What is Seeking?

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परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी

(आत्मा की) खोज क्या है?

ब्राइटन पवैलियन, 

यूनाइटेड किंगडम 

31st March, 1980

मैंने कल आपको बताया था कि आप को कैसे अनुभव होता है अपनी खोज का? आप को अपनी खोज का अनुभव क्यों होता हैं। हमारे अंदर ऐसा क्या है जो इस खोज को कार्यान्वित करता है? और यह योग सहज है। और कोई रास्ता नहीं है जिससे आप अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर सकें, क्योंकि अगर आपको एक बीज को अंकुरित करना है तो उसमें अंकुरण होना चाहिए। इसी प्रकार अगर आपको अपनी नई चेतना में अंकुरित होना है, वह आपके कुंडलिनी जागरण के द्वारा ही होना है, क्योंकि इसी कार्य के लिए कुंडलिनी वहां है। अगर आप को ये (माइक) मुख्य स्विच में लगाना है तो आप को तार प्रयोग करना होगा। इस के लिए और कोई रास्ता नहीं है।

जैसे कल मैंने आपको बताया था कि ये सुंदर यंत्र बनाया गया है, सारे प्रयास किये गए हैं। आप इस से गुजर चुके हैं, कितने, हम ने इसे पैंतीस करोड़ के लिए कितना गिना था? पैंतीस! हां?

सहज योगी: तीन सौ पचास मिलियन

श्री माताजी : तीन सौ पचास मिलियन प्रकार के जीवन! और अब आप मनुष्य बन गए हैं। तो, आखिरकार अवश्य ही इस सुंदर मानवीय ढांचे, इस यंत्र का कोई अर्थ होगा कि क्यों इसका निर्माण किया गया। इसका अवश्य कोई कारण होगा। और जैसे आप को अपना मानवीय साक्षात्कार प्राप्त हुआ है, जैसे आपको यह मानवीय शरीर मिला है, अगर आपको और विकसित व्यक्तित्व तक पहुंचना है, तो उसे सहज ही होना होगा। आप उसे कार्यान्वित नहीं  कर सकते। ये एक सरल तर्क समझना होगा! आपने मनुष्य होने के लिए कुछ भी नहीं किया है और उससे ऊंचा होने के लिए भी आपको कुछ नहीं करना है।

परंतु आप ने कुछ ग़लत कर के शायद आपने आप को कुछ क्षति पहुंचाई है। जो भी गलत आपने स्वयं के साथ किया है उसे भी सही किया जा सकता है, अगर बीज को अंकुरित होना है। आप इसी प्रकार बनाए गए हैं। परमात्मा ने विशेष रूप से आपको इसी प्रयोजन से बनाया है। उन्होंने आप को एक अमीबा से, एक कार्बन परमाणु से बनाया है। चाहे आप उन पर विश्वास करें या ना करें। कोई फर्क नहीं पड़ता! परंतु आज अगर आप स्वयं ही देखें, कि जिसने भी यह मानवीय शरीर और मानवीय बुद्धि बनाई है, कोई बहुत ही शानदार कलाकार होगा। और ऐसा कहा गया है कि अगर आपने उसको (लॉ ऑफ़ चांस) संयोग नियम पर छोड़ दिया होता, आप छोटा, नन्हा एक सैल वाला अमीबा भी नहीं बना पाते। तो इस जैसे कम समय में, अगर मनुष्य जैसी जटिल चीज़ बनाई गई, तो उसके पीछे एक बाज़ीगर है। चाहे आप उस पर विश्वास करें या ना करें, महत्वपूर्ण नहीं है! महत्वपूर्ण यह है कि वह विद्यमान है और वह कार्यान्वित है! 

अब हमारे अंदर यह यंत्र रखा गया है। यह बहुत अधिक सूक्ष्म यंत्र हमारे अंदर स्थित किया गया है। अब मैं आपको कुंडलिनी के बारे में बताऊंगी। ये कैसे कार्य करती है और विभिन्न चक्र कौन से हैं। जैसा कि मैंने आपको कल बताया था कि यह बहुत ही सूक्ष्म चक्र हैं हमारे अंदर। हम उन्हें खुली आंखों से नहीं देख सकते, परंतु जब कुंडलिनी उठने लगती है, वह ऊपर आने लगती है, तब आप अपनी खुली आंखों से कुंडलिनी का स्पंदन और इन सारे चक्रों पर स्पंदन देख सकते हैं। जब तक ये यहां पहुंचती है, आप यहां स्पंदन का अनुभव कर सकते हैं और जब तक ये स्पंदन कर रही है, आप अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त नहीं कर सकते। जब एक बार स्पंदन रुक जाए तो आप को समझ जाना चाहिए कि वह सर्वव्यापी दिव्य शक्ति में जा कर समाप्त हो गई है। 

जब यह घटित होता है तब आप अपने हाथों में ठंडी हवा का अनुभव करने लगते हैं। तब आप अपने अंदर से एक ठंडा विकिरण गुजरता हुआ अनुभव करते हैं। ये आप के खुद के अंतर में (होली घोस्ट) पवित्र आत्मा का विकिरण है। यह वह विकिरण है जो आप अपनी आत्मा, जो आप के हृदय में वास करती है, से अनुभव कर रहे हैं। आप अपने चक्रों को भी अपनी उंगलियों पर अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि अब आप के चक्र जाग्रत हैं। 

अब यह सब जो मैं आपको बता रही हूं, आप इसका अनुभव कर सकते हैं और सत्यापित कर सकते हैं। समय आ गया है आपके लिए वह सब कुछ सत्यापित करने के लिए जो मैं आपसे कहती हूं। यह पहले कहा जा चुका है, हजारों वर्ष पहले कि हमारे अंदर कुंडलिनी  है। छठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बहुत स्पष्ट रूप से साफ साफ कहा था, कि यह अवशिष्ट शक्ति है, साढ़े तीन कुंडल में जो त्रिकोणाकार अस्थि में प्रतीक्षारत है, जैसे कि आप वहां देख रहे हैं, जो अंतत: जागृत होती है और आपको आत्म साक्षात्कार, आप का पुनर्जन्म प्रदान करती है। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट वर्णन किया है इस का और दूसरे चक्रों के बारे में भी। 

उससे पूर्व, उससे बहुत बहुत पूर्व, हजारों वर्ष पूर्व, लोग कुंडलिनी जागरण पर कार्य करते रहे हैं, परंतु उसे गुप्त रखा गया। वह कुछ लोगों पर कार्य करने लगे, जैसे कि हम भी अपनी वैज्ञानिक अनुसंधान में, पहले उस का प्रयोग करते हैं बहुत ही संरक्षित रहस्य की तरह, विभिन्न तौर तरीके ढूंढने का प्रयास करते है और जब वह पूर्णत: सर्वोत्तम बन जाता है, तब हम उसे सार्वजनिक करते हैं और इसकी सब को पहचान कराते हैं, क्योंकि जब तक कोई भी खोज जनता को फयादेमंद ना हो, उसका कोई अर्थ नहीं है। 

