Easter Puja: The Meaning of Easter

London (England)

1980-04-06 The Meaning Of Easter, Dollis Hill Ashram, London, UK, 31' Download subtitles: EN,IT,RO,TRView subtitles:
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1980-04-06 ईस्टर का अर्थ, डॉलिस हिल आश्रम, लंदन, ब्रिटेन

… जैसे कि आज मैं एक मुस्लिम लड़के से बात कर रही थी और उसने कहा कि “मोहम्मद साहब एक अवतरण नहीं थे।“ “तो वे क्या थे?” “वे एक मनुष्य थे , परंतु परमात्मा ने उन्हें विशेष शक्तियां दी हैं।” मैंने कहा, “बहुत अच्छा तरीका है!” क्योंकि यदि आप कहते हैं कि वे एक मनुष्य थे, मानव जाति के लिए  यह कहना बहुत अच्छा है कि “वे केवल एक मानव थे , वे इस पृथ्वी पर आये , और हम उनके समकक्ष हैं।” जो आप नहीं हैं। इसलिए विस्मय और वह श्रद्धा जैसा कि आप इसे कहते हैं, वह हमारे अंदर नहीं आती है । व्यक्ति सोचने  शुरू लगता हैं कि वह ईसा मसीह के समान हैं, मोहम्मद साहब के समान है, इन सभी लोगों के सम कक्षा है! और वे कहां और हम कहां हैं?

जैसे, यहां, लोग ईसामसीह के जीवन के साथ कैसे खेल रहे हैं! वे स्वयं अपने को ईसाई कहते हैं, और वे उनके जीवन के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाते हैं, क्योंकि यह बनना है जिसके बारे में उन्होंने चर्चा की थी।  उन्होंने इन सब निरर्थक की बातों के विषय में बात नहीं की थी । दूसरी बात हम कोई सम्मान नहीं करते हैं । हमारे हृदय में कोई आदरपूर्ण भय नहीं है कि एकमव वही हैं जिन्होंने एक के बाद एक कई ब्रम्हांडों की रचना की है और हम क्या है, उनकी तुलना में? हम न्यायधीशों  की तरह  बैठ कर उनका निर्णय कर रहे हैं। मनुष्य में  कितना अहंकार है ! बुलबुलों की तरह।

निश्चय ही, वे  स्वयं ब्रह्म तत्व से  निर्मित थे, दिव्य प्रेम से, इसलिए उन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त उन्हें कृष्ण के बाद जन्म लेना पड़ा क्योंकि कृष्ण ने कहा था कि, “परमात्मा की यह दिव्य शक्ति नष्ट नहीं होती है। इस का संहार नहीं किया जा सकती है”, बस यह प्रमाणित करने के लिए, उन्होंने यह रूप धारण किया, ईसामसीह का यह स्थूल  स्वरूप और इस पृथ्वी पर अवतरित हुए। परन्तु मनुष्य उन के  पास कुछ भी देखने के लिए  दृष्टि नहीं हैं। वे जानते हैं कि हीरा क्या होता है, वे जानते हैं कि एक  बहुमूल्य कपड़ा क्या होता है, परन्तु  वे नहीं जानते कि यह कितनी अनमोल घटना  थी कि वे (ईसा मसीह) इस  पृथ्वी पर अवतरित हुए । अब इसके बारे में सोचिये  ! यह स्थिति भयानक थी। परमात्मा के विषय में या आत्मसाक्षात्कार के विषय में किसी से बात करने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता था। अपितु स्वयं धर्म के विषय में बात करना भी, धर्मपरायणता, बहुत ही कठिन था। मेरा आशय है, उन लोगों में कितनी  अज्ञानता छायी होगी कि उन्होंने उन्हें  क्रूस पर चढ़ा दिया।

