How truthful are we about seeking?

Caxton Hall, London (England)

1979-07-16 How Truthful Are We About Seeking London NITL HD, 45' Download subtitles: ENView subtitles: Transcribe/Translate oTranscribe

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          हम सत्य की ख़ोज के बारे में कितने ईमानदार हैं?

 सार्वजनिक कार्यक्रम, कैक्सटन हॉल, लंदन, इंग्लैंड। 16 जुलाई 1979।

एक दूसरे दिन मैंने आपको उस उपकरण के बारे में बताया जो पहले से ही हमारे अंदर है, अपने आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए, जो एक वास्तविक अनुभूति है, जो एक अनुभव है, जो एक घटना है जिसके द्वारा हम वह बन जाते हैं। यह हो जाना है, यह कोई वैचारिक मत परिवर्तन या उपदेश नहीं है बल्कि यह एक ऐसा बनना है जिसके बारे में मैं बात कर रही हूं। जब हम कहते हैं, हम सत्य के साधक हैं, तो इस खोज में कितने ईमानदार हैं? यह एक बिंदु है जिसे हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए। क्या हम वास्तव में, सच्चाई से खोज रहे हैं? क्या हम इसके बारे में सच्चे हैं, या हम ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह कहना अच्छा है कि हम सत्य की तलाश कर रहे हैं? यदि आपको कुछ वास्तविक खोजना है, तो आपको स्वयं ईमानदार होना होगा।

यह सहज योग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। सहज योग एक ऐसी प्रणाली है जिसके द्वारा आप स्वयं सत्य में कूद पड़ते हैं। तुम सत्य हो जाते हो, तुम सत्य को नहीं देखते हो, तुम सत्य को नहीं समझते हो, लेकिन तुम सत्य बन जाते हो। यह सबसे आश्चर्यजनक बात है कि मनुष्य यह नहीं समझते कि सत्य से क्या अपेक्षा की जाए। वे सत्य की खोज कर रहे हैं, लेकिन सत्य के पूर्ण मूल्य के बारे में उनकी कोई धारणा नहीं है। सत्य पर, हम समझौता नहीं कर सकते। इसके दो पहलू नहीं हैं: जैसे आपके पास दिन और रात है, आपके पास सही और गलत है। यह निरपेक्ष है! इसमें कोई समझौता नहीं है।

उदाहरण के लिए, जैसा कि उस दिन मैंने तुमसे कहा था कि जब तुम्हें अपनी अनुभूति होती है, तो तुम अपने हाथ से बहने वाले शीतल स्पंदनों को महसूस करने लगते हो। और ये शीतल स्पंदन इस बात का संकेत हैं कि दैवीय शक्ति आप में प्रवाहित होने लगी है। अब, ये स्पंदन जो आपके पास से एक ठंडी हवा की तरह बह रहे हैं, बिल्कुल वास्तविक हैं, वे वास्तविकता से कहीं अधिक वास्तविक हैं, चूँकि मनुष्य के पास हमेशा वास्तविकता का सापेक्ष विचार होता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए, यदि आप कार्बन परमाणु लेते हैं- इसे किसी भी तरह से रखा जा सकता है, इसकी चार संयोजकताएँ होती हैं, लेकिन इसे एक अणु में किसी भी तरह से रखा जा सकता है। आप इसका रूप बदल सकते हैं, लेकिन फिर भी, यदि आप इसके विवरण में जाते हैं, तो कार्बन कार्बन ही रहेगा। और एक हाइड्रोजन अपनी मूल संरचना में हाइड्रोजन बना रहेगा।

तो, सत्य जो मूल चीज है, वह बदल नहीं सकता। तुम उसे ढाल नहीं सकते, तुम उसे मूर्ख नहीं बना सकते, तुम उसे संचालित नहीं कर सकते। जब ये वायब्रेशन आप से बह रहे हैं, अगर कोई वायब्रेशन नहीं हैं तो उस स्थिति में आप वहां नहीं हैं। कोई नहीं कह सकता कि तुम वहां हो, कि तुम एक साक्षात्कारी आत्मा हो क्योंकि तुम्हारे सिर पर एक बड़ा सींग है। आप कोई भी चिन्ह और हस्ताक्षर यह कहते हुए  धारण किये हों कि आप एक महान व्यक्ति हैं, आपके बहुत सारे अनुयायी हैं और बहुत सारे लोग आपके पीछे पागल हो रहे हैं। लेकिन फिर भी आप एक साक्षात्कारी आत्मा नहीं हैं और आप नहीं हैं। भले ही आप सूली पर चढ़ाए गए हों और आप एक साक्षात्कारी आत्मा हों, आप यह महसूस कर सकते हैं कि यह, जिसे हमने सूली पर चढ़ाया है, वह है जो चैतन्य उत्सर्जित कर रहा है।

