Birthday Puja

मुंबई (भारत)


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Birthday Puja. Mumbai, Maharashtra (India). 21 March 1979.

मेरा मन उमड़ आता है। आज तक लगातार बम्बई में ही ये जन्मदिवस मनाया गया। बम्बई में बहुत मेहनत करनी पड़ी है, सबसे ज्यादा बम्बई पर ही मेहनत की। लोग कहते भी हैं कि,”माँ, आखिर बम्बई में आपका इतना क्या काम है।“ पहले तो यहाँ पर रहना ही हो गया था, लेकिन बाद में भी बम्बई में काम बहुत हो सकता है, ऐसा मुझे लगता है।

हालांकि बम्बई पे कुछ छाया सी पड़ी हुई है। अभी दिल्ली में थोड़ा सा भी काम बहुत बढ़ जाता है | देहातों में भी बहुत काम हुआ है, हजारों लोग पार हो गये हैं, इसमें कोई शक नहीं। लंदन (London) जैसे शहर में भी बहुत काम हुआ है। लेकिन बम्बई के लोगों पे कुछ काली छाया सी पड़ी हुई है। मेरे ख्याल से पैसे के चक्कर बहुत जरुरत से ज़्यादा, बम्बई के लोगों में हैं। बड़ी आश्चर्य की बात है कि बम्बई में सालों लगातार मेहनत की है हमने, और सबसे कम सहजयोगी बम्बई शहर में हैं। इसका कोई कारण समझ में नहीं आता है। बहुत बार मैं सोचती हूँ और जब लोग मुझ से पूछते हैं कि, “माँ, आप बम्बई पे इतना क्यों अपना समय देती हैं? आखिर बम्बई में कौनसी बात है?” हालांकि शहरों से मैं बहुत घबराती हूँ। शहरों के लिए तो ठग लोग काफ़ी तैयार हो गये हैं क्योंकि आप की जेब में पैसे हैं और ठग आपको ठगना चाहते हैं। और आप लोगों के पास पैसा है, आप ठगों के पास ज़्यादा जाते हैं। जो लोग सर्कस बनाते हैं, उनके पीछे में आप दौड़ते हैं। हज़ारों लोग, ऐसे लोगों के लेक्चरों में दौड़ते हैं। असलियत को नहीं खोजते । वो पैसे की जो अहंकार देने की शक्ति है, उसको आजमाते हैं ।

लेकिन, तो भी बम्बई से मेरा बड़ा प्रेम है। उसकी वजह है बहत बड़ी – शायद आप लोग जानते हैं कि महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती तीनों का उद्भव इसी बम्बई शहर में हुआ है। इस धरती माँ ने, न जाने क्या सोच कर के, आपकी इस नगरी में ये पुण्य कार्य किया और ऐसी शक्तिशाली चीज़ जो कि कहीं भी, कहीं भी दुनिया में नहीं है, तीनों शक्तियों का यहाँ पर उद्घाटन किया है। लेकिन, लोग उस महालक्ष्मी के मंदिर में जा कर के भी सारे ही गलत काम करते हैं और उसके पास की जो महालक्ष्मी थी उसकी दौड़ है, उसमें अगर आप जा के देखो तो वहीं पे भीड़ लगी रहती है। न जाने लोग क्या खोज़ रहे हैं, इस बम्बई शहर में। मैं बहुत बार सोचती रहती हूँ कि इन लोगों के दिमाग कब खुलेंगे, कब ये लोग सोचेंगे, कब इनके दिमाग में ये बात आयेगी कि सब से बड़ी चीज़ आत्मा को पाना है। बगैर आत्मा को पाये आप परमात्मा को नहीं जान सकते। सब कुछ जो भी आप बाकी का कर रहे हैं, सब कुछ अविद्या है, सब कुछ व्यर्थ है। आप जानते हैं कि परमात्मा का साम्राज्य अबाधित चल रहा है, सारे संसार में। उसने सारी सृष्टि बनायी है और आपको भी इसीलिये बनाया है कि उस परमात्मा को जानें जो आप का कर्ता, सृष्टा और आपका पालनहार है। उसकी शक्ति को आप समझें। न जानें क्यों इन्सान इस तरह से भरमा गया है, इस तरह से गलत रास्ते पर चल पड़ा है, इस तरह से अपने जीवन को इतना उसने क्षुद्र बना दिया है।

