Sahasrara Puja, Sincerity Is The Key Of Your Success

Dollis Hill Ashram, London (England)

1980-05-05 1 Sahasrara Day Puja 2, 10'
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1980-05-05 Sahasrara Puja: Sincerity Is The Key Of Your Success, London, UK, 52' Download subtitles: EN,IT,NLView subtitles:
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सहस्त्रार पर आपको सामूहिक आत्मा द्वारा आशीर्वादित किया जा रहा है।
(सहस्त्रार पूजा, डौलिस हिल)

हम कह सकते हैं कि 5 मई 1970 को पहली बार परमात्मा की सामूहिक आत्मा का द्वार खोला गया था। इससे पहले परमात्मा के आशीर्वाद लोगों को व्यक्तिगत रूप से ही प्राप्त होते थे …. और वे अपना आत्मसाक्षात्कार भी व्यक्तिगत रूप से ही प्राप्त करते थे एक के बाद एक। व्यक्तिगत आत्मसाक्षात्कार की विधि सामूहिक साक्षात्कार से एकदम अलग थी। उन्हें (व्यक्तिगत आत्मसाक्षात्कार) पहले अपना धर्म को स्थापित करना पड़ता था ……. अपने मोक्ष की कामना करते हुये स्वयं को पूरी तरह से स्वच्छ करना पड़ता था …… और अपने चित्त को मोक्ष पर ही केंद्रित करना पड़ता था या कह लीजिये कि ईश्वर प्राणिधान पर….. (ईश्वर – परमात्मा और प्राणिधान– तीव्र इच्छा) ….. ध्यान धारणा—- प्रार्थना …. परमात्मा के बारे में सोचना … उनकी कृपा प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करना …. स्वयं को शुद्ध करने के लिये धार्मिक तरीके से आचरण करना पड़ता था। उन्हें अपने मन मस्तिष्क पर, इच्छाओं पर, क्रियाओं पर इस तरह से नियंत्रण रखना पड़ता था ताकि वे पूरी तरह से मध्य मार्ग पर बने रहें और जब वे इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते थे …. या जब वे इसके योग्य हो जाते थे तो माँ की कृपा से उन्हें साक्षात्कार प्राप्त होता था। कुछ समय तक यही तरीका चलता रहा। जिन थोड़े बहुत लोगों को इस प्रकार से साक्षात्कार प्राप्त हुआ उन्होंने सहजयोग की तैयारी के लिये बहुत से सुंदर कार्य किये। वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में थे लेकिन वे बहुत कम संख्या में थे परंतु अद्वितीय थे। उदा0 के लिये भारत में और प्राचीन काल के अन्य स्थानों पर उन्होंने धरती माँ के अनोखे उपहार खोज निकाले जिनको वे स्वयंभू ……. या स्वयं ही सृजित कहते हैं। ये पत्थर की मूर्तियां हैं जिन्हें धरती माँ ने बाहर फेंक दिया और इन संतो ने उन्हें पहचाना। इन संतों ने उन स्थानों पर मंदिर बनवा दिये और उनकी पूजा करने लगे और पूजा के माध्यम से ही इन्होंने इन मूर्तियों को चैतन्यित किया ताकि वह उस क्षेत्र को पूर्णतया चैतन्यमय कर दें। संसार भर में इस प्रकार के पत्थर हैं लेकिन इनको केवल संत ही खोज पाये। इसके बाद उन्होंने जीवन में धर्म के महत्व की स्थापना की……. कि किस प्रकार से धर्म पर चलने से आपका स्वास्थ्य … धन … संपत्ति आदि ठीक रहता है …… संपत्ति वह जो आपकी शान में वृद्धि करती है न कि आपकी शान घटाती है और आपको विचलित करती है। उन्होंने स्कूल और विश्वविद्यालय खोले … खासकर भारतवर्ष में … और आज भारत में जो लोग इन विश्वविद्यालयों में पढ़ते थे वे अपने नाम के आगे इनका नाम अपने गोत्र के रूप में लगाते हैं … और आज भी एक ही गोत्र के लोग आपस में शादी विवाह नहीं करते हैं। वे अपने बच्चों को इस प्रकार से शिक्षा देते थे कि आगे चलकर वे धार्मिक जीवन बितायें …. अपने वैवाहिक जीवन का आनंद लें और बाद में वे इस तरह से परिपक्व हो जाते थे कि उन्हें आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो जाता था और आनंदपूर्वक अपना जीवनयापन करते थे। उन्होंने उन लोगों के चित्त को भी अंदर की ओर प्रक्षेपित किया जिनका चित्त बाहर की ओर था और अपने उदाहरण से …. अपने व्यवहार से अपने आनंदित होने की शैली से और एक खुशहाल व प्रसन्नचित्त