Seminar for the new Sahaja yogis Day 3

(भारत)

Feedback
Share

1980-01-30, Seminar for the new Sahaja yogis Day 3, Bordi 1980 (Hindi)

और जाते समय, आप सब लोगों को, यहाँ पर छोड़ के, इतनी प्यारी तरह से, इन्होंने, अपने हृदय से निकले हुये शब्द कहे, जिससे, चित्त बहुत खिच सा जाता है। आजकल के जमाने में, जब प्यार ही नहीं रह गया, तो प्रेम का खिंचाव और उससे होने वाली, एक आंतंरिक भावना भी संसार से मिट गयी है। मनुष्य हर एक चीज़ का हल बुद्धि के बूते पर करना चाहता है। बुद्धि को इस्तेमाल करने से मनुष्य एकदम शुष्क हो गया। जैसे उसके अन्दर का सारा रस ही खत्म हो गया और जब भी कभी, कोई भी आंतरिक, बात छिड़ जाती है तो उसके हृदय में कोई कंपन नहीं होता, क्योंकि हृदय भी काष्ठवत हो गया। न जाने आज कल की हवा में ऐसा कौनसा दोष है, कि मनुष्य सिर्फ बुद्धि के घोड़े पे ही चलना चाहता है, और जो प्रेम का आनन्द है उससे अपरिचित रहना चाहता है। लेकिन मैं तो, बहुत पुरानी हूँ, बहुत ही पुरानी हूँ और मैं मॉडर्न हो नहीं पाती हूँ। इसलिये ऐसे सुन्दर शब्द सुन के, मेरा हृदय बहुत ही आंदोलित हो जाता है । लेकिन आज कल की, बुद्धि भी, अब हार गयी। अपना सर टकरा टकरा के हार गयी है। और जान रही है कि उसने कोई सुख नहीं पाया, कुछ आनन्द नहीं पाया। उसने जो कुछ भी खोजा, जिसे भी अपनाया, वो सिर्फ उसका अहंकार था। उससे ज्यादा कोई उसके अन्दर अनुभूति नहीं आयी। धीरे धीरे मनुष्य, इससे परिचित हो रहा है कि वो किस कदर काष्ठवत हो गया है। किस कदर उसकी भावनाएं सुप्त हो गयीं हैं। आज कल के कवि अगर पढ़िये या आजकल के अगर वाङ्मय पढ़िये, साहित्य, तो उसमें आपको नज़र आयेगा, कि बहुत ही अश्लील तरह की उथली बातें, जिसका की सम्बन्ध हृदय से तो क्या, किसी उथली एक तरंग से भी नहीं लगता। उसी प्रकार, कविताओं में भी, इतनी शुष्कता और इतनी घृणित बातें लिखी जाती हैं, कि स्वभावत: कोई भी मनुष्य अगर इतना कृत्रिम और बुद्धिवादी न हो जायें, तो उसे तो जी मचलने लग जाये। माने हमारी संवेदनशीलता बड़ी ही घट गयी है, और इस संवेदनशीलता के घटने के साथ, ये पहचानना की कौन इन्सान अच्छा है, और बुरा है, ये भी घट गया। ये भी संवेदनशीलता हमारे अन्दर घट गयी है कि अच्छाई क्या है और बुराई क्या है? अच्छाई क्यों करनी चाहिये और बुराई क्यों छोड़नी चाहिये। इसकी भी अकल हमारे अन्दर से खत्म हो चुकी है। जब श्रीराम इस संसार में आये थे, हज़ारों वर्ष पहले, तब मनुष्य बहुत ज्यादा संवेदनशील था। एक तो माँ पृथ्वी से उसका सम्बन्ध बहुत घटित रहा, इसलिये उसकी संवेदना बड़ी तीक्ष्ण थी। वो जानते थे कि श्रीराम ये विष्णु के अवतरण है, और सीताजी ये आदिशक्ति का अवतरण है। उनको किसी को बताने की जरूरत नहीं थी। उस वक्त अधिकतर लोग इस बात से परिचित थे कि श्रीराम भगवान स्वरूप हैं। नहीं तो एक भीलनी उनके लिये बेर ले के क्यों आयी। अब देखिये, कहाँ तो श्रीराम, इतने बड़े राजा और एक भीलनी उनके लिये बेर ले के आयी। देखिये प्रेम का खेल कितना सुन्दर है। और जब वो अपने बेर तोड़ती थी, बूढ़ी सी भीलनी थी। उसके दाँत भी कुछ टूटे हुए थे बेचारी के, एक एक बेर को वो दाँत मार के देखती थी कि कहीं खट्टा तो नहीं है। नहीं तो मेरे राम को खट्टा न लग जायें। इतने विचार से उस भीलनी ने, उसके हाथ गंदे थे कि साफ़ थे पता नहीं। एक भीलनी आप समझ सकते हैं कि जो बिल्कुल गिरिजनों में से, जिनको कहना चाहिये, हमारे यहाँ आजकल जिनको हम लोग दलित ही कहते हैं।