आज वह समय आ गया है कि आप उसके बारे में सब कुछ जाने और इसीलिए अब यहां ब्राइटन में हम इस की बहुत खुलकर चर्चा कर रहे हैं और समझने का प्रयास कर रहे हैं।

अब यहां जैसे कि आपने त्रिकोणाकार अस्थि में देखा है साढ़े तीन कुंडलित शक्ति है कुंडलिनी। यह शक्ति परमात्मा की इच्छा कि शुद्ध शक्ति है। यह उनकी इच्छा है जो आपके अंदर सुप्त अवस्था में पड़ी है। उनकी हमेशा से यही इच्छा रही है उनकी सारी रचना में, कि वह अपने खुद के बच्चे निर्मित करें जो उन्हें समझ सकें। जब बच्चे परमात्मा को समझें तो वे उन्हें अपनी सारी शक्तियां दे सकें प्रकट करने के लिए, जिससे कि उनकी संतान परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश कर सकें तथ पूर्ण परमानंद एवं सुख से वहां पर निवास कर सकें। कि वे ‘सामूहिक अस्तित्व हैं। वह विराट जगत है और आप लघु जगत, कि आप विशाल शरीर की सैल हैं और इन सैल्स को जाग्रत करना है और उन्हें विराट से एक होना है, जिस से आप को ‘सामूहिक अस्तित्व” की समझ प्राप्त होती है। सामूहिक जीव आपके बारे में सचेत है परंतु आप उस के बारे में सचेत नहीं है। और इस प्रकार संपूर्ण यंत्र आप के अंदर बनाया गया था। आप उसे कैसे पाएंगे और आप उसे कैसे प्राप्त करेंगे? 

आप यह तीन लकीरें देख सकते हैं जो एक दूसरे के सामानांतर रखी गई हैं। पहली नीली रेखा से इच्छा करने की शक्ति को दर्शाया गया है, ये आपके भावनात्मक पक्ष को देख भाल करती है। यह बाहृय में (left sympathetic nervous system) बाएं अनुकंपी तंत्रिका प्रणाली के रूप में प्रकट होता है। अब डॉक्टर नहीं जानते कि बाएं और (right sympathetic nervous system) दाएं अनुकंपी तंत्रिका प्रणाली दो भिन्न प्रकार के कार्य करने के लिए हैं। 

तो बाईं तरफ की शक्ति वह है जिससे आप इच्छा करते हैं। वह शक्ति है जिसके द्वारा आप स्वयं को संस्कारित करते हैं, जिस से आप भूतकाल में रहते हैं। इस नाडी को संस्कृत भाषा में हम ईड़ा नाडी कहते हैं। दाएं तरफ की नाडी जो आप यहां देख रहे हैं, पीले रंग की नाडी, वह शक्ति है जिससे आप रचना करते हैं, जिसके द्वारा आप भविष्य में जा सकते हैं, आप भविष्य के बारे में विचार करते हैं। इसी के द्वारा आप भविष्य की योजना बनाते हैं। इसी के द्वारा आप शारीरिक कार्य भी करते हैं, जो आप भविष्य के लिए भी करना चाहते हैं। हर प्रकार की भविष्य की योजना, अपने भौतिक, बौद्धिक और आर्थिक और ऐसे अन्य कारणों के लिए बनाना, आप की इसी शक्ति के द्वारा होता है, जो दाईं हाथ की तरफ है, और ये नाडी कहलाती है पिंगला नाड़ी। 

अब जो रंग हैं वहां। जो बाई तरफ का रंग है वह गहरा नीला रंग है, जैसे कि आप यहां देख रहे हैं जो काले रंग जैसा लग रहा है। और जो दाएं हाथ की तरफ है उसका रंग पीला है। अब जब यह दोनों शक्तियां हमारे अंदर कार्य करने लगती हैं, अर्थात एक जो इच्छा करने की शक्ति है और दूसरी कार्य करने की। पहले हम इच्छा करते हैं और फिर हम कार्य में लग जाते हैं। जब यह दोनों शक्तियां कार्य करने लगती हैं तब हम अपने मस्तिष्क में एक (बाई प्रोडक्ट) गौण उत्पाद उत्पन्न करते हैं, जैसे किसी कारखाने में उठता हुआ धुआं। यह धुआं अहंकार और मन कहलाता है, जैसे आप उन्हे देख रहे हैं ऊपर से लांघते हुए। जब आप नीले तरफ को प्रयोग में लाते हैं जो कि इच्छा या इच्छाशक्ति कह सकते हैं, तब आप के अंदर मन विकसित होता है और जब आप दाईं तरफ से कार्य करते है तो अहंकार विकसित होता है।

अब अहंकार और मन को बहुत सरल तरीके से समझते हैं, इस प्रकार कि, मान लीजिए जब एक बच्चा अपनी मां द्वारा पाला जाता है वो पूर्ण परमानंद और आनंद में होता है। तो मां लड़के, बच्चे के लिए साइड बदल देती है, और वो बहुत अधिक आहत महसूस करता है। जब वह आहत महसूस करता है उसका अहंकार उठता है। वो सोचता है, ‘ वो ऐसा क्यों करती है? आप समझिए कि सूक्ष्म तरीके से अहंकार बढ़ने लगता है। यह अहंकार है जो आप को वहां देख रहे हैं बढ़ते हुए दाईं तरफ। मेरा मतलब है कि अहंकार होने में कुछ भी गलत नहीं है। आपको ये होना चाहिए। यह इसी प्रकार कार्यान्वित होता है। जैसे हर कारखाने में चिमनी होनी चाहिए, आपके अंदर अगर चिमनी नहीं है तो यह सब वहां एकत्रित हो जाता है।

बाएं हाथ की तरफ, जब बच्चा कुछ चाहता है और उसे वह करने के लिए मना किया जाता है। मां कहती है, ‘ऐसा मत करो!’ तो आप उस टोकने से संस्कारित हो जाते हैं। इस संस्कार के  होने से आपका मन/प्रति अहंकार विकसित होता है। जब आपके अहंकार को चोट लगती है मैं कहूंगी, तब आपका अहंकार विकसित होता है। जब आपकी इच्छा पूरी नहीं होती, तब आपका ‘मन’ विकसित होता है। धीरे-धीरे हम अपने आप को अपने अहंकार और मन से पहचाने लगते हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि आपका व्यक्तित्व किस प्रकार का है। कुछ लोग सोचते हैं, ‘मैं ये करता हूं! मैं ये हूं!’ आप समझे? उनमें से कुछ लोग भयभीत हैं।’ नहीं यह बहुत आक्रामक है।’ परंतु जो कुछ भी हो, या तो आप के अंदर अहंकार होता है या मन। दोनों ही इस प्रकार विकसित हो जाते हैं, जैसे कि आप देख सकते हैं इस में, और अगर एक बहुत भारी हो जाता है तो दूसरे को नीचे की तरफ धकेल देता है। अगर यह अधिक भारी हो जाता है तो यह इस को नीचे की तरफ धकेल देता है। अब कुंडलिनी को बीच में से गुजरने के लिए, यहां पर जगह होनी चाहिए इस तरह। अगर किसी व्यक्ति का असंतुलित व्यक्तित्व है तब कुंडलिनी को जागृत होने में समय लगता है। वह समय लेती है। 