लेकिन अगर साधक सच्चा नहीं है या बाधित है और वह हर समय खुद को धोखा देने की कोशिश कर रहा है, तो उसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। सहज योग में आपको लाभ प्राप्त करना होता है। किसी और को हासिल नहीं करना है, आपको ही हासिल करना है। तो, आपको इसके बारे में वास्तविक होना होगा। आप इसे पैसे से नहीं खरीद सकते। आप इसे किसी झूठे माध्यम से छिपा नहीं सकते। आप इसे मार नहीं सकते। यह शाश्वत है। यदि आप अपने हाथों में अपने वायब्रेशन खो देते हैं- कई लोगों ने मुझसे कहा है कि “माँ, हमने वायब्रेशन खो दिये है, अब क्या करें?” जैसे कि उन्होंने चैतन्य गवां कर कुछ महान हासिल किया है, कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है। यह भूल है! कहीं न कहीं आपके साथ कुछ गड़बड़ है जिसे आपको सुधारना ही होगा। अगर आप सोचते हैं कि बात करके या बेवकूफ बनाकर, चीजों को छुपाकर आप कुछ हासिल करने जा रहे हैं, तो आप दुखद रूप से गलत हैं।

इसलिए, हमें अपने प्रति अत्यंत सच्चा होना चाहिए, जब हम ईश्वर का सामना कर रहे हों, जब हम सत्य का सामना कर रहे हों, तब हमें स्वयं को धोखा नहीं देना चाहिए।

इस दुनिया में कुछ लोग हैं जो दूसरों को नष्ट करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो खुद को नष्ट कर लेते हैं। वैसे ही इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दूसरों को धोखा देते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो खुद को धोखा देते हैं। इस दुनिया में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो आपको ऐसा करने में मदद करती हैं – वह है खुद को धोखा देना। तो, सतर्क रहें! जैसे आप कुछ किताबें पढ़ते हैं- वे आपके घमंड को सहलाते हैं, कभी-कभी, आपके अहंकार को लाड़-प्यार करते हैं और आपको यह महसूस कराते हैं कि ओह, मैं ठीक हूँ, मुझे ठीक लग रहा है!और आपको लगता है कि आपने वास्तव में वह लक्ष्य हासिल कर लिया है जो आप चाहते थे, क्योंकि कुछ किताबें कहती हैं ऐसा, ऐसा, ऐसा, ऐसा…या हो सकता है, कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे आपकी भलाई और आपके सत्य की खोज में कोई दिलचस्पी नहीं है, आपको ऐसा विचार दे सकता है कि ठीक है, यही सत्य है। , ठीक है!तो, आप मान लेते हैं कि यही सत्य है और आप इसे स्वीकार करते हैं, कि यही सत्य है।

और उस तरह की बद्धता के साथ, अपने दिमाग में उस तरह के विचार के साथ, आप आगे बढ़ते हैं और अपने जीवन को आगे बढ़ाते हैं। एक जन्म, दो जन्म, तीन जीवन … फिर भी आप सत्य के साधक माने जाते हैं! आप कितने जन्म खोज़ में बर्बाद करने जा रहे हैं? क्या आप वाकई इसके बारे में ईमानदार हैं? या ऐसा है, क्योंकि एक फैशन है कि किसी को उस तरह या इसी तरह की बात करनी है? बेशक, दूसरे को धोखा देना बेशक पाप है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन स्वयं को धोखा देना भी सत्य की खोज में एक बड़ी बाधा है।

तो, हमें यह महसूस करना होगा कि हम यहां सत्य का सामना करने के लिए हैं। और ईश्वर ने हमें इस तरह से बनाया है कि इस चीज़ के घटित होने के लिए, हमें अपना आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्होंने हमारे भीतर सब कुछ बहुत ही खूबसूरती से रखा है। इसका पता लगाने के लिए आपको जंगल में नहीं जाना है! आपको इसके बारे में कुछ भी नहीं पढ़ना है! क्राइस्ट किस विश्वविद्यालय में गए या कृष्ण किस विश्वविद्यालय में गए? जहाँ तक विश्वविद्यालय शिक्षा का संबंध है, राम ने क्या शिक्षा प्राप्त की? आपको अपने भीतर पढ़ना होगा, आपकी अपनी किताब आपके भीतर है, और स्वयं को देखने के लिए, बहुत ही विनम्र तरीके से समझने के लिए कि, ‘मैं कहाँ हूँ?’