ऐसे समाज में की भीलनी इतने प्रेम से, प्रभु राम के लिये छोटे छोटे बेर इकट्ठे कर रही थी। और जब श्रीराम आये, तो बगैर हिचक के उन्होंने उनसे कहा कि, ‘श्रीराम, मेरे पास आपके लिये बड़े सुन्दर बेर हैं। एक एक बेर मैंने अपनी दाँत से चख के देखे हैं। इससे आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी।’ श्रीराम का हृदय पुलकित हो गया, क्योंकि वो प्रेम को जानते थे | प्रेम की संवेदना उनके अन्दर जबरदस्त थी। क्योंकि वो परमात्मा थे। परमात्मा स्वयं प्रेम है, इसलिये वो प्रेम को जानते हैं। प्रेम के भूखे हैं और प्रेम ही को पहचानते हैं। अगर आपको परमात्मा को बाँधना हैं तो आप प्रेम करिये । अगर आप प्रेम नहीं कर सकते तेा आप परमात्मा को नहीं बाँध सकते। सिर्फ प्रेम से ही आप परमात्मा को बाँध सकते हैं। किसी भी ऐसी शक्ति को आप तभी अपने ऊपर खींच सकते हैं, उसका उपयोग कर सकते हैं, उसके शरण जा सकते हैं या उसको अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं । जब आपके अन्दर, ऐसा हृदय हो, कि जो प्रेम से खुश हो जाता है । श्रीराम ने वो बेर, चटाक् से, एकदम, दौड़ के ‘अरे, तुम इतने बेर इकट्ठे कर लायी, चलो, चलो सब मुझे दे दो।’ और ले कर खाना शुरू कर दिया। और खूब खुशी से खा के कहते हैं, ‘वाह, मैंने तो ऐसे कभी बेर नहीं खाये। ऐसे बेर तो मैंने जीवन में कभी नहीं खाये। ऐसे सुन्दर बेर मैंने कभी खाये नहीं, ये तुम कहाँ से इकट्ठे कर के लायी। अच्छा, बताओ।’ तो लक्ष्मण जी को बड़ा गुस्सा आ रहा था, कि ये क्या बदतमीज़ी हैं। सब बेर एक एक झूठे कर के लायीं है और इन्होंने श्रीराम को दे दिया। तो उन्होंने लक्ष्मण जी को कहा कि, ‘देखो , मैं तुम को इस में से एक भी बेर नहीं दूँगा। ये सारे मेरे लिये लायी है, बाकी तुम को चाहिये तो तुम अपने तोड़ के खा लेना। पर इस में से मैं एक भी नहीं दूँगा।’ तो सीता जी तो बहुत होशियार थीं । उन्होंने कहा , ‘श्रीराम, मुझे भी तो दो-चार बेर दे दीजिये। क्या आप ही सब खाईयेगा । मैं तो आपकी अर्धांगी हूँ। मुझे भी तो एक-दो बेर दीजिये।’ तो उन्होंने कहा कि, ‘अच्छा, आप, चाहिये तो थोड़े से मुझ से बेर ले लीजिये।’ अब लक्ष्मण जी को लगा कि देखो, सब तो भाभी को बेर दे दिये और मुझे नहीं दे रहे हैं ये। तब उनको बुरा लग गया। तो भाभी से कहते हैं कि, ‘क्या मुझे कुछ बेर नहीं दीजियेगा? सब आप ही लोग खा लीजियेगा।’ देखिये कितनी छोटी सी चीज़ है एक बेर। एक छोटी सी चीज़ है बेर, कोइ बड़ी भारी चीज़ नहीं है। लेकिन उस बेर पे कितनी ही रचना, कविता कर सकते हैं आप। और उसकी आज तक याद है। हर एक हमारे जितना भी हिन्दुस्तान में जितना भी लिटरेचर कोई भी भाषा में हुआ हो, हर जगह शबरी के बेर कहे जाते हैं। कितनी सुन्दरतम कल्पना हैं और कितनी सूक्ष्म है वो। उसको समझने के लिये हृदय चाहिये। बुद्धि से आप नहीं समझ सकते इसे, और जब भी इस बात का ख्याल बनता है और याद पड़ती है तो इतना हृदय उस से पुलकित हो जाता है, सोच के कि शबरी ने कितनी प्यार से ये बेर अपने भोले पन में इकट्ठे किये थे। ऐसे कहाँ शबरी जैसे लोग दुनिया में मिलेंगे! ये उसका हृदय था कि जिसे एक एक बेर में वो देख रहे थे और देख देख कर के खुश हो रहे थे कि अहाहा, कितना प्रेम मनुष्य में है। जैसे समझ लीजिये कि एक प्यार का सागर परमात्मा है और जब वो आ कर किनारे में टकराता है, तो किनारे के टकरान से फिर उस पे लहरें उठनी शुरू हो जाती हैं और वो जब लहरें वापस समुद्र की ओर जाती हैं तो आनन्द से वो बिल्कुल भर जाता है । प्रेम की गाथा जितनी कहो सो कम है। प्रेम की गाथा तो ऐसी है कि उसको कहते भी नहीं बनता। वो बहते ही रहता है, बहते ही रहता है, बहते ही रहता है। जितना बहता है उतना ही आनन्द उसमें से झरता है। आप प्रेम का कोई मूल्य क्या ही दे सकते हैं तो मेरी समझ में नहीं आता। यही की जब आपसे वो टकराता है, तो उसके तरंग फिर उठ कर के और बड़ा सुन्दर सा चित्र सा बन जाता है।