फिर, यहां तक कि उन के शिष्यों ने भी ईसामसीह को कभी नहीँ पहचाना । जब उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया तो उन्होंने कहा, “अब वे मर चुके हैं।” फिर जब वे पुनः जी उठे, तो किसी ने भी इस पर विश्वास नहीं किया। यहाँ तक कि उन्हें जो ‘कफन’ मिला, उसके बारे में भी कई तरह की किंवदंतियां हैं। निःसंदेह,  एक कपड़ा  था जो उनके चेहरे पर बंधा हुआ था जिसे खींचा गया था, यही कारण है कि उनका चेहरा लम्बा और विकृत दिखता है। परंतु वह कपड़ा वहीं रह गया था। मेरा आशय है, उस कफन के बारे में इतना महत्वपूर्ण क्या है? मैं समझ नहीं पाती । यह ईसामसीह का रक्त है। उन्हें स्वयं पर लज्जित होना चाहिए । जिस अज्ञानता के साथ लोगों ने उन्हें देखा।

आप कल्पना नहीं कर सकते ! यदि आप उस दृष्टि कोण से देखते हैं,  लोग कैसे अपने अहंकार के साथ स्वयं अपने को प्रबंधित कर रहे है,और पूर्ण अंधकार में जी रहे हैं ,और स्वयं अपने को स्वप्रमाणित करते हैं कि वे ही  लोग हैं जो  कि परमात्मा का भी निर्णय कर सकते हैं!

और मुश्किल से उन्होंने उन्हें तीन या चार वर्षों तक ही जीवित रहने दिया। उन्होंने किसी को भी किसी भी प्रकार की कोई हानि नहीं पहुंचाई। आप इसके लिए किसी समुदाय को दोष नहीं दे सकते। यदि उनका जन्म भारत में हुआ होता ,तो सम्भवतः वे भी ऐसा ही करते । उन्होंने मोहम्मद साहब के साथ क्या किया? बस ऐसा ही।

परंतु यहाँ इतनी अधिक संख्या में चोर  हैं, जैसा कि उनके जीवन में दिखता है – केवल एक विरोधाभास -जिन्हें बचने  की अनुमति दी गई क्यों? यह समझौता क्यों संभव हुआ और ऐसा ईसा मसीह के साथ क्यों हुआ ? क्या हम आज अपने साथ वही कार्य करते हैं? कि हम चोरों के साथ अपना समझौता करते हैं, जो नकारात्मक लोग हैं, और हमें इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया जा रहा है ।

अब जैसा कि आप जानते हैं उन्होंने सभी ब्रम्हांडों की रचना की । ब्रम्हांड का अर्थ है ‘एक यूनिवर्स’। अब, सूर्य का ब्रह्मांड, इस ब्रम्हांड में से पृथ्वी बनीं और उसमें से आप जन्में है। और आपके आज्ञा चक्र में उन्होंने एक छोटा सा विराट का सृजन किया है, जैसा कि वे इसे कहते हैं । वे आपके आज्ञा चक्र के भीतर विध्यमान हैं।

यह त्याग अति , अति महत्वपूर्ण है । और, यद्यपि यह स्थूल  है, सूक्ष्म में यह घटित हुआ है । जागरूकता को इस आज्ञा चक्र के मध्य में से लेकर जाने का कार्य ईसा मसीह द्वारा किया गया स्वयं अपने को सूली पर चढ़ा कर । वे एक स्थूल व्यक्ति के रूप में आये ,  एक स्थूल मानव की भाँति, उनकी देह की मृत्यु हो गई, परंतु नष्ट नहीं हुई , क्योंकि वह शरीर भी उस अविनाशी दिव्य चैतन्य से बना हुआ था, जैसा कि आप कहते हैं, इस ब्रह्म का विकिरण। वे  नष्ट नहीं हुई थी। और यही कारण है कि शरीर की मृत्यु नहीं हुई, और वे अपने शरीर के साथ पुनर्जीवित हो गये । उन्हें यह दिखाने के लिए मरना पड़ा कि, यद्यपि शरीर मरता है, इसे  बचाया जा सकता है। इसलिए उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया था। अन्यथा वे आपको यह नहीं  दर्शा सकते थे ।

