Seminar for the new Sahaja yogis Day 1

Cowasji Jehangir Hall, मुंबई (भारत)

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सहज योगियों के लिए सेमिनार 

बोर्डी शिबिर, महाराष्ट्र, भारत,

28 जनवरी 1980,

मुझे बताया गया था कि, मुझे संबोधित करना चाहिए, जनसमूह को, अंग्रेजी भाषा में। मैं आशा करती हूँ, यह संतोषजनक होगा, कुछ लोगों के लिए, यदि मै संबोधित करूँ, आपको अंग्रेज़ी में।

मैं सोचती हूँ की, समय हो गया है, हमारे लिए, कि सोचें, क्यों परमात्मा ने सृजन किया है, इस सुंदर मानव का, मनुष्य का। क्यों उन्होंने इतना कष्ट उठाया, कि विकास करें हमारा, अमीबा से इस स्तर तक। हमने सब कुछ, महत्वहीन समझा है। यहाँ तक की, बात करना परमात्मा के बारे में, ऐसे आधुनिक समय में, यह असंभव है। क्योंकि बुद्धिजीवियों के अनुसार, वे अस्तित्व में नहीं हैं।

वे कदाचित कुछ भी कह सकते हैं, जो चाहे, परन्तु वह हैं, और बिलकुल हैं। अब समय आ गया है, सर्वप्रथम, हमारा यह जानने के लिए, हम यहाँ क्यों है? हमारी सिद्धि किस में है? क्या हम आए हैं, इस संसार में, केवल पैदा होने के लिए, अपना भोजन करें, बच्चे पैदा करें, उनके लिए धन उपार्जित करें, और इसके बाद मर जाएँ? अथवा कोई विशेष कारण है, कि परमात्मा हमसे इतना प्रेम करते हैं, और उन्होंने सृजन किया, एक नवीन संसार, मनुष्य का? 

साथ ही, समय आ गया है, हमारे जानने के लिए, कि परमात्मा विद्यमान हैं। और यह कि उनके प्रेम की शक्ति विद्यमान है। और केवल यह नहीं, परन्तु यह व्यवस्थित करती है, समायोजित करती है, यह गतिशील है। कि वे प्रेम करते हैं, और उनके प्रेम में, वे चाहते हैं, हमें प्रदान करना, परमात्मा का साम्राज्य, वह उच्चतम, जो सोचा गया था, मानव के लिए। 

आइए हम भूल जाएं, अपनी कुंठाओं को, और अपनी विषमताओं को, और अपनी तथाकथित राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को, क्योंकि उनका अस्तित्व नहीं है। यह केवल एक भ्रम है, जिसके पीछे हम भाग रहे हैं। हम ही वे लोग हैं, जिन्होंने यह मकड़ी का जाल बनाया है, और उसमे फंसे हैं, और चिंतित हैं, जीवन के विषय में। कुछ भी नहीं है, चिंतित होने के लिए, क्योंकि भगवान, सर्वशक्तिमान परमात्मा, जिन्होंने सृजन किया आपका, सर्वशक्तिमान हैं, और वे उत्सुक हैं, आपको प्रदान करने के लिए, उपहार, आनंद और प्रसन्नता का। 

यदि हम बैठें जाएं और समझने का प्रयास करें, हम जानेंगे कि, परमात्मा ने हमें बनाया है, मानव के रूप में, बिना हम में से किसी के, इसे जाने बिना। हम नहीं जानते, कैसे हम बने, बन्दर से इस स्थिति तक। हमे कोई अनुमान नहीं है, कब हमें प्राप्त हुआ, यह बड़ा व्यक्तित्व, मानव का। हम ने क्या किया, मानव बनने के लिए? हमें यह सरल प्रश्न पूछना चाहिए, स्वयं से। हम क्या करते हैं, इतनी सरलता से श्वास लेने के लिए? हम क्या करते हैं, जब हमारा ह्रदय नियमित रूप से स्पंदन करता है? कैसे समय, यह नियमबध्द करता है, जिस प्रकार यह काम करता है। हमने क्या किया है, इसे प्राप्त करने के लिए, इस प्रकार का एक सुंदर शरीर, जो काम करता है, स्वयं ही।

आपने अब तक कुछ नहीं किया है। अधिक से अधिक, जो हम कर सकते हैं, एक निर्जीव कार्य है। जैसे हम कदाचित निर्मित कर लें, एक भवन, निर्जीव पत्थरों में से। अथवा यदि यह मृत्त हो जाए, हम निर्माण कर सकते हैं, एक अच्छे, सुन्दर फर्नीचर का। परन्तु क्या हमने, कुछ भी किया है, जीवंत अब तक, कि हम इतना अभिमान करते हैं? कि हम अस्वीकार करें, उस शक्ति को, जो जीवन का निर्माण करती है? सहस्त्रों पुष्प, फलों में परिवर्तित होते हैं, प्रतिदिन। और मैं कह रही हूँ, सहस्त्रों, क्योंकि कोई शब्द नहीं हैं, इसके लिए, यह अनंत है। जब यह शक्ति कार्य करती हैं, इतनी सूक्ष्मता से, असीमता से, और इतनी सूक्ष्मता में, उदहारण के लिए, यदि आप के पास आम का पेड़ है, आपको प्राप्त होगा, एक आम का फल ही।

यदि आपके पास गुलाब का पौधा है, आपको प्राप्त होगा, केवल गुलाब उसमे से। वह सब सुनियंत्रित, व्यवस्थित है। सब कुछ किया जाता है इतनी सुंदरता से। आपको रखा गया हैं, इस पृथ्वी माँ पर, जो गतिशील हैं, ऐसी तीव्रता से गतिशील, और तब भी आप वहीं हैं, कोई समस्या नहीं है। यह सभी बातें, कैसे हो रही हैं? हम सामना नहीं करना चाहते हैं। हम सामना नहीं करना चाहते, यथार्थ का। कदाचित, हम सोचते हैं कि, यथार्थ, बहुत अधिक हो जायेगा। परन्तु समय आ गया है, हमारे लिए यथार्थ को जानने का, क्योंकि यह सबसे सुंदर बात है, और यह कि यथार्थ और सत्य, एक बहुत सरल बात है। 