उस सागर पे भी एक चित्र सा बन जाता है। एक आंदोलन सा, एक बड़ा सुन्दर सा, एक, झिलमिल झिलमिल जिसे कहना चाहिये प्यार का दर्शन हो जाता है। इसके लिये मनुष्य में बड़ी सूक्ष्मता चाहिये, इस चीज़ को समझने के लिये । जो लोग बहुत ही ग्रोस है, जो कि बहुत ही जड़ हैं, जिनके अन्दर प्रेम का अभी तक कोई आविर्भाव ही नहीं हुआ, जो एकदम पत्थर दिल हैं, इन लोगों के सामने प्रेम की गाथा कहना भैंस के आगे बीन बजाने के बराबर है। इस तरह की इस प्रेम की शक्ति हमारे अन्दर कहाँ से उदित होती है ? किस जगह ये प्रेम की शक्ति है ये हमारे हृदय के अन्दर बसे हुए आत्मा के तरंग से ही प्रेम की शक्ति आती है। और इस के प्रतीक स्वरूप हमारे अन्दर जो यहाँ पर आपको दिखायेंगे, जो बीचोबीच, जो हमारे यहाँ बीच में है, हृदय में, बीच में यहाँ पर जो स्टर्नम बोन है, जिसे एक हड्डी के रूप में हम देखते हैं, वहाँ पर आप जानते हैं, कि एंटीबॉडिज़ नाम की चीज़ तैय्यार होती हैं। ये माँ अपने शक्ति में क्योंकि हृदय चक्र जो है वो बराबर उसके पीछे में बराबर बीचोबीच है और इस हृदय चक्र पे जगदंबा का स्थान है मैंने कल आप से बताया था। और इस स्टर्नम बोन के अन्दर में ये जो सामने में जो हड्डी है, इस हड्डी के अन्दर एंटीबॉडिज़ नाम के सिपाही माँ तैय्यार कर देती है। जो बारह साल तक तैय्यार होते रहते हैं। और फिर वो अपने सारे शरीर में फैल कर सा सुसज्ज रहते हैं। कभी भी किसी भी तरह का अटैक जब शरीर पर आता है, कोई भी तरह का, चाहे वो उसके माइंड से आये, चाहे माने उसके मन से आये, चाहे उसके शरीर से आये, चाहे उसके अहंकार से आये, सारे अटैक से ये एंटीबॉडिज़ जो होती हैं ये माँ के बनाये हुये सिपाही उससे लड़ते रहते हैं। अब हम लोग सोचते हैं कि हमारे अन्दर जो भी कुछ इस तरह के संरक्षित रखने वाले जो कुछ भी हमारे अन्दर फोर्सेस हैं या शक्तियाँ हैं वो जैसे कोई हमारी अपनी ही हैं। ये पहले ही से परमात्मा ने आपके अन्दर ये सब धीरे धीरे एक एक चक्र बनाये। ये सारे चक्र आप ने जो उत्क्रांति में, इवोल्यूशन में जो जो कदम रखे हैं, उस कदम का माइल स्टोन है। अपने मंजिल पे पहुँचने के लिये जिस तह से आप गुजरे हैं उन तह का ये दिग्दर्शक है। मैंने आप से बताया कि कार्बन एटम जब आप थे तो आपका जो सब से छोटा चक्र है श्री गणेश का वो था। अब कार्बन कितना महत्त्वपूर्ण है उसके बारे में मैं आप से बताती रहूँ तो बहुत टाइम हो जायेगा। लेकिन आप पिरीऑडिक टेबल अगर आप देखें तो आपको पता चलेगा कि कार्बन एटम के आये बगैर कोई भी प्राणी में जीव नहीं आ सकता है। जीवन कार्बन के आने के बाद ही शुरू हुआ है। इसलिये ये कार्बन जो है ये श्रीगणेश, जो अपने अन्दर मूलाधार चक्र पे बैठे हुये हैं। उस श्रीगणेश का द्योतक है। जिस प्रकार कार्बन में भी चार वैलन्सीज होती है उसी प्रकार श्रीगणेश के भी चार हाथ हैं। और ये चारों हाथ हमारे अन्दर शक्ति के द्योतक हैं। जब हमारे अन्दर मूलाधार चक्र जागृत हो जाता है, तो हमारे अन्दर ये चारों शक्तियाँ जागृत हो जाती हैं। इसी प्रकार अब हम हृदय चक्र की बात कर रहे थे कि हृदय चक्र जब इन्सान का खराब हो जाता है, या हृदय पे जब आघात होने लग जाते हैं, तो आदमी में असंरक्षित भावनायें आ जाती हैं। इनसिक्यूरिटिज आ जाती हैं। जिससे भय, आशंका आदि चीजें, डरना किसी चीज़ से, एकदम पता नहीं रात में बैठे बैठे, औरतों में ज्यादा तर होता है कि उनको हमेशा आशंका लगी रहती है कि कोई हमें परेशान तो नहीं कर देगा, कोई हमें मार तो नहीं डालेगा। किसी को कुछ दिखायी देता है, कोई कहता है कि ‘मुझे यहाँ पर एक आदमी दिखायी दिया। कहीं कुछ हो गया। इसी से हिस्टेरिया आदि जो बीमारियाँ हैं, डरने की जो बीमारियाँ हैं वो सब होती हैं। इसको सुरक्षित रखने के लिये हमारा जो हृदय का, सेंटर में जो हृदय का जो चक्र है उसे जागृत रखना पड़ता है।