किन्तु वास्तव में,इसका वैकुंठ में ‘प्रयोग ‘ किया गया था, जैसा कि आप इसे कहते हैं: कि वे मरे और फिर पुनर्जीवित हुए ; यह दिखाने के लिए कि यह मरता नहीं है। कृष्ण ने कहा है, “नैनं छिन्दन्ति  शस्त्राणि , नैनं दहति पावकः।“ अर्थात “इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते ,न ही इसको कोई आग  जला सकती । न ही  इसे पावन उड़ा सकती है।“ “ न चैनं क्लेदयन्त्यापो ,न शोषयति मारुतः ।। “ कोई भी, कुछ भी इसे शोषित नहीं कर सकता।“ वही आत्मा वे हैं। 

जब उन्होंने उन्हें पुनर्जीवित होते हुए देखा तब उन्होंने कहना शुरू कर दिया, “ओह ! वे वही थे ! ” तब उनके शिष्यों ने उन पर विश्वास किया। कितनी अज्ञानता , कितना अंधकार ! कितना अंधकार ! यह एक चींटी को मानव सभ्यता के विषय में बताने के समान है ।

और यह स्थूल  घटना घटित हुई,, सूक्ष्म में भी ,ऐसी ही घटना घटित होना था । जैसे कि जब आप कहते हैं कि मूसा ने नदी पार की , तो यह आदि गुरु द्वारा भवसागर पार किए जाने की घटना थी ।अतः, सूक्ष्म  में ,जो कुछ भी किया जाता है उसे इस प्रकार से स्थूल में अभिव्यक्त  किया जाता  है। और यही  वास्तव में घटित हुआ जब ईसामसीह को क्रूस पर टांगा गया था।

परन्तु पुनः आप उन्हें सूली पर नहीं चढ़ा सकते। अब वे ‘एकादश रुद्र ‘बन गये हैं , जैसा कि वर्णित है- ग्यारह रुद्र, जैसा कि आप भली-भांति जानते हैं। ये  शिव की समस्त शक्तियां हैं जो उन्हें प्रदान की गई हैं।

अभी तक, जब तक उनका जन्म हुआ था , कृष्ण ने उन्हें अपनी शक्तियां प्रदान की थीं, और उससे वे  ‘महाविराट’ बन गये। यहाँ तक कि उन्हें कृष्ण के ऊपर स्थापित किया गया। परन्तु अब, जब वे (अवतरण होगा) आएंगे , तो वे शिव की विनाशकारी शक्तियों से सुसज्जित होंगे ,  ग्यारह की संख्या में।एक ही शक्ति समस्त ब्रम्हांडों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। और यही है जो ईसामसीह रूप में आने के लिये वर्णित है।

अब आप उन्हें पुनः क्रूस पर नहीं चढ़ा सकते। और अब समय आ गया है कि हम सभी उनका स्वागत  करने के लिए तैयार रहें। हम अभी भी उनका स्वागत करने के लिए तैयार नहीं हैं। जब तक आप आत्मसाक्षात्कारी नहीं बनते,  आप उनका स्वागत नहीं कर सकते ,क्योंकि यदि आप ‘अजाग़्रत’ बने रहते हैं,उनके आने तक, तो आप समाप्त हो जाएंगे, आप यहाँ नहीं रहेंगें, आप नष्ट हो जाएंगे। वे केवल समस्त निरर्थक चीजों का विनाश  करने के लिए अवतरित होगें। अतः इस सीमित समय का उपयोग आपको मोक्ष और आपके उत्थान के लिए किया जाना चाहिए ।

किन्तु जब हम ईसामसीह के विषय में विचार करते हैं, तो मनुष्य कैसे पूर्ण दिखावा करता है। सभी प्रकार के ढोंग,   जैसे वे नाटक करते हैं, अभिनय करते हैं कि ईसामसीह को कैसे सूली पर चढ़ाया गया था। वे समस्त सुंदर गहने धारण करेंगे और सब कुछ और वे अभिनय करेंगे । यह सब उपहास हो रहा हैं ।