सत्य है, कि परमात्मा ने सृजन किया है, आप सभी का, कि उनकी शक्ति प्रकटित हो आप पर।  जैसे हमने इस यंत्र का निर्माण किया है, की हमारी वाणी इसमें से जाए, उस प्रकार से, परमात्मा ने आपको बनाया है, इतनी सुंदरता से, कि आप अभिव्यक्त कर सकते हैं, उनकी शक्ति, उनकी शक्ति, आपके यंत्र द्वारा। परन्तु एकमात्र अंतर, इस यंत्र की बीच में, और इस मानव यंत्र में, यह है, कि आप अवगत हैं, कि आप जानते हैं, सब कुछ, कि आप समर्थ हैं, समझने में, शक्ति को, जो आप में से प्रवाहित होती है, और उसकी अभिव्यक्ति को, और एक सम्पूर्ण कुशल-संचालन इसका, और इसका अंत- आनंद इसका।

यह बताया गया है, विभिन्न ग्रंथों में, प्रमुख रूप से, हमारे देश में, जो संपन्न है, परमात्मा के महानतम आशीर्वाद से, बहुत सुंदर वातावरण से। हम अनुभूति नहीं करते, इस देश में रहते हुए, कितना अन्य देशों ने सामना किया हैं, रहने के लिए, अपने परिसर में। 

मान लीजिये, यदि आपको, लन्दन में रहना पड़े, आपको पता होना चाहिए, कि आपके पास होनी चाहिए, बड़ी आमदनी, क्योंकि इतनी ठण्ड होती है। आप के पास होना चाहिए, एक घर, जो केंद्र से समूचे रूप में गर्म रखा जाता है, कम से कम। यह देश क्योंकि विशेषतः बना है, एक सरल जीवन के लिए, बिना प्रकृति से किसी संघर्ष में जाकर। 

हमने देखा है, कि सहस्त्रों वर्ष पहले, इस हमारे महान देश में, बहुत से महान संत होते थे, जो जंगलों में चले गए, क्योंकि इस देश में, आप जंगल में रह सकते हैं, बहुत कम भोजन के साथ, पता लगाने के लिए, अंतर्निहित धाराओं के बारे में, जो इस शरीर को नियंत्रित करती हैं। 

यद्यपि पश्चिम में, लोग बाह्य में गए, सर्वप्रथम। अपने घरों को ठीक से बनाकर। रहना तक कठिन था वहाँ। और उसके बाद वे गए चीज़ों में, जैसे विज्ञान। बाह्य की और। देखने के लिए, क्या सुविधाएँ वे प्राप्त कर सकते हैं, भौतिक वस्तुओं में से, क्या सहायता उन्हें मिल सकती है, भौतिक वस्तुओं में से। 

परन्तु यहाँ लोग चले गए थे, स्वयं के भीतर। वे अपना चित्त ले गए, भीतर, जानने के लिए, क्या अन्तर्निहित शक्तियाँ थी, जिन्होंने सृजन किया, इस सम्पूर्ण बह्रामंड का, और सृजन किया मानव का। मान लीजिये कुछ दोष आ जाए, यंत्र में, यहाँ, और आप निदान नहीं कर सकते उसका, तब, आप प्रारम्भ करेंगे जाना, स्तोत्र की ओर, और पता लगाएंगे, यदि कोई दोष था स्तोत्र में। इस प्रकार, कुछ लोग, प्रयास कर रहे हैं, यहाँ कार्य करने का, उसी समय, कुछ लोग कार्य कर रहे थे, स्तोत्र पर। उन्होंने खोजा कि, हमारे भीतर, एक शक्ति निहित है, कुण्डलिनी नामक। यह कुण्डलिनी ही शक्ति है, रीढ़ की हड्डी के मूल पर स्थित, त्रिकोणाकार अस्ति पर, हम इसे कहते हैं…कुछ लोग इसे गलत समझते हैं, क्योंकि मैं त्रिकोणाकार कहती हूँ, क्योंकि यह पूरा त्रिकोण हैं, छोटी-छोटी हड्डियों वाला, त्रिकोणाकार हड्डियाँ कहलाता है, चिकित्सा विज्ञान में। मेरा तात्पर्य है वह त्रिकोणाकार, जिसकी आप अनुभूति कर सकते हैं, पीठ पर, पीठ पर, हड्डी के नीचे, ‘सेक्रम’ कहलाता है। अब इस ‘सेक्रम’ का अर्थ है, पवित्र हड्डी। ज़रा सोचिए, कैसे लोग जानते थे, कि यह पवित्र अस्थि है, और साथ में यह कहा जाता है, कि जब एक व्यक्ति को जलाया जाता है, पूरा उनका शरीर जल सकता है, परन्तु यह हड्डी, जल नहीं सकती।              

इसके साढ़े-तीन कुण्डल होते हैं, यह कुंडलिनी। एक विशेष कारण होता है, साढ़े-तीन कुण्डल होने का, क्योंकि वह प्रदान करता है, एक शाश्वत प्राणी की उत्पत्ति, परन्तु उसकी हम चर्चा किसी और समय करेंगे। अब यह साढ़े-तीन कुण्डल, कुण्डलिनी के, अथवा ऊर्जा, अथवा शक्ति, यह उत्त्पत्ति करती है पूर्ण मनुष्य की, जिसे हम कहते हैं पिंड, एक पूर्ण “ज़ाइगोट” का सृजन होता है इसमें से। वे सृजन करतीं हैं, और फिर भी वैसी ही रहती हैं, जैसे एक माँ सृजन करतीं हैं, एक बच्चे का, परन्तु वैसी ही रहती हैं। 

यह कुण्डलिनी आपकी माता है। वे ही हैं, जो आपकी एकमात्र माता हैं। प्रत्येक व्यक्ति के पास यह माता होती है, त्रिकोणाकार अस्थि में, प्रत्येक व्यक्ति! और यह माता हर समय आलेख रखती हैं, अवलोकन करती हैं, संयोजित करती हैं, और प्रयास कर रही हैं, देने का आपको, जिसे आप कहते हैं, सार्वलौकिक अचेतन का प्रतीक। वे कहते हैं, यह कुण्डलिनी सुप्तावस्था में हैं। वह एक प्रकार से हैं, क्योंकि उन्होंने अब तक व्यवस्थित नहीं किया। इस कुण्डलिनी के नीचे एक चक्र है, एक अन्य चक्र आप देख सकते हैं, जो चक्र है प्राप्ति का, सभी जानकारी का, कि क्या आपने किया है, पिछले जन्मों में, और और क्या आप कर रहे हैं, आज। आपकी सभी जानकारी रखी जाती है, जैसे की टेप, त्रिकोणाकार अस्थि में, प्रत्येक मनुष्य के।

अब आप कह सकते हैं कि “हम कैसे मान लें, माँ, कि ऐसी ऊर्जा है?” 

