Guru Puja: Gravity Point

London (England)

1979-07-08 1 Guru Puja 1, 43' Download subtitles: EN,RUView subtitles:
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                                                      गुरु पूजा

 डॉलिस हिल आश्रम, लंदन (यूके)

 8 जुलाई 1979

आज गुरु पूर्णिमा का दिन है। यह पूर्ण चंद्रमा का दिन है, इसलिए इसे पूर्णिमा कहा जाता है। गुरु को पूर्ण चंद्रमा की तरह होना चाहिए: इसका मतलब है पूरी तरह से विकसित, पूरी तरह परिपक्व।

चंद्रमा की सोलह कला या चरण होते हैं, और जब पूर्ण पूर्णिमा आती है, पूर्णिमा के दिन, सभी सोलह कलाएं पूरी हो जाती हैं। आप यह भी जानते हैं कि विशुद्धि चक्र में सोलह उप चक्र होते हैं। जब कृष्ण को विराट के रूप में वर्णित किया जाता है, तो उन्हें सम्पूर्ण कहा जाता है: विष्णु के स्वरूप का पूर्ण अवतार। क्योंकि उन्हें सोलह चरण पूरी तरह से प्राप्त हैं।

इसलिए आज की संख्या सोलह है। छह प्लस एक सात है।

अब हमें गुरु के महत्व को समझना होगा। जब हमारे पास ईश्वर हैं तो हमें गुरु क्यों चाहिए? हमें शक्ति मिली है, फिर हमें गुरु क्यों चाहिए? गुरु रखने की क्या जरूरत है?

‘गुरु’ का अर्थ होता है वजन, भार। हम अपना वजन धरती माता के गुरुत्वाकर्षण के चुंबकीय बल से प्राप्त करते हैं। तो गुरु का अर्थ है गुरुत्वाकर्षण, किसी व्यक्ति में गुरुत्वाकर्षण।

हमें गुरु की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि ईश्वर को जानना आसान है, विशेष रूप से सहज योग में, उसके साथ एकाकार होना। जैसे ही आप सहज योग, आधुनिक सहज योग में अपना आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करते हैं, तुरंत ही आप अन्य लोगों को आत्मसाक्षात्कार देने के हकदार बन जाते हैं। यह कहा जाता था कि गुरु वह व्यक्ति है जो आपका ईश्वर से मिलन कराता है। लेकिन यह सच नहीं है, क्योंकि सहज योग में कोई भी आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति कुंडलिनी चढ़ा सकता है और दूसरों को आत्म-साक्षात्कार दे सकता है; सहस्त्रार को छूने या सहस्रार को खोलने के तुरंत बाद। लेकिन आम तौर पर एक बोध प्राप्त -आत्मा यह नहीं कर सकता। कोई भी जन्मजात आत्मसाक्षात्कारी इसे अपने दम पर नहीं कर सकता है। चूँकि आज, मैं अधिकारी हूँ, उसे मुझ से अधिकार प्राप्त करना होता है |

इसलिए यह कहा गया कि गुरु वह व्यक्ति है जो आपका ईश्वर से मिलन करवाता है: इसका मतलब है कि कुंडलिनी उठाता है और आपको ईश्वर के साथ एकाकार  करवाता है। क्योंकि उन दिनों में जब गुरु आत्म-साक्षात्कारी हुआ करते थे , जब गुरुओं को बोध प्राप्त भी हो जाता था फिर भी, जब वे विकास की,पूर्ण शुद्धि, पूर्ण निर्लिप्तता की एक बहुत ऊँची स्थिति में पहुंच जाने के बाद ही:उनके पास कुंडलिनी को ऊपर उठाने का अधिकार और शक्ति प्राप्त होती थी |

इसलिए आत्मसाक्षात्कार की अवस्था को बस छुते ही लोगों के लिए इस आत्मसाक्षात्कार को प्रदान कर पाना संभव नहीं था। पुराने दिनों के अधिकांश गुरु लोगों को पहले स्वच्छ करने से शुरूआत करते थे। पहले उन्हें स्वच्छ किया, एक-एक करके कुंडलिनी उठाई, हर चक्र तक पहुंचाया और फिर उन्हें आत्मसाक्षात्कार दिया। यह पूरी तरह से एक अलग तकनीक थी। आप कह सकते हैं कि यह एक बैलगाड़ी की तकनीक थी।

और क्यों इसीलिए एक मंत्र एक विशेष चक्र के लिए दिया जाता था: जहां समस्या थी, जहां कुंडलिनी रुक रही थी।  कुछ लोगों को करीब दस साल के लिए भी मिलता था, वे एक चक्र पर काम करते थे। मैंने उन लोगों को जाना है जो दस साल, बीस साल से आज्ञा चक्र पर काम कर रहे हैं। लेकिन सहज योग में आप जानते हैं कि हम इसे यूँ ही आसानी से साफ करते हैं। इसका आपके चक्र विशेष के साथ कुछ सम्बन्ध हो ?? तथा ??।