कल मैंने आपसे बताया था, कि इसको जागृत करने के लिये आपको जगदंबा का ध्यान करना चाहिये। वो किस प्रकार करना चाहिये आदि, सब कुछ आप सहजयोग में सीख सकते हैं। असल में सहजयोग में पार होने के बाद भी आप को सीखना पड़ता है, कि ये चक्र क्या हैं, उसको जागृत कैसे रखना चाहिये, कुण्डलिनी को कैसे चढ़ाना चाहिये, किस तरह से ठीक रखना चाहिये। एक छोटी सी चीज़, अगर आपको मैं मोटर भी प्रेज़ेंट कर दूँ, और अगर ये नहीं आप सीख लेंगे कि मोटर कैसी चलानी है तो मोटर खड़ी रह जायेगी। उसी प्रकार सहजयोग में इसका बहुत सीखना होता है। मेरे लेक्चर में मैं आपको कहाँ तक बता सकती हूँ? लेकिन अधिकतर सहजयोग में आये हुये लोग इस हॉल में, इसी प्रकार हमेशा लोग आते हैं। लेकिन उनमें से कितने लोग सहजयोगी हो गये। इसी पे मुझे आश्चर्य होता है। अभी उदाहरण के लिये आज ही एक माँ, एक बेटी, और उसकी बेटी, इस प्रकार तीन जनरेशन मेरे पास आये। ये लोग १९७० में मेरे हाथों से पार हुये थे। उसके बाद इनकी तबियत बड़ी खराब गयी, चार साल बाद। तो एक सहजयोगी के पास गये कि ‘साहब, हमारी तबियत बड़ी खराब गयी, ये हुआ, वो हुआ, क्या करें? बेचारे सहजयोगी मेहनत करने के पीछे में उनके यहाँ गये। उनको देखा । उन से कहा कि, ‘देखिये आप बिल्कुल सहजयोग नहीं कर रहे हैं। आपकी कुण्डलिनी यहाँ फँसी हुयी हैं। अगर आप अपनी कुण्डलिनी ठीक से जागृत कर ले, ठीक कर ले तो आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी। बिल्कुल आसान चीज़ हैं। मैं आपको कर के दिखाता हूँ।’ उन्होंने उनकी कुण्डलिनी फिर से जागृत कर दी। उनसे कहा कि, ‘अब देखिये , इसमें जमिये। इस में थोड़ा सा काम करना पड़ेगा आपको, ज्यादा नहीं। जरा ध्यान दें। अपनी ज्योत जलाये रखें।’ लेकिन वो फिर से वही, ‘ये रे माझ्या मागल्या’ जैसे मराठी में कहते हैं। उन्होंने बिल्कुल इस ओर ध्यान नहीं दिया। उसके बाद उनको एक गुरुजी मिल गये, बीचोबीच। तो उन्होंने उनसे बताया कि, ‘हाँ, मैं तुमको एक मंत्र देता हूँ, जंतर- मंतर देता हूँ।’ उन्होंने कहा, ‘अच्छा, ठीक है।’ एक काला साधारण धागा, बिल्कुल साधारण धागा। उसको पता नहीं क्या उन्होंने करके और इन्होंने सब के गले में दे दिया, सब का सौ सौ रूपया ले लिया, जंतर मंतर का। वो धागे का दाम अगर जोड़ने चाहिये तो दो पैसा भी नहीं होगा। अब सब लोग गले में पहन करके बिल्कुल उनके ऊपर मर गये। अब वो महाराज साहब जो हैं उनके बड़े ऐसे शिष्य हैं। और उनको कहने लगे कि, ‘ये जो उदी है, ये हम साईंनाथ की उदी लाये हैं, ये अपने घर में रखिये।’ अब वो उदी ले कर के गयी| अपने घर में उदी लगाने लग गये। आज अब साईंनाथ तो यहाँ हैं नहीं, बताएँ ये किस की उदी है? कौन से श्मशान घाट से उठा के लाये हो। और इसमें तुम्हारा कौन सा हेतु है। तो कहने लगे कि, ‘ वो उदी ऐसे ऐसे उपर से नीचे नीचे गिरती थी, तो हम बड़े इस से इंम्प्रेस्ड हो गये। मैंने कहा, ‘ये तो सारी भूतविद्या है।’ बहरहाल जो भी हो वो उसी में बहते गये। आज वो पहुँची देवी जी, तो उनकी माताजी जो थी वो तो चल नहीं पा रही थी। उनका सारा बदन यूँ, यूँ हिल रहा था मेरे सामने। उनकी जो लड़की थी, उसकी एक टाँग टूट गयी, क्योंकि यहाँ पर उसके पता नहीं क्या हो गया , एक्सीडेंट हो गया और उसका एकदम औसिफिकेशन हो गया| तो उसके बाद डॉक्टर ने इधर से काट दिया। उनकी टाँग आधी छोटी हो गयी। लड़़की उनकी जो लड़़की थी उसको किड़नी की ट्रबल हो गयी और अब उसको डायलिसिस पे रखा हुआ है। उसको भी जा कर बेचारे एक सहजयोगी ने बचाया। उससे वो बच गयी और उसकी हालत अब पहले से ठीक है, हॉस्पिटल से निकल आयी। उस वक्त उस सहजयोगी ने उनको समझाया कि देखिये, ये सब साधुओं के चक्कर में मत घूमिये। लेकिन वो उनसे रुपया भी लेते थे । पैसा भी लेते थे और ये भी करते थे। तो उन्होंने कहा कि ‘ नहीं, नहीं वो तो हमसे बड़े अच्छे हैं, बड़ी मीठी बातें करते हैं।