हालांकि परमात्मा ने भी बहुत मेहनत की है, इस मानव को बनाने के लिये। आप जानते हैं कि एक अमिबा (amoeba) से आपको इन्सान बनाया गया है। एक आप अपनी आँख को टटोले तो आप को पता होगा कि ये आँख कितनी महत्त्वपूर्ण है। इस आँख को कितनी खुबसूरती से उस परमात्मा ने गढ़ा है। इस सारे शरीर को उसने कितनी सुंदरता से बनाया है। और इस शरीर के अन्दर वो पूरा यंत्र बना के रखा है जिससे आपको ये वरदान मिलने वाला है और ये चाबी आपके अन्दर खुलने वाली है। लेकिन इस बम्बई शहर में लोग सोये हुए हैं, बिल्कुल निद्रावस्था में लोग रहते हैं। पता नहीं किस चीज़ की मस्ती चढी हुई है, किस तरह का नशा यहाँ चढा हुआ है। मैं बार-बार आप लोगों को कहती हूँ कि आप जागिये, जागने का समय आ गया है। वास्तव में सहजयोग के मामले में आप जानते हैं, कोई ये नई चीज़ नहीं है। कबीर ने सहजयोग कहा हुआ है, नानक ने कहा हुआ है, राम ने जो किया वो सहजयोग ही था। जो नंगे पैर सारे भारतवर्ष में घूमे, आपके महाराष्ट्र में जो घूमे हैं; वो इसीलिये घूमे थें कि इस जमीन की, इस धरती, इस भारत माता के कण-कण में वो चैतन्य भरें। उनके पैर से चैतन्य बहता था। इस चैतन्य लहरियों को भरने के लिए उन्होंने यहाँ पर पदयात्रायें की। धरती माँ ने भी यहाँ पर अष्टविनायक की उत्पत्ति की हुई है। वो भी इसलिये कि चैतन्य की लहरियाँ बहती रहेंगी और लोग उसको जानते रहें।

उसके बाद कृष्ण ने जो कुछ भी किया वो भी सहजयोग ही था। पूरा सहजयोग था। राधाजी स्वयं साक्षात् शक्ति थीं। राधा – “रा” माने शक्ति, “धा” माने धारणे वाली, वो शक्ति थीं । जब वो अपने पाँव जमुना (River Yamuna) में डालती थीं तो वहाँ चैतन्य बहता था। उस पानी को जब वो अपने सर पर रखती थीं तो भी चैतन्य बहता था। उस पानी को वो कंकड़ मार के जमीन पर गिराते थे तब भी चैतन्य वहाँ डालते थे। जब गोपियाँ अपने सर पे जमुना का पानी रख के चलती थीं, तो उस पे भी कंकड़ मार करके उनके पीठ पर वो चैतन्य का पानी गिराते थे, जिससे उनकी जागृति हो जाए। जो वो रास खेलते थे, रास – “रा” माने शक्ति “स” माने सह – शक्ति के सहित, जो वो सब को खड़ा कर देना चाहते थे, वो भी राधाजी के बदन से बहने वाली चैतन्य शक्ति सब में दौड़ाते थे। हर एक चीज़ में उन्होंने यही प्रयत्न किया कि मनुष्य के अन्दर की कुण्डलिनी जागृत हो जाए। इस तरह से, जैसे खेल-कूद में हो जाए, क्योंकि वे लीलाप्रिय थे।

लेकिन मानव आज उसे छह हज़ार साल से करता आ रहा है। मेरे जन्म से ही एक बात मैं बहुत जरूर जानती थी, जिसके लिए मैं अपने पिता से भी बहुत सलाह करती थी, वो भी बहुत पहुँचे हुये थे। उन्होंने मुझ से यही कहा, कि जब तक ये चीज़ सर्वसामान्य की नहीं होगी,जब तक ये अनुभूति, आत्मा की अनुभूति जब तक सर्वसामान्य की नहीं होगी, तब तक न तो परमात्मा का कोई अर्थ रहेगा, न ही उनके सृजन का, न उनके क्रिएशन का कोई अर्थ रह जायेगा । जरूरी है कि लोग आत्मा को जानें क्योंकि आत्मा के बगैर आप परमात्मा को जान नहीं सकते। जिस प्रकार आँख के बगैर आप कुछ देख नहीं सकते, उसी प्रकार जब तक आपका आत्मा जागृत नहीं होता तब तक आप परमात्मा को जान नहीं सकते। परमात्मा के नाम पर हजारों आप दुकानें खोल दें और परमात्मा के नाम पर दुनियाभर के आप ढ़कोसले और ढोंग को खड़ा कर दें और जिसको कि आप माने, उस से कुछ भी होने वाला नहीं। आप के हृदय के अन्दर ही आत्मा का स्थान है। जो साक्षी आप ही के अन्दर बसा हुआ है, उसको जानना ही होगा। ये बहुत जरूरी बात है। आप समझते नहीं है, ये कितनी जरूरी बात है। वो समय आ गया है।

