Self-realisation and fulfilment

Caxton Hall, London (England)

1979-08-06 Self-Realisation and Fulfilment, Caxton Hall, transcribed, 58'
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‘आत्मसाक्षात्कार और तृप्ति’ , सार्वजनिक कार्यक्रम, कैक्सटन हॉल, लंदन, इंग्लैंड, 

6 अगस्त, 1979

….क्या ये ठीक है?

सहज योग के बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा जा चुका है। जैसा कि पहले मैंने आपको बताया था, नये लोगों के लिए मैं कहना चाहूंगी, ‘सह’ माने साथ ‘ज’ माने जन्मा। यह आपके साथ ही जन्मा है। यह आपके साथ है। अंकुरित करने वाली शक्ति जो आपको परमात्मा से जोड़ेगी, वो आपके साथ ही पैदा हुई है। जैसे इस देह में आपकी नाक है, आँखें हैं, चेहरा है, इसी प्रकार ये अंकुरित करने की शक्ति भी आपके अंदर है, अनेक युगो से आपके अंदर है। आप की हर खोज में वो आप के साथ रही है। और अब समय आ गया है, बसंत का समय आ गया है आप कह सकते हैं, जब लोगों को परमात्मा से अपना संबंध प्राप्त करना है, अन्यथा ईश्वर अपना खुद का अर्थ खो देंगे।

जब तक आपको अपना खुद का अर्थ ज्ञात नहीं होता, जब तक आपको अपना अंदर से तृप्ति नहीं आती, आप के रचयिता जिसने आपको बनाया है उसको भी अपना संतोष प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए यह अनुग्रह, यह विशेष उपहार है आधुनिक मनुष्य को की वह वास्तव में अपना आत्म साक्षात्कार पा सकें।

पर जैसे ( रेजिस ?) ने ठीक ध्यान दिलाया कि हमारे सारे यंत्र अच्छे से हमारे अंदर स्थापित हैं।  पर जब से हम पैदा हुए हैं तब से हम हमेशा उन लोगों के प्रति आकर्षित हुए हैं, जो ऐसे सिद्धांतों को ले कर आगे आए हैं कि वह परमात्मा से आप का परिचय करा सकते हैं। और कभी आपको लगता है कि आप खुद ही उन्हें ढूंढ सकते हैं। कभी हम अपना समय बहुत तुच्छ जीवन में बर्बाद कर देते हैं, हर समय खुद को नष्ट करने में या दूसरों को नष्ट करने में। इन सब बातों का आप के यंत्र पर असर आता है जो एक तथ्य है। तो जब आप सहज योग में आते हैं, तो मेरी आप से प्रार्थना है समझने के लिए, कि यहां कोई दुकान नहीं खुली हुई है। यह आपकी भलाई के लिए है। यह आपका अधिकार भी है इसे प्राप्त करने और इसे पाने का। आपको अमीबा से मनुष्य इसी लिए बनाया गया। परंतु यह अधिकार आपको इसीलिए मिला क्योंकि आप इस के योग्य हैं। अगर आप में वो योग्यता नहीं, तो यह आपको नहीं मिल सकता। आप में इस को प्राप्त करने की योग्यता होनी चाहिए। 

जो लोग यहां आते हैं, मुझे पता है उनको आत्म साक्षात्कार नहीं मिलता तो वह कहने लगते हैं की मां, हमें आत्म साक्षात्कार नहीं मिला! जैसे कि उन्हें इस बात पर बहुत गर्व हो। इसमें कोई गर्व की बात नहीं अगर आपको आपका आत्म साक्षात्कार नहीं मिला। एक व्यक्ति को इस बात पर गंभीर होना चाहिए और अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त करना चाहिए अभी और यहीं! 

अगर आपकी योग्यता बहुत कम है तो कोई क्या कर सकता है इस बारे में? कोई क्या बात कर सकता है इस बारे में? मेरा मतलब की आजकल जब लोग इतने अहांकार उन्मुख हैं तो कोई सुनना नहीं चाहता इस बारे में। जब तक की आप को सम्मोहित ना किया गया हो, अपनी स्वतंत्रता में आप नहीं जानते कि आपको कभी कभी विनम्र होना है! अगर आप विनम्र हो सके और अगर आप यह एक बात जान सकें, कि अब तक आपने प्राप्त नहीं किया है और आपको प्राप्त करना है, क्योंकि इसी कि आप खोज कर रहे हैं, कि आपका अपना अधिकार है उसे प्राप्त करने का, कि आपको इसी लिए बनाया गया है, कि आप युगो से इसे खोज कर रहे हैं और आपको गुमराह किया गया है, दुरूपयोग किया गया है, आप की आंखों में धूल झोंकी गई है और आप सब प्रकार का मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते चले जा रहे हैं कई दिनों से, कई वर्षों से, लेकिन जब आप सहज योग में आते हैं तो आपको सब कुछ चाहिए (चुटकी कि आवाज ) इस तरह। ये इस ओर इशारा करता है कि आप स्वतंत्र हैं। यह संकेत है की आप स्वतंत्र हैं वाद-विवाद करने के लिए भी। यह बहुत अच्छा संकेत है। मुझे इस की खुशी होती है। लेकिन कभी-कभी स्वतंत्रता परित्याग भी हो सकती है। जिस स्वतंत्रता के पीछे बुद्धिमता की पृष्ठभूमि ना हो उस स्वतंत्रता का कोई अर्थ ही नहीं है। अपनी बुद्धि का प्रयोग करें।

यह वह स्थान नहीं है जहां आप धन का भुगतान कर सकते हैं, नहीं बल्कि आप को अपनी साधना का परिणाम रूपी धन प्राप्त करना है । अगर आप सच्चे साधक है, ठीक है, यद्यपि आप के साथ समस्याएं रहीं, यद्यपि वो एक गलती थी, हर किसी को पूरा प्रयास करना चाहिए की आप उसे प्राप्त कर लें, और आप को वह प्राप्त हो जाएगा। पर क्या आप सच में खोज रहे हैं? यह मुख्य बात है।

मैंने देखा है लोग यहां आते हैं। सिर्फ बैठे हुए हैं एक साथ क्योंकि वह किसी विशेष दल से संबंधित हैं या फिर कुछ और, सिर्फ आते है देखने के लिए जिसे हम हिंदी में तमाशा कहते हैं। जैसे यह कोई शो है, जिसे वो आकर देखना चाहते हैं। क्या इस प्रकार आप अपना जीवन व्यर्थ करेंगे? आप को अपना मूल्यांकन करना होगा। आप को जान ना चाहिए की आप सच्चे सत्य के खोजी हैं और आप किसी से बंधे नहीं हैं, क्योंकि आप ने उस के लिए धन दिया है, क्योंकि आप अपने सिर पर किसी के प्रतीकों को उठाए हुए हैं। आप को खुद अपने जैसा रहना है। अगर आप खुद का सम्मान करते हैं तो मैं आपके साथ हूं। परंतु अगर आप स्वयं का सम्मान नहीं करते, खुद का मूल्यांकन नहीं करते और अपना समय बेकार की बातों में नष्ट करना चाहते हैं तो मैं क्या कर सकती हूं? आप बताइए मुझे। अगर आप मेरी जगह होते तो क्या करेंगे? 