तो पहली धारणा यह है कि एक व्यक्ति जो आपको ईश्वर से मिलवाता है वह गुरु थोड़ा उन्नत होना चाहिए। क्योंकि आपके लिए अब यह कुंडलिनी चढ़ाने और उन्हें ईश्वर से एकाकार करवाना बच्चों का खेल है। लेकिन फिर भी आप सहज योग शब्दावली के अनुसार गुरु नहीं बन जाते। यदि आप को सहज योग के बारे में अभी विकल्प भी है, और संदेह है फिर भी,  आप अपना हाथ उठा कर कुंडलिनी चढ़ा सकते हैं। यहां तक ​​कि जब आपका चित्त, स्वच्छ और एकाग्र नहीं भी हो तब भी आप इसे कर सकते हैं। आप अभी भी कर सकते हैं। कैसे? यह कैसे इस तरह से कार्यान्वित हुआ है, इतनी खूबसूरती से?

मैं कहूँगी कि, केवल इस स्तर पर, इसने काम किया है। शायद बाद में मैं आपको बताऊंगी। लेकिन यह शुद्ध दैवीय है जो की आप किसी अवस्था में हों दूषित नहीं होता है, यह प्रवाहित ही है: पूर्ण शुद्ध दैवीय | दूसरों के साथ यह भिन्न था, उन्हें इसे स्वच्छ करना पड़ता था, इसे साफ कर बाहर करना होता था। एक उपकरण के रूप में आप परिपूर्ण हैं, लेकिन एक गुरु के रूप में आप नहीं हैं।

जो कुछ भी आप में दोष हो सकते हैं या आपमें जो कुछ भी कमी हो सकती है, आप अपना हाथ उठाएं और कुंडलिनी उठेगी, आपके इशारे पर। अपनी उंगलियों पर यह गति करने जा रही है। आपको जबरदस्त शक्ति मिलती है। आप किसी से भी पूछ सकते हैं, वे आपको बताएंगे कि वे आश्चर्यचकित हैं। उन्हें आपसे जलन होती है। वे यह नहीं समझ पाते हैं कि कैसे, अपनी उंगलियों को उठाकर, कि आप सही उपकरण हैं। क्योंकि आप वास्तव में किसी परिपूर्ण द्वारा बनाए गयें हैं।

लेकिन किसी व्यक्ति को यह समझना चाहिए की वह पूर्ण गुरु नहीं हैं। और इसीलिए यह सब बताने के लिए आपको एक गुरु की आवश्यकता है कि पूर्णता क्या है।

अब जैसा कि मैंने आपको बताया है कि, गुरु का मतलब है गुरुत्वाकर्षण। आप यह नहीं कह सकते कि धरती मां की धुरी कहां है? तुम यह नहीं देख सकते। मेरा मतलब है कि आप इसे देख नहीं सकते, आप इसे महसूस नहीं कर सकते। लेकिन वे कहते हैं कि एक धुरी है, जिस पर धरती पृथ्वी घूमती है। तो यह एक ऊर्जा है, एक ऊर्जा जिस पर यह धरती घूमती है। उसी तरह आपके पास एक धुरी है, जो आपकी सुषुम्ना है, जो आपको गुरुत्वाकर्षण प्रदान करती है।

गुरु के लिए पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि आपका गुरुत्व बिंदु एक है। हर बात गुरुत्वाकर्षण पर केन्द्रित होती है। जहाँ तक और जब तक आपका चित्त आपके भीतर उस गुरुत्व बिंदु पर पूरी तरह से स्थिर न हो जाए – जिसे ध्रुव कहा जाता है, एक निश्चित बिंदु है – आप गुरु नहीं बन सकते। तो आप में गुरुत्वाकर्षण आपके चित्त को स्वच्छ करके आप को प्राप्त होता है, अपने चित्त की निगरानी करके कि, यह कहाँ जाता है? आप अपने गुरुत्वाकर्षण बिंदु या गुरुत्व वाली किसी भी चीज पर कैसे पहुँचते हैं? हम इसे कैसे खोजते हैं? हम इसे संतुलित करते चले जाते हैं, और जब संतुलन पूरा हो जाता है, उस समय हम कहते हैं कि यह गुरुत्वाकर्षण बिंदु है। उसी तरह आपके चित्त के माध्यम से आपके गुरुत्व बिंदु को पूर्ण संतुलन में बनाए रखना चाहिए।

तो पहली बात यह है कि आपको एक संतुलित व्यक्ति होना चाहिए। लेकिन एक संतुलित व्यक्ति एक अचल व्यक्ति नहीं है, वह कठोर नहीं है। लेकिन एक असंतुलित व्यक्ति वह व्यक्ति होता है जो कि सहज योग में आने के बाद भी: यहां, वहां, वहां तक भागता रहता है,  ​​इसके पीछे दौड़ना, उसके पीछे दौड़ना, उसके पीछे दौड़ना। ऐसा व्यक्ति बहुत कुछ हासिल नहीं कर सकता है। सहज योग के द्वारा अपने गुरुत्व बिंदु, संतुलन बिंदु को ठीक करें।

