Evening prior to departure for London, Importance of Meditation

पुणे (भारत)

1979-03-24 Evening prior to departure for London, Pune Marathi, 26'
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Evening prior to Her departure for London (Marathi & Hindi). Pune, Maharashtra, India. 30 March 1979.

[Hindi Transcript]

 ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK आप लोग सब इस तरह से हाथ कर के बैठिये। इस तरह से हाथ कर के बैठे और आराम से बैठे। इस तरह से बैठिये। सीधे इस तरह से आराम से बैठिये। कोई स्पेशल पोज़ लेने की जरूरत नहीं है। बिल्कुल आराम से बैठिये। सहज आसन में। बिल्कुल सादगी से। जिसमें कि आप पे कोई प्रेशर नहीं। न गर्दन ऊपर करिये, नीचे करिये। कुछ नहीं। मुँह पर कोई भी भाव लाने की जरूरत नहीं है और कोई भी जोर से चीखना, चिल्लाना, हाथ-पैर घुमाना, श्वास जोर से करना, खड़े हो जाना, श्वास फुला लेना ये सब कुछ करने की जरूरत नहीं। बहुत सहज, सरल बात है और अपने आप घटित होती है। आपके अन्दर इसका बीज बड़े सम्भाल कर के त्रिकोणाकार अस्थि में रखा हुआ है। इसके लिये आपको कुछ करना नहीं है। आँख इधर रखिये। बार बार आँख घुमाने से चित्त घूमेगा। आँख इधर रखिये। चित्त को घुमाईये नहीं। आँख घुमाने से चित्त घूमता है। आँखे बंद कर लीजिये, उसमें हर्ज नहीं । उल्टा अच्छा है, आँख बंद कर लीजिये। अगर आँख बंद नहीं हो रही हो या आँखें फड़क रही हो तो आँख खोल दीजिये। सब से पहली चीज़ है यह घटना घटित होनी चाहिये। लेक्चर सुनना और सहजयोग के बारे में जानना इसके लिये बोलते बोलते मैं तो थक गयी हूँ। और एक बहोत बड़ी किताब भी लिखी गयी है, अंग्रेजी में । उसकी कॉपीज तो शायद खत्म हो चुकी। लेकिन और आने वाली हैं। जिनको लेना हो वो अपना नाम दर्ज करें। उसमें सब सहजयोग के बारे में बातचीत की गयी है। काफ़ी बड़ी किताब है। इसलिये मैं लेक्चर नहीं दंगी। लेक्चर देते देते मैं थक गयी। अब आप सब लोग पार हो जाईये। जो पाने का है, उसे पा ले। उसी के लिये अब हम टाइम देंगे। क्योंकि आज मैं आखरी दिन यहाँ पर हूँ। उसके बाद लंडन चली जाऊंगी। जो पाने का है वो सहज है और सहज ही घटित होता है। उसमें कोई भी आफ़त करने की जरूरत नहीं। कोई चिल्लाने की जरूरत नहीं। चीखने की जरूरत नहीं । जब घटित होगा, आप खुद ही जान जाईयेगा, कि हो गया। पूरी तरह से आँख बंद कर दो। तुम्हारे आज्ञा पे पकड़ आ रही है। दोनों हाथ हमारी ओर कर के आराम से बैठ जाईये। इस तरह से। कोई ऊपर उठाने की जरूरत नहीं। आराम से। बिल्कुल आराम से। थोड़ी देर के लिये अपने विचार जरा बाहर रख दें। उससे कोई फायदा नहीं होता है। जो घटना है, उसे घटित होने दीजिये अपने अंदर। आपको पाना है ना? फिर आप पा लीजिये। इधर की, उधर की बातें सोचने से क्या फायदा ? इसकी, उसकी बात सुनने से कोई फायदा नहीं है। जिन्होंने दुनिया में किसी का भी कल्याण नहीं किया, वो क्या बात कर सकते हैं? आप लोग अपना अपना कल्याण साध लें। इसको साध लेना चाहिये। थोडे हल्के बैठें। कुछ लोग जरा नर्वस से हैं। थोड़े हल्के बैठें। एकदम पैर वगैरा हल्का छोड़ के बैठिये। कोई भी लॉकिंग सिस्टम नहीं करे। बदन एकदम हल्का छोड़ दीजिये। कोई भी आसन वरगैरा लेना नहीं। दोनो हाथ हमारी ओर करें और आँख बंद करें। अब क्या होता है, आप देखिये। अब अपने मन की ओर देखें और ये जाने की कोई विचार अन्दर से आ रहा है। अन्दर से। आप बाहर से मेरी बात सुन रहे