Navaratri Celebrations

मुंबई (भारत)

1979-09-28 Kundalini And Kalki Shakti, Mumbai, India, 45' Download subtitles: EN,FI,PL,TR,ZH-HANTView subtitles: Add subtitles:
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(नवरात्रि उत्सव, कुंडलिनी और कल्कि शक्ति , मुंबई,महाराष्ट्र, भारत, 28 सितंबर 1978)।

आज हम कुंडलिनी और कल्कि के संबंध पर बात करेंगे। वास्तव में कल्कि शब्द निष्कलंक शब्द का अपभ्रंश है। निष्कलंक का अर्थ वही है जो मेरे नाम का निर्मला का अर्थ है … निष्कलंक अर्थात बिना दाग धब्बे वाला… बिना किसी दाग धब्बे वाला व्यक्ति।
कल्कि …. इस अवतरण का वर्णन कई पुराणों में मिलता है …. कि कल्कि सफेद घोड़े पर सवार होकर इस धरती पर, संभलपुर नाम के गांव में आयेंगे। अब संभलपुर भी बहुत दिलचस्प है … लोग हर चीज का शाब्दिक अर्थ ले लेते हैं। संभल शब्द का अर्थ है भाल अर्थात माथा इसका अर्थ है कि कल्कि हमारे माथे पर अवस्थित हैं। भाल मतलब माथा और यहां वे जन्म लेने वाले हैं। यही इस शब्द का अर्थ है।
बीच में ईसा और और उनके संहारक अवतरण महाविष्णु को कल्कि कहा जाने लगा। मानव जाति को परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश पाने के लिये, स्वयं को सुधारने के लिये एक समय दिया गया है…. जिसको बाइबिल में लास्ट जजमेंट या अंतिम न्याय कहा गया है। आपमें से प्रत्येक को धरती पर अंतिम न्याय का सामना करना पड़ेगा।
ऐसा माना जाता है कि विश्व की जनसंख्या इस समय अधिकतम है क्योंकि जिसको भी परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश करने की इच्छा थी उन सबने इस आधुनिक समय में जन्म लेना है और शीघ्र ही वे सब जन्म ले लेंगे।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण समय है क्योंकि सहजयोग ही अंतिम निर्णय है। ऐसा सुनना अविश्वसनीय है लेकिन यही सत्य है। यद्यपि आप समझ सकते हैं कि माँ के प्रेम से आपके लिये आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करना अत्यंत सरल हो गया है और यही अंतिम न्याय की पूरी कहानी है जो काफी भयावह प्रतीत होती है लेकिन इसको आपके लिये इतना सुंदर व सुकोमल बना दिया गया है कि इससे आपको लेशमात्र भी परेशानी नहीं
होती है। यह अंतिम निर्णय का समय है और आप सभी को सहजयोग के माध्यम से परखा या जज किया जायेगा कि आप परमात्मा के साम्राज्य में जा सकते हैं कि नहीं।
सहजयोग में लोग कई प्रकार के चित्त के साथ प्रवेश करते हैं। यहां ऐसे लोग भी आते हैं जिनके कृत्य अत्यंत तामसिक होते हैं अर्थात जो काफी सुस्त प्रकृति के होते हैं। जब इनकी ये प्रवृत्ति अत्यधिक बढ़ जाती है तो ये शराब का या ऐसी ही किसी चीज सेवन करने लगते हैं जो उन्हें वास्तविकता से दूर ले जाती हैं और अंदर से उऩको सुस्त या सुन्न बना देती हैं।
दूसरी ओर, जैसा कि आप जानते हैं कि दांई नाड़ी प्रधान लोग, जो अत्यंत महत्वाकांक्षी होते हैं… अत्यंत महत्वाकांक्षी। वे पूरे संसार पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं और कुछ अलग सा ही करना चाहते हैं। संपूर्ण या परमात्मा से उनका कोई संबंध नहीं होता।
आप देख सकते हैं कि इस कलयुग में लोग किस प्रकार अतिवादी हो गये हैं। उनमें से कुछ बहुत ज्यादा शराब पीने लगते हैं और अपनी चेतना से दूर चले जाते हैं… अपनी आत्मा से … सत्य से … सुंदरता से दूर चले जाते हैं। जबकि दूसरे सभी चीजों को नकारने लगते हैं… सभी सुंदर चीजों को … ये अत्यंत अहंवादी होते हैं।