यह कुछ अन्य जानने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। सबसे पहले अपने गुरुत्व बिंदु को सुधारें फिर आप आश्चर्यचकित होंगे कि, सहज योग के अलावा अन्य जो भी आप सहज योग के प्रकाश में, देखते हैं, आपको एहसास होगा कि, यह सहज योग से कैसे संबंधित है क्योंकि यह आपके गुरुत्व बिंदु से संबंधित है। माना की,  यह इसके विरोध में भी है, फिर भी आप देख पायेंगे कि यह कहां खिलाफ है। यदि यह इसके पक्ष में है, तो आप देख पायेंगे कि यह कहां है। उदाहरण के लिए आप किताबें पढ़ेंगे: तुरंत आपको पता चल जाएगा कि सत्य क्या है, सत्य क्या नहीं है। लेकिन अगर आपके भीतर वह बिंदु स्थापित या प्राप्त नहीं है, तो आप इस तरफ या उस तरफ फिसल जाएंगे। और कुछ भी आपको आकर्षित कर सकता है, आप सत्य से नीचे गिर सकते हैं। इसलिए उस बिंदु को सबसे पहले अपने भीतर स्थापित करना होगा: ध्रुवपद जैसा कि कहलाता हैं; निश्चित बिंदु की स्थिति जहाँ से,  हम समझते हैं कि,  सब कुछ इससे उत्सर्जित होता है, सब कुछ यहाँ से नियंत्रित होता है। हमारे भीतर का प्रकाश जिससे हम देख पाते हैं कि अंधकार क्या है और वास्तविकता क्या है।

लेकिन यह सब करने के लिए , भले ही आप सभी नामों का जाप और महिमामंडन करें,  इसका कोई अर्थ नहीं है जब तक कि आप इसके बारे में अनुशासन विकसित नहीं करते हैं। अनुशासन ही स्थायी भाव है या आप गुरु अवस्था, गुरु सेवा या गुरु बनने के लिए स्थायित्व की भावना कह सकते हैं।

आपको अपने शरीर को अनुशासित करना चाहिए , अपने दिमाग को अनुशासित करना चाहिए, खुद को अनुशासित करना चाहिए। सहज योग पाना इतनी सरल बात है: मेरा मतलब है कि आप बस मेरे साथ जुड़े हुए हैं। लेकिन तुम गुरु नहीं हो। तो आप खुद को कैसे अनुशासित करते हैं? कुछ लोगों के शरीर के अजीब तरीके होते हैं, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके शरीर में एक उचित तरीका हों। अपने शरीर को ढालें। यह आपके शरीर पर अत्याचार करना नहीं है, बल्कि आपके शरीर पर महारत हासिल करना है। उदाहरण के लिए, मैं यह नहीं कहूंगी कि आप ठंडे बर्फ के पानी में बैठें।  अपने आप को ठण्ड में जमा देना और अपनी हड्डियों को कष्ट देना यह गलत है। लेकिन आपको वह सब करना चाहिए जो आपको एक लचीला शरीर और किसी भी परिस्थिति में रह सकने वाला शरीर प्राप्त हो। थोड़ा-सा प्रयास  आपको भी करना होगा, कि आप जमीन पर ठीक से बैठ सकें, ताकि आप जमीन पर ठीक से सो सकें। इन चीजों के बारे में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। आपको अनुशासित होना होगा।

सहज योग एक वास्तविक आशीर्वाद है, लेकिन कभी-कभी किसी रूप में भी आशीर्वाद हो सकता है। यदि आप इसे हलके में लेते हैं तो आप बाहर फेंक दिए जायेंगे, आप बहुत आगे नहीं बढ़ पाएंगे।

तो शरीर ऐसा होना चाहिए जो खुद पर बहुत भार उठाने में सक्षम हो, बहुत काम करने में सक्षम होना चाहिए। यह अपने शरीर के बारे में आपको तय करना है।

अब आप अपने गुरु के शरीर को देखें कि यह कैसा है: मैं अपने शरीर से बहुत काम लेती हूं। मैं एक साथ घंटों काम कर सकती हूं। मैं एक साथ घंटों तक जागती रह सकती हूं। मैं कभी भी यह नहीं कहूंगी कि मेरा शरीर ठीक नहीं है। यह मेरा एक अच्छा दोस्त है। लेकिन एक बहुत महान तपस्या अवस्था है, हमें जो तपस्या करनी है, वह है घोर तपस्या। क्योंकि यह एक इंसानी शरीर है जिसे बहुत सारी चीजें करनी होती है। तुम जानते हो राम के समय में उन्हें पूरे रास्ते नंगे पैर चलना पड़ा था। वह एक राजा थे और उन्हें एक झोपड़ी में रहना पड़ा था।