हैं। आप सतर्क हैं। लेकिन ये देखिये की आपको कोई विचार आ रहा है क्या? (माइक में तीन बार फूँक मारने के बाद) अब आपके हाथ में देखिये ठण्डी हवा आ रही है क्या? हाथ की तरफ़ चित्त करें। आँख न खोले। आँख बगैर खोले अपने हाथ की ओर चित्त करें, देखें ठण्डी ठण्डी हवा आ रही है क्या? अगर गरमी आ रही है, तो जरा हाथ झटक लें। जरा सा झटक लें, पोछ लें। या थोडा सा फुंक ले अगर गरमी आ रही है। आराम से बैठ के देखते रहिये। हाथ नीचे लें। आप हाथ नीचे रखिये। हाथ नीचे ले लीजिये। ऐसे रखिये। हाथ की ओर चित्त दे। पहले हाथ की ओर चित्त रखें। ज़रा झटक लें ऐसे हाथ। थोड़े हाथ को झटक लें अगर….। एक, दो बातें मैं आपसे बताऊँगी। जरा ध्यान दें। लेकिन आँख बंद रखें । आँख नहीं खोलियेगा । आँख कृपया न खोलें, क्योंकि कुण्डलिनी जब चढ़ती है, आज्ञा चक्र पे ‘डायलेटेशन ऑफ़ प्यूपिल’  होता है। इसलिये अगर आँख खुलेगी तो कुण्डलिनी चढ़ेगी नहीं। ये बराबर हिप्नॉटिज्म के विरोध में है सहज योग। Close your eyes. शांति से बैठिये। हमारी ओर दोनों हाथ ऐसे कर के बैठिये। मानो की जैसे माँग रहे हैं कि हमें कुण्डलिनी जागरण दीजिये। हमें पार कराईये। अब समझने की बात ये है, आपमें से जिन्होंने कोई भी कुलदैवत माना हो, या किसी की भी पूजा की हो, जैसे दत्तात्रेय की समझ लीजिये आपने पूजा की है। तो इस वक्त जो हालात है, उसमें आपको ये पूछना होगा, कि क्या हमारे सामने साक्षात् दत्तात्रेय बैठे हैं? जिनका बदन हिल रहा है वो आँखें खोल दें। अगर आप श्रीराम को मानते हैं, तो इसी तरह का प्रश्न आप करें। अगर आप जगदंबा को मानते हैं, तो पूछिये कि, क्या माँ आप जगदंबा है? यही एक तरीका है, सहजयोग में पाने का। इसे हम भी क्या करें! जिस तरह बिजली का जो प्लग चालू होता है, उसी में प्लग लगाया जाता है। इस वक्त हम ही चालू है। जब कृष्ण थे तब लोगों ने कहा, कि हम राम को मानते हैं। जब कृष्ण चले गये, ईसामसीह आये, तो लोगों ने कहा मोझेस को मानते हैं। जब हम आये, तो लोग कहते हैं हम इन सब को मानते हैं। आपको नहीं मानते हैं। और वो सब हम ही हैं। इसे क्या किया जाय ? अगर हम वही हैं तो हम इसे क्या करें? और आप लोगों को इसमें बुरा क्यों लगता है समझ में नहीं आता। आपको बहुत से काम आते हैं, जो मुझे नहीं आते। मुझे तो बहुत से काम आते ही नहीं। मुझे अगर ये काम आता है, तो इसमें आपको बुरा क्यों लगता है, मुझे यही समझ में नहीं आता। अगर हम कोई चीज़ है तो है। इसमें आपको घबराने की कौनसी बात है? हजारों कुण्डलिनियाँ जब उठाते हैं, तो कोई न कोई तो बात होगी, नहीं तो हम कैसे उठायेंगे कुण्डलिनी को ? सोचने की बात है। जो लोग गायत्री का मंत्र कहते हैं, उन्होंने पूछना चाहिये, क्या आप गायत्री हैं? संध्या हैं? जो लोग मोहम्मद साहब को मानते हैं, उन्होंने पूछना चाहिये, क्या माँ, आप मोहम्मद साहब हैं? जो लक्ष्मी-नारायण को मानते हैं, उन्होंने पूछना चाहिये, क्या माँ, आप लक्ष्मी-नारायण हैं? जो लोग हनुमान को मानते हैं, उन्होंने पूछना चाहिये, क्या माँ, आप हनुमान हैं? जो लोग भैरव को मानते हैं, उन्होंने पूछना चाहिये, क्या माँ, आप भैरव हैं? जो लोग शिवजी को मानते हैं, उन्होंने पूछना चाहिये, क्या माँ, आप शिवजी हैं? इसी प्रकार जगदंबा से पूछना चाहिये, इसी प्रकार श्रीराम से पूछना चाहिये, इसी प्रकार श्रीकृष्ण से पूछना चाहिये, क्या आप श्री राधा-कृष्ण हैं? इसी प्रकार ईसामसीह से पूछना चाहिये, मुझ से पूछिये, क्या