Sahaja Yoga & the Subtle System

मुंबई (भारत)

1979-03-22 Sahaja Yoga & the Subtle System, Mumbai Hindi, 60'
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Sarvajanik Karyakram Date 22nd March 1979 : Place Mumbai : Public Program Type Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, Scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

आप एक बहुत सुन्दर प्रकृति की रचना हैं। बहुत मेहनत से, तो आखें हैं नहीं हम इसे कैसे जानेंगे और हमारे लिए भी यह नजाकत के साथ, अत्यंत प्रेम के साथ परमात्मा ने आप को बनाया है। आप एक बहुत विशेष अनन्त योनियों में से घटित होकर इस मानव रुप में स्थित हैं। आप इसलिए इसकी महानता जाएगी। इस प्रकार आपके अन्दर भी कोई चीज ऐसी ही बनी नहीं जान पाते क्यांकि, ये सब आपको सहज में ही प्राप्त हुआ है। यदि इसके लिए मुश्किलें करनी पड़ती, आफते उठानी पड़ती और आप इसको अपनी चेतना में जानते तो आप समझ पाते सारी चीज आपको आसानी से समझ आ जाती है। पर अगर कि आप कितनी महत्वपूर्ण चीज हैं। मनुष्य को जानना चाहिए कि परमात्मा ने हमें क्यों बनाया, इतनी मॅहनत क्यों की ? हम बत्ती कैसे आई बिजली कहां से आई, इसका इतिहास क्या है, किस लिए संसार में आये और हमारा भविष्य क्या है ? हमारा कैसे बना, तो सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। लेकिन आधुनिक अर्थ क्या है? जैसा कि कल मैने कहा था कि अगर हम मशीन बनायें पर इसको इस्तेमाल नहीं करें तो कोई भी अर्थ नहीं फिर उसको हटाए। उनको कोई चीज आसानी से मिल जाए तो निलकता। लेकिन जब तक ये मेन स्रोत से नहीं लगाया जाता बड़े आश्चर्य से पूछता है हमने तो कुण्डलिनी के बारे में पढ़ा तब तक आप इसका उपयोग भी नहीं कर सकते। उसी प्रकार है कि वो बड़ी मुश्किल चीज है। वो तो हजारों वर्षों में होती है, जब तक आप उस अनन्त स्रोत के साथ संबन्धित नहीं होते वो तो बड़ी मुश्किल चौज है। उसमें आदमी को ये करना पड़ता जिसके बारे में अनेक साधु संतों ने वर्णन किया हुआ है, अनेक है वो करना पड़ता है। तो हम इस पर यही कह सकते हैं कि पुस्तकों में आपने जिसके बारे में सुना होगा कि अनन्त शक्ति हम इसके माहिर हैं हम इसे जानते हैं, कुछ विशेष बात हमारी परमात्मा की सर्वव्यापी है और वो हर एक चीज का काम, हर हैं ही, जिसके कारण इसे आसानी से कर सकते हैं। बहुतों को एक चोज का संचालन, हर एक वस्तु की गति संभालती है। हो चुका है। इतना ही नहीं, जब आपका भी अन्तर योग स्थापित यह सुनी समझी हुई बात दूर की लगती है। जब तक आप उससे हो जाएगा, जब आप भी इसे प्राप्त होंगे, तो आप भी दूसरों की संबंधित नहीं होते, तब तक यह समझ में आने वाली नहीं। जैसा कि कल मैने कहा था कि आत्मा को जाने बगैर आप देखा है। खासकर इस बंबई शहर में पार होने के बाद कोई प्रयत्न परमात्मा को जान ही नहीं सकते। ये तो ऐसे ही कि नहीं करते, कोई आगे नहीं बढ़ते हैं। बंबई शहर को एक तरह टेलीफोन का तार लगा नहीं और आप टेलीफोन इस्तेमाल करें। की जड़वात पकड़े हुए है। इसके बारे में हमने कहा था। आप जो कुछ धर्म के नाम पर आप करते रहे हैं वो इसी तरह का अन्धा-धुन्ध काम हैं। ये आपको समझ आ जायेगा एक बार कि ये अति सूक्ष्म संवेदन है अति सूक्ष्म घटना है। यह घटित होना सम्बन्ध जुड़ने के बाद। उससे पहले ये प्रश्न बना रहेगा। अब हम क्या हैं ? हमारे अन्दर कौन-कौन सी व्यवस्था परमात्मा ने पा रहे हैं । इसको आप समझ लें और इसमें गतिमान हों। ये नहीं की है और किस मशोन के कारण, किस तंत्र के कारण उस को प्राप्त होंगे, इसके बारे में मैं आपको बताना चाहती हूँ। ये विषय बहुत ही कलिष्ठ हैं। वास्तव में ये विषय तब बताना चाहिए, जबकि आप पार हो जाएं। जिस वक्त संबंध हो जाए। माना की आप शारोरिक व्याधियां छूट जाती हैं क्योंकि आपके अन्दर परमात्मा अंधे हैं और मैं बताऊं कि ऐसा बना है, ये लाइट है, यहां पर का आलोक आने वाला है। आपकी आत्मा जागृत होने वाली इस तरह का रंग लगा हुआ है, वातावरण बड़़ा सुन्दर है। और है। तो ये शरीर का मंदिर भी निर्मल करना पड़ता है। आपमें अगर यह बहुत अच्छा लगता है, तो आप यह कहेंगे कि हमारे पास कुछ मानसिक बीमारी हो तो वो भी ठीक हो जाती है। आपकी समझाना बहुत ही कलिष्ठ होंगा जैसा कि इस कमरे की बत्ती अगर जलानी है तो आप एक बटन दबाएंगे। और बत्ती जल हुई है। पूरी तरह से तैयारी कर परमात्मा ने रखी हुई है। उसको जगाना मात्र है। जब आप आलौकित हो जाते हैं तो सारी की बत्ती जलाने से पहले ही मैं ये लर देना शुरु करूं कि ये मानव को सरदर्द की आदत है वो चाहता है पहले सिरदर्द हो जोत जला सकते हैं बहुत आसानी से। बहुत से लोगों को हमने हुआ भी बंबई शहर में रहते हैं इस लिए मैं आप से यह कहना चाहूँगी आपकी पूर्व सम्पदा का फल हैं। जन्म जन्मांतर की चीज आप की जहाँ के तहाँ पाया उसकीो ठप्प कर दिया जब ऐसा होता है तब हम देखते हैं इसका फल बहुत ही कम मिलता है। इसके अनेक फल हैं इनमें सबसे बड़ा फल ये है कि आपकी