इसलिए विलासिता और सुख-सुविधाओं आप पर हावी न हों। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप अपने शरीर को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित करें, यह बात बिल्कुल नहीं है। क्योंकि हमेशा मुझे संतुलन बिंदु लाना होता है। लेकिन अपने शरीर को ऐसा लाड़ मत करो कि आपकी तपस्या में यह एक बाधा बन जाए| अपने शरीर को स्वच्छ रखें उसकी इज्ज़त करें |वह यह जान कर अति प्रसन्न होगा की उसका उपयोग दैवीय कार्य के लिए किया गया है |

एक भारतीय शब्द है जिसे हम ‘बैठक’ कहते हैं। मुझे नहीं पता, उसके जैसा कोई अंग्रेजी शब्द नहीं है। लेकिन ‘बैठक’ का अर्थ है बैठने की शक्ति: आपके भीतर की गंभीरता। आप कब तक एक मुद्रा में बैठ सकते हैं, आपकी ‘बैठक’ कैसी है। किसी भी अध्ययन या वैसी ही किसी बात की तरह, वे पूछते हैं, “आपकी ‘बैठक’ क्या है?” “क्या आपकी बैठक है?” यह एक ही स्थिति में बैठे रहने की शक्ति है: आप कितनी देर तक लगातार बैठ सकते हैं। इसी तरह आप अपने गुरुत्व का आकलन कर सकते हैं। जहाँ तक और जब तक आपके पास एक बैठक न हो आप गुरु नहीं हो सकते।

तो शरीर को ठीक से बनाना है। इसे अनुशासित करना होगा। इसमें पतले या मोटे होने का कोई सवाल नहीं है, लेकिन शरीर ऐसा होना चाहिए कि आप एक गुरु के रूप में अपने उद्देश्य के लिए इसका उपयोग करने में सक्षम हों। 

कभी-कभी, आप पाएंगे कि आप जमीन पर नहीं सो पाते हैं:तो फिर आप जमीन पर तीन, चार दिनों के लिए सोएँ, तब शरीर बहुत खुश होगा। यह एक या दो दिन तक दर्द करेगा। लेकिन अपने शरीर का अपमान न करें। यह अनुशासन का दूसरा पक्ष है: हम अपना स्नान नहीं करते हैं, हम खुद को ठीक नहीं रखते हैं। तब तुम अपने शरीर का अपमान कर रहे हो। इसकी देखभाल करो| आपको इसकी कोमलता, शरीर की सौम्यता की देखभाल करनी पड़ सकती है। इसके साथ सम्मान का व्यवहार करें। बर्बर बनकर तुम अपने शरीर का अपमान कर रहे हो। तो शरीर बहुत महत्वपूर्ण है, यह पांच तत्वों से बना है, और गुरु के रूप में हमारे भीतर इन सभी पांच तत्वों को चमचमाता हुआ होना चाहिए।

मैं इसी तरह से कहती जा सकती हूं लेकिन अब आप इसके बारे में सोचें: भविष्य में, आपको अपने शरीर के साथ क्या करना है। आप अपने शरीर के भीतर स्थित पांच तत्वों का उपयोग कैसे कर सकते हैं, उन्हें साफ कर फिर सुंदर बनाएं ताकि आपका प्रकाश निखर उठे।

गुरुत्वाकर्षण आप तक आपके शरीर में इस तरह से आता है: कि आप अपनी शक्ति या अपने गुरुत्व के सिद्धांत, अपने निपुणता के सिद्धांत को अपने गुरुत्व के इस बिंदु के माध्यम से उत्पन्न करना शुरू करते हैं।

दूसरा बिंदु यह है कि आपके चित्त में वह गुरुत्व होना चाहिए। आपका चित्त बहुत महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति जो आसानी से परेशान होता है, या आसानी से किन्ही भावनाओं अथवा  बौद्धिक प्रयास या अन्य किसी बात में पड़ जाता है, वह एक गहरा व्यक्ति नहीं है।

गुरु के रूप में आपके लिए प्रलोभन होंगे। लोग आपकी अवस्था को चुनौती देंगे। एक व्यक्ति बहुत बड़ा बौद्धिक सच ’या वैसा ही कुछ अन्य लेकर आता है, फिर तुरंत आपको उसके बारे में चुनौती महसूस होती है और आप कह उठेंगे ,“ सब ठीक है, मुझे स्थिति को संभालने दो। ” इसे सहज योग बिंदु पर अपने गुरुत्वाकर्षण पर नियंत्रित करें। बस अपने गुरुत्वाकर्षण पर बैठ जाओ और खुद को देखो। तुरंत आपको पता चल जाएगा कि स्थिति को कैसे संभालना है। आपको उस व्यक्ति से बात करने की आवश्यकता नहीं है, आप स्थिति को ठीक से संभाल लेंगे: बौद्धिक स्तर पर नहीं बल्कि आपके गुरुत्व पर।