जीवन जीने से उनके अंदर गहन मूल्यों की स्थापना भी की। इससे परमात्मा और धर्म पर उनका विश्वास और भी गहरा हुआ और वे बहुत ही सुंदर व संतुलित जीवन जीने लगे। उन्होंने सहजयोग की स्थापना के लिये काफी अच्छा कार्य किया जो आज भी हो रहा है। हमारे कार्य क्षेत्र में ये लोग नट और बोल्ट्स की तरह से हैं। धर्म की स्थापना करने की उनकी इच्छा इतना महान थी कि महाकाली की पूरी दैवीय शक्ति उनके माध्यम से कार्य कर रही थी। उन्होंने इस कार्य को अत्यंत समझदारी व विवेक के साथ किया। उन्होंने महान धर्मग्रंथों को लिखा और हजारों वर्षों तक वे लोगों के लिये मार्गदर्शी प्रकाश का कार्य करते रहे।
मैंने ऐसे समय पर अपना जन्म लिया जिस समय भ्रम ने भौतिक स्तर पर अपने परिणाम दिखाने प्रारंभ कर दिये थे। जीवन के सभी असंतुलन भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं। जब मैंने अपने चारों ओर देखा तो मैं देखकर हैरान थी कि अज्ञानता ने लोगों को कितना अपरिपक्व बना दिया है ……. मानों अज्ञानता के बादल ने उनको चारों ओर से ढक लिया हो। प्राचीन काल के लोगों में इतनी समझ थी कि वे जानते थे कि सही क्या है और गलत क्या है। लेकिन ऐसे ही भ्रमपूर्ण वातावरण में मेरा जन्म हुआ था और मुझे हमेशा से मालूम था कि मुझे सहस्त्रार खोलने का कार्य करना है। प्रारंभिक झटकों के बाद मैंने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया लेकिन मैंने सोचा कि अभी मैं इसके बारे में लोगों को न बताऊं और बिल्कुल सामान्य व्यक्ति की तरह से जीवन बिताऊं …. और बिल्कुल भी चमक दमक से दूर रहूं। जैसे कि ईसा के जन्म के समय आकाश में एक तारा चमका था और राजा हैरोड को उनके जन्म के विषय में मालूम हुआ … उनके सैनिकों ने कार्य किया और आप सब जानते हैं कि आगे क्या हुआ। यदि आप किन्हीं विशेष लक्षणों के साथ जन्म लेते हैं तो नकारात्कमता आपको तुरंत ढूंढ लेती है। वैसे इसने मुझे भी ढूंढ लिया था और मेरे जन्म के 15 दिनों के बाद एक भयानक दुर्घटना हो गई थी जैसा कि आप सभी जानते हैं। मुझे आपके अंदर प्रवेश करने के लिये अत्यंत कठिन परिश्रम करना पड़ा था ताकि मैं आपके अंदर के विभिन्न परिवर्तन और संयोगों का अध्ययन कर सकूं।
परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।


मुझे मालूम नही है कि आपमें से कितने लोग ये जानते हैं कि परमात्मा को कितना कार्य करना पड़ा है और आपमें से कितने लोग सदियों से और खासकर मेरे जीवन के इन 47 सालों में किये जा रहे इस महान कार्य के लिये उनका धन्यवाद करते हैं। परमात्मा ने सर्व साधारण मानव के रूप में इस पर लगातार कार्य किया है क्योंकि परमात्मा को सर्वसाधारण तक पंहुचना था …. न कि असाधारण तक बल्कि सर्वसाधारण मानव तक। उनको इस सर्वसाधारण मानव को गहन बनाकर उसके असाधारण गुणों को बाहर लाना था। ये कार्य बहुत कठिन था। लेकिन मुझको कहना पड़ेगा कि सहजयोग ने जब कार्य करना प्रारंभ किया तो मुझे भी कार्य करने के लिये सहजयोग के टूल के रूप में महान कार्यकर्ता दिये गये जिन्होंने इस कार्य के दायित्व को अपने ही कार्य की तरह से अपने ऊपर ले लिया। आप सब को इस कार्य के लिये उनका भी धन्यवाद करना चाहिये क्योंकि उन सबने मेरे साथ सचमुच बहुत कठिन परिश्रम किया है। हालांकि ये काफी कम लोग थे परंतु उन्होंने ये कार्य किया।
उनमें से बहुतों को कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इनमें से कुछ अपना इलाज करवाने या ऐसे ही किसी कार्य के लिये आये जो बहुत निम्न श्रेणी के लोग हैं …… या वे अपने किसी रिश्तेदार के इलाज के लिये आये। जब उनको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हुआ तो वे अपने सभी बीमार रिश्तेदारों को मेरे पास लेकर के आये … फिर उनमें से कुछ आर्थिक और मानसिक कारणों से आये। उनमें से कुछ अपने परिवार और कुछ अपनी आध्यात्मिक समस्याओं के लिये …. उनसे छुटकारा पाने के लिये आये। लेकिन जिसने भी सहजयोग को अपने दायित्व के रूप में लिया कि उनको यही करना है …. यही उनका जीवन है … यही उनका संपूर्ण अर्थ है। वे अपना पूरा ध्यान इस पर ही लगाते हैं और इसको कार्यान्वित करते हैं … उनके स्तर से जो कुछ भी संभव होता है वे करते हैं।