आपने अभी इन विदेशी सहजयोगियों से सुना है, कि उनका देश, उनके देशों में वो सोचते हैं कि डूम (doom) आ रहा है – घर तहस-नहस हो गए, उनकी  फैम्लीज़ (families) टूट गई हैं, शराब पी- पीकर के लोग रास्ते में लोट रहे हैं। इतनी बुरी हालत है कि कौन माँ है, कौन बहन है, ये भी कोई पहचान नहीं पाता। एकदम टूट गये हैं लोग, उनको रात-रात भर नींद नहीं आती। स्वीडन जैसे देश में, दस में से नौ आदमी आत्महत्या की सोचता हैं। वहां पे सब से ज्यादा आत्महत्या संसार में होती हैं। जो सबसे ज्यादा सुबत्ता वाला, ऐफ्लूअन्ट (affluent) है।

हम लोग आज जो पैसों के पीछे में और दुनिया भर की जिन वस्तुओं की पीछे में सारी अपनी शक्तियाँ लगा दे रहे हैं, अपना स्वयं ही मूल्य खत्म कर दे रहे हैं। हम किस चीज़ के लिये बने हैं, कैसे बने हैं? परमात्मा ने हमें कितनी मेहनत से बनाया| हमारा क्या महत्त्व है? हम क्या विशेष चीज़ है। हमारे लिये हर तरह से, हर पाँचों तत्त्वों ने भी मेहनत की हुई है। सब ने मेहनत कर के आपको बनाया, आपको गढ़ाया है। आपके अन्दर इसका पूरा यंत्र बनाया हुआ है। आपके अन्दर कुण्डलिनी बनायी है, उसकी जागृति बनायी हुई है। लेकिन सहजयोग धीरे-धीरे पनपता है। एक तो ये जीवंत क्रिया है, दूसरी सच्ची चीज़ है। झूठी चीज़ आप ऐसे ही बना दीजिये,प्लास्टिक से आप चाहें हज़ारों फूल बना सकते हैं लेकिन असली फूल बड़ी मुश्किल से खिलते हैं। लेकिन जब बहार आती है, तो हज़ारों फूल खिल सकते हैं । लेकिन इस बम्बई में अभी बहार की किसी को खबर ही नहीं शायद। सब लोग सो रहे हैं, अपनी नींद में ही पड़े हुए हैं। किसी को होश ही नहीं कि बहार आ भी गयी और न जानें कितने ही खिल गये और अभी हम उसी मिट्टी में पड़े हुए मर रहे हैं ।

आज बड़ा शुभ दिन है। आज दिन ऐसा नहीं कि माँ बच्चों को डाँटे, सच आज ऐसा दिन नहीं है। लेकिन आज सालों से यहाँ पर, 1970 से लेकर आज तक हर बार मैंने यही जिद की बम्बई में ही ये दिन मनाया जाये। और हर बार मैंने बहुत आप लोगों के तारीफ़ के पुल बाँधती रही। लेकिन देखती यह हूँ कि सहजयोग यहाँ पनप नहीं पा रहा है। यहाँ पर गन्दे लोगों की इमारतें चलेंगी । यहाँ पर आज एक गन्दा आदमी आ कर के गन्दी बातें आपको सुनाये तो हजारों आदमी वहाँ दौड़ कर के नंगे नाचेंगे, आप लोग नाचेंगे। लेकिन आप लोगों को सच्चाई चाहिये नहीं। और मैं आज बता दे रही हूँ, इस बात को आप सुन लें। इस प्रकार एक दिन मैंने बताया था आंध्र में, तो मुझसे लोग नाराज हो गये थे। जब मैंने आंध्र में जाके बताया कि आप जागिये अब आप लोग। क्या है यहाँ पर सब जगह तंबाकू लगा रहे हैं, तंबाकू के खेत के खेत। और कहने लगे, “हम लोग नहीं खाते, हम सिर्फ एक्सपोर्ट कर रहे हैं।“ जितने रईस लोग हैं वो तंबाकू लगा रहे हैं और गरीब लोग जो हैं वो तांत्रिक विद्या कर रहे हैं । मैंने कहा,”खबरदार, बहुत हो गया। अब ये समुद्र आके खा जायेगा आपको।“ और आप देखिये, मैंने किस डेट पर कहा हुआ है और वही हो गया। न जाने क्यों मुझे अन्दर इस कदर घबराहट हुई कि ये लोग कर क्या रहे हैं? क्या भूल गये कि परमात्मा हर एक चीज़ को देखता है, हर को नापता है। हर सिटी का अपना-अपना पुण्य है। हर जगह का अपना-अपना पुण्य है। उसकी भी कोई हद होती है, उस हद से गुज़र गये हैं लोग। तब फिर उसकी ताड़ना पड़ेगी और उसको सहना पड़ेगा।