हमारे सहज योग कार्यक्रम में, हो सकता है, कम से कम 30 प्रतिशत लोग, जिन्होंने देखा होगा, अपनी खुली आँखों से, कुण्डलिनी का स्पंदन। आप देख सकते हैं, अपनी खुली आँखों से, कि कुण्डलिनी स्पंदित होती हैं, और वें उर्ध्वगामी होती हैं, आप यह देख सकते हैं, अपनी खुली आँखों से। केवल इतना ही नहीं, स्टेथोस्कोप द्वारा (ह्रदय गति मापने के यंत्र से), आप अनुभूति कर सकते हैं, उठना उस “लुब डुप’ का, जैसे आप देखते हैं अपने ह्रदय में, अथवा वे कहते हैं अनहता, अतार्थ ध्वनि आघात की। यह सब पता लगाया गया था, बहुत-बहुत समय पहले, परन्तु सब कुछ जो भारतीय है, उसका त्याग कर देना चाहिए, जैसे कि अनुपयोगी! हमारी धारणा रहती है, पिछले, पता नहीं कितने सारे सालों से। 

जबकि यह एक देश है, योग का। हम योग-उन्मुख लोग हैं। मूलतः हम योग-उन्मुख हैं। आप प्रयास कर सकते हैं, विचार बदलने का, और नई मुक्ति का, और इन निरर्थक वस्तुओं का, ले आइए कुछ भी, आपको जो अच्छा लगे, इस देश में। परन्तु यह बहुत कठिन होने वाला है, क्योंकी इसकी देखभाल हुई है, पोषण हुआ है, और प्रस्तुत किया गया है, सबसे बड़े आध्यात्म के मार्गदर्शक के समान। आप प्रयास करें, किसी भी कपट का, इस देश पर, वह काम नहीं करेगा, क्योंकि यह एक दिन का निर्माण नहीं है, यह दो दिन का निर्माण नहीं है, अपितु सहस्त्रों वर्ष, मुनियों ने कार्य किया है, इस देश पर, और इस भाग पर। और कृपया जान लीजिए, कि जैसे आप पैदा हुए हैं, भारतीय के रूप में, आप सबसे महानतम हैं, जहाँ तक अध्यात्म की बात है। परन्तु पिछले दिन, जब वे मेरा टेलीविज़न पर ले रहे थे, उन्होंने मुझे एक सीधा प्रश्न पुछा। 

“आप क्या सोचते हैं, पाश्चिमात्य साधकों के बारे में, जो आपके यहाँ हैं, और भारतीय साधक? मैंने कहा, “निसंदेह, पाश्चिमात्य साधक, अहंकार-उन्मुख हैं, वे अहंकार-तृप्ति में जाते हैं। वे जुड़ जाएंगे, एक गुरु से, जो उन्हें कुछ कपड़े देगा, अथवा कुछ नामों से बुलाएगा। वे थोड़ी अहंकार-तृप्ति चाहते हैं।

परन्तु तब भी, वे साधक हैं, बहुत लम्बे इतिहास वाले, रहे होंगे। वे हो सकता है, रहे हों महान संत, इस देश के, पैदा हुए अन्य देश में, कदाचित। क्योंकि जिस प्रकार, वे चले गए सहज योग में, और जस प्रकार, उन्होंने पांडित्य प्राप्त किया इस पर है, इतना उल्लेखनीय है। यद्यपि कृत्रम-बुद्धिजीवी, हमारे देश के, अत्यधिक सतही हैं। 

इस बात पर वे थोड़ा सा दुखी हुए। परन्तु मैंने कहा, “मुझे आपको सत्य बताना होगा।” हम कभी, विस्तार में नहीं गए, इन संतों की उपलब्धियों में, जिन्होंने पता लगाया, सब कुछ हमारे लिए, यह पहले से बना-बनाया है, बिलकुल जैसे आपकी कुण्डलिनी, बनाई गयी है, आपके पिता, परमेश्वर, सर्वशक्तिमान परमात्मा द्वारा, जिन्होंने स्थापित किया, कुण्डलिनी को, बिलकुल वहाँ, आपके लिए, तैयार। 

अब आपके पास पहला चक्र है। वे सभी हैं सूक्ष्म चक्र, जिसके बारे में मैं बात कर रही हूँ, जो स्थूल रूप प्रकट होते हैं, भीतर से, प्लेक्सस के रूप में। परन्तु यहाँ मैं बताऊंगी, आपको सूक्ष्म चक्रों के बारे में। पहला सूक्ष्म चक्र कहलाता है, मूलाधार चक्र। 

आप सभी, यदि आप जानते हों, इतना संस्कृत, कि यह मूलाधार है, आधार है जड़ का। जड़ क्या है? जड़ है कुंडलिनी, जो ऊपर है, और यह मूलाधार चक्र है। यही चक्र है, जो रोकता है, जो सूचना देता है कुंडलिनी को।

अब, इसका कोई लेना-देना नहीं है, हिंदू धर्म से, अथवा ईसाई धर्म से, अथवा कोई भी धर्म हो। हर कोई, चाहे आप लंदन से हो, अथवा भारत से, अथवा टिंबक्टू से, यह कुंडलिनी होती है, आपके भीतर, यदि आप मानव है। 

अब हम बात करते हैं, एक विश्व की और एक बड़े समझ की, और वह संभव नहीं है। वह एक असंभव कार्यभार है, जो आप ने उठा लिया है। कारण है कि, आप नहीं गए, अन्तर्निहित प्रवाह में, सभी लोगों के। दूसरा, आपने पता नहीं लगाया, अपना सम्पूर्ण। यह सब सम्बन्ध-सूचक परिभाषा हैं। आपकी सभी आर्थिक समस्याऐं, आपके सभी आर्थिक सिद्धांत, बिलकुल व्यर्थ हैं, क्योंकि वे सम्पूर्ण पर आधारित नहीं हैं। 

आप एक सतह पर चल रहे है, जिसका कोई आधार नहीं है, कुछ भी सम्पूर्ण नहीं है, यथार्थ में।  इसलिए हम सदा अतिशयता की ओर जाते हैं। जैसे कि, जब हम चर्चा करते हैं, मन लीजिए, राजनीति के बारे में।  देखिये, हमारी सभी विचारधाराएँ, जो कार्य करती हैं- पूंजीवाद, एक अतिशयता; साम्यवाद, एक अन्य अतिशयता। यह एक अन्य अतिशयता है, वह एक अन्य अतिशयता है। नदी मध्य में बहती है, और जितना अधिक आप मध्य में है, गहराई होती है, यह सभी विचारधाराएं, हवा में लुप्त हो जाएंगी, जैसे ही, आप जानेंगे स्वयं को। अपने सम्पूर्ण को जानिए। और यह सभी समस्याएं और उथल-पुथल, और यह निरर्थक बातें समाप्त हो जाएँगी। 