यदि आपको वास्तव में पुनरुत्थान की स्थिति में आना है तो आपको अपने आज्ञा चक्र में स्वयं अपने भीतर ईसा मसीह को जागृत करना होगा। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते , तो यह सब अभिनय , यहां तक कि मैंने स्पेन में कुछ लोगों को देखा है, वे कहते हैं, क्रूस पर लटकने  जैसा अभिनय कर रहे हैं। मेरा आशय है,  में यह उपहास चल रहा है इस विश्व में । हम ढोंग और झूठ के साथ जी रहे हैं । ये सभी बातें  हमें कहीं नहीं पहुंचाएंगी । हमें स्वयं अपना  सामना करना होगा । हमें अपने भीतर ईसामसीह को जागृत करना होगा। हमें , उनके सामने नतमस्तक होना होगा पूरी सूझबूझ के साथ की वे कितने महान है !

इसके विपरीत, हम सदैव उन व्यक्तियों की ओर झुकते हैं जो ढोंगी होते हैं, जो उनका ‘सर्कस’ बनाते  हैं। यह उपहास सभी ओर  हो रहा है! यह क्रूस को ले कर जाना या कोई भी नाटक, मेरा अभिप्राय  है, यह कितनी दुःखद  बात थी। और इसे अभिनीत करने के लिए – मैं नहीं जानती कि लोग ऐसा क्यों करना चाहते हैं। मैं बिल्कुल नहीं समझ सकती। मैं इसे सहन नहीं कर सकती।

परन्तु यदि आप में भावनाएं है, आप स्वयं अपने भीतर देख सकते हैं: यह एक समारोह, एक अनुषठान नहीं हो सकता । बलिदान होना और पुनर्जीवित होना; यह वास्तविकता है, ‘बनना’ है । यह कोई नाटक नहीं है। और लोग इस प्रकार का नाटक देखना चाहते हैं, और संतुष्ट हो जाते हैं।

हम सहजयोगियों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि ईसामसीह के जीवन के महत्व को समझें, कि उनका शरीर ऐसा  शरीर था जो केवल इन विकिरणों से बना था। अन्य सभी शरीर मानव शरीर थे। सभी अवतार, यहां तक कि कृष्ण का भी ,जब वे इस पृथ्वी पर आए तो उनमें भी मानवीय गुण थे – वह पृथ्वी मां उनके शरीर में उपस्थित थीं। अब पृथ्वी मां एक चुंबकीय शक्ति के रूप में विध्यमान होती हैं , वे केवल एक चुंबकीय शक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हैं। यदि चुंबकीय बल ही ईसामसीह की ऊर्जा का एकमात्र भाग है, तो इसे नष्ट नहीं किया जा सकता।

किन्तु हम जैसा कि हम मनुष्य हैं, हम बहुत स्थूल  हैं। और पृथ्वी माता की चुंबकीय शक्ति को भी हम नहीं जानते। हम इसे भीतर अंदर अनुभव नहीं करते। जिस दिन हम अपने अंदर उस चुंबकीय शक्ति को अनुभव करना प्रारम्भ कर देंगे , हम अति की इन सभी निरर्थक गतिविधियों को छोड़ देंगे। हम अपने गुरुत्व में स्थापित हो जाएंगे । किन्तु हम उस चुंबकीय बल के प्रति इतने संवेदनशील भी नहीं हैं जैसा कि में पक्षी हैं। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात आप,  उस चुंबकीय बल को अनुभव करने के लिए अवश्य ही  पर्याप्त सूक्ष्म हो जाते हैं। और आप पृथ्वी माँ से माँग  सकते हैं कि वे आपकी समस्याओं को दूर करें, आपके पापों को दूर करें – वे अपने भीतर सोख लेंगी। एक बार जब आप उतने (उस स्तर पर) सूक्ष्म हो जाते हैं, वे इसे क्रियान्वित करेंगी, निःसन्देह। परन्तु आपको उतना ( उस स्तर पर)  सूक्ष्म बनना होगा।