बुद्धि भी आलोकित होकर के आप सुबुद्धि प्राप्त करते हैं और चौथी जो सबसे बड़ी चीज हो जाती है कि आपके अन्दर से कुण्डलिनी जागृत हो जाती है। क्योंकि जब हाथ आपके मेरे आत्मा स्पन्दित होने लग जाती है। आप इसको चैतन्य के रूप ओर हैं तो बहता चैतन्य हाथ से गुजर के इन दोनों नाड़ियों से में अपने हाथों में बहती महसूस करते हैं। इसको लहरियां कहते नीचे उतरता है और जाकर गणेश को खबर देता है कि अब हैं। इसे शीतल लहरियाँ कहा है। इसको जब आप पाते हैं तो हाथों स्थिति है, वो शक्ति है जो जानती है , जो प्यार करती है, जो में बहुत ठंडी हवा चैतन्य की बहती है। लहरियों का अर्थ लोग आयोजन करती है और जो आपको जन्म देती हैं वो आपकी सोचते हैं बदन हिलना या कुछ उसमें किसी तरह का झकझोर जन्म दात्री है। इसी से आपका दूसरा जन्म होता हैं जिसमें आप होना। तो यह गलत बात है। इसमें समझ लेना चाहिए लहरियां द्विज हो जाते हैं। यह शक्ति अत्यंत पवित्र है अछूती है। इस तक अर्थात ठंडी-ठंडी हवा बहुत ही शोतल हवा इसमें अंदर में बड़ी कोई भी नहीं पहुंच पाता जब तक जो आदमी इसका आधिकारी ही शीतलता आती है। बहुत ही ज्यादा आर्शीवादित भावनाएँ अन्तर में पुलकित होती हैं। ये एक वास्तविकता है। साक्षात है। इसके सामने खड़ा होता है तब आपके हाथों के द्वारा यह शक्ति वास्तवीकरण है। ये कोई झूठी बात नहीं। यह कोई धोखा नहीं। अन्दर जाती है और कुण्डलिनी जागृत हो जाती है। यह अपने इसमें वास्तविकता में आते हैं और ये चीज आपके अन्दर घटित आप जागृत होती है। इसके लिए कोई भी मेहनत करने की होना अत्यावश्यक है। अगर ये चीज घटित नहीं हुई तो जरुरत नहीं होतो है क्योंकि ये जीवन्त क्रिया है। ये बिल्कुल जहाँ का तहाँ रह जाएगा। किसी भी तरह से उस चीज को प्राप्त जीवन्त क्रिया है। कोई भी जोवन्त कार्य मेहनत से नहीं होता वो नहीं कर पाएगा जिसमें वो अर्थ देखे जिसमें वो समर्थ हो जाए। अपने आप घटित होता है। उसी प्रकार कुण्डलिनी अपने आप आपके सामने कुण्डलिनी रखी है। इसका चित्र यहां बनाया जागृत होती है। सिर्फ इसे यह पता होना चाहिए कि इसके सामने हुआ है। वास्तविक कुण्डलिनी हमारे अन्दर परमात्मा ने बीज वो इंसान खड़ा है जो उसका अधिकारी है। के रुप में रखी है जिसको अंकुर करना है। मैं बहुत संक्षिप्त में बताऊँगो। आपकी कुण्डलिनी की जागृति हो मुख्य बात है बोलते ह बोलते ही मैं आपकी कुण्डलिनी जागृत करती हूँ। आप तीसरा चक्र माना जाता है पर कुण्डलिनी दूसरे चक्र को न कृप्या अपने हाथ सीधे मेरी ओर कर लें। ये कुण्डलिनी आपके छेदती हुई पहले तीसरे में जाती हैं क्योंकि दूसरा चक्र नाभी से अन्दर बसी हुई हैं। ये घटना क्षण भर में होती है तैयारियां उसकी निकल कर ऊपर धूमता रहता हैं दूसरे चक्र से भी शक्ति को करनी पड़ती है। ये कुण्डलिनी है जो कि अंकुररूप में आपके खींचा जाता हैं । इसमें से चित्त को खींचा जाता है। दूसरा चक्र अन्दर त्रिकोणाकार अस्थि में स्थित है। ये शक्ति परमात्मा ने जो स्वाधिष्ठान है इसमें आपका चित्त है । इस चक्र से चित्त को अंकुर रूप में स्थित की है। ये आपको माँ है जो जन्म-जन्मान्तर खींचकर के कुण्डलिनी अपने ऊपर छा लेती है जैसा कि समझ तक आप के साथ रही है। और आपने आज तक जो भी किया, लीजिए किसी कपड़े में ये मेरा हाथ चला गया हो। आपका आपका सारा जो भव है, भूत है उसका सारा टेप इसमें लिखा जो चित्त है आपको आश्चर्य होगा, आपके पेट में रहता है हुआ है। सारा माइक्रो स्कोपिक टेप इसमें लिखा हुआ है। आप आपके सर में नहीं रहता । चित्त पेट में रहता है लेकिन ज्ञात अपने इसको ठहरा नहीं सकते और यह नोट करती जाती है कि आप मस्तिष्क से होता है। वो किस प्रकार? वह स्वाधिष्ठान चक्र की की क्या सम्पदाएँ हैं। आपने क्या गलतियाँ की हैं, क्या अच्छाईयाँ वजह से। ये मैं आपको बाद में बताऊंगी। ये चित्त जो है.उसे ले की, क्या आपमें गुण हैं और क्या दुर्गुण हैं। यह त्रिकोणाकार अस्थि में अत्यंत पवित्र आपकी माँ है। और इसके नीचे गणेश करने का आगे की बात सोचने का, विचार करने का केन्द्र जी का चक्र है। ये अपनी माँ गौरी जिसे हम कुण्डलिनी कहते है क्योंकि इसी केन्द्र से हमारे पेट में जो मेद है, जो फैट हैं उसे हैं की रक्षा के लिए नीचे बैठे हैं यानि जो आदनी पवित्र नहीं वो बदलकर दिमाग के लिए ठीक बनाया जाता है। यह इसी केन्द्र कुण्डलिनी का कार्य नहीं कर सकते। केवल अत्यंत पवित्र का काम है। इस चक्र से हमारा महाधमनी चक्र चलता है। ये आदमी को ही अधिकार होता है कि वह कुण्डलिनी का कार्य चक्र आजकल बहुत कार्यशील है क्योंकि हम बहुत ज्यादा सोचते करे। ऐसा आदमी जब भी कुण्डलिनी का काम करता है तो उसे नाना प्रकार को बीमारियां हो जाती हैं क्योंकि यह जो दूसरे काम इस चक्र से होते हैं वो उपेक्षित हो जाते हैं। उनकी अनाधिकार चेष्ठा है। आप गणेश स्वरूप हो जाते हैं जिस वक्त शंकराचार्य ने इसे सौंदर्य लहरी कहा है। बाईबल में कुण्डलिनो उठ सकती हैं । क्योंकि कुण्डलिनी वो चैतन्य है, वह है वो आपके सामने खड़ा न हो जाए। जब इसका अधिकारी मनुष्य कुण्डलिनी इसके बाद छः चक्रों को छेदती हुई ऊपर जाती है। उसमें से जो महत्वपूर्ण चक्र हैं वो नाभी चक्र हैं। हालांकि यह कर कुण्डलिनी ऊपर उठती है। स्वाधिष्ठान चक्र हमारे कार्य रहते हैं। हर समय सोचते रहते हैं। अति सोचने की वजह से हमारे