लेकिन आज हमको एक चीज समझनी है कि हमें उन वीर लोगों की जरूरत है …. और उन लोगों की जरूरत है जो इसे अपना दायित्व समझते हैं। ये सहजयोगियों का सबसे बड़ा गुण है। आपकी व्यक्तिगत बातें, आपके अपने चक्र और अपनी समस्यायें आदि इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना संपूर्ण में सुधार करना क्योंकि यदि संपूर्ण में सुधार होता है तो आपमें भी सुधार आयेगा। यदि पूरा शरीर सुधरेगा तो आप भी सुधरेंगे। यदि एक अंगुली सुधरती है और बाकी का शरीर पीड़ा में है तो आप भी खुश नहीं रह पायेंगे।
अतः मुख्य बात ये है कि आप सहजयोग के लिये क्या कर रहे हैं ….. आप क्या कर सकते हैं … आप कितनी दूर तक जा सकते हैं। आप इसको किस प्रकार से कार्यान्वित कर सकते हैं। जीवन के हर चरण और क्षेत्र में जो भी लोग अपने ऊपर इस महान दायित्व को लेना जानते हैं केवल उन्हीं लोगों को अधिक से अधिक शक्तियां और अवसर दिये जायेंगे। फिर सहजयोग में आपको मालूम हो जायेगा कि ये सब कितना साफ सुथरा और सरल है… पूर्णतया स्वच्छ। इसमें कुछ भी गड़बड़ नहीं है। जो लोग भी धन दौलत से लेकर स्वयं तक को मुझको समर्पित कर देते हैं …. मुझे अपनी सब बाते बताते हैं … और मैं आपके बारे में सब जानती भी हूं … और आपको मैंने अपने प्रेम के महासागर की गोद में ले लिया है और उनका सहायता करने का हरसंभव प्रयास किया है….. अंदर बाहर सब जगह आपकी समस्यायें सुलझा कर मैंने आपकी सहायता करने का प्रयास किया है।
ये देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि किस प्रकार से सहजयोग आपके लिये एक माँ की तरह से है। इन सभी लाभों को उठाते हुये अभी भी आप अपने खुद के आनंद और आनंद के अपने खुद के विचार के साथ अपनी पहचान कर रहे हैं। आप लोग उस सामूहिक आत्मा का (सहस्त्रार) आनंद नहीं उठा पा रहे हैं जिसको 5 मई 1970 को खोला गया था। जब भी आप लोग साथ होते हैं ….. एक दूसरे के साथ होते हैं …… उस समय आप उन लोगों की तरह से व्यवहार करते हैं जो सहजयोगी नहीं हैं।
आज के दिन आपको निश्चय करना है कि आप अपनी सामूहिक आत्मा का आनंद उठाना प्रारंभ कर देंगे…. आपका सब कुछ सामूहिकता के लिये होना चाहिये। तभी आपका आनंद चरम सीमा पर होगा। आपको लगेगा ही नहीं कि आपने कुछ त्याग किया है। जब तक हमारे पास इस प्रकार के अधिक लोग नहीं होंगे तब तक अन्य की या डिशवाशर्स की कोई आवश्यकता नहीं है। डिशवाशर्स या निम्न श्रेणी के सहजयोगी एकदम बेकार हैं जो केवल फायदा उठाना चाहते हैं और मजे लेना चाहते हैं … कुछ इसी प्रकार के लोग। ये हमारे लिये कुछ विशेष नहीं करने वाले हैं। इसके लिये आपको किसी विशेष बौद्धिक स्तर की आवश्यकता नहीं है, इसके लिये धन की भी आवश्यकता नहीं है … आपको केवल पूर्ण इच्छा मात्र करनी है। आपको मालूम होना चाहिये कि हम उस संपूर्ण को खिला रहे हैं …. उसे विकसित कर रहे हैं जिसके हम अंग प्रत्यंग हैं। अतः आपको प्रण लेना चाहिये कि आपको सहजयोग को अपने व्यक्तिगत स्तर तक नहीं लाना है … और न ही आपकी व्यक्तिगत समस्याओं तक इसको लाना है .. या अपने संबंधों तक लाना है। यह परमात्मा के सृजन से संबंधित है। ये आपका या किसी अन्य का संबंध नहीं है। जिस प्रकार से किसी मशीन में सभी तारों को एक तार द्वारा मेन से जुड़ा होना चाहिये उसी प्रकार से आपको भी व्यक्तिगत रूप से परमात्मा से जुड़ा होना चाहिये ताकि आप सब एक साथ ही जुड़े रहें। मैं बार-बार ये कह रही हूं क्योंकि सहस्त्रार पर आपको इस सामूहिक आत्मा द्वारा आशीर्वादित किया जा रहा है।