माँ, आप ईसामसीह हैं? इसी प्रकार आप पूछें, क्या माँ, आप कल्कि हैं? पूछें, कि क्या माँ, आप आदिशक्ति हैं? जो आदिशक्ति के बारे में कहा गया है, वो सब हम काम करते हैं। तो फिर हमें आदिशक्ति मानने में आप लोगों को इतना हर्ज़ क्यों है? कॅन्सर तो आप हम से ठीक कराते हैं । अपनी कृण्डलिनी उठाते हैं। तो इस तरह से भ्रम में क्यों रहते हैं आप? आज तक हमने ये बात नहीं कही थी। लेकिन मुझे मालूम हैं कि मनुष्य अधिकतर मूर्ख होते हैं। जो दुष्ट होते हैं और जालसाज होते हैं और चोर होते हैं उनको ही भगवान मानते हैं। महामूर्खों की निशानी यही है।और जितने भी संत-साधु, असल होते हैं, अवतार होते हैं, उनको छलते हैं। ये अधिकतर मनुष्यों की विशेषता है। आप हमारे पास पार होने के लिए आये है, आपको हमारे प्रति श्रद्धा नहीं तो हम क्यों आपको पार करे? पहला हिसाब ये बताईये, कि हम आपसे एक पैसा नहीं लेते हैं। हमें आप कुछ देने वाले नहीं है। हम आपके पास कोई भी माँग नहीं करते हैं। हम ही उल्टे अपना पैसा खर्च कर के यहाँ आते हैं और अपने पैसे से ही रहते हैं। तो फिर आप हमारे ऊपर इतना हक क्यों जता रहे हैं? आप हम से कुछ माँगने आते हैं या हमें लेक्चर झाड़ने आते हैं? आपको अभी तक अगर मिला होता तो आप हमारे पास क्यों आते? फिर बाद में जब बीमारियाँ हो जाएँगी तब फिर आओगे। अभी ठीक हो जाओ| जिससे आगे बीमारियाँ नहीं आयेगी। नहीं तो कॅन्सर जैसी बीमारी भी चिपक जायेगी। सम्भल के रहो। इसको पा लेना चाहिये, जो परम है। वो तुम्हारे लिये हम खुद लाये हैं बना कर के बढ़िया। बड़े ही आप बुद्धिमान बन के आये हैं, कहाँ से आये हैं मेरी समझ में नहीं आता! सबदूर बुद्धिमानी के लक्षण नज़र आ रहे हैं, सारे उपद्रव भी तो बुद्धिमानी के है मनुष्य के! अब कुछ समझदारी थोड़ी देर के लिये रखो और पा लो। बचकाना अच्छा नहीं है। सारी जिंदगी बर्बाद कर दी फालतू चीज़ों में । क्या तुमसे माँ ये बतायेगी, कि तुम जा के शराब पिओ? अपने को नष्ट करो? अपना सर्वनाश करो? और जो आदमी ऐसी बातें कहता है उसको क्या वो हार पहनायेगी, कि ठीक है मेरे बच्चे का नाश कर? अभी तक अपने देश में कम से कम ऐसी माँएँ नहीं आयीं हैं। ये आपके भाग्य हैं। इस तरह से प्रश्न पूछे कि, ‘क्या माँ आप आदिशक्ति हैं?’ पूछिये ऐसा प्रश्न। (बाजू में, भाईसाहब आप आँख बंद कर लीजिये। वो नीले शर्ट में आये हैं वो आँख बंद लीजिये और ऐसे हाथ करिये मेरी ओर।) जो लोग आराम से नीचे बैठ नहीं सकते वो पहलेसे ही उपर बैठें। पहले से बैठ जाईये। आईये, जिसको आना है आयें । और ऐसे यहाँ तमाशे न देखते रह जायें । कुछ अपने से भी प्यार करना चाहिये। कुछ अपना भी तो ख्याल करना चाहिये। दूसरों को देखते रहोगे जिंदगी भर, तो अपने को कब देखने वाले हो। आप आँख बंद करिये। अब किसी को आने मत दो। नौ बजे तक लोग आते रहेंगे। ये कोई तरीका है? परमात्मा को पाना है, तो पहले से आ के शांति से बैठ जाओ। थोड़ी देर आराम से बैठो। पाने की बात है। आँख बंद करो । धीरे धीरे हो जायेगा। एकदम छोटे बच्चों जैसे समझाना पड़ता है। क्या ध्यान करने आये हैं? आप परमात्मा को पाने आये हैं। आप अपने को जानने आये हैं। कोई ऐसी बात नहीं जिसको आप कोई भी छोटी चीज़ समझ ले। बहुत बड़ी बात है, जन्मजन्मांतर की बात आप पाने आये हैं। आप लोग तो इस तरह से करते हैं जैसे कोई सिनेमाशोमें आये हैं। जरा तो गाम्भीर्य लाईये अपने अंदर। अब जरा शांति से बैठे सब लोग। जब तक समझाया नहीं जाये कोई समझता ही नही।