चलिए, हम पता लगाए, कहाँ हमारे भीतर हमारा सम्पूर्ण है? अब, जब मैं आपसे बात करती हूँ, मैं जानती हूँ प्रश्न, जो आने वाले हैं। इसलिए मुझे इसका प्रसंग देना पड़ेगा, चाहे मैं बात करूँ, इस पर किसी कारणवश, अथवा ऐसे ही, मैं बात करूँ आपसे, जो वैज्ञानिक रूप से सत्य है। यदि आप असली वैज्ञानिक हैं, में आपसे अनुरोध करुँगी, खुले मस्तिष्क के रहें। प्रत्येक वैज्ञानिक को खुले मस्तिष्क का होना चाहिए। क्योंकि आप जानते हैं, एवोगैड्रो का सिद्धांत, प्रस्तावित किया गया था, उसके बाद पुनः निरस्त किया गया था, पुनः निरस्त हुआ, और तब एक और। इस प्रकार, मैं प्रस्तुत कर रही हूँ, एक अवधारणा, आपके सामने, और इसे सिद्ध करने के लिए, आप मुझे एक अवसर दीजिए, और तब आप जानेंगे, कि मैं बात कर रही हूँ सम्पूर्ण नियमों (परम आचार) के विषय में, जिसे बदल नहीं सकते। सम्पूर्ण नियम परमात्मा का, जो लिखा गया है, प्रेम की पुस्तकों में। 

यह सम्पूर्ण निहित है आपके ह्रदय में, आपकी आत्मा के रूप में, आपकी आत्मा के रूप में। आत्मा अंगेज़ी भाषा में, मुझे लगता है अंगेज़ी भाषा, अपेक्षाकृत, समस्यात्मक है, क्योंकि मैं नहीं समझती, उनके कभी ऐसे ध्यान वाले अनुभव थे, जैसे हमारे थे। आत्मा आपके ह्रदय में है, सर्वशक्तिमान परमात्मा का प्रतिबिम्ब है। हमारे ह्रदय के भीतर आत्मा है, जैसे टिमटिमाती हुई ज्योति, हम कह सकते हैं, गैस की लौ के समान। हमारे पास टिमटिमाती रोशनी है, जो सब कुछ जानती है, जो सब कुछ जानती है। जिसे कहा गया है- चैतन्य, गीता में। एक यह जानती है, आप क्या करते हैं, आप कहाँ जा रहे हैं, आपकी क्या योजना है, और क्या गलत है, और क्या बुरा है, और यह ऐसा एक है। हम नहीं जानते कि, यही एक है जिसे खोजना है हमे।  परन्तु हम अवगत हैं, कि कोई है वहाँ, जिसे सब पता है हमारे बारे में। चाहे हम अंधकार में जाएं, अथवा आप छुपाएं चीज़ों को, कुछ भी कर लें, आप जानते हैं कि कोई है, आपके ह्रदय में, जो जानता है, सब कुछ आपके बारे में। 

परन्तु क्या हमें करना होगा अब, उन तक पहुँचने के लिए? अथवा वहाँ तक पहुँचने के लिए, अथवा उससे मिलने के लिए? हमने क्या किया है, मनुष्य बनने के लिए? मैं पुनः पूछती हूँ, वही प्रश्न। कुछ भी नही। और यहाँ तक कि, आत्मा को जानने के लिए, आपको कुछ भी नहीं करना होगा। आप क्या करते हैं, बीज को अंकुरित करने के लिए? पृथ्वी माता- वें उसकी देखभाल करती हैं। इस प्रकार, आपकी कुण्डलिनी को उठाने के लिए, आत्मा से मिलाने के लिए, आपको क्या करना पड़ता है? कुछ भी नहीं। और यह होगा कठिन, कि स्वीकार करें की, कुछ हमारे किए बिना, कैसे हम इसे प्राप्त कर सकते हैं? इस कारण, सहज योग आगे बढ़ता है, बहुत, बहुत धीरे। यदि मैं कहूँ लोगों से, कि आपको अपने सर के बल खड़ा होना पड़ेगा, तीन घंटे तक, तो दस गुना अधिक लोग होंगे यहाँ। आप कुछ नहीं कर सकते, इसके बारे में। एक प्रबुद्ध ज्योति ही, प्रबुद्ध कर सकती हैं, एक अन्य ज्योति को। एक सरल बात है, आप जानते हैं। यदि आप प्रबुद्ध नहीं हैं, आप कैसे प्रबुद्ध कर सकते हैं एक अन्य ज्योति को? कैसे आप प्रबुद्ध कर सकते हैं, स्वयं को? क्या करता है वह, जब वह प्रबुद्ध करता है, एक अन्य ज्योति को? वह अन्य ज्योति भी प्रकाश देती है।   

यह झिलमिलाहट जो आपके ह्रदय में है, वह आत्मा है। और यह कुण्डलनी ही है, जिसे तैयार रखा गया है, जैसे एक कोंपल, और अंकुर आपके भीतर, जो उठता है धीरे से, इन छह चक्रों के मध्य से, और बहार निकलता है, इस क्षेत्र से, जो तालू है, जैसे इसे कहा जाता है, अथवा आप कह सकते हैं, फोंटनेल क्षेत्र, फोंटनेल क्षेत्र। क्या अब ठीक है? आप देख सकते हैं? तालु क्षेत्र में, यहाँ, जिसे तालू कहते हैं, कुण्डलिनी इसको भेदती है। तालु में से, कुण्डलिनी भेदती है, और जब कुण्डलिनी भेदती है इसके बीच से, आपकी आत्मा का स्थान इस पर होता है, स्थान यहाँ है। आपको आश्चर्य होगा की, आत्मा आप में से बाहर निकलती है, प्रत्येक रात्रि, लगभग बारह इंच, और स्थान यहाँ है, और जब कुण्डलिनी स्पर्श करती है स्थान को, आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है। जब आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है, तब आप जानते हैं, अपने स्वयं का अर्थ। उससे पहले, इस जीवन का अर्थ, कुछ भी अर्थ नहीं होता। जैसे कि, जब तक यह सम्बन्धित नहीं होता स्त्रोत्र से, इसका कोई अर्थ नहीं होता।