पिछले साल मैंने ऐसे ही जब वहाँ के पंडों का हाल सुना। पंडों ने बहुत सताया है और गंगा-जमुना पर बैठ कर के इस तरह से वो धर्म को बेच रहे हैं। तब भी मैंने ऐसे ही चीख-चीख कर के कहा था कि इन पंडों से बच कर रहिये। अब देखा कि अपने खोमचे उठा करके सब भागे,जब गंगा जी और जमुना जी उनके खिलाफ हो गयीं । ये शुरुआत है। लेकिन आगे का भी सोचना होगा, जो आज मैं बता रही हूँ आप सबको । आगे का भी सोचना होगा, इसके आगे जो कल्कि अवतरण आने वाला है, वो आपके सामने आकर ऐसे बतायेगा नहीं । आप से बिनती नहीं करने वाला। आप पे मेहनत नहीं करने वाला। आप को रियलाइझेशन (realization) देने नहीं वाला। आपकी कैंसर की बिमारियाँ ठीक नहीं करने वाला। वो तो हाथ में तलवार लेके, खटा-खट आखिरी चीज़ करेगा। उस वक्त सर्व नाश, यही उनका कार्य है।

सहजयोग में बहुत अच्छा है। इसमें इंटिग्रेशन है, सुख है, आनन्द है, शारीरिक सुख है, मानसिक सुख है और परमात्मा का आशीर्वाद है, बहुत सुन्दर है। लेकिन, कल्कि युग में ये नहीं होने वाला। कल्कि के अवतरण के बारे में आपने सबने सुना है और वो होने वाला है। उससे पहले थोड़ी सी मियाद है, थोड़ा सा समय है। उसमें मेहरबानी करके अपनी आत्मा की आँखें खोलें । आपके अन्दर आत्मा हमेशा वास करता रहा और आपकी कुण्डलिनी भी आपके साथ हमेशा रही है। लेकिन आज तक कुण्डलिनी को न जाने क्या-क्या लोगों ने बना कर रखा है, जो कि आपकी स्वयं माँ हैं। और आप भी उस चीज़ को हर समय किस तरह से सुनते रहे हैं। मेरी यही समझ में नहीं आता है, कि कुण्डलिनी जो कि आपकी स्वयं की माँ हैं, उसके ऊपर गाली-गलोच लगाने वालों की बातें आप बड़े प्रेम से सुनते रहे और उनके लिये रुपया दे-दे करके और वहाँ आपने घण्टों लगा दिये, उनके टेप लगा-लगा करके भक्ति से आपने उनकी गुरु-विद्या सीख ली। जो आपकी माँ पे गाली लगाते हैं, ऐसे लोगों को आपने माना है। सब से पहले आप जान लीजिये कि परमात्मा ने जब ये सृष्टि बनायी थी, तो पहली चीज़़ उसने गणेश जी को बिठाया था, जो पवित्रता के द्योतक हैं,जो पवित्रता ही हैं। पहली चीज़ पवित्रता संसार में बनायी थी। और जिस इन्सान में पवित्रता नहीं होगी उसको परमात्मा की बात करने का कोई भी अधिकार नहीं। क्योंकि सहजयोग में आने के बाद आपकी पवित्रता बनती जाती है। बहुतों की तो अपने आप ही बन जाती है, ये तो पूर्वसंपदा की बात है । पर बहुत से लोगों की धीरे-धीरे बनती है।