सहज योग एक प्रणाली है जो कहती है, ‘सह-ज‘- ‘सहका अर्थ है साथऔर का अर्थ है जन्म। यह आपके साथ पैदा हुआ है। आपके साथ पैदा हुई हर चीज असली है। क्या तुम जानते हो? हम नहीं जानते। हमारे हाथ सच्चे हैं – वे हमें कभी धोखा नहीं देते। हमारे पैर असली हैं- वे कभी धोखा नहीं देते, है ना? हमारी आंखें सच्ची हैं: तुम कुछ सफेद देखते हो, वह सफेद दिखता है, वह सफेद है। हमारी आंखें हमें कभी नहीं बताती कि यह काला है। केवल जब हम बीमार होते हैं, तभी पूरी रचना बदल जाती है और आपके इस शरीर से आपको हर तरह की गलत जानकारी मिलती है। आपका दिल सच्चा है, लेकिन हम अपने दिल को धोखा देना सिखाते हैं, हम अपनी आँखों को धोखा देना सिखाते हैं। हमारे पास दिखावा है और सत्य आपको जानता है।

जब मैं ऐसा कहती हूं तो हमें अपने बारे में आत्म-दया नहीं करनी चाहिए। यह कभी भी एक अति से दूसरी अति पर जाने का मार्ग नहीं है। सामान्यतया मनुष्य की यही स्थिति है। यदि आप उन्हें एक बात बताते हैं, तो वे एक छोर से दूसरे छोर तक चले जाते हैं। नहीं, तुम बस बीच में खड़े हो जाओ और खुद देखो कि : हम कितने सच्चे हैं कि हम परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करें? क्या हम वास्तव में ईश्वर को खोज रहे हैं या हम ईश्वर के नाम के पीछे कुछ और खोज रहे हैं?

मैं आपको बताती हूं, हर कोई जो किसी भी धर्म को मानता है, उसको खुद की बस यही परीक्षा करना चाहिए और उसे आश्चर्य होगा कि या तो वह उससे पैसा मांग रहा है या वह उससे सत्ता मांग रहा है या वह किसी प्रकार की भौतिक या शायद सामग्री की तलाश कर रहा है। उसका लाभ। इस तरह हमारा उन लोगों से मोहभंग हो जाता हैं जो हमें सत्य की शिक्षा देते हैं, क्योंकि हम पाते हैं कि वे सत्य के साधक नहीं हैं, वे स्वयं को धोखा दे रहे हैं। सत्य के साधक का सारा ध्यान भीतर, अपनी खोज पर रहता है। उसे अन्य चीजों की परवाह नहीं है। साधक निरपेक्ष, पूर्ण चाहता है। साधक को वह नहीं चाहिए जो वह नहीं खोज रहा है।

इसलिए सबसे अच्छा तरीका जिस के द्वारा व्यक्ति प्रयास कर सकता है वह है अबोधिता। जैसे कोई छोटा नन्हा बच्चा एक बार मेले में खो गया हो। तो बच्चा मां के लिए रोने लगा। और पुलिस वालों ने बच्चे को हाथ में लिया।

तो, उन्होंने कहा, “ठीक है, अभी रुको, हम तुम्हारी माँ को लाएंगे, लेकिन सबसे पहले तुम्हारे लिए कुछ और है।” उन्होंने बच्चे को खेलने के लिए एक अच्छा गुब्बारा दिया।

तो, बच्चा कहता है, “नहीं, मुझे कोई गुब्बारा नहीं चाहिए, मुझे नहीं चाहिए। मुझे मेरी माँ चाहिए।”

तो, उन्होंने कहा, “ठीक है, चलो आपको नीचे ले चलते हैं, हम आपको खाने के लिए कुछ आइसक्रीम, कुछ चॉकलेट देंगे।”

बच्चा कहता है, “नहीं, मुझे कोई चॉकलेट नहीं चाहिए, मुझे ऐसा कुछ नहीं चाहिए। मुझे अपनी मां की उपस्थिति चाहिए। मुझे मेरी माँ चाहिए। मैं और कुछ नहीं लूँगा।”

उन्होंने बच्चे को शांत करने की पूरी कोशिश की और अपने स्तर पर कोशिश की, लेकिन बच्चा कुछ और नहीं लेता था बल्कि सिर्फ माँ के लिए ही माँग करता था। क्योंकि बच्चे ने मां को खो दिया था और वह मां को ढूंढ रहा था, उसे बाकी सब बातों पर संदेह था।

लेकिन हमारी भेद कर पाने की समझ, हमारी समझने की संवेदनशीलता, हमारी बुद्धि इतनी विकसित है, इतनी मूर्खतापूर्ण ढंग से विकसित है, मैं कहूंगी कि हम हमेशा सत्य से चूक जाते हैं और असत्य को पकड़ लेते हैं। मैं नहीं जानती कि मनुष्य इसे कैसे कर सकते हैं? जानवरों के लिए यह करना मुश्किल है लेकिन इंसान बस इसका प्रबंध कर लेता है। इतिहास में अब तक हमने इतना ही किया है, अगर आप देखें। इतने महान अवतार इस धरती पर आए। हमने उनके जीवन में क्या किया? हमने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया, उन्हें जहर दिया, हमने उन्हें जेलों में डाल दिया, उनसे जो संभव हुआ, हमने किया। कितनों ने उनका अनुसरण किया, एक या दो?