यदि चित्त में गुरुत्व है, तो यह अन्य लोगों के अहंकार और प्रति-अहंकार को नीचे खींचता है। तब आप निराश या व्यग्र नहीं होंगे। इसके अलावा अगर आप बाह्य से शुरू कर सकते हैं तो यह मनुष्यों के साथ कार्यान्वित हो सकता है; यह आसानी से काम करता है। जैसे,  अपने व्यवहार का अध्ययन करें कि,  आप दूसरों के प्रति कैसा व्यवहार करते हैं। या अपने चित्त का अध्ययन करें कि,  यह बाहर की ओर कैसा व्यवहार करता है: जो आपका ध्यान आकर्षित करता है, क्या आपके चित्त को आकर्षित करता है। अपने चित्त का अध्ययन करें। उस अध्ययन के द्वारा आप अपना चित्त इसकी मर्यादा में, सीमाओं में स्थापित कर पाएंगे।

एक बार जब आप चित्त की सीमाओं को निर्धारित कर देतें हैं तो,  गहराई विकसित होने लगती है। जिस व्यक्ति की कोई सीमा नहीं है, उसकी गहराई कभी नहीं हो सकती है, वह हमेशा की तरह फैल जाएगा; बिलकुल कोई गहराई नहीं। तो आपको अपने चित्त को समझकर हद तय करनी होंगी, कि, “इससे ज्यादा नहीं।” “ठीक है, उससे अधिक नहीं।”

जैसे, सहज योग में कुछ लोगों को मैंने देखा, वे एक मरीज में दिलचस्पी ले लेते हैं, फिर उनके लिए वह मरीज महत्वपूर्ण हो जाता है। या किसी व्यक्ति में दिलचस्पी ले लेते हैं कि, उसे आत्मसाक्षात्कार मिले: “मेरी माँ,” “मेरे पिता,” “मेरे, मेरे”। और हर समय वे इसके बारे में बात कर रहे हैं: “मेरी नौकरियां,” “मेरे कपड़े,” किसी तरह के ‘मेरे’। और वे नहीं जानते कि, इसकी मर्यादा रेखा कैसे खींची जाती है। आपको पता होना चाहिए कि रेखा कहाँ खींचनी है, यही मर्यादा है। नहीं तो सारी चीज़ बिखर जाएगी। आप एक तुच्छ व्यक्ति बन जाएंगे। आप में कोई गंभीरता नहीं होगी। इसलिए जब आप एक गुरु के रूप में काम कर रहे होते हैं, तब आपको पता होना चाहिए कि आप किसी व्यक्ति के साथ कहाँ तक जा सकते हैं तब आप एक गुरु हैं। लेकिन अगर आपको पता नहीं है कि मर्यादा रेखा कहाँ खींचनी है, तो आप रेखा को पार करके उसके चंगुल में आ सकते हैं।

तो स्थिति को संभालने का सबसे अच्छा तरीका है, बार-बार और फिर-फिर, निर्विचार जागरूकता में आना,  और आप इसे स्पष्ट रूप से स्थापित करें।

अब, उनमें से कुछ मुझसे शिकायत करते हैं कि, यह करना आसान बात नहीं है। यह करना सबसे आसान काम है, यदि अन्य सभी बेकार बातें जो आप कर रहे हैं,  छोड़ देते हैं । और फिर गुरुत्व आपको सही समय पर सही काम करने का ज्ञान देगा।

आश्रम एक ऐसी जगह है जहाँ गुरु बनना सीखना पड़ता है। लेकिन मुझे लगता है कि हमेशा यह लोगों के लिए एक अच्छा प्रयोग नहीं है। एक बार जब वे आश्रम पा जाते हैं तो वे इसे हलके में ले लेते हैं। वे सोचते हैं, “यह हमारे लिए मज़े से आने और रहने की जगह है और कुछ लोग काम करेंगे, कुछ आनंद ले रहे होंगे। कुछ भुगतान करेंगे कुछ भुगतान नहीं करेंगे। ” यह सबसे आश्चर्यजनक है। आपको उस व्यक्ति का तुरंत पता लगाना चाहिए, जिसका आध्यात्मिकता पर वास्तव में अधिकार है और उस व्यक्ति का अनुसरण करने का प्रयास करें। और इसके बजाय हम उन लोगों के साथ शामिल होने की कोशिश करते हैं जिनका आध्यात्मिकता पर  अधिकार कम ही हैं। और अगर वह नौ बजे तक सोता है, तो हर कोई सोता है! एक आश्रम में किसी को छह बजे के बाद नहीं सोना चाहिए: यह एक निर्विवाद बात है। अन्यथा बेहुदा बात है ! आपको जल्दी सोना चाहिए और जल्दी उठना चाहिए। अन्यथा आप आश्रम से बाहर रह सकते हैं। आप सभी को छह बजे उठना होगा। क्या आप जानते हैं कि आपकी माँ किस समय उठती है? और यहाँ यह मैं क्या पाती हूँ : यहां कोई नहीं उठता है। भारत में वे सभी बहुत जल्दी उठ जाते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि कोई भी यहां नहीं उठता है और मेरा चित्त सारा व्यर्थ चला जाता है।