मुझे में आप के लिए असीमित धीरज और प्रेम है, अत्यधिक प्रेम है आप के लिए, और मैंने आपसे बताया है कि मैं आपके लिए इसे कार्यान्वित करूंगी, कार्यान्वित करूंगी, कार्यान्वित करूंगी। मैं ऐसा करते हुए कभी थकूंगी नहीं। पर आप भी थोड़ा सा सहयोग करिए क्योंकि कुछ लाभ प्राप्त करना है आप को,  मुझे नहीं। 

सबसे पहली बात आपको समझनी होगी कि आप  मुझ पर अधिकार नहीं रख सकते। मैं बहुत कठिन इन्सान हूं इस तरह से कि सिर्फ अपनी सच्चाई से आप मुझ पर अधिकार कर सकते हैं। मैं सब को बहुत अच्छे से जानती हूं, कि कौन निष्ठावान नहीं है, पूर्णत: । आपको खुद उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए अपने प्रति ईमानदार रहिए। क्या अपने प्रति ईमानदार होना मुश्किल है? सिर्फ अपने प्रति ईमानदार रहिए। उन चीजों के अभ्यस्त मत होना जिन्होंने आज तक आपको कुछ नहीं दिया। अपने प्रति ईमानदार रहिए, अपना आदर करिए, अपना आकलन कीजिए की आप अवश्य ही बहुत उच्च कोटि के है इसलिए आप आज यहां हैं। आप एक मदिरालय में भी हो सकते थे।

तो आप को वह मिलना चाहिए जिस के लिए आप यहां आए हैं। उस को पाने में बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। इसके विपरीत, पहले दिन जिन्हे यहां अपना आत्म साक्षात्कार मिला, आप को बताएंगे उन्हें अपना आत्म साक्षात्कार बहुत जबरदस्त अनुभव के साथ मिला परन्तु उन्होंने उसे खो भी दिया! क्योंकि जब कुंडलिनी, जो की त्रिकोणाकार अस्थि में सुप्तावस्था में पड़ी है, जब उसे ज्ञात होता है की कोई है जो आप को आत्म साक्षात्कार दे सकता है, जिसे अधिकार है आत्म साक्षात्कार देने का तो वह उठती है। आप अपनी खुली आंखों से देख सकते हैं। हम आप को दिखा सकते हैं। हाल में ही हम ने ऐसे व्यक्ति का फोटो लिया था जिसकी कुंडलिनी स्पंदित हो रही थी। यह बहुत दिलचस्प बात है की कितना साफ़, फिल्म में भी, दिख रहा था। आप अपनी खुली आंखों से देख सकते हैं। ये ही आप के साथ होना चाहिए, कुंडलिनी का जागरण ये है। 

अभी हाल में, मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि किसी ने मुझे बताया की पतंजलि योग शास्त्र के तीसरे अध्याय में लिखा है कि, आप को अपना चित्त’ देश’ पर रखना चाहिए। अब देश के लिए उन्होंने अंग्रेजी भाषा में क्या अनुवाद किया है? देश क्या है? देश माने वतन, राष्ट्र।पर उन्होंने देश शब्द का अर्थ ( territory) यानि श्रेत्र लगाया है!! अब यह तो बेतुकी बात है। अब अगर आप को अपना चित्त देना है, मान लीजिए, अपने हृदय पर। हृदय चक्र संचालित होता है आदि मां श्री जगदम्बा से। वह वहां राज्य करती है। उस देश की वो रानी हैं। वो ही सब कुछ करती हैं। जब आप को उस क्षेत्र को  ठीक करना होगा, तो आप को रानी के पास जाना होगा, उनकी अनुमति लेनी होगी, उनको अपनी परेशानी बताइए, और वो आप को ठीक करेंगी। 

जबकि वो ऐसा का रहे हैं, हम कहेंगे, श्वासनलियां। यह सिर्फ एक क्षेत्र है। अब उदहारण के लिए हम इस क्षेत्र में बैठे हैं, ठीक है? और यह इस स्थान का क्षेत्र है और हमें यहां कुछ करना है। क्या हम कर सकते हैं? क्या ये हमें करना चाहिए? नहीं! हमे अधिकारी के पास जाना होगा। वहां जो सज्जन है उनसे पूछना होगा। वो अपने आदमी, या अपने कलाकार,या अपने वास्तुकार और जो भी कार्य है, उस कार्य को करने के लिए लगाएगा और अपने अधिकार से इस को सही करवायेगा। क्या हम यहां कुछ भी सही कर सकते हैं अगर हम करना चाहते हैं? पर इन छोटी बातों को भी आप नहीं देख पाए हैं जो एकदम साफ हैं, कि कोई नाम लेने से जैसे कैक्सटन हॉल, कैक्सटन हॉल, कैक्सटन हॉल, क्या आप वहां पहुंच जाते है?

परमात्मा का सारा विज्ञान आप के सामने प्रकाश में आएगा पूर्णत:! आप दिव्य नियमों का पूरा विज्ञान जान पाएंगे। वह साधारण नियमों जिन्हे हम जानते हैं से बहुत भिन्न होते हैं? पर पहले परमात्मा के राज्य में प्रवेश कीजिए! इसलिए मैं कहती हूं पहले अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त कीजिए। कुछ लोग प्राचीन काल में बेशक, अपने चक्रों को एक एक करके शुद्ध करते थे। लेकिन वह सब आत्म साक्षात्कारी थे। मुझे तो इन में से कोई भी आत्म साक्षात्कारी नहीं लगते।

पहली महत्वपूर्ण बात। एक आत्म साक्षात्कारी कभी किसी से धन नहीं लेता है। यह उस की गरिमा के परे की बात है कि वो किसी और के धन से जीवन यापन करे। दूसरी बात की वो अपनी शक्तियों का दिखावा नहीं करता बल्कि वो आप को शक्तियां देता है। तीसरा वह कोई चीज़ गोपनीय नहीं रखता। क्या यहां कोई माफिया चल रहा है कि हम सब गुप्त रखें? जब हम     सामुहिक चेतना की बात करते हैं तो हम सम्पूर्ण सामूहिक चेतना की बात करते हैं, आप उसे गुप्त कैसे रख सकते हैं? आप में से हर एक को जान ना है की दूसरों में क्या दोष है, आप में क्या दोष है, और सम्पूर्ण में क्या दोष है। वरना ऐसे रहस्यमई लोगों का क्या लाभ? कल्पना कीजिए कि हमारे शरीर की एक कोशिका अगर एकांतप्रिय हो जाए और वो दूसरों से संवाद ना रखे कि उस के पास क्या है और वो गोपनीय  हो जाय तो आप को को गैंग्रीन और कैंसर जैसी भयावह बीमारी या और कुछ ऐसा भी हो सकता है।