आप किस लिए लड़ रहे हैं, परमात्मा के बारे में, कि वे हैं, कि नहीं, जब हमारी आँखे अभी तक खुली नहीं हैं? जैसे हैं, अंधे लोग, लड़ते हुए, आपस में, और घोषणा कर रहे हैं, कि कोई परमात्मा नहीं हैं, अथवा परमात्मा हैं। दोनों बातें बिलकुल समान हैं। चाहे यह अन्धविश्वास हो, अथवा मैं कहूँगी, बौद्धिक दावा, कि परमात्मा नहीं होते हैं, बिलकुल एक समान है, इसका कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि दोनों प्रकार से, आप परमात्मा से सम्बंधित नहीं होते हो। तो पहली और सर्वप्रथम बात है, कि आप को जुड़ना होगा, अपनी आत्मा से, बाकी सब, पूर्णतया निरर्थक है। वे लोग जो लिप्त होते हैं, अन्य अहंकार की तृप्तियों में, और सोचते हैं कि वे प्राप्त करने वाले हैं, परमात्मा, कूदने से, अथवा, करने से, सभी प्रकार की निरर्थक बातें, वे, खेद है कि गलत समझते हैं। 

इस कुंडलिनी को उठना पड़ता है, और प्रदान करना पड़ता है, आत्म साक्षात्कार। यही है जो आदि शंकराचार्य ने कहा था, यही है जो ईसा मसीह ने कहा था, यही है जो हर किसी ने, जो एक व्यक्ति हैं, माने जाते है, कि असली लोग हैं, कहते थे, कि आपको दूसरा जन्म लेना होगा। आप कैसे ले सकते हैं, जन्म पुनः?

यह माता है, जो बैठी गई है नीचे वहाँ, प्रतीक्षा में, उस अवसर के लिए, कि उठें और भेदन करें इन 6 चक्रों का, ऊपर के चक्रों का, आपको आत्मसाक्षात्कार देने के लिए। सबसे नीचे का चक्र, वे नहीं भेदती हैं। यह सबसे नीचे का चक्र है, जिसे देखभाल करना होगा, (कुक्षीय नाड़ीजाल) पेल्विक प्लेक्सस का। और यदि आप जानते हो, पेल्विक प्लेक्सस, यह साथ ही देखभाल करता है, यौन-क्रिया का।

यौन-क्रिया का कोई संबंध नहीं है, कुंडलिनी से, मैं कह चुकी हूँ, एक-हज़ार-एक बार। परंतु लोगों में कोई बोध नहीं है, समझने के लिए। वह आप की माता है। अब समझ जाइए, कि आप सब भारतीय हैं, अंग्रेज नहीं। कैसे आप कह सकते हैं, ऐसी एक गंदी बात, अपनी माता के विषय में? और यही है जो, लोगों को भटकावे में ले गया है। मैं उन्हें दूँगी… क्योंकि मैं एक माँ हूँ, मैं उन्हें भी दूँगी, अवसर संदेह के कारण। हो सकता है, वे समझने में गलती कर रहे थे। हो सकता है, कि उन्होंने श्री गणेश का सूंड देखा वहाँ, और सोचा कि यह कुंडली थी, क्योंकि देवता जो शासन करते हैं, इस चक्र पर, श्री गणेश है।

जब मैं कहती हूँ, श्री गणेश, लोगों को नहीं सोचना चाहिए कि, यह हिंदू धर्म के बारे में है। किसी का अधिकार नहीं है श्री गणेश पर। वे किसी के देवता नहीं है, उस प्रकार से, जो बस चाहते हैं उन्हें जेब में रखना। वे ही अध्यक्ष है, जो शासन करते हैं पूरे ब्रह्मांड पर। और कोई भी दावा नहीं कर सकता, कि वह हिंदू अथवा ईसाई अथवा मुस्लिम है।

यह प्रभु श्री गणेश, जिनकी हम पूजा करते हैं, यहाँ तक कि डॉक्टर, इंजीनियर, और सभी पूजा करते हैं, नहीं जानते कि वह रहते हैं आपके भीतर, इस मूलाधार चक्र पर, जैसे, जैसे एक कमल कीचड़ में, जैसे एक छोटा बच्चा, जो नहीं समझता, निरर्थक पक्ष यौन-क्रिया का, जो इतना पवित्र है।

वह बच्चा आपके भीतर रहता है, और यहाँ मैं चाहती हूँ, साथ में, कि स्पष्ट करूँ, कि कई लोग सोचते हैं, कि ब्रह्मचर्य उन्हें दे सकता है, एक महान ऊंचाई आध्यात्मिकता में, वे खेद है कि गलत समझते हैं। आपको भागना नहीं है, किसी चीज से। आपके बच्चे होने चाहिए, आपको रहना चाहिए, जैसे साधारण पति और पत्नी।

वही है जो, हमारे यहाँ होना चाहिए सहज योग में। यदि आप, असाधारण प्रकार से, व्यवहार करते हैं, जैसे कि एक सन्यासी का जीवन, और वैसा सब, मैं आपसे अनुरोध करूंगी, कि आप अच्छा होगा, जाएं, और अपने कपड़े बदले, और वापस आए, साधारण कपड़ों में।

सहज योग केवल प्रदान किया जा सकता है, लोगों को जो साधारण है, चरमपंथियों को नहीं, जो विश्वास रखते हैं, भाग जाने में घर से, अथवा भागना घर की और अत्यधिक। जो लोग व्यतीत करते हैं एक अच्छा जीवन, जो सोचते हैं, उनके समाज के बारे में भी, और जो बहुत साधारण लोग हैं, मध्य मार्ग में, चरमपंथी नहीं।

मध्य मार्गी लोग, हमने कभी ध्यान नहीं दिया, मध्य मार्गी लोगों के बारे में। हम केवल चिंतित होते हैं, पूर्णतया निर्धन लोगों के विषय में, जो भिखारी हैं, अथवा चिंता करते हैं, लोगों के बारे में, जो बहुत धनवान होते हैं। भूल जाइए उन्हें, वे दोनों, एक ही श्रेणी में होते हैं।

आप देखेंगे, यह सहज योग में, कि उनकी एक जैसी विशेषताऐं है। उनके मूल्य समान है, वे  समान स्तर के होते हैं। केवल भिन्नता है, एक के पास बहुत अधिक धन है, और एक के पास नहीं है। आप देखिए, यह धन ही है, जो भिन्नता दर्शाता है, परंतु वह विभाजक है, जानने के लिए, की दोनों है, समान स्थिति में।