यहां आप कुंडलिनी के नीचे इस चक्र को देख सकते हैं। हमें ज्ञात होना चाहिए कि ये बहुत अधिक महत्वपूर्ण चक्र है, जिस के बारे में मुझे आप को संक्षेप में बताना है। यह चक्र कुंडलिनी के नीचे स्थित है। वह ऊपर नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि जब कुंडलिनी अन्य चक्रों का भेदन करती है तो इस चक्र का भेदन नहीं होता। परंतु वह वहां क्यों है? वह वहां किस लिए है? यह चक्र कुंडलिनी को जानकारी देने के लिए वहां पर स्थित है। यह कि यंत्र है जो सब प्रकार की जानकारी प्राप्त करता है कि, आप क्या कर रहे हैं? आप का इरादा क्या है? आपकी इच्छाएं क्या हैं? आप क्या कर रहे हैं? आप किस प्रकार के लोगों से भेंट कर रहे हैं? आप कहां जा रहे हैं? किस प्रकार की गलतियां कर रहे हैं? आप कौन से अच्छे काम कर रहे हैं? यह सब कुछ, सिर्फ इस जीवन काल का नहीं अपितु कई जन्मों का, इस कुंडलिनी में दर्ज हो जाता है। कुंडलिनी के अंदर उन सभी चीजों का संग्रह दर्ज है, वह सब जो आपके पास था। कुंडलिनी जानती है आप क्या रह चुके हैं।

तो यह छोटी सी चीज जो आप वहां देख रहे हैं, वह चक्र है जो प्रोस्ट्रेट ग्रंथि के बहुत निकट है और यही वह चक्र है जो हमारे अंदर अबोधिता उत्पन्न करता है। अगर आप अबोध हैं तो आप एक बच्चे की तरह है। आपकी कुंडलिनी तीव्र गति से ऊपर उठती है। कोई समस्या नहीं है। परंतु अगर आप जटिल है तो समय लगता है क्योंकि उस चक्र पर विराज रहे सज्जन कुंडलिनी को सूचना देते हैं, ‘नहीं! अभी भी इस व्यक्ति को समय चाहिए। वह ठीक ठाक नहीं है। उसके साथ कोई समस्या है।’ इसलिए ये अबोधिता संभाल कर रखनी चाहिए। जो लोग अपनी आबोधिता संभालने में असमर्थ रहे हैं उनको यह काफी कठिन लगता है।

परंतु आत्म साक्षात्कार के पश्चात आपको आश्चर्य होगा, कि जो लोग अपनी अबोधिता खो चुके हैं उसे वापस प्राप्त कर लेते हैं। यही एक मार्ग है जिससे आप अपनी अबोधिता पुनः प्राप्त कर सकते हैं। यह बहुत आश्चर्य जनक है कि आत्म साक्षात्कार के पश्चात आप पहले जैसी ही अबोधिता को प्राप्त कर सकते हैं, और आप उस अबोधिता का अपने अंदर आनंद लेने लगते हैं। तो यह हमारे अंदर अबोधिता का चक्र है। 

अब हमारे अंदर अबोधिता है, परंतु कौन बता सकता है? कौन सा डॉक्टर बता सकता है? कौन सा मनोचिकित्सक बता सकता है, ये अबोधिता कहां है जो हम को प्राप्त हो रही है? वो उस हिस्से में स्थित है।

अब हम तीसरे चक्र की बात करेंगे हमारे अंदर, जो बहुत महत्वपूर्ण है। वह नाभि चक कहलाता है जो कि नाभि बिंदु है नाभि बिंदु के ऊपर। आप पक्का सही सही नहीं बता सकते कि किसी का चक्र कहां पर स्थित हैं क्योंकि वह बिल्कुल पक्की बात नहीं है। यह शक्ति है जो थोड़ा बहुत ऊपर नीचे होती रहती है। पर इस चक्र का स्थान ऊपर, नाभि बिंदु के पीछे है। और यह बाहृय में, स्थूल में प्रकट होता है ‘सोलर प्लेक्सस’ के नाम से । यह चक्र जो की नाभि में है, हमारी सभी खोजों के लिए उत्तरदाई है। हमने खोजना आरंभ किया, आप कह सकते हैं, जब से हम सिर्फ अमीबा थे। उस समय हमारी खोज सिर्फ भोजन के लिए थी। फिर हमारे अंदर वो बढ़ गई जैसे हम बढ़ गए। मानवीय स्तर पर बेशक हमें भोजन की चाह है, साथ ही हमें (सामानों?) और धन की खोज है। हमें शक्ति की खोज है राजनीतिक या अन्य प्रकार की और हमे परमात्मा की भी खोज है। ये सिर्फ मनुष्य में ही प्रकट होना आरंभ होता है। 

परमात्मा की खोज तब आरंभ होती है जब मनुष्य अनुभव करने लगता है या देखने लगता है कि, कुछ तो अवश्य है इसके परे, कुछ तो अवश्य है जो पूर्णता देता है, कुछ तो अवश्य है जो वास्तव में संतोषदायक है। और वह उस परम बिंदु को ढूंढने लगता है, जहां से वापस लौटने की कोई आवश्यकता नहीं है, जहां कोई घृणा नहीं है, जहां कोई हताशा, निराशा नहीं है। और यह बिंदु हमारे हृदय में निवास करती हुई आत्मा है। संस्कृत भाषा में इसे आत्मा कहते हैं। हृदय में स्थित आत्मा साक्षी है, जो हमें देखती है, जो हमारी देख भाल करती है। पर हमें इस बात का आभास नहीं है। इस का अर्थ है कि आत्मा हमारे (सेंट्रल नर्वस सिस्टम) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में प्रसारित नहीं हो रही, नहीं बह रही है, कि हमें इसका आभास नहीं है। हमें पता है कोई है, हमें पता है कि कोई अंदर है, हम उस के बारे में जागरूक है एक प्रकार से, पर वह हमारे जागृत बुद्धि, हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में से नहीं बह रही। और यही है जिस के लिए यह खोज है। हम अपनी ‘आत्मा’ को खोज रहे हैं।

जैसे मैंने आप को कल बताया था आप को मेरी बात से सहमत होने की आवश्यकता नहीं है। आप को उसे (हाइपोथेसिस) अनुमान की तरह लेना चाहिए और यहां एक खुले दिमाग के साथ बैठें, जैसे कि एक वैज्ञानिक किसी नई बात को सुनेगा।  