एक आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति एक खुली किताब होता है। ऐसे व्यक्ति को कोई भी देख सकता है। यह एक खुली किताब है, पूरी तरह खुली किताब, और आप ऐसे व्यक्ति को किसी भी तरह खरीद नहीं सकते, ना  ऐसे व्यक्ति पर हुक्म चला सकते हैं। वो अपनी ही दुनिया में रहता है। और एक बार आप को शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं आप भी वैसे ही हो जाते हैं।

सहज योग में जब कुंडलिनी उठती है, मेरा मतलब है और किसी तरह से तो उठ ही नहीं सकती, सिर्फ सहज योग से ही उठ सकती है। जब वह उठती है और यहां सहस्त्रार को खोलती है, तब आप चारों ओर फैली परमात्मा की शक्ति से एकरूप हो जाते हैं। आप बन जाते हैं, उसका यथार्थीकरण होता है। यह कोई एक भाषण या और कुछ नहीं है। यह आप पर कोई प्रभाव नहीं है, कोई सिनेमा नहीं है, ऐसा कुछ नहीं है। यह एक ऐसी चीज है कि जब आप को होने लगती है, तो आप अपनी उंगलियों, दूसरे लोगों के विभिन्न चक्रों और उनके अंदर घटित होने वाली सब चीजों को अनुभव करने लगते है।

अब हमारे साथ जो समस्या है, वो इस प्रकार है। हमारे यहां बहुत नकली लोग, बहुत सारे शास्त्र बहुत किताबें  हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ईसाई धर्म से उनका मोहभंग हो गया है। कुछ लोग कहते है कि हिदू धर्म से उनका मोहभंग हो गया है। वो सब निराश हो चुके हैं। इसलिए उन्हें लगता है सब भ्रम है। अब आप को यह जानना चाहिए की अगर किसी कि नकल है तो जरूर सम्पूर्ण सत्य भी होगा। हर नकली का एक असली है। वरना आप को उसकी प्रतिलिपि कहां से मिलेगी? पर यह एक प्रतिलिपि है, पता चल ही जाता है। उदाहरण के लिए जैसे (??) की कोई नकल बना रहा था। बहुत ग़लत, ठीक है उसने बेचा भी पर लोगों को पता चला कि वह (??) नहीं हैं। 

जो सत्य एक आत्मसाक्षात्कारी द्वारा अभिव्यक्त या पूर्णत: प्रकट होता है, क्या कोई उसकी नकल कर सकता है ? आप उन्हे यूं ही बिना समय खोए पहचान सकते है अगर आप थोड़े सा गहन, समझदार और चौकन्ने हैं। यह दूसरा तथ्य है।

ऐसा नहीं है कि आप बुद्धिमान नहीं हैं! आप सब बहुत समझदार हैं! पर आप की समझदारी को भी कोई मात दे सकता है! और उसकी वह चालाकी आप की समझदारी में आत्मविश्वास के रूप में आ जाती है। जिस व्यक्ति ने आप को मात दी है उस ने नकल की है। और इस नकल को आप तभी पकड़ सकते हैं जब आप पारखी है। अब, आप पारखी कैसे बन सकते हैं? हर व्यक्ति के आगे समर्पण करने से नहीं, ना! बल्कि शास्त्र अनुसार डिग्री प्राप्त होने से। अब, सारे शास्त्रों में वर्णित कौन सी डिग्री है? और वह है कि आप को आप का पुनर्जन्म प्राप्त होना चाहिए! आप को आत्म साक्षात्कार प्राप्त होना चाहिए। क्या उन में से किसी ने ये कहा आप से, सिवाय मेरे, की आप यहां हैं अपने पुनर्जन्म के लिए, आप का फिर से जन्म होना है? जबकि वह आपसे कहेंगे, हां, परंतु यह बहुत मुश्किल काम है। आपको अपने कर्मों की कीमत चुकानी होगी। आपको यह करना होगा। यह आसान चीज नहीं है । आपको 15 साल ऐसे ही करना होगा।’ मैं ऐसा नहीं कहती। लेकिन जो आपको मुझे देना है वह कठिन है, और वह है आपकी वफादारी।

जब आप धन देते हैं, तो आप उसके बारे में वफादार हो जाते हैं। यह बहुत ही बकवास बात है मनुष्यों के बारे में, मैं समझ नहीं पाती। असल में अगर मैं किसी चीज के लिए धन दूं तो मुझे थोड़ा सा भ्रमित हो जाना चाहिए उसके बारे में। लेकिन लोग एक दम से वफादार हो जाते हैं जब वह पैसे देते हैं। अब देखिए आप सिनेमा देखने जाते हैं, ठीक है। तो उस के लिए पैसे देते हैं। और वो बहुत भयंकर है, आप बिल्कुल भी उस का आनंद नहीं ले पाते। मेरा मतलब, वह खौफनाक है। फिर भी आप कहते हैं, कि चलिए इसको पूरा देख ही लेते हैं, आखिरकार हमने इसके लिए भुगतान जो किया है।

तो धन का भुगतान करना जुनून है सब से पहले, और वहां आप सोचते हैं, ओह! हम ने तो भुगतान किया था। अब और थोड़ा ज्यादा भुगतान करना चाहिए। एक प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। और आप नहीं देखते कि  दूसरा व्यक्ति जिस ने बारह साल किया है, वो कहां है? और मैंने एक साल किया है, मैं कहां हूं? आप सब वहां एक व्यर्थ खोज में दौड़ रहे हैं, पहुंच कहीं नहीं रहे।

आत्म साक्षात्कार एक चीज़ है, जो यथार्थ अनुभव है, आप के अंदर घटित होना चाहिए। कम से कम कुछ लोगों में अगर यह घटित हुआ है, तो वो वहां है। ऐसे कितने लोग हैं जो कह सकते हैं कि हम आत्म साक्षात्कारी हैं?

अभी हाल में मुझे एक गुरु का संदेश मिला, क्योंकि मैंने गलती से कह दिया कि शायद उन्होंने आत्म साक्षात्कार को स्पर्श कर लिया है, कि वो आ कर मुझ से प्रमाण प्राप्त कर सकें कि वो आत्म साक्षात्कारी हैं या नहीं। बहुत कम लोग यह कहेंगे कि, मैं आत्म साक्षात्कारी हूं। बहुत कम लोग यह कहेंगे क्योंकि वह जानते हैं कि वह किस का सामना कर रहे हैं उस समय। आत्म साक्षात्कार आपको कोई सींग नहीं दे देता, इसके विपरीत आप इतने नम्र हो जाते हैं। मैंने ऐसे लोग देखे हैं जो आत्मा साक्षात्कारी हैं, जो यहां बैठे हैं, जिन्होंने कई लोगों को आत्म साक्षात्कार दिया है।

हमारे यहां दक्षिण अफ्रीका में एक लड़का है जिसका नाम महाराज है। उसने आज ही मुझे फोन किया। उसने इतने अधिक लोगों को आत्म साक्षात्कार दिया है कि वह कहता है कि, ‘ मैं विश्वास नहीं कर सकता! ‘ उसने बहुत सारे लोगों के रोगों को ठीक किया है। उसने यह किया है और उसने वह किया है। वह कहता है, मां मुझे तो विश्वास ही नहीं होता। किस लिए आपने मुझे इतनी सारी शक्तियां दी हैं? 