तरफ हम ध्यान नहीं दे पाते। वो काम इस प्रकार है ये चक्र लिवर हैं। के ऊपर का हिस्सा, अग्नाशय, गुर्दा, गर्भाशय सबको संभालता है। जब हम बहुत अधिक सोचते हैं तो हमें डाईविटीज की बीमारो गुरु हमारे अन्दर बसे हुए हैं। ये मुख्य दस गुरु हैं। ये दत्तात्रय के हो सकती है। क्योंकि हमार एक ही चक्र है जो कि सोचता भी है और मेद भी बदलता है। वही चक्र हमारे अग्नाशय को इग्राहम, मोहम्मद साहब, गुरुनानक अभी आपके जो शिरडी सम्भालता है। अतः बहुत अधिक सोचने वाले लोगों को मधुमेह के साई नाथ हा गए ये सब एक ही तत्व के, एक ही व्यक्ति के, हो जाता है। किडनी की बीमारी भी अधिक सोचने से होती है। एक हो महत्ता अवतरण हैं इनमें जरा सा भी अन्तर नहीं। दूसरे कारण भी हो सकते हैं परन्तु मुख्य कारण अधिक सोच मोहम्मद साहब में व गुरु नानक में इतना सा भी अन्तर नहीं। उन्होंने विचार हैं। अधिक सोच विचार से जिगर भी खराब हो जाता है। ही फिर से जन्म लिया क्योंकि मोहम्मद साहब ने जब देखा कि और गर्भाश्य पर भी इसका बहुत असर आ जाता है। अब आप कहेंगे कि माँ सोच विचार कैसे रोका जाए? मनुष्य छोड़कर गलत चीजों में पड़े जा रहे हैं तो उन्होंने गुरु नानक हर समय सोचता ही रहता है उसका विचार एक क्षण भर भी साहब के रुप. में जन्म लेकर उस चीज को ठीक करने की नहीं रुक सकता और अगर वह रुक जाए तो यह आश्चर्य की कोशिश की। दोनों ने एक ही का एश की कि सब एकता में रहें। बात है कि वो कैसे रुका है। आपको यही मैं दिखाऊँगी कि अभी पर आप जान ही रहे हैं कि उनका भी क्या हाल हुआ।स्वाधिष्ठान थोड़ी देर में आपके सारे विचार एक दम रुक जाएंगे। आप देखिएगा आपको लगेगा कोई भी विचार मेरे दिमाग में नहीं आ है। नाभि चक्र पर श्री लक्ष्मी नारायण का स्थान है। अब लक्ष्मी रहा। विचार शांत हो गए हैं। ये जब आज्ञा चक्र को कुण्डलिनी जी के बारे में हमारे यहां बहुत ही विकृत कल्पनाएँ हैं। लक्ष्मी लांघ जाती हैं तब यह घटित होता है। इसके बाद नाभी चक्र भी बहुत महत्वपूर्ण है। नाभी चक्र हमारी पाचन क्रिया पर निर्भर के कारण हम धर्म परायण होते हैं। उसो से हम धर्मधारणा करते करता है। नाभी चक्र हमारे धर्म को मानता है। मनुष्य का भी एक धर्म इसी धर्मधारणा की वजह से है। मनुष्य रुप में आपका जो विकास है। फिर उसको स्वतंत्रता है चाहे वह अपने धर्म में रहे या न रहे। हुआ है वह भी इस लक्ष्मी नारायण के तत्व से हुआ है विष्णु बाकी संसार की किसी चीज में भी यह स्वतंत्रता नहीं। जैसे कि तत्व से हो यह कार्य होता है। जो लोग अपने को वैष्णव कहलाते सोना हैं उसका अपना धर्म है कि वह खराब नहीं होता। बिच्छु हैं उनको जान लेना चाहिए कि जब तक उन्होंने आत्मा को पाया का अपना धर्म है कि वह डंक मारता है, सांप का अपना धर्म नहीं उनका वैष्णव धर्म अधूरा रह गया। ये हमारे अन्दर नাभी है और शेर का अपना धर्म है। सब अपने अपने स्व धर्म में बैठे चक्र में बसते हैं। विष्णु जी ने अनेक अवतरण लिए हैं। शिवजी रहते हैं। परन्तु मनुष्य को यह स्वतंत्रता परमात्मा ने दी हुई है कि के अवतरण नहीं होते हैं। बह्यदेव ने मात्र एक बार अवतरण चाहे वह अपने धर्म में रहे या न रहे। बुराई को जीतना है तो लिया था जिसके बारे में कहें तो आपको आश्चर्य होगा कि जीत ले चाहे तो अच्छाई को जीत ले। ये स्वतंत्रता परमात्मा ने उन्होंने एक बार हजरत अली के नाम से इस संसार में अवतरण विशेष रूप से मनुष्य को क्यों दी? इसलिए दी है कि परमात्मा लिया था । और यह सत्य है या नहीं ये आप लहरियों से देख सकते के साम्राज्य में यदि हमें जाना है तो पहले स्वतंत्रता में हम उसका हैं। जिस वक्त किसी आदमी को मधुमेह की बीमारी हो जाती वरण करें। अपनी स्वतंत्रता में ये कहँ कि हमें परमात्मा चाहिए। हमारे ऊपर यदि जबरदस्ती करके कोई कहे कि परमात्मा को हिन्दू हों, चाहे मुसलमान हों, चाहे पारसी हों। क्योंकि उनका ही मांगिए तो ये कौन सा मांगना हुआ? इसलिए इस दशा में पहुंचने अवतरण वहां पर बैठा हुआ है और उन्हों का नाम लेने से मधुमेह पर मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता में ही परमतत्व को मांगना चाहिए। किसी जबरदस्ती की वजह से नहीं । किसी बीमारी की वजह मधुमेह ठीक किए हैं। शत प्रतिशत। और अब ये हैं कि डाक्टर से नहीं, किसी दुःख की वजह से नहीं, किसी तकलीफ की वजह लोग तो अब हजरत अली का नाम लेने के लिए कहँगे नहीं। से नहीं। बल्कि इसलिए कि यह परम पाना ही हमारे जीवन का वो तो इस चीज के रहस्य को जानते ही नहीं, जिसके कारण मुख्य लक्ष्य है। इस स्वतंत्रता में जब आप जाते हैं और परम हमारे जो चक्र चलते हैं। वो तो बाह्य में, जड़ में, ठोस में देखते की इच्छा करते हैं तभी परमात्मा के महाद्वार आपके लिए खुलते हैं। सिर्फ ध्यान से ही आप अपने इस रहस्य को जान सकते हैं। इस धर्म के केन्द्र के चारों तरफ गुरुओं का स्थान है। ये दस अवतरण हैं। जिनमें से हम कह सकते हैं सुक्रान्त, मोजेज, लोग इस तरह उनके धर्म का अपमान कर रहे हैं और धर्म को चक्र पर श्री ब्रह्मदेव का स्थान है और सरस्वती उनकी शक्ति नारायण जी का स्थान जो है हमें धर्म के प्रति रूचि देता है। उसी हैं यानि कार्बन में जो चार (वैलेन्सीज) संयोजकता है वे भी है तो आपको हजरत अली का नाम लेना पड़ता है, चाहे आप की बीमारी ठीक होती है। सहजयोग में हमने शत प्रतिशत