अब जो केंद्रीय, मुख्य बिंदु है जिसे हम नाभि कहते हैं एक अन्य बिंदु, जो इसके नीचे है, उसी से जुड़ा है, जो आप वहां देख रहे हैं, यह रचनात्मकता का केंद्र है। यह केंद्र है जो रचना करता है और इसके छ सब प्लेक्सस हैं जो बाहर प्रकट होते हैं और जो प्लेक्सस स्थूल है (aortic plexus) एऔरटिक प्लेक्सस कहलाता है और इसके भी छ सब प्लेक्सस हैं। आध्यात्मिक भाषा में हम यह नहीं कहते कि सब प्लेक्सस हैं। हम कहते हैं कि स्वाधिष्ठान चक्र के कमल की छह पंखुड़ियां हैं। यह दाईं तरफ की रचनात्मक शक्ति को कार्यान्वित करता है, जैसे कि आप इसे देख सकते हैं कि इस के द्वारा वो मस्तिष्क से जुड़ा है।

अब जो मध्य में है, वह बहुत महत्पूर्ण है। वह आप को  विचार देता है कि आप में और ‘संपूर्ण’ में एक दूरी है। और इस दूरी को यहां हरे रंग के भवसागर के रूप में दिखाया गया है। उसके ऊपर जो नाड़ी है वह उत्तरदाई है मानवीय स्तर पर अब तक जो हमने प्राप्त किया है। मानवीय स्तर पर जो कुछ भी हमारे जागृत बुद्धि में आया है, इस नाडी द्वारा व्यक्त होता है जो टूटी हुई है और उस दूरी को हमें भरना है। एक बार हम ने उस दूरी को भर दिया, हमारी उत्क्रांति की प्रक्रिया पूरी हुई और हम वहां हैं जहां हमें होना चाहिए। हमें अपनी उपयोगिता का पता चल गया है। हमें अपना अर्थ मिल गया है। हम वही बन जाते हैं।

हमारे अंदर जो उच्च स्तरीय हैं वह प्रकट होने लगता है और चिकित्सा शब्दावली में (पैरासिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम) परानुकंपी तंत्रिका तंत्र कहलाता है। और टूटे हुए हिस्से भी, जब की वहां चक्र भी हैं, परानुकंपी का ही हिस्सा हैं।

तो हमारे पास तीन शक्तियां हैं जो दिखाई गई हैं। पहली हमारी इच्छा के लिए, दूसरे कार्य करने के लिए और मध्य वाली हमारी उत्क्रांति के लिए। इसका अर्थ है कि अपनी चेतना में हम एक खास बिंदु तक पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए पशुओं और मानव की चेतना में बहुत भारी अंतर है। हम कभी-कभी अपनी बहुत निंदा करते हैं, और सोचते हैं कि पशु हमसे ज्यादा बेहतर हैं क्योंकि वो शायद हमारे जैसे अस्त- व्यस्त नहीं हैं शायद, या उनकी इतनी समस्याएं नहीं हैं जितनी हमारी हैं क्योंकि हम आजाद हैं, हम सोच सकते हैं, समझ सकते हैं। हम उनसे बहुत अधिक संवेदनशील हैं, परंतु अगर आप किसी पशु से पूछे कि वह किसी हिस्से की दुर्गन्ध के बारे में क्या अनुभव करता है, जब वह सबसे गंदी गलियों से गुजर रहा होता है, तो वह बिल्कुल परेशान नहीं होता, किंतु हम होते हैं। उसको इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपके पास कौन से रंग हैं, कौन से आकार हैं। वह किसी भी रंग के संयोजन, किसी भी प्रकार की सौंदर्यबोध संबंधी भयानक गलतियां के बावजूद, जो लोगों ने की हैं उस के घर में, बहुत खुशी खुशी वहां रह सकता है जब तक कि उसे अच्छा भोजन मिलता रहे! वह बिल्कुल मज़े में है!

तो हमारी उत्क्रांति हमें उस बिंदु तक लाई है जहां हम बहुत ही सूक्ष्म, बहुत अधिक संवेदनशील और समझदार बन गए हैं। और जब आप समझदार होते हैं और एक दूरी महसूस होती है, तो आप तनाव में आ जाते हैं, ‘ओह ये भरनी चाहिए!’ आप ये भी जानते हैं कि आप की शक्ति क्षीण चुकी है। आप अपने (सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम) अनुकंपा तंत्रिका तंत्र के द्वारा यह शक्ति व्यय कर रहे हैं। दोनों ही आप से खेलते हैं, आपकी इच्छा करने से और आपके कार्य करने से । जब यह क्षीण हो जाता है तो ऐसे होता है जैसे कार में पेट्रोल खत्म हो जाता है तो आप भी तनावग्रस्त हो जाते हैं। इसी प्रकार आप भी तनावग्रस्त हो जाते हो और आपको समझ में नहीं आता कि इस तनाव के साथ क्या करना है। उसको निकालने के लिए आप ट्रेंकवीलाइजर औषधि लेते हैं, दूसरी चीजें लेते हैं, जीवन से पलायन आदि। यह सब प्रकार के पलायन कार्यरत होने लगते है क्योंकि आप इतने तनाव में हैं।

आपके दिमाग में अहंकार और प्रति अहंकार की वजह से तनाव आते हैं। वह इतना अधिक तनावग्रस्त हो सकता है कि आप की दोनों संस्थाएं एक दूसरे को ढक रही होती हैं और यह कुछ लोगों के लिए बहुत ही दर्दनाक भी हो सकता है। और जब ऐसी चीज़ें होती है आप आराम ढूंढते हैं और आप इन सब चीजों का प्रयोग करते हैं। परंतु यह अभी भी नहीं खुला है। इसका खुलना बाकी है। इस दूरी को ढकना होगा। और यह दूरी सिर्फ कुंडलिनी के जागरण से ही ढक सकती है।

एक बार लोगों को यह पता चल जाता है कि,’ हां कुंडलिनी का जागरण ही वो तरीका है जो प्रयोग करना चाहिए। ठीक है!’ तो आपके लिए तमाशा करते हैं। ‘हम आपके लिए कुंडलिनी का जागरण करेंगे। हम आपको आत्म साक्षात्कार देंगे। हम आपको यह देंगे, हम आपको वह देंगे।’ वह आपसे कई वादे करते हैं। पर जो महत्वपूर्ण है वह है घटित होना। वह यह सब करते हैं शायद पैसा बनाने के लिए, क्योंकि वह शक्ति चाहते हैं, शायद वो क्रूर हैं दूसरों कि पीड़ा से प्रसन्न होते हैं, शायद वो पैशाचिक हैं क्योंकि वह चाहते हैं कि आपको आत्म साक्षात्कार प्राप्त न हो, कि वो आप के आत्म साक्षात्कार पाने के सभी मौकों को खत्म कर देना चाहते हैं। मुझे नहीं मालूम उनका इरादा क्या है।

परंतु आपके अंदर यह कुंडलिनी है और जिसका जागरण हो सकता है और हजारों लोगों कि कुंडलिनी जागृत हो सकती है। मैंने यह किया है, आप भी यह कर सकते हैं। एक सज्जन है जिन्होंने दस हजार लोगों को आत्म साक्षात्कार दिया है। वह अभी बहुत ही युवा है और वह गांवों गांवों में जा रहे हैं। परंतु जैसे कि आप जानते हैं ग्रामीण बहुत सीधे लोग होते हैं और वह ऐसी किसी भी चीजों से बहकाए नहीं जा सकते जिन्हें हम धर्म के बड़े विस्तृत तमाशे कहते हैं। वे जानते हैं यह क्या है। वह बहुत सीधे होते हैं इन सब जटिलताओं की बकवास में विश्वास करने के लिए। इसलिए वह जानते हैं कौन असली है कौन नहीं। उनकी संवेदनशीलता बहुत अधिक है क्योंकि वह प्रकृति के साथ रहते हैं और वह पहचान सकते हैं किसी भी व्यक्ति को, कौन असली है और कौन नकली!

