The Meaning of Yoga

London (England)

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The Meaning Of Yoga Date : 11th November 1979 Place : London Туре Public Program Speech

[Translation from English to Hindi, Scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

सहजयोग आपके अन्दर जीवाणु की तरह आड़ोलन एक के बाद एक क्रिया आदि एक से विद्यमान है । यह आपके अन्दर जन्मी हुई दूसरी तरह के आड़ोलन के माध्यम से होता चीज है। व्यक्ति के अन्दर ये अन्तर्जात होती है जो अवययों में मौजूद है जैसे पेट स्वतः स्वतः इसका अंकुरण होता है अभिव्यक्ति होती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे सब आपके मस्तिष्क से आता है । अनुकंपी आप छोटे से बीज को अंकुरित होकर वृक्ष नाडीतन्त्र और पराअनुकम्पी नाड़ी तन्त्र बनते (Sympathetic, और खाए हुए पदार्थ को नीचे को धकेलता है। ये देखते हैं। यही सहजयोग है। अन्य Parasympathetic) हुए सभी योग जो इसके साथ-साथ चलते हैं, वे गतिशील हो उठते हैं और इसे कार्यान्वित सब सहजयोग के ही अंग-प्रत्यंग हैं। इन्हें करते हैं। ये एक बहुत बड़ी प्रणाली है और इससे अलग नहीं किया जा सकता। मुझे एक बहुत बड़ी संस्था है जो ये कार्य कर लगता है कि लोगों में कुछ गलत-फहमी है। रही है। आप यदि इसे पृथक करना चाहें तो योग के चार अंग होते हैं। ये सोचना भी पाचन प्रणाली भिन्न है मस्तिष्क प्रणाली । भिन्न है, स्नायु प्रणाली भिन्न है । आप इन्हें गलतफहमी न होगी कि वे अलग- अलग हैं जब हम कहते हैं कि हमने खाना खाया है इस तरह से अलग नहीं कर सकते कि तो इसका अर्थ ये नहीं होता कि बोल्ट की आपका मस्तिष्क एक तरफ लटका रहे तथा तरह से ये हमारे शरीर में चला गया और पाचन प्रणाली दूसरी ओर । इस जीवन्त फिर बोल्ट की तरह से ही शरीर से बाहर संस्था का ये समग्र रूप है ये संस्था एक निकल गया क्या ऐसा हो सकता है? दूसरे अवयव को समझती है और उनकी इसका अर्थ ये है कि आपने अपने मुँह में इस माँगों पर प्रतिक्रिया करती है इस प्रणाली खाने को चखा, इसका अर्थ ये है कि अपने को आप अलग- अलग नहीं कर सकते। मुँह में आपने लार (Saliva) का उत्सर्जन परन्तु हमारे मस्तिष्क इतने विधटित किया और बाद में यह अन्य अवयवों में गया, (Disintegrated) है या ये कहें कि हमारे वाहिका (Trachea ) में से गुजरा फिर ग्रास नली (Oesophagus) में से पेट के एक भाग विघटित करने में इतने कुशल हैं कि हम में पहुँचा, फिर छोटी-आँत में गया और इस जीवन्त चीज़ तत्पश्चात् बड़ी आँत में पहुँचा। यह सारा विघटित कर देना चाहते हैं। योग संस्था अन्दर की और बाहर की हर चीज़ को योग (Yoga) को भी मृत

ये शरीर जीवन्त है ये मृत शरीर नहीं है । प्रक्रिया होने के जो भी चीज़ जीवन्त है उसकी भली-भाँति कारण आप इसके विषय में कुछ नहीं कर देखभाल होती है, उसका आयोजन किया सकते। अतः यह सहज है । अधिक से जाता है और ये सब कार्य जीवन्त रूप से अधिक आप इसे थोड़ा बहुत इधर-उधर कर किया जाता है। ये बात आप नहीं समझ पाते सकते हैं, थोड़ा बहुत धकेल सकते हैं, बस। क्योंकि हम मृत चीजों पर ही कार्य करते हैं । नहीं है। यह एक जीवन्त प्रक्रिया है पूर्णतः जीवन्त प्रक्रिया। जीवन्त 1 जैसे एक पेड़ बढ़ रहा है। जापान में लोग मान लो मुझे ये यन्त्र चालू करना है तो मुझे पेड़ को एक विशेष आकार देना चाहते हैं तो इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि इसकी वे पहले एक डाली को काटते हैं, उसे कुछ एक तार है जो मुझे ऊर्जा स्रोत से जोडनी ज्यादा मोड़ देते हैं, फिर दूसरी डाली को पड़ेगी, तभी ये यंत्र कार्य करेगा मैं सदैव | हैं और इस प्रकार से कहती हूँ कि सहजयोग ऐसा ही है कि आप काटकर उसे मोडते पेड़ को विशेष आकार देते हैं। परन्तु जो भी अपनी तार को निकालकर ऊर्जा स्रोत से चीज़ जीवन्त है वह हमारे अन्दर बहुत सी जोड़ दें। परन्तु क्या आप सोचते हैं कि ये जटिल संस्थाओं के साथ मिलकर स्वतः ही इतना सुगम है? क्या आपको इस बात पर कार्यरत है। ये संस्थाएं भी जीवन्त हैं और विश्वास है कि आपने कुण्डलिनी को वहाँ से उन्हें इस बात का ज्ञान है कि वे क्या कर उठाकर सहजयोग से जोड़ देना है? बात रही हैं। उदाहरण के रूप में आपका शरीर ऐसी नहीं है जब कुण्डलिनी का अंकुरण मेरे प्रति आपकी तर्कबुद्धि से कहीं अधिक आरम्भ होता है, जब जागृति आरम्भ होती है चेतन है। मान लो आप भूत-बाधित व्यक्ति तो यह भिन्न चक्रों में से गुजरती है। कैसे? हैं परन्तु आप ये स्वीकार नहीं करेंगे कि आप रीढ़ के अन्तिम छोर पर विद्यमान कुण्डलिनी भूत-बाधित हैं। आप इस बात को स्वीकार के ऊपर उठने की व्याख्या आप किस प्रकार नहीं करें गे। मैं भी ऐसी कोई बात नहीं करते हैं ? अब यदि मैं आपसे बताऊं कि यह कहूंगी क्योंकि इस प्रकार की किसी भी आपकी पाचन प्रणाली से भी कहीं अधिक है अन्दर विद्यमान चीज को मैं नहीं लेना क्योंकि ण्डलिनी जो कि एक ऊर्जा मात्र है चाहूंगी। मानव प्रकृति का मुझे ज्ञान है उन्हें यह सोचती है, समझती है, आपको प्रेम यदि इस तरह की कोई चीज बताई जाएगी करती है आपके इस जीवन के विषय में तो आप निश्चित रूप से अपने लिए कष्ट को और पूर्व जन्मों के विषय में सभी कुछ बुलावा देंगे। इसलिए मैं आपको ये बातें नहीं जानती है। वह यदि इतनी समर्थ है, यदि वह सब कुछ जानती है, अपने आपमें यदि वह पूर्ण संस्था है और उसे यदि उठकर कु बताती। परन्तु शरीर मुझे पहचानता है जब आप मेरे सम्मुख आते हैं तो यह थर-थर काँपता है। बात सत्य है या नहीं आप मुझे आपके सिर तक आना है तो क्या ये सुगम बताएं । कार्य है? ये कठिनतम कार्य है । कहीं यदि