लेकिन अब हिटलर को ही ले लीजिए। कितनों ने उसका अनुसरण किया?

क्योंकि असत्य के साथ हमारी एक विशेष पहचान है, सत्य से नहीं, हमने जीवन भर असत्य के साथ जिया है। पल-पल आप पाएंगे कि हम ऐसा ही कर रहे हैं। पैसे के नाम पर, सत्ता के नाम पर, युद्ध में, सब कुछ जायज है, तथाकथित प्यार के नाम पर। इस सब के साथ, हम सत्य की खोज की अपेक्षा करते हैं? हम यह भी उम्मीद करते हैं कि सत्य हमारे चरणों में गिरे?

तो, इस दुनिया के सत्य के सभी साधकों से, मैं यह जानने का अनुरोध करती हूं कि यदि आप सत्य की तलाश कर रहे हैं, तो इस बार आप इसमे चुक नहीं करेंगे।

यह एक सच्चा, निरपेक्ष, शाश्वत, आनंद देने वाला, अपने भीतर का अस्तित्व है। आप स्वयं, आपके हृदय में यह निवास करता हैं, जो आत्मा है, आपके भीतर स्थित आत्मा है। इसे धोखा देना पसंद नहीं है। यह जानता है कि आप धोखा दे रहे हैं, यह सभी क्षेत्र को जानता है – क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र का ज्ञाता)। यह जानता है कि आप क्या कर रहे हैं, आप किसके साथ खेल रहे हैं, आप किस पर संदेह कर रहे हैं? यह सब कुछ जानता है।

चूँकि तुम्हारे भीतर यह आत्मा संपूर्ण के साथ एकाकार है, यह संपूर्ण के साथ पूरी तरह से सामंजस्य, एकाकारिता, एकरूपता रखता है। यह हम हैं, अपनी बुद्धि से आप इसे कह सकते हैं, या अहंकार, या प्रति-अहंकार, जो कुछ भी है, हम उसे धोखा देने की कोशिश करते हैं। वह इसे पसंद नहीं करता है, बिल्कुल नहीं।

यदि आपको वह बनना है, यदि आपका चित्त उस आत्मा में विलीन हो जाना है, तो अपना चित्त शुद्ध रखें। पवित्रता वह तरीका है जिसमें आप प्रवेश करने जा रहे हैं। यह आपका और आपके बीच ही कुछ है। यह कुछ ऐसा है जो आपके भीतर आप ही से संबंधित है, यह आपको तय करना और समझना है।

अगर आपके हाथ में वायब्रेशन प्राप्त हो रहे है, अगर ठंडी हवा आ रही है, अगर आपकी कुंडलिनी ने सहस्रार को छुआ है, तो हो सकता है कि यह कृपा ही आप पर बरस रही हो। लेकिन इसे हल्के में न लें। यदि आप उस धीमी गति से चलते हैं तो आप तेजी से प्रगति नहीं करेंगे। आप केवल तभी प्रगति कर सकते हैं जब आप अपने आप को उस कृपा में सराबोर करते रहें। यह सहज योग की पहली समस्या है, मैं विशेष रूप से पश्चिम में पाती हूँ। और इसलिए मैंने देखा है, कि आप उन लोगों पर अधिक मोहित हैं जो वास्तविक नहीं हैं और किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में कम से कम परवाह करते हैं जो बिल्कुल सच्चे है।

दूसरा बिंदु जो मेरे दिमाग में आता है, जो बहुत महत्वपूर्ण है, दूसरे दिन मैंने उस पर संकेत दिया, कि जब आप आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करते हैं, तो यह केवल कृपा है जो आपको मिलती है, पहले ही झटके में, आप इसे प्राप्त करते हैं। यह केवल अनुग्रह है कि आप इसे प्राप्त करते हैं! इसे बनाए रखना आपका काम है। आप इसे बहुत तेजी से खो देते हैं, आप में से बहुत से।

क्योंकि सहज योग में प्राप्ति होते ही आप उस पर शक करने लगते हैं। सबसे पहले शायद, क्योंकि आपको नहीं लगता कि आप आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने में सक्षम हैं। आप खुद को कम आंकते हैं, क्योंकि आप नहीं जानते कि परमात्मा आपसे कितना प्यार करते हैं। यदि वह तुम्हें आत्मज्ञान नहीं देंगे  तो उनकी सृष्टि नष्ट हो जाएगी। इस दिव्य प्रेम से ही आपको आत्म-साक्षात्कार प्राप्त हुआ है। लेकिन आप में से कई तुरंत वायब्रेशन खो देते हैं, क्योंकि आप संदेह करने लगते हैं।