अभी-अभी ग्लास्गो से किसी ने मुझे बताया कि उसने एक ही दिन में दस लोगों को आत्म साक्षात्कार दिया है। आप कुंडलिनी को उठते हुए देख सकते हैं, उस की कार्यप्रणाली को देख सकते हैं, उसमें जो सत्य है। आप बहुत वैज्ञानिक लोग हैं। आप सब लोग ऐसे असत्य पर कैसे विश्वास करते हैं, कि आप सालों लगे रहते हैं सदियों लगे रहते हैं, खुद को खत्म करने में, अपने धन को खत्म में, अपनी पत्नी को खत्म करने में,अपने बच्चों को खत्म करने में और कुछ भी प्राप्त नहीं करते जो भी हो?

आपको परमात्मा का ज्ञान होना चाहिए और यह तभी संभव है जब आपके पास वह दृष्टि हो। जो देख ही नहीं सकते उनको आप रंगों का, उस प्रेम के सौंदर्य का, उस प्रेम की कार्यशैली का कैसे वर्णन करेंगे? इसलिए मैं कहती हूं मैं आपसे प्रार्थना करती हूं कि आप अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त करिए। समझदार बच्चे बनिए। अच्छे बनिए! स्वयं के प्रति अच्छे बनिए! अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त करिए, यही सबसे महत्वपूर्ण है और फिर उसे कार्यान्वित कीजिए। 

अब सहज योगियों के लिए जो पहले से ही आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर चुके हैं, उनसे मुझे थोड़ी सी बात करनी है क्योंकि मैं एक महीने के लिए भारत जा रही हूं। और आज जो मुझे सहज योगियों से कहना है, कि वह जागृति पा चुके हैं और उनमें से अधिकतर के पास चैतन्य है। उन्हें चैतन्य का अनुभव हुआ है यह अच्छी बात है लेकिन उन्हें बहुत ज्यादा पकड़ आती है और वे लिप्त हो जाते हैं। इसलिए अनासक्ति पर काम करना चाहिए।

अब अनासक्ति एक ऐसी चीज है जिसको लोग नहीं समझते कि वह क्या है! वह किसी तरह की वेशभूषा धारण करते हैं यह दिखाने के लिए कि वह अनासक्त हैं। वह एक चारपाई लेकर पेड़ के नीचे सोएंगे और कहेंगे कि वो अनासक्त हैं। और वहां भी उनके बक्से में ताला लगा होगा। या फिर वह हिमालय पर चले जाएंगे और सोचेंगे कि वो अनासक्त हैं।

अनासक्ति आपके अंतर्मन की एक स्थिति है। यह बाहर  नहीं है। यह वस्त्रों द्वारा या किसी प्रकार की जीवन शैली या अन्य किसी तरह की शैली अभिव्यक्त नहीं की जा सकती बल्कि यह अंदर की चीज है। इस को जांचने का सबसे अच्छा तरीका है जब आप किसी को आत्म साक्षात्कार प्रदान करने का प्रयास करते हैं। क्या आप उस व्यक्ति के प्रति हमदर्दी रखते हैं? क्योंकि उस व्यक्ति का गुरु और आपका गुरु एक है क्या इसलिए आप उसे आत्म साक्षात्कार दे रहे हैं उस व्यक्ति को? क्या आप उस व्यक्ति के प्रति अधिक चिंतित हैं क्योंकि वह उस परिवार से आता है जहां से आप हैं,  या उस देश से आता है जहां से आप हैं? 

यह कहने के लिए सहानुभूति ( sympathy ) ek बहुत शानदार शब्द है ( sym – pathy ). Sym मतलब बांटना, और pathy माने pathos यानि दुख। मतलब दुख को बांटना ! यह सहानुभूति का सब से अच्छा हिस्सा है। सहानुभूति कुछ है तो असल में करुणा है जो सिर्फ बहती है। जो सिर्फ बहती है।। आप को किसी से सहानुभूति नहीं करनी। वह बहती है और कार्यान्वित होती है। यही करुणा है जो एक अनासक्त व्यक्ति से आती है। सिर्फ बहती है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि वह किस परिवार से आता है किस देश से आता है, आप की बाहर की चीजों से उसका कोई जुड़ाव नहीं होता। चाहे वह आपका भाई या बहन हो या नहीं। चाहे वह आपका शत्रु हो या नहीं। आप अपनी करुणा के वशीभूत बस उस व्यक्ति के लिए कार्य करते हैं, जैसे नदी बहती है, सूर्य चमकता है सबके लिए। उसी प्रकार आप भी अकर्मी हो जाते हैं अर्थात आप जो कर्म कर रहे हैं उनसे आप आसक्त नहीं होते।

यह बहुत ही आसान सा एक नियम है जिसका पालन  करना चाहिए कि आपको किसी से सहानुभूति नहीं रखनी है। और फिर इसके फलस्वरूप एक और समस्या की शुरुआत होती है। आप किसी एक से सहानुभूति करेंगे और प्रतिदिन आपके यहां एक सौ एक लोग आने लगेंगे, जो सिर्फ आपको बताएंगे रोते रहेंगे और बताते रहेंगे कि वह कितने दुखी हैं! पूर्णत दुखी। तो आप उन्हें कैसे सही करेंगे? उनके साथ बैठकर रोएंगे? या फिर उन्हे सिर्फ ये बता कर, सबसे पहले आप अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त कीजिए? यह सब आप में बाईं या दाईं नाडी के कारण आ रहा है। आप मध्य में रहिए। हम सब कुछ ठीक कर देंगे।

यह मन कि अलग ही की अवस्था है जहां आप पहुंच जाते हैं। यह एक अलग ही अवस्था है समाधि की जहां आप हैं, एक महासमाधि है, जहां आप सारे संसार को एक नाटक की तरह देखते हैं, जहां ना खुशी है ना दुख है सिर्फ आनंद रहता है। यह अनासक्त अवस्था एक उपलब्धि है जो सहज योगियों को प्राप्त करनी चाहिए। 

अपने स्वयं के बारे में सतर्क रहना बहुत आसान हो जाता है, जब आप दूसरों में या जो भी चीज़ हो,जो हुई हो उस में रुचि लेने लगते हैं। उदाहरण के लिए -एक बच्चा! अगर आप उसे एक बच्चा दे दें और वह यहां आए, तो वह दौड़ने लगेगा सारी जगह, सब चीजों को छूने लगेगा, उन पर कूदने लगेगा, यह करेगा, वह करेगा, सब खत्म। वह कुछ मोमबत्तियां इकठ्ठी कर सकता है और उनसे खिलौना जैसे कुछ बनाए, उसे फेंक दे और चला जाएगा। इस बच्चे को इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं है कि इसका भूत क्या था और उसका भविष्य क्या होगा। सब अपने आप होता है और फिर खत्म हो जाता है। यह सिर्फ एक खेल है। पर मैं यह नहीं कर सकती आपको सिर्फ एक भाषण देकर। आपको इसे प्राप्त करना होगा। सहज योग एक अनुभव करना है और उसे प्राप्त करना है। जो प्राप्त करता है वह अपने लिए प्राप्त करता है। जो अनुभव करता है वह अपने लिए अनुभव करता है और जब वह यह करता है तो वह सम्पूर्ण के लिए करता है। या संपूर्ण के लिए केंद्र का निर्माण करता है, और संपूर्ण इस प्रकार काम करने लगता है कि आप आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि किस प्रकार सामूहिकता में इतने सारे लोगों को आत्म साक्षात्कार मिलना आरंभ हो जाता है।