आपको कोई पत्थर पडा मिले तो इसे द्वारा कल्पना किया जाने वाला आदर्शतम उठाकर आप जहाँ चाहे फेंक सकते हैं। ऐसा व्यक्तित्व है। यह किसी भी प्रकार की करना क्या सुगम नहीं है? एक छोटा सा मूर्खता, झूठ, असत्य आदि किसी भी चीज कीडा भी इस बात को जानता है कि अपना को बर्दाश्त नहीं करती । यह निर्मल है, आप जीवन बचाने के लिए उसकी ओर आते हुए इसे निर्मल कह सकते हैं। यह पावन है। यह सॉड के रास्ते से किस ओर हट जाना है। पावनता का अवतरण है। यह पावनता की साँड यदि कहीं बैठ जाए तो उसे वहाँ से मूर्ति है किसी भी प्रकार की बेवकूफी को यह स्वीकार नहीं करती और न ही यह उठा पाना असंभव है। अपने स्तर पर आप जो चाहे प्रयत्न करते रहें । भारत में यह किसी भी प्रकार का समझौता करती है। ये कार्य करने के लिए बहुत से उग्र तरीके हैं। आपके अन्दर विद्यमान है आप देखें कि आप लाल मिर्चे जलाकर उनका धुँआ आप बैल कितने सुन्दर हैं? किसी भी चीज़ का इसे की नाक में सुंघा दें केवल तभी सॉड वहाँ से भय नहीं है। न इसे किसी चक्कर में फँसाया उठेगा अन्यथा जो चाहे करते रहें साँड वहाँ जा सकता है, न इसे सम्मोहित किया जा से नहीं उठेगा। अत्यन्त आनन्द पूर्वक वो सकता है और न किसी चीज से इसे वहाँ पर बैठा रहेगा कभी-कभी इस तरह प्रलोभित किया जा सकता है। ये प्रेम करती के बैलों से भी आपका वास्ता पड़ता है, है। परन्तु इसका प्रेम इतना पावन है कि कभी-कभी ऐसा भी होता है। परन्तु इस अपने प्रेम से अधिक पावन इसके लिए कुछ कुण्डलिनी को जागृत करना, जो कि सोचती भी नहीं है। किसी भी मामले में ये समझौता है, समझती है, हर व्यक्ति की व्यक्तिगत माँ नहीं करती और यही आपको आपका है, चाहे जब-जब भी उसने जन्म लिया हो, आत्म-साक्षात्कार देती है। अब तक जो जो आपके विषय में सभी कुछ जानती है. मानव इसके विषय में जानते हैं उन्हें उसे आपको सर्वाधिक प्रेम करती है, वही आपको प्रसन्न करने के तरीके खोजने होंगे। कौन आत्म-साक्षात्कार देती है, आपको आपका सी चीज इसे नाराज करती है? क्यों ये पुनर्जन्म देती है। तो ये आपकी माँ है। तो उठना नहीं चाहती? उन्हें तौर-तरीके इस प्रकार की कुण्डलिनी जो हमारे अन्दर खोजने पड़े और इस खोज के परिणाम विद्यमान है उसे उठा पाना तो कठिनतम स्वरूप भिन्न प्रकार के योग सामने आए जैसे होना ही चाहिए । यही कारण कहते हैं कि कुण्डलिनी को उठाना अत्यन्त योग को आप क्रियायोग कहते हैं। मेरे दुष्कर है ये बात ठीक है। अतः व्यक्ति को विचार से क्रिया और राजयोग एक ही चीज साँड को उठाने के तरीके खोज निकालने है, इनकी एक ही शैली है, तथा भक्तियोग, होंगे। क्योंकि कुण्डलिनी पूर्ण धर्मपरायणता ज्ञानयोग और ‘कर्मयोग’ इन सब विधियों को है, पूर्ण पावनता है । आपके मस्तिष्क मानव साँड को उठाने के लिए उपयोग 1 है कि लोग ‘राजयोग’, ‘हठयोग’ आदि तीसरी प्रकार के

करना चाहता है। कहने से मेरा अभिप्राय है और दृढ़ता से अपने स्थान पर जम जाएगा। कि इन सब तरीकों से व्यक्ति कुण्ठित हो बूडू से यह उठेगा नहीं । अतः लोगों को वह जाता है और स्वयं को समीपतम वृक्ष से उपाय खोजना होगा शीर्षासन में खड़े होने फाँसी लगा लेना चाहता है। तो यह एक से भी बैल नहीं उठेगा, नहीं ये नहीं उठेगा, अन्य प्रकार का कुण्ठित रोग है । इनके चाहे आप अपनी गर्दन तोड़ लें ये नहीं अतिरिक्त परपीड़नशील योग (Sadistic उठेगा । Yoga) है फिर पीटने वाला योग (Beating तो हमें क्या करना चाहिए? हमें इस बात Yoga) है और इस प्रकार से ये चलता रहता है एक चीज़ से दूसरी बेहतर चीज़ विद्यमान कुण्डलिनी क्या है? ये सभी योग तक जाना फिर धर्मान्धता । क्योंकि मानव के जो प्रचलन में आए हैं ये लोगों के अनुभकों लिए चैन से बैठना अत्यन्त कठिन है । उन्हें से पनपे हैं क्योंकि जब लोगों ने इस चुनौती मिलती है, ‘ओह, ये साँड नहीं कुण्डलिनी को उठाने का तथाकथित प्रयत्न का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए के हमारे अन्दर इसे उठाऊंगा । जबकि उन्हें किया तो वे मेंढक की तरह से उछलने लगे । उठता मैं इसका अधिकार नहीं होता जो लोग इसका ये परिणाम निकाला गया कि मेंढक आत्म-साक्षात्कारी भी हैं, उन्हें भी इसका की तरह से उछलने से कुण्डलिनी उठ जाती ज्ञान नहीं है क्योंकि उन्होंने कुण्डलिनी का है फिर कुछ लोगों ने अपने वस्त्र उतारने सृजन नहीं किया, बिल्कुल वैसे ही जैसे ये शुरु कर दिए। इस प्रकार की अटपटी चीजें मशीनरी मुझे मिल भी जाए तो भी मैं इसे शुरु कर दीं उनमें से गर्मी निकलने लगी चलाना, इसका उपयोग करना नहीं जानती, इसलिए उन्होंने सोचा कि यदि हम वस्त्र चाहे मैं प्रयत्न करती रहूँ। हो सकता है, इस प्रयत्न में मैं अपने हाथ ही जला लूँ। अतः कुछ अन्य लोगों को पेट में एक प्रकार की उतार देंगे तो हमें परमात्मा मिल जाएंगे। पकड़ महसूस हुई या कुछ लोगों को अपने के योगों को इस विश्व में जन्म देते हैं और अन्दर ये सब चीजें घटित होती हुई दिखाई हर व्यक्ति इस बात से आश्चर्य-चकित है देने लगती है उन्होंने इसे मूलबन्ध का नाम कि इतने सारे योग किस प्रकार हो सकते दिया। उन्होंने कहा कि बन्ध लग गया है । इस प्रकार के उल्टे-सीधे प्रयत्न बहुत प्रकार हमें यह योग अपनाना चाहिए कि वो किसी चीज ने वहाँ पकड लिया है। तो योग? को मानना चाहिए या महावीर को क्रिया योग ये है कि आप अपनी जिह्वा को बुद्ध या ईसा- मसीह को या किसी अन्य को। सब है क्या? इसके बाद ‘चर्चयोग’ और बुडू उसके तन्तु को नीचे से काटकर जिह्वा को (Budu) है और जादू टोने (Witch Craft) में ऊपर की ओर घुमाएं जहाँ ये गले की जड़ भी क्या हानि है, ये बात उस दिन किसी ने में स्थित छोटी जिह्वा को दबाए। प्रायः वे कही। कोई बुराई नहीं परन्तु इनसे साँड अपनी जिहवा को घुमाने में ही ल गे रहते हैं ये यहाँ से लेकर मेरे कहने से तात्पर्य ये है कि य