आप वहां क्या संदेह कर रहे हैं? क्योंकि तुम भ्रमित हो! संदेह करने से क्या मिलेगा या संदेह करने से क्या चला जायेगा? यहां कोई दुकान नहीं है। कुछ भी नहीं बिक रहा है। आपने इसके लिए कोई पैसा नहीं दिया है। आप अपनी शक्तियों या कुछ भी खोने वाले नहीं हैं। यदि आप राजा हैं, तो आप राजा बने रहेंगे, आप और भी बड़े राजा बन सकते हैं। यदि आप एक विद्यार्थी हैं तो आप एक बेहतर विद्यार्थी बन सकते हैं। खोने के लिए ऐसा क्या है जिस पर आपने संदेह करना और उसके साथ खेलना शुरू कर दिया है?

शायद, बहुत कम लोग आत्म-साक्षात्कार के मूल्य को जानते हैं। मैंने देखा है कि बीमार लोग इसे स्वस्थ लोगों की तुलना में अधिक महसूस करते हैं, कभी-कभी, क्योंकि बीमार अपने शरीर में आराम महसूस करते हैं। लेकिन हम कितने उथले हैं! ज़रा इस बारे में विचार तो करें। कभी-कभी, यह अमृत, यह अमृत किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो इसका मूल्य नहीं जानता है।

मेरे पास भारत में कुछ महान संत थे जिन्होंने मुझे बताया, जो मुझे जानते हैं, और जो मेरे काम को जानते हैं, कि, “माँ, आप इन लोगों पर अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं, वे अच्छे नहीं हैं।” वे नीचे नहीं आना चाहते।

मैं कहती हूं, “ऐसा क्यों कहते हो? मुझे पता है कि वे प्राचीन काल के साधक हैं, वे महान लोग हैं जो सत्य की खोज करते रहे हैं और आज वे सामान्य गृहस्थ के रूप में पैदा हुए हैं।”

लेकिन उन्होंने कहा, “वे दूसरी चीज़ों से इस कदर लिप्त हैं कि उनके लिए सत्य को स्वीकार करना बहुत मुश्किल होने वाला है।”

आपको अपने आप को सत्य के मंच पर स्थिर करना होगा, जो स्वयं ही चारों ओर कार्यान्वित है। यह आपकी परीक्षा लेता है। आपको परखने के तरीके हैं। हर मिनट इसकी परख हो रही है। आपको उस पर स्थापित होना होगा। जबकि, मैंने कई लोगों को यह कहते हुए देखा है, “फिर हम चैतन्य क्यों खो दें?”

मेरा मतलब है, अपना रवैया देखिए, मैं कह रही हूं। आप एक साधक हैं। सत्य साधक नहीं है, श्रीमान। आपको वहां बसना है, है ना? आपको वहां बैठना है, है ना? चूँकि आप प्राप्त करने जा रहे हैं, आपको वह आनंद मिलने वाला है जो सत्य है, वह प्रेम है, वह शाश्वत है। इससे आपको फायदा होने वाला है। तो, इतने उथले क्यों हो? इतने तुच्छ क्यों हो? क्योंकि तुम ही वो लोग हो जो, प्राचीन काल से, सत्य की खोज करते रहे हो।

ऐसे लोग हैं जिन्हें आपने उस दिन देखा है, मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिली थी जो टीवी या कुछ और पर था और वह स्वास्थ्य के बारे में और खोज और आत्म-ज्ञान के बारे में भी बड़ी-बड़ी बात कर रहा था। जब उसने मेरा सामना किया, तो मैंने उसे बिल्कुल उथला, किसी काम का नहीं, बिल्कुल बेकार साथी पाया।

उन्होंने कहा, “मुझे अनुभव प्राप्त होना चाहिए।”

मैंने कहा, “सर आपको क्यों होना चाहिए? आप हकदार क्यों हैं? क्योंकि आप बीबीसी में बड़ा व्याख्यान दे सकते हैं, क्योंकि आपने इस आदमी की यह किताब, उस आदमी की वह किताब पढ़ी है?”

यह आपका आकलन करता है, मेरे बच्चों, यह हर मिनट आपको परखता है। आप इसे परख रहे हैं, लेकिन यह आपका आकलन करता है!

शायद, मुझे आशा है कि मेरे जीवनकाल में, मैं देख सकुंगी कि सत्य इस पृथ्वी पर आपके हृदय में है और आप हजारों और हजारों, जो वास्तव में साधक हैं, इसे प्राप्त करते हैं। लेकिन यह एक जीवंत प्रक्रिया है। यह कोई कृत्रिम प्रक्रिया नहीं है। यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं है, उस तरह का रैखिक आंदोलन। यह एक जीवंत प्रक्रिया है। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें इसे कार्यान्वित करना है। जैसे आपके पास प्लास्टिक के कई फूल हो सकते हैं, लेकिन एक वास्तविक फूल को पाने के लिए उसे खिलते हुए देखने में कितना समय लगता है?