आप में से हर एक, जो सहज योगी है, प्रतिदिन कम से कम हज़ार से अधिक लोगों को आत्म साक्षात्कार देने के योग्य है। परंतु आप प्रयास नहीं करते हैं। आप शर्माते हैं, आप नम्र हैं और आप यह दावा नहीं करना चाहते कि आप एक  आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति हैं। असल में मुझे उनसे कहना चाहिए कि अपने सिर पर लिख लें कि’ मैं एक आत्म साक्षात्कारी हूं’। इसमें गलत क्या है? पर आप शर्माते हैं और आप इसके बारे में बात नहीं करते जबकि मैंने देखा है कि लोग बिना ज्ञान के, बिना किसी प्रभुता के उनके पास बड़ा झंडा होगा, बड़ा आश्रम होगा और वहां कुछ होंगे जो जोर-जोर से ढोल पीट रहे होंगे, ‘आओ आओ आओ, एक फलाना योगी आए हैं’। और सब लोग वहां पर एकत्रित होने लगेंगे। आप वहां जाते हैं और पाते की कोई भयानक पाखंडी वहां बैठा हुआ है नकली मूंछ और नकली दाढ़ी के साथ! 

पर सहज योगियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि पता करें जितने अधिक से अधिक संभव हो, उन्हें आत्म साक्षात्कार दे या आत्मसाक्षात्कार तक ले आएं। अपनी तरीके से इसे कार्यान्वित करें। पता करिए कि लोगों के साथ क्या समस्या है? वह ऐसे क्यों है? बैठिए और विचार विमर्श कीजिए। पता करिए कि लोग आत्म साक्षात्कार लेने क्यों नहीं आ रहे हैं और गलत लोगों की और क्यों जा रहे हैं, जो किसी काम के नहीं है। इस बारे में सोचिए। आप मुझे सबसे अच्छी तरह बता सकते हैं और आप ही सबसे अच्छे निर्णायक हैं।

आपके लिए ध्यान बहुत आवश्यक है, क्योंकि आत्म साक्षात्कार पाने के बाद बिना उनसे डरे अपनी रोशनी में आप देख सकते हैं कि आप की क्या समस्याएं हैं। और सहयोग में आप उन तकनीकों को भी जानते हैं कि खुद को कैसे स्वच्छ करना है, अपने कर्मों को कैसे निकालना है, अपने आप को कैसे पूर्णत: स्वच्छ करना है, और अपनी समस्याओं से किस तरह पूर्णत: छुटकारा पाना है। तो गंभीरतापूर्वक इसको करें। ध्यान करें। आप जानते हैं ध्यान कैसे करना है। आप जानते हैं स्वच्छ कैसे करना है। आप जानते हैं कौन से चक्र हैं जिनमें पकड़ है। दूसरों की सहायता कीजिए।

ध्यान को रीति अनुसार और नियम पूर्वक करना चाहिए। सहज योग में किसी चीज के लिए ज्यादा मनाही नहीं है क्योंकि सहज योग खुद आपकी बहुत सी चीजों को संभालता है। आप अपनी पुरानी आदतों को नहीं रख सकते। वह बस छूट जाती है, स्वत ही छूट जाती हैं। लेकिन आपको ध्यान जरूर करना चाहिए। आप को ध्यान करना सीखना चाहिए। अगर आपको कोई खास तरह की समस्या है तो आप अपने मित्रों से पूछ सकते हैं। पूछने में कोई नुकसान नहीं है। इसमें आपको शर्माना नहीं है और आप सब को एक दूसरे की मदद करनी चाहिए। हम एक विराट के अंग प्रत्यंग हैं और हम को एक दूसरे की जितनी संभव हो मदद करनी चाहिए। और जो सहज योग को बहुत दिनों से जानते है, और जो सहज योग के ज्ञान से पूरी तरह सुसज्जित हैं, आप को उन से पूछना चाहिए, उनकी सलाह लेनी चाहिए कि क्या करना है, इसे किस तरह कार्यान्वित करना है और अपने आप को स्थिर करिए। आपको स्थिर होना है। जब तक आपका सहज योग के प्रति सही रवैया नहीं होगा तब तक वह कार्यान्वित नहीं होगा।

अगर यह (सहज योग) सिर्फ एक सहायक या दूसरे दर्जे का विषय है तो यह कार्यान्वित नहीं होगा। इसे जीवन में सबसे प्राथमिक होना चाहिए और बाकी चीजें दूसरे दर्जे पर होने चाहिए। क्योंकि आप का जागरण हो चुका है, सही है, परन्तु ये जागरण अभी तक स्थिर नहीं है और आप स्वयं को अभी तक वह तृप्ति नहीं दे पाए हैं जो आप को सम्पूर्ण संतोष और सम्पूर्ण आनंद प्रदान करती है। जब तक आप वो स्तिथि प्राप्त नहीं करते, आप स्वयं से भी प्रसन्न नहीं हो सकेंगे। 

इसलिए कृपया ध्यान करिए, ध्यान करिए। लोग बहाना बनाते है, मैं यहां ध्यान नहीं कर सकता। मैं वहां ध्यान नहीं कर सकता। मैं नहीं कर सकता। यह सब गलत है। यह तरीके से आप बेहतर नहीं होंगे। यह आप को प्राप्त करना है। जब भी आप को अवसर मिले, आप इन लोगों से आश्रम में भेंट करने का प्रयास करिए, वहां देखिए, और ऐसे स्थान ढूंढ ने का प्रयास करिए जहां पर यह कार्यान्वित हो सके और जहां दूसरों को आत्म साक्षात्कार दे सकें। जीवन की सारी क्षुद्रता और मूर्खतापूर्ण लालसाएं और अन्य चीजें धीरे धीरे छूट जाएंगी, परन्तु अगर आप चाहें स्वयं खुद भी, क्योंकि अब आप एक आत्म साक्षात्कारी हैं, क्योंकि यह कर ने के लिए आप अच्छी तरह से सुसज्जित है और आप के पास यह करने ले लिए विशेष शक्तियां हैं।