याने आप सोचें कि जहाँ से भी आप आये हुए सोलह हजार आदमियों ने शराब पीना छोड़ दिया है। इसलिये लोग सहजयोग में नहीं आते कि माताजी फिर कहेंगी कि आप शराब मत पीजिये। मैं नहीं कहती,अपने आप छूट जाती है। क्योंकि जब मन की ही मदिरा आप पीने लग गये,जब आपको अपना ही आनन्द आने लग गया,जब मन से ही अमृत झरने लग गया, तो आप शराब क्यों पीजिये। मुझे कहने की जरूरत क्या है? अपने आप यह जो आज आपके सामने खड़े हुए हैं ऐसे हमारे यहाँ तीन सौ पक्के लोग हैं जिन्होंने पूरी तरह से सब चीज़ अपने आपसे छोड़ दी और ये लोग तो ड्रग्ज (drugs) तक लेते थे। कोई मैंने जा कर उनसे नहीं कहा था कि,”आप ड्रग्ज छोड़िये।“ आपके अन्दर की शक्ति है, आपके अन्दर की कुन्जि है आप उसे खोज लीजिये। बस, इतना ही मुझे कहने का है। लेकिन ये बात कहने पर नाराज़ होने की भी कौन सी बात है। मैं कहती हूँ कि तांत्रिक लोगों को भी सोचना चाहिये,कि माँ क्या बुरे के लिये कहेंगी। कोई माँ अपने बच्चे से कहेगी, कि जो गलत काम है वो सही है । पर सहजयोग में आने के पहले मैं कुछ भी नहीं कहती। जैसे भी आप हैं, जो भी आपको बीमारी है, जैसे भी आपकी हालत है हमारे सर आँखों पर, आप आईये। और उसके बाद आप इसे पा लीजिये, सहजयोग आपके अंदर आमूलाग्र, ऊपर से नीचे तक बदल देता है। क्योंकि ये जीवंत क्रिया है।

जैसे एक पेड़ है, वो जीवंत है। उसके अन्दर अगर कोई खराबी हो जाये, तो आप उसके अन्दर ऐसा कोई द्रव्य डाल सकते हैं जिसके कारण पूरा ऊपर से नीचे वो ठीक हो सकता है। लेकिन जो मरी हुई चीज़ है, समझ लीजिये बिल्डिंग है इसके तहखाने में कोई खराबी हो जाये या इसके दीवारों में खराबी हो जाये,तो उसे हम ठीक नहीं कर सकते। आप जीवंत हैं। आपके अन्दर ये जीवंत क्रिया घटित होती है। उसके लिये परमात्मा ने आपको धीरे-धीरे एक-एक चक्र बना के इतना सुन्दर बनाया है। लेकिन क्या आप अपने बारे में कुछ भी नहीं जानना चाहते? क्या आप अपनी शक्ति को बिल्कुल ही नहीं पाना चाहते? आपके अन्दर बने हुए ये चक्र कितने सुन्दर हैं। कितनी मेहनत से बने हैं और वो लालायित हैं। आपकी कुण्डलिनी जो है बैठी हुई है। हजारों वर्षों से आपके साथ जी रही है और चाह रही है कि वो क्षण आ जाये, जब आप परमात्मा को पा लें । लेकिन उसके लिये कितना आपसे, मुझे कहना होगा। कितना आपका आर्जव करना होगा। आपको भी तो थोड़ा सा सत्य को माँगना होगा। सत्य आपके पैर में गिरके मांगने वाला नहीं। सत्य आपसे कोई वोट नहीं माँग रहा है। सत्य आपसे रुपया-पैसा नहीं माँग रहा है। आप खरीद नहीं सकते सत्य को, यही सत्य का दोष है। अगर आप सत्य को खरीद सकते और आपका अहंकार उससे अगर पूरित होता तो आप लगे रहते, जैसे और गुरुओं के पीछे में आप भाग रहे हैं और फालतू अपना समय बरबाद कर रहे हैं और अपना रुपया बरबाद कर रहे हैं। आप ही अपने गुरु हैं। आपको क्या जरूरत है किसी के पीछे भागने की? आप इसे पाईये, इसको जानिये। थोड़ी सी तो भी अपनी कद्र करें। अपनी इज्जत करें | अपने को समझें| ऐसी छोटी-छोटी चीज़ में,और बेकार की चीज़ों में इस महान, मूल्यवान मनुष्य धारणा को न फेंके ।