लोग अपनी ठीक हैं। ये बात समझने का प्रयत्न करें ये जिहवा को विशुद्धि चक्र तक ले जाते हैं वे बहुत साधारण है। आत्म साक्षात्कार प्राप्त सोचते हैं कि विशुद्धि यही है और उनकी ये करने के पश्चात् वे सब ठीक हो जाते हैं और यह चलता रहता है। सोच ही बहुत बड़ी समस्या है। तो वे अपनी परन्तु आत्म-साक्षात्कार से पूर्व वे सब गलत जिह्वा को पीछे गले की ओर धकेलते हैं और सोचते है कि इसे गुदगुदाने से वे चालू होने से पूर्व यदि आप उसका ब्रेक कुण्डलिनी को उठा लेंगे हम बिल्कुल दबाएं या उसका स्टीयरिंग धुमाएं तो आप इससे भिन्न कर रहे हैं प्रभाव कारण जड़ है। बिल्कुल वैसे ही जैसे कार का इंजन कार को खराब कर रहे हैं। कार का इंजन तक जाना होगा तभी आप प्रभाव तक जब चालू हो जाए और आपको कार चलानी पहुँचेंगे। क्या आप मेरी बात को समझ पाए भी आती हो, आप कार चलाने में कुशल हों हैं? विशुद्धि चक्र, जो कि यहाँ है और तब सब कुछ ठीक है। अन्यथा जिस कार में अत्यन्त सूक्ष्म है, यदि ये खराब हो जाए तो मुझे मेरे घर से आश्रम तक लाना था वह इसके प्रभाव महसूस होंगे। इसके कारण मुझे कहीं भी धोखा दे देगी। इसी प्रकार से आपकी जिह्वा प्रभावित हो आपकी आँखे प्रभावित हो सकती हैं. आपकी कोई अर्थ न था उन्हें आप आत्म साक्षात्कार नाक प्रभावित हो सकती है आपके गाल के बाद समझने लगते हैं । प्रभावित हो सकते हैं। कुल मिलाकर ये 16 पंखुड़ियों के प्रभाव हैं ये सभी प्रभावित हो हठयोग भी चक्रों पर आधारित होता है, सकती हैं। अपनी नाक को गुदगुदाने से इसमें कोई सन्देह नहीं। नि:सन्देह ये भी आप विशुद्धि चक्र को नहीं छू सकते। क्या ईश्वरीय प्रावधान पर आधारित है। सारे ऐसा नहीं है? क्या आप मेरी बात को समझ अष्टांग, हठयोग के आठों भाग, इन्हें आप रहे हैं? उदाहरण के रूप में जिस केन्द्र से मानव के नज़रिये से देखें । मानव के लिए यहाँ बिजली आ रही है उसे गुदगुदाने से हठयोग क्यों बनाया गया सर्वप्रथम इसलिए आप उसे ठीक नहीं कर सकते । आपको जड़ों तक जाना होगा किसी पेड़ पर यदि लगाएं अर्थात परमात्मा के अस्तित्व पर लोग आप देखते हैं कि कोई एक फल सड़ रहा है अपने चित्त को लगाएं अन्धविश्वासों पर या सारे फल सड़ रहे हैं तो फलों का इलाज नहीं। वे इस बात को समझे कि परमात्मा है करने से क्या आप उस रोग को ठीक कर ताकि व्यक्ति स्वयं को विनम्र बना सके सकते हैं? आपको जड़ों तक जाना होगा । सकती है, जिन चीजों का आत्म-साक्षात्कार से पूर्व आइए हठयोग का उदाहरण लेते हैं। कि वे अपने चित्त को ईश्वर के प्रावधान पर फिर आप किसी साक्षात्कारी व्यक्ति को गुरु तो जब इन लोगों ने ये सब मनुष्यों पर घटित होते हुए देखा तो उन्होंने बहुत सी कि वह व्यक्ति कम से क म आत्म – विधियाँ बना लीं। ये सभी गलत हैं और सभी साक्षात्कारी हो, कोई भी ऐरा-गैरा नत्थूखैरा मानकर उसके पास जाएं। गुरु का अर्थ है