हमसे कभी नहीं कहते कि आप ये नहीं करो । हम शराब भी पीये, कहते हैं कि पीयो । कोई हर्जा नहीं। कुछ भी काम करो हर्जा नहीं है। बस पर्स मुझे दे दो। पीछे मैं ये है। आपको जो भी काम करना है करते रहो । माताजी तो कहती हैं न कि ऐसा नहीं करो, वैसा नहीं करो। लेकिन ये तो कभी किसी चीज़ को मना नहीं करते। ये तो कुछ नहीं, अगर आप उनसे कोई भी बात करो वो आपसे कहते हैं ठीक है।’ ऐसे ऐसे गुरु लोग हैं कि आप स्मगलिंग करते हैं तो कहते हैं कि ‘अच्छा भई मैं तुम्हें स्मगलिंग का तरीका बताता हूँ। लेकिन उसमें से इतना रुपया तुम मुझे दे दो। अब इस तरह के महामूर्ख लोग, जो कि इनको परमात्मा का काम समझते हैं। ऐसे लोगों का किस तरह से नुकसान होता है वो देखिये। अब वो जो लड़की थी, उसका भी डायलिसीस हो गया, उसकी भी हालत खराब, मै तो तीनों को देख कर मेरे आँसू भर आये। मैंने कहा कि, ‘हे राम, इनका ये क्या हो गया?’ मैंने कहा, ‘अच्छा, अब जाईये, माफ करिये’ मैं तो समझ गयी सब चीज़, उनके उपर दिखायी दे रही थी। मैं क्या कहूँ उनसे? मुझे तो किसी ने कभी कोई बात बतायी नहीं थी, न शिकायत की थी, पर मैं समझ गयी कि ये बात क्या है। तो मैंने कहा कि, ‘भाई, तुम तो १९७० में हमसे पार हुयी थीं। उसके बाद वो जो दीप तुम्हारे अन्दर जला था, जो तुम्हारे अन्दर जो अनुभव आया था। उसका तुमने क्या किया ये? और उस वक्त के जो बीमार थे, जिनको ल्यूकेमिया था, कैन्सर था वो आज कहाँ से कहाँ पहुँच गये और तुम बेवकूफ़ जो कि इतनी अच्छी थी आज कहाँ से कहाँ चली गयीं। ये सब क्यों किया?’ तो भी वो काला धागा ले कर के आये थे गले में गधे जैसे। वो काला धागा नहीं छूट सकता था उनका, वो गले में पहने हये थे। इतनी पकड़ होती है इन लोगों की। मैंने कहा, ‘पहले आप इस काले धागे को फेंकियें।’ बड़ी मुश्किल से माना उन्होंने, कि इस काले धागे को हम गले से उतारेंगे, बताईये। फिर सब बातें सामने आयीं, कि वो आदमी कितना रुपया लेता है, उनके लड़के को कितना लूटा। ये हुआ, वो हुआ। उससे पहले वो बताने के लिये भी तैय्यार नहीं थी कि उस काले धागे के बूते पर। याने मनुष्य इतना कमजोर है, कि एक धागा तक उसे बाँध सकता है। उसकी यही बुद्धि है क्या? मैं कहती हूँ कि इतनी आप लोग अपनी बुद्धि की कमाल समझते हैं। आपके पास इतनी भी क्या बुद्धि नहीं कि ये समझ ले कि ये आदमी को हम देख रहे हैं, इसका चरित्र अच्छा नहीं है, ये हमसे रुपया लूट रहा है, हमें परेशान कर रहा है, हमें इससे कोई भी लाभ नहीं, तो भी उसी के चरणों में आप क्यों जाते हैं? और उनका भी हृदय चक्र ऐसा धक धक, धक धक, ऐसे कर रहा है। बहरहाल तुम तो जानते हो कि माँ जो है वो क्षमाशील है, मतलब क्षमा हमारा स्वभाव है, हम उसको कुछ किसी तरह से जीत नहीं पाते। माने ऐसा है कि जब ऐसी हालत में किसे देखा तो फिर थोड़ा सा तो जरूर कहा लेकिन फिर उसके बाद फिर दिल लगा लिया। क्योंकि तकलीफ़ भी तो देखी नहीं जाती ना! बेवकूफ़ है तो क्या! बच्चे तो अपने ही हैं। उनकी तकलीफ़ भी नहीं देखी जाती और मैंने उन्हे फिर से अपने दिल से लगा लिया। लेकिन क्यों मुझे परेशान करते हो? क्यों नहीं अपना जरा खयाल करते? क्यों नहीं इसमें रचते हो? ये सब तुम्हारे लिये मुफ़्त है। इसको पाओ। इसमें रजना चाहिये। इसको सम्भालो। एक माँ हर समय अगर आपकी रखवाली भी करती रहे, और आप हर समय जाये और आ बैल मुझको मार, नहीं तो किसी कुँऐ में कूद, नहीं तो कोई आग में कूद, इसकी क्या जरूरत है? ये शैतानों के काम हैं, समझना चाहिये कि जो आदमी भगवान के नाम पे आपसे पैसा लेता है वो शैतान है शैतान! उसके पास बिल्कुल नहीं जाना चाहिये। आपको मैं समझा समझा के हार गयी। इस बम्बई शहर में कितने वर्षों से मैं यही बात कहती आयी हूँ।