जिन गुरुओं ने इसको जाना है वो जानते हैं कि हमारे अन्दर पेट से जन्म लोजिए। ये बात कहने से ही उनका ये चक्र ठीक हो के बाएं भाग में स्वाधिष्ठान का जो स्थान है वहाँ पर आपको गया उनकी ये बीमारी जो की सालों से ही चली आ रही थी, हजरत अलौ और फातिमा का नाम लेना पडता है। नाभी चक्र में जो विष्णु लक्ष्मी का स्थान है, इन्होंने आप जानते हैं कि ही ठीक हो गई, और उनको बड़ा ही आश्चर्य हआ कि माँ ने दस अवतार, कए हैं उसमें से नौ ले चुके हैं दसवां आने वाला पाँच मिनट में ये ठोक कर दी। अगर आप इसके अन्दर के रहस्य है। नौ अवतरणों , से उनके अधिकतर अवतार विकासशील हैं समझ लें तो बीमारी ठीक करना कोई विशेष चीज नहीं है। अब यानि वो पहले मछलो के रूप में आये। आप जानते हैं कि जीव ये चक्र खराब हो जाने से, मनुष्य को यह ध्यान में लाना चाहिए. पहले समुद्र में हुआ था। उसके बाद मछली से कछुआ बन गया। कि हो सकता है कि आप में कोई दोष हो। कुछ लोग होते हैं इस प्रकार ये विकास की अलग-अलग अवस्थाएं लक्ष्मी जो अपने बच्चे से बहुत दुष्टता से व्यवहार करते हैं और बच्चों नारायण की विकासशोलता की द्योतक हैं। वो सब हमारे अन्दर को बुरी तरह से पीटते हैं, उनका ख्याल नहीं रखते उनका पितृत्व बंधे हुए हैं। जो-जो संसार मे होता आया है वो सारा इतिहास पकड़ा जाता है। तब ये चक्र पकड़ा जाता है। हम लोग ऊपरी हर एक मानव में बना हुआ है और मानव इसलिए सबसे ऊँचा तरफ से इन्सान को देखते हैं यानि पूर्ण ढंग से नहीं देखते। मनुष्य हैं क्योंकि इसकी दशा सबसे ऊँची है। बाकी जितनी भी अवस्थाएँ केवल शरीर मात्र नहीं है। वो मन भी है, बुद्धि भी है, शरीर हैं वो मनुष्य से बहुत निम्न स्थिति में हैं। यानि आप अब समझ भी है, अंहकार भी है और आत्मा भी है। ये सारी चीज मनुष्य सकते हैं कि नाभी के चारों तरफ जो भव सागर फैला है उसमें है। जब तक पूर्ण चौज को आप न समझें, उसका संतुलन आप से जानवर निकल नहीं पाये। सिर्फ मानव निकल पाया है। न समझे तब तक आप ये नहीं समझ पायेंगे कि ये बीमारी जबकि हमारे यहां वामना अवतार हुआ, उसके बाद परशुराम किसलिए है। इस चक्र को बाई ओर हृदय अंग है। हृदय का जो जी का अवतार हुआ, उसके बाद श्री राम जी का। श्री राम जी का चक्र जो नाभी के ऊपर है उसे हृदय चक्र विराजमान है। यही आपका साक्षी है, यही क्षेत्रज्ञय है। यह आपके कहते हैं। श्री राम जी का स्थान हृदय चक्र के दायीं ओर में बारे में सब कुछ जानता है लेकिन ये आपको चेतना में नहीं है। बीचोबीच में नहीं। जो सुषुम्ना नाड़ी है जिससे आपका विकास है। माने ये कि आप ये तो जानते हैं कि कोई आपको जान होता है उस पर इसलिए नहीं रखा क्योंकि श्री रामचन्द्र जी ने रहा है लेकिन आप उसको कार्यान्वित नहीं करते। आपके अन्दर अपने को अवतार नहीं माना था। उन्होंने अपने को मर्यादा से स्पन्दित नहीं है। चिकित्सकों को भाषा में कहने का होगा कि पुरुषोत्तम मान करके इस बीच से हटाकर अर्थात उत्कान्ति के पद से हटा कर अपने को अलग कर लिया। ये आपके पिता ( का स्थान है। ये आपके पितृत्व का स्थान है। यदि किसी व्यक्ति ने अपने पिता को सताया हो, तकलीफ दी हो, तो ये चक्र पकड़ता को गति को कम करता है ? कौन आपकी धड़कतो छाती को है। अब डाक्टर लोग इसे मानते नहीं। इस चक्र पकड़ने से ही धीमा कर देता है? कौन आपके पेट में पाचन क्रिया करता लोगों को ऐसी बीमारी होती हैं जिससे बहुत तेज श्वास चलने है? ये जो स्वयं है वो आत्मा है। और वो आत्मा हमारे परा लग जाता है और किसी भी तरह से श्वास नहीं रुकता और अनुकम्पी नाड़ी तंत्र से चलता है लेकिन ये आत्मा हमारे चेतना लोग एक साहब को तो पच्चौस साल से चली आ रही थी। ये कहते स्थान है इसमें आत्मा का स्थान है। आत्मा आपके हृदय में आपका परा-अनुकम्पी तन्त्र आपके काबू में नहीं है। उसे रोग आटोनोमस) स्वयं चलित नाड़ी-तन्त्र भो कहते हैं। लेकिन ये स्वयं क्या है ? स्वयं कौन है ? कौन आपक हृदय में नहीं है। इसको मध्य नाड़ी तंत्र पर लाते ही अनेक रोग ठीक हो जाते हैं। जैसे हृदय का विकार है, आजकल दिल का दौरा बहुत हो आम बात है । लेकिन दिल का दौरा क्यों आता है? मैने कहा आपसे की हृदय में आत्मा का स्थान है। शिव का स्थान है यानि आत्मा जहाँ विराजती है वो शिव है। जब आदमी का ध्यान आत्मा से हटकर संसारिक कार्यों में लगता है। जो बहुत अधिक काम करता है, बहत अधिक दौड़ता है, वो सोचता है वही दुनिया में एक चक्रधारी मिला हुआ है। वो सारी दुनिया का भार लेकर चलता है। उसकी बाई ओर कमजोर हो जाती है। उसका दिल कमजोर हो जाता है। उसका आत्मा क्षीण हो जाता कहते हैं माताजो कि ये ला इलाज हैं। वर्षों से ठीक नहीं होती। पितृत्व का स्थान बिगड़ने के अनेक कारण होते हैं। जैसे आपके पिता की मृत्यु जल्दी हो गई। ऐसी उम्र में हो गई है जब आप बहुत ही छोटे थे, तो उनको आपको फिक्र लगो रहती है। कोई मरता नहीं। आप ये तो जानते हो हैं। उनकी जीव- आत्मा आपको आत्मा के पास मंडरातो रहती है। उनकी जीव- आत्मा के कारण आपका ये दायां हृदय पकड़ा जाता है। आपको आश्चर्य होगा कि कितने लोगों की मैने इस तरह की बीमारियां ठोक की हैं। उनसे कहा कि आप अपने पिता से कह दीजिए कि हम बिल्कुल ठीक हैं। आप फिक्र न करें और आप फिर