गुरु बन बैठता है! ऐसा व्यक्ति मूर्ख है । गुरु सहजयोगी कुण्डलिनी को वैसे ही उठा लेते को आत्म-साक्षात्कारी होना ही चाहिए । यदि हैं, ये बात भिन्न है परन्तु अन्य कोई व्यक्ति वह आत्म – साक्षात्कारी है तो वह ऐसा ही इस कार्य को नहीं कर सकता। केवल आप कहेगा। वह अलग होने की बात नहीं करता, ही लोग इस कार्य को कर सकते हैं क्योंकि वह अधिकार की बात करता है क्योंकि वह अधिकारी है । जो लोग अलग होने की बात आप अधिकारी हैं और तुरन्त कुण्डलिनी को उठा लेते हैं। इन हठयोगियों ने क्या किया रोने-बिलबिलाने आदि की बातें कि इसे शारीरिक स्तर पर ही उभारा। अत: करते करते हैं वो भी अन्य लोगों की तरह से आपको ईश्वरीय प्रावधान (यम, नियम) का अन्धे हैं। उन्हें आपका नेतृत्व करने का कोई ज्ञान होना चाहिए। और वो भी पच्चीस वर्ष अधिकार नहीं। इस मामले पर विनम्रता की की आयु से पूर्व पच्चीस वर्ष की आयु से कोई बात नहीं। कहने का अभिप्राय ये है कि पूर्व आपको स्वयं को अनुशासित कर लेना मेरे पास यदि लाल शाल है तो मुझे कहना चाहिए अर्थात आपको ये समझ लेना चाहिए चाहिए मेरे पास लाल शाल है। इसमें कि उचित क्या है और अनुचित क्या है| अब विनम्रता की क्या बात है? मेरा अभिप्राय ये है जिन लोगों ने पन्द्रह वर्ष की आयु तक कि आप जो हैं वही बताने में क्या हानि है। दुनिया के सभी कुकृत्य कर लिए हैं वे अब आप यदि वह नहीं है, जब आपमें वह गुण पच्चीस वर्ष की आयु में यम नियम सीखने नहीं है फिर भी यदि आप अपने को वह बताते हैं तो यह अहंकार है। परन्तु यदि कार्य कर सकते हैं, मुझे बताएं। मान लो कि का प्रयत्न कर रहे हैं! किस प्रकार आप ये आप बह हैं तो आपको यह कहना चाहिए कि कार को आपने पूरी तरह से खराब कर “मैं ही प्रकाश हूँ, मैं ही मार्ग हूँ । कहने से दिया है तो आप अधिक से अधिक इसकी मेरा अभिप्राय ये है कि ऐसा कहते हुए बीमा की रकम के लिए ही तो कह सकते हैं । ईसा-मसीह अहंकार नहीं कर रहे थे । इसमें वो भी यदि आपने बीमे की किस्त चुकाई बुरा मानने की क्या बात है? तो हठ योग भी यदि करना हो तो सकते हैं कि कार बिल्कुल नई की नई हो आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति के मार्ग दर्शन में जाए जैसे फैक्ट्री से आई हो, बिल्कुल नई करना चाहिए, केवल आत्म साक्षात्कारी हो जाए! जिस घोड़े का दुरुपयोग किया व्यक्ति के मार्ग दर्शन में ही नहीं परन्तु उस हो। अब किस प्रकार आप ये आशा कर गया हो क्या वह दौड़ जीत सकता है? यह व्यक्ति के मार्ग दर्शन में जिसने शक्ति पथ बात ठीक नहीं है। अतः यह समझना चाहिए की कला में कुशलता प्राप्त कर ली हो। कि यम नियम तथा अन्य चीजें हमारे लिए शक्ति-पथ की कला में जो कि कुण्डलिनी नहीं हैं, विशेष रूप से पार्चात्य लोगों के जागृति है। पथ प्रदर्शक व्यक्ति में कम से लिए तो यह किसी भी प्रकार से नहीं हैं। हमें कम ये योग्यता होनी चाहिए। निःसन्देह यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए चाहे 和

प्रयोग करते हुए या जैसे भी। हमने बहुत सी करने का क्या लाभ है? इसका उन पर बहुत गलतियाँ कर ली हैं और अब भी प्रयोग दबाव पड़ेगा क्योंकि उनमें से कोई भी (Experiment) किए चले जा रहे हैं। मैं पुनः आत्मसाक्षात्कारी नहीं है और न ही वो वही शब्द कहूंगी कि हमने जो भी किया है शक्ति पथ में कुशल हैं। इसीलिए कहा गया उससे स्वयं को, अपने शरीर को हानि था कि आपको किसी ऐसे गुरु के पास पहुँचाई है क्योंकि हमारा पथ प्रदर्शन करने जाना पड़ेगा जो आत्मसाक्षात्कारी हो आप वाला कोई भी न था। हम स्वयं को हानि जंगलों में जाएं और पच्चीस साल तक वहाँ बहुत पहुँचाना नहीं चाहते थे परन्तु गलती से ऐसा रहें और उस गुरु के पथ प्रदर्शन में अभ्यास हो गया, अब क्या करें? ये बड़ा गम्भीर करें पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। ब्रह्मचर्यमय मामला है लोग बीमार हैं वे हढ योग नहीं वालावरण में रहें । कर सकते। सारा वातावरण रोगी है. पूरा स्थान रोगी है! उन्हें प्रेम की आवश्यकता है, जीभ को बाहर निकालना, जीभ के व्यायाम की नहीं। उन्हें स्काउट स की काटकर उसे पीछे को मोड़कर विशुद्धि चक्र आवश्यकता नहीं है, उन्हें तो ऐसा व्यक्ति को गुदगुदाना मैं नहीं समझ पाती। कभी- चाहिए जो उन्हें प्रेम कर सके, रोगमुक्त कर कभी तो आपकी तर्क बुद्धि बिल्कुल ही चली सके और उन्हें स्थापित कर सके । आजकल हठ योग में प्रेम का एक शब्द सोचते हैं कि आप अपने अन्दर की इस भी नहीं है क्योंकि लोग इसके लिए पैसा महान शक्ति को जागृत कर लेंगे? उस देते हैं। केवल एक चीज़ है-प्रेम, प्रेम ही शक्ति को जो सदसदविवेक है और जो हर केवल एक चीज़ है जिसे पैसे से खरीदा नहीं चीज को समझती है। इस तरह से आप जा सकता। क्या ये बात सच नहीं है? प्रेम उसको बेवकूफ नहीं बना सकते। तो ये सब के लिए किस प्रकार आप धन दे सकते हैं। हथकडे जो हम अपने पर आजमा रहे हैं, यही कारण है कि आज का हठ योग मात्र स्वयं को एक मामले में थोपना या दूसरे मिथ्या है परन्तु आत्म साक्षात्कार के मामले में थोपना आदि. इससे आप अपने पश्चात् आप हठ योग का उपयोग कर यंत्र को खराब करने के अतिरिक्त कुछ भी सकते हैं क्योंकि आप पावन हो जाते हैं. नहीं कर रहे । कुण्डलिनी जब विशुद्धि चक्र स्वच्छ हो जाते हैं, आपके जख्म ठीक हो से उठती है तो चक्र का विस्तरण (Dilation) जाते है, भर जाते हैं। लोग जख्मी हैं, गहन होता है। तब आपकी जिह्वा स्वतः ही अन्दर चोट खाए हुए हैं बहुत दुखी हैं। आपके को खिंच जाती है और आपकी आँखों का स्पर्श मात्र को बो महसूस करेंगे। उनमें जब भी विस्तरण हो जाता है। मुझे आशा है कि स्वयं को सम्भालने की शक्ति ही नहीं है तो कुण्डलिनी जागृति के लिए ऑँखों का उनसे बड़ी-बड़ी चीज़ों के विषय में बात विस्तरण करने के लिए वे आँखों में अब क्रियायोग पर आते हैं। क्रिया योग में तन्तु को जाती है। इस प्रकार के कार्यों से आप