जब तक आप उतना (उस स्तर पर ) विकसित नहीं हो जाते, तब तक आप उनके सूक्ष्मतर पक्ष को स्पर्श नहीं कर सकते, जो कि चुंबकीय शक्ति है। जबकि ईसामसीह का  शरीर उसी  चुंबकीय शक्ति  से ही निर्मित था।

अब, जब वे पुनर्जीवित हो गये , वे लोग रविवार को उत्सव मनाते हैं, क्योंकि जैसा कि आपने देखा है कि उनके पास लाखों-करोड़ों सूर्य हैं, और वे सूर्य से बने हैं। वे सूर्यतत्व का सार हैं। सूर्य के भीतर ऑक्सीजन की शक्ति  समाहित हैं, और यही ऑक्सीजन एक के बाद एक अनेक ब्रम्हांडों का सृजन करने के लिए उत्तरदायी है।

आप देखें , जब सूर्य की किरणें वृक्ष पर पड़ती हैं – हम इस बात का महत्व नहीं समझते – पेड़ों पर फूल खिलते हैं , फल लगते हैं ; फलों में बीज होते हैं और वे फिर से अंकुरित होकर पेड़ बनते हैं। सूर्य के बिना इस पृथ्वी पर कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता। और यही कारण है कि हम रविवार के दिन पूजा करते हैं, क्योंकि वे सूर्य थे।  वास्तव में, वे सूर्य में रहते हैं , हम कह सकते हैं। 

अब जब हम बांयी पक्ष की  ओर जाते हैं, तो हम वास्तव में उनसे बहुत दूर चले जाते हैं, नकारात्मक पक्ष में । हम बहुत नकारात्मक हो जाते हैं, जैसे जब हम बायीं पक्ष की  ओर जाते हैं, जैसा कि आप जानते हैं, हम उनसे बहुत दूर हो जाते हैं और हमारा आज्ञा चक्र पकड़ जाता है, जैसा कि आप कहते हैं, इस चक्र के पीछे की ओर । आप अपने दायीं  पक्ष में अति पर जाते हैं,आप उन्हें अस्वीकार करते हैं, आप अपनी सीमाएं पार करते हैं। आप उनसे परे  नहीं जा सकते। और इसी  कारण  जब आप दायीं पक्ष की ओर जाते हैं तो आप शालीनता, शिष्टाचार और विनम्रता की सभी सूझबूझ की सीमा को  पार कर जाते हैं। तो दोनों ओर आप  विपरीत दिशाओं में चले जाते हैं, उनसे बहुत दूर।

अहंकार दाहिने पक्ष के आंदोलन  का परिणाम है, क्योंकि ईसामसीह  का सार-तत्व उन व्यक्तियों पर आवश्यक कार्यवाही सक्रिय  नहीं करता, जो बहुत अधिक दाईं पक्ष और बायीं पक्ष की ओर गति करते हैं। तो एक ओर वे बाईं पक्ष , प्रतिअहंकार से लड़ते हैं , एवं दूसरी ओर वे मनुष्यों में अहंकार से लड़ते हैं।

यही कारण है कि आपने देखा है, यदि आप बहुत बाधित हैं, तो आपको ईसामसीह का नाम लेना होगा। केवल उनका नाम ही आपको आपकी बाधाओं  से दूर कर सकता है। प्रभु की प्रार्थना में ( लॉर्डस प्रेयर)  बाधाओं को दूर करने के सभी सार-तत्व विध्यमान है । परन्तु किसी डिक, टॉम या हैरी द्वारा कही गयी ‘प्रभु प्रार्थना’से  नहीं । उसे प्रभु ईसामसीह से सम्बद्ध होना चाहिए , केवल तभी यदि आप इसे कहें,तो इसका प्रभाव पड़ता है और ऐसा मंत्र एक जागृत मंत्र है।

दायीं पक्ष की ओर, जब आप गति करते हैं ,आपको  अपने ह्रदय में विनम्र होना होगा, क्योंकि वे आत्मा के रूप में आपके हृदय में निवास करते हैं, क्योंकि वे आत्मा हैं। और यह आत्मा अपमानित हो जाती है जब आप दाहिनी ओर बहुत अधिक चले जाते हैं। और यही कारण है कि अहंकारोन्मुख व्यक्तियों को हृदय की समस्या होती है।