है। उससे शिव गुस्सा हो जाते हैं और जब शिव गुस्सा होते हैं सहजयोग में बहुत नहीं होता। अति बहुत गड़-बड़ होता है। कोई तो दिल का दौरा हो जाता है। प्रकृति का भी एक नियम है। जब यदि अति विद्वान हो तो पार नहीं हो सकता। कोई अति श्री मन्त हो तो पार नहीं होगा। क्योंकि अति में जो दो नाड़ियां हैं ईडा दौड़ा रहा हो, उसकी दाई ओर पिंगला नाड़ी से बहुत काम ले और पिंगला उन्हों में घूमते रहते हैं। कुण्डलिनी जो है बीच में रहा हो तो उस वक्त परमात्मा ही ये व्यवस्था करते हैं कि उसका चलती है। मनुष्य को बीच में रहना चाहिए। मध्य मार्ग में रहना कार्य रुक जाए, उसको दिल का दौरा हो जाता है। कोई आदमी चाहिए। कोई भी अतिशयता करने से आपको हमेशा दुःख होंगे। बहुत कार्य करता है तो उसका अहंकर बंढ़ जाता है ईड़ा नाड़ी आपपागल भी हो सकते हैं। किसी भी अति पर उतरने की जरुरत नहीं है। यदि आप बीचोंबीच हैं तो आपके लिए आत्म साक्षात्कार नहीं। एक आदमी आये, वो मेरे सामने कांप रहे थे मैने कहाँ का पाना बहत आसान है। यदि आप सर्व सामान्य हैं तो ठीक है आपका परमात्मा में विश्वास है। वो बोले नहीं मेरा तो नहीं है। लेकिन यदि आप बड़े आदमो हैं,अति में हैं तो हम आपको नमस्कार करते हैं । आप सफल इसमें हों उसमें नहीं। मनुष्य को बनाई? बड़ी आसानी से मनुष्य कहता है हमारा परमात्मा में बीचो-बौच होना चाहिए, उसकी सारी गति बीचो-बीच हो। अब बहुत महत्वपूर्ण है। इसे भी समझ को अधिकतर पार्किन्सन की बीमारी होती है। कारण ये हैं लेना चाहिये। इस चक्र में जगदम्बा का स्थान है । जगदम्बा जब कि उनकी आत्मा क्षीण हो जाती है। वो थर- थर काँपने लगते हमारे अन्दर हिल जाती है तो हमारे अन्दर असुरक्षा की भावना आ जाती है। जंब वह सुप्त हो जाती है तों हमारे अन्दर धड़कन आप ये सोच रहे हैं कि हाल का बोझा कम करने के लिए कुछ आ जाती है। औरतों में तब स्तन कैंसर हो जाता है। यह जो भी कुर्सियां सर पर उठा ले तो आपको लोग क्या कहेंगे? कि अगर हम अतिशयता करते हैं उसकी वजह से ही कैंसर हो जाता है। अगर मनुष्य मध्य में रहे तो उसे कैंसर की बीमारी नहीं हो सकती। य दो नाड़ियां ईड़ा व पिंगला है इसके अतिचालन के कारण लें। उसी प्रकार आप अपने सर पर बेकार के बोझे ढो रहे हैं। कैंसर होता है। यदि मनुष्य मध्य में रहे और सब परमात्मा पर सब कार्य करने वाला परमात्मा है। एक पत्ता भी उसके कहे बगैर छोड़कर के कार्यान्वित रहे तो उसे कभी भी कैंसर की बीमारी नहीं हिल सकता। सही है या नहीं है ? ये सिवाय आत्म साक्षात्कार नहीं होती। कैंसर की बीमारी सहजयोग से ही ठीक होगी और के जान नहीं सकते। आपको लगेगा माताजी ूं ही कह रही किसी चीज से ठोक हो हो नहीं सकती। क्योंकि सहजयोग से हैं। आपको आश्चर्य होगा की उसकी शक्ति कितनी प्रगल्भ है। ही आप अपने आत्मा को प्राप्त करते हैं । और अपने परा अनुकम्पी नाड़ी तंत्र जो बीचों-बीच है, जो इन दोनों प्रणालियों उसके साम्राज्य में आना तो चाहिए। जब तक आप हिन्दुस्तान को प्लावित करती है। बायां और दायां अनुकम्पी नाड़ी तंत्र की के नागरिक नहीं हुए आप क्या जानिएगा कि हिन्दुस्तान के गति चलती रहती है। इसके बीच में चक्र हैं और उसके अन्दर देवता हैं। ये जब बहुत ज्यादा चलने लग जाती है तो ये हट जाती के साम्राज्य में देखेंगे कि इससे ज्यादा कार्यकुशल तो कोई है है। जब ये दोनों हट जाती हैं तो निरंकुश हो जाती है। जब ही नहीं। जो परमात्मा की है उसमें आपको आना मात्र है। देखिएगा निरंकुश हो गए तो जैसा चाहे वैसा बढ़ने लग जाते हैं। ये के आदमी बहुत ज्यादा काम कर रहा हो, अपने शरीर को बहुत से अहंकार बढ़ता है तो गुब्बारा बन जाता है। फिर उसको होश तो मैने कहा आपको किसने बनाया? ये सारो सृष्टि किसने विश्वास ही नहीं। यह बहुत बड़ी अहँकारिता है। नास्तिक लोगों जो बीच में हृदय चक्र है ये हैं। मतलब ये है आप समझ लीजिए आप हाल में बैठे हैं अगर आप किसी वायुयान में जा रहे हैं और आप यह सोचे की का बोझा सर पर उठा ले इसके लिए हम कुछ चीज सर पर रख कितनी सूक्ष्म है ? कितनी गहन है ? कितनी प्रेममय है? पहले नागरिक कैसे हैं औरउनकी सरकार कैसी है ? लेकिन परमात्मा किस प्रकार आपका स्वागत होता है। सारी सामूहिक शक्तियां जिसकी वजह से न जाने कितने ही लोगों को ठीक कर सकते हैं। न जाने कितने ही लोगों को पार कर सकते हैं न जाने कब तक चैन की बँसी बजा सकते हैं जितने भी वर्णित देवदूत हैं, जैसे कि हनुमान; भैरवनाथ, गणेश जी, इन सबकी आपको सहायता मिलती रहती है। आप के कार्य इस प्रकार सुगठित होते रहते हैं कि अगर किसी सहजयोगी से बात करें तो आपको आश्चर्य होगा कोई आदमी जो एक भी रुपया नहीं कमा सकता था वो भी बहुत रुपया कमाने लग जाता है। लेकिन कोई भी विषालुता आदमी के अन्दर आ जाती है। और इस विषालुता आने के कारण ही मनुष्य में कैसर की बीमारी हो जाती है। मनुष्य किसी तरह से इसके अन्दर यदि चैतन्य दे दे, इसके अन्दर के देवता जागृत कर दें तो फिर वही स्थिति आ सकती है और ये बीमारी एक दम ठीक हो सकती है। आज ही हमारे पास एक कैसर के मरीज आए थे उनका एक भाग तो डाक्टरों ने खत्म ही कर दी थी क्योंकि डाक्टर के पास तो ये काट डालो, आँख काट डालों, सर निकाल डालो और फिर न जाने क्या-क्या कर दो। ये कैंसर को ठोक करने का तरीका नहीं। आज ही आए