अभी दिल्ली के प्रोग्राम में न जाने कितने ही लोग पार हो गये। और बहुत लोग आये। हर तरह के। मुझे आश्चर्य हुआ कि दिल्ली में एक नानक साहब की बात मैं जरूर कहूँगी, इनकी कृपा बड़ी रही है, इसलिये दिल्ली के लोगों में इसकी जागृना बहुत है। पर इस महाराष्ट्र में ही कितना कार्य हो रहा है। ये संतों की भूमि है। यहाँ संतों ने अपना रक्त सिंचन किया है। इस महाराष्ट्र में बहुत कार्य हो सकता है। लेकिन इस मुम्बानगरी, जो कि उसकी राजधानी मानी जाती है, न जाने क्यों इतनी संतों से रहित, इतनी सत्य से रहित, नास्तिकों से भरी हुई, इतनी पाप नगरी क्यों हो गई है? आप पे बड़ा भारी उत्तरदायित्व है। आप पे बड़ी भारी जिम्मेदारी है। कल परमात्मा आप से पूछेगा कि, बेटे आपने क्या किया? उस पाप में भाग लिया तुमने? उस पाप में तुम समागम कर गये। फिर लोग आते हैं “माँ हमारे बच्चे का ऐसा क्यों हैं? हमारे बच्चे को ये तकलीफ क्यों हो गयी? हमारे बेटी को ये तकलीफ क्यों हो गयी ? हमारा ऐसा क्यों हो गया?” आप क्या करते रहे ? आप कहाँ हैं? जिन देशों से आज ये लोग आके बातें कर रहे हैं वहाँ जाने पर आपकी भी आँखें खुलेंगी । आप उसी रास्ते पर चले जा रहे हैं। लेकिन वो किस गढ्ढे में जाकर गिरे हैं वो आप देख नहीं सकते। क्योंकि आपके सामने सिर्फ उनका चलता हुआ रास्ता दिखायी दे रहा है। लेकिन वो गद्ढा नहीं दिखायी दे रहा है, जहाँ वो अपने सर ढूंढ रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं किसी तरह उसमें से निकल भागें । और जब वो कोशिश उनकी नहीं बन पड़ती तो आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या कर के भी कौन बच सकता है? कोई मरता ही नहीं। फिर से, फिर से वही जन्म आयेगा और वही दुविधा, वही आफ़त, वही आतंक।

कैंसर की बीमारी, एक बड़ा भारी एक तरह से, आप लोगों के सामने एक शैतान खड़ा हुआ है। उसे देखकर तो भी आप समझ लें कि सहजयोग के सिवाय कैंसर ठीक हो नहीं सकता। आप कितनी भी कोशिश कर लें, आपका कैंसर सहजयोग के सिवाय ठीक हो नहीं सकता। अभी डॉ. पचौरी जो आपके सामने थे, उन्होंने लंदन में भी कैंसर ठीक किया है । आप डॉक्टर लोगों के पास जाईये। यहाँ पर हमारे डॉक्टर भी बहत से शिष्य हैं, वो भी कैंसर ठीक करते हैं। लेकिन जब डॉक्टरों के पास जाईये तो वो कहेंगे कि, “हमारे पास लिस्ट दीजिये आप, कि आपने कितने लोगों का ठीक किया है।“ ये प्यार का खेल है। क्या आप अपने घर में आये हुए मेहमानों की लिस्ट देते हैं किसी को ? क्या आप ये बताते हैं कि उसको कितने निवाले खाने के खिलाये? ये जो पैसे पर काम करने वाले डॉक्टर हैं, ये क्या समझ सकते हैं प्यार को। ये क्या माँ को समझ सकते हैं। इनके बस का नहीं है ये समझना। ये लोग तो हमसे ऐसे उलटे-सीधे सवाल पूछते हैं, मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। मुझे तो ये भी नहीं पता कि कितनों को ठीक किया,कितनों को नहीं किया। गंगा बह रही है, जो ठीक हो गया वो ठीक हो गया; जो नहीं ठीक हुआ, नहीं ठीक हुआ। उसमें क्या कोई हिसाब लगाता है कि कितनों को ठीक किया ? कितनों को आशीर्वाद दिया ? कितनों को पानी पिलाया? कितनों ने घड़े भरे?

प्यार की महिमा आत्मा के प्रकाश के बगैर, कभी नहीं दिखाई देती। आत्मा का प्रकाश पहले खुलने दीजिये। आत्मा की रोशनी में आप देख सकते हैं कि प्यार चीज़ दूसरी होती है। आज तक आपने जाना ही नहीं प्यार क्या चीज़ है। प्यार की शक्ति कितनी प्रचंड है, कितनी महान शक्ति है। और इस शक्ति से बढ़के कोई और सूक्ष्म शक्ति हो ही नहीं सकती। आप यहाँ बैठे-बैठे किसी भी आदमी को आप पार करा सकते हैं। यहाँ बैठे-बैठे आप किसी भी आदमी का भला कर सकते हैं और कल्याण कर सकते हैं। इसकी शक्ति कितनी सूक्ष्म है और कितनी गतिमान है,आप समझ भी नहीं सकते हैं । आपका सारा साइन्स वगैरह इसके पाँव के नीचे भी नहीं आता। पर आप इसमें अन्दर तो आईये, इसको देखिये तो । किस गरूर में आप बैठे हुए हैं। ये गरूर से भी अन्धापन बहुत ज़्यादा है। बहुत ज़्यादा अन्धापन है। और कभी-कभी मुझे बड़ा दु:ख लगता है कि कब इसके बारे में लोग जागृत होंगे और इसे पायेंगे?