अब मैं बता रही हूँ आपको, की सहज योग केवल कार्य करता है, लोगों के लिए, जो अतिशयता में नहीं जाते। क्योंकि आप देख सकते हैं, कि यह मध्य में है। कि रीड की हड्डी में स्थित है, एक पक्ष या दूसरे पक्ष पर नहीं। वे लोग, जो सरल लोग हैं, जो व्यतीत कर रहे हैं, एक अच्छा, भला, नैतिक जीवन, सबसे अच्छे होते हैं सहयोग के लिए।

कोई आवश्यकता नहीं है, की कोई परीक्षण करें, जैसे पाश्चिमात्य लोगों ने किया है। उन्होंने वास्तव में विनाश कर दिया है, उनके समाज का, विनाश अपने आप का पूर्णतया, समाप्त। आप हो सकता है, बुलाएँ मुझे- मैं पिछड़ी हूँ, मध्य वर्गी। जैसे कि बुद्धिजीवियों के पास बड़े शब्द होते हैं, आप देखिए, वे अंकित कर देते हैं किसी पर।

परंतु समय निकल चुका है, जब वे समझ रहे हैं, की ऐसा बुद्धिहीन-व्यंगात्मक कार्य, हम ने किया, उस देश में। हमने विनाश कर दिया है समाज का, हमने विनाश कर दिया है, हमारे बच्चों का, हमने विनाश कर दिया है, अपने पारिवारिक संबंधों का, हमने विनाश कर दिया है संपूर्ण राष्ट्र का, प्रलय के समय की ओर, संपूर्ण प्रलय।

यदि आप जाएं और देखें उन देशों को- दीनतापूर्ण। वे जा रहे हैं, समाप्त करने के लिए अपना जीवन, शराबखाने में। ऐसा ही है यह, क्योंकि वे जीवन का सामना नहीं कर सकते। जीवन इतना दीनतापूर्ण है उनके लिए। उनके पास कोई परिवार नहीं है, बच्चे नहीं, पत्नी नहीं, कहाँ जाए? इसलिए वे जाते हैं, शराब खाने की और।

तो वे सभी परीक्षण किसी काम के नहीं है। माँ के रूप में, मैं कह रही हूँ, आपसे, “कृपया रुक जाइए।”

जागृत कीजिए, अपने श्री गणेश को, अपने भीतर, अपनी पवित्रता के आदर द्वारा। हमारे भारतीय पुरुष, सोचते हैं, कि पवित्रता का कोई अर्थ नहीं है उनके लिए। केवल स्त्रियों को पवित्र रहना चाहिए, और पुरुष को आवश्यकता नहीं होती, पवित्र रहने की, बिलकुल भी। सबसे आश्चर्यजनक है।

पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण बात है, मनुष्य के लिए, मध्य मार्ग में रहने के लिए। क्योंकि यह श्री गणेश का आशीर्वाद हैं। किसी को मिले, केवल तब, कुंडलिनी उठती है। अब श्री गणेश अवतरित हुए थे, इस पृथ्वी में, इस पृथ्वी पर, साक्षात, प्रभु ईसा मसीह के रूप में।

वे इस पृथ्वी पर आए थे, ईसा मसीह के रूप में, इस चक्र पर, जिसे आप कहते हैं आज्ञा चक्र, जहाँ मैं यह लाल चीज़ लगती हूँ। परंतु उनकी उत्क्रांति हुई, बहुत अधिक। 11 रुद्र होते हैं, जैसे कि हम कहते हैं, 11 रूद्र होते हैं, जो उनकी शक्तियाँ है, यह सब वर्णित है, देवी महात्म्य में,  देवी भागवत। उनका नाम महाविष्णु है। वे कहलाते हैं आधार ब्रह्मांड के। परन्तु, कौन पढ़ता है देवी भागवत? अथवा कौन पढ़ता है मार्कंडेय की पुस्तक, अथवा आदि शंकराचार्य की पुस्तक?

वे कहेंगे कि, “हम बड़े हिंदू हैं। और उन्होंने सुना तक नहीं, नाम आदि शंकराचार्य का। मैं केरल गई। और वे पत्रिका वाले लोग, बता रहे थे, मुझे कि, “हमने कभी नहीं पढ़ा उनको।”

केरल में, ऐसे महान व्यक्ति पैदा हुए थे, आदि शंकराचार्य। मेरा अर्थ है, उन्होंने पढ़ा नहीं उनके बारे में। उन्होंने कभी प्रचार नहीं किया, किसी हिन्दू धर्म का। यह एक गलत धारणा है।

उन्होंने कहा था, “न योग से, न सांख्या से।”

उन्होंने कहा था, “इन दर्शन-शास्त्रों द्वारा नहीं, आप पहुंचने वाले हैं, परमात्मा तक, अपितु माता की कृपा द्वारा, केवल, आप को मिलेगा, वह पद। 

उन्होंने यह स्पष्ट कहा था। वे कभी नही मानते थे, किसी ऐसी धर्मनिरपेक्षता जैसी धारणा, अथवा कोई ऐसे विचार, जिसका अर्थ हो, कि यह धर्म अलग है। धर्मनिरपेक्ष का अर्थ ही है, कि अन्य धर्म विद्यमान हैं। केवल एक ही है धर्म, परमात्मा का, जो विद्यमान है। 

सैकड़ों धर्म नही होते हैं, जैसे कि हम सोचते हैं उनके बारे में। वे सभी पुष्प हैं, एक बड़े पेड़ के।  हमने तोड़ लिए है, यह सभी पुष्प, “यह मेरा है, यह मेरा है।” और तब, आप कैसे बात कर सकते है धर्मनिरपेक्षता की? यह एक है, और यह पुष्पित हुए हैं, एक शक्ति द्वारा, एक प्रेम द्वारा। 

वे भिन्न कैसे हो सकते हैं? वे सभी एक हैं, पूर्णतया एकजुट। वे पूर्णतया तालमेल में हैं, और कोई समस्या नहीं है उनमें। समस्या है, हम में, मनुष्य में। ऐसा बहुत अधिक होता है, विश्वास करने के लिए। परंतु यह एक तथ्य है। किसी को तो बताना पड़ेगा आपको, कि वे प्रभु गणेश थे, जो आए थे इस पृथ्वी पर, प्रभु ईसा मसीह के रूप में, और क्या किया आपने, उनके साथ?