यह विकास किसी को छांटता नहीं है, यह अन्य विकास की तरह एक ही दिशा में के तरीके से नहीं चलता है: आपकी शक्ति की तरह, आपकी राजनीतिक, आर्थिक वृद्धि की तरह। वे एक ही दिशा में चलते हैं, उनका दूसरों के साथ कोई संबंध नहीं है, आप देखिए। उनका संपूर्ण के साथ कोई संबंध नहीं है, उन्हें अनुपात का कोई बोध नहीं है। जैसे किसी की नाक बढ़ रही है, किसी के कान बढ़ रहे हैं। यह एक कैंसर है! इन सभी गतिविधियों का परिणाम कैंसर है, यानी वे आपको खा जाएंगे। उन्हें अपना रास्ता बनाने के लिए किसी को खाना पड़ेगा। वे आंख मूंदकर एक तरफ चलना शुरू कर देते हैं, फिर वे मुड़ नहीं सकते।

यह एक पुष्टिदायक, जीवंत आंदोलन है। और इसमें समय लगता है। यह बहुत तेजी से काम कर सकता है। यह एक श्रंखलाबद्ध क्रिया में चल सकता है। मैं आपको आश्वस्त कर सकती हूं: यदि आप सभी इसके बारे में ईमानदार होने और इसके बारे में विनम्र होने का फैसला करते हैं, यदि आप सहज योग के बारे में अपना दृष्टिकोण थोड़ा बदलते हैं: कि यहां कुछ भी बिकाऊ नहीं है, कि आप साधक हैं, आपको दरवाजा खटखटाना होगा, आपको इसके लिए प्रार्थना करनी होगी और तब आप धन्य होंगे।

यह सबसे बड़ा अंतर है जो मैं पाती हूँ, और इसलिए कभी-कभी मैं बहुत असहाय महसूस करती हूं। कृपया समझने की कोशिश करें। कृपया, समझिए कि यह स्थिति है: आप साधक हैं, आप वास्तव में सच्चे खोजी हैं, आप हजारों वर्षों से खोज रहे हैं। शास्त्रों में कहा गया है। और आप इस धरती पर परमात्मा के राज्य के नागरिक के रूप में अपना अधिकार पाने के लिए पैदा हुए हैं। लेकिन वही खोजो! और किसी अन्य चीज़ की आकांक्षा ना करो, क्योंकि अन्य कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, न तृप्त करने वाला, न फल देने वाला, न पूर्ण।

आज, अब इसके बाद हम ध्यान करने जा रहे हैं। सहज योग में ध्यान का केवल एक ही सरल अर्थ है कि कुंडलिनी को वहां त्रिकोणीय हड्डी से उठना है, और सहस्रार को छूना है, यहाँ, और आपको सूक्ष्म बिंदु के प्रति खोलना है। यही एक साधारण सी बात है, ध्यान है।

बोध के बाद भी ध्यान का अर्थ यही है कि आप अपनी कुंडलिनी को वहीं ऊपर लटका कर रखें। आप सूक्ष्म सामूहिक चेतना के साथ हैं, परमात्मा के प्रेम की सार्वभौमिक सर्वव्यापी शक्ति के साथ हैं। एक बार जब आप वहां होते हैं, तो आप बस उस आनंदमय स्थिति में बस जाते हैं। तब रोग तुम्हारे पास नहीं आते, फिर मानसिक यातनाएं तुम्हारे पास नहीं आतीं। आप साक्षी बन जाते हैं और आप उस शक्ति के निमित्त बन जाते हैं, जो सर्वव्यापी है और आपको अपने भीतर सामूहिक चेतना प्राप्त होती है। यह आपके साथ होता है।

यदि आपके साथ ऐसा नहीं होता है, तो वास्तव में कहीं न कहीं कुछ खामियां हैं, जिन्हें ठीक करना होगा। जिसके लिए मैं कड़ी मेहनत करने को तैयार हूं। और बहुत से ऐसे हैं जो इसे प्राप्त भी कर चुके हैं। तो, आप भी इसे प्राप्त करने जा रहे हैं और आप इसे महसूस भी करने जा रहे हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। यह एक उपहार है, यह कोई प्रलोभन नहीं है। अब अपने आप को गुमराह न करें- आपने काफी कुछ किया है। अब कृपया, उपहार प्राप्त करें और इसे अपने भीतर स्थापित करें।

सभी झूठे विचारों से अपनी पहचान न बनाएँ। जैसे, अगर तुम ईसाई हो तो, ‘मैं ईसाई हूं।  केवल ईसा-मसीह ही वह है।हाँ, एक वही है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन उसका अर्थ बहुत कुछ है। या अगर मैं मुसलमानहूं, तो मोहम्मद साहब ही वह हैं। या यदि मैं यहूदी हूँ, तो मैं क्राइस्ट में विश्वास नहीं करता। चारों तरफ ऐसे विवेकहीन कई हैं। आप उस प्रकार के नहीं हैं!