कल मैं आपको ये बताऊँगी कि आप क्या हैं? आप क्या चीज़ हैं? आपके अन्दर कौन से चक्र हैं? और कैसे कैसे वो गतिमान होते हैं? और किस तरह से ये सुरति, ये कुण्डलिनी, आपकी माँ, किस तरह से आपको बढ़िया तरीके से पार कराती हैं; कितनी कलात्मक है, कितनी सुन्दर है, कितनी प्रेममय है, इसको समझ लेना आपका परम कर्तव्य है। ये आपके साथ जन्म-जन्मांतर रही हैं और इसको पा लेना भी आपका सबसे बड़ा यही तो एक ध्येय है। आप किसलिये पैदा हुए हैं? किसलिये मनुष्य बने? किसलिये अमिबा (amoeba) से आज तक आपको इन्सान बनाया गया? समझ लीजिये, ये एक बड़ा भारी सा इन्स्ट्रुमॅन्ट (instrument) बनाया हमने और इसको अगर मेन से लगाया नहीं तो इसका क्या अर्थ निकलता है? इसका कोई अर्थ ही नहीं, व्यर्थ हो गया । और इसको बनाने वाले का भी क्या अर्थ हुआ। परमात्मा का भी कोई अर्थ नहीं रहने वाला । लेकिन परमात्मा भी आपके सामने झुकता है। एक जैसे कि आपको स्वतंत्रता है। आपको स्वतंत्र किये बगैर, ये कार्य नहीं हो सकता था अभी इसलिये आपको स्वतंत्र किया गया। लेकिन स्वतंत्रता का मतलब बेछूटपना तो हो नहीं सकता।

कोई अगर एरोप्लेन (aeroplane) के हिस्से कहें कि हम स्वतंत्र हैं हम जहाँ चाहें जैसे चिपक जायें और जब चाहें निकल जायें, तो वो क्या एरोप्लेन चल सकता है। आप अगर एक सबंध, पूरे एक परमात्मा के अंग-प्रत्यंग हैं, अगर आप उस विशाल-विराट के ही रक्त मॉँसपेशियाँ हैं, तो क्या आप अपना अलग व्यक्तितित्व रख सकते हैं? और कह सकते हैं कि मैं स्वतंत्रता से जन्मा हूँ । जैसे ही आपने ये कह दिया, आप मैलिग्नंट (malignant) हो गये, आप एक कैन्सर हो गये उस शरीर के । जैसे ही आपने सोच लिया कि “मुझे जो करना हैं, मैं करूंगा।“ उसी जगह आपको जानना चाहिये एक तो आप जानते नहीं कि सारे परमात्मा और उसके एक-एक अंग -प्रत्यंग में बसे हुए, जो भी महान जिसे चिरंजीव आपने कहा ऐसे लोग हैं वो सब आपको देख रहे हैं। जैसे ही आप इस कैन्सरस (cancerous) स्थिति में चले जाएंगे, आप नुकसान पहुँचाएंगे अपने को भी, और उस विशाल देह को भी जिसने आपको समाया हुआ है। इसका विचार आपको रखना चाहिए। बहुत जरूरी है कि अब समय बहुत कम है। बहुत कम है। आप समझ सकते हैं कि 1970 से ले करके आज तक इस बम्बई शहर में मैंने महीनों काटे। बहुत मेहनत की। जैसे इन्होंने कहा, सबसे ज़्यादा मेहनत मैंने बम्बई में की। बहुत ज़्यादा मेहनत की है। लेकिन बम्बई के लोग बहत मुश्किल हैं। या तो यही हो, कि अतिपरिचयात् अवज्ञा, लेकिन ऐसे सोते रहने का अब समय बीत गया। कृपया आप लोग जागें।