और आपको एहसास नहीं होता है कि ये सभी चीजें कितनी महत्वपूर्ण हैं। यह आपके लिए प्रशिक्षण का समय है। इसके लिए आप पैदा हुए हैं, आप यह युगों से खोज रहे थे। यह आपको अब मिल गया है, आपको खुद को अनुशासित करना चाहिए। लेकिन मैंने आश्रमों में देखा है जहां लोग बड़ी राशि का भुगतान करते हैं, वे छह बजे, 4 बजे, 3 बजे उठते हैं। चूँकि सहज योग में हर चीज़ आपसे ही आना है। यह ऐसी शैली है।

ज्यादा से ज्यादा मैं जो ठीक नहीं हैं ऐसे लोगों से, कुछ समय के लिए बाहर जाने के लिए, बाहर रहने के लिए , और फिर उसके बाद में आश्रम से जुड़ने के लिए कह सकती हूं। जो कुछ लोगों की मदद करता है। लेकिन इससे ज्यादा नहीं; क्योंकि मैं भी एक माँ हूँ हालाँकि मैं एक गुरु हूँ। यह ऐसा है कि, आपको खुद को परिपक्व करना चाहिए। यदि मैं आप पर चीज़ें लादुं उसकी तुलना में इस तरह आप जल्दी परिपक्व होंगे। दूसरों के साथ दोष ढूंढना लेकिन खुद के साथ नहीं ? आपके पास एक अनुशासन होना चाहिए, सुबह उठने का समय, थोड़ी पूजा या कुछ करना। कम से कम आधा घंटा, आप सब एक साथ बिताएं। आपको ६ या ६.३० बजे तक तैयार रहना चाहिए, बैठना चाहिए, ध्यान करना चाहिए। अब मुझे आपके लिए नियम बनाने होंगे, क्योंकि आप इसे रखना नहीं चाहते।

मुझे यह भी आश्चर्य है कि बहुत से लोग, इतने सालों के बाद भी, दिल से मेरी आरती भी नहीं जानते हैं। यही सहज योग है, क्योंकि यह एक महामाया है। इसलिए आपको इसे खुद सीखना होगा। आपको इसे स्वयं करना होगा।

सहज योग के बारे में बात करना बहुत आसान है, बहुत सरल : खड़े हों और बोले। चूँकि आपने अपनी माँ से सुनी हैं, आपकी बातें। लेकिन इसका दूसरे व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा! यह व्यर्थ चली जाएगी, क्योंकि इसे आपके गुरुत्व के आधार से आना चाहिए।

यही सबसे बड़ी चीज है, अपने आप को पूरी तरह से अनुशासित करना जो आप खुद के लिए कर सकते हैं। और अपने आप को अनुशासित करने में प्रतिस्पर्धा करें; और अपने शरीर को ठीक करो, तुम्हारा चित्त सुधारो |

चित्त कई तरीकों से सुधारा जाता है। जैसा कि मैंने कहा: अपने चित्त को देखो, यह कहाँ जाता है।

अब हम सहज योग के अलावा और क्या बात करने जा रहे हैं? क्या सहज योग की तुलना में कुछ अन्य अधिक सुंदर या अधिक दिलचस्प है?

और गुरु का काम क्या है? अन्य कुछ भी नहीं वरन, स्वयं परब्रह्म को, परमात्मा के पूरे कार्य को उजागर करना; यह एक गुरु का काम है। इस आधुनिक काल में गुरु का काम केवल कुंडलिनी का उत्थान ही नहीं परब्रह्म के पूर्ण कार्य को उजागर करना है। लेकिन कुंडलिनी को ऊपर उठाने के बाद आपको परमात्मा की शक्तियों और हर बात के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए। इसके लिए आपको सीखना होगा, आपको पढ़ना होगा, आपको समझना होगा।

क्या अब आप पुराने गुरुओं और आधुनिक गुरुओं के बीच अंतर को समझे? चूँकि उन्हें इतने जबरदस्त अनुशासन के साथ बनाया गया था और मुश्किल से ही एक या दो महान गुरु हुआ करते थे। वे इस तरह के अध्ययनों और ऐसे सवाल-जवाब और परीक्षा और परीक्षणों से गुज़रे कि जब तक वे 75 वर्ष के हुए तब वे गुरु बने। लेकिन हमें इसे जल्दी करना है और सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप खुद इसे करें।