थे। एक दिन के अन्दर उनमें फर्क आ गया। आप कहेंगे कि के अवतरण में घटित हुआ है। इसलिये मनुष्य उस विराट के माँ ये कैसे हो गया। बिल्कुल सीधी सी चीज है इतनी कठिन बात बारे में सोचने लगा। उस परमात्मा के बारे में सोचने लगा जिसमें है ही नहीं क्योंकि ये लोग मशीनरी जानते ही नहीं और बगैर उसने अन्तरनिहित होना है, जिसमें उसने समाना है। जब आप जाने आप ठिठ्र-पिठ्र करते रहिए तों खराबी के सिवा उसमें समा जाते है और जब ये बूंद सागर हो जाती है तो सागर करिएगा क्या? अगर डाक्टरों से कहा जाए कि आप इस की सारी शक्तियां उसमें चलायमान हो जाती है और वह स्वयं मशीनरी को समझें इसे जाने कि ये क्या है तो वो कहते है कि देखता है कि वह सामुहिक चेतना में जागृत होता हैं ये नहीं की आप लिस्ट दीजिए बनाकर जिन्हें आपने ठीक किया है। तो मैं हम भाषण दें, आप सब भाई बहन हैं। इसकी कोई अहमियत नहीं यहां कोई फाइल रखती हूं? जो भी आता है वो अगर गंगा के है उसके बाद आप हो ही जाएगे। जब आप शरीर के किनारे आ जाए तो ठीक है। ये तो प्यार का खेल है। हम कोई अंग-प्रत्यंग हैं, समझ लीजिए जब हम आपकी बीमारी ठीक पैसा बनाने के लिये थोड़ा ही बैठे हैं। पैसा बनाने वाले न तो इसे करते हैं, मतलब हमारे हाथ से ये घटना हो जाती है तो इसमे कभी समझेंगे और न ही समझ पाए हैं। चैतन्य तो बह रहा है। हमारा क्या? क्योंकि आप हमारे ही तो अंग-प्रत्यंग हैं। समझ प्यार बहता रहता है। देते रहते है, देते ही रहते है और इसी में लीजिए हमारे हाथ पर चोट आई हैं अगर हम उसे ठीक कर आनन्द आता है। ये प्यार जब अन्दर जाता है, तो कार्यान्वित होता रहे हैं तो ये कोई आपके ऊपर अहसान या उपकार नहीं कर है। ये सारी सृष्टि ही प्रेम और चैतन्य से चल रही है। परमात्मा रहे। ये तो हम अपनी अगुलियों को ठीक कर रहे हैं। जब लोग की अनुकम्पा और उनकी क्षमा शीलता से चल रही है। नहीं तो दान के नाम के विचार से कार्य करते हैं, उसका परमात्मा से हम लोगों ने इतनी गलतियां की हैं, इतनी गलतियां की हैं कि सम्बन्ध रखते हैं तो उनकी कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। हमलोगों को वास्तविकता में परमात्मा के बड़े ही अनुग्रहित होना जितने भी बड़े मिशन वाले तथा दानी लोग हैं उनकी कुण्डलिनी चाहिये। उनको बहुत ही ज्यादा हमको मानना चाहिये कि उन्होंने जागृत नहीं होती क्योंकि वह गलतफहमी में बैठे हैं। ठीक है हमें हमेशा माफ किया है। यहां तक की कितने ही लोग हमें आपको किसी गरीब की मदद करना हैं वो आप इसलिये कर परमात्मा को मानने वाले मिलेंगे। वहत कम लोग हैं जो परमात्मा रहे हैं क्योकि आपके अन्दर कोई रो रहा है। क्योंकि वह गरीब को मानते भी है या उनके ऊपर चित्त भी देते है। ये बीच के चक्र जो आपको लग रहा है वह आपके अन्दर आपके वैभव को पकड़ने की वजह से मनुष्य में जो बीमारियां है उनमे से सबसे चुनौती दे रहा है। इसलिये आप उस गरीब की मदद कर रहे हैं। बडी बीमारी है स्तन कैंसर। जिन औरतों को असुरक्षा की भावना आ जाए, जिनको लगे कि उनके पति गलत रास्ते पर चल रहे रहे हैं तो इसलिये कर रहे हैं क्योंकिआपकी तन्दरुस्ती में भी ऐसी है। आजकल तो इस मामले में आदमियों से कह भी नहीं सकते कोई चीज है जो आपको खींच रही हैं उस बीमार की सेवा के और औरतें भी उसी रास्ते पर चल रही है। मैंने पहले ही कहा लिये। इसलिये जो लोग कहते है कि हम बहुत दानवौर हैं तो ये था कि पवित्रता जीवन का सबसे बढ़ा ध्येय हैं। जिस आदमी बहुत अहंकार की बात है। जो इन्सान अपने को समझता है कि में पवित्रता नहीं है वो संसार में कुछ भी नहीं कर सकता। वो मैं अपनी खुशी के लिये कर रहा हूं ये मेरा सुख हैं ये मेरा आनन्द भी करता है तो उसके मरने केबाद सभी कहते हैं अरे था हैं इसलिये मैं कर रहा हूं, क्योंकि ये चीज मुझे काट रही हैं, अगर आप तन्दरुस्त हैं और किसी बोमार की तीमारदारी कर कुछ तो क्या था, ऐसा गन्दा आदमी था। लोग उसके बारे में किताबे छपवाते हैं और कहते हैं होंगे बड़े भारी होंगे, बड़ीलडाईयाँ लड़ी होंगी। लेकिन आदमी गंदा था। संसार में लोगों ने ऐसे आदमी को सामूहिक रुप से कभी भी महत्ता नहीं दी | उसके ऊपर भी जो चक्र है वह बहुत महत्व पूर्ण हैं और मुनष्य के लिये तो बहुत ही महत्पूर्ण हैं। जब मनुष्य ने अपनी गर्दन पूरी तरह ऊपर उठा लो तो ये चक्र पूरी तरह प्रकाशित हुआ। ये चक्र है विराट चक्र।ये चक्र है श्री कृष्ण का।विराट का मतलब ये हैं कि जब मुनष्य ने गर्दन उठाई तो जाना की मैं एक बड़े भारी विराट का एक अंग प्रत्यंग हूं। मैं एक सागर में बसी हुई एक बूंद हूँ। एक पुरातन अस्तित्व का मैं एक हिस्सा हूं। ये श्री कृष्ण मुझे दुख पहुंचा रही है इसलिए मैं कर रहा हूँ। जो आदमी इस तरह सोचकर कार्य करता है उसकी कुण्डलिनी बहुत आसानी से जागृत हो जाती है। इसलिए हमने देखा इसका संबंध परमात्मा से जोड़ने की कोई जरूरत नहीं। ये आपकी निजी चीज है। क्योंकि आपके अन्दर ये संवेदना हैं, आप इसे कर रहे हैं इसलिए ये घटित हो रही है। बहुत से लोग इसका मिशन बनाते हैं भगवान से संबंध जोड़ेगे भगवान से संबंध नहीं सिर्फ आत्मा से ही होता है। जितने भी लोग परमात्मा का काम कर रहे हैं उन्हें जान लेना चाहिए कि परमात्मा का काम एक ही है कि मनुष्य का संबंध परमात्मा से जोड़ दे। आत्मा का संबंध परमात्मा से जोड़ना ही एक मात्र कार्य है जो परमात्मा के नाम पर करना चाहिए। बाकी