कल आप अपने साथ और लोगों को ले आईये, जो आपके अड़ोसी-पड़ोसी हैं। और हो सके तो आज हमारा जो प्रोग्राम इसके बाद होने वाला है कव्वाली का, उसमें मैं आपको आत्मसाक्षात्कार देने का प्रयत्न करूंगी। उस वक्त आप सब लोग मेरी ओर इस तरह से हाथ करके बैठें। और आपको धीरे -धीरे हाथ में ठण्डी- ठण्डी हवा आने लग जाएगी। आप देखेंगे कि आपके हाथ के अन्दर ये चैतन्य की लहरियाँ ठण्डी-ठण्डी आने लगेंगी। इन ठण्डी-ठण्डी लहरों के बारे में, श्री आदि शंकराचार्य ने आपको बहुत विशद रूप से बताया है। बायबल में भी बताया है कि होली घोस्ट (Holy Ghost) माने आदिशक्ति के अंग से,ये ठण्डी-ठण्डी लहरें निकलती हैं, आदि सब ओर इसका वर्णन है। कोई ये नयी चीज़ नहीं है। लेकिन आज तक ये सर्वसामान्य के लिये घटित नहीं हुआ था और ये चीज़ सर्वसामान्य को मिलनी चाहिये । दो-चार को ही मिली हुई, चलती नहीं है। इस वजह से ये कार्य आज इस कलियुग में करने का आवश्यक था।

आप लोगों ने आज मुझे इतनी बधाईयाँ दी हैं, इसमें से बहुत से सहजयोगी भी हैं। और सहजयोगी लोगों के लिये मैं इतना जरूर कहूँगी कि बम्बई में क्योंकि इसके ब्रांचेस (branches) बहुत नहीं होते हैं, ये प्रसार कम होता है । इसलिये जो सहजयोगी बहुत गहरे भी हैं, बहुत गहरे सहजयोगी हैं । और यहाँ का गहरापन सहजयोगियों का जो है प्रशंसनीय हैं। क्योंकि इसकी बहुत सारी शाखायें नहीं होती हैं। बाकी के सहजयोगी जितने भी हैं बहुत गहरे उतरते चले जाते हैं । पर बाकि इसका प्रकाश बाहर कम फैलता है। जो हैं, २००-३००-४०० तक होंगे कहना चाहिये, जो काफ़ी गहरे उतर गये हैं। लेकिन उनका प्रकाश बाहर की ओर नहीं फैला हुआ। इसलिये मुझे आपसे कहना है कि और जो आपके मित्र हों, सब लोग हों, उनको खाना-खिलाना, घूमाना-फिराना, खिलाना इस तरह की बेकार की चीज़ों में उलझाने से अच्छा है कि आप इस पुण्य का लाभ उठायें कि उनको आप ही लोग यहाँ पर लाके पार करवायें। यहाँ, आप जानते हैं, यहाँ पैसा-रुपया, कोई चीज़ नहीं चलती। सिर्फ यही है कि आपको पार होना पड़ता है। अब इसमें कोई वाद-विवाद करने से कोई पार नहीं होता है । झगड़ा करने से कोई पार नहीं होता है । जो पार है वो पार है, जो नहीं है सो नहीं है। आपको पार होना है तो पार हो लीजिये। एक बार आईये, दो बार आईये, जरूर आने के साथ पार हो जाता है।

पिछली मर्तबा काफ़ी मेहनत की थी हमने, और ध्यान दिया था । लेकिन देखते यही हैं कि लोगों में अभी भी काफ़ी निद्रावस्था है। उसको थोड़ा सा जगाना चाहिये । और उस आशा से ही मैंने आज जरा आप से थोड़े कड़े शब्दों में कहा, कि कृपया जागृत होईये। अगर धीमी आवाज सुनाई नहीं देती, अगर मधुर आवाज सुनाई नहीं देती, अगर मंजुल बात सुनाई नहीं देती, तो फिर थोड़ा सा कड़ा होना पड़ता है और कहना पड़ता है कि, बेटे जागो, बहुत देर हो गयी। सूर्य कब का आकाश पे आ गया। न जाने कब डूब जायेगा। फिर से अंधेरे में, हमेशा के अंधेरे में डूब जाओगे। एक माँ का हृदय है और वो भी विकल हो जाता है। कभी कभी बहुत व्यथित भी हो जाता है। इसे समझना चाहिये। आज आप लोगों से मैं एक ही वादा चाहती हूँ कि अगला जन्मदिन मैं यहाँ करूंगी लेकिन आप बहुत बार, बहत तादाद में सहजयोग को प्राप्त करें ।

H.H. Shri Mataji Nirmala Devi