तीसरा चक्र जो आपको यहां देख रहे हैं या हम कह सकते है चौथा चक्र हृदय का चक्र है। हृदय चक्र वो चक्र है जो आप को सुरक्षा देने के लिए उत्तरदाई है। यह मां का चक्र है। यह आपको सुरक्षा की भावना देता है। जब आप असुरक्षित अनुभव करते हैं, आप ने देखा होगा आप की सांस तेज़ चलने लगती है। जब आप बच्चे होते हैं बारह साल की उम्र तक आपकी (स्टरनम बोन) उरोस्थि की हड्डी में (एंटीबॉडी) भ्रमर बनता रहता है, जो यहां है। क्या आप जानते हैं उरोस्थि की हड्डी को‌ जो यहां है? और यह भ्रमर पूरे शरीर में चारों तरफ फैला रहता है व्यक्ति के ऊपर हुए किसी भी चढ़ाई या हमले से लड़ने के लिए। यह भ्रमर जो हम सहज योग की शब्दावली में कहे तो वास्तव में मां की सेनाएं हैं। वह वहां बनती हैं और यह ब्रह्मांड की मां का चक्र है। इन चक्रों पर जो देवता विराजमान हैं उनके बारे में भी मैं एक-एक करके बताऊंगी।

यहां एक अन्य चक्र है जो विशुद्धि चक्र कहलाता है, बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस बिंदु पर मनुष्य ने अपना सिर इस प्रकार ऊपर उठाया। उस ने अपना सिर नई आकांक्षाओं, नए विचारों के साथ उठाया है। जब उस ने अपना सिर उठाया तभी उस के अंदर अहंकार और मन विकसित होने आरंभ हो गया। जब सिर पृथ्वी माता की तरफ नीचे झुका था, यह दोनों विकसित नहीं हो सकते था क्योंकि शक्ति धरती में समा रही थी। परंतु जब आप ने अपना सिर इस प्रकार ऊपर उठाया तब अहंकार और मन बहुत तेजी से विकसित होने लगे, जिस के द्वारा आपका अपना व्यक्तित्व विकसित हुआ। अहंकार और मन का मेल आपको सर्वव्यापी शक्ति से काट देता है।

जब आप एक बच्चे होते हैं, अगर आपको याद हो, आपके ब्रह्मरंध्र में बहुत ही मुलायम जगह होती है और अचानक वो ठोस, और ठोस, और ठोस हो जाती है जो कि अंतत: कुछ लोगों में पत्थर कि तरह ठोस हो जाती है। अब यह सर्वव्यापी शक्ति पर दरवाजा बंद करने जैसा है। यह क्यों किया जाता है? आप दूर क्यों बंद है उस से, क्योंकि आप को आप की स्वतंत्रता दी गई है, आप कि अपनी विशिष्टता। आप श्रीमान एक्स बन जाते हैं, आप श्रीमान वाय बन जाते हैं। आप श्रीमान ज़ैड बन जाते हैं, क्योंकि अपनी प्रयोग प्रक्रिया द्वारा आप जान लेते हैं क्या सही है क्या ग़लत! आप स्वतंत्र हो जाते है। 

उदहारण के लिए अगर मैं ये यंत्र (माइक्रोफोन) बना रही हूं, पहले मुझे अलग से इसका परीक्षण करना होगा, फिर मैं उसे यहां रख दूंगी, है ना? इसी प्रकार आप भी अलग हो जाते हैं। और आप अच्छे बुरे के साथ प्रयोग करने लगते हैं। आप समझने लगते हैं क्या अच्छा है, क्या बुरा है। एक बार आप इसे जानने लगते हैं, आप सही मार्ग पर चलने लगते हैं।

परंतु जैसे कि आपने देखा है मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाया है। उनका आजादी कि अर्थ बहुत अधिक बदल गया है। और ये आजादी के प्रति बदला रवैया, बदला व्यवहार खुद आज़ादी के कारण ही है, क्योंकि आप चुनने के लिए स्वतंत्र हैं कि आप अच्छा चाहते हैं या बुरा। और जब ये आप के साथ घटित होता है, कि आप स्वतंत्र हो जाते हैं आप बुरी चीज़ें चुनने लगते हैं, तो यह और भी मजबूत, और मजबूत और मजबूत बन जाता है।

तो आपने इस बिंदु (आज्ञा चक्र) तक सभी चक्र देख लिए हैं। यह वह चक्र है, जहां मस्तिष्क के मध्य में ईसा मसीह का चक्र है। यह वह चक्र है जहां हमारी पिनियल और पिट्यूटरी अंग दोनों ही ऑप्टिक चैसमा में स्थित है, आप कह सकते हैं कि यह वहां इस प्रकार रखा गया है। यह बहुत सूक्ष्म है और आपके अहंकार और मन दोनों को नियंत्रित करता है। यह चक्र आज्ञा चक्र कहलाता है। इसकी दो ही पंखुड़ियां है जिससे आप अपने अहंकार और मन को नियंत्रित करते हैं।

उसके ऊपर जो चक्र आप देख रहे हैं, उसे सहस्त्रार कहते हैं। यह आखिरी चक्र है, हज़ार पंखुड़ियों का और सहस्त्रार कहलाता है अर्थात सात झरनों का प्रवाह, आप ऐसा कह सकते हैं। प्रवाह सात का नहीं हज़ार का। सहस्त्र माने हजार, सहस्त्रार माने एक हज़ार। क्या कहेंगे। संस्कृत का बताना मुश्किल है (श्री माताजी हंस कर कह रही हैं) आप कह सकते हैं एक हजार का प्रवाह, एक हज़ार झरनों का प्रवाह। वहां एक हजार पंखुड़ियां हैं। आप उन्हें देख सकते हैं। कुछ लोगों ने उन्हें देखा है और आप भी उन्हें अपने अंदर देख सकते हैं। वो मस्तिष्क में स्थित है और वह (लिंबिक एरिया) सचखंड को ढकती हैं जो कि वहां खाली हिस्सा है। सचखंड आज कल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि लोगों ने सचखंड के साथ प्रयोग करना आरंभ कर दिया है।

जब कुंडलिनी उस को पार करती है और इस हिस्से का भेदन करती है इसको ही बपतिस्मा कहते हैं। तब आप पाते हैं कि यह जगह मुलायम हो जाती है और अचानक कुंडलिनी का प्रवाह, अनुकम्पा का प्रवाह आप में आता हुआ अनुभव करते हैं, जब वो उस सूक्ष्म का भेदन करती है। अब हमारे चारों ओर ये शक्ति है, यह विद्यमान है, परन्तु हमें इस का अनुभव करना है। हमने अभी तक इसका अनुभव नहीं किया है 

(भाषण की रिकॉर्डिंग में व्यवधान)

इसलिए हम भटके हुए हैं, इसलिए हम भ्रमित हैं, हमारी समस्याएं हैं। हमारी सभी राजनीतिक समस्याएं इसीलिए हैं क्योंकि हम किसी ऐसी चीज़ का सामना कर रहे हैं जो सापेक्ष है। वहीं हालत हमारे आर्थिक स्तिथि की है, वैसा ही हमारी सारी समस्याओं के साथ भी कि हम..