जो कार्य है वो लौकिक है। कंबल इकट्टे करना, कंबल बांटना। हैं कि एक बारपार करने के बाद सारा देवी महात्मय पढ़ डाला, कपड़े इकट्ठे करना कपड़े बांटना। ये कार्य परमात्मा का नहीं। ये सब लौकिक कार्य है, भौतिक कार्य है। परमात्मा का इससे कण्डलिनी क्या है। आज भी 300 आदमी भारत आना चाहते कोई सम्बन्धनहीं। इस चक्र में, विशुद्धि चक्र में 16000 नाड़ियां होती हैं। खुद ही सोच लीजिए कितना महत्वपूर्ण चक्र है। आपकी खुद अपना खर्चा करके आये हैं और हर एक जगह जहाँ हम 16000 नाड़ियाँ इस चक्र से चलती है। अब जब आप सिगरेट जाते हैं वहां सहजयोग कैसे कार्यान्वित है उसे देखते हैं। आपको पीते हैं तो आप इस चक्र को सताते हैं। अपने पीछे डंडा लेकर आश्चर्य होगा कि हमारे ग्रामों में हजारों लोग खटाखट पार हो क्यों पड़े हैं कि आ बैल मुझे मार। और उसके लिए पैसे भी जाते हैं। लेकिन आपके बंबई शहर में तो कमाल है कि यहां दो। आप जानते ही नहीं कि सिगरेट पीने से अधिक नुकसान लोग पार होते भी हैं फिर भी टिकते नहीं। यहां पर सहज़योग अन्दर हो जाता है। आपको इसका अन्दाजा ही नहीं। लोग कहते सबसे ढोला, सबसे धीमा और सबसे छोटा रह गया है। न जाने हैं इससे केंसर हो जाता है। सिर्फ कैंसर ही हो जाए तो बात दूसरी क्यों कल भी मैंने कहा कि नौ सालों से मैं यहा जन्मदिन मनाती है। पर आपका पुर्नजन्म होने का अवसर भी काफी हद तक खत्म हूं। हालांकि दिल्ली में बहुत काम हुआ। यहां से कितने ही ज्यादा हो जाता है। अगर आप बहुत अधिक सिगरेट पीते हैं तो ये चक्र बुरी तरह से पकड़ा जाता है। सहजयोग में पता नहीं कैसे सब रही हूं। शायद बंबई शहर के लोग जड़ता में बैठे है। इनकी पकड़ चीजें क्षमा हो जाती हैं ? यदि आप सिगरेट भी पी रहे हैं तो उन पर आ गई है, या तो पश्चिमी देशों का प्रभाव इतना हो गया भी आप पार हो जाएंगे। एक साहब बहुत ज्यादा सिगरेट पीते है कि यहां के लोग बहत ही मुश्किल में जमते हैं। सहजयोग में थे। वो पार हो गए तो उनके अन्दर से बहुत धुआँ निकला और पाना आसान है… जमना मुश्किल। हिन्दुस्तानी लोग बहुत जल्दी उसके बाद बहुत सुगन्ध आई। उसके बाद जब भी वे सिगरेट पीने पार हो जाते हैं। पर एक एक विदेशी पर आठ-आठदिन मेहनत जाते थे तो उनको सुगन्ध आती थी। फिर उन्होंने सिगरेट पीना -,रनी पड़ती है। लेकिन जब वो पार हो जाता है तो मुझे लगता ही छोड़ दिया। वैसे भी सिगरेट व शराब दोने ही मनुष्य इसलिए है कि पीता है क्योंकि वह अपने से ही भागना चाहता है। एक ये हिन्दुस्तानी चाहे हजारों पार हो जाएं तो भी व्यर्थ है क्योंकि इनको पलायन है। अपने से भागना, अपने को मनुष्य देखना नहीं चाहता। किसी भी चीज की कदर नहीं है। अपनी भी जिन्हें कदर नहीं क्योंकि अपना जो इतना सुन्दर है वो तो सारा बंद है। वो तो जाना है उनसे फिर क्या कहा जाए? इसलिये मैं आपसे विनति करती नहीं। जब वो अपने को जान लेता है तब उसको इच्छा ही नहीं हूं कि यदि आप पार हो जाए तो आप इसे प्रा ले और इसे आगे रहती क्योंकि अपने ही मजे में वह बैठा रहता है। उसको लालच बढ़ायें। यहां हमारे केन्द्र हैं। वहां जाएं लेकिन लोगों को जब तक ही नहीं होता। क्योंकि इतना मधुर स्वाद जब आने लगता है तो हाल याशान दार चीज न हो, लोगों को इतना अहंकार हैं कि उसे अपने आप ही छोड़ देता है। इसलिए सहजयोग में छोटी जगह वो जाना ही नहीं चाहते। ये बड़ी दुख की बात है। आदिशंकराचार्य को पढ़ डाला। बाइबल में ढूंढ निकाला कि थे पर यहां कोई व्यवस्था ही नहीं थी। तो भी पंद्रह बीस आदमी लोग वहां पार हो गये वहां मैं केवल तीन साल से ही कार्य कर कुछ फायदा हुआ। क्योंकि ये जमने वाले है लेकिन मनुष्य कोई भी शंका नहीं होती अपने आप ही ये घटना घटित होती जबकि पहले लोग अपने को पाने के लिये जगंलों में जाते थे। है। लंदन में तीन सौ लोग हैं जो बुरी तरह से नशा लेते हैं और कहां-कहां घूमते थे। परन्तु अब जब आपके घर में गंगा बह सबने पार होने के बाद अपने आप नशे छोड़े। बिल्कुल पूरी कर आई हैं तो इसका सम्मान करना चाहिये। समझना चाहिये तरह से छोड़ दिये। परन्तु एक बात है हमारे हिन्दुस्तान में जो कि कितनी अलग सी चीज हमें मिली है। अमूल्य चीज हमें मिली लोग हैं योगभूमि में पैदा हुए हैं। इनके ऊपर बहुत वरदान हैं हमें इसे बहाना चाहिये। बात-बात में खोना अच्छी बात नहीं अपने ही आप मिल गए हैं। पूर्व जन्म की सम्पदाओं के कारण है।इसतरह आपको क्या फायदा होने वाला है? लेकिन जो चीज आप हिन्दुस्तान में पैदा हु और इसलिए आपधार्मिक भी बहुत आपने पायी है वो आपने अनन्त की तपस्या से पाई है। उसे खोकर है। आप अबोध भी बहुत है। बहुत गुण आपके अन्दर है। लेकिन आपमें एक दोष बहुत बड़ा है कि जो चीज आपको आसानी न तो आप नर्क में जा सकते है और न स्वर्ग में। आपके लिये से मिल जाती है उसकी महत्ता आपमें जरा भी नहीं है। आपको कोई भी स्थान परमात्मा को समझ नहीं आएगा कि ऐसे अकलमंद आश्चर्य होगा कि लंदन में मेरे प्रोग्राम में, जो हर हफ्ते होता इन्सान के लिये कौन सा स्थान बनाया जाए। आपसे विनती है है, इतनी भीड़ रहती है कि जरा भी जगह नहीं रहती । और इससे कि आज अगर आप इसे पा भी ले तो इसे बढ़ायें। हमारे केन्द्र बड़ा ही हाल होगा छोटानहीं। और लोग इस लगन से लगे हुए में से किताब ले जाए। वो आपको इसके बारे में समझा देंगे। इसे से हैं के यही कहा जाएगा कि आपके लिये कौन सा स्थान रह जाएगा।