सोचिए इसके बारे में। वे वहाँ थे, केवल चार सालों के लिए। उन्होंने इस प्रकार का एक कार्य किया, और क्यों किया आपने उनके साथ? क्या कारण था? क्योंकि, पुनः, आप सामना नहीं करना चाहते थे, यथार्थ का। अब यह समय आ गया है, कि आप टाल नही सकते यथार्थ को। यदि आप टालते हैं, तो बहुत बड़ी विपत्तियाँ प्रतीक्षा कर रही है आगे। आपको सामना करना होगा, यथार्थ का। और क्यों? मैं आपको बताती हूँ, बिल्कुल यही।

हमारे अंदर स्थित है, अंतर्निहित धाराएं हमारी अनुकंपी और पराअनुकंपा गतिविधियों की। तीन नाडियाँ, जिन्हें कहा जाता है, पहले वाला कहलाता है, बांए पक्ष पर, ईडा नाड़ी। वे अंतर्निहित धाराएं होती हैं, अनुकंपी-तंत्रिका तंत्र की। बाईं अनुकंपी-तंत्रिका तंत्र। परंतु आप देख नही सकते उसे, अपनी खुली आँखों से। यह रीढ़ की हड्डी के भीतर होता है, यद्यपि अनुकंपी-तंत्रिका तंत्र बाह्य में है। दाएं पक्ष पर, स्थित है पिंगला नाड़ी, जो अभिव्यक्ति करती है, दाईं अनुकंपी-तंत्रिका तंत्र की।

मध्य में स्थित है, पराअनुकंपी-तंत्रिका तंत्र, जो वास्तव में स्वचालित है। और आप इसे नियंत्रित नहीं कर सकते। यह प्रदान करती है सारी ऊर्जा, जिसका उपयोग होता है, अनुकंपी तंत्र द्वारा। जब कभी आप चले जाते हैं, आपातकालीन स्थिति में, आप प्रारंभ करते हैं, उपयोग करना, अपनी अनुकंपी-तंत्रिका तंत्र का, किसी भी आपातकालीन स्थिति में, जैसे कि कहिए, भागना।

जब आप दौड़ते हैं, आपका ह्रदय प्रारम्भ कर देगा, धड़कना, परन्तु पराअनुकंपी, इसे सामान्य में ले आता है। यह छह केंद्र हैं, जहाँ से आपको मिलती है, ऊर्जा, अनुकंपी-तंत्रिका तंत्र के लिए। अब जब आप, आवश्यकता से अधिक कोई गतिविधि करते हैं, क्योंकि आप चले जातें हैं, अतिशयता में, तब वह विशेष चक्र, अस्वीकार कर देता है, उत्पादन, और अधिक ऊर्जा का, और वह थक जाता है, क्योंकि आप स्त्रोत से संबंधित नहीं है, और तनाव बढ़ने लगता है, और यदि आप चलते जाएँ, और अधिक इसके साथ, परिणाम कैंसर है।  

कैंसर का उपचार नहीं है। आप लिख कर रख लीजिए आज। और दस सालों से मैं कह रही हूँ, बिना सहज योग के, इसका उपचार नहीं हो सकता। क्यों कैंसर कार्य कर रहा है, हमारे भीतर? क्योंकि हम समाप्त कर रहे हैं अपनी ऊर्जा, विभिन्न चक्रों में, और कोई भी मार्ग नहीं होता, ऊर्जा को वापस लाने का, अपनी और। आपके पास होना चाहिए, कोई पद्धति, जिसके द्वारा आप, सम्बंधित हो जाए, स्तोत्र से। उदाहरण के लिए यदि आप जा रहे हैं, कार द्वारा, और आप का पेट्रोल समाप्त होने वाला है। तो आप तनाव उत्पन्न कर लेंगे, साधारणतया। परन्तु मान लीजिये, कि आप के पास मार्ग है, स्तोत्र से जुड़ने का। और ऊर्जा बहती है, आपके भीतर हर समय। आप हमेशा भरपूर रहने वाले हैं। आप पूर्णतया शांति में हैं। यही एक कारण है, कि लोग ले जा रहे हैं, स्वयं को शारीरिक रूप से सर्वनाश की ओर।  

दूसरा, यदि आप ऐसा नहीं करते। यदि आपको कैंसर नहीं होता, अथवा ऐसा कोई अन्य रोग।  आप नीरस हो जायेंगे जीवन में, आप ऊब जायेंगे स्वयं से। तब नीरसता से पार होने के लिए, आप जाते हैं शराबखाने की ओर। आप जाकर पीते हैं, और करते हैं, यह सब, शराब की लत ।  

निःसंदेह आजकल लोग गुण गा रहे हैं शराब के। आप करते रहिए प्रशंसा इसकी, कोई बात नहीं, मैं नहीं कहूँगी, आप शराब मत पीजिए। आप सहज योग में आईए, और आप छोड़ देंगे। हजारों लोगों ने छोड़ दिया है पीना, और क्यों?

मेरा अर्थ है, मैं नहीं बताती उन्हें, “मत पीओ” बिलकुल नहीं। मैं कहती हूँ, “खाली बोतल मत लेकर आईए यहाँ।” पिछली बार एक सज्जन, बोतल लेकर आए यहाँ, केवल मुझे मारने के लिए। परन्तु यदि, आप यहाँ आते हैं, आप अपना परम प्राप्त करते हैं, आनंद अपने परम का, और तब आप पीना नहीं चाहते, स्वयं ही। तब भी, यदि आप चाहें, आप नहीं पीएंगे। मैं कुछ नहीं करती आपको, मैं आप से नहीं कहती, मैं आपका मन परिवर्तन नहीं करती, अथवा मैं कुछ नहीं कहती, शराबबंदी के बारे में, कुछ नहीं, किसी प्रकार का। स्वतः ही, जब आप स्वयं को प्राप्त करते हैं, आप उसके बाद ऊबते नहीं हैं, आप इतना अधिक संतुष्ट होते हैं, अपने भीतर से, और आप बिलकुल इसमें नहीं पड़ते हैं। यह एक बहुत सरल बात है, और वही है जिसकी खोज होनी चाहिए, और समय आ गया है, हमारे लिए, कि अपना आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करें। सबसे महत्वपूर्ण बात है, हम सभी के लिए, कि अपना आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करें।