अब आप परम से जुड़ गए हैं, आप परम से कोई भी प्रश्न कर सकते हैं और आपको उत्तर अपनी उंगलियों पर मिलता है जब आपकी उंगलियां प्रबुद्घ हो जाती हैं। और इस तरह आपको ज्ञात होता है कि आप प्रबुद्घ हो चुके हैं। 

(भाषण का यहां से पुनरारंभ)

तब आप स्वयं को अनुभव करने लगते हैं, और तब आपको अनुभव होता है कि आप बहुत अधिक विस्तृत हो गए हैं। आप स्वयं और दूसरों के लिए जीवित हो गए हैं, क्योंकि आप दूसरों को भी महसूस करने लगते हैं। यहां बैठे बैठे आप पता कर सकते हैं कि अमेरिका में किसी सज्जन के साथ क्या हो रहा है, अगर आप उस पर अपना चित्त डाल पाएं तो, क्योंकि अब आप का चित्त प्रबुद्घ हो चुका है और इस लिए आप अनुभव कर सकते हैं। 

समस्या ये है कि ये इतना शानदार है कि अविश्वसनीय लगता है! सच में है! अब मान लीजिए कि मैं इस जगह को बहुत ही शानदार बना दूं, पर अगर यहां अंधेरा हो तो आप कुछ नहीं देख पाएंगे, और मैं कहूं, ‘यह शानदार जगह है और आप आइए और खुद ही देखिए कैसे यहां चीज़ें कार्यान्वित होने लगती है। हर यंत्र बहुत ही अच्छी तरह व्यवस्थित है। वो काम करने लगती है। आप को बहुत बढ़िया परिणाम मिलेंगे।’ और आप अंदर आते हैं बिजली जलाते हैं। यह काम करता है! क्योंकि ये अंतर्निहित है। और सारी शानदार बातें आप को प्राप्त होने लगती है और आप उसे समझने लगते हैं, क्योंकि वह उसके अंदर है। सिर्फ रोशनी आने की आवश्यकता है। और एक बार रोशनी आ जाती है आप उसे समझने लगते है। तो उसके लिए आप क्यों किसी को इल्जाम दें या क्यों क्रोधित हों? आखिरकार यह सब आपके आनंद और खुशी के लिए ही किया जा रहा है। यह एक अप्रत्याशित घटना है मैं कहूंगी जैसे कि क्रिसमस फादर आकर आपको बहुत सारे उपहार सौंपे। यह पहले ही कर लिया गया है। यह सब पहले से प्रबंधित है।

जैसे कि हम कह सकते हैं, कि पहली बार जब मैंने टेलीविजन देखा, उदहारण के लिए रंगीन टेलीविजन। और अचानक मेरे पति, जब वो उसे मेरे पास लाए, वो बोले, ‘ओह! तुम कुछ बहुत शानदार चीज़ देखने वाली हैं!’ मैंने कहा, क्या? मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने कहा, ‘ तुम फिल्म शो देख सकती हो! तुम सब को हिलते हुए देख सकती हो!’ मैंने कहा, सच में? कमरे में?  उन्होंने कहा, ‘हां देख सकती हो!’ ‘ ऐसा कैसे हो सकता है?’ तुम थोड़ा इंतजार करो और देखो। जरा रुको! सिर्फ एक मिनट चाहिए!’ और उन्होंने मुझे बहुत अच्छे से तैयार किया बड़ा सरप्राइज़ देने के लिए। उन्होंने कहा, ‘ तुम यहां लोगों को देख सकती हो, बातें इत्यादि करते हुए!’ और उन्होंने उसको शुरू किया, और मुझे आश्चर्य हुआ वो काम कर रहा था। सिवाय बिजली के वह किसी अन्य चीज़ से जुड़ा नहीं था, और सब चीज़ काम करने लगी और मैं देख रही थी सब कुछ वैसा ही घटित हो रहा था जैसे उन्होंने कहा था। वो वाकई शानदार था! कोई भी उस पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। आप सोच ने लगते हैं, वास्तव में यह सत्य है या नहीं?

पहली बार जब मैंने भारत में टेलीफोन देखा, निश्चय ही जब मैं बहुत छोटी थी और मैं सोचती हूं कि यह उल्लेखनीय है, कि हमारे घर में टेलीफोन था और हम पहले कुछ लोगों, बहुत कम लोगों में से थे, जिन के पास टेलीफोन था। आप सोचिए यह तब की बात है जब हम ने उसे खरीदा। हमें विश्वास है नहीं हो रहा था! ऐसा कैसे हो सकता है कि आप किसी से फोन पर ऐसे ही बात कर लें? कैसे आप किसी को डायल करके बात कर सकते हैं? हमने तुरंत एक लड़की को जिसके पास फोन था उसे फोन किया। उसे फोन छूने की आज्ञा नहीं थी और हमने उसे फोन कर दिया। उसके पिता बोले, ‘क्या? तुमने फोन खरीद लिया? अब तो मुसीबत हो गई! अब तुम उसे फोन करते रहोगे!’ वह बोली, मैंने तुम्हें एक बार बताया था अगर तुम्हें याद हो कि ऐसा एक यंत्र है जिससे आप बात कर सकते हैं। पर तुमने कभी मेरा विश्वास नहीं किया। आप देखो टेलीफोन होता है। हैं ना? तब हमें विश्वास करना पड़ा क्योंकि सब कुछ हमारे लिए तैयार किया गया था, उसे सिर्फ जोड़ना था। और हम उसे समझने लगे। 

मुख्य बात यह है कि वह सब कुछ तैयार किया गया है। मैंने आपको बताया है कि तीन सौ पचास मिलियन जीवनों से आप गुजरे हैं यह सब होने के लिए और उसमें जम ने लिए, यह सब जो आप के अंदर पहले से बना है। अब अगर ये शानदार है, क्यों ना इसे पा लें! हम को इसके लिए भुगतान भी नहीं करना। आप कर भी नहीं सकते। आप क्या भुगतान करेंगे? क्या आप भुगतान कर सकते है तीन सौं पचास मिलियन बार विभिन्न जिंदगियों से गुजरने के लिए? क्या आप कर सकते हैं ये भुगतान? क्या आप उस प्रेम के लिए धन दे सकते हैं जिसने आपको मनुष्य बनाया? यह पूरी बात बहुत ही शानदार है! तो अब हम इसके लिए क्या धन दे सकते हैं? आपको सिर्फ उसे स्वीकार करें और ग्रहण करें और उसका आनंद लें, बस इतना ही!