पर अब भी मैं देखती हूँ कि आधा बम्बई शहर न किसी न किसी आदमी के पीछे में लगा हुआ है। हर सातवे घर में एक गुरु का फोटो आपको मिल जायेगा। इतने हो गये हैं कि मच्छरों जैसे, और सब को ये मच्छर काटते रहते हैं और लोगों को अच्छा लगता है मच्छरों का काटना। उसमें एक ही बस बात है कि वो आप से कहते हैं कि अच्छा आप मुझे पैसा दीजिये। कितनी बड़ी सूक्ष्म अहंकार पे चोट है, इसे आप देख लीजिये, कि आप हमें पैसा दीजिये और हम आपके गुरु हो जायेंगे। साफ़ साफ़ नहीं कहते वो, गोल घुमा कर कहते हैं। लेकिन आपको अच्छा लगता है, कि ये हमसे रुपया ले रहे हैं। हम गुरु को खरीद रहे हैं। गुरु रख लेते हैं लोग। अभी हम एक गाँव गये थे। वहाँ पर एक देशमुख साहब खूब शराब पीते हैं। उनकी बीबी मेरे पास आयीं। मुझ से कहने लगी, ‘माँ, इनकी शराब छुडा दो।’ मैंने देखा कि इनका चक्कर ठीक नहीं । कहने लगे कि, ‘नहीं हम तो बहुत धार्मिक हैं। हमने गुरु रखे हुये हैं। मैंने कहा, ‘अच्छा!’ जैसे पहले लोग, भाई लोग रख लेते थे या कोई ब्राह्मण लोग रख लेते थे, आजकल गुरु लोग रख लेते हैं। और वो गुरु लोग को अपना पैसा सप्लाय होते रहता है। और गुरु साहब कहते हैं कि, ‘ठीक है भाई तुम्हारी औरतों को मैं सम्भालता हूँ।’ ये औरतें जा कर के, वो गुरु यंग आदमी है उनको नेहलाती हैं, धुलाती हैं। ये करती हैं। वो करती हैं। और अगर वो कुछ कहें कि, ‘भाई तुम लोग शराब क्यों पीते हो?’ अपने आदमी से ऐसे कहें। तो गुरु साहब कहते हैं कि ‘देखिये, इनसे कुछ मत कहिये । मैं उनको ठीक कर लूंगा। अंत में मैं इनका भी कल्याण करूंगा। औरतों का तो कल्याण कर ही रहे हैं। अब उनका भी कल्याण करो। ‘आप अभी कुछ मत कहिये।’ इसलिये उनको सहजयोग पसंद नहीं आ सकता। ऐसे लोगों को सहजयोग नही पसंद आ सकता है क्योंकि वो चाहते हैं कि परमात्मा के नाम पर अपनी गन्दगियाँ छुपा लें। कितनी गन्दी चीज़़ है! इससे परमात्मा का क्या नुकसान होने वाला है? अगर आपके अन्दर गन्दगी रहेगी तो इससे क्या परमात्मा को बीमारी होने वाली है कि आपको बीमारी होने वाली है? थोड़ा विचार करना चाहिये। परमात्मा तो निर्मल ही है, उसके अन्दर तो कोई दोष है ही नहीं, उसको कुछ नहीं चाहिये । वो आपको समझा रहा है अगर, वो कह रहा है कि, ‘भाई , अपनी अन्दर की गन्दगी को निकाल दो, उससे आपको तकलीफ़ होगी।’ तो इस बात पर सब लोग नाराज़ हो जाते हैं। तो समझदारी की बात ये हैं कि जब आप पार हो जाते हैं, जब आप में आत्मसाक्षात्कार आ जाता है, आप खुद ही देखने लग जाते हैं अन्दर में कि मैंने ये चक्र पकड़ा है, ये चक्र पकड़ा है, मेरा ये चक्र पकड़ा है। ‘माँ मेरे चक्र साफ़ करो!’ आप को उसी की तकलीफ़ होने लग जाती है और कहते हैं कि चलो इसकी सफ़ाई करवा लें। जिस प्रकार एक जानवर को आप गन्दगी से ले जाईये उसको पता नहीं चलता है। उसी प्रकार मनुष्य को कितने भी अनीति में से गुजार दीजिये, उसको पता नहीं चलता है, कि ये अनीति है, ये पाप है। उसको समझ में नहीं आता है। पाप के प्रति उसकी संवेदना बिल्कुल जीरो हो गयी। लेकिन जब, वो पार हो जाता है, वो देखने लगता है कि कितनी गन्दगी है। उसकी बदबू उसे आने लग जाती है। वो समझने लगता है कि ये मेरे अन्दर छिपी हुई ये सारी चीजें निकल जाये जितनी जल्दी, अच्छा है। क्योंकि वही अपना डॉक्टर हो जाता है और देखने लगता है, यही आत्मसाक्षात्कार है। अपने सारे चक्रो को जानना, अपनी अन्दर की खराबी जानना और दूसरों के अन्दर के जान कर के भी उसमे सामूहिक चेतना में उसको महसूस करना, यही आत्मसाक्षात्कार है। ये कोई लेक्चरिंग की बात बिल्कुल भी नहीं। कल भी मैंने आपसे कहा ये घटित होना चाहिये।