अब इसके लिए, आप मोल नही दे सकते। मेरा अर्थ है, यह इतना बेतुका है बताना, परन्तु लोग इतने पागल हैं, की मुझे कहना पड़ता है। आप कैसे मोल दे सकते हैं, अपनी माँ के प्रेम का? क्या आप मोल दे सकते हैं, अपनी माँ के प्रेम का? मेरा अर्थ है, भारतीय समझते हैं, अपनी माँ को। कैसे आप मोल दे सकते हैं, उनके लिए? क्या आप बात भी कर सकते हैं इसके बारे में? यह इतना अपमानजनक है, इतना हास्यास्पद। परन्तु आप पैसे नहीं दे सकते, इसके लिए, आप पैसे नहीं दे सकते परमात्मा के लिए। कोई भी, चाहे वह बुलाता हो, स्वयं को, किसी भी नाम से, अथवा कुछ और, में चिंतित नहीं होती। परन्तु कोई भी जो, परमात्मा का नाम लेता हो, और पैसे लेता हो, परजीवी के समान रहता है, समाज पर, एक पापी व्यक्ति है। और वे जो अनुसरण करते हैं, उन व्यक्तित्वों का, साथ ही जाते हैं उस ओर, जो जाता है नरक की ओर सीधा।   

आप पैसे नहीं ले सकते, इस प्रेम के लिए। यह प्रेम, यह बहता है, यह बस बहता है, यह कुछ नहीं चाहता, आप वापस भुगतान नहीं कर सकते इसको। यह बस बहता है, प्रकाश के सामान। यह अपेक्षा नहीं रखता किसी चीज़ की, यह केवल अपेक्षा रखता है, इस के बहाव की। जब तक यह बहता है, यह संतुष्ट है, यह और कुछ नहीं चाहता। आंकलन मत कीजिए, परमात्मा का आदर्शों द्वारा, जो मनुष्य के होते हैं स्वयं के बारे में।

वे प्रयास करते हैं, उन (परमात्मा) को व्यवस्थित करने का। और वे खरीदने वाले हैं उन्हें। ऐसे होते हैं, मैं जानती हूँ। सभी संस्थान, तथाकथित धार्मिक संस्थान, जहाँ लोग बिल्कुल परजीवी होते हैं, वहाँ रहते हैं, काम नहीं करते, पैसे बनाते हैं धर्म में से। और यह बहुत कठिन है, उनके लिए स्वीकार करना, जब मैं कहती हूँ, “आप मोल नहीं दे सकते, इसके लिए।”

परंतु मैं बताती हूँ आपको कि, आपकी माँ से, आप जान सकते हैं, कि इस माँ के पास कम प्रेम है आपके लिए, परंतु सर्वशक्तिमान परमात्मा के पास महासागर है। आप मोल नहीं दे सकते उस महासागर का। बस स्वीकार कीजिए इसे। यह बहने लगेगा, उमड़ आएगा, आपको ढक लेगा, आप को सुंदर बना देगा। समय आ गया है, आप सभी के लिए, इसे प्राप्त करने का।

आज, मैं सोचती हूँ, यह पर्याप्त है। कल मैं बताऊंगी आपको, विस्तार से, सभी चक्रों के बारे में, और कि कैसे उन्हें बनाए रखें। परंतु मैं अनुरोध करूंगी कि, आत्मसाक्षात्कार के बाद, आपको जानना चाहिए, कि प्रत्येक प्रकाश, जिसको प्रबुद्ध किया जाता है, चला जा सकता है फिर से पीछे की ओर। क्योंकि लोग ध्यान नहीं देते इसके बारे में। तो आपको पता होना चाहिए, जागृति के बाद, कैसे देखभाल करें दीपक का। 

यदि आप कर सके इसे, कुछ दिनों के लिए भी, यह सशक्त होगा। और तब आप प्रारंभ करेंगे इस का आनंद लेना। और तब आप प्रवेश करेंगे एक क्षेत्र में, जहाँ और कुछ नहीं, परंतु है, आनंद और हंसी, और उल्लास और प्रसन्नता और हर्ष। और उस आनंद लेने में, आप अचंभित होते हैं, कि कहेंगे, कि देखेंगे की, आप संबंधित है एक दूसरे से, इतना अधिक, जैसे एक भाग उंगली का संबंधित है पूरे शरीर से। 

ऐसा होता है, यह वास्तविक है, यह भाषण देना नहीं है, की आप भाई और बहन हैं, नहीं, यह होता है, आप बन जाते हैं ऐसे, जब कुंडलिनी उठती है। प्रबुद्धता, आपकी उंगलियों पर, आप के अस्तित्व पर, आपको अवगत बनाती है, कि आप अंग प्रत्यंग है दूसरों के भी। यह आपको बनाती है। आपको बताने की आवश्यकता नहीं होती, स्वयं को। आपको शिक्षित करने की आवश्यकता नहीं होती, स्वयं को। यह बस हो जाता है, यह बस घटित होता है, यथार्थी-करण।

सामूहिक चेतना, बन जाती है आपका धर्म। यह बन जाती है आपका अस्तित्व। और यही है जिसका आपको लाभ उठाना है। और वही है जो आपको प्राप्त करना होगा। उसके लिए, किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं है, पैसा नहीं, अथवा कुछ और की आवश्यकता, अतिरिक्त कि जब आप इसे प्राप्त करें, आपको इसे बनाए रखना होगा, कुछ समय के लिए, जब तक यह प्रज्वलित ना हो जाए ठीक से। 

परमात्मा आपको आशिर्वादित करें। 

मैं आपको आश्वासन देती हूँ, कि इससे आश्चर्यजनक कार्य हुए हैं, और यह काम करने वाला है, आश्चर्यजनक रूप से आपके लिए। आपका ऐसा नहीं होगा मनोभाव, जैसा आपका होता है, दुकान में। आपने इसके लिए पैसे नहीं दिए हैं। मैंने आपको प्रेम दिया है। इस कारण, मैं आपके साथ हूँ। और इसके लिए, आपको व्यवहार करना होगा, उस प्रकार से। सम्मान कीजिए इसका, और घमंडी मत बनिए। क्योंकि घमंड से, आप कदाचित इसे प्राप्त ना कर पाए। मैं नहीं चाहती, आप ऐसे, कुछ, इससे वंचित रहे। कृपया मेरी बात सुने। मैं आपकी माँ हूँ। और अभी तक, आप सभी, मेरे बच्चे हैं। चाहे आप 90 अथवा 100 के हो, कोई बात नहीं। इस संदर्भ में, आप सभी, मेरे बच्चे हैं। और आपको, सुनना पड़ेगा, मुझे। अपने आनंद में जाइए, अपनी प्रसन्नता में जाइए, और पहुंचे अपने अस्तित्व की चाबी तक। बहुत-बहुत धन्यवाद।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करें।