आधुनिक काल में, हम सोच नहीं सकते कि कोई ऐसा हो सकता है जो यूंही आप को आमंत्रित करे मुफ्त में, आप को सब कुछ दे मुफ्त में और सिर्फ देने का आनंद ले। हमें ऐसे सुंदर व्यक्ति के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते। इसलिए लोग डरे हुए हैं। आप उन्हें आमंत्रित करें वह डर जाते हैं,’ क्यों? ये क्या है?’ क्योंकि मैं मिल रही हूं कुछ से या किसी से, जरूर वही होगा। हम कभी विश्वास नहीं करते। यह सच है क्योंकि हमें बहुत बुरे अनुभव हो चुके हैं। 

पर हमारे यहां ईसा मसीह जैसे लोग हुए, जिन्होंने अपना जीवन दे दिया। आज का दिन महत्वपूर्ण है क्योंकि हमने यह सप्ताह शुरू किया है, उन्हें याद करने के लिए, जहां उन्होंने अपना जीवन दे दिया। क्या उन के जैसा कोई होगा जो अपने जीवन का बलिदान देगा कुछ कहने के लिए जो सत्य हो? उन्होंने अपना जीवन सत्य के लिए बलिदान कर दिया। किस लिए? क्यों किया उन्होंने? क्योंकि देने में अधिक आनंद है, बहुत अधिक परमानंद किसी भी अन्य बात से। अगर आप देने की उस दशा में पहुंचते हैं तो आप भी आनंद लेने लगेंगे देने में। यह होना है। हमें अपने अंदर के उस सौंदर्य को प्राप्त करना है जिसे देने में आनंद आता है, जो उदारता का आनंद लेता है, जो निर्भयता का आनंद लेता है, जो सारे दुनिया के सारे सद्गुण जो हमारे अंदर बसे हैं उनका आनंद लेता है। हमें सिर्फ अपने अंदर नीचे गहरा उतरना है। और ये सब आप के लिए तैयार है। सब तैयार है। ये सब वहां है!

तो मुझे लगता है कि अब हमें अनुभव प्राप्त करना चाहिए। यही सबसे बढ़िया है। क्योंकि हर समय उसके बारे में बात करने से क्या लाभ? जरा सोचिए कि मैंने अगर एक केक बनाया है, अच्छा यह होगा कि आप उसे गर्म खाएं और उसका आनंद लें!

कितने सारे लोगों ने उसका आनंद लिया है, और मैं चाहती हूं कि सभी नए लोग उस का आनंद लें क्योंकि जैसा मैंने कल आपको बताया था, आप मुझे कुछ नहीं दे सकते। मुझे कुछ भी जरूरत नहीं है। मैं यहां सहज योग करने नहीं आई हूं। मैं लंदन इसीलिए आई हूं क्योंकि मेरे पति कि यहां पोस्टिंग हुई और इस कारण मैं यहां हूं। मैं कहूंगी कि ये आप की अपनी पुकार है कि मैं यहां हूं। तो आपको मुझे कुछ नहीं देना है। कुछ भी जरुरत नहीं है। सिर्फ इतनी बात है, उसे स्वीकार करें और केवल उस का आनंद लें। यह एक उपहार है जिस के आप योग्य हैं। यह आपका अपना अधिकार है। आप परमात्मा के पुत्र हैं और आपको वह बनना है।

परमात्मा आपको आशीर्वादित करें! आइए अब इसका का अनुभव लें!

अगर आपके कोई सवाल हैं, तो आप सवाल पूछ सकते हैं। सवाल पूछने में कोई नुकसान नहीं है। पर मैं कहूंगी कि पहले अनुभव ले लीजिए और बाद में सवाल पूछिए, ज्यादा बेहतर विचार होगा!

अब आप इस तरह अपने हाथ मेरी तरफ करें। मेरी प्रार्थना है कि अपने माथे को साफ कर ले यह मेरे लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि माथे पर कई बार समस्याएं होती हैं, ज्यादातर होती हैं। क्या आप मेरे लिए अपना माथा साफ कर सकते हैं? केवल साफ करिए! मेरा मतलब है माथा खोलिए! अपने बाल हटाइए मेरा मतलब है सारे बाल! थोड़े से, हां यह ठीक है! क्या आप भी अपने बाल जरा से हटा सकते हैं? हां, अच्छा है! 

अभी अपने हाथ मेरी तरफ करें इस प्रकार!

यह आप कि बीमारियों को ठीक करता है, आप की शारीरिक तकलीफे। ये कैंसर ठीक करता है। कई बीमारियां ठीक करता है। हम ने ठीक किया है। कैंसर तो इसी से ठीक हो सकता है। और कोई रास्ता नहीं है। परंतु मेरे पास आने का क्या लाभ जब आप को कैंसर हो जाए या और कोई गंभीर बीमारी हो जाए? बेहतर होगा पहले ही उससे छुटकारा पा लें! (श्री माताजी धीमे स्वर में – यह काम कर रहा है) 

अब सभी अपनी आंखें बंद कर ले, जरा आंखें बंद कर लें। क्या आप अपना लाल स्कार्फ थोड़ा सा हटा सकती हैं? हां यह अच्छा रहेगा! कुंडलिनी को भेदन करना है और मैं उसे यहां भी देखना चाहूंगी।

सबसे पहले अपने दिमाग पर ध्यान दें। क्या आपके दिमाग में कोई विचार आ रहा है? सबसे पहले अपने दिमाग पर ध्यान दें। अपने दिमाग से पूंछे,’ तुम क्या सोच रहे हो?’ अपना चित्त कहीं ना डालें जुड़ा हुआ कैसे किसी पर केंद्रित हो, बस उसको ढीला छोड़ दें, पूरी तरह ढीला! कहीं पर ध्यान केंद्रित ना करें।

अब देखिए क्या आप अपनी उंगलियों में ठंडी हवा महसूस कर रहे हैं, क्योंकि ये उंगलियां, जैसे मैंने आपको बताया था, उसके अंत में सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम है जो आलोकित हो जाता है। तो आप अपनी उंगलियों के सिरे पर अनुभव करने लगते हैं, अगर आप ठंडी हवा अनुभव कर रहे हैं। अगर आप अपना चित्त स्थिर नहीं रख सकते तो अपने चित्त को अपने सिर के ऊपर रखिए जहां आप की मुलायम हड्डी थी बचपन में।

(श्री माताजी धीमे स्वर में: ठीक है? ठीक है। मेरे ख्याल से यह काम कर रहा है। अधिकतर चक्र साफ हो चुके हैं) अब आप देख सकते हैं अगर आपकी हाथों से ठंडी हवा आ रही है तो आपके सिर से भी ठंडी हवा आ रही होगी। अपना बायां हाथ सिर के ऊपर ले जाइए और खुद ही देखिए कि वहां गर्म हवा है या ठंडी। ठंडी हो सकती है और गर्म भी हो सकती है। अगर वह ठंडी है तो ठीक है, अच्छा है!