लेकिन इसमें अगर आप रूजे नहीं, इसमें आप बैठे नहीं, इसमें आपने मेहनत नहीं की और जो आप की पिछली आदतें थीं जैसे की बहुत अहंकारीपन करना और बेवकूफ़ियाँ करना तो फिर ये चीज़ चलने नहीं वाली। अपने प्रति प्रतिष्ठित हो गये। अपने को समझ के, कि हम एक दीप हैं संसार के। हमें जलाया गया है, हमारे अन्दर रोशनी आ गयी है। इस रोशनी को बचाना चाहिये। जब तक आप ऐसा नहीं सोचेंगे सहजयोग में आप उतर नहीं सकेंगे। आज सारे संसार को आप देखिये तो एक कगार पर खड़ा हुआ है। इससे उसको उस उँची दशा में उतरना ही है। ये उसके उत्क्रांति का चरम पद है। ये उसको लेना ही है। गर उसने नहीं लिया, तो उसका इलाज भी आने वाला है। जो लोग इस लास्ट जजमेंट को, ये आपका आखरी निर्णय है। आखिर परमात्मा लास्ट जजमेंट, आखरी निर्णय कैसे करें? कुण्डलिनी को चढ़ा के ही आपका आखरी निर्णय होने वाला है, कि जो कुण्डलिनी के सहारे पार हो जाये वो एक तरफ़ और जो नहीं हुए हैं वो दूसरी तरफ़ हो जाएंगे। इसलिये इसको आ मास करने की जरूरत थी, सामूहिक करने की जरूरत थी, सामूहिक ये कार्य होना चाहिये, ये सामूहिक कार्य होना चाहिये। और अब भी अगर लोगों अपना इसपे निर्णय नहीं कर लिया, ये लास्ट जजमेंट नहीं कर लिया, तो मैं आप से साफ़ बताना चाहती हूँ कि जिस प्रकार गेहूँ और घुन अलग किये जाते हैं उसका छिलका अलग उतार दिया जाता है, उसी प्रकार गर आपने अपने को साफ़ नहीं कर लिया तो जो आखरी कल्की होगा वो आप, जो भी इस तरह के होंगे उनको अलग हटा लेंगे। उनका सर्वनाश है, क्योंकि इसको यही कहना चाहिये कि लास्ट सॉर्टिंग आऊट। इसमें कोई भी तरह की मै अतियुक्ती नहीं कर रही हूँ। मैं आपसे बहुत बिनती कर के कहती हूं कि इस बात से आपको घबराना नहीं चाहिये और न ही नाराज़ होना चाहिये, क्योंकि ये बात हो के रहेगी। गर आप इस बात से सतर्क नहीं रहे, तो कल वो दिन नहीं आना चाहिये कि आप कहेंगे कि माँ आपने बताया नहीं कि लास्ट जजमेंट है। इसलिये मैं आपसे साफ़ साफ़ बताना चाहती हूँ, कि यही लास्ट जजमेंट शुरू हो गया है। इसमें आप अपने को जज कर लीजिये। अब, हमारे जो चक्रों में से जो आज्ञा चक्र है उसके बारे में मैं आपसे बताऊंगी, जो बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। आज्ञा चक्र जो है ये हमारे मस्तिष्क के अन्दर, ब्रेन के अन्दर में, पिनिअल बॉडी और पिट्यूटरी नाम की जो संस्थायें हैं उसके बराबर बीचोबीच है। और वहाँ पर रह कर के अतिसूक्ष्म ये सेंटर है । वो अपने अन्दर की इगो और सुपर इगो, जो कल आपसे मैंने बताया था, वो दोनों संस्थाओं को चालित रखता है। ये आज्ञा चक्र, जहाँ मैंने सिन्दूर लगाया है। इस चक्र की एक खिड़की बाहर की ओर है और एक इस ओर है। इसलिये उसको द्विदल कहते हैं। इस चक्र के पीछे की तरफ़ जो खिड़की हैं, उससे हमारा सुपर इगो, माने हमारा मन संचालित रहता है और जो सामने की खिड़की है उससे हमारा अहंकार संचालित रहता है। अब इसीलिये कहा गया है कि किसी के सामने माथा झुकाने की जरूरत नहीं। मैं सबसे आपसे भी कहती हूं कि आप भी मेरे पैर क्यों छूते हैं? जब तक मैंने आपको कुछ दिया नहीं, क्या जरूरत है आप मेरे पैर छुईये? मतलब इसलिये मै कहती हैँ कि अगर मैंने कह दिया छू लीजिये तो आप सारी दुनिया के छूना शुरू कर देंगे। किसी के भी आगे मथथा झुकाना गलत चीज़ है, ये परमात्मा ने बनायी हुई पेशानी। सिवाय उस आदमी के जो की स्वयं साक्षात् परमात्मा से प्रेरित है, जिसने आपको कुछ विशेष अनुभव दिया है उसी के सामने सर झुकाना चाहिये। लेकिन हम लोगों की ऐसी प्रथा हो गयी कि हर जगह जाकर हम सर झुकाते रहते हैं। इसलिये ये जो पेशानी है, जहाँ ये आज्ञा चक्र है इसमें दोष आ जाता है। आज्ञा चक्र का दोष जो है पीछे में आता है जब आप पेशानी किसी के आगे झुकाते हैं, तो इसका दोष पीछे में आता है और आगे का दोष जो है वो अति विचार करने से आता है।