अब मैं भारत जा रही हूं और मैं आप लोगों का संदेश भारत में आप के भाई बहनों के लिए ले जा रही हूं। वह हजारों में है आप यह जानते हैं। और गांव में वे लोग बहुत ही सीधे और अच्छे हैं और यह (सहज योग) भारत में गांवों में आग की तरह फैल रहा है। शहरों में नहीं, क्योंकि शहरों में लोग खुद की प्रगति कर रहे हैं, वह परिष्कृत हो रहे हैं। परंतु गांव में लोग बहुत सरल है और सहज योग वहाँ बेहतरीन परिणाम दे रहा है।

इसी प्रकार आप भी यहां ऐसे अनेक लोग ढूंढ सकते हैं जो स्वभाव से सरल हैं और सहज योग में आना चाहेंगे। कई प्रकार से आप उन्हें आमंत्रित कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, मैं कहूंगी कि यह लड़का दक्षिण अफ्रीका में, वो यहां आया, आश्रम में रहा। बहुत समय पहले उसे आत्मसाक्षात्कार मिला था। लेकिन उसने सारी तकनीक सीख ली थी। वह वापस दक्षिण अफ्रीका गया और जो सबसे पहली चीज उसमें शुरू की उसने लोगों के उपचार के लिए फोटो देने शुरू किए और धीरे-धीरे कई लोग निरोग हो गए। और फिर उसको कुछ समस्याएं आई, उसने मुझे फोन किया कि, ‘ यह हो रहा है, वह हो रहा है’। परंतु ऐसे लोग जिनको आवश्यकता है शारीरिक कल्याण की, उसको उसी प्रकार कार्यान्वित करना सही रहेगा कुछ लोगों के साथ, और फिर खबर फैल जाती है और धीरे-धीरे लोग आपके पास आने लगते हैं।

पर ऐसे भी कुछ लोग होंगे जो स्वस्थ होंगे और फिर भी वह भगवान को खोज रहे होंगे भगवान को पाना चाहते हैं। सहज योग में, आप संसार के सारे धर्मों का, इस धरती पर आए सारे अवतरणों का अर्थ प्राप्त करते हैं, क्योंकि वह इस धरती पर आए थे उन सारे चरणों की जानकारी देने के लिए जो आप की क्रमगत उन्नति के लिए आवश्यक हैं।

आप सब को आप के अंदर अब उन चक्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो ठीक नहीं हैं। चक्रों पर एकाग्रता से ध्यान दीजिए और उन चक्रों पर बैठे देवी-देवताओं पर भी। जहां भी समस्या है उस पर उस पर जरा एकाग्र हों और उस पर अपना चित्त डालें। अपने चित्त से आप उसकी सफाई कर सकते हैं। उस समय उस देवता का आप नाम लें, आप जानते हैं कि मंत्र कैसे होते हैं, आप जानते हैं आप मंत्र कैसे बना सकते हैं। अब आप मंत्रों के सारे शास्त्र को जानते हैं। अब आप मंत्र का सही तरह उपयोग करें जहां भी आवश्यकता हो। उसके बाद आप अपना पूरा चित्त उस पर प्रवाहित करें – धारणा। आप देखिए जब तक ये आप के अंदर निरंतर पूरी तरह इस को धारण नहीं करता पूर्णत:। और उसके बाद आप अपनी जागृत चेतना, समाधि में चले जाइए। तो यह हुआ ध्यान, धारणा और समाधि।

जागृत चेतना सब से पहले निर्विचार समाधि है। तो, निर्विचार समाधि में रहने का प्रयास करिए और बाद ने सामूहिक चेतना में रहने का। ये दो चरण हैं जिन में आप पहले ही पहुंच चुके हैं। इन्हे कायम रखने, शुद्ध रखने का प्रयास करिए और स्वयं को वहां स्थापित करिए। ये इस प्रकार किया जाना चाहिए। जिसे हम हिंदी भाषा में बैठक कहते हैं, आप की बैठक होनी चाहिए, अर्थात आप को उस पर बैठने के योग्य होना चाहिए। आप को उसको काफी समय तक करने योग्य होना चाहिए। लेकिन जिसे हठ कहते है उसके साथ नहीं, लेकिन आनंद के लिए। जब तक कि आपको उसका आनंद आता है, आप उसे करना आरंभ कर देते हैं। और आपको यह देखकर आश्चर्य होगा कि किस प्रकार आप अपने चक्रों और देवताओं को स्थापित करेंगे, और आप की पुकार पर जरा से उसका जिक्र करने पर, वह इस प्रकार कार्य करना आरंभ कर देंगे।

मैं चाहती हूं जो भी मैं हूं, मुझे आप को वह सब देना चाहिए, जो कुछ भी मेरे पास है, क्योंकि मुझे कुछ प्राप्त नहीं करना है। यह मेरे पास था सारे वर्षों में, सब युगों में। अब जो मैं चाहती हूं कि यह सब आपके पास होना चाहिए। मुझे आपको समृद्ध होते देखना है, जैसे बसंत में भूमि देवी पुष्प उगाती है और खुशबू चारों ओर फैलती है। मैं चाहती हूं कि आप सब पल्लवित हो और आप की सुगंध सब देशों में और सारे ब्रह्मांड में, सारे विश्व में फैले। सम्पूर्ण देशों का परमात्मा के सौंदर्य, कृपा और परमानंद युक्त एक नए संसार में परिवर्तिन होना चाहिए।

परमात्मा आप सभी को आशीर्वादित करें।

आप में से हर सहज योगी कम से कम दस लोगों को यहां लेकर आए जब तक कि मैं अगली बार वापस आती हूं। प्रयास करिए। आप यह कर सकते हैं। धन्यवाद!

आपके गुरु दूर जा रही हैं। इसी प्रकार आपको यह भी जानना चाहिए कि आप में जो भी प्रतिभाएं हैं आपको उन को बढ़ाना चाहिए। बढ़ाना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा लोगों को सहज में लाना चाहिए।

जो लोग आज यहां पहली बार आए हैं, कृपया अपने हाथ उठाएं। जो पहली बार आए हैं, कृपया अपने हाथ उठाएं। अब, क्या आप आगे आ सकते हैं यहां? मैं आपको देखना चाहती हूं। कृपया आएं! उन्हें बैठने दीजिए! कृपया बैठिए!  इन्हें कुछ कुर्सियां दे दीजिए! हां यह आरामदायक है!