मिल गई? आपको भी ठंडी हवा आई? अभी नहीं? सिर में? हाथ में? अभी नहीं? यह कार्य करने लगेगा। चिंता मत करिए!

अब जिनको अनुभव नहीं हुआ है कृपया अपने हाथ उठाएं। ठीक है! अगर आपको बुरा ना लगे तो मैं इन लोगों से कहूंगी कि आप की देखभाल करें और मैं भी नीचे आऊंगी देखने के लिए। ठीक है?

जिन्हें अभी तक ठंडी हवा का अनुभव नहीं हुआ है कृपया अपने हाथ उठाएं। (सहज योगियों से – जरा इन पर ध्यान दीजिए) ऐसे ही रखिए ताकि कोई आपके पास आए। कृपया क्या आप?

मैं सोचती हूं सबसे अच्छा रहेगा अगर ब्राइटन के लोग करें, यह बेहतर होगा! आप को भी आना चाहिए, आप को भी, आप सब को आना चाहिए और मदद करनी चाहिए। मै जो कह रही हूं क्योंकि उनको पता होगा यह कौन है, उनके क्या नाम है और बातें। बेहतर होगा कि ब्राइटन के लोग ही इसे कार्यान्वित करें और अन्य लोग भी। आप खुद ही देखिए। और अन्य लोगों को भी उनके साथ शामिल होना चाहिए दूसरों की मदद के लिए। क्या समस्या है देखें?

यह बाएं से दाएं है। अधिकतर लोगों को संतुलन जैसा चाहिए बाएं से दाएं। बाएं से उठाएं दाएं की ओर अपने बाएं हाथ मेरे तरफ रखते हुए। आप जरा बाएं से उठाएं और दाएं ओर ले जाएं। यह काम करेगा!

जॉन आप समझे ये भी वही है, बाएं से दाएं। अब इन सज्जन को मिल गया है। क्या आपको ठंडी हवा आ रही है? बढ़िया!

आप भी शामिल हो जाइए। आप जॉन के साथ शामिल हों और देखें ये क्या है। अभी आप उसकी पूरी कल्पना देख सकते है। आइए! आप का क्या नाम है? क्या नाम है? क्या कहा इन्होंने?

योगी : रौस

ठीक है! आप जॉन के साथ शामिल हो जाइए और देखते हैं। जॉन! आप खुद देख सकते हैं। आपके वाइब्रेशंस जान जाएंगे। अब आइए! उस को बुलाइए!

जिनको कल आत्म साक्षात्कार प्राप्त हुआ था वह भी इसको करके देखें अपने आप। आइए। जरा देखिए! अब देखिए ठंडी हवा आ रही है। क्या आप हाथों में ठंडी हवा का अनुभव कर रहे हैं? आपको हाथ में अनुभव नहीं हो रहा? आपको सिर में अनुभव हो रहा है? ठीक है!

क्या आपको अब अनुभव हो रहा है? विशुद्धि चक्र! उनको विशुद्धि चक्र की समस्या है, इसलिए। आप उसकी विशुद्धि पर हाथ रखिए! जॉन!

आप सब भी जिनको आत्म साक्षात्कार मिला है आइए और इसको करिए।

आपको ठंडी हवा आ रही है? ठीक है।और आपका क्या हाल है? आइए। वह भी बहुत बढ़िया हैं। 

अच्छा आप को मिल गया? आइए यहां खड़े होइए। आप शामिल हो जाइए उसके साथ। आइए। वो आप के साथ है? उसके साथ कार्यान्वित करिए। अब आपको ब्राइटन के लिए यह कार्यान्वित करना है। है ना?

आप यह कर सकते हैं। वो वहां है आप की मित्र। वो आप को बताएगी क्या करना है। हां! आइए। अब ठीक है? उनकी विशुद्घि को बंधन दीजिए जैसे उन्होंने दिया है। यह बढ़ गई है। तब आप को हाथों में अच्छा अनुभव होगा। अगर आप विशुद्धि को इस तरह घुमाएं, तो यह ऐसे अच्छा होगा। अगर आप अपना हाथ इस प्रकार घुमाएं तो आप विशुद्धि को ज्यादा शक्ति दे सकते हैं। देखिए! हां! इस तरह यह ज्यादा अच्छा काम करता है। उस तरह ज्यादा मोड़ें। क्या पहले से बेहतर है? जॉन वो कैसे हैं? आपका क्या नाम है? आपका? मैं आपसे पूछ रही हूं? नहीं! उनका।

साधक: इवान

इवान आप भी इसको अनुभव कर सकते हैं। हैं ना? अब आप भी उनको अनुभव करने का प्रयत्न कीजिए। उनकी मदद कीजिए। आप अपनी कुंडलिनी उठाइए। अब उस के हाथ पकड़िए एवान और रॉस! आप उनके पीछे खड़े हो जाइए! अब देखते हैं, आइए! खुद ही देखिए यही सब से अच्छा होगा। आइए। खड़े हो जाइए।

अब आप सब एक साथ हाथ पकड़ें। अब आप तीनों अपने हाथ। नहीं! हां! मैं एक हाथ रखूंगी। दाएं हाथ। आप सब अपने दाएं हाथ साथ में रखें। ठीक है? इस तरह। हम सब। अब आप नीचे से कुंडलिनी उठाइए। आइए। एक, दो, तीन! करिए। फिर से, एक बार फिर से। 

क्या अब आपको अपने हाथ में अनुभव हो रहा है? उन से पूछिए। क्या वह अपने हाथ में अनुभव कर रहे हैं? क्या आपको ठंडी हवा का अनुभव हो रहा है? अभी नहीं? बिल्कुल भी नहीं? थोड़ा सा? हां। यह कार्यान्वित हो रहा है आप देखिए। यह बढ़ गया है। क्या यह बढ़ गया है? उनको बाएं से दाएं रखें। जॉन उनको बाएं से दाएं रखें। हां! वह पहले से बेहतर है। क्या आपको ठंडी हवा का अनुभव हो रहा है? बढ़िया! (श्री माताजी और अन्य किसी के हंसने का स्वर) यह काम कर रहा है। 

यह कार्य करेगा ही! और उनका क्या? क्या कहा? उनको बाएं से दाएं करिए। क्योंकि दाएं बहुत ज्यादा है। बाएं से दाएं। अब देखिए, अब आप उसे उठाइए। अब यह ज्यादा सरल भी होगा उठाना। अब उठाइए आप तीनों। अब उठाए। उनका क्या हाल है? सबसे पहले उनको बाएं से दाएं की तरफ उठाकर ले जाइए। यह महत्वपूर्ण है। क्या वो ठीक है? क्या? अब बाईं विशुद्धि। ठीक है।

आपको क्या अनुभव हो रहा है? दोषी भाव? आप सिर्फ इतना कहिए, कि मैं दोषी नहीं हूं। बस इतना ही। क्या आप मेरे लिए यह कहेंगे? मैं किसी भी कारण दोषी नहीं हूं, सिर्फ इतना कहिए। कार्य करता है। बेहतर? अब मुझे नीचे जाना चाहिए।

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