कोई आदमी अगर हर समय सोचता रहे तो उसमें ये दोष आ जाता है या जो अहंकारी मनुष्य होता है उसका भी दोष इस चक्र पे आ जाता है। अब इस चक्र के जो द्विदल हैं, माने समझ लीजिये दो हाथ हैं, उस में से जो बीचोबीच जो इसका तत्त्व है, वो तत्त्व, एकादश रुद्र कहलाया जाता है। माने उसपे ग्यारह शक्तियाँ हैं जो हमारे माथे पे यहाँ ग्यारह चक्र है। बहुत महत्त्वपूर्ण ग्यारह चक्र हैं। इसी एकादश रुद्र से ही कल्की बनेगा। इसी से सर्वनाश होने वाला है। इसलिये इसको बचाना बहुत जरूरी है। और इसके जो तत्त्वस्वरूप संसार में सब से बड़े अवतरण हुये हैं, वो है जीजस क्राइस्ट। ये श्रीगणेश एक तरफ़ से इनका हाथ समझ लीजिये श्रीगणेश का है, एक अंग इनका श्रीगणेश का है, जो कि लेफ्ट साइड हैं और राइट साइड जो है वो कार्तिकेय स्वामी, आप जिनको जानते हैं। कार्तिकेय स्वामी के बारे में आपने सुना होगा और जिनको दक्षिण में बहुत लोग मानते हैं, उनको मुरूगंद कहते हैं। इस प्रकार इनके दो अंग हैं। और इन दो अंगों को मिला कर के ही जीजस क्राइस्ट इस संसार में आये। और उनका जो क्रॉस है वो भी स्वस्तिक का ही रूप है। लेकिन जीजस क्राइस्ट के जीवन का सबसे बड़ा जो उद्देश्य या उसकी महिमा है या उसका जो संदेश हैं वो क्रॉस नहीं है। क्योंकि जीजस क्राइस्ट, ये, कृष्ण के लड़के हैं। महाविष्णु के बारे में आप जरूर पढ़ें, जो मैं बात कह रही हूँ, एक भी बात झूठी नहीं और उनकी जो माँ मेरी थी और राधा जी हैं। रा…धा, रा माने शक्ति, धा माने जिसने धारणा की हुई है। महालक्ष्मी स्वरूपा हैं। उनकी जो माँ थी वो महालक्ष्मी थी। लेकिन जीजस क्राइस्ट के जमाने में उन्होंने इस मामले मे ज्यादा बातचीत इसलिये नहीं करी कि जब दुष्ट रावण, राक्षस आदि लोग ये जानेंगे कि उनकी माँ ही महालक्ष्मी हैं, तो वो माँ के पीछे पड़ जायेंगे और तब वो अपना गुस्सा नहीं रोक पायेंगे। और उनकी पूरी एकादश रुद्र की जो शक्तियाँ हैं, वो क्रोधित हो करके सारे संसार को भस्म कर डालेंगी। इसलिये इस बात को बिल्कुल गुपित रखा रहा। लेकिन तो भी इसाई धर्म के जो पहले कैथोलिक लोग हैं वो बहुत दिनों तक, अभी भी मानते हैं, के उनकी माँ जो हैं वो दैवी शक्ति थी। लेकिन वही होली घोस्ट है, इसे वो नहीं मान सकते। और उनकी समझ में नहीं आता है कि होली घोस्ट चीज़ क्या है। क्योंकि उनमें भी आत्मसाक्षात्कारी लोग बहुत कम हुये हैं और जो भी इसाई धर्म में आत्मसाक्षात्कारी हुये हैं, उनको मार डाला, उनको फाँसी चढ़ा दिया या उनको बिल्कुल ही चर्च से निकाल डाला। जैसे हमारे यहाँ हिन्दू धर्म में भी जो कोई बड़ा भारी साधु-संत हुआ है, ज्ञानेश्वर हुआ, तुकाराम हुआ, आज तक कोई हुआ ही नहीं जिसके पीछे में सारी दुनिया न लग गयी हो, समाज न लगा हो। इसी प्रकार ईसामसीह के पीछे भी, बहुत लोगों ने, आप जानते हैं किस तरह से उनकी हालत खराब की और उनको किस तरह से क्रॉस पे चढ़ाया। ये चढ़ाना लिखा हुआ था। सूली पर चढ़ना उनका एक नाटक था। और ये नाटक करना पहले से लिखा था। क्योंकि कृष्ण ने अपने गीता में कहा है, कि ये जो प्रणव शक्ति है, जो ओंकार शक्ति है, ये शक्ति ‘नैनं छिदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक:’, इसको कोई खत्म नहीं कर सकता। इसको कोई मार नहीं सकता। उनकी इस बात को सच करने के लिये ही ईसामसीह को आज्ञा चक्र पे सूली होना पड़ा। हर एक इनकार्नेशन ने, हर एक अवतार ने, संसार में आ कर के एक नया कदम लिया। अब आज्ञा चक्र का जो पकड़ है वो बहुत ही छोटी सी, उसमें जगह ही छोटी सी और उसमें से अतिपवित्र चीज ही गुजर सकती है, बाकी जितने भी अवतार हुये हैं, माने गणेश छोड़ कर के, बाकी जितने भी अवतरण हैं, संसार में आये हैं, श्रीविष्णु के अवतरण, वो सारे ही सदेह हैं। उनके अन्दर पृथ्वी का अंग है।