एप्ट्रोफिन ( Aptrophin ) नहीं डालते। ये सारी चीजें स्वतः घटित होती हैं। होगा मैं यदि निराश होकर इस यंत्र में यहाँ गुजरनी है अत: विद्युत को इसमें से बहना तो बन्ध लग जाते हैं। बन्ध के कुण्डलिनी को पकड़ लेता है, चक्रों को छेड़ने लगू या तोड़ने लगू तो इसमें से पकड़ लेता है। कुण्डलिनी जब ऊपर को विद्युत नहीं प्रवाहित होगी केवल ये यन्त्र कारण पेट से फूँक मारना शुरु कर दूँ या यहाँ से इसे आती हैं तो स्वतः ही चक्र बन्द हो जाते हैं समाप्त हो जाएगा। क्या आप मेरे स्पष्ट ताकि ये ऊर्जा ऊर्ध्वगति की ओर रहे विचार को समझ गए है? ये बात बहुत स्पष्ट न जा सके। ये सारी चीजें हमारे है कि यदि आप अपने यन्त्र को बिगाड़ने का अधोगति में अन्दर स्वतः घटित होती हैं, बन्ध भी लगते प्रयत्न करेंगे तो अपने अन्दर की शक्ति को हैं। हो सकता है कि कुछ परा चेतन व्यक्ति जगा नहीं पाएंगे। गुरु यदि आत्मसाक्षात्कारी अपने अन्दर देख पाते हों और ये सोचने होता तो वो आपको बताता। सर्वप्रथम वह लगते हैं । कि आप यदि पेट को इस प्रकार आपकी कुण्डलिनी उठाता. कम से कम खीचें, अपनी जीभ अन्दर की ओर मोडे तो आपकी कुण्डलिनी उठाता और आपसे ये चीजें घटित हो जाएंगी। परन्तु कुण्डलिनी कहता शनैः शनैः कुण्डलिनी को उठने के जागृति द्वारा ही ये सब घटित होता है। इन लिए आप मार्ग बनाए। लोग जब कुण्डलिनी सब चीजों द्वारा कुण्डलिनी की जागृति नहीं को उठाने का प्रयत्न करते हैं तो वे इसे होती। अब क्या आप मेरी बात समझ पाए? क्या आपने मेरी बात समझी? अब ये स्पष्ट मूलाधार को तो छू नहीं सकते। अत: ये है। यही कारण है कि ये क्रिया योग आरम्भ लोग कुण्डलिनी को ज्यादा से ज्यादा नाभि हुए। मेंढक की तरह से कूदना आरम्भ हुआ, तक ला पाते हैं। परन्तु अब इसे वहाँ पर यहाँ तक कि निर्वस्त्र रहने का भी आरम्भ रोका किस प्रकार जाए? तब वो कहेंगे खाना हुआ। ये सभी चीजें उन लोगों के कारण है कम खाओ, अपने चित्त को इधर-उधर मत जो अनाधिकार कुण्डलिनी को उटाने का भटकने दो एक-एक चक्र पर उठाते हैं। निःसन्देह वे । आप खाना कम खाओ ताकि प्रयत्न कर रहे हैं। केन्द्रों में जब यह उठती आपका चित्त खाने पर ही न बना रहे। स्वयं है तब ये सारी चीजें घटित होती हैं परन्तु को निर्लिप्त बनाए रखो। ये सारे कार्य वे यदि आपका स्वास्थ्य ठीक न हो, आप बीमार पच्चीस वर्ष से पूर्व की आयु में करवाते हैं। हो, आपके शरीर की देखभाल करने के लिएबहुत अधिक भूखे भी न रहो. नियमित समय आपका हृदय बहुत परिश्रम कर रहा हो और पर खाओ, चित्त को बहुत अधिक बाहर की ऐसी स्थिति में आप यदि धोर परिश्रम वाले ओर मत रखो ताकि चित्त वहीं पर रहे और इन कार्यों को करें, इन सभी उपायों को कुण्डलिनी ने पच्चीस वर्षों में जो एक इंच उपयोग करें तो आप अपने शरीर -यन्त्र को का थोड़ा सा उत्थान किया है वह कहीं वहाँ खराब करते हैं। इसमें से विद्युत ऊर्जा से भी नीचे न चली जाए। बार-बार वो जन्म

लेते हैं और कीड़ी की चाल से अपने उत्थान विषय में वो सोच नहीं सकते। अतः महा की ओर चलते हैं और इन सब तरीकों से वो काव्य इसी प्रकार से भिन्न होते हैं जब हम आपकी कुण्डलिनी को वहाँ रोकते हैं और ये चीजें सीखने के लिए जाते हैं तब हम कहते हैं अधार्मिक जीवन मत बिताओ। अपने तथा-कथित गुरुओं को देखते है आपको अत्यन्त धर्मपरायणतामय जीवन उनके जीवन को देखते हैं और हमारे अन्दर बिताना होगा घोड़े को जब प्रशिक्षित करना वैसी ही छाप रह जाती है । बिना ज्योतिर्मय होता है तो उससे पूर्व कि वो दौड में भाग हुए वे आपको कुछ भी सिखा नहीं सकते। ले उसकी आँखों के इर्द-गिर्द दो पर्दे लगा देते है। परन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण महान सन्तों ने वर्णन किया है कि ये दादा-दादी का प्रेम हुआ करता था जो जलन्धर योग और जलन्धर बन्ध तथा अन्य ये क्रिया योग भी ऐसा ही है। भारत के बच्चों की देखभाल किया करते थे गुरु का सभी पेट में घटित होते हैं अर्थात ये सभी प्रेम उसका प्रशिक्षण तथा आत्मानुशासन भी बन्ध पेट में और हृदय में बनते हैं और ये महत्वपूर्ण है । जो गुरु आपसे पैसा लेते हैं सभी ग्रंन्थियाँ टूटती हैं। इसी बात का वर्णन क्या वे आपको व्यापार प्रबन्धन, उल्टे-सीधे किया गया है। कुण्डलिनी जब उठती है तो तरीकों और धोखाधड़ी में प्रशिक्षण दे रहे ये सब चीजें आपमें भी घटित होती है। मैं हैं? उनके सच्चे गुरुओं के, जीवन उनके क्योंकि अत्यन्त कुशल स्वामिनी हूँ इसलिए प्रे म, ज्ञान एवं सूझ-बूझ से इस प्रकार ये सब आपमें भी घटित होता है। जब तक परिपूर्ण हैं कि लोगों के चरित्र एवं व्यक्तित्व मैं कार्य समाप्त नहीं कर लेती मैं इसे आप पर नहीं छोड़ती आपको तो बस इतना पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के रूप में भारत में अब कोई भी श्रीराम पर महाकाव्य नहीं लिख सकता क्यों कि अब पूर्ण स्वतन्त्रता पूर्वक चुनना होता है। भारत में कोई राम बचे ही नहीं हैं । संभवतः आपको केवल पूर्णतः स्वतन्त्र होना होता है। अब कोई आए भी नहीं। कोई भी इस प्रकार अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता में सहजयोग स्वीकार करना होता है, आत्म-साक्षात्कार के पथ को | का महाकाव्य नहीं लिखता। लोग अब केवल करना होता है और अगर मुझे लगता है कहानियाँ लिखते हैं। भारत में कविताएं भी कि अपनी पूर्ण स्वतंत्रता में आपने इसे ऐसी लिखी जा रही हैं जैसे आपके लार्ड- नहीं चाहा तो आप बहुत तेजी से सहज बायरन लिखा करते थे। अब श्रीमान बायरन से बाहर चले जाते हैं। आप इसमें रहते ने भारत में जन्म ले लिया है। मेरे विचार से ही नहीं, आप स्वयं ही दौड़ जाते हैं, उन्होंने आपका देश छोड़ दिया है! उसी और यदि ऐसा नहीं होता तो मैं इस प्रकार से साहित्य में सारी गतिशीलता बात का ध्यान रखती हूँ कि आप स्वयं समाप्त हो गई है क्योंकि लेखकों के सम्मुख ही दौड़ जाएं । कोई आदर्श नहीं है। किसी भी व्यक्तित्व के अंतः व्यक्ति को समझना चाहिए कि ये