शायद पश्चिमी देशों की परंपरा आपको अनुशासन के लिए बहुत प्रोत्साहन नहीं देती है। शायद इसे खुद को संवारना कहा जा सकता है। लेकिन केवल एक अनुशासित व्यक्ति ही है,  जो सहज योगी हो सकता है। एक अनुशासित व्यक्ति में सहजता सबसे अच्छा काम करती है। एक अनुशासित व्यक्ति वह है जो जानता है कि, सहजता ही तकनीक और ऊर्जा है। लेकिन एक भटके हुए व्यक्ति का सहजता क्या कर पाएगी? उपकरण बहुत ख़राब है अत: यह इसे कार्यान्वित नहीं कर सकती। इसलिए आप अपने आप को अनुशासित करें ताकि दूसरे आपके व्यवहार से अनुशासित हों।

एक बार जब आप अपने आप को अनुशासित कर लेते हैं, जब आप एक गुरु बन जाते हैं, तो आपके पास एक गुरु के रूप में कुछ विशेषाधिकार होते हैं। और इसे एक हथियार के रूप में पहले कई गुरुओं द्वारा इस्तेमाल किया गया था, आपको ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। मैं आपको केवल एक अतिरिक्त मुद्दे के रूप में बता रही हूं – यह है गुस्सा। सभी गुरुओं में जबरदस्त क्रोध था। गुरु से यह अपेक्षित था | जैसे मैं आपको अलाउद्दीन खान साहब के बारे में बताऊंगी जो एक महान संगीतकार थे, रविशंकर और इन सभी लोगों के गुरु थे। और मेरे पिता इन मैहर के महाराजा के राजनीतिक सलाहकार थे। और हम वहाँ गए, मैं भी वहाँ थी | उस समय रवि शंकर एक कलाकार थे, इधर-उधर थोड़ा-बहुत बजाते थे। मेरा मतलब है कि वह तब भी काफी अच्छे कलाकार थे। तो उनके गुरु का मेरे पिता के प्रति बहुत सम्मान था। वह मेरे पिता के साथ बहुत सम्मान का व्यवहार करते थे।तो वह कुछ बजा रहे थे, वह मृदंगम में बहुत अच्छे थे। इसलिए उन्होंने मेरे पिता के लिए मृदंगम बजाया। तो उसमें जो धुन या लेहरा है, वह धुन जो बजानी है, सरल धुन; सिर्फ मृदंगम बजाने के लिए, उस पर (एक संगत के रूप में) बजाया जाना है। इसलिए मेरे पिता ने रविशंकर से बजाने को कहा और वह स्थिति से बाहर हो गए। जब उनके गुरु चले गए तो उन्होंने आकर मेरे पिता से कहा, “इसे यहाँ देख लो? सिर में एक बड़ा गुमड निकल आया था। ” उन्होंने बताया कि, “उन्होंने आज सुबह मेरे सिर पर मेरे सितार को तोड़ दिया है क्योंकि मैंने एक स्वर, एक नोट, एक गलत तरीके से बजाया है।”

ये गुरु पद है! तुम्हें पता हैं? आप अपने गुरु के साथ बिलकुल भी स्वच्छन्दता नहीं ले सकते हैं, और थोड़ी सी भी गलती होने पर वे इसे उठाएंगे और आपको मारेंगे, आप देखें।

इसलिए लोग बहुत सावधान रहते थे। अगर वे पत्थर के पास बैठे होते। लोग उनसे दूर रहते। वे पत्थर फेंकते। वे इस तरह एक चिमटा, बड़ा चिमटा रखेंगे। कोई भी उनके पास आता तो वे उन्हें मारते। जरा सी बात पर उन्होंने एक शिष्य को चिमटा मार दिया। आप जानते हैं, यह लोहे से बनी एक लंबी चीज होती थी, और चिमटा एक दोहरी शाखा वाली चीज़ है। और वे उस व्यक्ति को वही मारते, “थम!” इस तरह। मेरे यहां आपके गुरु के रूप में आने से पहले यह स्थिति थी। गुरु और माता होना कठिन है, मैं दोनों चीजें एक साथ नहीं कर सकती! (हँसते हुए) लेकिन यही स्थिति थी, उन महान कलाकारों की भी, जो आज महान चीजें बजा रहे हैं, जैसे कि आप अब विलायत ख़ान साहब को सुनेंगे: आप जाकर उनसे उनके गुरु के बारे में पूछें, कि उन्हें कितने समय तक पीटा गया, किसी को भी पीटा गया स्वर की गलती पर: पूर्ण शुद्धता, पूर्ण अनुशासन। यदि गुरु ने कहा, “कल पाँच बजे,” भले ही गुरु आए या न आए, पाँच बजे आपको वहाँ रहना होगा। भारतीय शैली में किसी भी कला के लिए ऐसा ही था, पूर्ण अनुशासन। अनुशासन के बिना शिक्षा भी नहीं दी जाती थी: सख्त काम लेने वाले। और यह वही है जो उन्होंने इस्तेमाल किया था और जिसका उपयोग आपको यहां सहज योग में नहीं करना चाहिए।