सहज योग में कई बाधाएं शारीरिक रूप में आती है, बहुत ज्यादा, अगर आपका स्वास्थ्य अच्छा नहीं चल रहा है। जब आपकी वो रुकावट हट जाती है तब आपकी कुंडलिनी चढ़ जाती है।

दूसरी आती है मानसिक रूप से। उदाहरण के तौर पे अगर आप एक बहुत ही परेशान व्यक्ति हैं, तो भी आप को समस्या आती है। कुंडलिनी को उठाने में समस्या होती है। 

तीसरी आती है आपकी मानसिक दृष्टिकोण के कारण। अगर आप कुछ ज्यादा ही पढ़े लिखे हैं और आत्म साक्षात्कार को ले कर आपके दिमाग में कुछ धारणा हैं, तो समय लगता है। 

चौथा जो कि सबसे महत्वपूर्ण है कि अगर आप कि कोई आध्यात्मिक त्रुटि रही है, ऐसे लोगों द्वारा शुरू की गई जो एक प्रकार से परिस्थिति का शोषण करना चाहते हैं, तो वह आपके लिए एक बहुत बड़ी बाधा बन जाती है। अगर आप एक प्रकार के आध्यात्मिकता में दिलचस्पी लेते रहे हैं, आत्माओं इत्यादि के पास जाने  में, उसका भी बहुत बुरा असर होता है।

परंतु आपको चिंता नहीं करनी चाहिए। अगर कोई समस्या भी है तो वह सही कि जा सकती है। उसको सुधारा जाना चाहिए और वह सुधारी जाएगी। लेकिन जैसे कि मैंने कहा, आत्म साक्षात्कार आप की पहुंच में हैं। डरने की कोई बात नहीं है। अगर इस तरह को कोई समस्या है, हम उसे दूर कर देंगे। उसके लिए हम एक तरीका, एक तकनीक का प्रयोग करते हैं जो सभी सहज योगी जानते हैं। उदाहरण के लिए वह आपकी कुंडलिनी को ऊपर उठाते हैं। मैं भी उठा सकती हूं।  मैं अपनी कुंडलिनी को उठाती हूं  जिस पर मैं आपकी कुंडलिनी को उठाती हूं। यह ध्यान योग कहलाता है। 

असल में सहज योग महायोग है। यह महानतम योग है जिसके द्वारा, आप दूसरे व्यक्ति की कुंडलिनी अपने हाथों द्वारा उठा सकते हैं, क्योंकि चैतन्य, दिव्य चैतन्य आपके अपने हाथों से बह रहा है। यह कार्य करता है और यह सूक्ष्म है। ये आपको संतुलन देता है। अगर यह दाएं तरफ या बाई तरफ ज्यादा है तो आप इसे संतुलन दे सकते हैं। अगर किसी चक्र में समस्या है तो आप वहां चैतन्य दे सकते हैं और चक्र ठीक हो सकते हैं। आप चक्रों को निरोग कर सकते हैं। और चक्रों को अधिक शक्ति दी जा सकती है उनकी सहायता के लिए आने के लिए और कार्यान्वित करने के लिए  ।

उदाहरण के तौर पर कैंसर की बीमारी जिसमें चक्र अलग हो जाते हैं। ये दो चक्र अलग हो जाते हैं क्योंकि उसमें जो कोषाणु है वह अपने आप में हो जाते हैं, बहुत ज्यादा शक्ति खींचने लगते हैं, और फिर उन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। तो जब ये होता है तब दोनों चक्रों को इस प्रकार से साथ लाना आवश्यक होता है। बाई तरफ से और दाएं तरफ से लाना और एक साथ रखा जाता है इस तरह। 

इसके लिए आवश्यक है कि वहां पर चैतन्य दिया जाए। और इसीलिए आप के उस एक चक्र पर कई लोगों को  चैतन्य देना होगा। पर इससे आपको परेशान नहीं होना चाहिए। यह बहुत आश्चर्य की बात है कि कुछ लोगों को जब चैतन्य दिया जाता है, तो उन्हें ये अच्छा नहीं लगता,। उन्हे ये अच्छा नहीं लगता और वह इस को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं। लेकिन आपके साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता है।

जब मोहम्मद साहब ने लोगों को सिखाया कि नमाज़ कैसे करनी है तो लोग उन पर हंसते थे। जो उन्होंने सिखाया वह कुछ और नहीं बल्कि कुंडलिनी का जागरण ही था। उन्होंने सिर्फ कुंडलिनी जागरण ही सिखाया। और कुंडलिनी के जागरण के द्वारा वह चाहते थे कि लोगों को आत्म साक्षात्कार प्राप्त हो। पर वे सब गलत हो गए,  क्योंकि यह सब कार्य करने के लिए उनके, उनके दामादों, उनकी बेटी और उनके पोतों के अलावा वहां कोई आत्म साक्षातकारी नहीं था। बाकी शायद वहां सब बेकार के लोग थे, या फिर धीरे-धीरे उसमें गिरावट आ गई। और नमाज की पूरी प्रणाली एक प्रकार से एक, जिसे हम कहते हैं ओपचारिक मात्र बनकर रह गई और कोई नहीं जानता कि ये क्यों, और किस लिए है। लेकिन वह यह (नमाज़) कर रहे हैं क्योंकि उन्हें कहा गया है। अब कोई इस पर हंसता नहीं है। जब वह विशुद्ध थी तो सब उस पर हंसते थे।

इसी प्रकार सहज योग की तकनीक को भी आपको धीरे-धीरे समझना है। अन्य लोग आपको चैतन्य दे रहे हैं तो आपको इसका बुरा नहीं मानना चाहिए। कल आप भी यही कर रहे होंगे और दूसरों को आत्म साक्षात्कार दे रहे होंगे। आप वह सब स्वयं करेंगे जो सब कुछ आज दूसरे लोग कर रहे हैं। और इसको अजीब मानने की कोई जरूरत नहीं है। फिर वह इस प्रकार आपके पीछे से कुंडलिनी को इस तरह से हिलाएंगे। और या फिर वह आपको इस प्रकार से संतुलन देंगे। इस बारे में आपको इतना परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसमें कोई बेतुकी बात नहीं है। एक प्रणाली है जो सारे ग्रंथों में लिखी हुई है। कबीर ने इसका वर्णन किया है। नानक ने इसका वर्णन किया है। शंकराचार्य के सारे ग्रंथों में इसका वर्णन है। अगर आप मार्कंडेय को पढ़ते हैं तो उसमें भी इसका वर्णन है। इसमें कुछ नया नहीं है। परंतु क्योंकि आप इसके बारे में जानते नहीं हैं, आप अनुभवहीन हैं इसलिए आप इसे नहीं समझ पाते। पर आपका कोई नुकसान नहीं होगा। इसी प्रकार आप लोगों को निरोग करते हैं और उन्हें अच्छा अनुभव करवाते हैं।  किसी भी प्रकार की किसी भी चीज से आपको परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है।

अब यहां ऐसे कुछ लोग हैं जो जन्म से ही आत्म साक्षात्कारी हैं और कुंडलिनी का ज्ञान है उनके अंदर से  है। वो इसी प्रकार जन्मे है। हमारे यहां एक छोटा सा लड़का है यहां वह जन्म से आत्मसाक्षातकारी है। वह हॉलैंड में रहता है। काफी सारे बच्चे हैं जो जन्म से आत्म साक्षात्कारी हैं और वह मुझे बेहतर समझते हैं। वह तुरंत ही कुंडलिनी पर कार्य करना शुरू कर देते हैं। और सबसे अधिक आश्चर्य की बात कि अधिकतर सहयोगियों के बच्चे जन्म से ही आत्म साक्षात्कारी हैं। जो लोग सिर्फ मेरे प्रोग्राम में भी आते हैं उनके बच्चे भी जन्म से आत्म साक्षात्कारी हैं, और मैं लोगों को अपने बच्चों को लाने के लिए प्रार्थना इसीलिए करती हूं, क्योंकि शायद वे अपने बच्चों की वजह से ही यहां है। और वह (बच्चे) यह बहुत अच्छी तरह समझते हैं। वह जानते हैं कि उसे कैसे कार्यान्वित करना है। वह जानते हैं कि उसे आगे कैसे आगे ले जाना है। मुझे उन्हें कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है।