इन सीमाओं और झूठी पहचानों को पार करें और अपनी दृष्टि को ऊंचा उठाएं, जिसे अधिष्ठान कहा जाता है, आप अपने आप को जो हैं उससे ऊंचा रखिये। तुम कौन हो! और बस इतना ही कहो, “मैं सत्य का साधक हूँ! क्या यह मुझे, मेरे व्यक्तित्व को शोभा देता है। मैं इसके बारे में ऐसा कैसे सोच सकता हूं!”

सत्य को सार्वभौमिक होना चाहिए और उन सभी के लिए होना ही चाहिए, चाहे वे ईसाई हों, यहूदी हों, हिंदू हों, मुसलमान हों, नास्तिक हों। यह आप में से प्रत्येक के लिए होना चाहिए। तो, आप इसे विभाजित डिब्बों में न रखें और न ही इसे दबाएँ, क्योंकि तब आपकी साधना का अंत होता है। वह तुम्हारी खोज़ की मृत्यु है।

जैसा कि मैंने आपको पहले बताया, एक पेड़ में कई फूल होते हैं और उसमें सुंदर, एक, संपूर्ण व्यक्तित्व होता है। लोग फूलों को यह कहते हुए अपने साथ ले जाते हैं कि, “यह मेरा फूल है। यह मेरा फूल है।”

वे इसे पूर्ण से अलग कर देते हैं और फूल बदसूरत हो जाते हैं और मर जाते हैं। जीवन का रस पेड़ में चारों ओर घूमता है, यह एक फूल पर नहीं चिपक जाता क्योंकि यह ईश्वर की शक्ति के साथ एकाकार है।

हम, मनुष्यहमारे स्वतंत्र विकास के उद्देश्य से विशेष रूप से अलग किये गए हैं, लेकिन, हमारे ज्ञान में हमें अपने चारों ओर यह सब देखने और उससे सीखने में सक्षम होना चाहिए। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हमें सिखाती हैं कि अलग-अलग भागों में मत बंटो। क्या कोई पेड़ कहता है कि मैं इंग्लैंड का हूंया मैं भारत का हूं‘? यदि यह एक जलवायु में समृद्ध नहीं हो सकता है, तो ऐसा नहीं है, बस।

मनुष्य के रूप में आप सर्वोच्च हैं और सबसे बुद्धिमान और सर्वश्रेष्ठ हैं। परमात्मा को देखने दें कि यह बहार की बेला आपको उनके कार्य, उनकी रचना के सुंदर फल के रूप में पल्लवित करती है।

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें!

क्या तुम अपने हाथ इस तरह रखोगे, मेरी ओर, ऐसे ही और अपने जूते निकालोगे? अब, आप यहां खोज़ करने के लिए हैं, न कि किसी मानसिक कलाबाजी के लिए। तो, कृपया, अपने मन को कुछ समय के लिए चुप रहने के लिए कहें। अब तक आप इसे ढूंढ नहीं पाए हैं।

ठीक है, तो चलिए आगे बढ़ते हैं। और अब किसी भी व्यायाम में मन न लगाएं। बस अपने हाथों को इस तरह से बहुत ही सरल तरीके से, सबसे आरामदायक स्थिति में रखें। अपने शरीर पर कोई दबाव न डालें। अगर कुछ तंग है, तो कृपया उसे हटा दें। और थोड़ा आराम से बैठ जाते हैं। बस सबसे आराम से, लेकिन दोनों पैरों को जमीन पर छूते हुए रखें।

[२ मिनट के लिए शांति]

कृपया, अपनी आँखें बंद करें। कृपया, अपनी आँखें बंद कर लें, क्योंकि जब कुंडलिनी आज्ञा को पार करती है, तो पुतली का फैलाव होता है। और फिर आंखें थोड़ी, आप देखिये, थोड़ी सी, थोड़ी देर के लिए अंधी हो जाती हैं, लेकिन कृपया, उन्हें बंद रखें, देखिये, अन्यथा कुंडलिनी पार नहीं होगी, क्योंकि वह आपको परेशान नहीं करना चाहती, आप देखिए। फिर तो, वह आज्ञा के नीचे ही रह जाएगी।

अब, यदि आप अपनी आँखें ठीक से बंद नहीं कर सकते हैं, इस अर्थ में कि पलकों में थोड़ी झिलमिलाहट है, तो कृपया उन्हें खोलें।