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो प्रतिअहं से ग्रसित होते हैं, जिनके मस्तिष्क अत्यंत कंडीशंड होते हैं और वे अत्यंत आलसी और पुरातनपंथी होते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग अत्यंत महत्वाकांक्षी व दबंग प्रवृत्ति के होते हैं और ये लोग एक दूसरे को अपने महत्वाकांक्षाओं और प्रतिद्वंदिता से नष्ट कर देते हैं। ये दोनों ही प्रकार के लोग सहजयोग में प्रवेश के लिये कठिन साबित होते हैं। जो लोग मध्य
में होते हैं वे सहजयोग में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। इसके अतिरिक्त जो लोग कुछ कम जटिल होते हैं….. गांव के लोगों की तरह सरल हृदय के होते हैं वे भी सहजयोग में सरलता से प्रवेश कर पाते हैं और उन्हें किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती है। देखिये मैंने शहरों में इतनी मेहनत की है लेकिन आज यहां केवल दो सौ या तीन सौ लोग बैठे हैं परंतु यदि मैं इतना परिश्रम गांवों में करती तो आज यहां
5-6000 लोग बैठे होते और उनको उनका आत्मसाक्षात्कार भी सरलता से ही प्राप्त हो जाता। क्योंकि यहां लोग काफी व्यस्त रहते हैं, उनको बहुत सारे काम होते हैं। वे सोचते हैं कि परमात्मा को प्राप्त करने से अच्छा कुछ और महत्वपूर्ण कार्य कर लिये जांय।
ऐसी परिस्थितियों में सहजयोग अत्यंत मधुरता से साधकों के दिलों में अपनी जड़ें जमा लेता है। ये अत्यंत सहजता से ….. त्वरित रूप से कार्य करता है। आपको आपका आत्मसाक्षात्कार भी बिना प्रयास के, बिना कोई पैसा वैसा दिये हुये और बिना किसी कठिन अभ्यास के ही सरलता से प्राप्त हो जाता है।
लेकिन जब हम कल्कि की बात करते हैं तो आपको याद रखना होगा कि आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने और परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश करने से बीच हम काफी लड़खड़ा सकते हैं। इसको योगभ्रष्ट स्थिति कहते हैं। लोग योग प्राप्त करते हैं लेकिन फिर भी अपनी प्रवृत्तियों को छोड़ नहीं पाते हैं। उदाहरण के लिये अहंवादी लोग या पैसे के पीछे भागने वाले लोग या प्रभुत्व जमाने वाले लोग अपना एक
समूह बना लेते हैं। वे उन लोगों का समूह बनाकर, अपने विचारों से उनपर प्रभुत्व जमाते हैं और उऩका पतन होता चला जाता है। बाकी लोग भी उनके साथ ही गिरते चले जाते हैं। सहजयोग में भी। मुंबई में भी अक्सर ये सब होता रहा है… ये बहुत ही सामान्य सी बात है। लेकिन इसको योगभ्रष्ट स्थिति कहते हैं जहां पर एक व्यक्ति अपने योग से च्युत हो जाता है और नीचे गिर जाता है। सहजयोग आपको स्वतंत्रता
देता है कि आप गिरना चाहते हैं या ऊपर जाना चाहते हैं।
लेकिन यदि आप किसी गुरू के पास जाते हैं और किसी अन्य प्रकार का योग करना चाहते हैं जिसमें शुद्धीकरण किया जाता है और जिसमें लोगों को बाल्यकाल से ही प्रशिक्षित व अनुशासित किया जाता है। इस प्रकार के योग में गुरू ये चाहेगा कि आपको इतनी बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाय कि आप किसी अन्य के साथ संबंध ही न रख सकें। वे आपके उस व्यक्तित्व को ही नष्ट कर डालते हैं और उन्हें बाहर निकाल
फेंकते हैं। लेकिन यहां आपकी स्वतंत्रता में आपको समझाया जाता है कि आपको मेन से संबंध जोड़े रखना है… अपने ग्रुप से जुड़े रहना है …… संपूर्ण के साथ जुड़े रहना है न कि किसी एक व्यक्ति के साथ जो आप लोगों पर प्रभुत्व जमाना चाहता हो।
श्रीमाताजी निर्मला देवी।