स्थान है वो हमारे सर में है और वही शिव हमारे हदय में बसे समझकर इसमें गतिमान हों। जब विशुद्धि चक्र को कुण्डलिनी लांघ जाती है तो आज्ञा है। जैसे ही वहाँ प्रकाश होता हैं वैसे ही हृदय से आत्मा का प्रकाश चक्र पर आती हैं। आज्ञा जो हैं यह जहां हमारी दुक तन्त्रिकाएं हमारे अन्दर बहने लग जाता है और परा-अनुकम्पी नाड़ी तन्त्र एक दूसरे को लांघ जाती हैं वहां बड़ा सूक्ष्म चक्र है । यही हमारे को हम नियन्त्रित कर लेते हैं। एक दम आपको लगता है सर पीयूषकाय (Pititutary) और शंकुरुप (Pineal) ग्रन्थियों से ठंडी-ठंडी हवा आ रही हैं और हाथों से भी ठंडी-ठंडी हवा को भी नियन्त्रित करता है। इसी से हमारी आँख पर भी असर आता है क्योंकि दृुक तन्त्रिका भी वहीं से आती है। जिनका आज्ञा चक्र खराब हो जाता है उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो तक आप पार नहीं हो सकते। अब इसके लिये आप कहें कि सकती है। पागल आदमी का आज्ञा चक्र खराब होता है। आज्ञा माँ हम क्यों नहीं पार हो सकते ? हम कोई भी कड़ी बात आपसे चक्र खराब होने से आदमी अहंकारी भी हो सकता है। या एक नहीं कहना चाहते। इतना ही कहेंगे कि बेटा आपमें ये चक्र खराब दम उसको स्थिति पोछे की तरफ से खराब होता हैं जिसे हम प्रतिअहं कहते हैं, चाहिये। अपने पापों तथा गलतियों के बारे सोचने की जरुरत यानि ऐसी बीमारियों से प्लावित होता है जिसमें कि उसे तन्द्रा नहीं है। ये सब चीज छूट जाती है क्योंकि पाप पुण्य भी आप आ जाती है। और सोते ही रहता है हर समय सोते ही रहता है। अपने अहैं से करते हैं। अहं और प्रति अहँ के इस प्रकार हट एक बीमार सा बन जाता है। उसे कोई भी काम करने की इच्छा जाने पर आप बिल्कुल बदल जते हैं। आप जो थे वो अब आप नहीं होती। और जब सामने का चक्र पकड़ता है तो व्यक्ति बहुत रहते नहीं। आप आत्मा हो जाते हैं। आप आत्मा की आंख से देखने ही महत्वाकांक्षो हो जाता हैं और अनेक तरह के कार्य करने लगता है और अपने मद में किसी को नहीं मानता। उसे लगता है कि मैं ही दुनिया का सब कुछ हूँ। इस तरह ये चक्र सन्तुलन रहते हैं। पर इस बीच को जो स्थिति होती है कि जब तक ऊपर को तोड़ देता है। ये चक्र जो है यहां गणेश जो का अवतरण है। चढ़ जाएं और वहां स्थिर हो जाए यहीं स्थिति जरा नाजुक होती ईसा मसीह का है। अब ईसा मसीह का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। सहजयोग पाने के बाद भी आपको थोड़ा सा स्थिर होना हैं। देवी महात्म में महा विष्णु का वर्णन हैं। आप लोगों ने शायद पड़ेगा। सहजयोग में पहले दिन बहुत जोर से कुण्डलिनी काम पढ़ा होगा। महा विष्णु का जो वर्णन है वो बिल्कुल ईसा मसीह करती है बहुत लोगों को पहला अनुभव इतने जोर का होता है से मिलता है गणेश जी से किस तरह से महा विष्णु तत्व बनाया कि वे आश्चर्य करते हैं लेकिन इसके बाद भी कुण्डलिनी जागृत गया, यह आप पढ़ें। आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि जो मैं कह होती है। आपके अन्दर की कुण्डलिनी हमें पहचानती है। उन्माद रही हूं एक-एक बात सही है। इस चक्र को जब कुण्डलिनो से, आवेग से और खुशी के मारे हमें देखते हौ वह उछल पड़ती लांघ जाती हैं तो आप निविचार हो जाते हैं। एक दम निविचार है और बाहर आ जाती है। आप को अनुभव हो जाता है। लेकिन हो जाते हैं। आप अपने ऊपर यदि चित्त दे तो आप अपने अन्दर निविचारिता महसूस करेंगे। अधिकतर लोग निविचार चेतना में अनेक दोष हैं। जैसे बाढ़ आकर नदी आगे बढ़ जाती है और चले जाते हैं। ये पहली समाधि है जिसे निविचार समाधि कहते उसके अन्दर के गड्डे भरने लगते हैं उसी प्रकार कुण्डलिनी हैं। इसी घटना के साथ आप देखें की आप किसी की भी आपके अनेक रोग, तकलीफों को ठीक करने लगती है। एक कुण्डलिनी उठा सकते हैं। अभी आप पार नहीं हुए लेकिन जब आप निर्विचार समाधि में चले गये तभी आपमे यह शक्ति आ अंकुरित हो भी जाए तो भी उसे संजोना पड़ता है। अब आप जाती हैं कि आप किंसी की भी बीमारी भी ठीक कर सकते है सोचिए कि बौज का अंकुर इतनी सख्त जमीन में से कैसे और थोड़ी बहुत कुण्डलिनी भी उठा संकते हैं। लेकिन आप पार नहीं करा सके। लेकिन जब ये कुण्डलिनी इसे छेद देती है जो इसी प्रकार अपने आत्म साक्षात्कार को बहुत सम्,लना पड़ता कि सहस्त्रार है जो कि 1000 नाडियों से बंधा है उसको छेद है। यह जागृती बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसे आप पाएं और इसका करके तालू से जो कुण्डलिनी निकलती है तब वे अति सुक्ष्म सर्वव्यापी शक्ति में एकाकार होती हैं। उस वक्त और उसके हाथों आप सबको अनन्त आर्शीवाद। से हृदय का स्पन्दन शुरु हो जाता है क्योंकि जो सदा शिव का आ रही है। इस चक्र का खुलना बहुत जरुरी हैं जब तक ये चक्र नहीं खुलता, जब तक सहस्रार को कुण्डलिनी नहीं छेदती तब हैं। वो ठोक हो सकते हैं। आपको इसकी चिन्ता नहीं करनी ज्यादा गिर भी सकती हैं। जब ये चक्र बहुत लग जाते हैं। जब तक आप पानी में हैं आपको डूबने का डर लगता रहता है। पर नाव पर सवार होकर आप पानी को देखते इस अनुभव की स्थिरता इसलिये नहीं टिकती क्योंकि आप में बार अनुभव होने के बाद इसे संजोना पड़ता है। जैसे बीज फूट कर निकलता है। पर बाहर आने पर उसे सम्भालना पड़ता है। आनन्द उठाएं। भाषण सुनकर चले जाने का कोई लाभ नहीं।