[30 सेकंड के लिए शांति]

अपने आप से नाराज मत हो, आप देखिए। जो कुछ मैंने तुमसे कहा है, वह सबके लिए सच नहीं है। लेकिन यह हम में से प्रत्येक में थोड़ा सा है, कभी-कभी इसकी थोड़ी कमी होती है, आप देखते हैं। तो, कृपया, खुद से नाराज न हों, बल्कि खुद से प्यार करें। प्रेम करने से तुम उसे परख सकोगे; आपके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। बस इसके बारे में मत सोचो। यह बिना विचारों के काम करेगा। सोचने से बात नहीं बनेगी। इसलिए अपनी सोच को एक तरफ छोड़ दें। आपको नहीं सोचना है। आप में से अधिकांश खाली हो गए हैं।

[30 सेकंड के लिए शांति]

आपको इसे प्राप्त करना होगा जैसे एक छोटा बच्चा अपनी मां को चाहता है। उसी तरह आपको सत्य तक पहुंचना है। वह सब, बहुत आसान है। लेकिन अपने मन को कुछ देर शांत रहने के लिए कहें, न कि आपको बहुत ज्यादा सोच-विचार में ले जाने के लिए। यह बहुत जरूरी है, क्योंकि यह मन ही आपको हर समय धोखा देता है। इसे ठीक से प्रशिक्षित करें।

[एक तरफ] आपको इसे रिकॉर्ड करना चाहिए, वायब्रेशन।

[२ मिनट के लिए मौन]

अगर आपके हाथ में कोई ठंडी हवा आ रही है… जो लोग पहली बार आए हैं, उन्हें देखना चाहिए कि आपके हाथ में कोई ठंडी हवा तो नहीं आ रही है, आपकी उंगलियों, उंगलियों के माध्यम से।

[30 सेकंड के लिए मौन]

आप को अनुभव करना है। बहुत अच्छा।

[डेढ़ मिनट के लिए शांति]

अब जिन्हें ठंडी हवा मिल रही है, कृपया आप सब हाथ ऊपर उठाएं।

माँ किसी को हिंदी में संबोधित कर रही है। तुम्हें नहीं आ रहे हैं? (मतलब आपको नहीं मिल रहा है?’) [बाकी अस्पष्ट है]

जो आज पहली बार आए हैं, कृपया अपने हाथ ऊपर उठाएं जिन्हें ठंडी हवा मिल रही है। पहली बार के लिए

माँ एक सहज योगी से पूछ रही हैं: आ रही है उनको ठंडी हवा? नहीं आ रहा? उनको बंधन दो तो तुम्हारा आ जाएगा।” 

अब जो पहली बार आए हैं और ठंडी हवा नहीं मिल रही है, कृपया हाथ उठाएं। पहली बार और ठंडी हवा नहीं मिल रही है, कृपया अपने हाथ ऊपर उठाएं।

क्या आप पहली बार आए हैं? क्या तुम्हे ? यह महिला … उससे पूछो। क्या तुम आ गए… हाँ। क्या आपके हाथ में ठंडी हवा चल रही है? फिर हाथ ऊपर उठाएं।

क्या आपने मेरी बात का पालन किया? जो लोग पहली बार आए हैं और उन्हें ठंडी हवा नहीं मिल रही है, कृपया हाथ उठाएं।

हन्ना क्या उसे ठंडी हवा मिल रही है?

हाँ? क्या बात है? संदेह? तुम अपना सारा समय बर्बाद करने जा रहे हो, इस तरह, मेरे बच्चे… [अस्पष्ट] आप कैसे सुनेंगे?

कृपया, उठाएँ… क्या आपको ठंडी हवा मिल रही है? नहीं तो फिर से उठाओ… आप सभी जो पहली बार आए हैं और ठंडी हवा नहीं मिल रही है, कृपया हाथ उठाएं। क्या आपको ठंडी हवा मिल रही है? अच्छा। [अस्पष्ट] मैं बहुत खुश हूँ! बहुत खुश! आप सभी को मिल गया है। क्या तुम अब ठीक महसूस कर रहे हो?

एक, दो, तीन, चार… और चार… उस महिला के बारे में क्या? क्या आपको ठंडी हवा मिल रही है, नहीं? पा रहे हो ? बहुत अच्छा! ठीक है, इसे काम करने दो। अपनी आँखें बंद करो, यह काम करेगा, ठीक है? केवल चार लोगों को वायब्रेशन नहीं मिल रहे है। क्या आप किसी गुरु के पास गए हैं? क्या आप किसी गुरु के पास गए हैं? गुरु, गुरु। आप उन्हें क्या कहते हैं, मास्टर या गुरु या मैं नहीं जानतीअन्य सभी नाम क्या हैं। आप गुरुओं को क्या कहते हैं?