बायीं पक्ष की ओर, प्रतिअहंकार क्षेत्र में ईसामसीह एक आतंक है! वे उनके नाम से भयभीत होते हैं। वे उनसे दूर भागते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे एकादश रुद्र हैं। तो एक पक्ष में वे सौम्य हैं , अर्थात्  वे उन व्यक्तियों से पीछे हट जो अहंकारी हैं , अहंकारोन्मुख हैं। वे विदूषकों और मंद बुद्धि  व्यक्तियों को पसंद नहीं करते। गधे जिनपर वे सवारी करते थे  उन के लिए संकेत हैं, जो अहंकारोन्मुख हैं। उन्होंने ‘गधे’ को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

परन्तु बायीं पक्षीय वे  व्यक्ति हैं, वे भयंकर नकारात्मक लोग  हैं , वे उनसे भयभीत हो जाते हैं। पूर्णतया भयभीत।आप ईसामसीह का नाम लें और वे बस दूर भाग जाते हैं, दूर हो जाते हैं, “नहीं, किसी भी अवस्था में नहीं, हम उनका सामना  नहीं करेगें।  हे ईश्वर, वे आ रहे हैं ! “

अब यह माथे पर[बिंदी] चिन्ह वास्तव में उनके रक्त का संकेत है। और यही कारण है कि यह चिन्ह जैसा वर्णित है , उन व्यक्तियों को ,यहाँ तक कि यदि आप ये रंग उन्हें दिखा दें तो वे भाग जाते हैं । परन्तु आप को धैर्य के साथ, विनम्रता के साथ ईसामसीह के महत्व को समझना होगा, क्योंकि वे वही हैं जिन्होंने एक के बाद एक कई  ब्रम्हांडों की रचना की है। यहां आप केवल एक मेज पर बैठकर नहीं कह सकते हैं, “आओ चलो इसपर बहस करते हैं!” या, आप देखें, “चलो चर्चा करते हैं”। यह कोई ‘हठ धर्म’ नहीं है। वे एक जीवंत परमात्मा हैं, और जीवंत परमात्मा  की चर्चा मनुष्यों द्वारा नहीं की जा सकती है।उन पर चर्चा करने के लिए ,उन्हें समझने के लिए आपको अति  मानव बनना होगा। और जितना अधिक आप उन्नत होते जाएंगे, उतना ही आप विस्मयपूर्ण आदर से भरते जाएंगे , “हे परमात्मा!” और जब आप अनुभव करेंगे कि वे ब्रह्मांड का आधार हैं ,वे हमारा आधार हैं ,तो आप बहुत शक्तिशाली अनुभव करेंगे कि –  कोई भी आपको बाधित नहीं कर सकता यदि वे आपको ‘सहारा’ हैं।

किन्तु आप ईसामसीह पर केवल अपना अधिकार नहीं जमा सकते। आप नहीं कह सकते, “ठीक है, ईसामसीह मेरे हैं !” कोई भी व्यक्ति उन्हें अपने  अधिकार में नहीं रख सकता। आपको उनके प्रति समर्पित होना होगा ताकि आप उनकी सम्पदा बन जाएं, जिससे वे आपकी देखभाल करें।

उनकी महानता को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता। एक बच्चे के रूप में, एक पुत्र के रूप में वे आनन्द दाता हैं । कोई व्यक्ति यह वर्णन नहीं कर सकता कि कैसे उन्होंने अपनी माँ की देखभाल  की – यह असंभव है।कोई भी शब्द वर्णित नहीं कर सकते: ईसामसीह की अपनी माँ के लिए समझ को : उनका प्रेम, उनकी सौम्यता, उनकी देखभाल, उनकी भक्ति, समर्पण, उनकी श्रद्धा । इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

