पता नहीं चलता है। इसने जिस तरह से हमें सम्भाल के रखा है, गुलाब के फूल से भी कोमल उसने हमें बनाया हुआ है। उस परमात्मा ने क्या ऐसी ही चीज़ हमारे अन्दर रखी होगी कि जिसके जागृत होने से हमें नुकसान हो गया। उसके बारे में कुछ भी जानना दकिया-नुसी ने हो गया। इस तरह की उल-झनऊ हालत है। जब कि एक तरफ धर्मान्धता तो है ही, कबीर ललकारा, नानक ने ललकारा है, तुकाराम ने ललकारा है, ज्ञानेश्वर ने कहा हुआ है। किसने नहीं कहा है कि धर्मान्धता परमात्मा नहीं है, तो उनको पकड़-पकड़ के सूली पर चढ़ाये। इसी देश में लोगों को सताया। और आज भी यही हालत है, हमें वो लोग अच्छे लगते हैं जो कि सर्कस दिखाये, थोड़ा बहुत तो बेवकूफ बनाये, और वो लोग बहुत अच्छे लगते हैं जो थोड़ा बहुत आपसे रुपया-पैसा लें। क्योंकि माताजी कहती हैं कि, ‘मुझे आप क्या दोगे बेटे। मैं तो तुम्हारी माँ हूँ। ऐसी बात नहीं करना’ तो माँ नहीं है पसन्द! अगर आप किसी को दो-चार पैसे से खरीद सके तो आपका अहंकार भी तृप्त होता है इसलिए आपको ऐसे लोग पसन्द आते हैं। और वो अच्छे, आराम से, आपके अहंकार को कूट कर के तीस- चालीस करोड़ रूपया बना कर के आपको बेवकूफ बना कर के एक दिन गुम हो जाएंगे। और आपको बेवकूफ बनना ही अच्छा लगता है, तो बेवकूफ बने रहिये। पर कम से कम इसका दोष परमात्मा को नहीं देना चाहिए। इसका दोष मनुष्य का है। विशेष कर भारतीय लोगों का है। इनका चित्त गया कहाँ है ? आज भारतीय लोगों का चित्त कहाँ अटका हुआ है। पहले तो ठीक था। गुलामी थी, गुलामी की जंजीरें थीं , उसे तोड़ना है । गुलामी भी नहीं है अभी अगर हमारा चित्त इधर रहता तो। हमारा चित्त रहा एक-दो आदमियों पर। एक-तो बिचारे मेहनत करते थे, आत्मा को पाते थे और वो जैसे ही उस जगह से आये और करुणा में अगर वो आपके सामने आ कर कुछ कहना शुरु कर दे तो उसका कारण आप लोग हैं। लेकिन अंग्रेजों के गले में तो आपने हार पहनायें। इतना ही नहीं उनका बाना भी आपने पहन लिया और आज भी उनके झंडे फेहरा रहे हैं। अंग्रेजी से मेरा मतलब इंग्लिश लोगों से ही नहीं है। मेरा मतलब है उस सभ्यता से है जिसे कि हम पाश्चिमात्य कहते हैं, जो खोखली है। उसके अन्दर कोई तत्व या प्रिंसीपल नहीं है | उटपटांग है बिल्कुल। बड़े-बड़े मैंने शास्त्रों वाले देखे वहाँ । मैं उनसे पूछती हूँ, ‘आपको मिला क्या?’ सॉक्रेटिस का जमाना तो कुछ और था। उन्होंने जो बातें कहीं वो वहीं के वहीं रह गयी। उनको ताकते रह गये। सबने कहा, ‘चलो परमात्मा नहीं है, यही बात अच्छी है। पीठ कर के बैठ जाओ।’ अब आगे बोलो। पहले तो परमात्मा को खत्म करो, फिर आगे की बात करो। तो अब क्या पता लगा रहे हैं आप, पत्थर! बिजली का पता लगा दिया। बहुत कमाल कर दिया। क्या फायदा हुआ बिजली का पता लगा कर के। अपनी तो आँखें आपने अभी तक खोली नहीं। चन्द्रमा पे आप चले गये, तो कौन बड़ा भारी कमाल कर दिया आपने। कैन्सर की बीमारी तो आप ठीक नहीं कर सकते। लेकिन हम लोग कर सकते हैं। सहजयोग से कैन्सर की बीमारी हम ठीक कर सकते हैं। इतना रुपया वो लोग खर्च करके, इतना उपदव्याप करके उन्होंने क्या दिया आपको? शराब! और आज की इनकी सभ्यता उनके घरों कों तोड़ रही है। सबको मिटा रही है। हमारी जो पुरातन चीज़ें हैं उसकी ओर आपको ध्यान ले जाना चाहिए और सोचना चाहिए कि हमारे शरीर के बारे में जो कुछ भी वर्णन किया गया है कि हमारे अन्दर ही जो जो शक्तियाँ हैं इसे हम दैवी शक्ति के नाम से जानते हैं, उसे पहचनना चाहिए ।

इतना ही नहीं लेकिन जिसे हम आत्मज्ञान के नाम से जानते हैं उस आत्मा को पाना चाहिए। इसकी व्यवस्था जितनी इस देश के लोगों में है उतनी उन देशों में नहीं। वहाँ हजारों लोग मेरे प्रोग्राम में आते हैं यूँ हो जाते हैं (पार) लेकिन पाने वाले कम हैं। यहाँ पर बहुत कम आते हैं लेकिन सबके सब करीबन पा लेते हैं। कहते हैं ना ‘दाँत हैं तो चने नहीं, चने हैं तो दाँत नहीं’ वो हालत है। यहाँ लोग आते ही नहीं, उनको फुर्सत ही नहीं है। बहुत बिजि लोग हैं अपने देश में । लड़ाई- झगड़े करने में, एक- दूसरे के गले काँटने में इस कदर बिजि हैं कि उनके पास फुर्सत नहीं है, आत्मा का ज्ञान लेने का। कौन पड़े ऐसे झगड़ों में! लेकिन जो सारे ज्ञानों का ज्ञान है इसका पाना सारे पाने से ऊँचा होता है। उसको पाना चाहिए और वो टाईम आ गया इसलिए आप लोग पा रहे हैं। कहते हैं जिसे कि ‘ब्लॉसम टाईम, बहार का टाईम’ आ गया। इसलिए आप इतने मजे से पा रहे हैं, इसको पा लेना चाहिए। मैं आपको बताना चाहती थी कि कुण्डलिनी क्या है और कहाँ स्थित है और उसके चक्र वगैरे कहाँ हैं लेकिन अब इन लोगों को देखिये कि कोई लाये नहीं उन लोगों को। तो कल मैं बताऊंगी कि सबेरे आपको फिर ये कुण्डलिनी क्या है? कहाँ बसती है ? और किस तरह से उत्थान होता है उसका ? और इसके जो अनेक चक्र हैं वो कैसे बसे हैं? और उसमें कौनसे देवता हैं? ये देवता कैसे होते हैं, हैं या नहीं? इसकी क्या सीख है ? जो एक छोटी सी बात आपसे बतायें कि जो मैंने अभी कहा था कि ये भवसागर जो बना हुआ है हमारे पेट में, कि हमारे नाभि चक्र के चारों तरफ में है। इसलिए मैंने कहा था कि दस गुरु मुख्यत: आये। ये दस गुरु, अगर आप पुराने जमाने से देखें तो मोजेस, अब्राहम, सॉक्रेटिस आदि करते-करते राजा जनक, उसके बाद में मोहम्मद साहब, गुरु नानक, आखिर में आप अगर आयें तो अपने शिर्डी के साईनाथ; ये सब एक ही तत्व के अवतरण हैं। एक ही तत्व के; दत्तात्रेय के। अगर ये बात कही जाये तो शास्त्रज्ञ घबरा जाएंगे कि, ‘माताजी, ये क्या बात कर रहे हैं? लेकिन उसी शास्त्रज्ञ को जब पेट का कैन्सर हो जाता है तब देखिये क्या होता है! तब ये नक्शा दूसरा है। वो अगर डॉक्टर हो तो उससे भी बढ़िया नक्शा बन जाता है। एक तेहरान के डॉक्टर थे। उनको पेट में कैन्सर की बीमारी हो गयी। वो मेरे पास आये, तो मैंने कहा, ‘भाई, देखो तुम जरुरत से ज़्यादा धर्मान्ध हो, क्या ये सही नहीं?’ तो कहने लगे, ‘हूँ, मैं तो बस इस्लाम को मानता हूँ।’ इस्लाम की इतनी सी भी चीज़ जानते नहीं। मोहम्मद साहब को ज़रासे भी पहचानते नहीं, ‘हाँ में तो इस्लाम का हूँ।’ मैंने कहा, ‘अच्छा, इसलिए आपको कैन्सर हो गया।’ तो कहने लगा कि, ‘क्या?’ मैंने कहा, ‘हाँ!’ इस तरह की कर्मठता से ही कैन्सर की बीमारी पेट में हो जाती है बहत बार हमने देखा है। तो कहने लगे, ‘अच्छा।’ मैंने कहा, ‘तुमसे मोहम्मद साहब खुद नाराज़ हैं।’ कहने लगे, ‘क्यों ?’ मेंने कहा, ‘उनका जो अवतार हुआ है गुरु नानक का, उनको तुम मानोगे?’ कहने लगे, ‘कभी भी नहीं। में तो नहीं मान सकता हूँ उनको।’ मैंने कहा, ‘फिर मैं भी तुम्हे ठीक नहीं कर सकती जाओ|’ चले गये। एक तो कैन्सर की बीमारी ऊपर से खुद डॉक्टर; तो मालूम है कि ठीक तो नहीं होने वाली, तो फिर आये, ‘अच्छा, कहो माँ, मैं मानता हूँ।’ मैंने कहा, चलो, अब गुरु नानक का नाम लो, दत्तात्रेय का नाम लो।’ शुरु कर दिया उन्होंने। उनकी तबियत ठीक हो गयी। ऐसे एक ब्राह्मण देवता आये एक बार, अभी पूना मैं गयी थी। पूना आपको मालूम है कि ये ब्राह्मणों का गढ़ है। ये ब्राह्मण थोड़ी होते हैं क्योंकि जो पार नहीं हुए वो ब्राह्मण नहीं होते हैं। द्विज, जो दूसरी बार पैदा हो गये वही ब्राह्मण हैं। द्विज की कोई जात नहीं होती। वो जाति से परे, गुणातीत हैं। बड़ी उंची चीज़़ है ब्राह्मण होना। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। ये भी अलग-अलग गलतफहमियाँ हमारे अन्दर बैठी हुई है कि ‘हम जन्म से ब्राह्मण हैं। हम ब्राह्मण कुल |

में पैदा हुए तो हम ब्राह्मण हैं।’ और काम काहे का करते हैं, तो जूते बनाते हैं, जूते की फैक्टरी में, पर हैं ब्राह्मण! इस पर बहुत बड़ा एक बार वाद-विवाद खड़ा हुआ। कहने लगे कि, ‘ये गीता में लिखा हुआ है।’ मैंने कहा, ‘गीता-वीता तो मैंने पढ़ी नहीं । हाँ, मैं जानती सब हूँ। लेकिन लिख ही नहीं सकते। ‘ तो कहने लगे कि, ‘क्यों?’ मैंने कहा, ‘किसने लिखी गीता ?’ तो कहने लगे, ‘व्यास, व्यास मुनि ने।’ मैंने कहा, ‘व्यास किसका बेटा था। उसकी माँ कौन थी? भिमरीन थी। और उनका विवाह भी नहीं हुआ था पराशर मुनि से और उससे पैदा होते हैं व्यास मुनि! जिसके बाप का ही पता नहीं ऐसे व्यास मुनी, जिन्होंने गीता लिखी थी, वो क्या ऐसा लिखेंगे, कि जन्म से ही ब्राह्मण हो वही ब्राह्मण होता है। आप ही बताइये । कोई अपनी पैर पर कुल्हाडी मारेगा ?’ वाल्मिकी कौन थे ये आप जानते हैं । हर जगह जहाँ-जहाँ अवतार आये हैं, आपने देखा है, कि कृष्ण जा कर के विद्र के यहाँ साग खाई थी। क्यों खायी थी? ये नहीं कि उनको खाना नहीं मिलता था । जान कर के उन्होंने जा कर, खा के दिखाया था कि जाति- पाति का जो ये ढोंग-ढ़कोसला है वो खत्म होनी चाहिए। राम ने एक भिलनी के मुँह के बेर खाये। आप लोग खा सकते हैं? एक बुढ़ी भिलनी, गंदी, मैली, कुचैली कपड़े पहनी हुई, जिसके दो ही दाँत बचे ह्ये हैं। उन दाँत को उन बेरों में थोप-थोपकर के लादे। आप खायेंगे? आप में से कितने लोग हैं जो इस बेरों को खायेंगे? पर श्री राम ने इसे खाया। खाया ही नहीं, उसका वर्णन इतना सुन्दर है कि खा के कहते हैं कि, ‘देखो भाई, ये मेरे बेर हैं मैं तो किसी को नहीं देने वाला, ऐसे मैंने कभी खाये नहीं। अमृत-तुल्य बेर हैं।’ वो सीताजी को छेड़ के कहते हैं कि, ‘तुमको भी नहीं देने वाला मैं।’ तो सीताजी कहती हैं, ‘कुछ तो दे दीजिए हमको भी प्रसाद, ऐसा भी क्या ! हम भी तो कुछ खा लें। क्या आप ही सब खाईयेगा?’ पहले तो लक्ष्मण जरा नाराज़ खड़े हुए थे। और सीताजी ने खा के वो बड़े खुशी से बोला, ‘हमें भी दे दीजिए भाभीजी थोड़ा सा। हम भी खा लें।’ इतना सुन्दर वर्णन है उस प्रेम का, जिस प्रेम से भिलनी ने दिया था। हर जगह इस प्रेम की महत्ता, हर जगह है इस देश में, हर अवतारों में है, हर गानों में गायी गई। और हम लोग हैं कि अभी जातीयता ले कर के उस पे से इलेक्शन लड़ते हैं। मैं तो कहती हैं कि इन लोगों का दिमाग खराब है क्या ? जाति जन्म के अनुसार हो ही नहीं सकती। ये तो हर एक की प्रवृत्ति के अनुसार बनायी गयी थी। जिसकी जैसी प्रवृति होती है, वैसे होते थे। जितने भी लोग सत्ता में खोजते थे परमात्मा को या आनन्द को उसको क्षत्रिय कहा जाता था। और इसी प्रकार जो ब्रह्म में परमात्मा को खोजते थे, या ब्रह्म में जो आनन्द को खोजते थे उनको ब्राह्मण कहा जाता था। आप लोग ब्राह्मण है क्योंकि आप परमात्मा को खोजते हैं। इस तरह की जाति-पाति आदि अनेक तरह के विकृत काम करने से ही हमारे देश का आज ये हाल हो चुका है। अतिशयता तक पहुँच गये हैं। कुछ समझ में नहीं आता है कि जब ये किसी के शास्त्र में लिखा नहीं गया। अगर आप हिन्दू धर्म के प्रणेता श्री आदि शंकराचार्य को मानते हैं। तो | उनको कभी पढ़ते ही नहीं , मेरे ख्याल से कोई अगर पढ़े तो उन्होंने यहाँ तक कि ये लिखा है कि ‘न योगे न साँख्ये’ कुछ भी इसमें काम नहीं करता। उन्होंने कहीं भी जाति पर लिखा ही नहीं । मेरी समझ में नहीं आता कि कौन सी किताब पढ़ कर आप जातीयता ला रहे हैं संसार में? कहीं भी उन्होंने नहीं लिखा। उन्होंने तो सिर्फ माँ की प्रशंसा लिखी है। विवेक चूडामणि जैसा विद्वत और इतना सुन्दर ग्रंथ लिखने के बाद उन्होंने लिखा है ‘चैतन्य लहरी’ या ‘सौंदर्य लहरी’ जो अपनी माँ का ही वर्णन उन्होंने कर दिया है। सारा मन्त्र उसने उसमें लिखा हुआ है। एक-एक श्लोक में मन्त्र लिख दिया। उस आदमी को समझने की जगह पता नहीं कहाँ से ढकोसले निकाल के लाये हैं। और इसको ‘हम इतने भारतीय हैं।’ जिस भारतीय को कुण्डलिनी के बारे में मालूम नहीं और सही से पता नहीं मैं उस को

कभी भी भारतीय नहीं कहूँगी। मेरे पति तो आप जानते हैं कि सरकारी नौकर रहे हैं। मुझे एक सरकारी नौकर मिला नहीं जो कुण्डलिनी को नाम से जानते हैं। आश्चर्य की बात है! मैं जापान गयी थी वहाँ लोग कहने लगे कि, ‘साहब, ये कुण्डलिनी, इसके बारे में आप कुछ बताईयेगा ।’ वो लोग मुझसे पूछ रहे थे। कहने लगे, ‘आज तक हमें कोई नहीं मिला हिन्दुस्तानी, जिसने कुण्डलिनी नाम जाना है। वो तो कुण्डली जानते हैं, बस् होरोस्कोप, पर कुण्डलिनी कोई नहीं जानता।’ और इसका जो शोध है, इसकी जो खोज है ये आपके सारे संसार के एटमबॉम्ब, दुनियाभर की सब चीजों से उंची खोज है । इससे सारा ही ट्रान्सफोर्मेशन इन्सान का हो जाता है । कितनी डाइनैमिक है ये चीज़़ । कितनी प्रचंड इसकी शक्ति है। लक्ष्मी तत्व को जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के सिवाय कोई मार्ग ही नहीं । बाह्य से अब इन देशों ने उन्नति कर ली है लेकिन अन्दर से खोखले हो चुके हैं। हम लोगों ने बाह्य से तो उन्नति नहीं की, और अन्दर की जो कुछ चीजें हैं उसको भी जाने दिया। अगर हम जागृत हों उन शक्तियों के प्रति, जिसका पता बहुत सालों पहले लग चुका है इसको सिर्फ जानना मात्र है। तो वो दिन दूर नहीं कि सारा संसार इससे सुख प्राप्ति करे, इससे आनन्द लुटेगा। लेकिन हमको पहले ये जान लेना चाहिए कि हम एक भारतीय हैं और हमारा ये हक है कि इसे हम जाने और इसे हम समझें। अब देखिये कि अमेरिका में और लंदन में डॉक्टर लोग हमें बुलाते हैं कि, ‘हमारे यहाँ आईये और आप हमें सब समझाईये।’ अभी तक तो मैं इसे किसी तरह से टालती रही। मैंने सोचा इसकी खोज, चाहे जो भी हो हिन्दुस्तान में हुई हो इसकी खोज, पर ये है सारी हिन्दूुस्तानी चीज़ । गणेश तत्व मैं इन लोगों को क्या समझाऊंगी? और यहाँ मैं डॉक्टरों से कहती हैँ मैं तीन बार लेक्चर कर चुकी, बस, उसमें लिखते बैठते हैं, पता नहीं क्या? लेकिन मैं कहती हैं। तनिक पार हो जाओ तो समझ में आयेगा, लेकिन पार नहीं होते। बीमार हो तो पेशंट भेज देते हैं। करें क्या इन लोगों का? और उपर से मुझसे कहते हैं कि, ‘आप सब स्टैटिस्टिक बना के लिखो कि किस किस को आपने ठीक किया। अब मुझे और कोई धंधा नहीं रहा ? मैंने कहा, ‘तुम लोग नहीं समझ सकते । तुम मशीन हो।’ मैं कोई पैसे के लिए काम नहीं करती। ये प्यार की बातें हैं ये तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी। आपके घर कोई खाना खाने वाले आयें तो क्या आप उनके नाम लिख के भेजते हैं कि कितने लोग मेरे यहाँ खाना खा के गये! इसने इतने निवाले खायें । इसने ये खाना खाया। ये मेरे प्यार का भंडार है, मैं क्या लिखते फिरुंगी कि मेरे दरवाजे कितने लोग आये और मेरे से प्यार कितने ले गये ? ये भी कोई तरीका है? ये कोई शराफत है? ये कोई डीसन्सि है? पर ये पैसे कमाने वाले लोग कैसे मुझे समझेंगे? हाँ, अगर उस जमाने के वैद्य होते तो समझ सकते। ये प्यार की बात है। प्यार में हम बाँट रहे हैं जिसको लेना हो ले, जिसको समझना है समझ लो, ये सब चीज़ मुफ्त में है। ये पूरी तरह से मुफ्त चीज़ है। प्यार जो है इतना मूल्यवान है कि इसकी कोई भी कीमत आप लगा नहीं सकते। उसका कोई भी मूल्य आप दे नहीं सकते। उसका सिर्फ आनन्द उठाने की बात है। और मैंने कहा, ‘आप मेरा सारा मज़ा किरकिरा कर रहे हैं, मुझे इस तरह की बातें मत सिखाईये कि इसका एक स्टैटिस्टिक बनाईये।’ मैंने कहा, ‘कोई नया-नया आपको यहाँ पे ऑडिटर बनाया हुआ है कि आप आ कर के हर एक चीज़ का हिसाब-किताब लिखाईये कि कितने लोगों को ठीक किया ? कितनों की बीमारी ठीक करी? क्या-क्या?’ मैं तो कभी किसी के पेपर भी नहीं जाँचती । मैं नाम तक नहीं पूछती। अभी आप जानते हैं कि सबेरे वो मल्टिपल स्क्लिअरोसिस की लड़की आयी थी, उसका मैं नाम भी नहीं जानती और वो ठीक हो गयी। बस वो आ के बैठ गयी चरणों में ठीक हो गयी, काम खतम। इसका नाम जानने की कौनसी बात है। क्या गंगाजी सबके नाम लिखते बैठती है कि कितनों ने उसके आँचल से पानी चुराया! इन लोगों को ये बात समझ में नहीं

आ सकती क्योंकि ये बारीकी, ये सुन्दरता इन लोगों में नहीं आ सकती है। ये समझ नहीं सकते। बहरहाल जो भी हो आप में से कितने लोग इसे समझ गये और इसे पा लिये, उतना ही मेरे लिए बहुत है। यही मेरे धन्यभाग है कि इतने लोग बैठ कर के इसे लेने के लिए इस देश में अभी भी मौजूद हैं और आ रहे हैं। पर तो भी एक बड़ी भारी बात मैं आपसे कहूँ कि आज भी मैंने कहा कि महाराष्ट्र में, गाँव में में काम करती हूँ और गाँव में काम जोरों में होता है । यहाँ पर भी मैंने देखा है कि जैसे देहरादून मैं गयी थी, देहरादून में लोगों में बड़ी संवेदना है । इसी तरह से यहाँ पर गाँव में जब मैं काम शुरु करुंगी तो मैं जानती हूँ कि बहुत हो जाते हैं जैसे सबेरे कहा था । और आप लोगों के लिए चोर भी बहत सारे तैयार हो गये। जैसे डिमांड होता है वैसे सप्लाय होता है, आपकी जेबें भरी हुई है। आपके लिए चोर भी हाजिर हैं। और वो आते हैं, आप पे फीस लगाते हैं, आप उनको फीस देते हैं और उनके लेक्चर सुनते हैं, बहुत धन्यभाग