सहज योग में क्रोध का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मैंने आपको कोई भी ज्ञान क्रोध के साथ नहीं दिया है। शायद ही कोई हो सकता है जिसने मुझे गुस्से में देखा हो। तो हम सहज योगी दूसरों को ज्ञान इस तरह से प्रदान नहीं करेंगे। हमें बहुत ही सौम्य और मधुर बनना है, क्योंकि आपके अपने गुरु के पैटर्न में, क्योंकि वह मधुर है, वह बहुत सौम्य है और वह बहुत प्रेरक और दयालु है। उसी तरह से आपको होना चाहिए, क्योंकि वह पैटर्न जो आपने सीखा नहीं है। इसीलिए आप उस तरह के तरीका नहीं अपनाए जहाँ लोग बड़े गुस्सेल स्वभाव में होते हैं और वे एक बड़े क्रोध के साथ सामने आते हैं। यह सहज योगी को शोभा नहीं देगा।

मेरा मतलब है, उनके पास इतनी जबरदस्त शक्तियां भी थीं कि वे किसी को भी राख में परिवर्तित कर सकते थे; ऐसे स्वभाव के साथ वे रहते थे।और उनके पास जिब्राल्टर की चट्टान की तरह कहीं एक गुरु होते थे कि,  आप उनका सामना करें और आप अपना सिर मारते हैं। कम से कम एक या दो बार आपको उनसे एक बड़ी मार अवश्य पड़ती थी, अन्यथा वह आपका गुरु नहीं है। यही व्यवस्था थी।

अब हमारे यहाँ एक महान कलाकार बैठे हैं। आप उनके गुरु को भी याद कर रहे होंगे, जिन्होंने ज्ञान प्रदान करने से पहले उन्हें अच्छी तरह से पीटा होगा। वे कहते थे कि, “बिना आपको छिले और तराशे, आप एक शिष्य को अच्छा नहीं बना सकते।” और इस बार हम यह चुनौती देने जा रहे हैं यह साबित करने के लिए कि हमारी माँ बेहद दयालु हैं और फिर भी हम खुद को अपनी ही छेनी से तराश कर बहुत खूबसूरत हुए हैं। इसलिए मैं आपसे यह करने का अनुरोध करती हूं क्योंकि एक माँ के रूप में मैं ऐसा नहीं कर सकती। और इसीलिए इसे इस तरह से करना आपकी जिम्मेदारी है।

आज वह दिन है जहां हम सभी को यह तय करना होगा कि अब हम गुरु बनने जा रहे हैं।  एक गुरु के रूप से मैं सेवानिवृत्त होने जा रही हूं।  आप लोगों की माँ बने रहना बिलकुल ठीक है।

अब आपको अन्य लोगों का गुरु बनना होगा, और आपको पता होना चाहिए कि,  इसके लिए आपको क्या हासिल करना चाहिए। आपके भीतर सभी शक्तियां हैं, आप उन्हें भी प्रकट कर सकते हैं। लेकिन जब तक आप गुरु नहीं बन जाते, तब तक आप अनुयायी वर्ग नहीं रख सकते। यह एकमात्र अंतर वहाँ है। यदि आप एक अनुयायी वर्ग रखना चाहते हैं, तो आपको अपने आप को उस अंदाज़ में तराशना चाहिए कि, जैसे ही लोग आपको देखें , तो कह उठें , “कोई यहाँ उस गुरुत्वाकर्षण के साथ है।”

मुझे लगता है कि आज की गुरु पूजा के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

केवल एक चीज, अंतिम, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस में आप दिखावा नहीं कर सकते। यह वास्तविक होना चाहिए। एक बड़े, थोपे हुए व्यक्ति की तरह खड़े होकर, आप वास्तव में वैसे बन नहीं जाते। इसके विपरीत लोग आपको पागल समझेंगे। यह आपके भीतर से प्रकट होना चाहिए कि आपको अपने भीतर उस गरिमा को विकसित करना चाहिए, उस शिष्टता को, उस संतुलन को, उस समझ को अपने भीतर। एक दयालु कवि, एक सुंदर व्यक्तित्व, परोपकारी। लेकिन इसके अलावा हर किसी अन्य से अधिक गुरुत्वाकर्षण, गहराई, सज्जनता, उदारता, उचित असर, साफ-सफाई, स्वच्छता [और] सब से ऊपर, प्यार: एक दिल जैसे महासागर, सबसे ज्यादा क्षमाशील।

मुझे यकीन है कि अगले साल हमारे यहाँ कुछ गुरु होंगे जिन्होंने पहले से ही अपने आसपास कुछ अनुयायी बना लिए हों |

परमात्मा आप को आशिर्वादित करें !