सभी मार्ग, चाहे वह भक्ति मार्ग ही क्यों न उनसे दूर हो गए हैं अतः आप अपनी हो मैंने आपको तीन प्रकार के भक्तों के वंहगियों पर चले जाते हैं और वैसे ही पुनः विषय में बताया जो कामार्थ प्राप्ति के लिए असहज बन जाते हैं यह मात्र अभिनय है, आते हैं। मेरे पास बहुत से लोग रोग मुक्ति थोड़े समय के लिए परन्तु लम्बे समय तक के लिए आए यह अच्छी बात है, मेरे लिए यदि आप अभिनय किए चले जाएंगे तो ये यह अच्छा अवसर होता है। वे ठीक हो जाते वास्तविकता बन जाएगी। अभी तक आप हैं, उनमें प्रेम जागृत हो जाता है और वे खेल खेलते रहे, अब खेल समाप्त हो गया मुमुक्षु (मुक्ति प्राप्ति के लिए इच्छुक) बन है। अतः आपको स्वीकार करना होगा कि जाते हैं। ऐसे लोग महान सहजयोगी बन जाते हैं। भारत में ऐसे बहुत से सहजयोगी इसे प्राप्त कर लिया है । ये आपके अन्दर है, है जो महान सहजयोगी बन गए। आरम्भ में आप प्रकाश हैं, आपको ये बात स्वीकार वे इलाज के लिए आए और महान करनी होगी कि अब आप प्रकाश हैं, आप सहजयोगी बन गए। इन सभी अवस्थाओं को पहले जैसे नहीं हैं। एक पूष्प के रूप में आप अब आप महान हैं और अपने अन्दर आपने वो पार कर सकते हैं। परिवर्तित हो गए हैं । आपको स्वयं पर अतः व्यक्ति को समझना चाहिए कि यह विश्वास और भरोसा होना चाहिए क्योंकि महायोग का समय है जहाँ ये सब अन्तर्योग अभी तक तो आप सभी प्रकार के लोगों से अर्थात आन्तरिक घटनाएं स्वतः ही घटित एकरूप थे. बेवकूफी भरे उल्टे-सीधे अनुभवों होती हैं। मुझे आपकी कुण्डलिनी के साथ से जुड़े हुए थे। इस बात पर आप विश्वास कुछ करना होता है, काफी कुछ करना होता नहीं करना चाहते। आप यदि थोड़ा सा भी है और वो इस बात को अच्छी तरह से इस बात को स्वीकार कर लें, ठीक से इस जानती है। वह भी मुझे बहुत अच्छी तरह से पर चलें तो आप इसमें भली- भांति स्थापित जानती है इतना अच्छी तरह से कि मुझे हो जाएंगे। मैं यहाँ आपको इसका स्वामित्व देखते ही एकदम से उठकर ये सहस्रार पर देने के लिए हूँ इस सब पर पूर्ण स्वामित्व आ जाती है। ये इतनी प्रसन्न होती है कि देने के लिए। ये महायोग जब आपमें घटित त्यक्ति पर इसका पहला प्रभाव बहुत ही हो जाता है तो आपको किसी अन्य चीज की अच्छा पड़ता है। व्यक्ति को लगता है कि चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती। उसने पा लिया है । पूरे आनन्द के साथ ये सभी योग आपके चरणों में होंगे इस प्रकार ऊपर उठती है आप पा लेते हैं परन्तु पुनः से आप अपने हाथ उठाएं और कुण्डलिनी वंहगियों पर चले जाते हैं। यद्यपि आपके उठ जाएगी। ये सत्य है। आप इसे सारे कष्ट और सभी समस्याएं दूर हो जाती आजमाएं। कोई यदि बीमार है तो आप इस हैं फिर भी आप अपनी वंहगियों को पकड़े प्रकार से अपना हाथ रखें, वह व्यक्ति रखना चाहते हैं क्योंकि संस्कार वश आप ठीक हो जाएगा आप स्वयं आजमाएं। ये