समझते हैं, वाह भाई, वाह ! हम फलाने के शिष्य हैं, हम ठिकाने के शिष्य हैं और बीमारी क्या? तो पैरेलिसिस। इस प्रकार आपको समझ लेना चाहिए कि अगर जोरो में काम होगा। शहर के लोग बहुत कृत्रिम आपको ऐसी कोई जीवन्त चीज़ चाहिए हो उसके लिए अपनी आर्टिफिशयालिटीस् को छोड़ना होगा। मेरे सामने आप सब बच्चे हैं और बेटे हैं। आप बड़े आदमी होंगे, राजा साहब होंगे , कुछ होंगे मेरी नज़र में तो बैठता नहीं है। मेरी समझ में नहीं आता। मेरी अकल नहीं है उतनी। बिल्कुल मेरी अकल नहीं। इसलिए आप बिल्कुल नम्रतापूर्वक इस चीज़ को स्वीकार्य करें और इसको माने और इसमें फिर जमें। जो इसमें जमता है वो ही पाता है। और जो जमना नहीं चाहता और जो बहुत सुपरफिशियली रहता है, उसको ये छू जाती, तो खतम हो जाती है। इसमें गहरी चीज़ है और गहरा आदमी चाहिए। और आपमें गहरापन है तो आप बहुत कुछ पा सकते हैं । एक बात जरुर कहूँगी, चाहे जो भी हो, पाश्चिमात्य देशों ने इस तरह से अपनी प्रगति कर ली है इसमें उन्होंने एक चीज़ को पा लिया कि संसार की जो जड़ता है उससे कभी भी आनन्द न ले सके। जड़ता से सिर्फ हम एक फार्म से दूसरा फार्म बनाते रहते हैं। सब मृत्यु की स्थिति बदलते रहते हैं अगर मरा हुआ पेड़ है तो उसकी कुर्सी बना लेते हैं। पर हम कोई भी चीज़ से आनन्द नहीं पाते, उल्टे हमें आदतें लग जाती है। इस चीज़ को इन लोगों ने जान लिया बुद्धि से और इसलिए जब इनको साक्षात हुआ कि सच्चाई क्या है तो मुश्किल से होता है, मैंने आपको बताया कि इन लोगों का जागरण मुश्किल से होता है, लेकिन जब हो जाता है तो जम जाता है। इन लोगों ने सब कुछ पढ़ डाला है। आदि शंकराचार्य पढ़ डाला। ये आप इनसे सुनिये, आपको आश्चर्य होगा कि ये पंडित कहाँ से आ गये। एक से एक विद्वान लोग, इनमें से थोडे से ही यहाँ आयें, लेकिन ये महा विद्वान लोग हैं। और इनको आप देख के आश्चर्यचकित होंगे कि इन्होंने सब चीज़ छोड़ कर इस पर कैसी जान लगायी और किस तरह से उसको मास्टर बनाया। आज आश्चर्य की बात ये है कि भारतीय अनुसंधान या भारतीय शास्त्र या भारतीय खोज को करने के लिए मुझे वहाँ जाना पड़ा है। कुछ ऐसा इत्तफाक हुआ कि हमें जाना ही पड़ा। हमारे पति वहाँ इलेक्ट हुए और वहाँ हमें ये लोग मिले हैं कि जिन्हें यहाँ लाना पड़ा कि आप लोगों की जागृति करें । वो दिन कब आयेगा कि इस भारतवर्ष के नौजवान सिनेमा के चक्कर और ऐसी फालतू की चीज़े छोड़ कर के कुछ गहरेपन में उतरें और यहाँ से परदेस में जा कर के अपनी देश की महत्ता बढ़ायें | इतना ही नहीं , ये जीवंत कार्य है, ऐसा दिन कब आयेगा पता नहीं। मैं उसी दिन की राह देख रही हूँ कि ऐसे नौजवान सामने आयें और अपने को इसमें समर्पित करें और इसे स्वीकारें । परमात्मा आपको शांति दें।