आप को जानना चाहिए, कि कुछ है जो की बहुत बहुत सत्य और स्पष्ट है। बात सिर्फ इतनी है आप उस के बारे में नहीं जानते, आप ने उसे नहीं देखा, अनुभव नहीं किया, इसलिए ये आप को थोड़ा अलग लगता है। पर वह भिन्न है। यह एक भिन्न वस्तु है, है ना? आखिरकार जब आप लंदन आते हैं, तो आप पाते है लंदन भारत से थोड़ा अलग है। और यहां आप को कुछ प्रयोग करना होता है जो आप भारत में नहीं करते। तो, यह थोड़ा भिन्न है, पर फिर भी आप को इसका उपयोग करना होता है अगर आप को यहां रहना है। इस प्रकार जब आप परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश करते हैं, आप को पता होना चाहिए कि किस प्रकार अपने पैरों का प्रयोग करना है, कैसे अपने हाथों का प्रयोग करना है, किस प्रकार अपनी और दूसरों कि कुंडलिनी कि पूर्ण गति का आप को उपयोग करना है। यह धीरे धीरे आप सीख जाएंगे, इसलिए डरने कि कोई बात नहीं।

परंतु बार बार ये कहना होगा कि ये एक गंभीर बात है। आप इसे खुद नहीं कर सकते। आप को ऐसे ही आप का आत्म साक्षात्कार मिल सकता है। आप को बहुत अच्छा लगेगा। लेकिन इसे त्यागिये मत। दोबारा वापस आइए, एक साथ एकत्रित होइए, स्वयं को स्थापित करिए, और तब आप पूर्णत: जानेगें आप क्या हैं और आप कितने सक्षम हैं।

परमात्मा आप को आशीर्वादित करें।

तो अब आप सब अपने हाथ थोड़ा इस तरह रखें। अपनी आंखें बंद कर लीजिए। अब देखिए कि आप की आंखें बिना जोर पड़े या बिना पलकें झपके बंद हैं, तो सब ठीक है। लेकिन अगर पलकें अस्थिर हो रही है तो उन्हें खोल कृपया खोल लीजिए। अगर पलकों में कोई कंपन नहीं है तो यह ठीक है। आप खुद ही देख सकते हैं।

अब जब कुंडलिनी आज्ञा चक्र से उपर उठती है, जो यह है जहां मेरा लाल निशान है, मस्तिष्क के मध्य में जहां ऑप्टिक चास्मा है, तो आप हो जाते हैं..

(भाषण कट गया है)

बहुत अच्छे संतुलन और समझ से सिर्फ स्वयं को देखिए। क्या आप के दिमाग में कोई विचार है? आप स्वयं ही देखिए। वह आप हैं जिसे स्वयं को प्रमाणित करना है। अब अगर कोई विचार नहीं है तो बहुत धीरे से अपना ध्यान सिर के ऊपर ले जाइए, जोर दे कर या किसी और प्रकार नहीं। बस यहाँ! वहां ध्यान दीजिए।

हम लाइट बंद कर रहे हैं जिस से आप की आंखों पर ज्यादा जोर ना पड़े।  अब क्या होता है कि आप ठंडी हवा को अपनी उंगलियों से अपनी हथेलियों की तरफ आते हुए अनुभव करने लगते हैं। शायद आप गर्म अनुभव कर रहे हैं, अगर हां, तो उसे इस तरह फेंक दीजिए, अगर आप गर्म अनुभव कर रहे हैं। दोनों हाथों से, साथ नहीं लेकिन एक दूसरे से अलग, और दोनों उंगलियों को इस तरह दबाते हुए। केवल उन्हें आगे की तरफ इस तरह दबाइए। लेकिन दोनों हाथ उस पर होने चाहिएं हां। अब अपनी दोनों आंखों को बंद रखिए क्योंकि जब कुंडलिनी उठती है तो पुतली का फैलना घटित होता है।

जिनको अपने हाथ में ठंडी हवा महसूस हो रही है अपने हाथ उठाइए। आप सब जिन्हे हाथों में ठंडी हवा का अनुभव हो रहा है। अच्छा! 

क्या आप? थोड़ा बहुत? अभी नहीं? क्या आप अनुभव कर रहे हैं? थोड़ा सा, थोड़ा सा, ये शुरू है रहा है। सिर्फ आप दोनों। आप को आने लगेगा धीरे धीरे। आप का कैसा रहा मेरे बच्चे? नहीं? कृपया अपना हाथ यहां रखिए। क्या स्वास्थ्य आपका स्वास्थ अच्छा चल रहा है? अब बेहतर है देखिए?

अपने दोनों पैरों को इस प्रकार रखिए, सीधे जमीन पर यहां। पैर जमीन पर इस तरह अलग, यहां, हां! क्या आप को मिल रही है? क्या आप को महसूस हो रही है? थोड़ा बहुत? हां! क्या आप को अनुभव हो रहा है? अभी नहीं? ठीक है! आप को अनुभव नहीं हो रहा? देखिए। प्रतीक्षा कीजिए और देखिए। यह कार्यान्वित होगा। यह कार्यान्वित होगा। यह कार्यान्वित होने लगेगा।यह कत्यानवित होता है। बढ़िया, यहां ये हो रहा है।

जरा अनुभव कीजिए वहां, अगर वह अच्छा अनुभव कर रहे हैं। आप खड़े हो कर देख सकते हैं कि क्या वह वहां है। ऊपर आइए। आप में से कुछ खड़े हो जाइए। गविन! उनको प्राप्त हो गया है। उनको मिल गया है। दोनों को। उनको मिल गया है। तुम को भी मिल गया है, निस्संदेह। 

अपनी आंखें बंद रखिए! यह अब युगो का महानतम अनुभव है। अपनी आंखें बंद रखिए। पूर्णत: स्वयं का आनंद लीजिए। स्वयं का आनंद लीजिए। आपका क्या हुआ? अभी तक नहीं? क्या बात है? आपको यहां कोई समस्या है? यहां? ठीक है! यह बात है! हम उसे सही कर देंगे। आपको मिल गया है अच्छी बात है! परमात्मा आप को आशीर्वादित करें।

जिगर, जिगर। सिर्फ अपने जिगर की देखभाल करें। और बहुत उदास। क्या वह ठीक है? डॉन? बढ़िया। नहीं वह ठीक है! यह क्या है? हृदय? अपना हाथ उसके पीछे रखिए। सांस को रोकिये! ठीक है? अब छोड़िए!

आप एक दूसरे को क्यों नहीं देखते? अच्छा विचार होगा। एक दूसरे को जांचिए। यह बहुत अच्छा विचार है। एक दूसरे को जांचिए। साथ आइए!