महायोग है । सहजयोग का ये सर्वोच्च बिन्दु थी परन्तु आज कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू है। एक बार जब आप इसे प्राप्त कर लेंगे तो खैरा गधे की तरह से आपके कान में रेंकता आपको कुछ अन्य करने की आवश्यकता है और आप सोचते हैं कि ये बड़ी चीज नहीं रहेगी। आप वही बन जाते हैं क्योंकि है. मैं किसी को नहीं बताऊंगा कि मुझे कौन कुण्डलिनी वही बनाने के लिए कार्य करती सा मंत्र मिला है। ये लोग आपको बेवकूफ हैं और जब कोई चीज आपको पूर्णता प्रदान बनाने में लगे हैं, ये नहीं जानते ये स्वयं को करती है तो क्यों आप कुछ अन्य करें? सहजयोग में आने के पश्चात् आपके साथ हैं उसका इन्हें बहुत बड़ा मूल्य चुकाना जो भी घटित हुआ उसकी सूची मैं आपको संस्कृत-भाषा में देने वाली हूँ। जिस अवस्था जाते! व्यक्ति को बहुत सारी चीजें समझनी को प्राप्त करने के लिए लोगों को हजारों होती हैं जैसे आपका कुल-देवता क्या है? बहुत बेवकूफ बना रहे हैं जो कुकृत्य इन्होंने किए होगा। अंतः मंत्र इस प्रकार से नहीं लिए आपका अपना इष्ट देव कौन है? आपकी में ही प्राप्त हो गई है। ये स्वीकार करना जन्मपत्री क्या है? आप कौन से ग्रहों पर कठिन कार्य है कि इसे आपने सहज ही में पकड़ रहे हैं? इस स्थिति में मंत्र का दिया प्राप्त कर लिया। बिना सिर के भार खड़े हुए जाना, इसका समय, जन्म कुण्डली के समय या कोई अन्य व्यायाम किए हुए क्या ऐसा विशेष अनुसार निश्चित किया जाता है। नहीं है? परन्तु प्रतीक्षा करें और देखें कि जन्मकुण्डली का कौन सा समय गुरु की आपको क्या प्राप्त हुआ है नि:सन्देह कुछ जन्म कुण्डली से मिलता है? यही कारण था लोगों को ये अवस्था प्राप्त नहीं होती क्योंकि कि लोगों को मुश्किल से एक दो व्यक्ति प्राप्त होते थे । सन्त ज्ञानेश्वर ने भी अपने नहीं। यह कार्यान्वित हो जाएगा। परन्तु जीवनकाल में केवल एक व्यक्ति को नाम जिन्हें प्राप्त हो गया है, किसी विशेषता के दिया और यहाँ पर ये सभी ऐरे गैरे नत्थू कारण जिन्हें ये उपलब्धि प्राप्त हो गई है खैरे नाम बाँटे चले जा रहे हैं! मेरी समझ में उन्हें इस विशेषता को खोजना है अपने नही आता। क्या इन भयानक-भयानक नामों वर्ष कार्य करना पड़ता था वो आपको सहज य उनमें कोई समस्या होती है। कोई बात लिए आपने इसे खोजना है। इतनी आसानी के अतिरिक्त कुछ भी आसानी से उपलब्ध से आपको प्राप्त हो जाने का एक कारण है। नहीं है? ये नाम यदि मैं भारतीयों को मुझे किसी ने बताया कि एक गुरु है जो बताऊंगी तो वो सब समझ जाएंगे। इन मंत्र देता है. ये मूर्खता है। विदेशी साधकों को इन्होंने ऐसे नाम दिए आयु के अनुसार पूर्णतः मूर्खता। आप इस बात को स्वीकार जैसे ईगा पिंगा, ठिंगा। सभी नाम आप कर लें। कोई आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति सहजयोगियों के नियंत्रण में हैं, आप अपने आपको ये मंत्र नहीं देगा। यही कारण है कि मंत्र बना सकते हैं क्योंकि आपमें एक विशेष मंत्र देना एक बहुत बड़ी चीज समझी जाती प्रकार का गुण है जिसका उपयोग आप कर

सकते है। जो भी मंत्र आप लें वह जागृत मंत्र होता है, आप इस बात को जानते हैं। पर नहीं रख सकते हैं। किसी के हाथ पर रखने से पूर्व आपको सारे प्रबन्ध करने पड़ते हैं। परन्तु यदि आप सर्वशक्तिशाली बन अत्यन्त सुखद होता है कि यद्यपि अभी तक जाते हैं तब क्या होता है? आप के लिए सभी आप अपनी बाधाओं से मुक्त नहीं हुए होते कुछ बच्चों का खेल बन जाता है, सुगम हो जाता है आप कुण्डलिनी उठाते हैं आप इससे आपकी कुण्डलिनी उठाने की शैली जानते हैं कि भिन्न चक्र हैं, इन चक्रों को आप ठीक कर सकते हैं । इन्हें ठीक करने लोगों की कुण्डलिनी उठा सकते हैं, क्या ये का ज्ञान आपको है। यही कारण है कि यह महायोग है। इसे ऐसा होना पड़ता है। आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् ये कहना फिर भी आप इसे कार्यान्वित कर सकते हैं । पर कुछ भी हानि नहीं होती। आप अन्य बात सत्य नहीं हैं? अभी भी आप अन्य लोगों को आत्म-साक्षात्कार दे सकते हैं चाहे आप अन्यथा किस प्रकार हम इस विश्व की रक्षा बाधित ही क्यों न हों। लोग कहते हैं कि मैं करेंगे? किस प्रकार इस सृष्टि को व्यवस्थित भूत से लड़ रहा हूँ। परन्तु यहाँ पर एक हाथ किया जाएगा? इस बात का हमें पता लगाना से आप स्वतः ही कुण्डलिनी उठा लेते हैं। होगा कहने से अभिप्राय ये है कि परमात्मा परन्तु वहाँ बहुत सी आत्माएं आपको पकड़ने को इस बात का पता लगाना पड़ा कि किस का प्रयत्न करती हैं। यहाँ आप एक हाथ से प्रकार आप सब साधकों को आशीर्वादित उन आत्माओं को समाप्त करते हैं और दूसरे किया जा सके. किस प्रकार उनकी से कुण्डलिनी उठाते हैं! इतनी पावनता से (परमात्मा) की अभिव्यक्ति हो सके और जिन लोगों की कुण्डलिनी उठाई जाती है उनका कार्य पूर्ण हो । उन्हें भी कोई हानि नहीं होती। अतः मंत्र लेने या देने के लिए व्यक्ति को एक सप्ताह समाहित हैं । मानव अवस्था तक आने के तक निराहार रहना पड़ता है, बिना किसी लिए अब पाषाण युग (Stone Ages) में पुरुष या महिला की शक्ल देखे, सभी प्रकार जाने की आवश्यकता नहीं है। ये बात इस के कर्मकाण्ड करने के पश्चात् ही व्यक्ति प्रकार से है या आप ये कह सकते हैं कि को नाम प्राप्त होता है कुछ गुरु तो अपने भारत जाने के लिए अब मुझे कोलम्बस की शिष्यों को कहते हैं कि प्रतिदिन 108 बार तो यह महायोग है जिसमें सभी योग तरह से जाने की आवश्यकता नहीं है हाथ धोया करें मंत्र देने से पूर्व सभी प्रकार जिससे मैं अमरीका पहुँच जाऊ। (मार्ग की नेति क्रियाएं आदि करवाई जाती हैं। ये इतने सारे कर्मकाण्ड हैं, क्यों? क्योंकि आप सभी कुछ जानता है आपके पास आना जानने वाले व्यक्ति को जो इसके विषय में अत्यन्त दुर्बल (Vulnerable) हैं। ये फास्फोरस (ज्वलनशील पदार्थ) की तरह से किया हो और जो इस कार्य के सभी रहस्यों है और फास्फोरस को आप किसी के हाथ को जानता हो, आपको भली-भांति होगा- किसी ऐसे व्यक्ति को जिसने ये सब