और आप जानते हैं कि वे एक उन्नत श्री गणेश के रूप में अवतरित हुए थे। और पीछे (आज्ञाचक्र)वे श्री गणेश हैं; सामने वे कार्तिकेय हैं: बहुत शक्तिशाली, ग्यारह रुद्र । और इसने उन्हें सर्वोच्च पद प्रदान किया है।

इसलिए, आज इस दिन, हमें यह सोचना होगा कि उनका पुनरुतथान हमारे लिए कैसे किया गया था। उनसे अधिक, उनकी माँ को उनका क्रूस  पर चढ़ाए जाने का कष्ट उठाना पड़ा। यह बहुत अधिक कष्टदायी था । क्योंकि वे उनके विषय में सब कुछ जानती थीं , वे जानती थीं  कि यह सब घटित होने वाला है और वे एक मां के रूप में एक मानव स्वरूप थीं ,और उनके इकलौते प्रिय पुत्र को उनकी उपस्थिति में क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था ।

हमें क्रूस पर टांगे जाने का  महिमामंडन एक कारण से नहीं करना चाहिए: क्योंकि ईसामसीह को उस पर सूली चढ़ाया गया था। परंतु क्रूस आज्ञा चक्र का भी सूचक है। क्योंकि वही स्वास्तिक, जो समान रूप से विस्तारित ,चार संयोजकताओं  वाला था , एक उन्नत प्रतीक के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है जो एक क्रूस है।

इसलिए जब हम क्रूस का गुणगान करते हैं, तो हम अपनी आज्ञा का महिमामंडन कर रहे हैं, जिसके द्वारा हम समर्पण और त्याग के जीवन को स्वीकार करते हैं । और यदि हम क्रूस  के बाद आगे की ओर देखें तो हम जानते हैं कि यह पुनरुत्थान है । और यह  पुनरुत्थान आप इसी जीवन काल में यथार्थ में प्राप्त करने जा रहे हैं।

परन्तु अब अपनी खोज संबन्धी सभी निरर्थक विचारों को और व्यर्थ भटकना  छोड़ दें ।खोज का तात्पर्य किसी  विषय में ज्ञान पाना नहीं है , परन्तु कुछ ‘बनना’ है। इसके लिए ईसामसीह ने स्वयं को सूली पर चढ़ाया। उन्होंने स्वयं को पुनर्जीवित किया ताकि आप सभी का पुनरुत्थान  हो सकें। तो आपको आज, पुनरुत्थान का नेतृत्व करने के लिए उन्हें धन्यवाद देना होगा। और इसी जीवनकाल में ही आप पुनर्जीवित होने जा रहे हैं और आप स्वयं  अपनी आंखों से अपने पुनरुत्थान को देखने जा रहे हैं ,जैसा उनके शिष्यों ने  ईसामसीह के पुनरुत्थान को देखा था। यह सब वचन दिया जा रहा है और यह आप सभी के लिए घटित होना चाहिए । इसलिए हमें आनंदित और प्रसन्न रहना चाहिए कि सार्वजनिक पुनरुत्थान का समय आ गया है। और  इतनी महान घटना का हम सामना कर रहे हैं, हम इतने भाग्यशाली लोग हैं ।

अपनी  संकुचित दृष्टि और क्षुद्र लालसाओं को त्याग दें ,अपना निम्न, अल्प जीवन जिसमें हम मेंढक की भाँति जीवित रहते हैं । स्वयं अपना विस्तार करें और विचारें कि आज आप ‘सामूहिक पुनरुत्थान’ के नाटक का सामना कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अपितु आप इसका कुशलता से प्रबंध कर रहे हैं ।

इसलिए आनंदित और प्रसन्न हों कि, जो  ईसामसीह ने दो हजार वर्ष पूर्व किया था, आज हम यह करने जा रहे हैं, और इसलिए ईस्टर हम सभी के लिए एक विशेष दिन है। यह वास्तव में एक बहुत ही विशेष दिन है क्योंकि हमारे जीवन में मृत्यु मर गई है और हम पुनर्जीवित हो रहे हैं ।

परमात्मा आप सभी को आशीर्वादित करें !