पहचानता हो।) मैं मानव के विषय में अभी है कोई बात नहीं आपको मुझसे थोड़ा सा तक बहुत कुछ सीख रही हूँ। मैं सोचती हूँ सहयोग करना होगा और आपको आत्म- मुझे अभी भी बहुत कुछ सीखना है-बहुत साक्षात्कार प्राप्त हो जाएगा। आप अवश्य कुछ। क्योंकि मानव अत्यन्त विचित्र भी हो इसे प्राप्त करें ये मेरी इच्छा है। आपमें भी सकता है। ये बात आप नहीं जानते। मैं इस यदि ये इच्छा होगी तो हम एक ही स्थान पर प्रकार से व्यवहार करती हूँ परन्तु अचानक पहुँच जाएंगे। ये लोग इस शरीर यन्त्र को खराब है? कभी-कभी तो आप मानवों के व्यवहार करने के लिए कुछ चालाकियाँ अपनाते हैं। को देखकर मुझे लगता है कि यह मेरे लिए सम्मोहन करते हैं तथा सभी प्रकार के बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन है! ये बहुत ही उल्टे-सीधे कार्य करते हैं । आपके अन्दर दिलचस्प बात है बहुत ही दिलचस्प। मानव विराजमान कुण्डलिनी आपमें परमात्मा की मुझे लगता है कि हे परमात्मा ये सब क्या गुरु बहुत ही अजीब जीव है। उसका व्यवहार कभी भी एक ही तरह का नहीं होता। उसके आपके अन्दर यह परमात्मा की इच्छा है। विषय में निश्चित रूप से आप कभी भी कुछ केवल उसी इच्छा से इसे जागृत किया जा इच्छा है। ये परमात्मा के लिए इच्छा नहीं है। 11 नहीं कह सकते। आप नहीं जानते कि वो सकता है। परमात्मा की इच्छा को ही उठाया कब कैसा व्यवहार करे अत्यन्त दिलचस्प जा रहा है । परमात्मा की इच्छा ही शक्ति है लोग हैं। सहजयोग में आने के पश्चात् और परमात्मा का प्रेम ही उनकी इच्छा है। उनकी इच्छा है कि वे अपनी शक्तियाँ, अपना विषय में मैंने ये सब बैभव और प्रेम करने की सामर्थ्य आपको आपको भी बहुत आनन्द आएगा। भिन्न योगों के आपको बताया है फिर भी आपके कोई प्रदान करें। इसी इच्छा को आपके अन्दर प्रश्न है तो आप पूछ सकते हैं। परन्तु आपके स्थापित किया गया है और यह सुप्त है। जब प्रश्न विवेकपूर्ण होने चाहिएं। आप अपने ये जागृत होती है तो आपके अन्तस में उनकी प्रश्न पूछे क्योंकि मैंने ये सब आपको बहुत इच्छा पूर्ण होती है और आपकी पूर्ति हो जाती ही संक्षेप में बताया है। बाद में किसी वक्त है। जब तक आप परमात्मा नहीं है, आप मैं विस्तार में बताऊंगी। परमात्मा की इच्छा को नियंत्रित नहीं कर उत्तर-ये लामा आदि सब गलत हैं। अपने सकते। आत्म-साक्षात्कार के बाद परमात्मा बच्चों को मैं ये बात स्पष्ट बताना चाहती हूँ। आपको अपनी शक्तियाँ देता है जिनके द्वारा इन्होंने आप लोगों के लिए बहुत सी समस्याएं खड़ी कर दी हैं। आप सब लोगों अन्य लोगों की कुण्डलिनी आप उठा सकते हैं ने आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लिया है। एक क्योंकि ये परमात्मा की ही इच्छा है। यह साधक से श्रीमाताजी पूछती हैं कि तुम्हें महानतम उपलब्धि है जिसे व्यक्ति प्राप्त कर आप उनकी इच्छा का संचालन कर सकते हैं । अभी तक नहीं प्राप्त हुआ, थोड़ी सी समस्या सकता है क्या ऐसा नहीं है?

प्रश्न: आत्मसाक्षात्कार क्या है? मानव की उच्च कोटि के लोग थे इसीलिए आप रक्षा करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? क्या परमात्मा को खोज रहे थे, इसीलिए आपने अन्य लोगों की कुण्डलिनी उठाने से और इस देश में जन्म लिया पूरा विश्व परिवर्तित श्रीमाताजी आपको समझने से ही ये कार्य हो हो जाएगा एक दीपक पूरे कमरे में उजाला सकता है? कर सकता है परन्तु इसके लिए आपको उत्तरः आत्मसाक्षात्कार द्वारा आप प्रकाश बन अपनी बाती हर समय प्रज्जवलित रखनी जाते हैं, ठीक है? अतः आपको अन्य लोगों होगी ताकि इससे प्रकाश निकलता रहे । को ज्योतिर्मय करना होगा यह आपका एक अधिकतर विक्षिप्त लोग भयपीडित हैं, उनमें कार्य है इसे समझ जाने पर आप विराट को जटिलताएं हैं । क्योंकि वे कभी स्वयं को समझ जाएंगे। इसका पूर्ण ज्ञान आपको सुरक्षित नहीं समझते। जो देश युद्ध रत होना चाहिए। आपको अपना और अन्य हैं उसका कारण ये है कि वे अन्दर से लोगों का ज्ञान होना चाहिए और अन्य लोगों असुरक्षित महसूस करते हैं । क्योंकि उन्होंने को शुद्ध करने का आपको प्रयत्न करना स्वयं को नहीं समझा। यदि उन्होंने स्वयं को चाहिए। केवल सभी को स्वच्छ करने से, समझा होता तो वे दुखी न होते। आपमें सर्वत्र प्रकाश फैलाने से आप सभी कुछ विपुल वैभव छिपा हुआ है, क्या ये बात सत्य ज्योतिर्मय कर सकते हैं। क्या ये बात ठीक नहीं है? एक बार जब आप अपने वैभव को नहीं है? हमारे अन्दर जिस चीज की कमी है समझ जाएंगे तो कभी दुखी न होंगे और वह है ज्ञान और चेतना। एक बार जब आप पूरा विश्व अत्यन्त सुखमय होने वाला है। इन्हें प्राप्त कर लेंगे तो पूरा विश्व परिवर्तित आप यही सब खोज रहे थे क्या ऐसा नहीं हो जाएगा। आप इसी को खोज रहे थे पूरे है? आपका अपना वैभव है और अब आपने विश्व को आप परिवर्तित करना चाहते थे, इसी का ज्ञान प्राप्त करना है। उदाहरण के क्या आप इस बात को जानते हैं? आपने ये रूप में चाहे आप इस कमरे में आ जाएं फिर सब क्यों किया? क्या आपको इसका ज्ञान भी इसके विषय में आप सभी कुछ नहीं है? क्योंकि पूर्व जन्मों में आप अत्यन्त महान जानते आप यहाँ हैं। अतः मुझे आपको ये और उच्च कोटि के साधक थे, यही कारण सब चीजें बतानी हैं। आप अपने अन्दर था कि आप खोज रहे थे। ठीक है आपसे कुछ गलतियाँ हुईं, परन्तु आप अत्यन्त गुण कुछ कार्यान्वित कर रहा सम्पन्न लोग हैं । अपनी शक्ति को न भूलें । अधोगति की ओर न जाएं। क्योंकि आप खोजें, अन्य लोगों में भी खोजें यही सब | परमात्मा आपको धन्य करें ।